शुक्रवार, 18 जून 2010

मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन के बीच बढ़ रही दूरियों

मध्य प्रदेश भाजपा आंतरिक संघर्ष से रूबरू है. सत्ता और संगठन के बीच क्रमश: बढ़ रही दूरियों के कारण राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बढ़ता जा रहा है. प्रभात झा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के अंदर एक नए राजनीतिक ध्रुव का जन्म हुआ है. भारतीय जनता पार्टी सत्ता की दूसरी पारी में आंतरिक संघर्ष की ओर बढ़ती नज़र आ रही है. शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा को राज्य में दूसरी राजनीतिक पारी खेलने का अवसर प्रदान किया है, परंतु राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली विजय का कारण बहुत कुछ कांगे्रस का आंतरिक संघर्ष भी था. भारतीय जनता पार्टी सरकार की पहली पारी में जिस स्तर पर मंत्रियों के भ्रष्टाचार, प्रशासनिक निरंकुशता और भाजपा कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता के मामले सामने आए थे, उससे दोबारा विजय के संकेत तो नहीं ही मिल रहे थे.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है.

भाजपा नेताओं का यह भी मानना है कि दूसरी पारी की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस के अंदरूनी बिखराव की भी रही है. भाजपा के शासनकाल में सत्ता और संगठन के मध्य कभी कोई टकराव नहीं नज़र आता था, लेकिन पिछले दिनों राज्य सरकार की जो गतिविधियां रहीं, उनसे यह सा़फ संकेत मिलने लगा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने अस्तित्व-संरक्षण के लिए नई बिसात बिछाना चाहते हैं. भाजपा संगठन में प्रभात झा की ताजपोशी से यह संदेश मिला था कि पार्टी राज्य में अपनी बुनियाद मज़बूत करने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए कुछ ज़मीनी प्रयोग करना चाहती है. प्रभात झा वास्तव में दल के लिए एक नई कर्मभूमि के निर्माण की कोशिश के लिए ही लाए गए थे. प्रभात झा ने हालांकि अभी तक अपनी टीम की घोषणा नहीं की है, पर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि उनकी टीम में उन्हें ही स्थान मिल पाएगा, जिनका जनता और कार्यकर्ताओं से संपर्क बना हुआ है.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है. भाजपा नेताओं का अंदाज़ा है कि नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता बढ़ाने के पीछे शिवराज सिंह चौहान की प्रशासनिक कमजोरियों को पूरा करने का लक्ष्य है. मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में फिलहाल परिवर्तन के संकेत नहीं हैं, फिर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों पर विभिन्न आरोपों का प्रमाणीकरण विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा कराया जा रहा है. केंद्र के साथ राज्य के संबंधों के प्रति शिवराज सिंह की लापरवाही ने कई केंद्रीय योजनाओं का धन आवंटन रुकवा दिया है. पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रियों द्वारा राज्य में दौरों के पूर्व राज्य सरकार से अनुमति लेने संबंधी सरकारी फतवा स्वयं शिवराज सिंह के लिए भारी पड़ गया है. बाद में मुख्यमंत्री को न स़िर्फ उक्त आदेश वापस लेना पड़ा, बल्कि केंद्रीय नेताओं के समक्ष अपनी स्थिति भी स्पष्ट करनी पड़ी. इधर शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र पुलिस को वापस ले लिया है. यह कार्रवाई कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ की गई, पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ नहीं. प्रशासन के ऐसे दोहरे मापदंड से मध्य प्रदेश सरकार के राजनीतिक-प्रशासनिक असंतुलन का पता चलता है.

प्रशासनिक अराजकता पर नियंत्रण पाने में राज्य सरकार खुद को सक्षम नहीं पा रही है. शासन के प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालने वाला जनसंपर्क विभाग भी अराजकता का गढ़ बन गया है. विभिन्न केंद्रीय विभागों द्वारा भेजे गए जांच दलों की रिपोर्टें केंद्र द्वारा आवंटित राशि में भ्रष्टाचार के खुलासे का प्रमाण बनती जा रही हैं. भाजपा शासनकाल में ही उज्जैन विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद नेताओं द्वारा प्रो. अग्रवाल की कथित हत्या की गुत्थी सुलझाने में सरकार पूरी तरह असफल रही. आज तक पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह और कमल पटेल के विरुद्ध कायम किए गए आपराधिक प्रकरणों में भी सरकार बचाव का कोई मार्ग नहीं तलाश सकी. प्रशासनिक अराजकता की हद तब हुई, जब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की पहल पर राज्य के मुख्य सचिव अवनि वैश्य के विरुद्ध बाक़ायदा वारंट जारी हुआ. राज्य सरकार की गतिविधियों पर संघ और संगठन दोनों की निगाह है. संगठन यह महसूस कर रहा है कि दूसरी बार सत्ता पाने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में दल का आधार निरंतर कम होता जा रहा है. यही कारण है कि वर्ष 2011 के फरवरी माह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिशानिर्देश पर मध्य प्रदेश के आदिवासी ज़िले मंडला में आदिवासी महाकुंभ की घोषणा की गई है.

इस महाकुंभ में बीस लाख आदिवासियों को एकत्र करने की योजना बनाई गई है. महाकुंभ को भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं द्वारा संबोधित किया जाना है. संघ की इस पहल पर आयोजन के एक वर्ष पूर्व राज्य सरकार सौ करोड़ रुपये से अधिक के अनुमानित व्यय का लक्ष्य बना चुकी है. वास्तव में भाजपा तीसरी बार सत्ता पाने के लिए परिवर्तन की लहर चलाना चाहती है. संगठन के पदाधिकारियों का मानना है कि यदि तीसरी बार भाजपा सत्ता पर क़ाबिज़ होती है तो मध्य प्रदेश को गुजरात की तरह सुरक्षित राज्य घोषित करने में परेशानी नहीं होगी. दूसरी ओर मध्य प्रदेश को केंद्र बनाकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी स्थायी सत्ता कायम रखी जा सकेगी. भाजपा ने इस कार्य के लिए अपने स्वयंसेवी संगठनों को भी सक्रिय करना शुरू कर दिया है. जन अभियान परिषद के माध्यम से मध्य प्रदेश के सुदूर आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में संघ समर्थित स्वयंसेवी संगठनों का एक बड़ा ताना-बाना तैयार किया जा रहा है. तीन वर्ष की अवधि में निर्धारित योजना के अनुसार सत्ता का लाभ भाजपा के छोटे से छोटे कार्यकर्ता तक पहुंचाना और उसे वित्तीय रूप से स्वावलंबी बनाना एकमात्र लक्ष्य नज़र आता है. भाजपा संगठन राजनीति में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका से भलीभांति परिचित है. उसे मालूम है कि राजनीति की कमज़ोरियों को ढकने के लिए यदि मीडिया एक प्रभावशाली तंत्र है तो स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. एक अनुमान के अनुसार, इस समय मध्य प्रदेश में 1700 से अधिक स्वयंसेवी संगठन भाजपा एवं स्वयंसेवक संघ की रीतियों और नीतियों के तहत काम करने के लिए सक्रिय हो चुके हैं. राज्य के समस्त वित्तीय संसाधन इन स्वयंसेवी संगठनों के लिए खुले रहेंगे.

प्रभात झा के सक्रिय होने के बाद संगठन की सक्रियता अब सत्ता पर नज़र आने लगी है. कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से लेकर प्रशासनिक परिवर्तनों तक संगठन की भूमिका को नकार पाना अब शिवराज सिंह के वश की बात नहीं है. यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सत्ता को स्वयंसेवक संघ की नीतियों के अंतर्गत संगठित रूप से संचालित करने के लिए अभी कई परिवर्तन नज़र आने शेष हैं. प्रभात झा की टीम के गठन के बाद यह स्पष्ट है कि भाजपा शिवराज पोषित रहेगी या अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहकर राज्य में एक स्थायी राजनीतिक आकार ग्रहण कर सकेगी.

कांग्रेस दौ़ड में ही नहीं देश में राजनीतिक रूप से कांग्रेस का अस्तित्व मृतप्राय है. कांग्रेस की गतिविधियां बताती हैं कि वह दौड़ में है ही नहीं. व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त राज्य के कांग्रेसी नेता भाजपा की किसी भी चाल का जवाब देने में असफल रहे हैं. मज़बूत संगठन शक्ति के प्रतीक समझे जाने वाले सुरेश पचौरी पिछले दो माह के दौरान केवल अपने राज्यसभा टिकट के लिए संघर्षरत दिखे. कांग्रेस के भविष्य को लेकर यह किंवदंती प्रचलित है कि जब भाजपा सरकार में बिना किसी रोक-टोक के व्यक्तिगत कमाई का रास्ता खुला हुआ है तो अपनी सरकार के लिए पहल करने की ज़रूरत ही क्या है. अपने-अपने राजनीतिक आकाओं को हाज़िरी देकर और हाईकमान के सामने मीडिया में छपे हुए तथ्यों का विश्लेषण करके राज्य कांग्रेस के नेता अपने राजनीतिक दायित्वों को पूरा कर रहे हैं. वे राजनीति से अधिक अपने व्यवसाय में व्यस्त हैं और कार्यकर्ता पूरी तरह उपेक्षित. कांग्रेस के लिए संभवत: मध्य प्रदेश अब प्राथमिकता सूची में नहीं है.

1 टिप्पणी:

  1. आप प्रभात झा के अंध भक्त हैं क्या, प्रभात झा का चयन मध्यप्रदेश भाजपा के लिए उचित नहीं है। उनके स्थान पर प्रहलाद पटेल या किसी अन्य जनाधार वाले नेता को क्यों अध्यक्ष नहीं बनाया गया। प्रभात जी तो राज्य के ही कई जिलों में अब तक एक बार भी नहीं गए हैं

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