बुधवार, 18 मई 2011

शिवराज के खिलाफ उमा को हथियार बनाने की तैयारी

विनोद उपाध्याय
उमा भारती के भारतीय जनता पार्टी में वापसी के मुद्दे पर म.प्र. से लेकर दिल्ली तक महाभारत की शुरूआत हो गई है। लेकिन राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं कि उमा भारती के पक्ष में माहौल बनाने वाले भी भारतीय जनता पार्टी के भले के लिये नहीं बल्कि शिवराज सिह चौहान को झुकाने के लिये व उनके खिलाफ माहौल बनाने के एक हथियार के तौर पर उमा भारती को इस्तेमाल कर रहे हैं।
साध्वी व पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के भारतीय जनता पार्टी में वापसी के मुद्दे पर म.प्र. से लेकर दिल्ली तक महाभारत की शुरूआत हो गई है एक तरफ बाबूलाल गौर के नेतृत्व में सांसद सुमित्रा महाजन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ व भाजपा के लौह पुरूष लाल कृष्ण आडवाणी हैं दूसरी ओर उमाभारती के रास्ते में मुख्य रूकावट मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान , श्रीमती सुषमा स्वराज , अरूण जेठली और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सुरेश सोनी की लॉबी सक्रिय है । दरअसल म.प्र. की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान जिस तरह से कार्यकर्ताओं व मंत्रियो को हतोत्साहित व सरकारी अधिकारियों को उपकृत करने की राह पर चले हैं व भाजपा के म.प्र. के इकलौते नेता के तौर पर उभरे हैं वह उनके विरोधियों को कांटे की तरह चुभ रहा है।
मुख्यमंत्री ने जिस प्रकार लाड़ली लक्ष्मी योजना व अन्य जनहितैषी योजनाओं की शुरूआत की है वह फाईलों को निपटाने की एक समय सीमा तय की है। उससे उनके समर्थक शिवराज सिंह चौहान को भाजपा की राजनीति का मुख्य चेहरा बनाने की कोशिश मे है वहीं मंत्रियों के खिलाफ जिस सुनियोजित ढंग से खबरें मीडिया के जरिये बाहर आ रही हैं उससे उन मंत्रियो की छवि को क्षति पहुंच रही है जो किसी न किसी ढंग से मुख्यमंत्री के ताज को पहनने के इच्छुक थे। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने जिस तरह के बगावती तेवर दिखाये हैं उससे यह साफ प्रतीत होता है कि उमा भारती की आड़ में असंतुष्ट मंत्रियो को एक करने की कबायद की जा रही है। गौरतलब है विगत दिनों पूर्व उप प्रधानमंत्री व लौह पुरूष लाल कृष्ण आडवाणी की पहल पर जसवंत सिंह को पुन: भाजपा में शामिल कर लिया गया है। पिछले वर्ष में पाकिस्तान के संस्थापक मो. अली जिन्ना के उपर लिखी गई एक चर्चित किताब के बाद पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया था क्योंकि इस किताब में जसवंत सिंह ने जिन्ना के बजाये नेहरू के नजरिये को देश बटवारे के लिये जिम्मेदार बताया था जबकि जिन्ना को लेकर संघ परिवार की आम राय यह रही है कि बटवारे के मुख्य अपराधी जिन्ना ही थे। पूर्व मंत्री जसवंत सिंह की पार्टी में दोबारा वापसी पर भी जसवंत सिंह ने खुले तौर पर जिन्ना के बारे में अपने नजरिये को वापस नहीं लिया यहां तक कि खेद भी व्यक्त नहीं किया । इस मुददे पर भाजपा का पूरा नेतृत्व भी चुप्पी साध गया इसी फार्मूले के तहत पैसे के बदले सवाल पूछने के घोटाले में रंगे हाथ स्टिंग ऑपरेशन में पकडे गये व पार्टी से निकाले गये अन्ना पाटिल को दोबारा भाजपा में शामिल कर पवित्र कर लिया गया । इन्हीं फामूर्लो की आड लेकर बाबूलाल गौर ने उमा भारती के मुद्दे पर काफी कडा रूख अपना लिया है व भाजपा नेतृत्व को स्पष्ट संकेत दे दिये हैं कि वे अपना अभियान बंद नही करेगें भले ही उन्हें ही मंत्री पद से इस्तीफा क्यों न देना पडे।
उमा भारती की वापसी से भाजपा को फायदा क्या होगा यह प्रश्न है किन्तु शिवराज सिंह के राजनैतिक प्रेक्षकों का मानना है कि उमा भारती की भाजपा में वापसी से शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ लॉबिग तेज हो जायेगी। इंदौर से जीत का रिकार्ड बना चुकी व मुख्यमंत्री पद की एक सशक्त दावेदार सुमित्रा महाजन भी उमा भारती के भाजपा में पुर्नप्रवेश की वकालत की है। शिवराज सिंह चौहान के मंत्री मंडल में शामिल वरिष्ठ मंत्री, कैलाश विजय वर्गीज , रंजना बघेल, नागेन्द्र सिंह, अजय विश्नोई, उमाशंकर गुप्ता भी उमा भारती के पक्ष में दिखाई प्रतीत होते हैं। बेलगांव की घटना के बाद मंत्री अनूप मिश्रा के इस्तीफे के बाद से मुख्यमंत्री के मंत्रियो को भरोसा हो गया है कि शिवराज सिंह चौहान उन्हे बचाने के लिये कभी भी आगे नही आयेगें व पी.वी. नरसिन्हाराव की तरह अपनी सफेद चादर बचाकर दूसरों के दामन पर दाग पडने पर उस दामन को झटक देगें। मंत्रियो का मानना है कि बेलगाव घटना के समय अनूप मिश्रा उज्जैन में थे व उनका बेटा घटना स्थल पर नहीं था मंत्रियो का यह भी मानना है कि अटल बिहारी बाजपेयी के भान्जे व ब्राम्हणों के नेता के तौर पर स्थापित अनूप मिश्रा जिस घटना में मंत्री मंडल से बाहर हुये या किये गये वह उसके पात्र नहीं थे वह भाजपा की अंदरूनी राजनीति के शिकार हुये हैं। मंत्री यह भी भयभीत है कि शिवराज सिंह चौहान की कार्यशैली पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अनुरूप है कि म.प्र. में अपने से ज्यादा नामवर नेता स्थापित न रहें ताकि भविष्य में उनके नेतृत्व के खिलाफ कोई भी आवाज न उठे। उमा भारती की वापसी से भाजपा को फायदा क्या होगा यह एक यक्ष प्रश्न है किन्तु शिवराज सिंह के करीबी तथा राजनैतिक प्रेक्षकों का मानना है कि उमा भारती की भाजपा में वापसी से शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ लॉबिग तेज हो जायेगी। यह भी एक कटु सत्य है कि उमा भारती चाहे जितने वायदे कर लें कि वह म.प्र. की राजनीति में ज्यादा दिलचस्पी नही लेगंी लेकिन व्यवहारिक रूप से यह संभव नही है क्योंकि उमा की जन्म भूमि व कर्मभूमि म.प्र. ही रही है। उनकी लोकप्रियता के चलते दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज नेता के नेतृत्व वाली को 2003 में बुरी तरह से हार का सामना करना पडा था।
कांग्रेस के दिग्गज नेता भी उमा भारती की कार्यशैली के चलते यह नहीं चाहते कि उमा भारती भाजपा में भाजपा मे वापिस आयें। उमा श्री भारती लोध समुदाय की एक क्षत्र नेता व राम मंदिर आंदोलन के दौर में संघ परिवार की सबसे तेज तर्रार नेता मानी जाती थी । चुनाव में नेताओं के विश्वासघात व कलह के बाद भी उमा भारती के नाम से 5 प्रतिशत से अधिक वोट मिलना भी अपने आप में एक मायने है। किन्तु अफसोस उमा भारती के पक्ष में माहौल बनाने वाले भी भारतीय जनता पार्टी के भले के लिये नहीं बल्कि शिवराज सिह चौहान को झुकाने के लिये व उनके खिलाफ माहौल बनाने के एक हथियार के तौर पर उमा भारती को इस्तेमाल कर रहे हैं व उमा भारती से डर कर मुख्यमंत्री उनका विरोध कर रहे हैं। भाजपा का हित सोचने की किसी को फुरसत नहीं है म.प्र. का प्रशासन खनन माफिया , वन माफिया , शराब माफिया , भू माफिया, के हाथो का खिलौना बना हुआ है किन्तु मंत्रियो को आपस में लडने से फुरसत नहीं। हालाकि यह म.प्र. का अभिशाप ही है कि इस प्रदेश में चाहे कांग्रेस की सरकार रही हो या भाजपा की मुख्यमंत्री के खिलाफ मुख्यमंत्री के खिलाफ हमेशा से बगावती तेवर हमेशा रहे हैं। 1962 से लेकर सिर्फ दिग्विजय सिंह व शिवराज सिह चौहान ही ऐसे मुख्यमंत्री रहे हैं जो पांच वर्ष से अधिक म.प्र. के मुख्यमंत्री के तौर पर स्थापित रहे है। कुल मिलाकर भाजपा में जो महाभारत चल रही है उसके आत्मघाती दुष्परिणाम भाजपा को ही भोगना पडेगा वैसे भी भाजपा की छवि कांग्रेस से ज्यादा भ्रष्ट होने की बनती जा रही है। अब यह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर निर्भर करता है कि वह भाजपा का भला सोचे मुख्यमंत्री का भला सोचे या असंतुष्टो का भला सोचे । जनता को तो पिसना ही है।

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