सोमवार, 15 सितंबर 2014

शिवराज के दागदार सारथी

vinod upadhyay
भोपाल। चाल,चेहरा और चरित्र की बात करने वाली भाजपा के मंत्रियों और नेताओं ने मप्र को इस कदर लूटा है कि प्रदेश कंगाल हो गया है। भाजपा के पिछले शासनकाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, उनके मंत्रियों, भाजपा नेताओं ने भ्रष्टाचारियों और सत्ता के दलालों से सांठगांठ कर एक लाख छियालिस हजार सत्ततर करोड़ का घोटाला कर मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार का एक नया इतिहास बनाया। प्रदेश के इतिहास में इस सबसे बड़े घोटाले की शिवराज सरकार ने प्रदेश को ब्यानवे हजार करोड़ रूपए का कर्जदार बना दिया। स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने का दावा करने वाले खुद स्वर्णिम बन गए और प्रदेश को कंगाल बना दिया। भाजपा के भ्रष्टाचार की परते धीरे-धीरे खुलने लगी है। व्यापमं घोटाले में भाजपा के पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा जेल में हैं,वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित कई वर्तमान और पूर्व मंत्री आरोपों के घेरे में हैं। यही नहीं वर्तमान 4 मंत्रियों बाबूलाल गौर, कैलाश विजयवर्गीय, जयंत मलैया,गौरीशंकर बिसेन और 8 पूर्व मंत्रियों लक्ष्मीकांत शर्मा, अजय विश्नोई, अनूप मिश्रा, चौधरी चन्द्रभान सिंह, अखंड प्रताप सिंह, महेन्द्र हार्डिया, कमल पटैल व राघवजी के खिलाफ लोकायुक्त में मुकदमा दर्ज है। लेकिन सत्ता के रसूख के कारण अभी लोकायुक्त संगठन भी इनकी ढाल बना हुआ है। हालांकि हालही में जबलपुर उच्च न्यायालय ने कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच करने का निर्देश लोकायुक्त को दिया है। भाजपा के इन वर्तमान और पूर्व मंत्रियों के अलावा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह,नरोत्तम मिश्रा, गोपाल भार्गव,पारस जैन,राजेंद्र शुक्ला, जगदीश देवडा, तुकोजीराव पवार, जगन्नाथ सिंह, डॉ. रामकृष्ण कुसमारिया, नागेन्द्र सिंह और अर्चना चिटनिस भी विभिन्न भ्रष्टाचार और घोटालों में आरोपी हैं। साप्ताहिक खबरयार ऐसे ही कुछ दागदार वर्तमान और पूर्व मंत्रियों द्वारा किर गए भ्रष्टाचार और घोटाले की रिपोर्ट यहां प्रस्तुत कर रहा है।
- शिवराज सिंह चौहान
लोकायुक्त संगठन में प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एवं उनकी पत्नी साधना सिंह के खिलाफ 15 नवम्बर 2007 को भोपाल जिला न्यायालय के आदेश पर डंपर खरीदी मामले में प्रकरण कायम किया गया था। मुख्यमंत्री ने पुराने मित्र पूर्व केन्द्रीय मंत्री प्रहलाद पटेल ने डंपर खरीदी मामला उठाया था। इस प्रकरण में मुख्यमंत्री अथवा उनकी पत्नी को बयान देने के लिए लोकायुक्त संगठन में कभी नहीं बुलाया गया है। बल्कि संगठन के एक अधिकारी ने मुख्यमंत्री निवास पहुंचकर मुख्यमंत्री एवं उनकी पत्नी के बयान दर्ज करने की औपचारिकता पूरी कर ली है तथा मामले में उन्हें क्लीन चिट दे दी गई। इस घोटाले से जैसे-तैसे निकले मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी का नाम अब व्यापमं घोटाले में भी सामने आया है।
-लक्ष्मीकांत शर्मा
पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा अभी व्यापमं घोटाले में एसटीएफ की कस्टडी में हैं। देश के सबसे बड़ा यह घोटाला इन्हीं के कार्यकाल में हुआ है। इस घोटाल से पहले इन पर 25 जुलाई 05 में खनिज लीज घोटाले में लोकायुक्त में मामला दर्ज है। हाईकोर्ट के कई निर्देश के बाद भी लोकायुक्त संगठन जांच में कोताही बरतता रहा। लेकिन 2013 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद इनका रसूख जाता रहा और इनके उच्च और तकनीकी शिक्षा मंत्री रहते व्यापमं में हुए घोटाले में दोषी पाए जाने पर हाईकोर्ट की फटकार के बाद उन्हें एसटीएफ ने गिरफ्तार किया है। स्पेशल टास्क फोर्स के पास मौजूद सबूतों में यह पता चला है कि पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने 40 से अधिक सिफारिशें की थीं। इसमें संघ से जुड़े लोगों के अलावा उनके विधानसभा क्षेत्र के कार्यकर्ताओं के नाम भी शामिल हैं। इसमें से चार कार्यकर्ताओं को वे पिछली पूछताछ में पहचान चुके थे। एसटीएफ ने पूर्व मंत्री की सिफारिश से पास हुए सिरोंज निवासी तीन लोगों को एसटीएफ ने गिरफ्तार किया था।
पुजारी से लेकर मंत्री तक का सफर
पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा पहले पुजारी थे। इसके बाद वे सरस्वती स्कूल में शिक्षक बने। चार सौ रूपए की तनख्वाह पाने वाले शर्मा की राजनीतिक इच्छा शक्ति जागी। उन्होंने इसके लिए स्कूल के माध्यम से संघ का रास्ता चुना। 1993 में सिरोंज से विधायक चुने गए। ओपी शुक्ला को शर्मा ही डेपुटेशन पर लेकर आए थे। इसके साथ ही उन्होंने पंक ज त्रिवेदी का व्यापमं में पदस्थापना कराई। इन दोनों तैनाती को लेकर शर्मा पर आरोप लगते रहे हैं। शर्मा पिछले वर्ष विधानसभा चुनाव हार गए। इसके बाद वे सागर से लोकसभा का टिकट मांग रहे थे। एक वक्त में सीएम की दौड़ में रहे लक्ष्मीकांत शर्मा आज सलाखों के पीछे पहुंच गए हैं।
संघ पदाधिकारियों का नाम!
पूर्व मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा पर दूसरी परीक्षाओं में सिफारिश करने के आरोप लगे हैं। बताया जाता है कि उनका नाम नाप-तौल और पीएमटी परीक्षा में सिफारिश करने में भी है। नाप-तौल परीक्षा के एक अभ्यर्थी मिहिर की सिफारिश संघ नेता ने की थी। इसका खुलासा पूर्व मंत्री के ओएसडी रहे ओपी शुक्ला ने किया था। इस महाघोटाले में संघ के एक बड़े पदाधिकारी का भी नाम सामने आ रहा है। हालांकि एसटीएफ इस बात से इनकार कर रही है।
-जयंत मलैया
वित्त मंत्री जयंत मलैया पर लोकायुक्त में चार मामले दर्ज हैं। पहला 19 मार्च 2007 पद को दुरूपयोग का। दूसरा 31 मार्च 2008 को बिल्डर को 20 करोड़ का लाभ पहुंचाने का। तीसरा 2 मई 2008 श्रीराम बिल्डर को अवैध लाभ पहुंचाने का, और चौथा 9 जून 2008 पद के दुरूपयोग का। हालांकि इनमें से तीन मामलों में लोकायुक्त ने उन्हें क्लीनचीट दे दिया है। मलैया भाजपा के पिछले शासनकाल में जब आवास एवं पर्यावरण मंत्री थे तब उन पर इंदौर में एक बिल्डर को अपने पद का दुरूपयोग कर जमीन आवंटित करने का आरोप है। कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता केके मिश्रा ने लोकायुक्त से शिकायत कर मलैया सहित पांच अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करने की मांग की। लोकायुक्त से की गई शिकायत में कहा गया है कि इंदौर की विकास योजना क्रमांक 54 में बस टर्मिनल और बस स्टेंड हेतु दस एकड़ जमीन आरक्षित की गई थी। इस जमीन में लगभग चार एकड़ भूमि बस स्टैंड का एकीकृत भाग रखते हुए व्यवसायिक निर्माण की अनुमति दी गई थी। शिकायत में कहा गया है कि यह भूमि बस स्टैंड तथा ट्रान्सपोर्ट नगर के मास्टर प्लान में होने के बावजूद इसे आवासीय बताकर कॉलोनी के लेआउट को स्वीकार किया गया है। इस सारी कवायद के जरिए श्रीराम बिल्डर्स को सौ करोड़ रुपए का लाभ हुआ है।
-कैलाश विजयवर्गीय
इंदौर के करीब 100 करोड़ के बहुचर्चित सुगनी देवी जमीन घोटाले में मई 2013 में लोकायुक्त ने भले ही नगरीय प्रशासन और विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को क्लीनचीट दे दिया,लेकिन इसके दाग अभी भी उन पर हैं। कांग्रेस नेता सुरेश सेठ कहते हैं कि लोकायुक्त ने जानबुझकर कैलाश विजयवर्गीय को बचा लिया, जबकि इस मामले में विजयवर्गीय ही प्रमुख आरोपी हैं। मामला सन 2004 का है जब कैलाश विजयवर्गीय महापौर थे। इंदौर नगर निगम के आधिपत्य की 3 एकड़ जमीन की लीज खत्म होने के बाद धनलक्ष्मी केमिकल के मालिकों ने इसे निगम के पास सरेंडर करने की बजाए रमेश मंदोला की नंदानगर साख संस्था को सौंप दी। जमीन के इस अवैध हस्तातरंण में नगर निगम इंदौर के तत्कालीन मेयर इन काउंसिल ने भी अपनी सहमति दी थी। इस जमीन की बाजार कीमत 100 करोड़ रुपया है। 5 अगस्त 2010 को लोकायुक्त पुलिस ने मामले में एफआईआर दर्ज की। इसमें मौजूद तथ्य बताते हैं कि पूरे मामले में कैलाश विजयवर्गीय की अहम भूमिका थी। विवाद और कैलाश विजयवर्गीय एक दूसरे के पर्याय विवाद और कैलाश विजयवर्गीय एक दूसरे के पर्याय हो गये हैं। विजयवर्गीय को विवादों में रहना रास आने लगा है। यही वजह है कि उनके बयान किसी न किसी विवाद को नया जन्म दे रहे हैं। उनका राजनीतिक सफर विवादों से भरा पड़ा है। कभी वे मोदी के निकट होने का दिखावा करते हैं, तो कभी शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश का सबसे बड़ा नेता बताने में कोताही नहीं बरतते हैं।
-गौरीशंकर बिसेन
मप्र की भाजपा सरकार में गौरीशंकर बिसेन सबसे विवादास्पद मंत्री रहे हैं। इन पर कई संगीन आरोप लगे हैं। अभी हालही में हाईकोर्ट ने एक पुरानी याचिका को संज्ञान में लेते हुए कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन के खिलाफ लोकायुक्त जांच के आदेश दिए हैं। पूर्व विधायक किशोर समरीते ने 2012 में यह याचिका कोर्ट में लगाई थी और बिसेन पर आय से अधिक संपत्ति और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। बिसेन ने विभिन्न पदों पर रहते हुए भ्रष्टाचार के द्वारा भारी संपत्ति अर्जित की। याचिका में आरोप लगाया गया था कि बिसेन ने 1984 से लेकर अभी तक बेहिसाब संपत्ति अर्जित की। याचिका में बताया गया था कि बिसेन के पास 50 लाख का फ्लैट पूना में (बेटी मौसमी के नाम), बीवी के नाम पर भी 90 लाख का फ्लैट, बालाघाट में कलेक्ट्रेट के सामने ढ़ाई करोड़ की जमीन, पत्नी के नाम पर काफी जमीन, सेनेटरी पाइप की एक फैक्ट्री जो 90 लाख में खरीदी है। याचिका दायर करने के बाद पैरवी नहीं करने से मामला ठंडे में पड़ा रहा, कोर्ट के सामने याचिका आई तो कोर्ट ने स्वत: संज्ञान में लिया और लोकायुक्त जांच के आदेश दे दिए। संपत्ति के ब्यौरे को बनाया आधार- 19 जून को मुख्य न्यायाधीश अजय माणिकराव खानविलकर व जस्टिस आलोक आराधे की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान हाईकोर्ट का ध्यान जनहित याचिकाकर्ता किशोर समरीते द्वारा आरटीआई के जरिए हासिल किए गए मंत्री गौरीशंकर बिसेन के संपत्ति के ब्यौरे की ओर आकृष्ट कराया गया। इसके जरिए स्पष्ट किया गया कि मंत्री बिसेन ने 2004 से 2012 के बीच अपनी वास्तविक आय से 2 करोड़ रुपये अधिक की सपंत्ति अर्जित कर ली है। लिहाजा, लोकायुक्त जांच की मांग मंजूर किए जाने योग्य है।
भ्रष्टाचारपूर्वक अर्जित संपत्तियां-
मंत्री बिसेन के खिलाफ जनहित याचिका में आरोप लगाया गया है कि उन्होंने पद का दुरूपयोग करते हुए खुद, पत्नी व बच्चों के नाम पर करोड़ों की संपत्तियां अर्जित की हैं। 1- बेटी के नाम पर पुणे में 50 लाख का मकान। 2- बालाघाट में खुद के नाम का ढाई करोड़ का मकान। 3- पत्नी के नाम पर बालाघाट में 91 लाख का एक और मकान। 4- पाइप बनाने की 90 लाख की फैक्टरी।
कैबिनेट मंत्री गौरीशंकर बिसेन की आय से अधिक संपत्ति के मामले को हाईकोर्ट ले जाने वाले पूर्व विधायक किशोर समरीते ने जांच के दायरे में उनके रहते हुए सभी ठेकों को लेने की मांग की है। समरीते ने बताया कि बिसेन ने करीब दो हजार करोड़ रुपए की नामी-बेनामी संपत्ति बनाई है। पत्नी, बेटी, साले और दूरदराज के रिश्तेदारों के नाम पर भूमि में बड़ा निवेश किया है। कुछ कंपनियों में घोषित व अघोषित हिस्सेदारी भी है। जब बिसेन सहकारिता मंत्री थे तब गृह निर्माण समिति की जांच आदि के मामले में करोड़ों के वारे-न्यारे किए। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री रहते हुए चार करोड़ से अधिक की जल आवद्र्घन योजनाओं के ठेकों में कमीशनबाजी हुई है। पाइप खरीदी से लेकर ड्रिलिंग मशीन की खरीदी में खेल हुआ है। कृषि मंत्री रहते हुए कागजों पर ही पूरा काम हो रहा है। हाईकोर्ट ने लोकायुक्त को जांच के आदेश दिए हैं। जांच के दायरे में बिसेन के मंत्रित्वकाल में हुए ठेकों की भी जांच होनी चाहिए। साथ ही मुख्यमंत्री को इन्हें पद से बर्खास्त करना चाहिए। समरीते ने बिसेन के स्टाफ को भी कटघरे में खड़ा किया है।
-पारस जैन
वर्तमान स्कूल शिक्षा मंत्री पारस जैन जब पिछली सरकार में खाध एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री थे तब उनके खिलाफ भी एक 25 करोड़ के बड़े भूमि घोटाले को लेकर लोकायुक्त में प्रकरण दर्ज हुआ है। पारस जैन और उनके परिजनों पर दबाव डालकर नियम विरूद्व उज्जैन जिले में सीलिंग की सरकारी भूमि हथियाने का गंभीर आरोप लगा है। चिमनगंज 26 जुलाई 84 के अनुसार कस्बा उज्जैन की भूमि रकबा 1.786 हेक्टेयर तथा ग्राम पंडयाखेड़ी की भूमि सर्वे क्र. 6,8,9 व 7 पेकी 2.282 हेक्टेयर का कब्जा धारा 10 (6) के अंतर्गत दिनांक 11 सितम्बर 86 को लिया था। उक्त भूमि का बाजार मूल्य तकरीबन 25 करोड़ रूपए है। पारस जैन ने इन भूमियों के नाम पर राजनैतिक दबाव में कब्जा करके मोहनलाल जाट से फर्जी अनुबंध लेख दिनांक 20 मई 74 को करना बता कर तत्कालीन तहसीलदार नित्यानंद पांडे से उसका नामांतरण अपने नाम से भूमि स्वामी बतौर 26 सितंबर 2005 को करा लिया। साथ ही उन्होंने कस्बा उज्जैन की 1.787 हेक्टेयर भूमि पर भी कब्जा कर रखा है। इस भूमि घोटाले में मंत्री पारस जैन के अलावा उनकी पत्नी श्रीमती अंगूरबाला जैन, भाई विमलकुमार जैन, पूर्व राजस्व मंत्री कमल पटेल तथा तत्कालीन तहसीलदार नित्यानंद पांडे को आरोपी बनाया गया है।
-अजय विश्रोई
पूर्व मंत्री अजय विश्रोई भी हमेशा विवादों में रहे हैं। जब वे स्वास्थ्य मंत्री थे तब उनके खिलाफ 29अप्रैल 2008 को दवा खरीदी में घोटाला के मामले में लोकायुक्त में मामला दर्ज है। उसके बाद जब वे पिछली सरकार में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री थे तब उन पर आरोप लगा कि उन्होंने एक अफसर को पोस्टिंग देने के लिए एक बिचौलिए के जरिए उनकी पत्नी की मांग कर डाली। वक्फ बोर्ड कमेटी के पूर्व सीईओ डॉ. सैयद मुजाहिद हुसैन जैदी ने विश्नोई के खिलाफ व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2 की अदालत में इस आरोप का परिवाद पेश किया था। परिवाद में डॉ. हुसैन ने कहा था कि विभागीय मंत्री की मांग उनके बंगले में मौजूद शौकत खान नामक व्यक्ति के माध्यम से आई थी। डॉ. हुसैन ने इस मामले की शिकायत भाजपा के आला पदाधिकारियों को भी की। विश्नोई पर ये आरोप भी है कि अल्पसंख्यक कल्याण विभाग संभाल रहे विश्नोई का आदेश न मानने पर हुसैन को प्रताडि़त किया गया। वक्फ बोर्ड में मुख्य कार्यपालिक अधिकारी का दायित्व संभाल रहे सैय्यद मुजाहिद हुसैन जैदी का न केवल तबादला हुआ, बल्कि उनके खिलाफ विभागीय जांच भी करवाई गई। वेतन भी रोक लिया गया। इतना ही नहीं जिन लोगों ने जैदी की मदद की उन्हें भी प्रताडि़त किया गया।
-अर्चना चिटनीस
पूर्व शिक्षा मंत्री चिटनिस के खिलाफ अपने कार्यक्षेत्र के बाहर जाकर एक किताब को अनुदान देने और ब्लैकबोर्डो को काले से हरे रंग का किए जाने के मामले में लोकायुक्त में शिकायत दर्ज है। उन पर आरोप है कि प्रदेश स्तर पर ग्रीन बोर्ड पुतवाने में बड़ी गड़बड़ी हुई है। साथ ही एनसीईआरटी के नियमों को ताक पर रखकर आरएसएस से संबंधित संस्था की 'देवपुत्रÓ किताब खरीदा है। साथ ही इसे अगले 15 साल तक खरीदने के लिए करीब 13 करोड़ रुपए का अग्रिम भुगतान भी कर दिया गया है। मजेदार बात तो यह है कि मिडिल स्कूल स्तर की यह किताब प्राइमरी के बच्चों को उपलब्ध कराई गई। देवपुत्र के कारण ही एनसीईआरटी की बरखा सीरीज की उन किताबों को नकार दिया गया, जो वाकई उपयुक्त हैं। जिम्मेदारों का तर्क था कि देवपुत्र से पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों में पढऩे और समझने की आदत बढ़ेगी। लेकिन हकीकत में ये व्यावसायिक मासिक पत्रिका है, जिसमें मध्यप्रदेश और छग सरकार के विज्ञापन छपे हैं। दरअसल 'देवपुत्रÓ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के अनुषांगिक संगठन विद्या भारती से संबद्ध पत्रिका है। आरोप है कि पूर्व स्कूल शिक्षा विभाग की मंत्री अर्चना चिटनीस ने आरएसएस को उपकृत करने के लिए 'देवपुत्रÓ को स्कूलों के लिए खरीद लिया है। इस किताब के प्रकाशक एवं संपादक कृष्ण कुमार अष्ठाना हैं। अष्ठाना आरएसएस मालवा प्रांत के संघ चालक रहे हैं।
-राघव जी
प्रदेश के पूर्व मंत्री राघव जी पर अप्राकृतिक कृत्य का आरोप लगा है। इस कारण उनकी कुर्सी तो गई ही उन्हें जेल भी हुई और पार्टी से भी निकाल दिया गया। राघव जी पर उनके नौकर राजकुमार दांगी आरोप लगाया था। उसका आरोप था राघवजी ने उसे शराब कम्पनी सोम डिस्टलरी में नौकरी लगवा दी। वह मंडीदीप से आना जाना करता था, वह राघवजी के घर जाता तो वह उससे हाथ पैर दबवाते, उसके बाद गुप्तांगों पर मालिश करवाते और अप्राकृतिक कृत्य भी करते। राजकुमार का आरोप है कि राघवजी उसे लगातार नौकरी का प्रलोभन देते रहे, इतना ही नहीं अपनी कारगुजारियों को उजागर करने पर जान से मारने की धमकी देते थे। यही कारण रहा कि वह चाहकर भी राघवजी के कारनामे उजागर नहीं कर पाया। लगभग साढ़े तीन साल तक यह सिलसिला चला। राजकुमार का आरोप है कि राघवजी उससे लगातार नई-नई लड़कियां लाने और दोस्ती कराने की बात कहते थे और भरोसा दिलाते थे कि जो काम कहोगे करा देंगे। वे अश्लील बातें भी करते थे और एसएमएस भी। इसके अलावा उनके कई महिलाओं व नए लड़कों से भी सम्बंध हैं। वे यह सब वर्षों से करते आ रहे हैं। इस मामले के उजागर होने के बाद प्रदेश में जमकर बवाल मचा था।
-नागेंद्र सिंह
पूर्व मंत्री और वर्तमान सांसद नागेंद्र सिंह पर आरोप है कि लोक निर्माण मंत्री रहते उन्होंने विभाग में तीन अधीक्षण यंत्रियों को मुख्य अभियंता पद पर पदोन्नति में नियमों की अवहेलना कर करोड़ों रूपयों का लेन-देन किया था। यह आरोप पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने लगाया था। आरोपा है कि 19 सितम्बर 2013 को लोक निर्माण विभाग ने अधीक्षण यंत्री के पद पर पदस्थ जी.पी. कटारे, पी.के. श्रीवास्तव एवं जी.पी. मेहरा को मुख्य अभियंता के पद पर पदोन्नति के आदेश जारी किया जिसमें से जिन दो अधिकारियों की सी.आर. प्रमुख सचिव लोक निर्माण के.के. सिंह ने इनके प्रतिकूल काम-काज के चलते ''क'' प्लस से ''क'' कर दी थी, उसे लोक निर्माण मंत्री ने नियम विरूद्ध ''क'' प्लस करके उन्हें पदोन्नति दिला दी। इन पदों के लिए डी.पी.सी. उस समय की गई जब प्रमुख सचिव लोक निर्माण प्रशिक्षण पर गए हुए थे। आचार संहिता लगने से पहले ताबड़तोड़ विभाग के उच्च पदों के लिए जो डी.पी.सी. की गई उसमें न प्रमुख सचिव उपस्थित थे और न ही विभाग के उपसचिव थे। विभाग के उपसचिव को भी जिस दिन डी.पी.सी. थी उस दिन उन्हें छुट्टी पर भेज दिया गया। डी.पी.सी. में शासन की तरफ से विभाग के ओर से अंडर सेकेट्री ने प्रतिनिधित्व किया। नियमानुसार मंत्री को अधीक्षण यंत्री की सी.आर. लिखने की भी पात्रता नहीं है। यही नहीं पूर्व मंत्री ने अपने चहेते अधिकारियों को एप्को और मंडी बोर्ड में मुख्य अभियंता के रिक्त पदेां के विरूद्ध पदोन्नति दिलाई।
-कमल पटेल
दुर्गेश हत्याकांड के चलते अपना मंत्री पद गंवाने वाले कमल पटेल को जेल में भी रहना पड़ा। मार्च 2008 में हरदा जिले के देवतालाब इलाके में पूर्व मंत्री पटेल के बेटे सुदीप का कांग्रेस नेता राजेंद्र पटेल से विवाद हुआ था, जिसमें गोलीबारी हुई थी। इस गोलीबारी में सुदीप का साथी दुर्गेश जाट घायल हुआ था। उसके बाद से दुर्गेश का कोई पता नहीं है। उच्च न्यायालय के आदेश पर सीबीआई इस मामले की जांच कर रही। जांच में सीबीआई ने पाया कि दुर्गेश को घायल होने के बाद अस्पताल न ले जाकर पटेल के बंगले पर ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। बाद में शव को नष्ट कर दिया गया। इतना ही नहीं राजेंद्र पटेल के घर हमला करने और घायल दुर्गेश को लाने में जिस वाहन का उपयोग किया गया था, उसके कलपुर्जे और पर्दे बदल दिए गए। इसमें पूर्व मंत्री शामिल रहे। इसी आधार पर उनकी गिरफ्तारी सीबीआई ने की थी। इस मामले में जैसे-तैसे बाहर आए कमल पटेल पर लोकायुक्त में भी एक मामला दर्ज हो गया है। उज्जैन में कथित तौर पर फर्जी तरीके से सीलिंग की जमीन को बंधन मुक्त कराकर दूसरे के नाम कराए जाने के मामले में लोकायुक्त ने तत्कालीन राजस्व मंत्री कमल पटेल के खिलाफ की गई शिकायत दर्ज कर ली है। लोकायुक्त से की गई शिकायत में कहा गया है कि पूर्व राजस्व मंत्री कमल पटेल के कारण मंत्री पारस जैन ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर ग्राम पांडयाखेड़ी और उज्जैन कस्बे की लगभग 4000 हेक्टेयर भूमि को किसान मोहनलाल जाट से वर्ष 1974 में अनुबंध होना बताकर वर्ष 2005 में तत्कालीन तहसीलदार डॉ. नित्यानंदन पांडे से नामांतरण करवा लिया। सरकारी से निजी घोषित की गई जमीन मंत्री जैन की पत्नी व भाई के नाम हो गई है। शिकायत में बताया गया है कि यह जमीन शासन ने धारा 10 (छह) के तहत 1984 में ही अपने कब्जे में ले ली थी। भूपेंद्र दलाल की ओर से की गई शिकायत में साफ कहा गया है कि उज्जैन के तत्कालीन जिलाधिकारी ने भी इस जमीन को सरकारी जमीन माना था, मगर मंत्री ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर तत्कालीन तहसीलदार से मिली भगत कर जमीन को अपनी पत्नी व भाई के नाम करवा लिया।
शिवराज का जीरो टालरेंस दिखावा
कांग्रेस का आरोप है कि भ्रष्टाचार के मामले में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जनता के सामने एलान कर चुके है कि वह जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाएंगे लेकिन देखने में यह आ रहा है कि वह खुद भ्रष्टाचारियों के सरताज बनते हुए दिखाई दे रहे है। उनके मंत्रिमंडल में कई ऐसे दागी चेहरे है जिनके लिए लोकायुक्त बरसों से कार्रवाई के लिए राज्य सरकार से अनुमति मांग रहा है और सरकार है कि इन भ्रष्ट मंत्रियों की ढाल बनी हुई है। लोकायुक्त कई बार अपना दर्द सार्वजनिक कर चुके है। शिवराज में मंत्री और पूर्व मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लोकायुक्त में कई सालों से लटके हैं। हैरानी की बात ये है कि कुछ मंत्रियों के खिलाफ जांच इसलिए आगे नहीं बढ़ पा रही है, क्योंकि राज्य सरकार जरुरी कागजात ही मुहैया नहीं कराती। ऐसे में सवाल ये पैदा होता है अगर राज्य सरकारें इच्छा शक्ति नहीं दिखाएंगी तो अकेला लोकायुक्त भ्रष्टाचार खत्म कैसे कर देगा। शिवराज के मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त की जांच कछुए की चाल क्यों चलती रही इस सवाल का जवाब लोकायुक्त पीपी नावेलकर के बयान में ही छुपा है। लोकायुक्त की टीम कुछ मंत्रियों के खिलाफ जांच इसलिए पूरी नहीं कर पा रही है क्योंकि सरकारी विभाग इस मामले से जुड़े कागजात ही नहीं दे पा रहे हैं। शिवराज से उनके मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त में चल रहे मामलों पर जीरो टॉलरेंस कहकर अपना पल्ला झाडऩे में लगे हुए है। तो अब सवाल ये है कि आखिर परिणाम आएगा कैसे। अगर जांच के लिए जरुरी कागजात ही लोकायुक्त को नहीं मिलेंगे तो जांच आगे बढ़ेगी कैसे।
भाजपा के घोटालों की लंबी फैहरिस्त
काग्रेस द्वारा पूर्व मंत्री नागेन्द्र सिंह के भतीजों द्वारा मनरेगा में तीस करोड़ रूपये का घोटाला, बिना टेंडर की बिजली खरीदी में बत्तीस हजार एक सौ नौ करोड़ रूपये का घोटाला, समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी में सवा तीन करोड़ रुपये का घोटाला, पिछले तीन साल में पड़े छापों में एक हजार इकत्तीस करोड़ रुपये की काली कमाई, लोक निर्माण विभाग में बीस करोड़ का घोटाला, कुपोषण दूर करने के नाम पर छ: सौ करोड़ रुपये का घोटाला, अवैध उत्खनन कर पचास हजार करोड़ की काली कमाई, सरकारी खजाने में 50 हजार करोड़ की हेराफेरी, दीनदयाल उपचार योजना में पैंसठ करोड़ रुपये का घोटाला, स्वास्थ्य विभाग में पांच सौ करोड़ का दवा घोटाला, किसानों की कर्ज माफी में एक सौ आठ करोड़ रूपये का घोटाला, जल संसाधन विभाग में नियम विरुद्ध टेंडर मंजूर करने में पांच हजार करोड़ रुपये का घोटाला, मुख्यमंत्री के स्वेच्छानुदान में छियात्तर करोड़ रुपये का घोटाला, गेमन इंडिया को सरकारी जमीन देने में पांच हजार दो सौ पचास करोड़ रुपये का घोटाला, तेंदूपत्ता बोनस वितरण में दो सौ साठ करोड़ रुपये का घोटाला, देवपुत्र और ब्लेक बोर्ड पुताई में पच्चीस करोड़ रुपये घोटाले के साथ ही चुनाव के मात्र एक हफ्ते पूर्व पंचायत विभाग में एक हजार करोड़ घोटाला करने का आरोप भाजपा पर लगाया गया है। साथ ही मुख्यमंत्री की पत्नी द्वारा विदिशा में अवैध रूप से गोदाम बनाने, डम्पर के नाम पर भ्रष्ट कमाई करने, मुख्यमंत्री के साले और भतीजे द्वारा नियम विरुद्ध ठेकेदारी का पंजीयन कराने, साले द्वारा कौडिय़ों के मोल लाखों का बंगला खरीदने गृह निर्माण सोसायटी के अवैधानिक रुप से लोगों के प्लाट हड़पने और बुधनी में मुख्यमंत्री के भाई, भतीजों द्वारा आदिवासियों एवं अनुसूचित जाति के लोगों की जमीन जबरन खरीदने का आरोप लगाया गया है।

जर्जर बांधों की जद में मप्र की आधाी आबादी

कभी भी दरक सकते हैं उम्रदराज बांध!
प्रदेश में 100 साल की उम्र पार कर चुके हैं 23 बांध vinod upadhyay
भोपाल। इस बार भले ही पिछली बार की तरह जोरदार बारिश नहीं हुई है,फिर कई बांध लबालब भरने के बाद छलक पड़े। यही नहीं अगस्त के शुरूआत में ही डिंडोरी का गोमती बांध, हमेरिया बांध, रामगढ़ी, सिमरियानग, चांदिया, गोरेताल, लोकपाल सागर, भरोली सहित करीब दर्जनभर बांधों में रिसाव और दरार आने से आसपास के क्षेत्रों में दहशत फैल गई। हालांकि समय पर इन बांधों के रिसाव और दरार को दुरूस्त कर कदया गया, लेकिन ये घटनाएं इस बात का संकेत दे गईं की अगर बांधों की लगातार देखरेख और मरमत नहीं की गई तो ये कभी भी जानलेवा बन सकते हैं। बांधों में हुए रिसाव के बाद जब प्रदेश के बाधों की स्थिति का जायजा लिया गया तो यह तथ्य सामने आया की प्रदेश के करीब 91 बांध उम्रदराज हैं और ये कभी भी दरक सकते हैं। मध्यप्रदेश वाटर रिसोर्स डेवलपमेंट के आंकडों के अनुसार प्रदेश में पेयजल उपलब्ध कराने, सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए 168 बड़े और सैकड़ों छोटे बांध बनाए गए हैं। देखरेख और मेंटेंनेंस के अभाव में कई छोटे-बड़े बांध बूढ़े और जर्जर हो चुके हैं। इनमें से कुछ की उम्र 100 साल से ज्यादा है। इन उम्रदराज बांधों को लेकर बेपरवाह प्रशासन ने न तो इन्हें डेड घोषित किया और न ही मरम्मत की कोई ठोस पहल की। ऐसे लबालब ये बांध यदि दरक गए या टूट गए तो कभी भी बड़ी तबाही ला सकते हैं। इन बांधों की वजह से नदियां भी अपनी दिशा बदल सकती हैं। इससे भी बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। लेकिन इस ओर कभी किसी का ध्यान नहीं गया है। प्रदेश के लगभग आधा सैकड़ा बांधों की उम्र 50 साल पूरी हो चुकी है। जबकि 18 बांध तो 100 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। ऐसे में इन बांधों की ठोस मरम्मत नहीं होने से इनके आधार कमजोर हो चले हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक बड़े बांधों की उम्र 100 वर्ष व छोटे बांध की उम्र लगभग 50 वर्ष मानी जाती है। इस उम्र तक इन बांधों की मजबूती बनी रहती है। बाद में ये धीरे-धीरे ये कमजोर होने लगते हैं। साथ ही नदियों के साथ आने वाले गाद भी बांधों को प्रभावित करते हैं। इससे बांधों की क्षमता कम होने लगती है। वाटर रिसोर्सेज से जुड़े एक्सपर्ट इंजीनियर बांधों की उम्र 50 और 100 साल बताते हैं। छोटे बांधों को 50 वर्ष के हिसाब से डिजाइन किया जाता है, जबकि बड़े बांधों की उम्र 100 साल बताई जाती है। बांधों के सिलटेशन और मजबूती दोनों के आधार पर उम्र तय होती है। वर्तमान में ज्यादातर बांधों की उम्र बहुत ज्यादा हो चुकी है। जानकारों का कहना है कि जब बांध बने थे जब ज्यादातर स्थान जंगल थे। अब जंगल काटकर खेती होने लगी है। इसका असर भी बांधों पर पड़ा है। बांधों में सिलटेशन बढ़ चुके हैं। आजतक सरकार ने लाइव स्टोरेज ही नहीं मापी है। बेस में मिट्टी में सही तरीके से काम्प्रेशन नहीं किया गया है। आधार ही यदि कमजोर हो गया, तो बांध के बचने का सवाल ही नहीं। गेट से ज्यादा खतरा बांधों में सबसे ज्यादा खतरा गेट के खराब होने का रहता है। हर साल गेट की मरम्मत होनी जरूरी हैं। ज्यादातर गेट के रबर-सील कट जाते हैं, जिन्हें नहीं सुधारने पर बगैर गेट खोले ही पानी बहने लगता है। इसके अलावा उलट व चोक नालियां भी खतरा बन सकती हैं। पिछले चार साल से करीब दो दर्जन बांध जब बारिश के दिन में लबालब होते हैं तो उनके गेट से पानी बहने लगता है। लेकिन मध्यप्रदेश वाटर रिसोर्स डेवलपमेंट इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। बताया जात है हर साल सैकड़ों एकड़ खेती तो बांध से निकले पानी से ही खराब हो जाती है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि तीन साल पहले एक रिपोर्ट तैयार की गई थी, जिसमें बांधों की बदहाल स्थिति को बताया गया था। लेकिन रिपोर्ट फाइलों में ही दब कर रह गई है। प्रदेश के कई बांधों में रिसाव की समस्या आम है। आए दिन रिसाव वाली जगह से बांधों के आशिंक रूप से टूटने की खबरें आती रहती हैं। बांध टूटने से सैकड़ो एकड़ फसल के अलावा अन्य आर्थिक नुकसान भी होते हैं। मंदसौर शहर को बाढ़ के खतरे से बचाने के लिए चार दशक पहले बने धुलकोट बांध पर अब खनन माफियाओं की नजर पड़ गई है। शहर के पश्चिमी इलाके में बने इस ढाई किलोमीटर लंबे बांध की पाल को मिट्टी माफियाओं ने खोदना शुरु कर दिया है और वे चोरी छिपे यहां से ट्रॉलियों में मिट्टी भरकर ले जा रहे है, जिसका ईंट बनाने में उपयोग कर रह रहे हैं। ईंट भट्टे मालिकों ने शमशान घाट और नरसिंहपुरा इलाके से गुजर रही बांध की पाल से इतनी भारी मात्रा में मिट्री की खुदाई की है कि करीब आधा किलोमीटर इलाके में बांध काफी जर्जर हो गई है। हैरत की बात ये है कि अधिकारी इस खुदाई से नावाकिफ हैं। वहीं, खंडवा जिले में स्थित 'ओंकार पर्वतÓ की दरार से ओंकारेश्वर बांध (जल विद्युत सिंचाई परियोजना) को खतरा उत्पन्न होने की आशंका है। बांध के ठीक सामने पर्वत में दरार दिखाई दे रही है। बांध से लगभग 150 मीटर दूर पर्वत का एक हिस्सा दरकने लगा है। बांध और पर्वत के बीच कुछ चट्टानें कट गई हैं। आशंका व्यक्त की जा रही है कि नर्मदा नदी की तलहटी में दरार अंदर ही अंदर बांध तक पहुंच गई तो बड़े नुकसान का खतरा हो सकता है। जानकारों का कहना है कि नर्मदा में आने वाली बाढ़ से पर्वत चारों तरफ से कट रहा है। पर्वत पर कभी जंगल हुआ करता था, लेकिन क्षेत्र में गिनती के पेड़ रह गए हैं। पर्वत पर मठ, आश्रम, दुकान, मकान बन गए हैं। पर्वत की तलहटी में ज्योर्तिलिग मंदिर है, यह क्षेत्र अवैध भवन निर्माणों से घिरता जा रहा है। पर्वत पर अतिक्रमण हो रहे हैं। उल्लेखनीय है कि नर्मदा हाइड्रोइलेक्ट्रिक डेवलपमेंट कापरेरेशन लिमिटेड द्वारा बनाई गई ओंकारेश्वर जल विद्युत परियोजना में बांध द्वारा 520 मेगावाट बिजली बनाने की क्षमता है। बांध में कुल 23 गेट लगे हैं। यहां पर 189 मीटर जलस्तर तक (समुद्र तल से) पानी भरा जाता है। अगर यह बांध दरकता है तो बड़ी जन हानि होगी। संजय सरोवर परियोजना के तहत बनाए गए एशिया के सबसे बड़े मिट्टी के बांध पर खतरा मंडरा रहा है। एक तरफ इस बांध के तटबंध की मिट्टी लगातार बह रही है वहीं आतंकवादियों और नक्सलवादियों की भी कुदृष्टि इस बांध की ओर है। भीमगढ़ बांध में गेटों की सुरक्षा के लिए कन्ट्रोल रूम बनाया गया है जहां एक चोकीदार रहता है और वह भी नदारद रहता है और उसके सिवाय वहां कोई भी जबाबदार व्यक्ति सेवा नहीं देता। इनकी होती है लगातार मॉनिटरिंग एक तरफ जहां आधी शताब्दी पहले बने बांधों की देखरेख नहीं की जा रही है वहीं अभी हाल ही में बने बरगी, तवा, बरना, इंदिरा सागर,ओंकारेश्वर, बाणसागर, गांधी सागर, मनीखेड़ा, गोपीकृष्ण सागर, माही, कोलार और केरवा बांध ऐसे हैं जिनकी लगातार मॉनिटरिंग हो रही है। इन बांधों में किस दिन कितना पानी बढ़ा और कितना कम हुआ इसकी जानकारी प्रतिदिन मिलती है। कितने सुरक्षित हैं बांध?... सरकार ने माना था कि देश के कुल 5,000 बांधों में से 670 ऐसे इलाके में जो भूकंप संभावित जोन की उच्चतम श्रेणी में आते हैं। ऐसे बांधों में मप्र के करीब 24 बांध भी शामिल हैं। सवाल ये उठता है कि भूकंप संभावित इलाकों में मौजूद ये बांध आखिर कितने सुरक्षित हैं। मौजूदा समय में उपयोग किए जाने वाले 100 से ज़्यादा बांध 100 वर्ष से भी पुराने हैं। भारत में बांध बनाने की परंपरा सदियों पुरानी है और पिछले 50 वर्षों में ही देश के विभिन्न राज्यों में 3,000 से ज़्यादा बड़े बांधों का निर्माण हुआ है। एक ऐसे देश में, जहां आधी से ज़्यादा आबादी कृषि पर निर्भर है वहां 95 प्रतिशत से ज़्यादा बांधों का उपयोग सिंचाई के लिए किया जाता है। भारत में बांधों का निर्माण और उनकी मरम्मत की निगरानी केंद्रीय जल आयोग करता है। आयोग के साथ सरकारें भी दोहराती रहीं हैं कि सभी बांधों की सुरक्षा जांच होती रही है और भूकंप संभावित ज़ोन में आने वाले बांध भी किसी आपदा को झेल सकने में सक्षम हैं। कई विशेषज्ञों का मत है कि मप्र में सैंकड़ों बांध अब पुराने हो चले हैं और असुरक्षित होते जा रहे हैं। उनका कहना है कि पुराने बांधों को गिराकर उसी इलाके में नए और ज़्यादा मज़बूत बांधों का निर्माण आवश्यक है। साऊथ एशिया नेटवर्क ऑफ डैम्स के प्रमुख हिमांशु ठक्कर कहते है कि सरकारों का ध्यान इस ओर नहीं गया है। ठक्कर ने बताया, मौजूदा समय में उपयोग किए जाने वाले देश में 100 तथा मप्र में 23 बांध 100 वर्ष से भी पुराने हैं। बांध पर बांध बने जा रहे हैं बिना ये सोचे की अगर ऊपर का एक बांध टूट गया तो नीचे किस तरह की प्रलय आ जाएगा। मामले से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि भारत में किसी बांध का इस्तेमाल बंद कर देना इतना भी आसान नहीं है और उसे बंद करने से पहले विकल्प की तलाशने की ज़रूरत होती है। भारत के 'सेंट्रल वॉटर कमीशनÓ के प्रमुख अश्विन पंड्या को लगता है कि भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है जहां आबादी का दबाव तेज़ी से बढ़ रही है, साथ ही सिंचाई और ऊर्जा संबंधी ज़रूरतें बढ़ती जा रही हैं। ऐसे ताबड़तोड़ बांध बनाए जा रहे हैं, लेकिन इन बांधों को बनाने में कई तरह की बातों को दरकिनार किया जा रहा है,जो भविष्य के लिए खतरनाक है। वह कहते हैं कि भारत में दशकों पहले कंक्रीट से बने बांधों को भूकंप से बचाने के लिए नई बांध तकनीक से मजबूत करने की जरूरत है। इसके लिए आईआईटी के साथ मिलकर अमेरिका के विशेषज्ञ काम करने को तैयार हैं। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ प्रो. एके चोपड़ा कहते हैं कि 1967 में भूकंप में पुणे का 'कोएना बांधÓ जिस तरह से टूटा-फूटा था, उसे लेकर कंक्रीट के बांधों को नई तकनीक से मजबूती देने की जरूरत महसूस हुई। भारत में अधिकांश बांध 50 से 60 साल पुराने हैं जिनकी क्षमता दिनों दिन घट रही है। उल्लेखनीय है कि भारत में कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार ने एक प्रस्ताव रखा था जिसमें देश के सभी बांधों के निरीक्षण और मरम्मत की बात कही गई थी। यह प्रस्तावित क़ानून अभी तक संसद से पारित नहीं हुआ है। हालांकि भारत में नई बनी मोदी सरकार में पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा है, हम हर बांध की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और उसी हिसाब से उनकी समीक्षा की जाएगी। धरती की गरमी बढ़ाते हैं बांध बांधों से हो रहे पर्यावरण विनाश को लेकर पर्यावरणविद बरसों से चेता रहे हैं लेकिन हमारी सरकारें बांधों को विकास का प्रतीक बताने का ढिंढोरा पीटते हुए उनकी नसीहतों को अनसुना करती रही हैं। कैग की रिपोर्ट ने भी अपनी तरह से चेताया है। इस सबके बावजूद सरकार बड़े बांध बनाकर उसको विकास का नमूना दिखाना चाह रही है। सच यह है कि बांधों ने पर्यावरणीय शोषण की प्रक्रिया को गति देने का काम किया है जबकि बांध समर्थक इसके पक्ष में विद्युत उत्पादन, सिंचाई, जल, मत्स्य पालन और रोजगार आदि में बढ़ोतरी का तर्क देते हैं। वे बांधों को जल का प्रमुख स्रेत बताते नहीं थकते। जबकि विश्व बांध आयोग के सव्रेक्षण से स्पष्ट होता है कि बांध राजनेताओं, प्रमुख केन्द्रीयकृत सरकारी-अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं और बांध निर्माता कंपनियों के निजी हितों की भेंट चढ़ जाते हैं। सरकार इस मामले में दूसरे देशों से सबक लेने को तैयार नहीं है जो अब बांधों से तौबा कर रहे हैं। विडम्बना यह है कि सरकार नए बांधों के निर्माण को तो प्रमुखता दे रही है लेकिन खतरनाक स्थिति में पहुंच चुके 50 साल पुराने तकरीब 655 बांधों के रखरखाव, भूकंप, बाढ़, मौसमी प्रभाव और सामान्य टूट-फूट से उपजी समस्याओं तथा बांधों के खतरे के आकलन सम्बंधी अध्ययन के लिए सचेत नहीं दिखती है। इस संबंध में जल संसाधन मंत्रालय के पास न तो कोई योजना है और न उसके लिए कोई बजट निर्धारित है। सरकार ने बांध सुरक्षा समिति गठित तो की है लेकिन मात्र सलाह देने के अलावा उसके पास कोई अधिकार नहीं है। यह सरकारी लापरवाही की जीती-जागती मिसाल है। गौरतलब है कि आज भारत समेत दुनिया के बड़े बांधों को ग्लोबल वार्मिग के लिए भी जिम्मेदार माना जा रहा है। ब्राजील के वैज्ञानिकों के शोध इस तथ्य का खुलासा कर इसकी पुष्टि कर रहे हैं। उनसे स्पष्ट हो गया है कि दुनिया के बड़े बांध 11.5 करोड़ टन मीथेन वायुमंडल में छोड़ रहे हैं और भारत के बांध कुल ग्लोबल वार्मिग के पांचवे हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं। इससे स्थिति की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। वैज्ञानिकों का दावा है कि दुनिया के कुल 52 हजार के लगभग बांध और जलाशय मिलकर ग्लोबल वार्मिग पर मानव की करतूतों के चलते पडऩे वाले प्रभाव में चार फीसदी का योगदान कर रहे हैं। इस तरह इंसानी करतूतों से पैदा होने वाली मीथेन में बड़े बांधों की अहम भूमिका है। हमारे यहां मौजदा समय में कुल 5125 बड़े बांध हैं जिनमें से 4728 तैयार हैं और 397 निर्माणाधीन हैं। भारत में बड़े बांधों से कुल मीथेन का उत्सर्जन 3.35 करोड़ टन है जिसमें जलाशयों से करीब 11 लाख, स्पिलवे से 1.32 करोड़ व पनबिजली परियोजनाओं की टरबाइनों से 1.92 करोड़ टन मीथेन उत्सर्जित होता है। हर साल लाखों लोग होते हैं बेघर मध्य प्रदेश की जमीन पर बने उत्तर प्रदेश के आधा दर्जन बांधों के कारण पिछले कई दशक से मध्य प्रदेश हर साल बाढ़ से तबाही झेल रहा है। इन बांधों से मध्य प्रदेश को दोहरी मार पड़ रही है। एक तो यहां जमीनें खराब हो रही हैं और साथ ही बांधों के बकाए राजस्व की राशि दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। प्रदेश को होने वाली इस राजस्व की क्षति की वसूली के लिए प्रदेश की सरकारों ने कभी पहल नहीं की जबकि दूसरी ओर एक बड़े रकबे में भूमि सिंचित करने और बकाया भू-भाटक कोई जमा न करने से उत्तर प्रदेश सरकार के दोनों हाथों में लड्डू हैं। इस बीच केन बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना पर भी सवालिया निशान उठ रहे हैं। इन बांधों के कारण मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगा हुआ छतरपुर जिला अरसे से बाढ़ त्रासदी को झेल रहा है। जंगल और जमीन मध्य प्रदेश की है लेकिन उसका दोहन उत्तर प्रदेश कर रहा है। गौरतलब है कि आजादी से पहले एकीकृत बुन्देलखण्ड में सिंचाई की व्यवस्था थी। लेकिन प्रदेशों के गठन के बाद मध्य प्रदेश को इन बांधों के कारण दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। बांधों का निर्माण तो मध्य प्रदेश की जमीन पर हुआ है लेकिन व्यवसायिक उपयोग उत्तर प्रदेश कर रहा है। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में कुल 6 बांध निर्मित हैं जो उत्तर प्रदेश की सम्पत्ति हैं। लहचुरा पिकअप वियर का निर्माण सन् 1910 में ब्रिटिश सरकार ने कराया था। इसमें मध्य प्रदेश की 607.88 एकड़ भूमि समाहित है। तत्कालीन अलीपुरा नरेश और ब्रिटिश सरकार के बीच अलीपुरा के राजा को लीज के रकम के भुगतान के लिये अनुबन्ध हुआ था। आजादी के बाद नियमों के तहत लीज रेट का भुगतान मध्य प्रदेश सरकार केा मिलना चाहिए था लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने कोई भुगतान नहीं किया। नियम कायदों के हिसाब से लहचुरा पिकअप वियर ग्राम सरसेड के पास है इसलिए 15.30 रूपया प्रति 10 वर्गफुट के मान से 607.88 एकड़ का 40 लाख 51 हजार 318 रूपया वार्षिक भू-भाटक संगणित होता है। लेकिन ये रकम उत्तर प्रदेश पर बकाया है। इसी तरह पहाड़ी पिकअप वियर का निर्माण 1912 में ब्रिटिश सरकार ने कराया था। अनुबन्ध की शर्तों के मुताबिक दिनांक 01 अप्रैल 1908 से 806 रूपया और 1 अप्रैल 1920 से 789 रूपया अर्थात 1595 रूपया वार्षिक लीज रेट तय किया गया था। पहाड़ी पिकअप वियर के डूब क्षेत्र 935.21 एकड़ का वार्षिक भू-भाटक 62 लाख 32 हजार 875 रूपया होता है। यह राशि 1950 से आज तक उत्तर प्रदेश सरकार ने जमा नहीं की। करोड़ों रूपयों के इस बकाया के साथ-साथ बरियारपुर पिकअप वियर का भी सालाना भू-भाटक 8 लाख 36 हजार 352 रूपया होता है। इस वियर को भी 1908 में अंग्रेजी हुकूमत ने तैयार कराया था। इसमें तकरीबन 800 एकड़ भूमि डूब क्षेत्र में आती है। छतरपुर के पश्चिम में पन्ना जिले की सीमा से सटे गंगऊ पिकअप वियर का निर्माण 1915 में अंग्रेजी सरकार ने कराया था। जिसमें 1000 एकड़ डूब क्षेत्र है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने अन्य बांधों की तरह इस बांध का भी 6 लाख 53 हजार 400 रूपया वार्षिक भू-भाटक राशि को आज तक जमा नहीं किया। छतरपुर एवं पन्ना जिले की सीमा को जोडऩे वाले रनगुंवा बांध का निर्माण 1953 में उत्तर प्रदेश सरकार ने कराया था। इसका डूब क्षेत्र भी तकरीबन 1000 एकड़ है। इस प्रकार से वार्षिक भू-भाटक 6 लाख 53 हजार 400 रूपया है। इस राशि को भी उत्तर प्रदेश सरकार की रहनुमाई का इन्तजार है। वर्ष 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रदेश की सीमा को जोडऩे वाली उर्मिल नदी पर बांध का निर्माण कराया था। इसके निर्माण के बाद मध्य प्रदेश की 1548 हेक्टेयर भूमि डूब क्षेत्र में आ गयी। इसका सालाना अनुमानित भू-भाटक 9 लाख 86 हजार 176 रूपए बनता है। लेकिन मप्र सरकार कभी भी उत्तर प्रदेश सरकार से अपने राजस्व का हिसाब नहीं कर सकी। जबकि हर बरसात में मध्य प्रदेश के गांवों को भीषण बाढ़ का सामना करने के साथ-साथ पलायन करना पड़ता है। उत्तर प्रदेश के इन अधिकंाश बांधों की समय सीमा अब लगभग समाप्त हो चुकी है। इनसे निकलने वाली नहरों के रख-रखाव पर न ही सरकारों ने कोई ध्यान दिया और न ही जल प्रबन्धन के सकारात्मक समाधान तैयार किए हैं। रनगुंवा बांध से मध्य प्रदेश को अब पानी भी नहीं मिल पाता है। जल-जंगल और जमीन इन तीन मुद्दों के बीच पिसती उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की हांसिए पर खड़ी जनता की यह पीड़ा कहीं न कहीं उन बांध परियोजनाओं के कारण ही उपजी है। जिसने दो प्रदेशों के बीच वर्तमान में पानी की जंग और भविष्य में बिन पानी बुंदेलखंड के अध्याय लिखने की तैयारी कर ली है। इन बांधों से है खतरा बांध निर्मित वर्ष बालाघाट डोगरबोदी 1911 अमनल्ला 1916 बिठली 1910 बसीनखार 1909 रामगढ़ी 1915 तुमड़ीभाटा 1989 कुतरीनल्ला 1916 बड़वानी रंजीत 1916 बैतूल सतपुड़ा 1967 भोपाल केरवा 1976 हथाईखेड़ा 1962 छतरपुर मदारखबनधी 1964 गोरेताल 1663 दमोह माला 1929 मझगांव 1914 हसबुआमुदर 1917 गोड़ाघाट 1913 चिरेपानी 1913 रेद्दैया 1910 छोटीदेवरी 1919 जुमनेरा 1910 नूनपानी 1952 दतिया रामसागर(गुना) 1963 रामपुर 1917 अमाही 1917 खानपुरा 1907 जमाखेड़ी 1915 भरोली 1916 मोहरी 1916 केशोपुर 1916 खानकुरिया 1915 समर सिंघा 1917 ग्वालियर हरसी 1917 तिगरा 1917 रामोवा 1931 टेकनपुर 1895 सिमरियानग 1976 खेरिया 1913 रीवा गोविंदगढ़ 1916 सागर नारायणपुरा 1926 रतोना 1924 चांदिया 1926 सतना लिलगीबुंदबेला 1938 सीहोर जमनोनिया 1938 सिवनी अरी 1952 समाल 1910 चिचबुंद 1951 बारी 1957 शाजापुर नरोला 1916 सिलोदा 1916 शिवपुरी धपोरा 1913 चंदापाठा 1918 डिनोरा 1907 नागदागणजोरा 1911 झलोनी 1913 रजागढ़ 1914 अदनेर 1911 ककेटो 1934 विदिशा घटेरा 1956 उज्जैन अंतालवासा 1908 कड़ोडिया 1957 शाजापुर नरोला 1916 सिलोदा 1916 होशंगाबाद दुक्रिखेड़ा 1956 धनदीबड़ा 1956 इंदौर यशवंत नगर 1933 देपालपुर 1931 हशलपुर 1950 जबलपुर परियट 1927 बोरना 1920 पानागर 1912 कटनी पिपरोद 1913 गोहबंनधा 1912 पथारेहटा 1918 दारवारा 1918 पब्रा 1912 अमेठा 1918 जगुआ 1921 जगुआ 1921 लोवर सकरवारा 1919 अपर सकरवारा 1919 बोहरीबंद 1927 अमाड़ी 1927 बोरिना लोवरटी 1923 मौसंधा 1917 मंदसौर पोदोंगर 1956 गोपालपुरा 1954 पन्ना लोकपाल सागर 1909 रायसेन लोवर पलकसती 1936 सफेद हाथी बना एनवीडीए वर्ष 1972 में बने मास्टर प्लान में तय किया गया था कि मध्यप्रदेश नर्मदा में उपलब्ध कुल जल का 65 फीसद यानि 18.25 मिलियन एकड़ फीट(एमएएफ ) जल का उपयोग कर प्रदेश को समृद्ध बनाएगा। इसके तहत 23 बड़ी, 135 मध्यम व तीन हजार से अधिक छोटी परियोजनाओं का निर्माण करना तय किया गया। वृहद परियोजनाओं के लिए 1985 में नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए)का गठन हुआ। सभी बड़ी परियोजनाओं का जिम्मा प्राधिकरण को सौंपा गया। तय हुआ,कि नर्मदा का 11.36 एमएएफ जल एनवीडीए, 5.39 एमएएफ जल सिचांई विभाग व डेढ़ एमएएफ जल का उपयोग लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी व उद्योग विभाग को करना है। यह भी आश्चर्यजनक ही है,कि करीब तीन दशक के इस सफर में यह प्राधिकरण महज 7 परियोजनाओं के जरिए अब तक करीब 9.114 एमएएफ पानी का उपयोग ही कर पाया है। हालांकि भाजपा सरकार ने सत्ता में आते ही नर्मदा घाटी परियोजनाओं की सुध ली तो दिसंबर 2003 में विजन 2012 नामक मसौदा तैयार किया गया। इसमें नर्मदा घाटी की सभी वृहद परियोजनाओं का निर्माण 11वीं पंचवर्षीय योजना यानि साल 2011-12 में पूरा कर लेने का दावा किया गया। इन पांच सालों में भी करोड़ों रुपए व्यय हुए लेकिन एक भी नई परियोजना अंजाम तक नहीं पहुंची। तर्क दिया गया,कि केंद्र ने अनुमनितयां देने में देर की। नया विजन 2015 तैयार हुआ और इसमें 12वीं पंचवर्षीय योजना के अंत अर्थात वर्ष 2015 तक सभी प्रस्तावित योजनाओं को पूरा करने का लक्ष्य तय हुआ। नया विजन तैयार हुए तीन साल का वक्त गुजरने को है,लेकिन प्राधिकरण निर्धारित नए लक्ष्य का 25 फीसदी हिस्सा भी पूरा नहीं कर सका। जानकार बताते हैं,कि प्राधिकरण ने इससे पहले वर्ष 2007 में एक रिवर्स कैलेण्डर भी तैयार किया था,लेकिन यह केवल कागजों तक सीमित रहा। योजनाओं के क्रियान्वयन की यही स्थिति रही तो फिर एक नया विजन तैयार होगा। संभव है,कि नया विजन राज्य सरकार के विजन 2018 को लक्ष्य कर बनाया जाए। हास्यास्पद पहलू यह,कि प्राधिकरण अपना काम तो समय पर कर नहीं पाता, दूसरे के काम पर उसकी निगाह है। इसके चलते उक्त विजन में तय हुआ,कि प्राधिकरण जलसंसाधन विभाग को आवंटित (5.39 एमएएफ जल उपयोग की) की विस्तृत परियोजनाओं में पचास फीसदी के डीपीआर तैयार करने का काम करेगा और उन 50 फीसदी परियोजनाओं को भी अपने हाथ में लेगा जिन्हें जल संसाधन विभाग अब तक शुरु नहीं कर सका है। तीन दशक में केवल दो परियोजनाएं की पूरी प्राधिकरण में कामकाज की गति का आंकलन इसी बात से लगाया जा सकता हैकि इन तीन दशकों में प्राधिकरण केवल दो बड़ी परियोजनाएं मान व जोबट ही पूरी कर सका। इनसे केवल 0.2045 एमएएफ नर्मदा जल का उपयोग ही किया जा सका। वहीं पांच परियोजनाएं वर्ष 1988 से पहले जल संसाधन विभाग द्वारा पूरी की गई। इनसे नर्मदा का 2.952 एमएएफ जल का उपयोग हुआ। करीब 6 एमएएफ जल उपयोग के लिए एनवीडीए की सात परियोजनाएं रानी अवंतीबाई लोधी सागर परियोजना(जल उपयोग1681एमसीएम), बरगी डायवर्जन (2510.6 एमसीएम),इंदिरा सागर (1625.26 एमसीएम),ओंकारेश्वर(1300 एमसीएम), अपर वेदा(101.09 एमसीएम), पुनासा लिफ्ट (130.20 एमसीएम)एवं लोअर गोई (136.65 एमसीएम)निर्माणाधीन हैं। वहीं 0.2537 एमएएफ जल की दो परियोजनाएं हालोन एवं अपर नर्मदा के लिए निर्माण का कार्य शुरुआती दौर में ही है। जबकि 1.57 एमएएफ जल उपयोग की सात परियोजनाएं अब तक शुरु ही नहीं की जा सकी। इनके लिए सर्वे,अन्वेषण एवं डीपीआर बनाने का काम ही पूरा नहीं हो सका। यहां यह भी गौरतलब है,कि वर्ष 1956 से 1988 तक अर्थात 22 सालों में प्रदेश के ही जल संसाधन विभाग ने नर्मदा की सहायक नदियों पर पांच बांध (बारना,कोलार,मटियारी,सुक्ता व तवा)तैयार कर नर्मदा के 2.952 एमएएफ जल का उपयोग किया। वहीं प्राधिकरण 25 साल में महज दो बांध मान व जोबट ही बना पाया। धन की कमी का हवाला देकर दो बांध इंदिरा सागर व ओंकारेश्वर सागर राष्ट्रीय जल विद्युत विकास निगम (एनएचडीसी)को हस्तांतरित कर दिए गए। एनएचडीसी ने इस कार्य को महज चार साल में ही पूरा कर दिया। बीते पांच सालों में ही प्राधिकरण महज एक बांध अपर बेदा पर तैयार कर पाया। इसमें भी तीन साल अधिक लगे। वहीं फरवरी 2009 में शुरु हुआ लोअर गोई बांध का जो काम तीन साल में हो जाना चाहिए था वह अभी प्रगतिरत है। लागत बढ़ाने सांठगांठ बांध हों या इनसे निकलने वाली नहरें। सभी के निर्माण में विलंब की एक प्रमुख बजह भ्रष्टाचार रहा। यह मनमानी निर्माण दरों पर काम दिए जाने और इस पर भी विलंब कर कार्य की लागत बढ़वा कर किया गया। उदाहरण के तौर पर रानी अवंति बाई लोधी सागर परियोजना से बांयी तट नहर के द्वारा इलाके की 1.57 लाख हेक्टेयर सिंचाई का लक्ष्य तय किया गया। करीब 135 किमी लंबी यह नहर व 1915 किमी लंबे इसके वितरण नेटवर्क का काम आठ साल में पूरा हो जाना चाहिए था,लेकिन यह कार्य अब तक पूरा नहीं हो सका। आपको यह जान कर हैरत होगी कि परियोजना की शुरुआती लागत महज 252 करोड़ थी जो इन 25 सालों में अब बढ़ कर 12 सौ करोड़ से अधिक हो गई है। प्राधिकरण का दावा है,कि इस नहर को 2015 तक पूरा कर लिया जाएगा। नहर से अब 1.23 लाख हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता विकसित की जा चुकी है,लेकिन हकीकत यह ,कि इस नहर से तीस हजार हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र कभी सिंचित नहीं हो सका। नरसिंहपुर के समीप निर्माण का काम लंबे समय से अटके रहने के कारण जिले की 34 हजार हेक्टेयर से ज्यादा रकबे को परियोजना का लाभ अब तक नहीं मिला। जबकि विजन 2012 में तय पांच साल की अवधि के दौरान ही प्राधिकरण को 6 हजार करोड़ रुपए से अधिक का बजट आवंटित किया गया। इसमें से प्राधिकरण ने करीब साढ़े पांच हजार करोड़ रुपए खर्च भी किए ,लेकिन इस अवधि में वह किसी भी बड़ी परियोजना की नहर प्रणाली को अंजाम तक नहीं पहुंचा सका। इस मामले में गड़बड़ी मुख्यालय से लेकर मैदानी स्तर तक रही। जिन ठेकेदारों को काम मिल भी गया ,वे साल दर साल बढ़ती अनैतिक मांगों से घबरा कर या तकनीकी कारणों से काम को आधा-अधूरा छोड़ भाग खड़े हुए। बीते 25 सालों में करीब 15 हजार करोड़ रुपए खर्च कर एनवीडीए नर्मदा के पांच प्रतिशत जल का उपयोग ही कर सका। जल उपयोग की अंतिम समय सीमा वर्ष 2024 को देखते हुए उसके पास अब भी करीब एक दशक का समय है। जानकारों का मानना है,कि प्राधिकरण यदि वर्ष 2020-21 को ही लक्ष्य बना कर कार्य करता है तो उसे करीब इकतीस हजार करोड़ रुपए की आवश्यकता और होगी।

प्रज्ञा और जोशी को हैवान बनाया असीमानंद ने

vinod upadhyay
भोपाल। 2007 में हुई आरएसएस प्रचारक सुनील जोशी की हत्या का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। इस मामले में लंबे समय से जांच कर रही राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए)ने 19 अगस्त को भोपाल में स्पेशल जज विजय कुमार पांडे की अदालत में प्रज्ञा ठाकुर सहित 8 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश कर दिया। इस मामले में एनआईए ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि जोशी की हत्या की एक वजह साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के प्रति उनका यौन आकर्षण हो सकता है। लेकिन 2011 में देवास पुलिस और एनआईए की जांच और गवाहों के बयान में यह बात सामने आ चुकी है कि जोशी और साध्वी प्रज्ञा एक-दूसरे से प्यार करते थे। दोनों को धर्म और राष्ट्रीयता की राह से भटकाकर असीमानंद ने हैवान बना दिया। इस कारण दोनों के बीच लगातार दूरिया बढ़ती गई और नौबत यहां तक आ गई की एक दिन साध्वी प्रज्ञा को मजबुर होकर जोशी की हत्या करानी पड़ी। जोशी मर्डर केस की जांच में 2011 के बाद तब बदलाव आया, जब मालेगांव ब्लास्ट मामले में मध्य प्रदेश के महू में कुछ गिरफ्तारियां हुईं और देवास पुलिस ने पहली चार्जशीट दाखिल की। एनआईए द्वारा गिरफ्तार किए गए चार लोगों- राजेंद्र चौधरी, लोकेश शर्मा, जीतेंद्र शर्मा (भारतीय जनता युवा मोर्चा के नेता) और बलबीर सिंह को अब प्रज्ञा ठाकुर के साथ जोशी हत्याकांड मामले में आरोपी बनाया गया है। जांच एजेंसी का दावा है कि राजेंद्र और लोकेश ने ही 29 दिसंबर 2007 की रात जोशी का कत्ल किया था। जीतेंद्र शर्मा ने इसके लिए पिस्तौल मुहैया कराई थी और बलबीर सिंह ने इसे छिपाया था। एनआईए, देवास पुलिस और स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, प्रज्ञा और जोशी के पतन की कहानी कुछ इस तरह है। प्रज्ञा और जोशी का अतिवाद बना खतरनाक धर्म हो या फिर आध्यात्मिकता या फिर राष्ट्रीयता अगर इनको अतिवाद के साए में पोषित किया जाए तो वह खतरनाक हो सकता है और इसका सबसे ताजा और बड़ा प्रमाण हैं साध्वी प्रज्ञा चंद्रपाल सिंह ठाकुर और सुनिल जोशी। एक अध्यात्म तो दूसरा राष्ट्रीयता के सहारे अपने पथ पर गतिमान थे कि इनके बीच आ गए अतिवादी असीमानंद। फिर क्या था धर्म और अध्यात्म की चितेरी साध्वी प्रज्ञा और राष्ट्रीयता के ओज से भरे सुनील जोशी अपना पथ भटक गए। साध्वी प्रज्ञा देखते ही देखते एक दिन देश की कुख्यात आतंकवादी मान ली जाएंगी ऐसा कभी स्वयं उन्होंने भी नहीं सोचा होगा और बेचारे जोशी तो अब रहे नहीं। हिन्दुत्व पर आतंकवाद का धब्बा लगाने वाले प्रज्ञा और सुनील जोशी मध्य प्रदेश के निवासी थे। वर्ष 2003 में इंदौर में आयोजित एक कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हुई। अपनी आकर्षक छवि के कारण प्रज्ञा उसी दिन से सुनील जोशी के मन मंदिर में बस गई। मूलत: मध्य प्रदेश की निवासिनी 40 वर्षीय प्रज्ञा के अभिभावक कुछ साल पहले गुजरात के सूरत में जाकर बस गए थे इस लिए इनकी मुलाकात कम ही हो पाती थी। जहां एक तरफ जोशी प्रज्ञा से शादी करने का ख्वाब संजोए हुए था वहीं प्रज्ञा को जानने वाले बताते हैं कि उसे बचपन से ही जगत की भौतिकता से एलर्जी सी हो गई थी। हालांकि साध्वी ने वर्ष 2003 में ही साध्वी का चोला धारण करना शुरू कर दिया था लेकिन उन्होंने कोर्ट में प्रस्तुत अपने हलफनामें में कहा है कि वे 30 जनवरी 2007 को संन्यासिन बनी। बताते है कि प्रज्ञा चंद्रपाल सिंह ठाकुर संन्यासिन तो बन गई लेकिन उनमें आध्यात्मिकता का गुण नहीं समा सका। बात-बात में आक्रोशित होना उनके ठाकुरपन को दर्शाता था। उन्हें यह बात अच्छी तरह मालुम थी कि अध्यात्म का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सूत्र है संयम। अध्यात्म का मार्ग बहुत लम्बा और साधना का मार्ग है, किन्तु संयम का पालन कर अध्यात्म की साधना व्यवहार के धरातल पर भी की जा सकती है। बस सीमाकरण कर दो। हिंसा को कम करने का, कलह और संघर्ष को मिटाने का एक महत्वपूर्ण सूत्र है संयम,जिसकी कमी साध्वी होने के बाद भी उनमें नजर आती थी। सुनिल की रॉबिनहुड छवि की कायल थी साघ्वी सुनील जोशी मध्यप्रदेश के देवास में एक बेहद गरीब परिवार से जन्मा था लेकिन उसकी महत्वकांक्षाएं बड़ी थी। 1999 में वह महू जिले में संघ का जिला प्रचारक बन गया, जहां कुछ ही समय में वह कट्टर हिंदुत्ववादी के रूप में पहचाना जाने लगा। संघ में उसे गुरूजी के नाम से जाना जाता था। सुनील बचपन से ही अति उत्साही प्रवृति का था जो जवानी में और भी परवान चढ़ी। उसकी इसी रॉबिनहुड वाली छवि की साध्वी भी कायल थी। प्रज्ञा जबसे सन्यासिन बनी उनका अधिकत्तर समय जबलपुर के आश्रम में बीतता था। इस दौरान सुनील जोशी भी उनके संपर्क में रहता था। मेल- मुलाकातों का सिलसिला ऐसा चला कि सुनील जोशी के एक तरफा प्यार का अहसास साध्वी को भी होने लगा और वह भी उसे प्यार करने लगी। दोनों का प्यार कुछ इस कदर परवान चढ़ा की प्रज्ञा धर्म और अध्यात्म को तो जोशी हिन्दुत्ववादी राष्ट्रीयता को भूल गया। जोशी एक पल के लिए भी प्रज्ञा से अलग नहीं होना चाहता था लेकिन अध्यात्मिकता का चोला ओढ़े प्रज्ञा के लिए यह संभव नहीं था। साध्वी ने जोशी को मिलवाया था असीमानंद से 2003 में ही प्रज्ञा सिंह ने सुनील जोशी का संपर्क असीमानंद से कराया। पहली मुलाकात में ही जोशी अपनी हिन्दुत्ववादी आक्रामक छवि के कारण असीमानंद की पसंद बन गया। असीमानंद 2002 में हिन्दू मंदिरों पर हुए धमाकों से वे बहुत विचलित थे और प्रज्ञा सिंह और सुनील जोशी के अंदर अपने जैसी सोच देखकर उन्होंने उनके सामने अपनी मंशा जाहिर कर दी। स्वामी असीमानंद मूलत: पश्चिमी बंगाल के हुगली के हैं। ऊंची तालीम हासिल असीमानंद कभी नब कुमार थे, फिर उन्हें पुरुलिया में काम करते देखा गया। स्वामी वर्ष 1995 में गुजरात के आहवा में अवतरित हुए और हिंदू संगठनों के साथ हिंदू धर्म जागरण और शुद्धिकरण का काम शुरू किया। मगर वो कम से कम दो दशक से मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ही सक्रिय रहे। स्वामी असीमानंद ने मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के कोई 12 जिलों में अपने हिंदू प्रभाव का तानाबाना बुन रखा था। वे अपना कामकाज दक्षिण गुजरात के पांच जिलों- डांग और खेड़ा, उत्तरी महाराट्र के नंदनवार और पश्चिमी मध्य प्रदेश के झाबुआ में फैला रखा था, मगर उनका केंद्र गुजरात के डांग जिले में आहवा था। यहीं उन्होंने शबरी माता का मंदिर बनाया और शबरी धाम स्थापित किया। हिन्दू धार्मिक स्थलों पर हुए धमाकों का बदला लेने के लिए असीमानंद काफी उतावले थे। अपनी इस रणनीति को अंजाम तक पहुंचाने के लिए असीमानंद को वर्ष 2004 में उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ में मौका मिल गया। वहां एक बैठक हुई जिसमे प्रज्ञा सिंह, सुनील जोशी, रामजी कलसंगरा, देवेन्द्र गुप्ता और अन्य अनेक लोग मौजूद थे। इस बैठक में हिंदू धर्मस्थलों पर मुस्लिम चरमपंथियों के हमलों पर गुस्सा जाहिर किया गया और कहा सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठे है, लिहाजा खुद के दम पर कुछ किया जाए। यहीं वह बैठक थी जहां पर सुनील जोशी हिन्दुत्ववादी राष्ट्रीयता के भ्रामक छलावे में आ गया और उसकी आदते बिगडऩे लगी। ...और अपराध की राह पर चल पड़ा जोशी इस बैठक में असीमानंद ने जोशी का इस तरह माईंड वाश किया कि वह अपराध की डगर पर चल पड़ा। देवास के कुछ आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से उसकी नजदीकी बढ़ी। वह लोगों को डरा-धमका कर पैसा उगाहने लगा। जोशी की पैसा कमाने की ललक ने प्रज्ञा बहुत आहत थी। उसने इसके लिए कई बार जोशी को रोकने की कोशिश की लेकिन वह माना नहीं। बताते हैं कि वह पैसा कमाने के पीछे इस कदर पागल हो गया था कि वह प्रज्ञा को भी प्रताडि़त करने से नहीं चुकता था। उधर असीमानंद बराबर इनके संपर्क में रहते थे। धीरे-धीरे मुलाकातों का जब दौर बढ़ा तो देश भर में बम धमाकों की साजिश रची गई। हैदराबाद, अजमेर, मालेगांव और समझौता एक्सप्रेस में बम रखने का फैसला इन्हीं मुलाकातों के दौर में किया गया। असीमानंद के अनुसार जोशी 2006 के मालेगांव बम धमाके की साजिश में भी शामिल था और हैदराबाद की मक्का मस्जिद, अजेमर और समझौता एक्सप्रेस में हुए ब्लॉस्ट में भी उसका पर्दे के पीछे बड़ा रोल था। मालेगांव ब्लास्ट के बाद से जोशी और आक्रामक हो गया था। निनामा हत्याकांड के बाद से ही फरार चल रहे सुनील जोशी उर्फ गुरुजी ने इस अवधि में लगभग 1 करोड़ से अधिक की संपत्ति इक_ा कर ली थी। शराब व्यवसाय, सोना-चांदी के अलावा वायदा सौदे में भी गुरुजी ने लाखों रुपए निवेश किए थे। निनामा हत्याकांड के बाद से फरार हुए जोशी ने 4 वर्ष में 1 करोड़ से अधिक की संपत्ति बना ली थी। देवास की चूना खदान क्षेत्र में रहने के दौरान जोशी ने विभिन्न स्रोतों से धन एकत्रित करना शुरू कर दिया था। रामचरण खाती के साथ मिलकर उसने ग्राम पालनगर में खली-बीज का व्यवसाय शुरू किया था। वासुदेव परमार के साथ मिलकर उसने परमार के फोटो स्टूडियो के पास एक दुकान भी खरीद ली थी। जितेंद्र निवासी डकाच्या और शिवम धाकड़ के साथ मिलकर जोशी ने शराब के दो ठेके भी ले लिए थे। इतना ही नहीं, उसने आनंदराज कटारिया के साथ मिलकर वायदा सौदों और सोने-चांदी के व्यवसाय में लाखों रुपए निवेश कर दिए थे। नवंबर-दिसंबर 2007 में हत्या के कुछ समय पहले ही उसने आनंदराज और वासुदेव के साथ मिलकर फस्र्ट फ्लाइट कोरियर सर्विसेज की फ्रेंचाइजी ले ली थी। जोशी के भतीजे अश्विन और मेहुल उर्फ घनश्याम को गीता भवन क्षेत्र स्थित फस्र्ट फ्लाइट कोरियर पर प्रशिक्षण के लिए भेजा था। इंदौर में भी परफेक्ट कोरियर एजेंसी संचालन के लिए आनंदराज कटारिया की दुकान का इस्तेमाल किया था। दुकान के बदलाव सहित फर्नीचर आदि पर भी जोशी ने ही भारी धनराशि खर्च की थी। 2007 में इसका उद्घाटन भी जोशी और उसके साथियों ने किया था। इसके अलावा आनंदराज के साथ ही जोशी ने व्यावसायिक गतिविधियों के लिए बोलेरो गाड़ी भी खरीद ली थी। जोशी से आजिज आ चुकी थी प्रज्ञा जोशी द्वारा लगातार परेशान प्रज्ञा उसके पैसा कमाने की भूख से भी परेशान थी। कुछ समय पहले तक सबके ऊपर अपना हुकुम चलाने वाली साध्वी जोशी के होते हुए अपना वर्चस्व स्थापित नहीं कर पा रही थी लिहाजा प्रज्ञा सिंह ने सुनील जोशी की हत्या की साजि़श रच डाली। पुलिस की चार्जशीट में बताया गया कि जोशी ने साध्वी के साथ व्यक्तिगत तौर पर बुरा बर्ताव किया था, इसलिए भी साध्वी उससे नाराज थी। इस बात का खुलासा इसी माह एनआईए की एक रिपोर्ट में भी हुआ है। जिसमें कहा गया है कि संघ प्रचारक जोशी की हत्या की एक वजह साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के प्रति उनका कथित यौन आकर्षण हो सकता है। एनआईए के अनुसार, प्रज्ञा को इस बात की चिंता सताती रहती थी कि कहीं सुनील जोशी आतंकी वारदात को अंजाम देने के लिए बनाईं गईं योजनाओं का खुलासा न कर दें। साथ ही जोशी पार्टी और दूसरे स्रोतों से मिले पैसे का भी दुरुपयोग करता था। चार्जशीट के मुताबिक, जोशी हर्षद मेहुल, राकेश और उस्ताद के साथ भी बुरा बर्ताव करता था। ये लोग बेस्ट बेकरी केस में फरार थे। 1 मार्च 2002 को इस मामले में 14 लोग जिंदा जल गए थे। ये चारों जोशी के साथ देवास में छिपे थे। ये कुछ कारण थे जिसके कारण 2006 में जोशी और साध्वी के बीच विवाद हो गया। दोनों लव कपल थे 2011 में सुनील जोशी की भतीजी चंचल जोशी ने पुलिस की चार्जशीट पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि चाचा की हत्या से कुछ महीनों पहले तक साध्वी प्रज्ञा और सुनील जोशी में बातचीत नहीं हुई। प्रज्ञा दीदी का घर आना भी कम हो गया था। चंचल के अनुसार, उसके चाचा अश्लील हरकत नहीं कर सकते क्योंकि वे दोनों अच्छे फ्रेंड थे लव कपल थे। चंचल के अनुसार सुनील की मां दोनों की शादी करना चाहती थी। साध्वी प्रज्ञा और सुनील जोशी दोनों की शादी के लिए दादी की इच्छा थी लेकिन सुनील चाचा का मन नहीं था। उनके संबंध ब्वायफ्रेंड और गर्लफ्रेंड की तरह थे। चंचल के अनुसार,परिवार में सुनील जोशी की मां को यह शक था कि प्रज्ञा ने ही उसे मारा होगा वे गुस्से में कहती रहती थी कि प्रज्ञा आज कल आती नहीं है चाचू थे तब आती थी। चंचल ने बताया कि सुनील चाचा की मौत से पहले दोनों के बीच किसी पर्सनपल मैटर को लेकर लड़ाई हो गयी थी। दिल्ली में बनी हत्या की प्लानिंग 2011 में देवास पुलिस द्वारा कोर्ट में पेश चार्जशीट के मुताबिक सालभर पहले तक जोशी की करीबी रही प्रज्ञा उसकी अमर्यादित हरकतों से नाराज हो हिमालय आश्रम चली गई थी, लेकिन जोशी की मौत के बिना उसके दिल को सुकून नहीं था। इसलिए अगस्त 2007 में वह दिल्ली लौट गई और सुनील जोशी की हत्या की प्लानिंग शुरू कर दी। प्लान को अंजाम तक पहुंचाने के लिए दिल्ली में वह आनंदराज कटारिया से मिली। यहीं पर उसने कटारिया के समक्ष जोशी को रास्ते से हटाने का इरादा जाहिर किया। अक्टूबर 2007 से वह अपने प्लान को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इंदौर आ गई। यहां वह किराए के फ्लैट में रहने लगी। इस दौरान वह जोशी के रिश्तों व उसकी गतिविधियों पर नजर रखती रही। फिर उसने जोशी के करीबी रहे मेहुल उर्फ घनश्याम से संपर्क किया। मेहुल का विश्वास जीतकर उसने जोशी के साथ रहने वाले राज उर्फ हर्षद सोलंकी व मोहन उर्फ रमेश को भी जोशी की हत्या का साझेदार बनाया। 14 दिसंबर को इंदौर में प्रज्ञा के फ्लैट में एक गुप्त बैठक हुई। इस बैठक में वासुदेव परमार, आनंदराज कटारिया, मेहुल उर्फ घनश्याम,राज उर्फ हर्षद सोलंकी भी शामिल हुए। उसी दिन जोशी की मौत का प्लान बनाया गया जिसके बाद कटारिया, मेहुल, राज और वासुदेव परमार को काम बांटे गए। 29 दिसंबर 2007 को कत्ल का दिन भी आ गया। साध्वी के पास था मोबाइल नंबर 9425056114। इस फोन नंबर पर आनंदराज सुबह से ही लगातार प्रज्ञा सिंह से दिशा निर्देश लेता रहा। आनंद राज ने 4 बार प्रज्ञा सिंह को योजना के अंजाम देने की खबर दी। चंचल के अनुसार,जिस रात चाचा की हत्या हुई, उस रात वे घर से चावल खाकर गए थे। वे मोटर साइकिल से बाहर निकले थे, मगर थोडी देर बाद वापस आ गए, क्योंकि गाड़ी पंचर हो गई थी। उसी वक्त उनके मोबाइल पर एक फोन आया तो उन्होंने जवाब दिया कि वे आ रहे हैं, मगर उसके बाद उनकी लाश आई। चंचल ने बताया कि जिस दिन चाचा की हत्या हुई, उस दिन घर पर संघ का एक व्यक्ति रुका था। उसने कहा कि चाचा की हत्या के बाद प्रज्ञा दीदी घर आई थी। उस वक्त घर पर वह और उसकी छोटी बहन ही थी। सुनील जोशी की जन्म और कर्मभूमि देवास के लोगों का कहना है कि जोशी ने संघ द्वारा संचालित सरस्वती शिशु मंदिर में शिक्षा प्राप्त की थी। 1999 में वह महू जिले में संघ का जिला प्रचारक बन गया, जहां कुछ ही समय में वह कट्टर हिंदुत्ववादी के रूप में पहचाना जाने लगा। संघ में उसे गुरूजी के नाम से जाना जाता था। सुनील बचपन से ही अति उत्साही प्रवृति का था। अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण वह हमेशा कुछ अलग करने की सोचता रहता था। जोशी को बचपन से जानने वाले 72 वर्षीय श्याम नारायण शर्मा कहते हैं कि उसमें देश भक्ति कुट-कुट कर भरी हुई थी। वह वीर सावरकर का अनुयायी था। हमेशा उनकी पंक्तियां दोहराया करता था। इसका प्रमाण उसकी डायरी में भी मिलता है। उसने लिखा भारत अपना हो महान, ये हर व्यक्ति का सपना है। औरों को मत देखो, सोचो योगदान क्या अपना है। जोशी की डायरी में उसके ज्योतिषाचार्य बनने का सपना भी नजर आता है। उसने ज्योतिष का अध्ययन भी किया। इसमें ग्रह, नक्षत्रों और कुंडली बनाने तक की जानकारियां हैं। सुनील जोशी उर्फ मनोज ने हिसाब की एक डायरी के शुरूआती पन्नों में चंद शेर, श्लोक और पंक्तियां लिखकर खुद को सही ठहराने का प्रयास भी किया। इस डायरी को जोशी ने हत्या से करीब दस माह पहले तक लिखा है। इसके आगे उसने लिखा मैं जो कर रहा हूं वह, ईश्वर के द्वारा ही निर्दिष्ट है। ईश्वर प्रदत्त शक्ति से ही मैं इस कार्य को सम्पन्न कर पा रहा हूं। जोशी ने अण्डमान से हटाई गई पट्टिका पर लिखी वीर सावरकर की पंक्तियां भी डायरी में लिखी हैं। इसमें लिखा देशभक्ति का यह व्रत हमने आंखें मूंदकर नहीं लिया है। इतिहास की प्रखर ज्योति में हमने इस मार्ग की परख की है। दृढ़ प्रतीक्षित होकर दिव्य अग्नि में जलने का निश्चय जानबूझकर किया है। हमने व्रत लिया है, आत्म बलिदान का। देवास में जोशी का अपना अलग ही रूतबा था। लेकिन जब से उसकी हत्या हुई है लोग उसकी बात भी करने से कतराते हैं। ऐसे ही कुछ लोगों को जब विश्वास में लेकर उसके अतीत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि सुनील जोशी, हिंदुत्ववादियों की आतंकी साजिश का केंद्र बिंदु था। 2007 में देवास में जब उसके घर के बाहर रहस्यमय तरीके से उसकी हत्या कर दी गई तब उसकी उम्र पैंतालीस साल थी। लेकिन तब तक भी वह कट्टरता के गहरे हिंसक निशान छोड़ चुका था। 2000 में जोशी और संघ के दो अन्य कार्यकर्ता संदीप डांगे और रामचंद्र कालसांगरा गहरे दोस्त बन गए। डांगे शाजापुर में तो कालसांगरा इंदौर में संघ का प्रचारक था। तीनों की यह दोस्ती आगे बड़े घातक गुल खिलाने वाली थी। असीमानंद के इकबालिया बयान में 2006 के बाद हुए लगातार बम धमाकों में जोशी का नाम मुख्य षड्यंत्रकारी के रूप में सामने आया है। लेकिन जोशी का रिश्ता इससे भी पहले अपराधों से जुड़ चुका था। जोशी ने डांगे के साथ मिलकर स्थानीय मुस्लिमों को फंसाने और हिंदू-मुसलिम दंगे भड़काने के लिए महू के मंदिरों में कई बार बम धमाके करने की कोशिशें की। यह बात तब सामने आई जब सीबीआई ने महू से संघ के कार्यकर्ता और जोशी के घनिष्ठ मित्र राजेश मिश्रा पर शिकंजा कसा। मिश्रा महू के पास पीथमपुरा में लोहे के पाइप बनाने की फैक्टरी चलाता है। 2001 में जोशी ने संघ के विशेष कामों के लिए उससे 15 पाइप बनवाए, जिसमें अंदर की ओर खांचे वाली धारियां और बीच में एक छेद बनवाया गया। अप्रैल 2002 में जोशी और डांगे ने महू में हनुमान मंदिर और स्वर्ग मंदिर के पास कम शक्ति वाले बम धमाके किए जिनमें एक व्यक्ति को मामूली चोटें आईं। दिसंबर, 2002 में भोपाल में हुए इज्तीमें से करीब आधा दर्जन जिंदा पाइप बम बरामद हुए। मिश्रा ने टीवी पर बमों की तस्वीरें देखीं। ये हूबहू वैसे ही थे जो उसने जोशी को मुहैया करवाए थे। उसने घबराहट में जोशी को फोन किया, लेकिन उसे कहा गया कि घबराने की कोई बात नहीं है। अगस्त, 2003 में एक विवाद के बाद जोशी और डांगे ने कांग्रेस के आदिवासी नेता प्यारे सिंह निनामा और उनके बेटे दिनेश की हत्या कर दी। परिवारवालों ने एफआरआई में जोशी, मिश्रा और सात अन्य का नाम संदिग्धों के रूप दर्ज कराया। मिश्रा को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन जोशी के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के बावजूद पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया। हालांकि संघ ने उसे निकाल दिया। मिश्रा ने पुलिस को महू के मंदिरों और भोपाल में बम धमाके करने की नाकाम कोशिशों के पीछे जोशी का हाथ होने की बात बताई। पुलिस ने इस मामले में मिश्रा को तो आरोपित किया लेकिन जोशी का नाम शामिल नहीं किया। जोशी को कानून के शिकंजे से बच निकलने की खुली छूट दे दी गई। इसने उसे बाद में और बम धमाके करने का मौका दिया जिनमें दर्जनों महिलाएं, पुरुष और बच्चे मारे गए। फरवरी, 2010 में सीबीआई की टीम ने देवास पहुंचकर स्थानीय पुलिस से जोशी की डायरी और उसके द्वारा बनाए रेखाचित्र हासिल किए जो हत्या के बाद उसकी जेब से बरामद हुए थे। सीबीआई को यह भी पता चला कि जोशी का मोबाइल, बंदूक और दूसरी कईं निजी चीजें उसकी हत्या के बाद उसके घर से हटा ली थीं। असीमानंद ने सीबीआई को दिए अपने बयान में दावा किया है कि कुछ दिनों बाद उसके पास भरतभाई का फोन आया कि सुनील जोशी का मर्डर हो गया है। असीमानंद ने इसके बाद फौरन लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित को फोन किया। जवाब में पुरोहित ने बताया कि सुनील जोशी ने किसी का मर्डर किया था। ऐसा लगता है कि किसी ने उसी हत्या का बदला लिया है। क्या कहता है एनआईए का चालान सुनील जोशी हत्याकांड मामले में एनआईए द्वारा पेश पूरक चालान में इस बात का खुलासा हुआ है कि जोशी जेल में बंद प्रज्ञा सिंह से नजदीकी बनाना चाहता था। मालेगांव और अजमेर शरीफ बम ब्लास्ट में शामिल राजेन्द्र चौधरी और लोकेश शर्मा प्रज्ञा सिंह को छोटी बहन मानते थे। इसके अलावा प्रज्ञा, राजेन्द्र और लोकेश को आशंका थी कि सुनील जोशी बम ब्लास्ट मामले की पुलिस को जानकारी दे सकता है। इसके चलते तीनों ने सुनील जोशी की साजिश रच कर हत्या की थी। हत्या के दौरान प्रज्ञा इंदौर में थी। हत्या की सूचना मिलने पर प्रज्ञा सुनील जोशी को देखने पहले देवास के एमजीएच अस्पताल पहुंचीं, बाद में जोशी के घर भी गई थीं। विशेष सत्र न्यायाधीश वीके पांडे की अदालत में पेश चालान में तीनों के खिलाफ हत्या, साजिश, साक्ष्य छुपाने और आम्र्स एक्ट के अन्तर्गत चालान पेश किया गया। जितेन्द्र शर्मा पर आरोप है कि हत्या में इस्तेमाल की गई दो पिस्तौल को छुपाने के लिए दिलीप जगताप को दी। एनआईए ने फिलहाल मामले में अन्य आरोपी बलवीर सिंह के खिलाफ चालान पेश नहीं किया है। दिलीप जगताप को सरकारी गवाह बना लिया गया है । पूर्व मे देवास पुलिस ने हर्षद सोलंकी, वासुदेव परमार, आनन्द राज कटारिया, रामचरण पटेल और प्रज्ञा सिंह के खिलाफ चालान पेश किया था। बाद में मामले की जांच एनआईए को सौंपी गई थी। दो पिस्तोल से मारी गोली सुनील जोशी की हत्या के पहले राजेन्द्र चौधरी ने मामले में अन्य आरोपी वासुदेव परमार के साथ मिलकर सुनील जोशी की लोकेशन, मोबाइल कॉल डिटेल और अन्य जानकारी ली थी। घटना की रात मोटरसाइकिल पर सवार होकर लोकेश शर्मा और राजेन्द्र चौधरी सुनील जोशी का पीछा कर रहे थे। लोकेश मोटर साइकिल चला रहा था। मौका मिलते ही राजेन्द्र चौधरी ने सुनील जोशी पर दो पिस्तोलों से गोली मारी थी। हत्या के बाद दोनों इन्दौर स्थित ग्वाल बस स्टैण्ड के पास फ्लैट में रूके थे। प्रज्ञा ने दोनों से मिलकर काम पूरा होने की बधाई दी थी। -------------

मोस्ट करप्ट अफसरों की कुंडली बना रहा पीएमओ

10 साल के भ्रष्टाचार का हिसाब-किताब जुटाने में जुटी सरकार
-पीएम मोदी की हिट लिस्ट में मप्र कैडर के दो अफसरों सहित 34 आईएएस शामिल
-4619 आईएएस अफसरों में से 1476 के भ्रष्टाचार की हो रही जांच
-पिछले 10 साल में 157 आईएएस पर दर्ज हुए हैं भ्रष्टाचार के मामले
-71 की जांच कर रही सीबीआई vinod upadhyay
भोपाल। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार के 10 साल के शासनकाल में हुए 38 घोटालों के साथ ही प्रदेशों में हुए बड़े घोटालों की फाइलें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर खुलनी शुरू हो गई है। इन तमाम घोटालों के सूत्रधार रहे नौकरशाहों की कुंडली पीएमओ द्वारा बनाई जा रही है। केंद्र के साथ ही विभिन्न राज्यों में पदस्थ 4619 आईएएस अफसरों में से 1476 द्वारा किए गए भ्रष्टाचार से संबंधित फाइलें खंगाली जा रही है। सबसे पहले केंद्र में हुए भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों लिस्ट तैयार की गई है। पहली लिस्ट में यूपीए सरकार के शासनकाल के मोस्ट करप्ट 34 अफसर मोदी सरकार के निशाने पर आए हैं। इसमें से दो अफसर मप्र कैडर के हैं। अगर पिछले दस साल का रिकार्ड देखें तो इस दौरान 157 आईएएस अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया गया है, जिसमें से 71 की जांच सीबीआई कर रही है। अपने तीन माह के शासनकाल में मोदी सरकार ने अभी तक कोई बड़ी उपलब्धि भले ही हासिल न की है,लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ एक्शन लेना शुरू कर जनता को भविष्य के लिए शुभ संकेत जरूर दिया है। भ्रष्टाचार के खात्मे और सुशासन देने का वादा कर सत्ता में आई मोदी सरकार ने अब भ्रष्ट अधिकारियों की एक लिस्ट तैयार कर ली है। लिस्ट में उन अधिकारियों के नाम शामिल है जिन पर यूपीए सरकार के 10 साल के शासनकाल में भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। ये 34 अधिकारी विभिन्न मंत्रालयों और सरकारी विभागों में कार्यरत बताए जा रहे है। कांग्रेस के राज्यपालों को हटाने के बाद अब मोदी सरकार कांग्रेस शासनकाल में जमकर भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों की फाइल निपटाने में लगी है। मोदी सरकार की इस सूची से अधिकारियों में हडकंप मचा हुआ है तो वहीं भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे अफसरों को बुरे दिन का भय सता रहा है। यूपीए सरकार के 10 साल के शासनकाल में सरकार से लेकर अधिकारियों तक भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे।
पीएमओ और डीओपीटी बना रहा सूची हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ ) और डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनेल ऐंड ट्रेनिंग (डीओपीटी) के अधिकारियों की मीटिंग में भ्रष्टाचार का यह मसला उठा था। बताया गया कि अफसरों के खिलाफ विजिलेंस जांच भी शुरू हुई, लेकिन अचानक रहस्यमयी तरीके से जांच रुकने लगीं। पीएमओ ने डीओपीटी से ऐसे करीब 200 केसों की रिपोर्ट 31 अगस्त तक मांगी है। इसमें बताना होगा कि जांच हुई, तो उसमें क्या मिला और जांच रुकी, तो किस वजह से। गौरतलब है कि नियुक्ति की कैबिनेट कमिटी के प्रमुख प्रधानमंत्री हैं और तमाम ट्रांसफर-पोस्टिंग में अंतिम फैसला उन्हीं का होता है। ऐसे में पीएमओ अफसरों का पूरा ब्योरा रख रहा है। सबसे बड़ी बात यह है की केंद्र के विभिन्न मंत्रालयों में पिछले 10 साल में पदस्थ रहे अधिकारियों के साथ ही प्रदेशों में पदस्थ रहे उन सभी आईएएस की फाइल खंगाली जा रही जो घोटालों में आरोपी बनाए गए हैं। बताया जाता है कि 1476 अधिकारियों में से सबसे अधिक उत्तर प्रदेश के हैं,जबकि दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र के और तीसरे स्थान पर मप्र के अफसर हैं। पिछले तीन साल में देश भर में 39 आईएएस, 7 आईपीएस समेत अब तक 54 नौकरशाह विभिन्न मामलों में दोषी पाए जा चुके हैं जबकि 260 से अधिक नौकरशाहों के खिलाफ मुकदमें चल रहे हैं। यह आकड़े 2010 से लेकर 6 अगस्त 2014 तक के हैं। इनमें ज्यादातर मामले भ्रष्टाचार से जुड़े हैं। 6 अगस्त तक भारतीय प्रशासनिक सेवा के 19, भारतीय पुलिस सेवा के 3 और संबद्ध केन्द्रीय सेवाओं के 67 अधिकारियों के खिलाफ जांच लंबित है। इसके अलावा भारतीय प्रशासनिक सेवा के 154, भारतीय पुलिस सेवा के 15 और अन्य संबद्ध केंद्रीय सेवाओं के 102 अधिकारियों के खिलाफ 180 मामलों में मुकदमें चल रहे हैं।
भ्रष्टों पर मुकदमा करने के लिए एसवीएस अब सीबीआई को भ्रष्ट नौकरशाह पर केस चलाने के लिए उनके आकाओं की अनुमति के लिए वर्षों इंतजार नहीं करना पड़ेगा। सिंगल विंडो सिस्टम (एसवीएस) के तहत किसी भी आईएएस या आईपीएस के खिलाफ भ्रष्टाचार से सम्बंधित मुकदमा दर्ज करने की अनुमति सिर्फ भारत सरकार के कार्मिक प्रशिक्षण विभाग से मिलेगी। किसी भी राज्य में कार्यरत नौकरशाहों के लिए अनुमति सम्बंधित राज्य के मुख्य सचिव देंगे वो भी तीन महीने के भीतर, अगर अनुमति नहीं मिलती है तो फिर कार्मिक प्रशिक्षण विभाग भारत सरकार उस पर फैसले लेगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में उपरोक्त प्रस्ताव को हरी झंडी दी है और इसपर त्वरित गति से काम शुरू करने को कहा है।
सरकारी संरक्षण में भ्रष्ट अधिकारियों की संख्या बढ़ी पीएमओ और डीओपीटी की अब तक की पड़ताल में यह बात सामने आई है कि यूपीए शासनकाल में सरकारी संरक्षण में भ्रष्टाचार की राह चलने वाले अफसरों की संख्या बढ़ती गई। साल 2012 में ऐसे अधिकारियों की संख्या तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ गई। ये वे भ्रष्ट अधिकारी हैं जिनके खिलाफ जांच पूरी कर सीबीआई आरोप पत्र दाखिल करना चाहती थी, लेकिन यूपीए सरकार ने इसके लिए जरूरी अनुमति नहीं दी। इसके बाद सीबीआई ने 31 दिसंबर 2012 को ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की सूची जारी की, जिनमें उनकी संख्या बढ़कर 99 हो गई। ये सभी अधिकारी कुल 117 मामलों में फंसे हुए थे। लेकिन सीबीआई द्वारा सूची जारी कर देने भर से भ्रष्ट अधिकारियों को मिल रहा सरकारी संरक्षण कम नहीं हुआ। सीबीआई की ताजा सूची में ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों की संख्या बढ़कर 165 हो गई है। इन 165 अधिकारियों के खिलाफ कुल 331 केस दर्ज हैं, जिनकी जांच पूरी हो चुकी है। यदि भ्रष्ट अधिकारियों और उनके खिलाफ दर्ज मामलों का अनुपात निकाला जाए तो एक भ्रष्ट अधिकारी औसतन भ्रष्टाचार के दो मामलों में लिप्त है। जांच एजेंसी को ठेंगा दिखाने वाले भ्रष्ट अधिकारियों में कस्टम व एक्साइज विभाग के अधिकारी अव्वल हैं। 165 अधिकारियों की सूची में अकेले कस्टम व एक्साइज विभाग के 70 अधिकारी हैं।
5 साल में 25,840 भ्रष्ट अफसरों पर मामला केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) में वर्ष 2009 से लेकर 2013 तक 25,840 अधिकारियों के खिलाफ शिकायत पहुंची। जिनकी जांच में ये दोषी पाए गए और सीवीसी ने इनके विभागों को कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। लेकिन कई विभागों ने भ्रष्ट अफसरों के प्रति नरम रवैया अपनाया। खास कर विदेश मंत्रालय और ओएनजीसी समेत कई सरकारी संस्थानों द्वारा भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ नरमी बरतने पर सीवीसी ने नाराजगी जताई। सीवीसी ने कहा कि भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ उचित कार्रवाई नहीं होने से अन्य अफसरों के हौसले भी बुलंद होंगे। सीवीसी द्वारा वर्ष 2013 के लिए तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक गत वर्ष 17 मामलों में संबंधित संस्थानों ने भ्रष्ट अधिकारियों को दंडित नहीं किया या हल्की-फुल्की कार्रवाई कर छोड़ दिया। इनमें चार दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए), तीन रेल मंत्रालय, दो-दो दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) व ओएनजीसी के अधिकारी शामिल हैं। इसके अलावा केंद्रीय लोक निर्माण विभाग, दिल्ली जल बोर्ड, एलआइसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड, विदेश मंत्रालय, एसबीआइ और भारतीय मानक ब्यूरो के एक-एक भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ भी पक्षपाती रवैया अपनाया गया।
ईडी ने अफसरों का ब्योरा मांगा प्रवर्तन निदेशालय (ईडी)ने मप्र के करीब 70 अधिकारियों-कर्मचारियों सहित देशभर के करीब 2,455 अधिकारियों-कर्मचारियों के यहां मारे गए छापे का विवरण और संपत्ति की जानकारी मांगी है। ईडी मुख्यालय ने लोकायुक्त पुलिस संगठन से आय से अधिक संपत्ति के मामलों में 20 लाख रुपए से ज्यादा की संपत्ति के प्रकरणों की जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है। ईडी ने पिछले तीन साल की यह जानकारी मांगी है। मप्र में सभी संभागीय लोकायुक्त इकाइयों द्वारा पिछले तीन साल में भ्रष्ट अफसर तथा कर्मचारियों के यहां की गई छापों की कार्यवाही की जानकारी एकत्र कराई गई है। करीब 70 अधिकारियों की करोड़ों रुपए की आय से अधिक के ये मामले शीघ्र ही ईडी को सौंपे जाने हैं। इनमें कई चर्चित मामले भी शामिल हैं। ईडी इन मामलों में अर्जित संपत्ति के स्रोत के बारे में नोटिस जारी कर संबंधितों से स्पष्टीकरण लेगी। संतोषजनक जवाब नहीं आने पर ईडी द्वारा अधिकारी-कर्मचारी की आय से अधिक संपत्ति अटैच कराई जाएगी।
अफसरों की संपत्ति पर लोकपाल की नजर केंद्रीय लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम की नजरें भारतीय प्रशासनिक सेवा के सभी अधिकारियों पर गड़ी हैं। अधिकारियों को एक अगस्त तक स्थिति के मुताबिक संपत्ति का संशोधित ब्योरा 15 सितंबर से पहले वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। वहीं राज्य सरकार ने भी अपने समूह क, ख और ग कार्मिकों को अपनी सपंत्ति का ब्योरा प्रति वर्ष 31 जुलाई की स्थिति के मुताबिक 31 अगस्त तक उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं।
सोशल साइट व सूचना पट्ट पर लिखा जाएगा भ्रष्ट अधिकारियों का ब्यौरा भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार सख्ती के साथ ही भ्रष्टाचार करने वाले अधिकारियों का ब्यौरा विभाग की बेवसाइट से लेकर फेसबुक जैसी सोशल साइट पर भी डालने की तैयारी कर रही है। हालांकि इसमें पुराने मामलों को अपलोड नहीं किया जाएगा। हालांकि अभी पीएमओ और डीओपीटी के बीच इस पर विचार-विमर्श चल रहा है। उधर,भ्रष्टाचार रोकने और भ्रष्टाचारियों को सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने की मुहिम के तहत महाराष्ट्र एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी)ने तो सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर पेज बनाने की तैयारी शुरू कर दी है, जिस पर रिश्वत लेने वालों के फोटो डाले जाएंगे। एसीबी महानिदेशक प्रवीण दीक्षित ने बताया, भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम तेज करने और ऐसे लोगों तक पहुंचने के लिए हम फेसबुक का मंच इस्तेमाल करने की योजना बना रहे हैं। एसीबी के प्रमुख प्रवीण दीक्षित ने भ्रष्टाचारियों पर नकेल कसने के लिए सरकारी दफ्तरों के बाहर एसीबी की मोबाइल वैन भी खड़ी करनी शुरू की है। ताकि लोगों तक पहुंचा जा सके और उनसे संवाद स्थापित किया जा सके। ऐसा होने से ज्यादा से ज्यादा लोग भ्रष्टाचार से जुड़ी अपनी शिकायतें एसीबी तक पहुंचा सकेंगे।
फेसबुक के जरिए ज्यादा लोगों तक पहुंचने की कवायद हालांकि एसीबी पहले भी भ्रष्ट अधिकारियों की फोटो अपनी वेबसाइट पर लगाती रही है, पर वह सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए ज्यादा लोगों तक पहुंचना चाहती है। कई बार देखा गया है कि एक बार रिश्वत लेते पकड़े गए लोग जब दोबारा नौकरी पर आते हैं तो फिर घूसखोरी में लग जाते हैं। एसीबी के मुताबिक उनका यह निर्णय रिश्वतखोरी की घटनाओं को रोकने में मदद करेगा। एसीबी अधिकारियों का कहना है कि हम युवाओं से इस साइट को देखने को भी कहेंगे, ताकि भ्रष्ट अधिकारियों की फोटो उनके बच्चों तक भी पहुंचे और उन्हें यह पता लगे कि उनके अभिभावक कौन सा काम करते हैं। फोटो के साथ वेबसाइट पर यह भी लिखा जाएगा कि आरोपी अधिकारी कितने रुपए की रिश्वत लेते पकड़ा गया है और छानबीन के दौरान आरोपी के घर से कितने गहने व कितने नकद रुपए बरामद हुए हैं। एसीबी ने इस वर्ष 16 अगस्त तक भ्रष्टाचारियों को पकडऩे के लिए 744 व्यूह रचे, जो पिछले वर्ष की तुलना में 114 फीसद अधिक है। इस दौरान 1009 सरकारी कर्मचारियों और उनके सहयोगियों को गिरफ्तार किया। गत वर्ष इसी अवधि के दौरान एसीबी ने 344 व्यूह रचे, जिनमें 452 लोगों को गिरफ्तार किया था।
अभी तक एक भी अफसर ने नहीं दिया चल संपत्ति का ब्योरा अखिल भारतीय सेवाओं के लिए सम्पत्ति घोषणा को लेकर आए नए नियमों से प्रदेश के आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों में बेचैनी है। करीब एक माह का वक्त गुजरने के बावजूद प्रदेश के किसी भी अधिकारी ने अभी तक अपनी चल सम्पत्ति का विवरण दाखिल नहीं किया है। यही नहीं प्रदेश के 309 आईएएस अफसरों में से 21 ने अभी तक अपनी अचल संपत्ति का विवरण नहीं दिया है। उन्हें सम्पत्ति का विवरण देने के लिए 15 सितंबर तक का समय दिया गया है। लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम 2013 के नए नियम लागू होने से पहले तक अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को खुद की सम्पत्ति का विवरण देना होता था। यह विवरण 31 दिसम्बर को आधार बनाकर प्रस्तुत किया जाना था।
पीएमओ दो मिश्र का जलवा
नौकरशाही पर निगाह रखने के लिए प्रधानमंत्री ने दो मिश्र के हाथ में कमान दे रखी है। इनमें से एक हैं पीके मिश्र। मोदी ने अपने करीबी इस अधिकारी को प्रधानमंत्री कार्यालय फिट करने के लिए पहली बार अतिरिक्त मुख्य सचिव के पद का सृजन भी किया है। 1972 बैच के पूर्व आईएएस अधिकारी पीके मिश्र अब नृपेंद्र मिश्र का साथ दे रहे हैं। नृपेंद्र को प्रधानमंत्री का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया है। इन महत्वपूर्ण पदों पर बैठने वाले इन अधिकारियों के बारे में ये चर्चाएं तेज हैं कि मोदी इन दोनों में काम का बंटवारा आखिऱ किस तरह करेंगे। मजेदार रूप से इन दोनों अधिकारियों में मोदी को सीधे रिपोर्टिंग के अलावा एक और बात कॉमन है और वह यह है कि दोनों ही विनियामक संस्थाओं में रह चुके हैं। जहां नृपेंद्र मिश्र ट्राई के प्रमुख रह चुके हैं, वहीं पीके मिश्र गुजरात इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन के चेयरमैन रह चुके हैं। विनियामक संस्थाओं में रह चुके इन अधिकारियों के इतिहास के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री की गवर्नेंस स्टाइल नौकरशाहों द्वारा ही चलाई जाएगी और मोदी के गवर्नेंस एजेंडा में इन दोनों अधिकारियों की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी।

अब नेताओं की खादी होगी बेदाग

-मप्र के 7 सांसदों और 73 विधायकों को क्लीनचीट देने की तैयारी
-केंद्र ने मांगी दागी सांसदों और विधायकों के केसों की जानकारी
-केंद्रीय गृह मंत्री और केंद्रीय गृह सचिव ने भेजा मप्र सरकार को पत्र
- गंभीर अपराध सिद्ध हुए तो छिन सकती है सांसदी या विधायकी
-मंत्री बाबूलाल गौर, सरताज सिंह, गौरीशंकर शेजवार, राजेंद्र शुक्ल, लाल सिंह आर्य भी दागियों में शामिल vinod upadhyay
भोपाल। सुप्रीम कोर्ट के सख्त लहजे के बाद अब केंद्र सरकार ने दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे केसों का जल्द से जल्द निपटारा करना चाहती है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों से सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे केसों की डिटेल मांगी है। देश भर में जहां 185 सांसदों पर विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज है, वहीं इसमें मप्र के 7 सांसद भी शामिल हैं। इनके अलावा प्रदेश के 5 मंत्रियों सहित 73 विधायकों के खिलाफ भी विभिन्न तरह के केस दर्ज हैं। केंद्र सरकार की मंशा है की अब मप्र सहित देश के सभी दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ चल रहे केसों का जल्दी ही निपटारा किया जाएगा। मोदी सरकार सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई एक साल के भीतर पूरा करने की कोशिश में जुट गई है। ताकि जल्द ही सभी नेताओं की खादी सफेद नजर आएगी। दरअसल,राज्य सरकार की दलील है की मप्र के किसी भी वर्तमान विधायक पर ऐसे केस दर्ज नहीं हैं जिनके कारण उन्हें सजा मिल सकती है।
केंद्रीय गृह मंत्री और केंद्रीय गृह सचिव ने भेजा पत्र
देश की राजनीति को बेदाग बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किया है। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का हवाला देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय गृह सचिव अनिल गोस्वामी ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों को अलग-अलग पत्र लिखे हैं और उन्हें उच्चतम न्यायालय के निर्देशों की अनुपालना के लिए उन्हें कदम उठाने की सलाह दी है। इनमें वे मामले शामिल हैं जिनमें दो साल की सजा का प्रावधान है और जिससे संसद या राज्य विधानसभाओं से उन्हें अयोग्य करार दिए जा सकता है। मप्र सरकार को भेजे पत्र में केंद्रीय गृह मंत्री सांसदों विधायकों के केस की डिटेल मांगने के साथ ही ऐसे मामलों की सुनवाई में तेजी लाने को कहा है जिनमें दोष साबित होने पर अयोग्य करार देने का प्रावधान है। पत्र में कहा गया है कि वे अदालतों में ऐसे मामलों की नियमित आधार पर सुनवाई करवाएं, विशेष सरकारी वकील नियुक्त करें और उनकी नियमित निगरानी सुनिश्चित करें। गृह मंत्री और गृह सचिव ने अपने निर्देश में यह भी कहा है कि अगर वकीलों की कमी के चलते मामले की सुनवाई अटकती है, तो राज्य सरकार को विशेष सरकारी वकील की नियुक्ति करनी चाहिए। इसके अलावा राज्य के गृह सचिवों को नियमित अंतराल पर मामले की समीक्षा करने को भी कहा गया है। पिछले हफ्ते इसी तरह का पत्र कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद द्वारा भी प्रदेश सरकार को भेजा गया था।
मप्र के 32 फीसदी विधायक दागदार
नेशनल इलेक्शन वॉच की मध्यप्रदेश इकाई और लोकतंत्र सुधार संघ (एडीआर) के अनुसार,चौदहवीं विधानसभा 'दागियोंÓ से भरपूर है। मतदाताओं ने जो नुमाइंदे चुनकर विधानसभा में भेजे हैं उनमें 73(32 प्रतिशत )के खिलाफ विभिन्न धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज हैं। इनमें 45 तो ऐसे हैं जिनके विरुद्ध डकैती, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ जैसे गंभीर प्रकरण चल रहे हैं। जबकि, 2008 की विधानसभा में 26 प्रतिशत विधायकों के खिलाफ ही आपराधिक मामले थे। मध्यप्रदेश इलेक्शन वॉच संस्था ने विधायकों के आपराधिक रिकार्ड का खुलासा करते हुए दावा किया है कि भाजपा के निर्वाचित 165 में से 48 विधायकों (29 प्रतिशत), कांग्रेस के 58 में से 22 विधायकों (38 प्रतिशत), बसपा के चार में से एक (25 प्रतिशत) एवं दो निर्दलीय विधायकों ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की घोषणा की है। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 73 विधायकों में से 45 पर अपहरण, डकैती, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट के जुलाई 2013 के एक फैसले से ऐसे सांसद और विधायकों की सदस्यता पर खतरा मंडराने लगा था जिन्हें भ्रष्टाचार सहित ऐसे आपराधिक मामले में अदालत द्वारा दोषी ठहरा दिया गया हो जिसके लिए दो साल या इससे अधिक सजा का प्रावधान हो। लेकिन अब केंद्र सरकार की पहल से दागी नेताओं को राहत पहुंची है। उधर, सूत्रों का कहना है कि अभी केंद्र सरकार द्वारा यह स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है की दागदारों की श्रेणी में कौन-कौन से केस वाले नेताओं को शामिल किया जाएगा। उधर,कुछ नेताओं का कहना है कि पूर्व सांसदों और विधायकों के संबंध में भी विचार होना चाहिए। उधर, भाजपा के नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार राजनीति को स्वच्छ करने के अपने वादे पर कायम है और इसी क्रम में सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस साल मार्च में दिए गए आदेश को लागू करने की कोशिश शुरू की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ कर दिया था कि दो साल से अधिक सजा वाले मामलों में सांसदों एवं विधायकों के खिलाफ केस की सुनवाई एक साल में पूरी होगी और ऐसा नहीं होने पर जिला जज को हाईकोर्ट को रिपोर्ट भेजनी होगी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को लागू कराना जरूरी है। इसके लिए कानून मंत्री ने सभी राज्यों के कानून मंत्री और गृहमंत्री ने सभी मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा है।
मामलों की रिपोर्ट हो रही तैयार
प्रदेश के विधायकों पर विभिन्न अदालतों में दर्ज केस की रिपोर्ट तैयार की जा रही है। मप्र के विधि विभाग के अधिकारियों ने विधायकों से संबंधित जिला अदालतों और कलेक्टोरेट से जानकारी मांगी है। विधायकों ने चुनाव के दौरान अपने आवेदन के साथ अपने आपराधिक मामलों की जो जानकारी दी है उसकी भी पड़ताल की जा रही है। इस संदर्भ में विधि विभाग विधिवेताओं से भी सलाह लेगा। माना जा रहा है प्रदेश में जिन कुछ विधायकों के खिलाफ गंभीर मामले अदालतों में चल रहे हैं उन्हें भी माफी के दायरे में लाया जाएगा।
अपराध कैसे-कैसे? - आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 73 विधायकों में से 45 पर अपहरण, डकैती, महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर मामले दर्ज हैं। - भाजपा के तीन विधायकों भंवर सिंह शेखावत, रमेश मेंदोला, ओम प्रकाश धुर्वे और कांग्रेस के एक विधायक राजेंद्र कुमार सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत मामला दर्ज है। -दो विधायकों ने महिलाओं के विरुद्घ अपराध की घोषणा शपथ-पत्र में की है और ये दोनों ही सत्तारुढ दल के विधायक हैं। माहिदपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के बहादुर सिंह के ऊपर भारतीय दंड संहिता की धारा 509 के तहत किसी महिला के विरुद्घ अश्लील हरकत करने का मामला दर्ज है। मुरैना से भाजपा के रुश्तम सिंह के विरुद्घ भारतीय दंड संहिता की धारा 498 (पति अथवा रिश्तेदार द्वारा क्रुरता) के तहत मामला दर्ज है।
आरोप सिद्ध हुआ तो 13 साल के लिए चुनाव से दूर होंगे दागी नेता
सुप्रीम कोर्ट से दागी सांसदों को कैबिनेट मंत्री न बनाए जाने की सलाह मिलने के बाद मोदी सरकार अब जनप्रतिनिधित्व कानून में बड़ा संशोधन करने की तैयारी कर रही है। इसके तहत जिन नेताओं पर गंभीर आरोप लगे हैं, उन्हें 13 साल तक चुनावी राजनीति से दूर किया जा सकेगा। जनप्रतिनिधित्व कानून में प्रस्तावित संशोधन के अनुसार, यदि जनप्रतिनिधि के खिलाफ किसी भी आपराधिक मामले में चार्जशीट पेश हो चुकी हो और उसमें कम से कम 7 साल की कैद का प्रावधान हो, तो वह खुद-ब-खुद अपात्र घोषित हो जाएगा। अगर केस का ट्रायल पेंडिंग हो या सजा के बाद अपील की गई हो, तो भी नेता को अपात्र ही माना जाएगा। फिलहाल ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। कानून मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, संशोधन बिल का ड्राफ्ट तैयार है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुमति मिलने के बाद इसे आगामी शीत सत्र में संसद में पेश किया जाएगा। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि कानून मंत्रालय ने प्रस्तावित संशोधन विधेयक में स्पष्ट किया है कि यदि उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव की अधिसूचना जारी होने से 180 दिन पहले चार्जशीट पेश की गई हो, तो ही उसे अयोग्य घोषित किया जा सकेगा। साथ ही सरकार ने लॉ कमीशन द्वारा दागियों को राजनीति से दूर करने और जनप्रतिनिधित्व कानून में सुझाई गई अनुशंसाओं को भी संशोधन विधेयक में शामिल किया है। संशोधन बिल के ड्राफ्ट में कमीशन के सुझावों को भी शामिल किया गया है।
इसके अलावा- - प्रस्तावित संशोधन विधेयक में पहली बार गलत शपथपत्र देने को भी शामिल किया गया है। प्रस्ताव के मुताबिक, ऐसा करने पर उम्मीदवार को उस सीट से भी चुनाव लडऩे पर पाबंदी होगी। साथ ही उसे अगले 6 साल तक किसी भी चुनाव लडऩे से अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा। - गलत शपथपत्र देने की स्थिति में कानून मंत्रालय कम से कम 6 माह और ज्यादा से ज्यादा 3 साल की सजा का प्रावधान भी प्रस्तावित कर रहा है।
मप्र के पार्टीवार विधायकों की स्थिति
दल कुल विधायक दागी विधायक (संख्या)
भाजपा 165 48
कांग्रेस 58 22
बसपा 04 01
निर्दलीय 03 02
मप्र के दागी विधायक और उनपर दर्ज कसों की संख्या
क्र. नाम विस.क्षेत्र पाटी केस संख्या 1 तरूण भनोत जबलपुर पश्चिम कांग्रेस केस-8 2 गिरीश कुमार नरसिंहगढ़ कांग्रेस केस-5 3 जयभान सिंह पवैया ग्वालियर भाजपा केस-1 4 राजेंद्र कुमार सिंह सतना कांग्रेस केस-2 5 केपी सिंह अमरपाटन कांग्रेस केस-1 6 दिलीप शेखावत नागदा खाचरौद भाजपा केस-9 7 मुरलीधर पाटीदार सुसनेर भाजपा केस-5 8 बलवीर सिंह दिमनी बसपा केस-3 9 रुस्तम सिंह मुरैना भाजपा केस-2 10 जालम सिंह नरसिंहपुर भाजपा केस-2 11 भंवरसिंह शेखावत .धार भाजपा केस-1 12 अरुण भीमावत शाजापुर भाजपा केस-1 13 गोपाल सिंह चौहान चंदेरी कांग्रेस केस-6 14 संजय पाठक विजयराघवगढ़ भाजपा केस-2 15 रमाकांत तिवारी श्योपुर भाजपा केस-1 16 अंचल सोनकर पूर्वी जबलपुर भाजपा केस-1 17 चंद्रशेखर देशमुख मुलताई भाजपा केस-1 18 सत्यपाल सिंह सुमावली भाजपा केस-4 19 सुख सिंह बाना मऊगंज (रीवा) कांग्रेस केस-3 20 राजेश सोनकर सांवेर भाजपा केस-3 21 सोहनलाल वाल्मिकी परासिया कांग्रेस केस-2 22 सुरेंद्र नाथ सिंह भोपाल मध्य भाजपा केस-2 23 मोती कश्यप बड़वारा भाजपा केस-2 24 सतीश मालवीय घट्टिया कांग्रेस केस-1 25 निशंक जैन बासौदा कांग्रेस केस-1 26 जितेंद्र पटवारी राऊ कांग्रेस केस-6 27 नरेंद्र सिंह कुशवाह भिंड भाजपा केस-5 28 कालू सिंह धरमपुरी भाजपा केस-4 29 मनोज पटेल देपालपुर भाजपा केस-3 30 दिनेश राय मुनमुन सिवनी निर्दलीय केस-3 31 विश्वास सारंग नरेला भाजपा केस-2 32 यादवेंद्र सिंह नागोद कांग्रेस केस-2 33 सुरेंद्र गुप्ता इंदौर-1 भाजपा केस-2 34 इंदर सिंह परमार कालापीपल भाजपा केस-2 35 वेलसिंह भूरिया सरदारपुर भाजपा केस-1 36 विक्रम सिंह राजनगर कांग्रेस केस-1 37 बहादुर सिंह महीदपुर भाजपा केस-1 38 कल सिंह भभर चंदला निर्दलीय केस-1 39 लालसिंह आर्य गोहद भाजपा केस-1 40 गौरशंकर बिसेन बालाघाट भाजपा केस-1 41 राजेश यादव .गरोठ भाजपा केस-1 42 रमेश मंदोला इंदौर-2 .भाजपा केस-1 43 महेंद्र सिंह बामौरी कांग्रेस केस-1 44 संजय शर्मा तेंदुखेड़ा भाजपा केस-1 45 अमर सिंह यादव राजगढ़ भाजपा केस-1 46 अजय सिंह चुरहट कांग्रेस केस-2 47 हर्ष सिंह रामपुर बघेलान भाजपा केस-2 48 रामेश्वर शर्मा भोपाल (हुजूर) भाजपा केस-2 49 ऊषा ठाकुर इंदौर-3 भाजपा केस-2 50 गोविंद सिंह लहार कांग्रेस केस-1 51 रामदयाल चंदला भाजपा केस-1 52 शंकरलाल तिवारी सतना भाजपा केस-1 53 शकुंतला खटीक करेरा कांग्रेस केस-1 54 लखन पटेल पथरिया भाजपा केस-1 55 ओम प्रकाश धुर्वे शाहपुरा भाजपा केस-1 56 सज्जन सिंह उइके घोड़ाडोंगरी भाजपा केस-1 57 बाबूलाल गौर गोविंदपुरा भाजपा केस-1 58 कमल मसकुले बालाघाट भाजपा केस-1 59 आरिफ अकील भोपाल उत्तर कांग्रेस केस-1 60 राजेंद्र शुक्ला रीवा भाजपा केस-1 61 राम सिंह यादव कोलारस कांग्रेस केस-1 62 मनोज कुमार अग्रवाल कोतमा कांग्रेस केस-1 63 संदीप जायसवाल मुड़वारा भाजपा केस-1 64 कैलाश विजयवर्गीय मऊ भाजपा केस-1 65 निलेश अवस्थी पाटन कांग्रेस केस-1 66 तुकोजीराव पवार देवास भाजपा केस-1 67 कृष्ण कुमार श्रीवास्तव टीकमगढ़ भाजपा केस-1 68 हरवंश राठौर बंडा भाजपा केस-1 69 रामनिवास विजयपुर कांग्रेस केस-1 70 बाला बच्चन राजपुर कांग्रेस केस-1 71 रंजना बघेल मनावर भाजपा केस-1 72 सरताज सिंह सिवनी मालवा भाजपा केस-1 73 जसवंत सिंह हांडा शुजालपुर भाजपा केस-1
मध्यप्रदेश के दागी सांसद और उन पर दर्ज केसों की संख्या 1 गणेश सिंह सतना भाजपा केस-2 2 फग्गन सिंह कुलस्ते मंडला भाजपा केस-2 3 लक्ष्मी नारायण यादव सागर भाजपा केस-1 4 ज्योति धुर्वे बैतूल भाजपा केस-2 5 राव उदय प्रताप होशंगाबाद भाजपा केस-1 6 राकेश सिंह जबलपुर भाजपा केस-1 7 नरेंद्र सिंह तोमर ग्वालियर भाजपा केस-1
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इधर, तैयार हो रहा मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड
एक तरफ केंद्र सरकार दागी नेताओं को क्लीनचिट देने की तैयारी कर रही है उधर, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रियों के रिपोर्ट कार्ड तैयार करवा रहे हैं। मुख्यमंत्री सचिवालय के अफसर 10 बिंदुओं के आधार पर एक-एक मंत्री का आकलन कर रहे हैं। बताया जाता है की केंद्र से मिले दिशा-निर्देश के बाद यह कदम उठाया गया है। भाजपा संगठन और संघ की मंशा है की प्रदेश मंत्रिमंडल से ऐसे मंत्रियों को बाहर किया जाए जिनकी परफार्मेंस पुअर है। मंत्रिमंडल के फेरबदल में मंत्रियों के विभाग का फैसला उनकी रेटिंग के अनुसार किया जाएगा। इस आधार पर कुछ मंत्रियों को बड़े विभागों की जिम्मेदारी दी जाएगी तो कुछ के विभाग बदले जा सकते हैं, वहीं खराब परफॉरमेंस वालों को मंत्रिमंडल से बाहर कर उनकी जगह नए चेहरों को मौका दिया जाएगा। मंत्रियों का रिपोर्ट कार्ड बनाने के लिए इंटेलीजेंस से मंत्रियों की रिपोर्ट मंगवाई है। इसमें यह भी देखा जा रहा है कि कितने मंत्रियों ने पिछले 8 महीने में विभाग के काम-काज पर कितना ध्यान दिया है। बताया जाता है कि रिपोर्ट तैयार होने के बाद मुख्यमंत्री सबके कामकाज के लिए मंथन करेंगे और एक-एक मंत्री को उनका हिसाब-किताब देंगे। इस संबंध में मुख्यमंत्री सचिवालय ने तैयारी शुरू कर दी है। इस बार के मंथन में मंत्रियों के साथ ही चुनिंदा अफसरों को भी शामिल किया जाएगा।
निधि के उपयोग पर भी नकेल
विधायक व सांसद निधि के तहत जारी की जाने वाली निधि के उपयोग को लेकर केंद्र सरकार ने अतिरिक्त सतर्कता बरतना शुरू कर दिया है। केंद्र ने विधायकों पर शिकंजा कस दिया है। जारी निर्देश में दोटूक शब्दों में कहा गया है कि विधायक निधि के तहत विकास कार्य के लिए एक बार प्रस्ताव भेजने के बाद उसमें संशोधन नहीं होगा। लिहाजा विधायकों को अब सोच समझकर प्रस्ताव बनाने और जिला योजना एवं सांख्यिकी विभाग के हवाले करने की सलाह दी गई है। निधि के उपयोग को लेकर केंद्र सरकार ने पहले सांसदों के लिए लक्ष्मण रेखा खींची इसके तुरंत बाद अब विधायकों के लिए हदें तय कर दी है। सांसदों को हर हाल में 15 मार्च तक विकास कार्य के संबंध में प्रस्ताव भेजने कहा गया है। केंद्र सरकार ने विधायक निधि के उपयोग को लेकर जरुरी गाइड लाइन जारी किया है। अपने निर्वाचन क्षेत्र के ग्रामीण तथा शहरी इलाकों में विधायक निधि के तहत कराए जाने वाले कार्य के लिए जिला योजना एवं सांख्यिकी विभाग को भेजे जाने वाले प्रस्तावों में दोबारा उसे परिवर्तन करने की गुंजाइश को केंद्र सरकार ने पूरी तरह खत्म कर दिया है। लिहाजा विधायकों को कार्यों की सूची गंभीरता के साथ बनानी होगी। विकास कार्यों के संबंध में जैसे ही प्रस्ताव जिला योजना एवं सांख्यिकी विभाग के पास पहुंचेगी। विधायकों के प्रस्तावों को लॉक कर दिया जाएगा। मसलन उन्हीं कार्यों को अंतिम स्वीकृति दी जाएगी जो विधायकों द्वारा भेजे गए हैं। एक बार प्रस्ताव भेजने के बाद इसमें दोबारा रद्दोबदल नहीं किया जा सकेगा। दोबारा निर्वाचित होने के बाद भी नहीं मिलेगी आजादी केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि अगर कोई विधायक दूसरी बार अपने निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीत जाते हैं इसके बाद भी पहले कार्यकाल के दौरान उनके द्वारा भेजे गए प्रस्तावों को बदलने की आजादी नहीं मिलेगी। पुराने प्रस्तावों को किसी भी हालत में नहीं बदला जाएगा।
विवाद के कारण कड़ा फैसला
पूर्व में इस तरह की शिकायतें लगातार मिलती रही है कि विधायक के चुनाव हारने और नए निर्वाचित होने वाले विधायक द्वारा पूर्व के प्रस्तावों पर कैंची चला दी जाती है। दबाव डालकर उन प्रस्तावों को खारिज करा लिया जाता था जो पूर्व विधायक द्वारा प्रस्तावित किया गया था। राजनीतिक लाभ-हानि को ध्यान में रखकर बनाए जाने वाले दबाव को देखते हुए केंद्र सरकार ने अब विधायकों के लिए हदें तय कर दी है।

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

शनिवार, 23 अगस्त 2014

22,000 करोड़ की संपत्ति छुपाई नौकरशाहों ने

binod upadhyay/विनोद उपाध्याय
फ्लैग.....2012 के एक पर्चे के आधार पर हुई तहकीकात में हुआ खुलासा
- दिल्ली,मुंबई,चेन्नई ही नहीं सिंगापुर, दुबई में भी कई आईएएस अधिकारियों की अचल संपत्ति
- सबसे अधिक खेती और रियल स्टेट में इंवेस्ट किया अधिकारियां ने
- बड़ी-बड़ी कंपनियों और ठेकों में निवेश किया अवैध कमाई को
- देश में सबसे दबंग, तिकड़बाज, भ्रष्ट और अय्याश हैं मप्र के नौकरशाह
भोपाल। मप्र भले ही 100000 करोड़ के कर्ज में डूबा है...सूबे में हर व्यक्ति 14 हजार का कर्जदार है...44.30 फीसदी आबादी अभी भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करती है...30.9 फीसदी आबादी भुखमरी की कगार पर है...लेकिन यहां के अफसर मालामाल है। प्रदेश के 309 आईएएस अफसरों में से अधिकांश के पास बेपनाह चल और अचल संपत्ति है। हालांकि हर साल जब प्रदेश के आईएएस अफसर अपनी संपत्ति का ब्यौरा देते हैं तो अपनी अधिकांश नामी और बेनामी संपत्ति को छुपा जाते हैं। इस बार भी 10 अगस्त तक प्रदेश के जिन 281 आईएएस अफसरों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा दिया है और जिन 28 ने नहीं दिया है ये सारे नौकरशाह पिछले कई साल से करीब 22,000 क रोड़ की संपत्ति का विवरण छुपा जाते हैं। इस बात का खुलासा अधिकारियों द्वारा दिए गए संपत्ति विवरण और 2012 के एक पर्चे के आधार पर हुई तहकीकात के बाद हुआ है। इस तहकीकात की रिपोर्ट पीएमओं (प्रधानमंत्री कार्यालय )और केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को मिल गई है। दरअसल, वर्ष 2012 के अगस्त महिने में प्रदेश के राज्य मंत्रालय वल्लभ भवन में एक पर्चा वितरित किया गया था। उस पर्चे में मध्यप्रदेश के ज्यादातर नौकरशाहों को अय्याश और महाभ्रष्ट बताया गया था। उसमें सविस्तार अफसरों के नाम भी छापे गए थे। उस पर्चे को कुछ अफसरों ने उसी साल केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग और पीएमओ को भेज दिया। उस पर्चे के आधार पर वर्ष 2013 में पीएमओ ने जब विभिन्न स्रोतों से इसकी जांच कराई तो यह तथ्य सामने आया कि मप्र के अफसर केंद्र और राज्य सरकार ने विभिन्न योजनाओं के लिए मिलने वाले बजट में जमकर घपलाबाजी कर रहे हैं। इन नौकरशाहों ने अपनी अवैध कमाई का बड़ा हिस्सा खेती,रियल स्टेट, बड़ी-बड़ी कंपनियों और ठेकों में निवेश कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार भष्ट अफसरों ने प्रदेश की राजधानी भोपाल, इंदौर, होशंगाबाद, ग्वालियर, जबलपुर में खेती की जमीन तो सतना, कटनी, दमोह,छतरपुर और मुरैना में बिल्डर व खनन माफिया के पास करोड़ों रुपए का निवेश किया है। वहीं प्रदेश के बाहर मुंबई, दिल्ली, गुडग़ांव, हिमाचल प्रदेश, ओडिशा,पंजाब, शिमला, असम, आगरा के साथ ही विदेशों में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, सिंगापुर, दुबई, मलेशिया, बैंकॉक, कनाडा, लंदन में भी संपत्ति जुटाई है।
कांग्रेस परस्त अफसरों ने तैयार की थी रिपोर्ट
बताया जाता है प्रदेश के नौकरशाह अपनी संपत्ति की घोषणा करने में जिस तरह की कोताही और देरी करते थे, उसको देखते हुए मप्र कैडर के ही कुछ कांग्रेस परस्त अधिकारियों ने करीब 227 आईएएस अधिकारियों की चल और अचल संपत्ति का विवरण तैयार कर 2013 में पीएमओ को दिया था। इस रिपोर्ट में वर्ष 2004 से 2012 के बीच उनकी अवैध कमाई का विवरण है। इस रिपोर्ट को तैयार करवाने में कांग्रेस के कुछ नेताओं का भी हाथ था। पी एमओ के सूत्र बताते हैं कि इस रिपोर्ट का इस्तेमाल विधानसभा और लोकसभा चुनाव में प्रदेश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए उदाहरण के तौर पर होना था। लेकिन कांग्रेस के रणनीतिकारों ने यह कह कर इस रिपोर्ट को सार्वजनिक करने से मना कर दिया की इससे नौकरशाही खुलकर कांग्रेस के खिलाफ हो जाएगी और इसके परिणाम पार्टी के लिए गंभीर हो सकते हैं। अब वहीं रिपोर्ट केंद्र की भाजपा सरकार के हाथ लग गई है और वह इसको व्यवस्था सुधार के लिए सबक के तौर पर इस्तेमाल कर रही है।
अब चल संपत्ति का भी देना होगा ब्यौरा
मप्र के नौकरशाहों की कमाई की रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद केंद्र सरकार ने सभी अधिकारियों को अब अपनी चल-संपत्ति का ब्यौरा देने का फरमान जारी कर दिया है। केंद्र सरकार ने इस संबंध में मुख्य सचिव को पत्र लिखकर समय सीमा तय कर दी है। पत्र के मुताबिक अधिकारियों को एक अगस्त से 15 सितंबर के बीच ये ब्यौरा ऑनलाइन देना होगा। इसे प्रशासन में पारदर्शिता लाने की कवायद में अहम पहल माना जा रहा है। अखिल भारतीय सेवा और राज्य सेवा के अधिकारी अभी तक प्रॉपर्टी रिटर्न में अपनी अचल संपत्तियों की जानकारी ही सरकार को देते रहे हैं। माना जा रहा है कि इससे अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ेंगी। सरकार के नए निर्देश के अनुसार अब अधिकारियों को नकद राशि, बैंक जमा, शेयर और अन्य निवेश की जानकारी के साथ वाहनों की संख्या और उनकी मौजूदा कीमत भी बतानी होगी। अधिकारियों को सोना, चांदी और हीरे के गहनों की अलग-अलग जानकारी देनी होगी। देनदारियों की जानकारी भी देनी होगी। इसके अलावा पत्नी, बच्चों और अन्य आश्रितों के नाम की संपत्तियों का ब्यौरा भी देना होगा। पुराने कानून में अधिकारियों को अचल संपत्ति का ब्यौरा देना होता था। इसमें भवन और भूखंडों का ब्यौरा और उनकी अनुमानित कीमत शामिल होती थी। वैसे अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को अचल संपत्ति अर्जित लेने से पहले सरकार से अनुमति भी लेनी होती है। इस तरह का ब्यौरा देना अपेक्षाकृत आसान था।
मप्र के 28 अफसरों ने नहीं दी संपत्ति की जानकारी
प्रदेश के 309 आईएएस अफसरों में से अभी तक 281 ने अपनी संपत्ति की 2013-14 की जानकारी पुराने फॉर्मेट में भेज दी है,जबकि 28 ने अभी तक ब्यौरा नहीं भेजा है। अब इन सभी अधिकारियों को पत्र जारी कर अचल के साथ ही चल संपत्तियों का ब्यौरा देने को कहा गया है। यह जानकारी कार्मिक और प्रशिक्षण आंकड़ा विभाग ने दी है। अचलसंपत्ति का रिटर्न नहीं भरने वालों में सबसे अधिक 58 उत्तर प्रदेश कैडर के हैं। आंध्र प्रदेश के 26, उडीसा और पश्चिम बंगाल के 13-13 नौकरशाहों ने अपनी रिटर्न नहीं दी है। विभाग के अनुसार जम्मू कश्मीर से दस, मणिपुर, त्रिपुरा और अरूणाचल प्रदेश, गोवा, मिजोरम केन्द्र शासित कैडर से सात-सात आईएएस इस श्रेणी में हैं। सिकिकम से पा ंच, हरियाणा, झारखंड, मेघालय, असम, राजस्थान और नगालैंड प्रत्येक से चार-चार, गुजरात, बिहार, तमिलनाडु और उत्तराखंड से निर्धारित समय सीमा के भीतर तीन-तीन अधिकारियों ने ब्यौरा जमा नहीं कराया है। हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और केरल कै डर के दो-दो अधिकारियों ने यह रिटर्न नहीं दी है। देश में भारतीय प्रशासनिक सेवा के कुल अधिकृत संख्या 6270 हैं जबकि 4619 अधिकारी ही काम कर रहे हैं। इससे पहले के तीन वर्षो के दौरान भी 239 अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट जमा नहीं क राई। इनमें से 152 ने 2012 और 49 ने 2011 की रिपोर्ट नहीं दी है। वर्ष 2010 की अचल संपत्ति रिपोर्ट अभी तक 38 आईएएस नहीं दे पाए हैं।
मप्र इन अधिकारियों ने नहीं दी संपत्ति की जानकारी
1. एसपीएस परिहार (1986)
2. एम मोहन राव (1987)
3. अनुराग जैन (1989)
4. टी. धर्माराव (1989)
5. मुकेश चंद गुप्ता (1998)
6. कामता प्रसाद राही (1998)
7. शशि कर्नावत (1999)
8. संतोष कुमार मिश्रा (1999)
9. श्यामसिंह कुर्मी (2000)
10. चतुर्भुज सिंह (2001)
11. अशोक कुमार भार्गव (2002)
12. सुरेन्द्र के उपाध्याय (2002)
13. एम. सेलवेन्द्रन (2002)
14. निसार अहमद (2003)
15. राजीव शर्मा (2004)
16. रघुराज एम आर (2004)
17. लोकेश कुमार जाटव (2004)
18. अजय सिंह गंगवार (2005)
19. अशोक कुमार वर्मा (2005)
20. शशांक मिश्रा (2007)
21. नागरगोजे मदन विभिषण (2007)
22. शिल्पा गुप्ता (2008)
23. सुफिया फारूकी (2009)
24. अजय गुप्ता (2009)
25. अविनाश लावनिया (2009)
26. कमवीर शर्मा (2010)
27. आशीष सिंह (2010)
28. बी. विजय दत्ता (2011)
दबंग और तिकड़बाज भी हैं मप्र के नौकरशाह
पीएमओं पहुंची रिपोर्ट के अनुसार,मप्र के नौकरशाहों को दबंग, तिक ड़बाज और अय्याश भी बताया गया हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने में मप्र के अफसर सबसे अधिक परेशान करते हैं। मध्यप्रदेश में संपत्ति का ब्यौरा देने में आनाकानी करने वाले आईएएस अफसरों से सरकार तंग आ चुकी है। इतना ही नहीं, जिन अफसरों के ब्यौरे आए भी हैं उनमें लगभग सवा सौ अफसरों का ब्यौरा तय फॉर्मेट में नहीं है या उसमें कुछ गलतियां हैं। सरकार इनकी जांच कर रही है। बताया जा रहा है कि ऐसी स्थिति में सरकार द्वारा संपत्ति का ब्यौरा नहीं देने वाले अफसरों का विजिलेंस क्लीयरेंस या पदोन्नति रोके जाने जैसी कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन फिर भी अफसर ब्यौरा देने में लापरवाही बरत रहे हैं। कई अफसरों ने खुद की संपत्ति को 'निलÓ बताया है। इनमें लगभग एक दर्जन बड़े अफसर शामिल हैं। इनके ब्यौरे में मकान का जिक्र भी नहीं किया गया है। इसके पहले भी कई वरिष्ठ अफसर अपनी संपत्ति का ब्यौरा 'निलÓ बताते रहे हैं। अधिकारियों की कारस्तानी को देखते हुए केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग द्वारा हर अफसर के संपत्ति ब्यौरे का मिलान उनके पिछले साल के ब्यौरे से किया जा रहा है। मालूम हो कि अफसरों को हर साल जनवरी में संपत्ति ब्यौरा देना होता है। ब्यौरा नहीं देने पर कारर्वाइयों का प्रावधान है और केंद्र भी इस दिशा में कड़े निर्देश जारी कर चुका है। लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में सरकारें कु छ कर नहीं पातीं।
सरकार की नजर संपत्ति का ब्यौरा न देने वालों पर
मोदी सरकार ने उन नौकरशाहों पर अपनी नजर तिरछी कर दी है जिन्होंने अपनी चल और अचल संपत्तियों का ब्यौरा सरकार के पास जमा नहीं कराया है। डीओपीटी ने अधिकारियों की एक सूची तैयार कर उन्हें जल्द से जल्द अपनी अचल सम्पति का ब्यौरा जमा करने का निर्देश जारी किया है। डीओपीटी के 20 जून को भेजे गए इस पत्र के साथ अधिकारियों के नामों की सूची भी है। साल 2013 के लिए अब तक अचल संपत्ति का ब्यौरा न भरने वाले इन अधिकारियों को हिदायत दी गई है। उनसे कहा गया है कि अगर उन्होंने जल्द से जल्द ऑनलाइन आईपीआर नहीं भरा, तो किसी भी संवेदनशील पद पर उनकी नियुक्ति, इम्पैनलमेंट, प्रमोशन और डेपुटेशन जैसे मामलों में उनकी विजलेंस जांच रोक दी जाएगी। इससे पहले इन अधिकारयों को इस मामले में अब तक पांच बार रिमाइंडर भेजे जा चुके हैं। पीएमओ के एक और अहम निर्देश पर डीओपीटी अब सभी मंत्रालयों में ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति करेगा, जिनको सम्बधित मंत्रालय के बारे में पहले से कुछ जानकारी हो। जानकार मानते हैं कि इस आदेश का आशय यह है कि सिर्फ जान-पहचान और जुगाड़ से आईएएस और आईपीएस मलाईदार पद नहीं पा सकेंगे। उधर,एसीसी यानी अपॉइंटमेंट कमेटी ऑफ कैबिनेट ने संपत्ति का ब्यौरा न देने वाले आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को महत्वपूर्ण पद न देने की तैयारी की है। इसके लिए प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भी जल्द निर्देश भेज दिए जाएंगे।
अफसरों को नहीं पता अपनी हैसियत
केन्द्र और राज्य सेवा के ज्यादातर अफसरों को यह पता नहीं है कि उनकी संपत्ति की मौजूदा बाजार कीमत क्या है? ऊपर से सरकार ने अब उनसे निर्माण लागत की भी जानकारी मांगी है। इससे वे कशमकश में हैं कि क्या करें। इन अफसरों ने पिछले साल जो रिटर्न भरी है, उसमें कुछ ने वर्तमान मूल्य का कॉलम खाली छोड़ दिया तो कुछ ने पता नहीं, लिखा। काफी अफसर ऐसे भी हैं जिन्होंने वर्तमान मूल्य में खरीद मूल्य ही लिखा है। सूत्रों के अनुसार केन्द्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग भी संपत्ति का वर्तमान मूल्य पता करने का मैकेनिज्म खोजने में लगा है। प्रॉपर्टी रिटर्न के लिए केन्द्रीय कार्मिक विभाग ने निर्धारित प्रपत्र में मामूली संशोधन भी किया है। इसमें कहा गया है कि यदि किसी अधिकारी के लिए संपत्ति का वास्तविक मूल्य बताना संभव नहीं हो तो वे अनुमानित कीमत तो लिख ही सकते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि ऑल इंडिया सर्विसेज (कंडक्ट) रूल्स 1968 के नियम 16(2) के तहत प्रत्येक अधिकारी के लिए वार्षिक विवरणी में अचल संपत्ति के बारे में पूरी जानकारी देना अनिवार्य है। भले संपत्ति स्वयं के नाम या परिवार के सदस्य के नाम हो। यह भी बताना होगा कि वह संपत्ति पैतृक, खरीदी, लीज, या रहन रखी हुई है। यह विवरण हर साल देना होगा, संपत्ति की स्थिति में चाहे बदलाव हुआ हो या नहीं। देश के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एमएल मेहता का मानना है कि अधिकारियों से उनकी संपत्ति का वर्तमान पूछना ही गलत है। वर्तमान मूल्य लिखने से ईमानदार अफसर भी बेईमान नजर आएगा, जबकि सर्वविदित है कि संपत्ति का मूल्य आसपास होने वाले विकास के आधार पर बढ़ता रहता है।
खेती और किराए से भी कमाई
प्रदेश के नौकरशाहों के लिए वेतन के अलावा खेती और मकान किराए इत्यादि इनकी अतिरिक्त कमाई का जरिया है। नौकरशाहों की सम्पत्ति का ब्यौरा देखकर तो यही पता चलता है। सम्पत्ति का ब्यौरा देखकर स्पष्ट होता है कि प्रदेश के नौकरशाह कृषक भी हैं। कई तो करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं। मलाईदार पद पर काबिज रहे अफसर करोड़पति बन चुके हैं, लेकिन इन्होंने सम्पत्ति का खुलासा क रने में बेहद सावधानी बरती है। सभी आईएएस अफसर निवेश के मामले में काफी समझदार हैं और इन्होंने धन को मकान और प्लॉट में निवेश किया है। हालांकि कुछ अफसरों ने अपनी संपत्ति के वतर्मान मूल्य का उल्लेख करने से परहेज किया है।
71 आईएफएस ने छिपाई अपनी संपत्ति
प्रदेश के आईएएस ही नहीं बल्कि 71 आईएफएस अफसरों ने अपनी संपत्ति का खुलासा नहीं किया है। सरकार के निर्देश हैं कि हर कर्मचारी और अधिकारी को अपनी संपत्ति का ब्यौरा प्रत्येक साल उपलब्ध कराना होगा तथा ब्यौरे को विभागीय वेबसाइट पर भी अपलोड किया जाएगा। लेकिन वन महकमे के हरेक अफसर ने ऐसा नहीं किया है। इनमें दो ऐसी महिला अधिकारी हैं जिन्होंने 2012 बैच की होते हुए भी अपनी संपत्ति बताई है। पीसीसीएफ वर्ग के लगभग सभी अधिकारियों ने वर्ष 2014 के लिए अपनी संपत्ति का ब्यौरा दिया है लेकिन जिन एपीसीसीएफ स्तर के अफसरों ने संपत्ति नहीं बताई है उनमें रविन्द्र कुमार सक्सेना, सुरेन्द्र पाल सिंह, अमर सिंह अहलावत, सुहाष कुमार, जीए किन्हाल, रतन पुरवार, एके सपरा, शेषमणि पाण्डेय, एके जैन, एसके पनवार, एके भट्टाचार्य, मंगेश कुमार त्यागी, आरके गुप्ता, टीसी लेहानी, वाई सत्यम और प्रकाशम हैं। मुख्य वन संरक्षक - सीसीएफ स् तर के 17 अधिकारियों में अशोक भाटिया, देवेश कोहली, सुरेन्द्र कुमार सिंह, वीपीएस परिहार, प्रशांत कुमार, अखिलेश अर्गल, राकेश कुमार गुप्ता, अनुराग श्रीवास्तव, सुरेन्द्र सिंह राजपूत, चन्द्रकांत पाटिल, एसडी पटैरिया, एसएस गौर, रमेश कुमार श्रीवास्तव, कमलेश चतुव्रेदी, विजय एम अंबाडे, सागर शर्मा, और शमशेर सिंह प्रापर्टी नहीं बताने की सूची में हैं।
एक दर्जन वन संरक्षक - स्मिता राजारा, विश्वनाथ एस होतगी, बिन्दु शर्मा, बीएस अनिगेरी, एके नागर, सनत कुमार शर्मा, श्रीमती कमलिका मोहन्ता, अजय कुमार यादव, अशोक कुमार जोशी और डीके अग्रवाल, केपी शर्मा, अजयपाल सिंह, पीएस मेश्रम, पीएस चंपावत, विकास कुमार वर्मा, बीबी शर्मा, बीएस बघेल, नाहर सिंह, बिनसेंट रहीम, आरएस कोरी, जेआर वास्कले, एसके सिंह सिंगरौली, एके सिंह बुरहानपुर, अमित कुमार दुबे, देवा प्रसाद जे, एके वंसल, अनुपम सहाय पन्ना हैं। प्रोवेशनल अधिकारियों में रिपुदमन सिंह भदौरिया, रविन्द्र मनि त्रिपाठी, बासु कन्नोजिया और गौरव चौधरी महू हैं। ट्रेनिंग ले रहे 2010 बैच के आईएफएस अफसरों में अनुराग कुमार, देवांशु शेखर, संजय कुमार, विजय सिंह और संध्या भी शामिल हैं।
7 माह में 265 करोड़ की अवैध कमाई का खुलासा
प्रदेश में एक तरफ अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने में कतरा रहे हैं, वहीं इस साल जुलाई तक प्रदेश के भ्रष्ट अफसरों की 265 करोड़ की अवैध कमाई लोकायुक्त के छापे में सामने आई है। लोकायुक्त के छापे में अफसरों के घर, बैंक और तिजोरियों ने करोडों की संपत्ति उगली हैं। छापों में करोड़ों के सोने-चांदी के जेवरात, लाखों रुपए की नकदी और अकूत मात्रा में अचल संपत्ति मिली है। यही नहीं अदने से सरकारी कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों के घर-परिवार में ऐसे ऐशोआराम-भोगविलासिता के सामान मिले हैं जो शायद अरबपति घरानों के यहां मिलते हैं। इंदौर संभाग के अलग-अलग सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए लोकायुक्त पुलिस ने पिछले 7 महीने में 46 कारिंदों को रिश्वत लेते रंगे हाथों धर दबोचा। एसपी (लोकायुक्त) वीरेन्द्र सिंह ने बताया, हमने जनवरी से जुलाई के बीच मिली शिकायतों के आधार पर 15 पटवारियों और 9 पुलिसकर्मियों समेत 46 सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत लेेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया। उन्होंने बताया कि पिछले 7 महीने में लोकायुक्त पुलिस की इंदौर शाखा ने पांच सरकारी कर्मचारियों के ठिकानों पर छापे मारे और उनकी कुल 16 करोड़ रुपए की बेहिसाब संपत्ति का खुलासा किया। सिंह ने बताया कि लोकायुक्त पुलिस की इंदौर शाखा ने जनवरी से जुलाई के बीच भ्रष्टाचार के कुल 68 मामले दर्ज किए। इनमें सरकारी कर्मचारियों के आय के ज्ञात स्त्रोतों से ज्यादा संपत्ति रखने के पांच मामले शामिल हैं।
क्या था 2012 के पर्चे में
वर्ष 2012 में मध्य प्रदेश सहित देशभर के प्रशासनिक हलकों में महिनों तक तहलका मचाने वाले आठ पेज का वह पर्चा एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है। क्योंकि इस पर्चे के आधार पर ही प्रदेश के आईएएस अधिकारियों की चल और अचल संपत्ति का आकलन किया गया है। उल्लेखनीय है कि उक्त पर्चे में प्रदेश के 195 आईएएस अफसरों के नाम शामिल थे। इन अफसरों को अलग-अलग पांच श्रेणियों में रखा गया था। पहली श्रेणी ईमानदार अफसरों की, दूसरी श्रेणी भ्रष्ट अफसरों की, तीसरी श्रेणी महाभ्रष्ट अफसरों की, चौथी श्रेणी अय्याश अफसरों की तथा पांचवीं श्रेणी अत्यंत धनी अफसरों की थी। ईमानदार अफसरों की श्रेणी में एक दर्जन अफसर भी जगह नहीं बना पाए थे। जबकि आधा दर्जन से अधिक महिला आईएएस अफसरों को मर्दों की शौकीन करार दिया गया था। बहुत सारे अफसर ऐसे भी है जिन्हें आखिरी की तीन श्रेणियों में जगह दी गई थी।
इन्हें बताया ईमानदार
पर्चे में बताए इमानदार अफसरों में प्रदेश के तात्कालीन मुख्य सचिव आर परशुराम को शामिल किया गया था। इनके अलावा स्नेहलता कुमार, डीके सामंतरे, अजय नाथ, जेएस माथुर, स्नेहलता श्रीवास्तव, सुरंजना रे, वीपी सिंह, विजया श्रीवास्तव, आलोक श्रीवास्तव, एपी श्रीवास्तव, दीपक खांडेकर, एसपीएस परिहार, मनोज झालानी, मनोज गोविल, दीप्ति मुखर्जी, मनोहर अगनानी, रश्मि शमी, मनीष रस्तोगी, एसएस बंसल, कवीन्द्र कियावत और सुनीता त्रिपाठी को रखा गया था। इन अफसरों को पूरी तरह ईमानदार बताया गया था। इनके अलावा कुछ और अफसरों को भी ईमानदार तो करार दिया गया था लेकिन उन्हें साथ में अय्याश भी बताया गया था। इन अफसरों पर साधा निशाना
1978 बैच के एक अफसर को जहां महाभष्ट्र और अय्याश बताया गया था वहीं 1979 बैच के एक अफसर को महाभ्रष्ट, अय्याश और धनकुबेर और एक अन्य को सिर्फ भ्रष्ट करार दिया गया था। इसी तरह 1980 बैच के दो अफसरों को भ्रष्ट तो एक अफसर को महाभ्रष्ट, अय्याश और धनकुबेर बताया गया है। वहीं 1981 बैच के एक अफसर को महाभ्रष्ट और धनकुबेर तो एक अफसर को आखिरी की तीनों श्रेणियों में जगह दी गई थी। इसी बैच की दो महिला अफसरों को मर्दों का शौकीन भी बताया गया था। 1982 बैच के एक दर्जन अफसरों के नाम पर्चे में दर्ज थे। इनमें चार अपसरों को ईमानदार की श्रेणी में रखा गया था और बाकी को अन्य श्रेणियों में जगह दी गई थी। 1983 बैच के एक अफसर को नाम पर्चे में शामिल किया गया था, उन्हें महाभ्रष्ट की श्रेणी में रखा गया था। 1984 बैच के नौ अफसर के नाम पर्चे में शामिल थे। इनमें तीन अफसरों को पूरी तरह ईमानदार और बाकी के छह अफसरों को अलग-अलग श्रेणियों में रखा गया था। इसी तरह, 1985 बैच के दस अफसरों के नाम पर्चे में दर्ज थे। जिनमें से मात्र एक अफसर को पूर्णत: ईमानदार करार दिया गया था। वहीं एक अफसर को ईमानदार तो बताया गया था लेकिन उन्हें अय्याश भी बताया गया था। बाकी के अफसरों को भ्रष्ट, महाभ्रष्ट और धनकुबेर क रार दिया गया था। 1986 बैच के आधा दर्जन अफसरों में से एक अफसर को ईमानदारी का तमगा दिया गया था। बाकी के पांच अफसरों को अलग-अलग श्रेणिया दी गई थी। 1987 बैच के नौ अफसरों को पर्चे में जगह दी गई थी। इस बैच के एक अफसर को ईमानदार और एक अफसर को महाभ्रष्ट, पांच अफसरों को भ्रष्ट बाकी के तीन अफसरों को तीनों श्रेणियों में रखा गया था। 1988 बैच के चार अफसर, 1989 बैच के सात अफसरों, 1990 बैच के नौ अफसरों के नाम भी पर्चे में शामिल थे। वहीं 1991 बैच के दस अफसरों के नाम पर्चे में शामिल थे। इनमें से सिर्फ एक अफसर को ईमानदार अफसर का तमगा दिया गया था। 1992 बैच के 11 अफसर, 1993 बैच के आठ अफसर 1994 बैच के एक दर्जन अफसर, 1995 बैच के एक आधा दर्जन अफसर, 1996 बैच के नौ अफसर, 1997 बैच के आठ अफसर, 1998 बैच के दस अफसर, 1999 बैच के नौ अफसर, 2000 बैच के सोलह अफसर, 2001 बैच के छह अफसर, 2002 और 2003 बैच के एक-एक अफसर और 2004 बैच के छह अफसरों के नाम पर्चे में शामिल कर उन्हें भ्रष्ट, महाभ्रष्ट अय्याश और धनकुबेर की श्रेणी में रखा गया था। प्रदेश की नौ महिला आईएएस अफसरों पर इस पर्चे के माध्यम से गंभीर आरोप लगाए गए थे। उन्हें भ्रष्ट और महाभ्रष्ट की श्रेणी में तो रखा गया ही था, साथ ही उन्हें मर्दों का शौकीन भी बताया गया था। इन महिला अफसरों के बारे में कहा गया था कि इन महिला अफसरों के अपने आला-अफसरों के साथ अंतरंग संबंध हैं। इन महिला अफसरों में से कुछ को ईमानदार तो बताया गया था लेकिन साथ ही उन्हें मर्दखोर भी करार दिया गया था। तीन महिला अफसरों को महाभ्रष्ट और मर्दों का शौकीन, दो महिला अफसरों को भ्रष्ट और मर्दों की शौकीन बताया गया था।
नौकरशाहों के काम करने के लिए तय हुई गाइड लाइन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के विकास के लिए जनता से मिले 60 महीनों का अधिक से अधिक प्रभावी तरीके से इस्तेमाल करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने नौकरशाहों को अपनी कार्यशैली में ढालना चाहते हैं। मोदी ने अपने वर्किग स्टाइल में ढालने के लिए नौकरशाहों के लिए 11 सूत्रीय निर्देश दिए हैं। कैबिनेट सचिव अजीत सेठ ने वर्किग कल्चर और कार्यालय के वातावरण को और बेहतर करने के लिए वे 11 सूत्र वाले निर्देश सभी केंद्रीय सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिवों को भेजा है। पीएम मोदी के 11 निर्देश 1- सबसे पहला निर्देश है सभी कार्यालयों की सफाई। कार्यालयों के गलियारों-सीढियों की साफ-सफाई। इन जगहों पर कार्यालय संबंधी सामाग्री या आलमारी नहीं दिखनी चाहिए। 2- कार्यालयों के अंदर फाइलों और कागजो को व्यवस्थित करके रखा जाए, जिससे काम करने का सकारात्मक माहौल बने। 3- कार्यालयों के साज-सज्जा और उसकी सफाई के संदर्भ में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट 6 जून से हर रोज कैबिनेट सचिव के पास पहुंचनी चाहिए। 4- सभी विभागों से कहा गया है कि वे उन 10 नियमों को बताएं या खत्म करें, जो अनावश्यक हैं, जिनका कोई मतलब नहीं है और उनको हटाने से कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पडेगा। 5- सभी विभागों के सचिवों को फॉर्म को छोटा करने का निर्देश दिया गया है। हो सके तो संबंधित विभागों के फॉर्म एक पेज का किया जाए। 6- किसी भी काम पर निर्णय लेने की प्रक्रिया चार चरण से अधिक नहीं होनी चाहिए। 7- काम को लटकाने की प्रवृत्ति खत्म की जाए। किसी भी फाइल या पेपर को तीन से चार सप्ताह के अंदर क्लियर किया जाए। 8- नौकरशाह पावर प्वाईंट प्रजेंटेशन बनाएं, संक्षिप्त व प्रभावी नोट तैयार करें। फाइलों को भारी भरकम बनाने से बचें। 9- सभी सचिवों से 2009-14 के लिए तय किए गए लक्ष्य और उसकी वर्तमान स्थिति के बारे में विश्लेषण करने को कहा गया है। इसकी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को दी जाएगी। 10- सभी विभागों को एक टीम की तरह काम करने को कहा गया है। सभी स्तर पर नए विचारों का स्वागत किया जाए। 11- सचिवों से सहयोगपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रिया की आवश्यकता बताई गई है। जैसे अगर कोई विभाग किसी मसले को सुलझा नहीं पाता है तो वे कैबिनेट सचिव या प्रधानमंत्री कार्यालय से संपर्क करें।
निष्पक्षता के लिए नियमावली में संशोधन
नौकरशाह राजनीतिक रूप से निष्पक्ष रहें, किसी के साथ भेदभाव न करें और सिर्फ जनहित में रखकर फैसले लें, यह सुनिश्चित करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा कदम उठाया है। आइएएस, आइपीएस और भारतीय वन सेवा के अधिकारियों पर लागू वर्ष 1968 में बनी अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियमावली संशोधित हो गई है। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि वे कर्तव्य पालन के दौरान उच्च आचार नीति और राजनीतिक निष्पक्षता बनाए रखें। नई नियमावली में कहा गया है कि अधिकारियों को जनता के प्रति खासकर कमजोर वर्ग के प्रति जवाबदेह होने की जरूरत है। अधिकारी जनता के साथ नम्र और अच्छा व्यवहार सुनिश्चित करें व केवल जनता के हित और इस्तेमाल को देखते हुए फैसले लें। नियमावली में कहा गया है कि इस सेवा के प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्य पालन के दौरान उच्च आचारनीति, ईमानदारी, राजनीतिक निष्पक्षता, सचाई, जवाबदेही और पारदर्शिता का पालन करेंगे और उत्कृष्टता को बढ़ावा देंगे। व्यक्ति या संस्थान से न लें कोई आर्थिक सहयोग कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने जिस अखिल भारतीय सेवा (आचरण) संशोधन नियमावली, 2014 की अधिसूचना जारी की है उसमें अधिकारियों के लिए यह अनिवार्य बना दिया गया है कि उनके कर्तव्य निर्वहन से उनका कोई निजी हित जुड़ा हो तो उसे घोषित करें और जनहित की रक्षा के मार्ग में आने वाले विवादों के समाधान के लिए कदम उठाएं। यह भी कहा गया है कि अधिकारियों को ऐसे किसी व्यक्ति या संस्थान से कोई आर्थिक या अन्य एहसान नहीं लेना चाहिए जो उन्हें उनके काम को प्रभावित कर सकते हैं। यह भी कहा गया है कि लोक सेवक के रूप में कोई सदस्य अपने पद का दुरुपयोग नहीं करेगा और अपने, अपने परिवार या दोस्त को पैसे या सामान आदि से लाभ पहुंचे ऐसे फैसले नहीं लेगा। इस नियमावली में आईएएस, आईपीएस और आईएफएस के अधिकारियों की यह अनिवार्य जिम्मेदारी हो गई है कि वे अपने क र्तव्य पालन के दौरान गोपनीयता को बनाए रखें।