मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

सरकारी संरक्षण में खनन माफिया




ईमानदार होने की कीमत जब-तब देश और समाज को चुकानी ही पड़ती है। एक बार फिर एक आइपीएस अधिकारी को अपनी जान देकर ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ी है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में पुलिस अनुमंडल अधिकारी यानी एसडीपीओ के पद पर तैनात 2009 बैच के आइपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार सिंह को बामौर में अवैध खनन से जुड़े माफियाओं ने मार डाला। बताया जा रहा है कि उन्होंने बामौर में जाकर अवैध खनन को रोकने की हिम्मत दिखाई तो ट्रैक्टर चालक गाड़ी लेकर भागने लगा। जब उन्होंने ट्रैक्टर चालक को बीच रास्ते में रोकने की कोशिश की तो उसने नरेंद्र कुमार पर ट्रैक्टर चढ़ा दिया। अस्पताल में नरेंद्र की मौत हो गई। यह हृदयविदारक घटना इस बात की तस्दीक करती है कि देश में अवैध खनन से जुड़े माफिया की ताकत चरम पर है और सरकारें उनके आगे लाचार और पंगु हैं। यह घटना चाक-चौबंद कानून-व्यवस्था की मुनादी पीटने वाली मध्य प्रदेश सरकार के माथे पर कलंक है। अभी तक मध्य प्रदेश में काली कमाई करने वालों का ही भंडाफोड़ हो रहा था, लेकिन आइपीएस अधिकारी की हत्या ने राज्य की डांवाडोल होती कानून-व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है।

मध्यप्रदेश में पुलिस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या के संदर्भ में राजनेताओं और खनन माफियाओं को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह राजनेताओं के माफिया के रूप में बदलने और अपराधियों से उनके गठजोड़ को उजागर करता है. राज्य में धन कमाने के व्यापक अवसर वाले कई व्यापार-व्यवसाय होते हैं, जिनमें खनन, शराब के ठेके, और परिवहन आदि प्रमुख है. जब इन व्यवसायों में सत्ता से जुड़े राजनेता या उनके परिजन शामिल हो जाते हैं तो इन व्यवसायों से अवैध रूप से कमाई की तरीके रोक पाना प्रशासन के लिए कठिन होता है. ऐसे में नरेन्द्र कुमार जैसे अधिकारियों को अपना कर्तव्य निभाने के लिए अपनी जान गंवानी पड़ती है.
मध्यप्रदेश के मुरैना में अनुविभागीय पुलिस अधिकारी के पद पर पदस्थ आईपीएस अधिकारी नरेन्द्र कुमार को यहां पदस्थ हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था और निश्चित रूप से उनमें ईमानदारी से कर्तव्य निर्वहन का जज्बा था, जो किसी भी समाज के विकास और सुरक्षा के लिए अत्यन्तक जरूरी है. यह स्पष्ट, है कि उनकी हत्या के पीछे उन लोगों का हाथ है, जिनके हित उनके कर्तव्य निर्वहन से प्रभावित हो रहे थे.
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश में अवैध खनन के कई मामले लगातार सामने आते रहे हैं और इससे न सिर्फ सरकार को करोड़ों का नुकसान हो रहा है, बल्कि पर्यावरण का संकट भी खड़ा हो गया है.
मध्यप्रदेश में टीकमगढ़, छतरपुर, दतिया, ग्वालियर और शिवपुरी तक फैला बुन्देलखण्ड पठार खनन माफियाओं के कारण ही खत्म होने के कगार पर है. इस पठार से निकलने वाले ग्रेनाईट का सरकारी तौर पर तो प्रतिवर्ष मात्र 65 करोड़ रूपयों का व्यवसाय हो रहा है, किन्तु वास्तव में ढाई सौ करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का व्यवसाय अवैध रूप से किए जाने की बात सामने आती है. इसके बावजूद सरकार उसे नहीं रोक पा रही है.
पूरे प्रदेश में इस तरह चल रहे अवैध खनन से राज्य को रहे नुकसान के बारे में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट से पता चलता है, जिसके अनुसार मध्यप्रदेश में अवैध खनन के कारण पिछले पांच सालों में राज्य को 1500 करोड़ रूपए का नुकसान हुआ है. यही नहीं, मध्यप्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत की गई विभिन्न रिपोर्टों से भी प्रदेश में अवैध खनन की बात उजागर होती है.
विधानसभा में प्रस्तुत सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 2005 से 2010 के बीच राज्य में 6906 अवैध खनन के मामले सामने आए, जिनसे राज्य को 1496 करोड़ रूपयों का नुकसान हुआ. हालांकि खनन मंत्रालय के आकड़ों के अनुसार प्रदेश में 2009-10 में 9701 करोड़ रूपयों के खनिज एवं 440 करोड़ रूपए के उप खनिज का उत्पादन किया गया. किन्तु अवैध रूप से उत्पादित खनिज इससे भी कई गुना ज्यादा है, जिसका लाभ सीधे तौर पर खनन माफिया उठा रहे हैं.
मध्यप्रदेश के कटनी जिले में संगमरमर के खनन पर भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाए जाने के बावजूद यहां उत्खनन जारी है और करोड़ों रूपए का अवैध कारोबार संचालित किया जा रहा है.
इसी तरह प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में नर्मदा नदी के घाटों पर रेत के अवैध खनन का सिलसिला भी जारी है. प्रदेश के इसी क्षेत्र के अलीराजपुर जिले में सोप स्टोन, रेत, केलसाईट तथा डोलोमाईट स्टोन की 150 खदानों में से 116 खदानों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा खनन पर रोक लगाई गई है. इसके बावजूद यहां चोरी-छुपे खनन की घटनाएं होती रही हैं.
इस प्रकार मध्यप्रदेश में अवैध खनन की बात न सिर्फ सामाजिक कार्यकर्ता या मीडिया से जुड़े लोग ही कहते आए हैं, बल्कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक और सीएजी की रिपोर्ट में भी इसे स्वीकार किया गया है. पुलिस अधिकारी नरेन्द्र कुमार की हत्या के बाद अब यह बात और भी पुख्ता हो गई है.
विभिन्न रिपोर्टों के जरिये सरकार के सामने अवैध खनन की बात रखे जाने के बावजूद अब तक सरकार द्वारा इस दिशा में कोई ठोस कदम न उठाने से कई सवाल खडे होते हैं. इससे यह संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक है कि अवैध खनन के मामले में कहीं राजनीति और सरकार से जुड़े लोग तो शामिल नहीं हैं?
यह देखा गया है कि खनन, शराब, और परिवहन जैसे व्यवसायों के ठेके सरकार की ओर से जिन लोगो को मिलते हैं, वे अपने वैध धंधों के पीछे उसका अवैध रूप से भी फायदा उठाते हैं और यह प्रवृति बढती जा रही है. मध्यप्रदेश के अवैध खनन के मामलों की पड़ताल में इस बात को भी जांच का प्रमुख बिन्दु बनाया जाना चाहिए कि पिछले करीब एक दशक में जिन लोगों, फर्मो या कंपनियों को खनन के पटटे या ठेके दिए गए, उनमें ऐसे कितने लोग, फर्म या कंपनियां हैं, जो किसी न किसी रूप में राजनेताओं के रिश्तेदार या सत्ताधारी दल के शीर्ष लोगों के संबंधी हैं? यही जांच इस बात का राज खोलेगी कि आखिर एक पुलिस अधिकारी की हत्या और राज्य में चल रहे खनन माफिया के पीछे किन लोगों का संरक्षण हासिल है.
आइपीएस की हत्या के दो दिन बाद पन्ना जिले में पूर्व डकैत कुबेर सिंह ने अजयगढ़ के एसडीएम नाथूराम गौड़ और अनुविभागीय पुलिस अधिकारी (एसडीओपी) जगन्नाथ सिंह पर उस समय हमला कर दिया, जब वे रेत के अवैध खनन को रोकने की कोशिश कर रहे थे. पिछले वर्ष सतना जिले के उचेहरा और नागौद वन क्षेत्र में अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई करने वाले वनकर्मियों पर जो हमला हुआ उसमें लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह के भतीजे रूपेंद्र सिंह उर्फ बाबा राजा का नाम भी सामने आया.
नागेंद्र सिंह के अलावा मुरैना से भाजपा सांसद नरेंद्र सिंह तोमर का नाम भी अवैध खनन को संरक्षण देने में उछला है. अवैध खनन के खिलाफ पुलिस की हाल ही की कार्रवाई में उनके करीबी भाजपा नेता हमीर सिंह पटेल भी पकड़े गए. पटेल ने जनवरी में खनिज निरीक्षक राजकुमार बरेठा पर उस समय हमला कर दिया था, जब वे पत्थरों से भरी ट्राली जब्त करने की कार्रवाई कर रहे थे. तोमर ने भी माना है कि इलाके में बड़े पैमाने पर रेत और पत्थर की अवैध खुदार्ई हो रही है और इस पर कार्रवार्ई जरूरी है. मुरैना में पांच साल पहले तत्कालीन कलेक्टर आकाश त्रिपाठी और एसपी हरिसिंह यादव पर भी फायरिंग हुई थी. प्रदेश के जबलपुर से ही सियासत की शुरुआत करने वाले एनडीए संयोजक और जदयू अध्यक्ष शरद यादव तो साफ-साफ आरोप लगाते हैं कि मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस दोनों के संरक्षण में अवैध खनन चल रहा है.
ग्वालियर-चंबल अंचल में एक अनुमान के मुताबिक सालाना 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा के सैंडस्टोन और रेत का अवैध खनन हो रहा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक यहां की खदानों से हर साल 3.5 लाख घन मीटर पत्थर निकलता है, लेकिन अवैध खनन के चलते इससे ढाई गुना पत्थर (करीब 8 से 9 लाख घन मीटर) निकाला गया है. सरकार को इस पत्थर से मुश्किल से 12 करोड़ रु. बतौर रायल्टी के रूप में मिलते हैं. ग्वालियर के पास घाटीगांव वन क्षेत्र में भी 4,000 से ज्यादा ऐसे पिट्स पाए गए हैं, जिनसे अवैध खनन हुआ है. खनन माफिया की गतिविधियों के चलते घाटीगांव का सोन चिरैया अभयारण्य वीरान हो गया.
मुरैना के मनोज पाल सिंह की आरटीआइ पर मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक जबलपुर जिले की सिहोरा तहसील के गांव झींटी में करीब 51 हेक्टेयर पर खनन करने के लिए कटनी के पेसिफिक एक्सपोर्ट्स और नरसिंह लक्ष्मी माइंस, ग्वालियर के मायाराम सिंह तोमर और एक अन्य निवेदक भारद्वाज को खदानें दी गईं. पैसिफिक एक्सपोर्ट्स को अनुबंध के मुताबिक साल भर में करीब 81,000 टन आयरन, ब्लू डस्ट और लैटेराइट आदि खनिज निकालने थे. लेकिन इसने तो पांच महीने में ही धरती से 12 लाख टन खनिज निचोड़ लिया. इतना ही नहीं, उसने आयरन खनिज विशाखापत्तनम के रास्ते चीन तक में बेचा. बाकियों की खदान पर भी मिलीभगत कर पैसिफिक ने ही खुदाई की. लोकायुक्त के पास इसकी शिकायत हुई है. सरकार जांच दल की रिपोर्ट को दबाकर बैठ गई है. इस रिपोर्ट के बाद किसी भी कंपनी के खिलाफ न तो कोई कार्रवाई की गई और न ही खनन पर रोक लगाई गई. कटनी जिले में विजय राघवगढ़ के कांग्रेसी विधायक संजय पाठक पर भी आरोप लगा है कि सिहोरा इलाके में उनकी खनन कंपनियों ने क्षमता से ज्यादा खनन किया. एक अनुमान के मुताबिक लीज समाप्त होने के बाद भी यहां से करीब 50 लाख टन लौह खनिज निकाला गया, जिसकी कीमत करीब 5,000 करोड़ रुपए बैठती है.
जब लूट इस पैमाने पर चल रही हो तो फिर साजिश और गठजोड़ के आरोपों से कोई तबका बाहर कैसे रह सकता है? दिवंगत नरेंद्र कुमार की पत्नी मधुरानी तेवतिया ने इसी ओर इशारा किया: मध्य प्रदेश की आइएएस और आइपीएस एसोसिएशन हमारे साथ अब तक खड़ी नहीं हुईं. क्या ये संगठन सिर्फ चाय पीने और पार्टी करने तक ही सीमित रह गए हैं. ध्यान रहे कि यह एक पत्नी का भावुक विलाप भर नहीं क्योंकि मधुरानी खुद आइएएस अफसर हैं. नरेंद्र के पिता और उत्तर प्रदेश पुलिस में इंस्पेक्टर केशव देव भी इसी में जोड़ते हैं, आइपीएस अफसर का काम सड़क पर जाकर अवैध कामों को रोकना नहीं होता. थाना प्रभारी उस समय कहां थे? पूरे मामले में मध्य प्रदेश पुलिस का रवैया सहयोग का नहीं है. साजिश साफ नजर आती है.'' देव कहते हैं कि मरने से एक दिन पहले भी उनके बेटे ने राजनैतिक दबाव की बात कही थी.
इस मोर्चे पर कुछ ठोस हो, न हो, सियासत जरूर जमकर हो रही है. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर माफिया से सांठगांठ का आरोप लगाते हैं. नरेंद्र की हत्या की सीबीआइ जांच के अपनी सरकार के फैसले का जिक्र करते हुए चौहान कहते हैं, बहन मधुरानी के साथ मेरी पूरी संवेदना है. जहां तक अवैध खनन का सवाल है तो सरकार पहले ही इस पर सख्ती से कार्रवार्ई कर रही है. राज्य सरकार ने मुरैना जिले में जरूर अवैध खनन रोकने के लिए विशेष सशस्त्र बल (एसएएफ) की तीन कंपनियां और करीब तीन सौ जवान भेज दिए हैं. दरअसल मुख्यमंत्री को यह सफाई इसलिए देनी पड़ी क्योंकि राज्य की खदानों पर मुख्यमंत्री सचिवालय का सीधा नियंत्रण है और सचिवालय पर आरोप लग रहे हैं.
विधानसभा में विपक्ष के नेता अजय सिंह मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों और खनिज सचिव मिश्र पर सवाल उठाते हैं, मिश्र चार साल से इस पद पर हैं और उनके प्रभाव के कारण ही खनिज माफिया के खिलाफ किसी प्रकार की कार्रवाई नहीं हो पा रही है. सिंह चाहते हैं कि हत्या के साथ अवैध खनन की भी सीबीआइ जांच करवाई जाए. मिश्र हालांकि अपने ऊपर लगे आरोपों को राजनैतिक बताते हुए प्रतिक्रिया देने से इनकार करते हैं. दरअसल माइनिंग का मतलब ही लोग कालिख से भरा काम समझते हैं. अवैध खनन रोकने के लिए लगातार कार्रवाई हो रही है. चाहे वह सिहोरा का मामला हो या चंबल अंचल में पत्थर का खनन.
दरअसल, मध्य प्रदेश के सभी पचास जिलों में अवैध खनन हो रहा है. शहडोल और मालवा अंचल भी अवैध खनन से अछूता नहीं है. असल में खनन माफिया की दबंगई अभी पुलिस और प्रशासन पर भारी पड़ रही है. राजनेता बचे हुए हैं. लेकिन सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो पहिया पूरा घूमते देर नहीं लगेगी. जिस दिन राजनेता शिकार होने लगे. तब क्या होगा?
सरकार दावा कर रही है कि वह खनन माफिया के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई करेगी और अवैध खनन के खेल पर रोक लगाएगी, लेकिन सरकार के दावे पर यकीन करना कठिन है। इसलिए कि खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई की मांग लंबे अरसे से की जा रही है, लेकिन सरकार हाथ पर हाथ धरी बैठी है। इसी का दुष्परिणाम है कि आज खनन माफिया के हौसले बुलंद हैं और ईमानदार लोग मारे जा रहे हैं, लेकिन त्रासदी का यह खेल मध्य प्रदेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अन्य राज्यों में भी अवैध खनन का काला कारोबार जारी है और संबंधित राज्य सरकारों ने मौन धारण किया हुआ है। राजनीतिक संरक्षण दरअसल, अवैध खनन के इस खेल में वही लोग शामिल हैं, जिनके पांव सत्ता के गलियारे तक जाते हैं। अमूमन अवैध खनन के खेल में सत्ता से जुड़े मंत्रियों, सांसदों और विधायकों का नाम सुना जाता है। कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं की कारस्तानी जगजाहिर है। कर्नाटक सरकार पर उन्हें संरक्षण देने का आरोप भी लगता रहा है। मतलब साफ है, अवैध खनन से जुड़े माफियाओं को न केवल सत्ता का संरक्षण प्राप्त है, बल्कि सत्ता में उनकी सीधी भागीदारी है। अन्यथा, क्या मजाल कि अवैध खनन से जुड़े माफिया दिन-दहाड़े एक आइपीएस अधिकारी को ट्रैक्टर से कुचलकर मार डालते और सरकार शोक व्यक्त करती रह जाती। इस तरह की घटनाएं आए दिन मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों से सुनने को मिलती रहती हैं। खनन माफिया द्वारा सरकारी मुलाजिमों, आमजन और आरटीआइ कार्यकर्ताओं की हत्या आम बात हो गई है। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में पहाड़ धंसने से दर्जनों लोगों की जानें चली गई। इस घटना के लिए भी कसूरवार खनन माफिया ही बताए जा रहे हैं। सोनभद्र की यह घटना भी सत्ता पोषित भ्रष्टाचार का ही नतीजा है। हजारों एकड़ सुरक्षित वन भूमि को दुस्साहसिक ढंग से उत्तर प्रदेश सरकार की भूमि घोषित कर उसे मनचाहे पट्टेदारों को अलॉट कर दिया गया है और उस पर अवैध खनन जोरों पर है। दुर्भाग्य यह है कि दर्जनों लोगों के मारे जाने के बाद अब भी खनन का खेल जारी है। हाल ही में कर्नाटक में एक खनन माफिया के समर्थकों ने पत्रकारों पर हमला बोल दिया। दरअसल, ये हमले उन लोगों द्वारा किए और कराए जा रहे हैं, जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं। वे नहीं चाहते कि प्रशासन, आमजन, मीडिया या आरटीआइ कार्यकर्ता उनकी काली करतूतों पर से पर्दा हटाएं। व्यवस्था को अराजकता में बदल चुके इन लोगों के लिए सरकारी मुलाजिम और आरटीआइ कार्यकर्ता राह के रोड़े नजर आते हैं। वे उन्हें रास्ते से हटाने के लिए हत्या तक पर उतारू हैं। सच तो यह है कि देश में भ्रष्ट नौकरशाहों, राजनेताओं और स्थानीय स्तर के भ्रष्ट कर्मचारियों, बिल्डरों, भू-खनन माफियाओं का एक ऐसा नेटवर्क तैयार हो गया है, जिसका मकसद अवैध तरीके से अकूत संपदा इक_ा करना है। दुर्भाग्य यह है कि सरकार उनके तंत्र को तोडऩे में नाकाम साबित हो रही है। जब तक इन भ्रष्टमंडलियों को छिन्न-भिन्न नहीं किया जाएगा, खनन माफिया और अराजक किस्म के धंधों से जुड़े लोग सरकारी मुलाजिमों और आरटीआइ कार्यकर्ताओं की हत्या करते रहेंगे। दुर्भाग्य यह है कि खनन माफिया के खिलाफ जो सरकारी अधिकारी-कर्मचारी अभियान छेड़े हुए हैं, उन्हें सरकार सुरक्षा दे पाने में भी असमर्थ है। लिहाजा, उन्हें अपनी जान गंवानी पड़ रही है। लूट तंत्र के शिकार हुए कई जांबाज याद होगा, महाराष्ट्र में मालेगांव के अपर जिलाधिकारी यशवंत सोनवाने को तेल माफिया ने दिनदहाड़े जिंदा जला दिया था। जब उन्होंने तेल के काले धंधे से जुड़े लोगों को रंगे हाथ पकडऩा चाहा तो मौके पर ही तेल माफिया के गुर्गो ने उन्हें जलाकर मार डाला। राष्ट्रीय राजमार्ग अथॉरिटी (एनएचएआइ) के परियोजना निदेशक सत्येंद्र दुबे की बिहार में गया के निकट गोली मारकर हत्या कर दी गई। सत्येंद्र दुबे अपनी ईमानदारी के लिए विख्यात थे। उन्होंने एनएचएआइ में बरती जा रही अनियमितताओं के संबंध में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पत्र लिखा था। इसी तरह इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन के मार्केटिंग मैनेजर शणमुगम मंजूनाथ को उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में गोली मारकर खत्म कर दिया गया। शणमुगम ने तेल ईधन में मिलावट करने वाले तेल माफिया का पर्दाफाश किया था। इसी तर्ज पर देश में आरटीआइ कार्यकर्ताओं की भी हत्या की जा रही है। आरटीआइ कार्यकर्ता भी निशाने पर महज एक साल के दौरान ही एक दर्जन से अधिक आरटीआइ कार्यकर्ताओं की जानें ली जा चुकी हैं। अहमदाबाद के आरटीआइ कार्यकर्ता अमित जेठवा की इसलिए हत्या कर दी गई कि उन्होंने गीर के जंगलों में अवैध खनन का पर्दाफाश किया था। कई रसूखदार लोगों का चेहरा सामने आना तय था, लेकिन उससे पहले ही जेठवा की जान ले ली गई। हत्यारों ने गुजरात हाईकोर्ट के सामने ही उन्हें गोली मार दी। महाराष्ट्र के दत्ता पाटिल आरटीआइ का इस्तेमाल कर भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर किए थे। उनकी कोशिश की बदौलत ही एक भ्रष्ट पुलिस उपाधीक्षक और एक वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। उनकी पहल पर ही नगर निगम के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई थी, लेकिन सच और ईमानदारी की लड़ाई लडऩे की कीमत उन्हें भी जान देकर चुकानी पड़ी। इसी तरह महाराष्ट्र के आरटीआइ कार्यकर्ता वि_ल गीते, अरुण सावंत तथा आंध्र प्रदेश के सोला रंगाराव और बिहार के शशिधर मिश्रा को अपनी जान गंवानी पड़ी। जम्मू-कश्मीर के मुजफ्फर बट, मुंबई के अशोक कुमार शिंदे, अभय पाटिल तथा पर्यावरणवादी सुमेर अब्दुलाली पर भी जानलेवा हमला किया गया। देश के पहले केंद्रीय सूचना आयुक्त रह चुके वजाहत हबीबुल्ला की मानें तो कार्यकर्ताओं पर हो रहे हमले यह पुख्ता करते हैं कि आरटीआइ एक्ट देश में प्रभावी रूप ले रहा है, लेकिन क्या यह दिल दहलाने वाली बात नहीं है कि इसकी कीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है? आज मौंजू सवाल यह है कि सरकारी मुलाजिमों और आरटीआइ कार्यकर्ताओं पर होने वाले हमले कब बंद होंगे? सरकार उन्हें सुरक्षा कब मुहैया कराएगी? सच तो यह है कि सरकार की लापरवाही से ही ईमानदार अधिकारी और आरटीआइ कार्यकर्ताओं की जान सांसत में है। आज जरूरत इस बात की है कि केंद्र और राज्य सरकारें अवैध खनन रोकने के लिए सख्त कानून बनाएं और उस पर अमल भी करें। अन्यथा, खनन माफिया पर अंकुश लगाना कठिन हो जाएगा और ईमानदार लोगों की जान जाती रहेगी।
युवा और तेजतरार्र आइपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की निर्मम हत्या ने यह साबित कर दिया है कि इस देश में ईमानदार अधिकारियों के लिए काम कर पाना बेहद मुश्किल हो गया है। इसके साथ ही भ्रष्ट और बेईमान लोगों के लिए अपना काला धंधा चलाना कितना आसान है। यह पहली घटना नहीं है, जब किसी ईमानदार पुलिस अधिकारी ने फर्ज की खातिर अपनी जान की बाजी लगाई है। आइपीएस नरेंद्र कुमार की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में खनन माफिया ने वहां तैनात एक एसडीएम और एसडीपीओ पर जानलेवा हमला कर दिया। राज्य में हो रही ऐसी घटनाएं शिवराज सिंह चौहान सरकार की नाकामी जाहिर करने के लिए काफी है। फर्ज की राह में शहीद होने वाले ऐसे ईमानदार और निडर अधिकारियों की फेहरिस्त काफी लंबी है। वर्षो पहले बिहार के सहरसा-खगडिय़ा जिले के दियारा में दस्यु गिरोह का मुकाबला करते हुए डीएसपी सतपाल सिंह ने भी अपनी शहादत दी थी। हालांकि सतपाल सिंह की मौत के बाद यह बात चर्चा में रही कि स्थानीय जिला प्रशासन अगर समय रहते पर्याप्त पुलिस बल मौके पर भेजता तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी। इसके बाद बिहार के बहुचर्चित गोपालगंज के डीएम जी. कृष्णैया हत्याकांड का मामला सामने आया, जिसके नामजद अभियुक्त बाहुबली नेता आनंद मोहन फिलहाल उम्रकैद की सजा काट रहे हैं। ऐसी ही एक और घटना झारखंड के चतरा जिले में कुछ साल पहले हुई थी, जिसमें वन माफिया और नक्सलियों ने मिलकर एक डीएफओ की निर्मम हत्या कर दी। ईमानदार पुलिस अधिकारियों की हत्या का सिलसिला यही नहीं थमा, बल्कि साल दर साल बीतने पर इसमें और इजाफा हुआ। पिछले साल महाराष्ट्र में तेल माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने पर एक एसडीएम को जिंदा आग के हवाले कर दिया गया। दिनदहाड़े ऐसी घटनाएं होने के बावजूद संबंधित राज्य सरकारें उन लोगों पर कार्रवाई नहीं करती। सरकार की इस अनदेखी की सबसे बड़ी वजह कुछ और नहीं, बल्कि कहीं न कहीं इस काले धंधे में उनके लोगों और नाते-रिश्तेदारों की भागीदारी है। बीते कुछ वर्षो से देश के कई हिस्सों में अवैध खनन का कारोबार बेरोक-टोक चल रहा है। हिंदुस्तान के लगभग उन सभी राज्यों में जहां पहाड़ मौजूद हैं, वहां खनन माफिया सक्रिय हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि धन की इस धार में राजनीतिक दलों के नेता पूरी तरह शामिल हैं या इस तरह कहें कि राज्य सरकारें ऐसे खनन माफियाओं को पूरी तरह अपना संरक्षण दे रही है। कर्नाटक, गोवा में भाजपा और कांग्रेस की सरकार इस मामले में पूरी तरह बेनकाब भी हो चुकी है। आइपीएस अधिकारी नरेंद्र कुमार की जिस बेरहमी के साथ हत्या की गई, उससे कई सवाल पैदा हो रहे हैं। जिस मुरैना में उनकी हत्या हुई, उस जिले में अवैध खनन का धंधा कई वर्षो से चल रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कथित सुशासन में यह धंधा थमने की बजाय बढ़ता ही चला गया। बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी होगी कि जिस संसद भवन को देखकर हम उसकी वास्तुकला पर खुशी से इठलाते हैं, असल में उसे बनाने की प्रेरणा मुरैना स्थित मितावली चौंसठ योगिनी मंदिर से ली गई थी। यह मंदिर आठवीं सदी में बनाया गया था। इसे देखने के बाद हर कोई इसे नई दिल्ली स्थित संसद भवन का प्रतिरूप कहे बिना नहीं रह सकता। हालांकि ऊंची पहाडिय़ों पर स्थित इस ऐतिहासिक धरोहर का वजूद अवैध खनन के चलते खतरे में पड़ गया है। इस अवैध खनन में कोई और नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश में सरकार चला रही भाजपा के कई माननीय विधायक और नेता शामिल हैं। बोली और गोली के लिए मशहूर मुरैना में इन दिनों अवैध खनन का धंधा भ्रष्ट नेताओं और उनके गुर्गो के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो रहा है। एक तरफ वन एवं पर्यावरण मंत्रालय व प्राकृतिक संसाधन विभाग जंगल और पहाड़ों के रक्षार्थ नित्य नए उपाय तलाशने में जुटा है, वहीं संबंधित राज्य सरकारों में मौजूद लोग बिना किसी भय के अपना गोरखधंधा चला रहे हैं। भारत में जो हालात पैदा हो रहे हैं, उसके प्रति संसद और विधानसभा में बैठे लोगों को आज नहीं तो कल सोचना ही पड़ेगा, क्योंकि भ्रष्टाचार से बेहाल और एक अदद रोटी के लिए जद्दोजहद करने वाले करोड़ों लोग आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर अपने जन प्रतिनिधियों का गला काटेंगे। आइपीएस नरेंद्र कुमार और अभियंता सत्येंद्र दुबे जैसे ईमानदार अफसरों की कुर्बानी कभी बेकार नहीं जाने वाली। ऐसी घटना उन भ्रष्ट अधिकारियों के लिए भी एक सबक है, जो अपने ईमान का सौदा कर रहे हैं।

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

आदित्य उपाध्याय ने ठोका 112 रन




मनीपाल की विशाल जीत
भोपाल लक्ष्मीपति इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलाजी द्वारा आयोजित प्रथम लक्ष्मीपति टी-20 इंटर स्कूल क्रिकेट टूर्नामेंट में मनीपाल एकेडमी ने आरडी कान्वेंट को 177 रनों से पराजित किया। टॉस जीतकर मनीपाल एकेडमी ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 256 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया। आदित्य उपाध्याय ने 112 और सूरज ने 65 रनों का महत्वपूर्ण योगदान दिया। आरडी कान्वेंट के अजीत और रिची ने 1-1 विकेट लिए। जवाब में आरडी कान्वेंट की टीम 12 ओवरों में 80 रन बनाकर आल आउट हो गई। दीपक ने 12 न और मनप्रीत ने 11 रन बनाए। मनीपाल एकेडमी के आकाश ने 5 और सूरज ने 2 विकेट लिए। लक्ष्मीपति इंस्टीट्यूट के मैनेजिंग डायरेक्टर इंजीनियर शिव कुमार बंसल तथा सेंट जॉर्ज स्कूल के संस्थापक बी. थॉमस ने आदित्य उपाध्याय को मैन ऑफ द मैच का खिताब दिया।

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012


भेड़ाघाट में नर्मदा का सौंदर्य देखने उमड़ती है भीड़

मध्य प्रदेश में जबलपुर शहर के बगल में नर्मदा नदी के गोद में बसा एक जगह जहाँ घुमती सड़कें उचाइयों की तरफ बढ रही थी,पेड़ों से पटी झुरमुठ के पिछे से झांकती झाड़ियाँ,जो उस जगह के लिए किसी नवविवाहिता के द्वारा प्रयुक्त श्रिंगार प्रशाधन से कम न थी.
चारों तरफ फैली बड़ी-बड़ी चट्टानें खुद में अटल एवं आभायुक्त चरित्र को समेटे हुए थी.उन चरित्रों को उभारनें का कार्य वहाँ के शिल्पकार कर रहे थे,जो उनकी जीविका का साधन एवं आगन्तुकों के आकर्षण के केन्द्र भी थे.कलाक्रितियाँ ऐसी जो बरबस ही आगन्तुकों की भीड़ को अपनी ओर खींच रही थी.
आगे बढने पर नीचे उतरते पथरीले -संकड़े रास्ते,जहाँ सुरज की किरणें चारों तरफ व्याप्त संगमरमर के वास्तविक चरित्र के प्रदर्शन में अपना योगदान दे रही थी.नदजल की कलकल ध्वनी जो उँचाई से गिरने पर कर्णप्रिय संगित के रुप में हमारे कानों तक पहुँच रही थी तथा जल की बुंदे उँचाई से गिरने पर फुहरों में परिवर्तित हो कपासी प्रतिरुप प्रदर्शित कर रही थी.
नर्मदा एवं बैण-गंगा की सम्मिलित तेज धारा एवं गहरी खाई,जो हमारे दिल की धड़कनों को तेज कर रही थी और अनजान खतरे से आगाह भी.कुल मिलाकर एक ऐसा मनोरम जगह जो हमारे मन को आह्लादित एवं नयनों को त्रिप्ती की परकाष्ठा तक ले जा रहा था.
हम धुआंधार के सामने खड़े हैं। सामने यानी रेलिंग पर। नर्मदा यहां कोई 10-12 फीट नीचे खड्ड में गिरती है और फुहारों के साथ ऊपर उछलती है, मचलती है। गेंद की तरह टप्पा खाकर फब्वारों साथ ऊपर कूदती है । यहां नर्मदा का मनोरम सौंदर्य अपने चरम पर होता है। घंटों निहारते रहो, फिर भी मन न भरे। जल प्रपात का ऐसा नजारा शायद ही कहीं और देखने को मिले।
धुआंधार के सामने दोनों ओर कतारबद्ध संगमरमर की चटानें हैं, जो नर्मदा का रास्ता रोकती हैं। इन मार्बल राक्स की बनावट ऐसी है कि लगता है इन्हें किसी धारदार छेनी से तराशा गया हो। चट्टानों की बीच नर्मदा सिकुड़ती जाती है पर वह अपने वेग में बलखाती, इठलाती और अठखेलियां करती आगे बढ़ती जाती है। मानो कह रही हो "मुझे कोई नहीं रोक सकता।
यहां ’रोपवे’ भी हैं लेकिन मेरे बेटे ने इस पर यह कहकर जाने से मना कर दिया कि यह विकलांगों के लिए है। हम तो पैदल चलकर ही जाएंगे। यानी यह जेब ढीली करने का ही साधन है।
संझा आरती का समय है। भक्तजन नर्मदा मैया की आरती कर रहे हैं। दीया जलाकर लोग आरती कर रहे हैं और कुछ लोग नर्मदा में दीप प्रवाह कर रहे हैं। कर्तल ध्वनि के साथ आरती में बहुत से लोग शामिल हो गए हैं। आरती के पशचात प्रसाद वितरण हो रहा है।
कुछ परिक्रमावासी ’हर-हर नर्बदे’ का जयकारा कर रहे हैं। पहले लोग नर्मदा के एक छोर से दूसरे छोर तक और वापस उसी स्थान तक पैदल ही परिक्रमा करते थे। अब भी कुछ लोग करते हैं। लेकिन अब बस या ट्रेन से भी परिक्रमा करने लगे हैं।
जीवनदायिनी नर्मदा की महिमा युगों-युगों से लोग गाते आ रहे हैं। लेकिन अब नर्मदा संकट में है। बरसों से नर्मदा बचाओ की लड़ाई लड़ी जा रही है। इस पर बड़े-बड़े बांध बनाए जा रहे हैं। मैं वापस लौटते समय सोच रहा था कि क्या इस जीवनदायिनी मनोरम सौंदर्य की नदी को बचाया नहीं जा सकता?

रविवार, 18 मार्च 2012

काले हीरे का काला बाजार




काला हीरा यानी कोयले का कारोबार भी उसी की तरह काला है. कोयले के काला बाजार में सफेदपोशों की चलती है जिसके कारण यह माफियाओं की पहली पसंद बन गया है.एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 20 फीसदी कोयला काला बाजारी की भेंट चढ़ जाती है.
भारतीय कोयला बाज़ार एक अजीबो-गऱीब दानव है. कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल), सिंगरेनी कोल कोलियरी लिमिटेड (एससीसीएल) और नेवेली लिग्नाइट कॉर्पोरेशन (एनएलसी) के बीच राज्यों की स्वाधिकृत कंपनियों के उत्पादन के अल्पाधिकार की भरपाई ऐतिहासिक रूप में क्रय के एकाधिकार द्वारा की जाती रही है. उदारीकरण से पहले तक कोयले के सबसे बड़े औद्योगिक उपभोक्ता अर्थात बिजली, लोहा व इस्पात और सीमेंट के कारख़ाने भी ज़्यादातर राज्यों के स्वाधिकृत कारख़ाने ही रहे हैं, लेकिन वास्तव में रेलवे ही एक ऐसी संस्था है जिसके पास कोयले को बड़े पैमाने पर उठाने और उसे वितरित करने की अच्छी-खासी मूल्य-शक्ति है. उदारीकरण के बाद जब ये जि़म्मेदारियां सीआईएल को औपचारिक रूप में सौंप दी गईं, तब कोयला मंत्रालय ने 2000 के दशक की शुरुआत तक मूल्यों पर नियंत्रण बनाए रखा. फिर भी आयात-समानता के मूल्यों पर केवल कोयले के उच्चतम ग्रेड ही बेचे गए और भारत का अधिकांश उत्पादन निचले ग्रेड का होने के कारण कम मूल्य पर बेचा गया और हो सकता है कि इन मूल्यों का निर्देश अनिवार्य वस्तुओं, खास तौर पर बिजली की लागत को कम रखने के लिए कदाचित कोयला मंत्रालय द्वारा दिया गया था. सन 2011 के आरंभ में सीआईएल ने विभेदक मूल्य प्रणाली शुरू की, जिसके आधार पर बाज़ार-संचालित क्षेत्रों के लिए उच्चतर मूल्य तय किए गए.
इन बदलती हुई मूल्य-व्यवस्थाओं के बावजूद काले बाज़ार को छोड़कर खुले बाज़ार में थोक में कोयला खरीदना सचमुच बहुत कठिन है. भारत के छह सौ मिलियन टन के घरेलू कोयला उत्पादन में से लगभग 80 प्रतिशत का आवंटन कोयला मंत्रालय की प्रशासनिक समितियों के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के आवेदकों को किया गया. अतिरिक्त 10 प्रतिशत की बिक्री ऑनलाइन ई-नीलामी के माध्यम से की गई, जिसके परिणामस्वरूप अच्छा-खासा राजस्व भी मिला है. 2009-10 में ई-नीलामी मूल्य औसतन अधिसूचित मूल्यों से लगभग 60 प्रतिशत ऊपर रहा. अवरुद्ध कोयला ब्लॉक, जिन्हें जल्द ही प्रतियोगी बोलियों के माध्यम से सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कंपनियों को आवंटित कर दिया जाएगा, 19 प्रतिशत अतिरिक्त था. अंतत: घरेलू कोयला उत्पादन का आ़खिरी 1 प्रतिशत राज्य सरकार की एजेंसियों को, जो इसे स्थानीय बाज़ारों को उपलब्ध करा देते हैं, आवंटित कर दिया जाता है.
कोयले के कम मूल्य के पीछे का तर्क था कि बिजली, इस्पात और सीमेंट का परिणामी उत्पादन अनिवार्य था और वृद्धि को बढ़ावा देने के लिए उसकी क़ीमत कम करना ज़रूरी था, लेकिन आर्थिक सलाहकार के कार्यालय से हाल के मूल्यों के आंकड़ों को देखते हुए 2004 से 2011 तक कोयले के मूल्य में 89 प्रतिशत वृद्धि हुई, जबकि बिजली, इस्पात और सीमेंट के मूल्यों में क्रमश: 13 प्रतिशत, 26 प्रतिशत और 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई. उसी अवधि में थोक मूल्य सूचकांक में 54 प्रतिशत वृद्धि हुई. जहां एक ओर बिजली के मूल्य विनियमित कर दिए गए, वहीं दोनों के मूल्य का विनियमन नहीं हुआ है, जिसका अर्थ यह हुआ कि इन दोनों उद्योगों ने कोयले के बढ़ते मूल्यों को पर्याप्त रूप में आत्मसात करते हुए उनका प्रबंधन कर दिया. यदि स्थिति यही है तो कृत्रिम रूप से कोयले के कम मूल्य के रूप में सहायता की इनपुट राशि का तर्क काफ़ी कमज़ोर है, लेकिन मूल्य-निर्धारण मूलभूत समस्या भी नहीं है.
यह समय सबसे अच्छा था, यह समय सबसे खराब था, यह युग समझदारी का था, यह युग ही बेवक़ूफिय़ों का था. कोयले की इस वर्तमान गतिशीलता की तुलना किसी षड्यंत्र और दो शहरों की कथा (ए टेल ऑफ़ टू सिटीज़) के झंझावात से नहीं की जा सकती. यह कथा निश्चय ही आरंभिक भावनाओं को प्रतिबिंबित करती है और इससे इस क्षेत्र में चलने वाले घटनाचक्र का अंदाज़ा हो जाता है. हाल में बाज़ारी पूंजीवाद के संदर्भ में सबसे प्रतिष्ठित कंपनी के रूप में कोल इंडिया के उदय होने की चर्चा समाचार पत्रों में गूंजती रही है. वित्तीय जश्न मनाने की बजाय पिछले कुछ वर्षों से भारत में कोयले की भारी कमी रही है, जिसके कारण राज्य सरकारें, सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों की पावर और इस्पात कंपनियां समय पर कोयले की डिलीवरी न होने की लगातार शिकायतें करती रही हैं.
कोयले की आपूर्ति की निगरानी के लिए विकसित प्रशासनिक प्रणाली बहुत जल्द ही अपनी विश्वसनीयता खोने जा रही है. बिजली के क्षेत्र की क्षमता, शायद कुछ मूर्खतापूर्ण लगे, लेकिन कोयले की आपूर्ति की क्षमताओं से कहीं आगे निकल गई है. इस समय चलने वाले कई संयंत्र, खास तौर पर वे संयंत्र जो राज्य के क्षेत्र में हैं, अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं. पिछले साल वर्तमान संविदागत कऱारों को पूरा करने में सक्षम न होने के कारण ही बहुत कम कोयला ईंधन आपूर्ति कऱारों पर हस्ताक्षर हो पाए हैं.
घरेलू कोयले के सुरक्षित भंडार से काफ़ी मात्रा में कोयला निकालने की भारत की क्षमता में गिरावट आने के कारण उसकी नीति पर भी मूल रूप में इसका असर पड़ा है. कोयला मंत्रालय द्वारा निष्पादित नवीनतम कोयला ईंधन आपूर्ति कऱार (एफएसए) बिजली संयंत्रों की ईंधन संबंधी 75 प्रतिशत आवश्यकताओं को पूरा करने की गारंटी देते हैं, शेष की पूर्ति निजी तौर पर की जानी चाहिए. यदि कोयला ईंधन आपूर्ति कऱार (एफएसए) निष्पादित हो भी जाए, जो अपने आपमें संपर्क अनुमोदन प्रक्रिया की जटिलताओं को देखते हुए बेहद अनिश्चित है तो भी रेल और सड़क मार्ग के मिले-जुले रूप के कारण स्त्रोत स्थल से ले जाकर गंतव्य स्थल पर उन्हें खाली करने-कराने के तौर-तरीक़ों और उसके लिए जि़म्मेदार एजेंसियों द्वारा लॉजिस्टिकल प्रबंधन के कमज़ोर समन्वयन के कारण और भी नुक़सान और देरी होती रहती है. इस बात को लेकर हैरानी भी नहीं होनी चाहिए कि बड़े-बड़े कोयला उपभोक्ता बेहतर कि़स्म के कोयले को चुनने के लिए उसे उन देशों से आयातित करने पर आमादा होने लगे हैं, जहां पर कऱार और लॉजिस्टिक्स से संबंधित दायित्वों का पूर्वानुमान किया जा सकता है. इसकी प्रतिक्रिया में कोयला निर्यातक देशों और अभी हाल में इंडोनेशिया ने भी कोयले की बढ़ती मांग को देखते हुए उसकी क़ीमत में बढ़ोतरी और विनियमों में परिवर्तन करना शुरू कर दिया है.
आशा है कि भारत अगले कुछ वर्षों में एक मिलियन टन से अधिक कोयले का आयात करेगा. क्या कारण है कि कोयले का घरेलू उत्पादन मांग को पूरा करने में विफल रहा है? हालांकि इस बारे में बहुत-से स्पष्टीकरण दिए जा चुके हैं, फिर भी यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब कदाचित सबसे कठिन है. कुछ लोग कहते हैं कि पर्यावरण संबंधी स्वीकृति और भूमि अधिग्रहण ही मुख्य बाधाएं रही हैं. कुछ लोग इसका दोष राज्यों द्वारा स्वाधिकृत कोयला कंपनियों पर मढ़ देते हैं जो अपने परिचालन में आधुनिक खनन की परिपाटियों और प्रौद्योगिकी को प्रभावशाली रूप में अपनाने में असमर्थ रहे हैं. सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कोयला कंपनियों के इन पुराणपंथी मालिकों की काफ़ी आलोचना भी हुई है. इनके कई मालिकों ने तो उत्पादन के लिए ब्लॉक ला पाने में विफल होने के बाद अपने आवंटित ब्लॉकों को अनावंटित भी करा दिया. कि़स्सागोई की तरह आपराधिक तत्वों के साथ कोयला उद्योग की मिलीभगत और उसके फलस्वरूप होने वाली चोरी और ग्रेड की गुणवत्ता को कम करने की वारदातों को भी समझा जा सकता है. यही कारण है कि घरेलू उद्योग में वर्तमान कमी के सही कारणों को समझना इतना आसान नहीं है, परंतु एक बात तो साफ़ है कि परंपरागत बाज़ार की अपेक्षित क्षमताओं का पूरा उपयोग नहीं हो पाया है.
कोयले की आपूर्ति की निगरानी के लिए विकसित प्रशासनिक प्रणाली बहुत जल्द ही अपनी विश्वसनीयता खोने जा रही है. बिजली के क्षेत्र की क्षमता, शायद कुछ मूर्खतापूर्ण लगे, लेकिन कोयले की आपूर्ति की क्षमताओं से कहीं आगे निकल गई है. इस समय चलने वाले कई संयंत्र, खासतौर पर वे संयंत्र जो राज्य के क्षेत्र में हैं, अपनी क्षमता से बहुत कम काम कर रहे हैं. पिछले साल वर्तमान संविदागत कऱारों को पूरा करने में सक्षम न होने के कारण ही बहुत कम कोयला ईंधन आपूर्ति कऱारों पर हस्ताक्षर हो पाए हैं. पिछले कुछ महीनों में श्रमिक संकट, भारी वर्षा और तेलंगाना विरोध के कारण इस प्रणाली की ऐसी कमी भी सामने आई है, जिसके कारण बिजली के संयंत्रों में कोयले के भंडार कम होने लगे और अनेक दक्षिणी राज्यों में लंबे समय तक बिजली की कटौती होने लगी.
ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियों में निजी क्षेत्र में भी जोखिम बढऩे के कारण उत्साह में कमी दिखाई पडऩे लगी. सीआईएल के मूल्य-निर्धारण के उत्साह से भरे सारे प्रयासों पर बार-बार पावर क्षेत्र द्वारा पानी फेर दिया गया. यदि इन्हें उचित रूप में कार्यान्वित किया जाए तो इससे पावर क्षेत्र में सैद्धांतिक रूप में स्थितियों में सुधार आ जाएगा, लेकिन बढिय़ा कोयले की डिलीवरी में सीआईएल के खराब रिकॉर्ड के कारण कई ऑपरेटर भारी रद्दोबदल करने की बजाय स्थिति को यथावत बनाए रखना ही पसंद करते हैं. इस प्रकार का संतुलन, जहां कोई भी पक्ष पूरी तरह से निकम्मी पड़ी इस प्रणाली में कोई भारी परिवर्तन नहीं चाहता, बहुत समय तक नहीं चल सकता.
इस प्रकार की समस्याओं का कोई सरल समाधान नहीं है, इसलिए इन पर गंभीर विचार मंथन की आवश्यकता है. रणनीतिक कारणों से विदेशों से कोयले के संसाधन मंगवाने की बात ठीक तो लगती है, लेकिन इस बात को मद्देनजऱ रखते हुए कि कोयले की किसी खान को पूरी तरह से विकसित करने में पांच से सात साल तक का समय लगता है, अपने देश में ही कुछ अल्पकालिक उपायों की आवश्यकता तो होगी ही. कोयले के क्षेत्र में सुधारों पर शंकर समिति की रिपोर्ट में चार साल पहले कई ऐसी समस्याओं की भविष्यवाणी की गई थी और उस समिति की सिफ़ारिशों पर कार्रवाई करने में कुछ समय तो लगेगा ही. अनेक महत्वपूर्ण सवालों पर विचार करना होगा. उदाहरण के लिए पिछले बीस वर्षों में भारतीय कोयला खनन कंपनियों की उत्पादकता में बदलाव कैसे आया? कोयले की आपूर्ति की लाइनें कैसे चलती हैं और इस प्रक्रिया में बाधाएं और विचलन कहां हैं? क्या भारत अपनी घरेलू खानों से इष्टतम मात्रा में कोयला निकाल सकता है? क्या यह संभव है कि वर्तमान क़ानूनी ढांचे के भीतर अधिक खुले कोयला बाज़ार में संक्रमण किया जा सके ? इन सवालों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के बाद ही पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में चली आ रही समस्याओं के लगातार समाधान की कोशिशें रंग ला पाएंगी.
काला हीरा यानी कोयले का कारोबार भी उसी की तरह काला है। कोयले के काला बाजार में सफेदपोशों की चलती है जिसके कारण यह माफियाओं की पहली पसंद बन गया है। एक अनुमान के अनुसार देश में करीब 20 फीसदी कोयला काला बाजारी की भेंट चढ़ जाती है। अकेले मध्य प्रदेश में हर साल करीब 350 करोड़ का कोयला तस्करी के माध्यम से बाजारों में पहुंच रहा है।
मध्य प्रदेश में कई कोयला खदानें हैं और इन खदानों का कोयला देश भर में भेजा जाता है। कोयले के इस कारोबार में खदान से लेकर कोल डिपो और परिवहन प्रक्रिया के दौरान भारी मात्रा में कोयला चोरी होता है और अच्छी गुणवत्ता के कोयले को चुराकर वजन पूरा करने के लिए कोयले के ढेर में पत्थर और कचरा मिलाया जाता है। यही पत्थर और कचरायुक्त कोयला बिजली संयंत्रों को भेजा जाता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से बिजली उत्पादन कंपनियों के आला अफसर कई बार शिकायत कर चुके हैं कि राज्य के बिजली संयंत्रों को मिलने वाले कोयले में बड़ी मात्रा में पत्थर और कचरा होता है, जिससे बिजली उत्पादन प्रभावित होता है, लेकिन हक़ीक़त यह है कि कोयला कंपनियां तो अच्छा कोयला ही भेजती हैं। बीच में कोयला परिवहन करने वाले और भंडारण करने वाले कोयला चोरी करते हैं और उसमें पत्थर कचरा मिलाकर वजन पूरा कर देते हैं। इस गोरखधंधे में कोयला कंपनियों और बिजली संयंत्रों के ज़मीनी अधिकारियों की मिली भगत से इंकार नहीं किया जा सकता है। कोयला चोरी करोड़ों रुपयों का लाभदायक धंधा है और इस कमाई का बंटवारा ऊपर से नीचे तक होता है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जि़ले में तो कोयला चोरी का बड़ा मामला संसदीय जांच समिति ने पकड़ा भी है, लेकिन मध्य प्रदेश में अभी किसी का ध्यान नहीं गया है। यह चोरी का कोयला उद्योगों, कल कारखानों और कोयला आपूर्ति करने वाली व्यापारिक कंपनियों के भंडार में ही जाता है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और बिजली संयंत्रों के आला प्रबंधकों ने मिलावटी कोयले की बार-बार शिकायत करके बिजली संयंत्रों के लिए बेहतर गुणवत्ता वाले कोयले के आयात के समर्थन में माहौल तैयार किया और केंद्र सरकार से आयात की अनुमति भी ले ली है। लेकिन इस बारे में कांग्रेस नेताओं को पूरी आशंका है कि कोयला आयात का धंधा भ्रष्टाचार से प्रेरित है। एक यह भी आशंका जताई जा रही है कि देश में बड़ी मात्रा में हो रही कोयला चोरी को ठिकाने लगाने के लिए कुछ कंपनियां, बिजली संयंत्रों को कोयला बेचने के लिए लालायित हैं और हो सकता है कि मध्य प्रदेश सरकार का आयातित कोयला खरीदने का फैसला भी इन कंपनियों के दबाव का ही नतीजा हो।

देश का 28 प्रतिशत कोयला उत्पादन मध्यप्रदेश से
देश के कोयला उत्पादन का 28 प्रतिशत प्रदेश की धरती से हर साल राष्ट्र को उपलब्ध कराया जाता है। यह मात्रा लगभग 75 मिलियन टन है, लेकिन प्रदेश के बिजली प्लांटों के लिए 17 मिलियन टन कोयला भी प्रदेश को केंद्र सरकार नहीं दे रही है। प्रदेश में बिजली उत्पादन का मुय स्रोत कोयला ही है। बिजली प्लांटों के लिए कोयला केंद्र सरकार उपलब्ध कराती है। कोल इंडिया लिमिटेड यह मात्रा तय करती है। प्रदेश के बिजली प्लांटों के लिए केंद्र सरकार ने लगभग 17 मिलियन टन कोयला आपूर्ति का कोटा तय किया है, लेकिन पिछले तीन सालों से प्रदेश को लगभग 13-14 मिलियन टन कोयला ही मिल पा रहा है। कोयले की आवंटित मात्रा उपलब्ध कराने के लिए 2009 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सारणी से कोयला यात्रा भी निकाली थी।
मप्र के कोयला उत्पादन में भारी कमी के आसार
पुरानी खदानों के बंद होने और नये कोल ब्लॉकों में उत्पादन शुरू न होने से राज्य में कोयले के उत्पादन में भारी कमी होने जा रही है। उत्पादन में होने वाली यह संभावित कमी राज्य सरकार के लिए चिंता का विषय बन गई है क्योंकि खनन से मिलने वाली कुल रॉयल्टी में कोयले का हिस्सा 60 फीसदी होता है।
मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले में कई कोयला खदानें है। इसमें से सबसे बड़े कोल रिजर्व वाली झिंगुरदाह खदान जल्द ही बंद होने वाली है। एनसीएल की गोरबी खदान में भी कोयला कम बचा हुए है। प्रदेश के सिंगरौली की सभी खुली खदानेंं है, यहां के अलावा प्रदेश की ज्यादातर खदाने भूमिगत है और काफी पुरानी है। प्रदेश में फिलहाल कोल इंडिया की तीन सहायक कंपनियां एनसीएल, एसईसीएल और डब्ल्यूसीएल की कुल छह खदानें है।
दूसरी ओर प्रदेश के नये कोल ब्लॉकों में अभी तक कोल उत्पादन शुरू नहीं हुआ है तथा अगले दो सालों तक उनके शुरू होने की कोई संभावना भी नहीं है। प्रदेश में विभिन्न पॉवर कंपनियों को 22 कोल ब्लॉक आवंटित किये गये है, जिनका अनुमानित कोल भंडार 3100 मिलियन टन का है। ये ब्लॉक सिंगरौली, शहड़ोल, उमरिया, अनूपपुर और छिंदवाड़ा में है। जिन कंपनियों को यह आवंटित किये गये है उनमें रिलायंस एनर्जी लिमिटेड, एस्सार पॉवर, मध्य प्रदेश राज्य खनिज निगम, राष्ट्रीय खनिज विकास निगम, जे.पी.एसोसिएटस, ए.सी.सी. लिमिटेड शामिल है।
आज की स्थितियों को देखते हुए तय माना जा रहा है कि जब तक नये कोल ब्लॉकों में उत्पादन शुरू नहीं होगा, प्रदेश में कुल कोयला उत्पादन नहीं बढ़ेगा। ऐसी स्थिति में राज्य को कोयले से होने वाली रॉयल्टी में भी कमी आयेगी। चालू वित्त वर्ष में नवंबर महीने तक कुल रॉयल्टी 2086 करोड़ रुपये है, इसमें करीब 1079 करोड़ रुपये इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड के रुप में आया है। इस तरह से खनन की रॉयल्टी 1007 करोड़ रुपये है। इसी दौरान कोयले से मिलने वाली रॉयल्टी 619 करोड़ रुपये है। सरकार इसी राशि में होने वाली कमी को लेकर परेशान है।
कोयला जितना काला है उससे अधिक इस धंधे में लगे लोग काले हैं। ब्लैक डायमंड के नाम से प्रख्यात कोयले के काले कारोबार ने रातों ही रात में कईयों को फर्श से उठाकर अर्श पर ला खड़ा किया है। कोयले के कारोबार में मापदंडों का जिस प्रकार उल्लंघन हो रहा है उससे पर्यावरण भी दूषित हो रहा है। सिंगरौली में 22 सितंबर को ग्रीनपीस द्वारा सार्वजनिक सभा में एक रिपोर्टे जारी की गई। रिपोर्टर को जारी करते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा सिंगरौली पर पर्यावरण एवं मानवाधिकार के हनन के निशान दिखाई देते हैं। हमारी रिपोर्ट देश की विधुत राजधानी में छाए प्रदुषण एवं विनाश को बेनकाब करती है।
चारों तरफ कोयला की धूल के बीच पुरा जन-समुदाय कोयला खदानों के भारी बोझ के साये में जी रहा है।उन्होंने अपनी जमीन विधुत उत्पादन के लिए दी जो उन तक नहीं पहुँचती है और अब उनके पास जीविकोपार्जन के लिए कोई भरोसेमंद साधन नहीं तथा स्वास्थ्य चौपट हो गया है। इसे विकास नहीं कहा जा सकता। धरती और लोगो की इतने व्यापक पैमाने पर हो रही बरबादी को हम नजऱअंदाज़ नहीं कर सकते जिसे उनके अधिकारों की रक्षा किए बिना और हमारे द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अतिक्रमण की सीमा तय किए बिना उन पर थोपा जा रहा है।
यह हजारों हेक्टेयर सघन वनों का सवाल है, हाशिए पर पड़े हजारों आदिवासी एवं दुसरे समुदाय तथा इस क्षेत्र का सम्पूर्ण पारिस्थिकी तन्त्र खतरे में है। फिर भी महज कुछ टन निम्नस्तरीय कोयले के लिए सरकार यहां की समृद्ध जैव विविधता का विनाश करने पर तुली हुई है। कोयला से काला' नामक एक रिपोर्ट आज बैधन की एक सार्वजनिक सभा में जारी की गई। इस सभा में कोयला खनन एवं थर्मल पावर प्लांटों से प्रभावित गांवों के लोग और वैसे लोग जिनके गांवों में खनन या औद्योगिक परियोजनाएँ प्रस्तावित हैं, उपस्थित थे।
यह रिपोर्ट ग्रीनपीस द्वारा जुलाई 2011 में गठित एक तथ्य आंकलन दल (फैक्ट फाइंडिंग मिशन)(1) का नतीजा है। इसमें पर्यावरण एवं इस क्षेत्र के लोगों पर अनियंत्रित कोयला खनन तथा ताप बिजली संयंत्र (थर्मल पावर प्लांटों) के प्रभाव को दर्ज किया गया है। इस तथ्य आंकलन दल को देश की विद्युत राजधानी के तौर पर प्रोत्साहित, सिंगरौली, में कोयला खनन के कारण हो रहे मानवीय उत्पीडऩ एवं पर्यावरण के विनाश की सच्चाई को सामने लाने के लिए गठित किया गया था।
रिपोर्ट को जारी करते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा, ''सिंगरौली पर पर्यावरण एवं मानवाधिकार के हनन के निशान दिखाई देते हैं। हमारी रिपोर्ट, देश की विद्युत राजधानी माने जाने वाले सिंगरौली, में छाए प्रदूषण एवं विनाश को बेनकाब करती है। चारों तरफ कोयले की धूल के बीच पूरा जन-समुदाय कोयला खदानों के भारी बोझ के साये में जी रहा है। उन्होंने अपनी जमीनें विद्युत उत्पादन के लिए दीं जो उन तक नहीं पहुंचती है और अब उनके पास जीविकोपार्जन के लिए कोई भरोसेमंद साधन नहीं है तथा उनका स्वास्थ्य चौपट हो गया है। इसे विकास नहीं कहा जा सकता। धरती और लोगों की इतने व्यापक पैमाने पर हो रही बरबादी को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते जिसे उनके अधिकारों की रक्षा किए बिना और हमारे द्वारा किए जा रहे पर्यावरण के अतिक्रमण की सीमा तय किए बिना उन पर थोपा जा रहा है।''
इस तथ्य आंकलन दल के निष्कर्ष महत्वपूर्ण हैं, खासकर मंत्रियों के समूह (जीओएम) द्वारा कोयला खनन के लिए वन प्रखंडों के आवंटन की स्वीकृति के संदर्भ में। केवल सिंगरौली में ही, माहन, छत्रसाल, अमेलिया एवं डोंगरी टाल-2 के वन प्रखंडों को पहले 'वर्जितÓ (नो-गो) की श्रेणी में रखा गया था। लेकिन अब इस विषय में मंत्रियों के समूह की ओर से स्वीकृति की प्रतीक्षा की जा रही है। हाल ही में कुछ खबरों के अनुसार मंत्रियों के समूह द्वारा 'वर्जितÓ व 'गैर वर्जितÓ (गो) क्षेत्र का सीमांकन रद्द किया जा सकता है। जब तक अक्षत वनों का सीमांकन नहीं किया जाता, इन वनों और लोगों की जमीन पर अधिग्रहण का खतरा बढ़ता रहेगा।
आधिकारिक तौर पर, 1980 में वन संरक्षण अधिनियम लागू होने के बाद से सिंगरौली क्षेत्र में 5,872.18 हेक्टेयर वन का गैर-वन्य उपयोग के लिए विपथन किया जा चुका है। सिंगरौली के वन प्रमंडल अधिकारी के अनुसार और भी 3,299 हेक्टेयर वन विपथन के लिए प्रस्तावित है। इसमें वर्तमान एवं प्रस्तावित औद्योगिक गतिविधियों के कारण वन-भूमि के अतिक्रमण के विभिन्न उदाहरण शामिल नहीं हैं।
फिलहाल, प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से माहन के वनों को एस्सार एवं हिंडाल्को के खनन स्वामित्व में हस्तांतरित करने के लिए बेहद दबाव दिया जा रहा है। पूर्व पर्यावरण एवं वन मंत्री, जयराम रमेश ने संकेत दिए थे कि इन वनों में खनन नही किया जाना चाहिए। माहन में उपलब्ध कुल 144 मिलियन टन का कोयला भंडार हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड एवं एस्सार पावर लिमिटेड के ताप बिजली संयंत्र के लिए केवल 14 वर्षों तक कोयले की आपूर्ति के लायक हैं।
ग्रीनपीस इंडिया की नीति अधिकारी प्रिया पिल्लई ने आगे कहा, ''यह हजारों हेक्टेयर सघन वनों का सवाल है, हशिए पर पड़े हजारों आदिवासी एवं दूसरे समुदाय तथा इस क्षेत्र का संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में हैं। फिर भी, महज कुछ टन निम्नस्तरीय कोयले के लिए सरकार यहां की समृद्ध जैव विविधता का विनाश करने पर तुली हुई है। वन भूमि के और अधिक विपथन के पहले सरकार को दूसरे क्षेत्रों में कोयले की उपलब्धता एवं वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों का आंकलन करना चाहिए। कंपनियों को भी चाहिए कि वे प्रभावित समुदायों की आजीविका पर ध्यान दें, मानवाधिकारों पर हो रहे असर का आंकलन करें, भूमिहीनों एवं वन-आश्रित समुदायों की क्षतिपूर्ति तथा पुनर्वास की व्यवस्था करें।''
तथ्य आंकलन दल ने 9 एवं 10 जुलाई 2011 को सिंगरौली के उत्तर प्रदेश वाले इलाके में चिलिका दाड, दिबुलगंज (अनपरा थर्मल पावर प्लांट के निकट), बिलवाड़ा और सिंगरौली क्षेत्र के मोहर वन प्रखंड, अमलोरी एवं निगाही खदानों का दौरा किया। इस दल ने जनपद प्रशासन एवं कोल इंडिया लिमिटेड के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की।
रिपोर्ट में शामिल सूचनाओं के अनुसार देश में चुनिंदा 88 अति प्रदूषित औद्योगिक खण्ड के विस्तृत पर्यावरण प्रदूषण सूचकांक पर सिंगरौली नौवें स्थान पर है। इसके 81.73 अंक यह साफ-साफ संकेत करते है कि यह क्षेत्र खतरनाक स्तर पर प्रदूषित है। दरअसल, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (एनआईएच) और भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) के प्रदूषण नियंत्रण अनुसंधान संस्थान (पीसीआरआई) की रिपोर्ट साफ-साफ संकेत करती है कि कोयला खनन के कारण सिंगरौली क्षेत्र में भू-जल का प्रदूषण हुआ है।
इसके अतिरिक्त, ' इलेक्ट्रिसिटे द फ्रांसÓ की एक अप्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार उत्पादन के लिए निम्नस्तरीय कोयले के उपयोग के कारण सिंगरौली के थर्मल पावर प्लांटों से हर साल लगभग 720 किलोग्राम पारा (मर्करी) निकलता है। अनेक गांवों में और यहां तक कि नॉदर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के उच्च अधिकारियों के द्वारा भी, तथ्य आंकलन दल को बताया गया कि चूंकि उनका दौरा बरसात के मौसम में हुआ है इसलिए वायु का गुणवत्ता स्तर काफी बेहतर था। सामान्यत:, और खासकर गर्मी के महीनों में वायु की गुणवत्ता का स्तर काफी खराब होता है। राख के तालाबों और खदानों के आस-पास रहने वाले ग्रामवासियों ने कहा कि उन महीनों में उनका जीवन नर्क हो जाता है। इसके फलस्वरूप, सिंगरौली गांव के लोगों को अनेक तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ रहती हैं जिनमें सांस की तकलीफ, टीबी, चर्मरोग, पोलियो, जोड़ों में दर्द और अचनाक कमजोरी तथा रोजमर्रा की सामान्य गतिवधियों को करने में कठिनाई जैसी अनेक समस्याएं हैं।
इस रिपोर्ट में इस बात को भी उजागर किया गया है कि किस तरह विभिन्न खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों ने ग्रामीण जीवन को नुकसान पहुंचाया है लेकिन इन गतिविधियों के संचालकों से किसी ने भी स्वास्थ्य सेवा एवं बुनियादी सुविधाओं को मुहैया कर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहे कुप्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी नहीं ली है। उदाहरण के लिए, सोनभद्र जनपद (उत्तर प्रदेश में) के शक्तिनगर में चिलिका दाड गांव को लें जो नैशनल कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) के मिट्टी के ढेर, कोयला ढोने वाली रेलवे लाइन और राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम के पावर प्लांट से घिरा है और यहां जल को प्रदूषित करने, वायु को प्रदूषित करने एवं स्वीकृत मानदंड से अधिक शोर पैदा करने में इनमें से हरेक की भूमिका है।
केवल अकेले चिलिका दाड में ही 600 ऐसे परिवार हैं जिन्हें इन विभिन्न परियोजनाओं के कारण अनेक बार विस्थापित होना पड़ा है। इन निवासियों को आवासीय पट्टे दिए गए केवल उस पर रहने के अधिकार के साथ। वे न तो इस जमीन को बेच सकते हैं और न ही इसके एवज में कोई कर्ज ले सकते हैं। अब इस गांव से महज 50 मीटर की दूरी पर भारी संख्या में खदानों, बेरोजगारी, उच्चस्तरीय प्रदूषण एवं खनन विस्फोट का खतरा झेल रहे ग्रामीणों के सामने बदहाली को झेलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा है।
तथ्य आंकलन दल इस बात की सिफारिश करता है कि जब तक अन्य क्षेत्रों में कोयले की उपलब्धता एवं वैकल्पिक ऊर्जा समाधानों का आंकलन न हो जाए तब तक के लिए सिंगरौली के वन क्षेत्र में सभी खनन गतिविधियों पर रोक लगाई जाए। दल यह भी सिफारिश करता है कि सभी खनन एवं औद्योगिक गतिविधियों का व्यापक मानवाधिकार आंकलन किया जाए और लोगों की शिकायतें दूर करने के लिए जमीनी स्तर पर कारवाई की जाए। इस दल ने महसूस किया है कि दशकों से सिंगरौली में प्रभावित जन समुदायों की आजीविका का सवाल बुनियादी तौर पर अनुत्तरित ही रहा है। इस मोर्चे पर तथ्य आंकलन दल ने सुझाव दिया है कि लोग अपनी पूर्ववर्ती आजीविका को जारी रख सकें, इस पर प्रशासन को ध्यान देना चाहिए। इसके लिए भूमि-आधारित क्षतिपूर्ति व्यवस्था लागू की जाए जिसके माध्यम से अधिग्रहीत की गई कृषि भूमि के बदले में किसी दूसरी जगह कृषि भूमि प्रदान की जाए।
भिलाई इस्पात संयंत्र में काले हीरे की कालाबाज़ारी इस तरह चलती है कि प्रतिवर्ष अरबों रुपये का लेनदेन अधिकारियों, कर्मचारियों और पुलिस के साथ मिलकर खुलेआम कर लिया जाता है. इस धंधे में लगे हुए ठेकेदार कहने को तो कोयले की बुहारन यानी शेष बचा हुआ कोयला बटोरते हैं, पर इसी के भरोसे छत्तीसगढ़ में एक नया कोल मा़फिया लंबे समय से सक्रिय है. इस पर लगाम लगाने की न कभी कोशिश की गई और न ही इसे गंभीरता से लिया गया. पिछले बीस वर्षों में इस धंधे से 350 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई की गई है.
भिलाई से लेकर बिहार और झारखंड तक इस्पात कारखानों में कोल माफिया रेलवे, आरपीएफ, इस्पात संयंत्रों के अधिकारियों-कर्मचारियों और सुरक्षातंत्र के साथ मिलकर यह अवैध कारोबार कर रहे हैं, जिसे हर स्तर पर राजनीतिक संरक्षण हासिल है. भिलाई इस्पात संयंत्र को बिहार, झारखंड और कोरबा की खानों से निकलने वाला कोयला आपूर्ति किया जाता है, जो मालगाड़ी के माध्यम से यहां तक पहुंचता है. जानकारी के अनुसार, एक मालगाड़ी में 6 से 10 वैगन तक होते हैं और एक वैगन में 18 से 60 टन कोयला भरा होता है. जैसे ही मालगाड़ी यार्ड में पहुंचती है, ट्रांसपोर्ट एवं डीजल विभाग, मैटेरियल विभाग, कोक ओवन विभाग मिलकर कोयला रिसीव करते हैं और डिब्बा खाली होने का क्लियरेंस देते हैं. इसके बाद डिब्बे में पड़े कोयले का चूरा, जिसे बुहारन कहा जाता है, साफ़ करने की प्रक्रिया शुरू होती है. इसी बुहारन के ज़रिए ही भिलाई इस्पात संयंत्र से प्रतिवर्ष 350 करोड़ रुपये का चूना लगाया जाता है. भिलाई स्टील प्लांट में काम करने वाला ठेकेदार अग्रवाल, जिसका पूरा नाम ज्ञात नहीं है, इस बुहारन को पिछले कई वर्षों से लगातार साफ़ कर रहा है. इस ठेकेदार ने 60-70 मज़दूर लगा रखे हैं, जो बेलचे से बुहारन एकत्र करने का काम करते हैं. प्रत्येक मज़दूर को 90 रुपये प्रतिदिन मज़दूरी दी जाती है. एक महीने में मज़दूरों का भुगतान एक लाख 79 हज़ार रुपये के आसपास होता है. इतनी बड़ी राशि के लिए इस बुहारन का बाज़ार भाव 200 से 250 रुपये प्रति टन होता है. प्रतिमाह भिलाई इस्पात संयंत्र में 30 मालगाडिय़ां डाउनलोड होती हैं. यानी 250 टन प्रतिमाह. बारह माह में 60 हज़ार टन बुहारन मालगाडिय़ों से उतारी जाती है, जिसकी कुल क़ीमत करोड़ों में होती है. इस बुहारन के साथ योजना के अनुसार अच्छा कोयला भी डिब्बे में छोड़ दिया जाता है, जो खुले बाज़ार में अतिरिक्त रूप से बेच दिया जाता है.

पिछले बीस वर्षों के दौरान लगभग 350 करोड़ रुपये का माल तस्करों द्वारा ग़ायब कर दिया गया. यह मात्र अनुमान है. सूत्रों के अनुसार, बिना टेंडर के बेचे जाने वाले इस माल के व्यापार में लगभग हर स्तर के अधिकारी और कर्मचारी को मुंह बंद करने की पूरी क़ीमत दी जाती है. बिना किसी अधिकार के ठेकेदार द्वारा बीस वर्षों की अवधि में कितना माल निकाल कर बाज़ार में बेचा गया, इसका हिसाब इस्पात संयंत्र या रेलवे के किसी भी अधिकारी के पास नहीं है. इस संदर्भ में चौथी दुनिया ने जब विभिन्न विभागीय अधिकारियों से चर्चा करनी चाही तो अफ़सर कन्नी काट गए. भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसंपर्क अधिकारी जेकब कुरियन का कहना है कि हमें भी कोयले की कमी की शिकायतें मिल रही हैं. हालांकि इस्पात संयंत्र का ट्रांसपोर्ट और डीजल विभाग डिब्बों को खाली कराता है. उन्होंने कहा कि प्रबंधन खुद ही अपनी निगरानी में क्लीनिंग कराएगा.
भिलाई इस्पात संयंत्र में कोयले की तस्करी का सिलसिला विभिन्न स्तरों पर निरंतर जारी है. प्रबंधन यदि जाग भी जाए तो अवैध रूप से पैसा कमाने का आदी हो चुका तंत्र उसे सक्रिय नहीं होने देगा.
झारखंड की सत्ता संस्कृति कमोबेश कोयले और लोहे के अवैध धंधे से ही ऊर्जा प्राप्त करती है. यह धंधा राज्य के ताक़तवर नेताओं और आला अधिकारियों के संरक्षण में बड़े ही संगठित रूप से संचालित होता है. कोल इंडिया की दो अनुशंगी कंपनियां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड और सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड की खदानें पूर्ण रूप से और ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड की कुछेक खदानें झारखंड की सीमा के अंदर आती हैं. इन इलाक़ों में एक प्रचलित शब्द है डिस्को पेपर. इसका इस्तेमाल चोरी के कोयले को सड़क मार्ग से मंडी तक पहुंचाने के ग़ैर सरकारी परमिट के रूप में किया जाता है. रास्ते में पडऩे वाले पुलिस थानों से लेकर तमाम सरकारी महकमे को इसकी जानकारी रहती है. यह एक सांकेतिक टोकन होता है, जिसे कोयला माफिया हर दिन बदल देता है. प्राय: दस या बीस रुपये के नोटों की गड्डी से एक-एक नोट को निकालकर आधा फाड़ दिया जाता है और चोरी का कोयला ले जाने वाले ट्रक को निर्धारित फीस के एवज में दिया जाता है. किस इलाक़े से किस सीरीज़ के नोट जारी किए गए हैं, सुबह माफिया के गुर्गे रास्ते के तमाम थानों को सूचित कर देते हैं. ट्रक वालों को सफिऱ् इसे दिखाना होता है. उन्हें हर थाना क्षेत्र में वीआइपी ट्रीटमेंट मिलता है. वैध कोयले से लदी गाड़ी भले ही रोक ली जाए, लेकिन अवैध कोयले की गाडिय़ों को कोई नहीं रोकता. कारण, हर सप्ताह माफिया की तरफ़ से बंधी बंधाई रकम का पैकेट उन तक पहुंच जाता है. पुलिस की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिये कभी-कभी मैच फिक्सिंग के अंदाज़ में कोयले की बरामदगी भी करा दी जाती है.
कोल इंडिया की दो अनुशंगी कंपनियां भारत कोकिंग कोल लिमिटेड और सेंट्रल कोलफील्ड लिमिटेड की खदानें पूर्ण रूप से और ईस्टर्न कोलफील्ड लिमिटेड की कुछेक खदानें झारखंड की सीमा के अंदर आती हैं. इन इलाक़ों में एक प्रचलित शब्द है डिस्को पेपर. इसका इस्तेमाल चोरी के कोयले को सड़क मार्ग से मंडी तक पहुंचाने के ग़ैर सरकारी परमिट के रूप में किया जाता है. रास्ते में पडऩे वाले पुलिस थानों से लेकर तमाम सरकारी महकमे को इसकी जानकारी रहती है. यह एक सांकेतिक टोकन होता है, जिसे कोयला माफिया हर दिन बदल देता है.
झारखंड के कोयला खदान क्षेत्रों से लेकर हाइवे तक कार्य विभाजन के आधार पर धंधे का संचालन होता है. माफिया, पुलिस, औद्योगिक सुरक्षा बल और स्थानीय जनप्रतिनिधियों के संरक्षण में कुछ दबंग किस्म के अपराधकर्मी बंद खदानों में अवैध उत्खनन कराते हैं. इसमें प्राय: स्थानीय गऱीब बेरोजग़ारों को दैनिक मज़दूर के रूप में लगाया जाता है. असुरक्षित और अवैज्ञानिक खनन कार्य के कारण दुर्घटनाएं भी होती रहती हैं, जिसमें मौतें भी हो जाती हैं, लेकिन प्राय: स्थानीय ग्रामीण शवों को हटा लेते हैं और चुपके से अंतिम संस्कार कर देते हैं. अवैध उत्खनन में लिप्त होने की बात कोई स्वीकार नहीं करता. प्रतिदिन अवैध उत्खनन से उत्पादित कोयले को अवैध डिपो में एकत्र किया जाता है. जंगल, पहाड़ और आबादी से जऱा हटकर बने इन डिपो का संचालन भी माफिया के गुर्गों की टीम के जि़म्मे रहता है. स्थानीय ग्रामीण कोयला खदानों से कोयला चुराकर साइकिलों पर लादकर इन्हीं डिपो में लाकर बेचते हैं. इसके एवज में उन्हें भरण-पोषण भर रकम मिल जाती है. पुलिस वाले भी इन्हीं को परेशान करते हैं और अवैध वसूली करते हैं. रोजग़ार के अभाव में ग्रामीण इस अवैध धंधे में शामिल हो जाते हैं. स्थानीय थाने को प्रति ट्रक एक हज़ार से तीन हज़ार तक नजऱाना दिया जाता है. हाइवे के पहले पडऩे वाले थानों को भी प्रति ट्रक की दर से नजऱाना तय रहता है. डिस्को पेपर हाइवे में प्रभावी होता है. कोयलांचल के पुलिस थानों की प्रतिदिन की कमाई लाखों में होती है, इसीलिये इन थानों में पोस्टिंग के लिए पुलिस अधिकारी मुंहमांगी रकम देने को तैयार रहते हैं. इस धंधे में पुलिस, पत्रकार, नेता और यहां तक की नक्सलियों का भी हिस्सा रहता है, जिसे पूरी ईमानदारी के साथ निर्धारित अवधि में बांट दिया जाता है. पुलिस थानों के प्रभारी अपने आला अधिकारियों को इसका हिस्सा पहुंचाते हैं. माफिया की तरफ से पुलिस, प्रशासन और राजधानी के आकाओं को अलग से पैकेट भेजा जाता है. शायद ही कोई ऐसा राजनीतिक दल हो जिसके शीर्ष नेताओं को उनकी हैसियत के मुताबिक़ थैली न पहुंचाई जाती हो. ऐसा नहीं कि यह धंधा अनवरत रूप से चलता हो. चुनाव के पूर्व या केंद्र के ज़्यादा दबाव बढऩे पर कुछ समय के लिए इसका पैमाना घटा दिया जाता है. ऐसे मौक़ों पर सरकार की छवि सुधारने के लिए ईमानदार और कड़े प्रशासकों का पदस्थापन कोयलांचल के इलाकों में किया जाता है. फिर माहिर अधिकारियों को भेजकर धंधे का दायरा बढ़ा दिया जाता है.
चोरी के कोयले को मंडी तक पहुंचाने का काम भी कुछ खास ट्रक मालिक करते हैं. उन्हें सामान्य से अधिक भाड़ा मिलता है और रास्ते में कोई परेशानी नहीं होती. कोयला माफिया के पास ऐसे ट्रकों की लिस्ट रहती है. वे हर ट्रिप के बाद माफिया के यहां उपस्थिति दर्ज करा देते हैं. उन्हें दिन के व़क्त ही बता दिया जाता है कि किस डिपो से लोड लेना है. शाम ढलने के बाद इनपर कोयले की लदाई होती है और देर रात वे हाइवे पकड़ लेते हैं. अधिकांश कोयला डिहरी और बनारस की मंडियों में खपाया जाता है, जहां से इसे देश के दूसरे इलाक़ों के कोयला व्यापारी खरीद ले जाते हैं.

कोयला चोरी को रोकने की बात हर सरकार करती है. इसके लिये तरह-तरह के उपाय भी किए जाते हैं. कभी टास्क फोर्स बनाई जाती है तो कभी लगातार छापेमारी की जाती है. कभी चिन्हित कोयला तस्करों को गिरफ्तार कर जेल में भी डाला जाता है. लेकिन सब सफिऱ् दिखावे के लिये. सत्ता में बैठे लोगों के खाने के दांत और दिखाने के दांत अलग रहते हैं. एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष कऱीब 1000 करोड़ का कोयला चोरी से मंडियों तक पहुंचाया जाता है. कुछ बड़े तस्करों का जाल तो नेपाल और चीन तक बिछा हुआ है. चोरी का कोयला स्थानीय स्तर पर भी रोलिंग मिलों, ईंट भ_ों आदि में धड़ल्ले से खपाया जाता है. उन्हें यह कोयला सस्ता पड़ता है. चोरी का कोयला खपाने वाले कल-कारखानों का नजऱाना भी स्थानीय स्तर से राजधानी तक पहुंचता है. बहरहाल, काले हीरे के काले धंधे में कई सफ़ेदपोश लाल हो रहे हैं. इसे कोई स्वीकार करे न करे, लेकिन कोयले की दलाली में अच्छे-अच्छों के हाथ काले हो रहे हैं, जिसे वे तरह-तरह के दास्त

रविवार, 8 जनवरी 2012

नौकरशाहों के निजी क्षेत्र प्रेम पर लगेगा अंकुश





निजी क्षेत्र का मोहपाश नौकरशाहों को वर्षो से अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। यही कारण है कि वर्ष 2001 के बाद से 100 से अधिक नौकरशाहों ने निजी क्षेत्र की नौकरी पकडऩे की खातिर सरकारी नौकरी से या तो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली या फिर रिटायरमेंट के बाद निजी क्षेत्र का रूख किया है। कैरियर के बीच में नौकरी छोड़ देना आईएएस एवं आइपीएस अधिकारियों के लिए कोई नई बात नहीं है,लेकिन प्रशासनिक सेवा से रिटायर होकर निजी क्षेत्र में शानदार नौकरियां तलाशने वाले नौकरशाहों को तगड़ा झटका लगने वाला है। मौजूदा नियम के मुताबिक, सरकारी अफसर रिटायरमेंट के बाद, कम से कम एक साल तक निजी क्षेत्र में नौकरी नहीं कर सकते हैं। इस एक साल की अवधि को कूलिंग ऑफ पीरियड कहा जाता है। घोटालों की शृंखला से जूझती केंद्र सरकार इस अवधि को बढ़ाकर तीन साल करना चाहती है। केंद्रीय मंत्री वी नारायणस्वामी के नेतृत्व में कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय मौजूदा नियम में बदलाव को अंतिम रूप दे रहा है, ताकि जल्द ही उसे कैबिनेट से मंजूरी मिल सके।
ऐसे मामलों में हमेशा ही निहित स्वार्थ की संभावना बनी रहती है। हम इसे रोकना चाहते हैं। हम कूलिंग ऑफ पीरियड को फिर से तीन साल करना चाहते हैं। सात-आठ साल पहले इसे घटा कर एक साल कर दिया गया था। इस तर्क के पीछे यह सवाल छुपा हुआ है कि क्या आईएएस अफसरों को निजी क्षेत्र में काम करने की इजाजत दी जानी चाहिए? खासकर तब, जबकि लॉबिंग उसके काम का महत्वपूर्ण हिस्सा हो। हालांकि अपनी सीमाओं के बावजूद, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सरकारी अफसरों की निष्ठा और आचार संहिता बनाए रखने के लिए अपने तई भरसक प्रयास किए हैं।
लेकिन यह बात भी पूरी तरह सही है कि रिटायरमेंट के बाद निजी क्षेत्र में नौकरी करने की इछा रखने वाले अफसरों के आग्रह को सरकार बहुत अच्छे ढंग से मैनेज नहीं कर पाई है। देखा जाए तो मनमोहन सरकार कूलिंग ऑफ पीरियड के नियम लागू करने के मामले में काफी ढीली साबित हुई है, जबकि रिटायर होने वाले अफसरों के लिए इन नियमों का पालन करना अनिवार्य होता है। मिसाल के तौर पर इन मामलों पर एक नजर डालते हैं।
दरअसल, कॉरपोरेट रणक्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के बीच ख़ुद को बचाए रखने और आगे बढ़ाने के लिए कंपनियों के पास दो ही विकल्प हैं- या तो वे नेताओं और अफ़सरों को रिश्वत दें या फिर अवकाश प्राप्त अफ़सरों को अपने यहां नौकरी पर रखें जो उनके लिए राजनीतिक और अफ़सरशाही वर्ग से निपट सकें। पहले की तुलना में दूसरा विकल्प बहुत तेजी से लोकप्रिय होता जा रहा है। निजी क्षेत्रों में आकर्षक तनख्वाह और भारतीय प्रशासनिक सेवा एवं भारतीय पुलिस सेवा की मुश्किल भरी नौकरी सहित विभिन्न कारणों के चलते आईएएस एवं आइपीएस अफसरों के नौकरी छोडऩे का सिलसिला जारी है। बीते तीन साल में 30 अधिकारियों ने आइपीएस की नौकरी छोड़ दी। अखिल भारतीय सेवा में भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) की नौकरी काफी लोकप्रिय है, बावजूद इसके आइपीएस अफसर करियर के बीच में ही नौकरी छोड़ रहे हैं। बीते तीन सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि 2008 में 12, 2009 में दस और 2010 में आठ आइपीएस अधिकारियों ने नौकरी छोड़ी।
आईएएस अफसर अशोक मोहन चक्रवर्ती पश्चिम बंगाल के प्रमुख सचिव पद से 30 अप्रैल 2010 को रिटायर हुए। उन्होंने आईएएस कैडर पर नियंत्रण रखने वाले कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) से एस्सार समूह में काम करने की इजाजत मांगी। राज्य सरकार और अन्य संबंधित एजेंसियों से मश्विरे के बाद डीओपीटी ने उन्हें हरी झंडी दिखा दी। चक्रवर्ती ने सात अक्टूबर 2010 को स्थानीय निदेशक के पद पर एस्सार समूह को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दीं। वित्त सचिव पद से रिटायर होने वाले अशोक झा को सरकार ने एक ऑटोमोबाइल कंपनी में सेवा देने की इजाजत दे दी। तीन वरिष्ठ अफसर तो ऐसी कंपनियों से जुड़ गए, जो या तो सीधे तौर पर या फिर परोक्ष रूप से कॉरपोरेट लॉबिंग से जुड़ी थीं। अब इसे संयोग ही कहा जाएगा कि तीनों ही कंपनियां लॉबिंग को लेकर चल रहे हालिया विवाद से किसी न किसी तरह जुड़ी हुई हैं। ये तीनों कोई मामूली अफसर भी नहीं थे। प्रदीप बैजल विनिवेश सचिव थे, जो बाद में टेलीफोन रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (ट्राई) के चेयरमैन बने। अजय दुआ डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रोमोशन में सचिव थे। इसी तरह सीएम वासुदेव आर्थिक मामलों के सचिव और विश्व बैंक के बोर्ड में भारत की ओर से नामित कार्यकारी निदेशक थे।
पीवी भिड़े 31 जनवरी 2010 को राजस्व सचिव के पद से रिटायर हुए थे। डीओपीटी ने उन्हें पांच कंपनियां ज्वाइन करने की इजाजत दी है। इनमें नॉसिल लिमिटेड, हिडेलबर्ग सीमेंट इंडिया लिमिटेड, ट्यूब इंवेस्टमेंट इंडिया लिमिटेड, एल एंड टी फाइनेंस लिमिटेड और ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड शामिल हैं। नरेश दयाल 30 सितंबर 2009 को केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में सचिव पद से रिटायर हुए थे। जल्द ही उन्होंने ग्लैक्सो स्मिथक्लाइन कंज्यूमर हेल्थकेयर में अनाधिकारिक निदेशक के तौर पर जुडऩे की अर्जी दाखिल कर दी। 21 मई 2010 को उन्हें इजाजत भी दे दी गई।
उत्तर प्रदेश कैडर के 1973 बैच के अफसर अजय शंकर ने 31 दिसंबर 2009 को वित्त एवं उद्योग मंत्रालय से रिटायर होकर निदेशक के पद पर टाटा टी ज्वाइन कर लिया। इसी तरह यूनियन टेरिटरी कैडर के 1969 बैच के अफसर अनिल बैजल 31 अक्टूबर 2006 को शहरी विकास मंत्रालय के सचिव पद से रिटायर हुए। उन्हें 22 जून 2007 को इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फाइनेंस कंपनी के पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप इनिशिएटिव के सलाहकार व चेयरमैन पद पर ज्वाइन करने की इजाजत मिल गई।
तमिलनाडु कैडर के 1975 बैच के अफसर बृजेश्वर सिंह ने हाल में सड़क परिवहन और राष्ट्रीय राजमार्ग मंत्रालय को पत्र लिखकर एल एंड टी बिल्डिंग्स ज्वाइन करने की इजाजत मांगी है। उल्लेखनीय है कि एल एंड टी समूह ने हाल में विभिन्न व्यवसायों को अलग-अलग करने की रणनीति के तहत यह कंपनी बनाई है। मंत्रालय इस बात पर राजी है कि बृजेश्वर सिंह स्वतंत्र निदेशक के रूप में एल एंड टी बिल्डिंग्स ज्वाइन कर सकते हैं।
यूं तो इसमें कहीं कोई गड़बड़ी नजर नहीं आती, मगर शीर्ष नौकरशाहों को इतनी आसानी से इस तरह की इजाजत देने पर त्योरियां चढ़ सकती हैं। हाल में इस मुद्दे पर पुनर्विचार के अलावा सरकार ने कूलिंग ऑफ पीरियड में छूट दिए जाने को लेकर कभी कोई ठोस बचाव पेश नहीं किया। कैबिनेट का मसौदा तैयार करने वाले सरकारी अफसर इस बात की पुष्टि करते हैं कि कूलिंग ऑफ पीरियड के मामले का फिर से अध्ययन किया जा रहा है। नाम न छापने की शर्त पर एक अफसर ने कहा, एक खास तरह का काम है, जिसे करने की इजाजत रिटायर्ड सरकारी अफसरों को नहीं मिलनी चाहिए। फिलहाल तो सरकारी नीतियों में इस तरह के भेद का प्रावधान ही नहीं है। मिसाल के तौर पर, कूलिंग ऑफ पीरियड पूरा होते ही सेना से रिटायर हुए अफसर हथियार बेचने वाली कंपनियों में नौकरी कर सकते हैं। क्या सरकार को उन्हें इस तरह की इजाजत देनी चाहिए? सरकार का मसौदा इसकी भी पड़ताल करेगा कि क्या आईएएस अफसर को ऐसी लॉबिंग फर्म या किसी कंपनी से जुडऩे दिया जाना चाहिए, जिससे उनके अंतिम तीन पदों का कोई लेना-देना रहा हो। सही कहा जाए तो कूलिंग ऑफ पीरियड के फॉर्मूले को ही लॉबिंग में अनैतिकता रोकने के लिए काफी समझना ठीक नहीं होगा।
अधिकारी यह भी कहते हैं कि नीरा राडिया प्रकरण और पूर्व ट्राई अध्यक्ष के रिटायरमेंट के तुरंत बाद कॉरपोरेट लॉबिंग फर्म से जुडऩे का मामला कूलिंग ऑफ पीरियड में बदलाव के बारे में फिर से सोचने का बड़ा कारण बना। ऐसे और भी मामले हैं, जिनमें सेवानिवृत्त अधिकारी ऐसी कंपनियों से जुडऩे की चाहत रखते हैं, जिनके साथ उनका संबंध सरकारी नौकरी में रहते हुए भी था, जैसे कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के एक पूर्व अधिकारी एक निर्माण कंपनी से जुडऩा चाहते थे। स्पष्टीकरण मांगने पर पता चला कि एक खास क्षेत्र में उनके रहते हुए उस कंपनी को कई ठेके दिए गए थे। आखिरकार, उन्हें वह कंपनी ज्वाइन करने की इजाजत नहीं मिली।
डीओपीटी एक और नजरिए से भी इस मामले को देख रही है: एक विचार यह भी है कि कूलिंग ऑफ पीरियड इस मसले को पूरी तरह नहीं सुलझा सकता, क्योंकि कई बार रिटायर हो चुके अधिकारी इसे बाईपास करते हुए फुलटाइम कर्मचारी होने की बजाय सलाहकार बनकर कंपनियां ज्वाइन कर लेते हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के बाद से तो यह खास रिश्ता ज्यादा ही चर्चा में आ गया है। सरकार इस गठबंधन को तोडऩे के रास्ते निकालने की दिशा में काम कर रही है। विशेष रूप से, चार पूर्व नौकरशाहों के पीआर कंसल्टेंट और लॉबिस्ट नीरा राडिया के संपर्क में रहने के मामले की बड़ी बारीकी से जांच की जा रही है। यह वही नीरा राडिया हैं, जिनकी फर्म में वैष्णवी कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस, नोएसिस स्ट्रैटजिक कंसल्टिंग सर्विसेस, विटकॉम कंसल्टिंग और न्यूकॉम कंसल्टिंग शामिल हैं।
जिन नौकरशाहों पर उंगलियां उठी हैं, उनमें ट्राई के पूर्व अध्यक्ष व पूर्व विनिवेश सचिव प्रदीप बैजल, आर्थिक मामलों के पूर्व सचिव सीएम वासुदेव, इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन के पूर्व सचिव अजय दुआ और ट्राई के पूर्व सदस्य डीपीएस सेठ शामिल हैं। जैसे ही घोटाला सामने आया, कैबिनेट सचिवालय ने तुरंत नीरा राडिया की फर्म वैष्णवी कम्युनिकेशंस से इनके रिश्तों की पड़ताल की थी। ट्राई से रिटायर होने के बाद बैजल राडिया की फर्म वैष्णवी कम्युनिकेशंस से जुड़ गए थे और फिर राडिया के साथ पार्टनरशिप में नोएसिस कम्युनिकेशन की स्थापना की थी। जब 2जी घोटाला सामने आया, तब बैजल नोएसिस के चेयरमैन थे। माना जा रहा है कि डीओपीटी अब रिटायर होते ही कूलिंग ऑफ पीरियड से छूट मांगने वाले नौकरशाहों के आग्रह पर सख्त रवैया अपनाएगा। डीओपीटी के अधिकारियों का कहना है कि उन्हें हर महीने ऐसे 10-12 प्रार्थनापत्र जरूर मिलते हैं और कोई आश्चर्य नहीं कि इनमें से ज्यादातर आर्थिक मंत्रालयों से जुड़े नौकरशाहों के होते हैं। विभाग ने अब तक काफी नर्म रवैया अपनाया है, मगर हाल के दिनों में सामने आए इन मामलों ने उसे और सावधानी बरतने पर मजबूर कर दिया है।

उदाहरण के लिए जरा इन दो मामलों पर एक नजर डालिए

हाल में, विभाग ने भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) से सात महीने पहले रिटायर हुए एक अधिकारी का आग्रह ठुकरा दिया, जिन्हें दो निजी कंपनियों से 30-30 लाख रुपये प्रति माह के ऑफर मिले थे। इसी तरह के एक अन्य मामले में विभाग ने शहरी विकास मंत्रालय से रिटायर हुए एक अधिकारी को निर्माण कार्य करने वाली एक निजी कंपनी से जुडऩे की इजाजत नहीं दी। बाद में जांच से पता चला कि इस अधिकारी के कार्यकाल में उस निजी कंपनी को मंत्रालय की तरफ से कई ठेके दिए गए थे।पर एस्सार समूह से जुड़े पश्चिम बंगाल के पूर्व प्रमुख सचिव चक्रवर्ती अधिकारियों के निजी कंपनियों से जुडऩे को अनुचित नहीं मानते। वह कहते हैं, इसमें किसी तरह की गड़बड़ी कैसे हो सकती है? किसी भी अधिकारी को अनुमति देने से पहले सरकार ऐसे सभी पहलुओं की जांच करती है। एस्सार समूह से जुडऩे से पहले मुझे भी पांच महीने इंतजार करना पड़ा था। भिडे कहते हैं, इसमें गड़बड़ी क्यों हो सकती है? मैंने एक सरकारी खाद कंपनी चलाई है। निजी क्षेत्र मेरे अनुभव को इस्तेमाल कर सकता है। मैं अभी काम कर सकता हूं, मगर सरकार को अब मेरी सेवाओं की जरूरत नहीं है। इसलिए मैंने निजी क्षेत्र से जुडऩे का फैसला लिया।इसी तरह दयाल ने भी टीएसआई से कहा, सरकार ने मुझे जो भी जिम्मेदारी दी, मैंने उसे बाखूबी निभाया। निजी क्षेत्र में भी मैं अपनी जिम्मेदारियों को ऐसे ही निभाउंगा।
डीओपीटी के अधिकारियों की मानें तो रिटायरमेंट के बाद निजी क्षेत्र से जुडऩे का आग्रह करने वाले अधिकारियों की सूची काफी लंबी है। एक जनवरी 2007 तक अनिवार्य कूलिंग ऑफ पीरियड दो साल हुआ करता था, मगर आईएएस अधिकारियों की जबरदस्त लामबंदी के चलते इसे घटाकर एक साल कर दिया गया। इतना ही नहीं, अधिकारियों का एक वर्ग ऐसा भी है, जो ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर निजी क्षेत्र से जुड़ जाता है।
यूपी कैडर के 1976 बैच के अधिकारी अशोक कुमार खुराना ने नवंबर 2007 में ऊर्जा मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव के पद से ऐच्छिक सेवानिवृत्ति ली थी। अप्रैल 2008 में उन्हें जेपीएसके स्पोट्र्स से जुडऩे की अनुमति दे दी गई। उत्तराखंड कैडर के 1975 बैच के अधिकारी ओपी आर्या ने मई 2008 में समय से पहले रिटायरमेंट ले लिया था। डीओपीटी से जनवरी 2009 में अनुमति मिलने के बाद वह जेपी गंगा इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरपोरेशन लिमिटेड में मुख्यकार्यकारी अधिकारी बन गए।
कहते हैं कि इन अधिकारियों को निदेशक के तौर पर एक बार बैठने के लिए दस हजार रुपये और सालाना 170 करोड़ रुपये तक वेतन मिल जाता है। यदि उन अधिकारियों को भी जोड़ लिया जाए, जिन्होंने केवल राज्य सरकारों से अनुमति लेकर निजी क्षेत्र में नौकरी कर ली है, तो यह सूची और भी लंबी हो जाएगी। नियम कहता है कि सचिव पद से नीचे तीन साल तक राज्य सरकार की नौकरी करने वाले अधिकारियों को केंद्र से नहीं, बल्कि राज्य सरकार से अनुमति लेना ही काफी है। इससे उनका काम और भी आसान हो जाता है।
ये मामले तो हाल के दिनों में खबरों में रहे हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में तो ऐसे ढेर सारे मामले सामने आए थे, जब रुपर्ट मरडॉक ने दूरदर्शन के प्रमुख रतिकांत बासु को भारत में स्टार के प्रमुख के तौर पर अपने साथ जोड़ लिया था। बासु के साथ सूचना विभाग की वरिष्ठ अधिकारी उर्मिला गुप्ता और इंदिरा मानसिंह भी स्टार से जुड़ गई थीं।
दिसंबर 2010 में रिटायर हुए एचएचएआई के पूर्व अध्यक्ष बृजेश सिंह ने सरकार से निर्माण क्षेत्र की बड़ी कंपनी एल एंड टी से जुडऩे की अनुमति मांगी है। ये उसी शृंखला की कड़ी है, जिसमें पूर्व सरकारी अधिकारियों और सरकारी कंपनियों के प्रमुखों की निजी क्षेत्र में जाने की इच्छा साफ तौर पर बढ़ती नजर आती है। हाल में, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेट (सेल) के पूर्व अध्यक्ष एसके रूंगटा ने बतौर प्रबंध निदेशक, वेदांता एल्यूमिनियम ज्वाइन किया है। यह तो वे कुछ नाम हैं जो पिछले दिनों चर्चा में रहे। ऐसे सैकड़ों नौकरशाह हैं जो निजी क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और कई जाने की तैयारी में हैं। अब देखना यह है कि सरकार नौकरशाहों के पलायन पर किस हद तक अंकुश लगा पाती है।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

परिवार में सिमटता मुलायम सिंह का समाजवाद





अगले दो-तीन साल भारतीय राजनीति के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे. इस दौरान कई राज्यों में विधानसभा चुनाव के अलावा 2014 में आम चुनाव भी होने हैं. सबसे अहम चुनाव देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के माने जा रहे हैं, जो आगामी छह माह के भीतर संपन्न हो जाएंगे. यहां के चुनाव पर हमेशा देश भर के राजनेताओं और जनता की नज़र रहती है. यहां मिली जीत-हार का प्रभाव केंद्र तक पड़ता है. यही वजह है कि सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव से काफी पहले ही रण के लिए बिगुल बजा दिया. कांग्रेस-भाजपा समेत सभी छोटे-बड़े दलों ने अपने-अपने महारथियों को चुनावी दंगल में उतार रखा है. वहीं बसपा सत्ता का भरपूर फायदा उठा रही है. बसपा प्रमुख ने एक बार फिर अपनी पार्टी को सत्ता में लाने के लिए मोर्चा संभाल लिया है. बसपा के बाद सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार समाजवादी पार्टी मानी जा रही है. सपा और ख़ासकर 73 वर्षीय मुलायम सिंह के लिए आगामी विधानसभा और 2014 में होने वाले आम चुनाव काफी मायने रखते हैं. कुछ राजनीतिक पंडित भविष्यवाणी कर रहे हैं कि ये मुलायम सिंह के नेतृत्व में लड़े जाने वाले आख़िरी चुनाव साबित हो सकते हैं. इसके बाद सपा को कोई न कोई नया कर्णधार चाहिए. नया कर्णधार कौन होगा, इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है, लेकिन संकेत यही हैं कि मुलायम अपने बाद भी सपा की बागडोर अपने परिवार में ही रखना चाहेंगे. सपा के नए कर्णधार मुलायम के बड़े बेटे अखिलेश यादव हो सकते हैं और छोटे बेटे प्रतीक भी. प्रतीक का नाम लिए जाने पर काफी लोगों को अटपटा लग सकता है, क्योंकि वह अभी राजनीति से दूर है. उसने राजनीति का ककहरा भी नहीं पढ़ा है, लेकिन कम लोग जानते होंगे कि प्रतीक के पास मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री है और उनकी पत्नी अपर्णा के पास राजनीति शास्त्र में. दोनों ने लंदन से शिक्षा हासिल की है. प्रतीक भले ही राजनीति से दूर हों, लेकिन राजनीतिक दांव-पेंचों से अंजान नहीं. अखिलेश यादव भी मुलायम के लिए चिंता का विषय हैं. वह सपा को आगे ले जाने में पूरी ताक़त लगाए हुए हैं, लेकिन उनमें नेताजी वाली बात नहीं है. दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का दबाव भी बढ़ता जा रहा है.

समाजवाद आई बबुआ, धीरे-धीरे आई. बेटा से आई, बहु से आई. भतीजा से आई, भाई से आई. मुलायम सिंह यादव के लिए समाजवाद की नई परिभाषा यही है. उन्हें दूसरों पर भरोसा नहीं, इसलिए अपने परिवार के बूते ही समाजवाद लाने का सपना देख रहे हैं. लेकिन क्या उत्तर प्रदेश की जनता उनके इस समाजवाद को स्वीकारेगी?

प्रतीक राजनीति में आएंगे, यह बात किसी को अबूझ पहेली लगे, लेकिन यह हक़ीक़त है. पिता मुलायम सिंह को उनके लिए भी ठीक वैसे ही रास्ता बनाना होगा, जैसा उन्होंने अखिलेश के लिए तैयार किया. संभावना इस बात की है कि प्रतीक 2014 के आम चुनाव में सपा की ओर से साइकिल की सवारी कर सकते हैं. उन्हें मुलायम अपने वर्चस्व वाली किसी संसदीय सीट से प्रत्याशी बना सकते हैं. यह सीट संभल, बदायूं या बहुत उम्मीद है कि इटावा भी हो सकती है. संभल संसदीय सीट इस समय बसपा के पास है, लेकिन मुलायम की वहां अच्छी पकड़ है. इस सीट पर सपा भी अपनी जीत दर्ज करा चुकी है. इटावा संसदीय सीट पर सपा के प्रेमदास कठेरिया विराजमान हैं, जो मौक़ा पड़ने पर प्रतीक के लिए अपनी दावेदारी से पीछे हट जाएंगे. बदायूं की संसदीय सीट भी सपा के खाते में है, जिस पर मुलायम के भतीजे धर्मेंद्र का क़ब्ज़ा है. फिलहाल तो प्रतीक घूमने-फिरने में मस्त हैं, लेकिन हो सकता है कि विधानसभा चुनाव के समय वह सपा के मंच पर दिखें. राजनीतिक पंडितों का कहना है कि मुलायम सिंह प्रतीक को लेकर काफी गंभीर हैं. वह साधना के स्वभाव से भी अंजान नहीं हैं. कहा जा रहा है कि नेताजी प्रतीक को देर-सबेर राजनीति में लाएंगे ज़रूर, लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि उनकी राह में कोई रोड़ा न आए यानी जीत सुनिश्चित होने के बाद ही प्रतीक को मैदान में उतारा जाएगा. मुलायम प्रतीक का हश्र बड़ी बहू डिंपल जैसा नहीं चाहेंगे. डिंपल फिरोज़ाबाद संसदीय सीट के उपचुनाव में तमाम दावों के बीच कांग्रेस के उम्मीदवार राजबब्बर से हार गईं थीं, जिससे नेताजी की काफी फज़ीहत हुई थी. अगर प्रतीक को लोकसभा नहीं भेजा जा सका तो उनके लिए राज्यसभा का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है.

इस बार मुलायम सिंह में काफी बदलाव नज़र आ रहा है. जो मुलायम सिंह पिछले चुनावों तक अपने दम पर, दबंगई से फैसले लेकर और चुनौतियां स्वीकार करके चुनावी संग्राम फतेह कर लेते थे, उन्हें अब दबाव में काम करना पड़ रहा है. पूरे राजनीतिक जीवन में अपने फैसलों पर अटल रहने वाले मुलायम इस बार किसी भी फैसले पर अटल नहीं दिख रहे हैं. उनमें जुझारूपन, दृढ़ इच्छाशक्ति, तत्काल निर्णय लेने की क्षमता घटी है. अब वह सबके साथ समान व्यवहार करने और जमीन से जुड़े नेताओं-पदाधिकारियों को स्नेह देने वाले नेता नहीं रहे. ये सारे बदलाव उनमें तबसे दिखाई दे रहे हैं, जबसे अमर सिंह सपा में आए. अब अमर को भी सपा से बाहर हुए जमाना हो गया, लेकिन मुलायम ने एक बार जो ढर्रा पकड़ लिया, उसे फिर नहीं बदला. उनका वह धोबी पाट अब नहीं दिखता, जिससे सामने वाला चारों खाने चित्त हो जाता था. उम्र बढ़ने के साथ मुलायम की हनक-धमक कम हो गई है. अब दबाव डालकर उनका निर्णय बदलवा लिया जाता है. जैसा कि हाल में सुल्तानपुर के लम्हुआ विधानसभा क्षेत्र में देखने को मिला, जहां पहले संतोष को टिकट दिया गया, दबाव पड़ा तो संतोष का टिकट काटकर अनिल पांडेय को दे दिया गया. अनिल तैयारी करने लगे, तभी दोबारा संतोष को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. फिर अनिल के नाम की घोषणा हुई और अंत में सुरभि शुक्ला को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया. सपा प्रमुख को क़रीब से जानने वालों का कहना है कि नेताजी बात के धनी हुआ करते थे, उनकी बात पत्थर की लकीर होती थी, इसकी वजह से उन्हें कई बार नुक़सान भी उठाना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी इसकी चिंता नहीं की. यह बात अब नेताजी में नहीं रही. इसी का फायदा उनका परिवार उठा रहा है. दबाव के चलते उन्होंने चालीस प्रत्याशियों के टिकट बांटने के बाद काट दिए, जबकि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ. मुलायम को कुछ फैसले परिवार के दबाव में लेने पड़ रहे हैं तो कई फैसले बदलने पड़ रहे हैं. वह पत्नी साधना की चचेरी बहन मधु गुप्ता को लखनऊ का मेयर और सांसद बनाने की भी कोशिश कर चुके हैं. मधु के डॉक्टर पति अशोक कुमार गुप्ता मुलायम की मेहरबानी से सूचना आयुक्त रह चुके हैं. परिवारवालों की महत्वाकांक्षा मुलायम सिंह पर भारी पड़ रही है. ताज़ा मिसाल है, उन्हें अपने सा़ढू प्रमोद गुप्ता (साधना के बहनोई) को टिकट देना पड़ा, जिन्हें औरेया ज़िले की विधूना सीट से कई नेताओं की दावेदारी खारिज कर सपा प्रत्याशी बनाया गया. उम्मीद है कि वह अपनी दूसरी बहू अपर्णा के लिए भी कोई राह ज़रूर निकालेंगे.

तौर-तरीक़ों में बदलाव ने उन्हें तन्हा कर दिया है. सपा के खांटी (समर्पित) नेता उनसे अलग हो चुके हैं. बेनी प्रसाद वर्मा एवं राजबब्बर जैसे नेताओं की बेरुख़ी ने मुलायम को कहीं का नहीं छोड़ा. जो नेता गए, उनमें से आजम को छोड़ किसी ने दोबारा पार्टी की तऱफ रुख़ नहीं किया. आजम की दूसरी पारी भी कोई खास कमाल नहीं कर पाई. उनके विवादास्पद बयानों से मुसलमान ख़ुश तो नहीं हो रहे, लेकिन हिंदू मतदाता सपा से नाराज़ होते जा रहे हैं. आजम सपा के लिए कितने अहम हैं, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि विधानसभा चुनाव प्रचार के लिए उनकी कहीं से मांग नहीं हो रही है. लोग मुलायम और अखिलेश के अलावा किसी नेता को प्रचार के लिए ज़्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं, चाहे शिवपाल यादव हों या फिर मोहन सिंह. अखिलेश की तेजी और आजम की वापसी के बीच शिवपाल अलग-थलग पड़ गए हैं. आजम की वापसी और पार्टी में जगह-जगह दख़लंदाज़ी ने रशीद मसूद जैसे नेताओं को बाग़ी बना दिया. मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए आजम खां पर नेताजी का ज़रूरत से ज़्यादा विश्वास कहीं सपा की लुटिया न डुबो दे, इस बात पर पार्टी के अंदर बहस होने लगी है. आजम के कारण अहमद हसन जैसे क़द्दावर नेताओं ने ख़ुद को किनारे कर लिया.

मुलायम चौतरफा परेशानियों से घिरे हुए हैं. कल्याण के कारण उनसे मुसलमान नाराज़ हैं तो छोटे भाई अमर सिंह की बेवफाई के बाद पार्टी धन संकट से भी जूझ रही है. पैसे की कमी के कारण प्रचार-प्रसार का काम ठप्प पड़ा है. आर्थिक तंगी से जूझ रही समाजवादी पार्टी को अपने ख़र्चों में कटौती करनी पड़ रही है. बसपा के विज्ञापन प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक छाए हुए हैं, लेकिन सपा के पास विज्ञापनों के लिए पैसा नहीं है. अमर के रहते सपा को कभी आर्थिक मोर्चे पर परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था. दुश्वारियों और बदलती सोच ने समाजवाद के लंबरदार मुलायम को अविश्वसनीय बना दिया है. कभी अंग्रेजी के कट्टर विरोधी रहे नेताजी आजकल अंग्रेजी के मोह में इतने फंस गए हैं कि उन्होंने अपनी वेबसाइट ही अंग्रेजी में लांच कर दी. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही कहते हैं कि यह बदलाव स्वाभाविक है. घर में कान्वेंट स्कूलों में पढ़े बच्चों की संख्या बढ़ रही है तो मुलायम कैसे अलग रह सकते हैं. सपा प्रमुख भले ही स्वयं को पिछड़ों का नेता कहते हों, लेकिन जब उनके परिवार में कोई रिश्ता जुड़ता है तो वह ऊंची जाति वालों से जुड़ता है. वह घर से लेकर बाहर तक अगड़ों से घिरे हैं तो पिछड़ों का दर्द कैसे बांट और समझ सकते हैं. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी कहती हैं कि मुलायम सिंह प्रदेश की जनता, ख़ासकर मुसलमानों को काफी समय तक धोखे में रखकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहे, लेकिन अब उनका फरेब चलने वाला नहीं है. वह एक्सपोज हो चुके हैं. बसपा प्रवक्ता ने कहा कि सपा की राजनीतिक हांडी बार-बार नहीं चढ़ने वाली. सपा में कोई दम नहीं रह गया है, वह बाप-बेटों और भाइयों की पार्टी बनकर रह गई है. पूर्व मुख्यमंत्री एवं जनक्रांति पार्टी के अध्यक्ष कल्याण सिंह ने कहा मुलायम सिंह मौक़ापरस्ती की राजनीति करते हैं. उनके अगल-बगल बैठे लोगों ने उन्हें कठपुतली बनाकर रख दिया है. मुलायम सिंह को जनता से अधिक अपने परिवार की चिंता है. उसी चिंता में वह अपना सब कुछ खोते जा रहे हैं, उनका समाजवाद परिवार तक सिमटता जा रहा है.
सामंतवादी मुलायम!

मुलायम सिंह को नई उपमा मिली है सामंतवादी होने की. यह उपाधि उनके क़रीबी दे रहे हैं. बाराबंकी के सपा नेता छोटेलाल यादव खुलेआम कहते घूम रहे हैं कि सामंतवादी मुलायम फॉरवर्ड (अगड़ों) की राजनीति करने लगे हैं. उनका (छोटेलाल) टिकट काटकर नेताजी ने बसपा प्रत्याशी संग्राम सिंह के कहने पर उनके एक कारिंदे धर्मराज सिंह को टिकट बेच दिया, ताकि संग्राम सिंह की जीत पक्की हो सके.
शादी में राजनीति के रंग

मुलायम सिंह यादव के दूसरे बेटे की शादी अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है. इस शादी में उन्होंने पैसा पानी की तरह बहाया, वहीं मेहमानों में कुछ ऐसे चेहरे शामिल थे, जिनके वहां होने की उम्मीद कम की जा रही थी यानी अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और उद्योगपति अनिल अंबानी. इन तीनों की मुलाकात अमर सिंह के मार्फत मुलायम से हुई थी. अमर सिंह की अनुपस्थिति में इन लोगों की मौजूदगी का लोग अपने-अपने हिसाब से आकलन करते रहे. अमर सिंह से राजनीतिक दुश्मनी का रंग मुलायम के व्यक्तिगत जीवन में भी दिखा. मुलायम ने बहू भोज कार्यक्रम में सभी दलों के नेताओं को बुलाया था, लेकिन बसपा नेता आने की हिम्मत नहीं जुटा सके. जो आए भी तो अपनी गाड़ी का झंडा उतार कर. नौकरशाहों ने आमंत्रण के बाद भी अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई. उन्हें डर था कि सरकार नाराज़ हो सकती है. कुछ ऐसे अधिकारी ज़रूर दिखे, जो मायाराज में किनारे पड़े हैं और मुलायम सरकार बनने की आस लगाए बैठे हैं. कहा जा रहा है कि बहू भोज कार्यक्रम में सरकार की ख़ु़फिया नज़र लगी थी, क्योंकि एलआईयू के लोग कार्यक्रम स्थल के आसपास टहलते देखे गए. वैवाहिक कार्यक्रम में जिन नेताओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें भाजपा के राजनाथ सिंह, कांग्रेस के प्रमोद तिवारी एवं सांसद जगदंबिका पाल प्रमुख थे.
कुछ छूटे तो कई ने किनारा किया

कभी समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता उसके प्राण हुआ करते थे. समाजवाद का झंडा लेकर मुलायम जिस तऱफ चल पड़ते, उनके पीछे चलने वालों की भीड़ लग जाती. किसी को भी चंद मिनटों में अपना मुरीद बना लेने की महारथ रखने वाले मुलायम की आवाज़ में दम था और जनता की नब्ज़ पर मज़बूत पकड़. मुलायम को कोई धरती पुत्र कहता तो कोई मुल्ला मुलायम. वह समाजवाद का ऐसा चेहरा थे, जिसमें लोगों को राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण का अक्स दिखता था. क़द के छोटे और इरादों के पक्के मुलायम जब चाहते, कार्यकर्ताओं को साथ लेकर किसी के ख़िला़फ भी हल्ला बोल देते थे. उन्होंने कई लोगों को ज़मीन से उठाकर आसमान पर बैठा दिया. केंद्र में उनकी तूती बोलती थी, वामपंथी उन पर भरोसा करते थे और कांग्रेसी भी मौक़ा पड़ने पर उनसे हाथ मिलाने से परहेज नहीं करते थे. भाजपा को मुलायम सांप्रदायिक पार्टी कहकर चिढ़ाते, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर उससे हाथ भी मिला लेते. 1992 में अयोध्या मुद्दे पर उनके द्वारा बोला गया वाक्य परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा…एक ऐसा डायलॉग बन गया, जिसके बारे में आज भी चर्चा सुनने को मिल जाती है. कुछ लोग मानते हैं कि अयोध्या विवाद में हिंदुओं को उकसाने में मुलायम के उक्त डायलॉग ने अहम भूमिका निभाई थी. इसी बयान के बाद कट्टर हिंदूवादी ताक़तें मज़बूत हो गईं, जिसकी परिणति बाबरी मस्जिद ध्वंस के रूप में हुई. लंबे समय तक प्रदेश और देश की राजनीति में अहम किरदार निभाने वाले मुलायम के पास कभी साथियों की कमी नहीं रही. सभी वर्ग के नेता उनके साथ जुड़े हुए थे. वह सबको उचित सम्मान देते थे. राजबब्बर, बेनी प्रसाद वर्मा, जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह, सुरेंद्र मोहन, अहमद हसन, अशोक वाजपेयी, अमर सिंह, किरण पाल, आजम खां, श्यामा चरण गुप्त, राम नारायण साहू ,रेवती रमण सिंह, ओम प्रकाश सिंह, राजा भैया, राम गोपाल यादव, रशीद मसूद एवं सलीम शेरवानी आदि दमदार नेताओं की एक लंबी-चौड़ी फौज हुआ करती थी. इन्हें साथ लेकर मुलायम ने राजनीति में कई मुक़ाम हासिल किए, लेकिन आज इनमें से कई उनका साथ छोड़कर चले गए हैं, वहीं कुछ ने पार्टी में होते हुए भी ख़ुद को किनारे कर लिया. कभी जाटों के नेता किरण पाल सपा प्रमुख की ताक़त हुआ करते थे. उनके सहारे मुलायम ने कई लड़ाइयां जीतीं, लेकिन अब वह बाहर हैं. मुस्लिम चेहरे के नाम पर अब आजम खां ही दिखाई देते हैं. अहमद हसन जैसे नेता शो पीस बनकर रह गए हैं. ब्राह्मण नेता जनेश्वर मिश्र का निधन हो चुका है और अशोक वाजपेयी ने ख़ुद को हरदोई तक सीमित कर लिया है. दलित चेहरे विशंभर प्रसाद और श्याम लाल रावत अब कहीं नहीं दिखते. सपा के वैश्य नेताओं में वेद प्रकाश अग्रवाल अग्रणी हुआ करते थे, वह भी पार्टी से अलग हो गए हैं. एक अन्य वैश्य नेता श्यामा चरण गुप्त ने अपना दायरा सीमित कर लिया है. पिछड़ों को लुभाने के लिए सपा प्रमुख ने बेनी प्रसाद वर्मा एवं राम नारायण साहू को मोर्चे पर लगा रखा था. बेनी कांगे्रसी हो चुके हैं और साहू भगवा रंग में रंग चुके हैं. गाजीपुर के ओम प्रकाश सिंह भी कुछ खास नहीं कर पा रहे हैं. आजम खां और शिवपाल यादव के बीच छत्तीस का आंकड़ा है. आजम के चलते रामपुर की सांसद जया प्रदा भी मुलायम से दूर हो गईं. कन्नौज के छोटे सिंह यादव, गुन्नौर (बदायूं) की उर्मिला यादव, विनोद उर्फ कक्का एवं महाराज सिंह यादव जैसे दबंग नेता भी पार्टी से दूर चले गए.
एक और पुराना साथी दूर हुआ

आजम खां से नाराज़ और मुलायम की चुप्पी से दु:खी पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं सांसद रशीद मसूद ने समाजवादी पार्टी से किनारा कर लिया. अब वह कांगे्रस का परचम लहराएंगे. उन्हें आजम खां से नाराज़गी के अलावा मुलायम सिंह की वादाख़िला़फी का दु:ख है. उन्होंने सपा की सदस्यता के साथ ही राज्यसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया. ऐन चुनाव के समय सपा से बग़ावत करके कांगे्रस का हाथ मज़बूत करने वाले रशीद मसूद को केंद्र से लालबत्ती और पुन: राज्यसभा सदस्य बनने का तोह़फा मिल सकता है. मसूद ने कहा कि मुलायम अपने पुराने वफादारों के साथ अखिलेश और आजम के माध्यम से ग़लत बर्ताव करा रहे हैं. उन्होंने शिवपाल यादव के साथ हो रहे व्यवहार पर भी चिंता जताई. मसूद ने कहा कि सेहत ठीक न होने और याददाश्त कमजोर हो जाने से मुलायम सिंह की पार्टी पर पकड़ नहीं रही. पार्टी नादान लोगों के क़ब्ज़े में है. आजम खां सपा को बाहर रहकर बर्बाद नहीं कर पाए तो भीतर आकर बर्बाद करने में लगे हैं. मुसलमानों और अति पिछड़े हिंदुओं को आरक्षित कोटे में आबादी के अनुसार आरक्षण देने की मांग उठाते हुए मसूद ने कहा कि उन्हें 1997 में भी पार्टी से निकाल दिया गया था. बाद में इस मुद्दे पर सार्वजनिक माफी मांगने की बात करके मुलायम सिंह ने उन्हें मनाया और कहा कि वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग छोड़ दें, सरकार बनने पर पिछड़े मुसलमानों और अति पिछड़े हिंदुओं को आरक्षण दे दिया जाएगा. 2003 से 2006 तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने इस तऱफ ध्यान नहीं दिया. सहारनपुर से पांच बार लोकसभा सदस्य और दो बार राज्यसभा सदस्य रहे रशीद मसूद ने कहा, मैंने मुलायम सिंह से टिकटों के बंटवारे में मुसलमानों के साथ हुई ज़्यादती सुधारने को कहा, लेकिन आजम के कारण कोई असर नहीं पड़ा. कई ऐसी सीटें हैं, जहां मुसलमानों की तादाद ज़्यादा होने के बावजूद दूसरे लोगों को टिकट दिए गए. शिवपाल यादव के साथ हो रहे बर्ताव के आरोप में दम लगता है. पिछले कुछ दिनों से सपा में जो कुछ चल रहा है, उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता. बसपा के कद्दावर नेता नसीमुद्दीन के भाई हसीनुद्दीन को समाजवादी पार्टी में शामिल करने के नाम पर जो नाटक हुआ, उससे पार्टी की काफी किरकिरी हुई. सपा में पहली बार किसी फैसले पर ऐसा विरोधाभास दिखा. विवाद की शुरुआत बीते 13 नवंबर को हुई. इस दिन कानपुर के सर्किट हाउस में हसीनुद्दीन पहली बार सार्वजनिक रूप से शिवपाल यादव के साथ दिखे. घोषणा की गई कि वह पार्टी में शामिल हो गए हैं, लेकिन 20-25 दिनों के बाद सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव की ओर से जारी बयान में इसका खंडन कर दिया गया. अखिलेश ने जिस तरह चाचा शिवपाल के फैसले को पलटा, उसी तरह शिवपाल ने भी सार्वजनिक रूप से कह दिया कि उन्होंने हसीनुद्दीन को पार्टी में शामिल कराया और वह उनके साथ हैं. इस संबंध में जब मीडिया ने सवाल उठाए तो अखिलेश ने इसे पार्टी का अंदरूनी मामला कहकर पल्ला झाड़ लिया.

चाचा-भतीजे के इस विवाद की आग में कुछ माह पूर्व सपा में लौटे एक नेता घी डालने का काम कर रहे हैं. कहा जाता है कि अखिलेश को क्रांति रथ पर सवार कराने के पीछे इन्हीं नेताजी का दिमाग़ था. उन्होंने ऐसा माहौल बना दिया, मानो अखिलेश मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. इस बीच कुछ लोगों के टिकट काटने में उक्त नेताजी का नाम एक बार फिर चर्चा में आया. सपा का मुस्लिम चेहरा समझे जाने वाले इन नेताजी के चलते शिवपाल यादव के कुछ लोगों के टिकट काट दिए गए, शिवपाल ने विरोध भी किया, लेकिन सपा प्रमुख इसलिए कुछ बोल नहीं सके कि कहीं मुश्किल से बनी बात बिगड़ न जाए, क्योंकि सपा को मुसलमानों को रिझाने के लिए एक मुस्लिम चेहरे की दरकार है. रशीद मसूद ने कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 135 सीटों पर मुख्य मुक़ाबला कांग्रेस-रालोद गठबंधन और बसपा के बीच होगा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने का विरोध करने वाली समाजवादी पार्टी 8-10 सीटें भी जीत ले तो यह उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी. सहारनपुर, मुरादाबाद, मेरठ, अलीगढ़ और आगरा मंडल में कांग्रेस-रालोद गठबंधन को अधिकांश सीटें मिलेंगी. भाजपा तीसरे और सपा चौथे स्थान पर रहेगी.

द्रौपदी का चीरहरण होता रहा धृतराष्ट्र बैठे रहे

नई दिल्‍ली. गुरुवार रात राज्यसभा में लोकपाल बिल पर मतदान से पीछे हटी कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार पर शुक्रवार को हमले तेज हो गए हैं। एक तरफ से मुख्य विपक्षी दल बीजेपी ने सरकार से इस्तीफा मांगा है तो वहीं, टीम अन्ना ने अब सिर्फ लोकपाल के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र को बचाने के लिए आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। टीम अन्ना के वरिष्ठ सदस्य शांति भूषण ने गुरुवार रात राज्यसभा में प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि गुरुवार रात जितने लोग भी टीवी देख रहे थे, उन्होंने देखा कि द्रौपदी का चीरहरण होता रहा और धृतराष्ट्र बैठे रहे।

टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, 'सरकार का मजबूत लोकपाल लाने का दावा खोखला साबित हुआ। लोकसभा के अंदर जो कानून आया, वह बहुत कमजोर था। उसका कोई फायदा नहीं था। बहुमत का गलत इस्तेमाल करके गलत बिल पास करवा लिया गया। लेकिन सरकार का राज्यसभा में बहुमत नहीं है। विपक्ष ने187 संशोधन दिए। लेकिन मोटे तौर पर 3 संशोधनों पर आम राय थी। इसमें सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाना, लोकपाल का चयन और हटाना और लोकायुक्त को इस कानून से बाहर रखा जाए। अगर गुरुवार को वोटिंग होती तो तीनों पास हो जाते। अगर ऐसा होता तो एक ऐसा लोकपाल निकल सकता था, जो शुरुआत करने लायक लोकपाल होता। लेकिन सरकार की मंशा कुछ और थी। लालू प्रसाद यादव और आरजेडी को सामने किया गया। शाम से ही टीवी चैनलों पर आने लगा कि सदन की कार्यवाही बाधित की जाएगी। बयानों को लंबा खींचा गया और सदन की कार्यवाही होते-होते 12 बज गए। संसदीय प्रावधानों का गलत इस्तेमाल करके संसद की कार्यवाही बाधित की। यह पूरी तरह से सरकार की साजिश थी। यह संसद और इस देश की जनता के साथ साजिश है।'
दूसरी तरफ, बीजेपी ने राज्‍यसभा की कार्यवाही स्‍थगित होने के लिए सरकार को जिम्‍मेदार ठहराया है। अरुण जेटली ने कहा कि मजबूत लोकपाल बिल पारित करना सरकार का वादा था लेकिन कांग्रेस और यूपीए ने देश को एक मजबूत लोकपाल से वंचित किया। जेटली ने कहा, 'बीजेपी ने सरकार के कमजोर बिल का समर्थन नहीं किया और कहा था कि इसमें संशोधन कर पारित करेंगे। बीजेपी ने अपनी रणनीति पहले ही तय कर दी थी। तीन मुद्दों पर पूरा सदन एकमत था। जब सरकार के वरिष्‍ठ नेता यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वित्‍त मंत्री प्रणब मुखर्जी संसद में मौजूद थे, ऐसे में सरकार लोकपाल पर वोटिंग से भागने का प्रयास करती है। यह विचित्र स्थिति है। सरकार ने रुकावट पैदा कर खुद को बचाया है।'
सुषमा स्‍वराज ने कहा कि सदन का सत्र खत्‍म होने के बाद दोनों सदनों के नेताओं के संयुक्‍त प्रेस कांफ्रेंस की परंपरा है लेकिन इस सत्र में सरकार की किरकिरी हुई और जाते जाते यह सरकार की मुंह पर कालिख पोत गया। उन्‍होंने राज्‍यसभा में गुरुवार की रात हुई घटना को ‘लोकतंत्र का चीरहरण’ करार दिया। मैं तो यहां तक कहता हूं कि इस साजिश में प्रधानमंत्री भी शामिल थे। उन्होंने कहा कि सरकार के पास तीन विकल्‍प थे। सबसे सहज यह कि ज्‍यादा संशोधन आए तो सेलेक्‍ट कमेटी के पास भेजने का विकल्‍प है। सरकार इस बिल को लाना ही नहीं चाहती है। सरकार को तुरंत इस्‍तीफा देना चाहिए और नए चुनाव कराने चाहिए।

इन महिला राजनीतिज्ञ की सुंदरता के कायल हैं सभी













राजनीति में महिलाओं का होना कोई नई बात नहीं है। अलग-अलग देशों में ऐसी ढ़ेरों महिला राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होने अपनी बुद्धिमता के बल पर अपनी अलग पहचान बनाई है। साथ ही कई ऐसी कुशल महिला राजनीतिज्ञ भी हैं, जिनकी पहचान उनके काम के साथ-साथ उनकी खूबसूरती के कारण भी है।
अगर आप जानना चाहते हैं कि कौन-कौन सी महिला राजनीतिज्ञ ऐसी हैं, जो अपनी सुंदरता के कारण चर्चा में रहती हैं तो नीचे की तस्वीरें देखें...

1. हिना रब्बानी (पाकिस्तानी विदेश मंत्री)



2. शेर्लोट मैरी पोमलाइन कैसीरागी (वेलेंटिनोइस की रानी)


3. रैनिया अल अब्दुल्लाह (जॉडर्न के किंग अब्दुल्लाह द्वितीय की पत्नी)


4. कैथरीन एलिजाबेथ मिडलटन (प्रिंस विलियम की पत्नी)


5. यूरी फुजीकावा (जापान के हैकनोह काउंसिल की सदस्य)



6. ओर्ली लेवी अबेकैसिस (इज़राइल की राजनीतिज्ञ)


7.मारिया रोसारिया करफग्ना (इटली की राजनीतिज्ञ)


8. साराह पॉलिन (अमेरिकी राजनीति की सबसे विवादास्पद राजनीतिज्ञ)


9. यूलिया वोलडिमरिवना टिमोशैंको (यूक्रेन)


10. लेटीज़िया (अस्टूरियास की राजकुमारी)

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

जल, जंगल और आसमान सब खा रहे हैं शिवराज चौहान



विनोद उपाध्याय

चाल, चरित्र और चेहरा जैसी नैतिक बातें करने वाली भाजपा और शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली इस सरकार की चाल लडखड़़ा चुकी है। चरित्र, कांग्रेसियों से ज्यादा बिगड़ चुका है और असली चेहरा भी धीरे-धीरे सामने आ चुका है। इसी सरकार से जुड़े लोग, मसलन प्रदेश के मंत्री, निगम-मंडल अध्यक्ष, विधायक और सांसद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व भ्रष्टाचार की वैतरणी में कूद-कूद कर डुबकियां लगा रहे हैं।

मध्य प्रदेश में जब शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने प्रदेश में सुशासन लाने के लिए सात तरह के माफियाओं पर अंकुश लगाने की कार्ययोजना बनाई थी लेकिन शासन और प्रशासन की मिलीभगत से प्रदेश में जमीन, शराब, वन, ड्रग, खनिज, गोवंश और गरीबों को मिलने वाले केरोसिन और अन्य सामग्री को पात्र व्यक्तियों तक नहीं पहुंचने देने वाले जैसे सात तरह के माफिया लूट मचाए हुए है। तमाम सेक्टरों में भ्रष्टाचार के बड़े मामलों के साथ ही प्रदेश में खनिज माफिया ने भी इस सरकार के राज में अपने आप को स्थापित कर लिया है। प्रदेश में अब करीब दस हजार करोड़ का खनिज घोटाला सामने आया है जिसमें न सिर्फ बड़ी माइनिंग कंपनियों ने बल्कि भाजपा के छोटे-बड़े नेताओं ने भी करोड़ों के खेल कर दिए हैं। पूरे प्रदेश में माइनिंग माफिया सक्रिय है। माफिया में केवल खनिज के कारोबारी ही नहीं हैं। बल्कि प्रदेश के अधिकांश मंत्री, भाजपा विधायक, सांसद और संगठन के पदाधिकारियों और उनके रिश्तेदार नेता से बड़े व्यापारी बन गए हैं।

मध्य प्रदेश में खनिज माफिया का कहर सबसे अधिक बुंदेलखंड के पठार पर पड़ रहा है। बुंदेलखंड इलाके की सबसे बड़ी कही जाने वाली सिद्धबाबा की पहाड़ी कभी समुद्र तट से 1,772 मीटर ऊंची हुआ करती थी, लेकिन इसके भीतर छिपे फौलादी ग्रेनाइट के खजाने के कारण इसे पाताल तक खोदा जा रहा है। आधिकारिक तौर पर महोबा से सालाना 65 करोड़ रुपए का ग्रेनाइट कारोबार होता है, लेकिन कबरई मंडी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि यह मंडी साल में कम से कम 250 करोड़ रुपए पत्थर सप्लाई करती है। इसे महज आंकड़ों का फर्क मान कर खारिज नहीं कर सकते। हिंदी पट्टी के पांच राज्यों में पड़ताल से पता चलता है कि महोबा का हाइवे नंबर 76 तो अवैध खनन की महज एक मिसाल है।

मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश सीएजी की एक रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2005-06 से 2009-10 के दौरान प्रदेश में खनन से जुड़ी गड़बडिय़ों के कारण प्रदेश सरकार को 6,906 मामलों में 1496.29 करोड़ रुपए राजस्व का नुक्सान हुआ। मध्य प्रदेश में पिछले छह साल में अवैध खनन के 24,630 मामले सामने आए। 23,393 मामले अदालतों में दर्ज हुए हैं, यह देश के अन्य सभी राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। मध्य प्रदेश देश का सबसे प्रमुख हीरा उत्पादक राज्य है। इसके अलावा यहां कॉपर (तांबे) के आधिक्य वाला पाइरोफाइलाइट और डाइसपोर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। माफिया साढ़े 37 लाख घन मी. पत्थर रोजाना पहाड़ों से निकालते हैं। इसके लिए वह एक इंच होल में विस्फोटक के बजाय छ: इंच बड़े होल में बारूद भरकर विस्फोट करते हैं। जब यह विस्फोट होते हैं तो आस-पास 15-20 किमी की परिधि में बसने वाले वन क्षेत्रों के वन्य जीव इन धमाके की दहशत से भागने लगते हैं व कुछ की श्रवण क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। इसके अतिरिक्त विस्फोट से स्थानीय जमीनों में जो दरारें पड़ती हैं उससे ऊपरी सतह का पानी नीचे चला जाता है और भूगर्भ जल बाधित होता है।

इस संपूर्ण बुन्देलखंड ग्रेनाइट करोबार जो कि यहां कुटीर उद्योग के नाम से चल रहा है, में 1500 ड्रिलिंग मशीनें, पांच सैकड़ा जेसीबी, 20 हजार डंपर, 2000 बड़े जनरेटर, 50 क्रेन मशीन और हजारों चार पहिया ट्रेक्टर प्रतिदिन 6 करोड़ 83 लाख, पांच सौ लीटर डीजल की खपत करके और ओवरलोडिंग करते हैं। इन विस्फोटों से रोजाना 30-40 टन बारूद का धुआं यहां के वायुमंडल में घुलकर बड़ी मात्रा में सड़क राहगीरों व खदानों के मजदूरों को हृदय रक्तचाप, टीबी, श्वास-दमा का रोगी बना रहा हैं। इसके साथ-साथ 22 क्रशर मशीनों के प्रदूषण से प्रतिदिन औसतन 2 लोग की आकस्मिक मृत्यु, 2 से तीन लोग अपाहिज व 6 व्यक्ति टीबी के शिकार होते हैं।

जल, जंगल, ज़मीन और आसमान। ऐसी कोई जगह नहीं जो घोटालेबाज़ों और माफियाओं की गिद्ध दृष्टि से बची हो। प्राकृतिक संसाधनों की लूट के इस खेल में सरकार, विपक्ष, पूंजीपतियों समेत हर वह आदमी शामिल है जिसके संबंध सत्ता में बैठे लोगों से हैं और जिनके पास धनबल, बाहुबल है। मध्य प्रदेश में ऐसे ही खनिज माफिया और घोटालेबाजों ने सरकारी तंत्र की मिलीभगत से 10,000 करोड़ रूपए से अधिक का अवैध उत्खनन किया है और उनकी लूट का सिलसिला अभी भी जारी है।

सुशासन की दुहाई देने वाली शिवराज सरकार भी अवैध खनन के धंधे में दागदार साफ-साफ दिख रही है। शिवराज के दो मंत्रियों पर खनन माफिया को खुलेआम संरक्षण देने का आरोप है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि ये अवैध खनन करा रहे हैं। ये दोनों मंत्री शिवराज के चहेते भी हैं। कोई विभाग खनिज माफिया पर कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। तमाम आरोपों के बावजूद तमाम स्तरों पर सत्यता साबित होने पर भी शिवराज सिंह चौहान अपने इन मंत्रियों को बचाने की कोशिश में लगे हैं। सतना के वन अधिकारी के मुताबिक उचेहरा और नागौद वनक्षेत्र में पचास सालों से अवैध उत्खनन होता आ रहा है। जब भी वन विभाग का अमला कार्रवाई करने जाता है तो वनकर्मियों पर हमला कर दिया जाता है। वन अधिकारियों के मुताबिक यहां कानून का नहीं बल्कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के करीबी मंत्री नागेंद्र सिंह के भतीजे का राज चलता है। सूबे में भाजपा के लोक निर्माण मंत्री नागेंद्र सिंह और खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ला पर आरोप है कि इनकी मिलीभगत से अवैध खनन का कारोबार रफ्तार से चल रहा है। इस मामले के शिकायतकर्ता के मुताबिक, बरसों से अवैध उत्खनन चल रहा है। मंत्री नागेन्द्र सिंह के भतीजे रूपेन्द्र सिंह उर्फ बाबा राजा जिन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

शिवराज के सुराज में करोड़ों की अवैध खुदाई हो रही है। वन विभाग के एडिशनल चीफ कंजरवेटर जगदीश प्रसाद शर्मा ने अवैध खनन पर राज्य के चीफ फॉरेस्ट कंजर्वेटर को सौंपी रिपोर्ट में बाबा राजा का जिक्र किया है। जांच रिपोर्ट के मुताबिक सतना के जंगलों में बाबा राजा का काम चल रहा है। बाबा राजा यानी एमपी के पीडब्लूडी मंत्री नागेन्द्र सिंह का भतीजा। इलाके में पत्थर का अवैध खनन बगैर वन अधिकारियों की मिलीभगत के मुमकिन नहीं। रिपोर्ट में लिखा है कि इस खनन की जांच अगर कर्नाटक के बेल्लारी केस की तर्ज पर की जाए तो वन क्षेत्र में करोड़ों रुपए के पत्थरों की चोरी और रॉयल्टी चोरी के रूप में सरकार को पहुंचाया गया करोड़ों का नुकसान उजागर हो सकता है। एसीएफओ की इस रिपोर्ट से हड़कंप है। शिकायतकर्ता ने इस मामले की सीबीआई जांच की मांग की है। मामले की परतें खुली तो कुछ और सफेदपोशों के नाम सामने आने से भी इनकार नहीं किया जा सकता। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास एक महीने से रिपोर्ट पड़ी है लेकिन मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई अब तक नहीं की गई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। मैं पूरी रिपोर्ट जब तक नहीं देख लेता, तब तक कुछ नहीं कह सकता।

मध्य प्रदेश कांगे्रस के मीडिया विभाग के अध्यक्ष माणक अग्रवाल ने कहा कि कांग्रेस के प्रदेश प्रतिनिधि मनोज पाल सिंह ने जबलपुर जिले की सिहोरा तहसील के ग्राम झींटी में 600 करोड़ के अवैध खनन के घोटाले की लोकायुक्त कार्यालय को शिकायत की है। 205 पेज के महत्वपूर्ण दस्तावेज सहित सात पृष्ठों की शिकायत में लोकायुक्त जांच की मांग की गई है। इसमें तथ्यों के आधार पर कहा गया है कि मध्यप्रदेश में कर्नाटक के बेल्लारी खनिज घोटाले से भी बड़ा घोटाला संबंधित मंत्रियों और अधिकारियों की मिलीभगत से हुआ है। तथ्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि स्वीकृति से कई गुना अधिक लौह अयस्क निकाला गया है। वन क्षेत्र में तथा आदिवासियों की जमीनों पर भी मनमाना खनन कर सरकार और आदिवासियों को करोड़ों की हानि पहुंचाई गई है। भ्रष्टाचार के इस बड़े खेल में रॉयल्टी वसूली की आड़ में करोड़ों के अवैध खनन को रफा-दफा कर पट्टाधारियों को अनुचित लाभ भी पहुंचाया गया है।

अग्रवाल के मुताबिक ग्राम झींटी के इस खनिज घोटाले के संबंध में कार्रवाई के लिए कांगे्रस ने 14 अक्टूबर 2011 को श्यामला हिल्स थाने में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों और अधिकारियों के विरूद्ध एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके बाद 19 अक्टूबर 2011 को इस बारे में न्यायालय में भी एक परिवाद दाखिल किया गया है। कांगे्रस नेता मनोज पाल सिंह ने इस प्रकरण के कुछ और महत्वपूर्ण दस्तावेज प्राप्त कर 11 नवंबर को लोकायुक्त को शिकायत सौंपी है। इस शिकायत में खनिज घोटाले के भीतर की गहरी परतों को खोला गया है। शिकायत में उल्लेख किया गया है कि संबंधित कंपनियों और व्यक्तियों को खनिज उत्खनन के पट्टे देने की प्रक्रिया भी दोषपूर्ण रही है। प्रदेश में खनिज आधारित उद्योग लगाने के मौखिक आश्वासन पर आवेदकों की आर्थिक स्थिति की जांच पड़ताल किए बिना उत्खनन की स्वीकृतियां जारी की गई हैं। ऐसा लगता है, इस घोटाले को पट्टेधारियों से सांठगांठ करके मंत्रियों और अधिकारियों ने काफी सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया है।

कांगे्रस के मीडिया विभाग के अध्यक्ष का कहना है कि इस बात के पुष्ट प्रमाण है कि खनिज पट्टेधारियों ने अनुमति से अधिक क्षेत्र में खनिज का उत्खनन कर बेजा लाभ कमाया है। अवैध उत्खनन के क्षेत्र में वन भूमि और आदिवासियों की भूमि भी शामिल है। इस तरह खनिज पट्टाधारियों ने पर्यावरण संरक्षण अधिनियम और मप्र भू-राजस्व संहित की धारा 165 का भी उल्लंघन किया है। संबंधित अधिकारियों द्वारा पट्टाधारियों की इस मनमानी की व्यापक स्तर पर अनदेखी की जाकर भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया गया है। अवैध खनन, जो कि कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है, को नाम मात्र रॉयल्टी लेकर नियमित मान लेने में अधिकारियों के स्तर पर भारी भ्रष्टाचार की बू आ रही है। इस प्रकरण में अधिकारियों ने अपने पद का भारी दुरुपयोग कर पट्टाधारियों को आर्थिक लाभ पहुंचाया है। ग्राम झींटी में हुआ खनिज घोटाला कितना बड़ा है, उसका अनुमान इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि चार पट्टाधारियों को हर साल 80,640 मैट्रिक टन औसतन खनन की अनुमति दी गई थी। किंतु मई 2011 तक इन्होंने 11,96,000 मैट्रिक टन खनिज निकाला, जो स्वीकृत सीमा से लगभग 12 गुना अधिक है।

भंवर में अन्ना





एक सच्ची घटना है- कुत्ता क्यों मरा? पंजाब के सबसे क़द्दावर मुख्यमंत्री थे सरदार प्रताप सिंह कैरो. स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ बड़े क़द्दावर नेता थे. एक बार दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहे थे. उनके साथ उनके संसदीय सचिव देवीलाल भी थे. सरदार कैरो की गाड़ी तेज़ी से भाग रही थी कि एक कुत्ता बीच में आ गया. कुत्ते की मौत हो गई. सरदार कैरो ने थोड़ी दूर जाकर गाड़ी रुकवाई. सड़क किनारे दो चक्कर लगाए और देवीलाल जी को बुलाया. उन्होंने पूछा, देवीलाल ये बताओ कुत्ता क्यों मरा? का़फी सोचने के बाद देवीलाल ने कहा कि कुत्ते तो मरते रहते हैं, यूं ही मर गया होगा. सरदार प्रताप सिंह कैरो ने फिर पूछा, बताओ कुत्ता क्यों मरा? देवीलाल जी खामोश रहे, फिर कहा कि आप ही बताइये. तब सरदार प्रताप सिंह कैरो ने देवीलाल से कहा कि यह कुत्ता इसलिए मरा, क्योंकि यह फैसला नहीं कर पाया कि सड़क के इस किनारे जाना है या उस किनारे. फैसला न लेने की वजह से वह बीच में खड़ा रह गया. अगर इसने फैसला कर लिया होता तो सड़क के इस किनारे या उस किनारे चला गया होता और बच जाता. फैसला नहीं लेने की वजह से यह कुत्ता मारा गया. देवीलाल को राजनीति का मंत्र मिल गया. उन्होंने जीवन भर इसका पालन किया. वह कभी बीच में नहीं रहे. राजनीति में उन्होंने हमेशा फैसला लिया. हमेशा इधर या उधर खड़े रहे. इसी सीख की वजह से वह देश के उपप्रधानमंत्री भी बने.

आंदोलन की शुरुआत से ही सरकार ने यह सा़फ कर दिया कि अन्ना हजारे जिस तरह का लोकपाल बनाना चाहते हैं, वह उसके पक्ष में नहीं है. सरकार के पक्ष को जानते हुए भी जंतर-मंतर के आंदोलन के पहले और बाद में उन्होंने कई चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई हल नहीं निकला. हल इसलिए नहीं निकला, क्योंकि सरकार अपनी ज़िद पर अड़ी थी. जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद संयुक्त बैठक में जो हुआ उससे भी यह सा़फ हो गया कि सरकार टाल-मटोल कर रही है.

अन्ना की समस्या बिल्कुल यही है. वह फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि क्या करें? इधर जाएं या उधर जाएं. वह कभी यात्रा पर निकलने की बात करते हैं, फिर बीच में यात्रा करने का इरादा छोड़ देते हैं. उन्होंने बड़े ज़ोर-शोर से यह ऐलान किया कि संसद सत्र में लोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो फिर से आंदोलन करेंगे, फिर अचानक से चुप हो गए. अन्ना तय नहीं कर पा रहे हैं कि आंदोलन करना है या नहीं. सरकार का समर्थन करना है या नहीं. उत्तर प्रदेश में यात्रा करनी है या नहीं. अन्ना हजारे के फैसला नहीं लेने की वजह से भ्रम की स्थिति बनती जा रही है. इस बीच अन्ना का बयान आया कि अगर सरकार मज़बूत लोकपाल बिल लेकर आ जाएगी तो वह कांग्रेस का समर्थन करेंगे और अगर लोकपाल बिल नहीं आया तो वह भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करेंगे. अन्ना अब तक यह फैसला नहीं कर पाए हैं कि सरकार का समर्थन करना है या नहीं. अन्ना भंवर में हैं. अब तक उन्हें यह समझ में ही नहीं आया है कि सरकार लोकपाल के साथ क्या करना चाहती है, जबकि यह दिन के उजाले की तरह सा़फ है कि सरकार जन लोकपाल बिल लाने के पक्ष में नहीं है. सवाल यह उठता है कि इस तरह के बयान का क्या मतलब है? क्या अन्ना हजारे की नज़र में जनता की ताक़त का कोई महत्व नहीं है? क्या जनता की ताक़त में उनका भरोसा नहीं है? जो लोग अन्ना हजारे के आंदोलन में शामिल हुए वे न तो कांग्रेस के थे और न ही भारतीय जनता पार्टी के थे. यह आम जनता थी. सरकारी तंत्र में मौजूद भ्रष्टाचार से त्रस्त और नाराज़ जनता थी. तो अब यह कहना कि कांग्रेस का समर्थन कर दूंगा, का क्या मतलब है. क्या अन्ना को लगता है कि वह जिसका समर्थन कर देंगे, वह चुनाव जीत जाएगा या जिसका विरोध करेंगे वह चुनाव हार जाएगा. इससे तो दिग्विजय सिंह की यह दलील सही लगती है कि अन्ना और उनकी टीम को चुनाव लड़ना चाहिए.

अन्ना हजारे को यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि रामलीला मैदान के अनशन से वह कुछ हासिल नहीं कर पाए. इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि रामलीला मैदान के अनशन से पहले जो जन लोकपाल बिल की स्थिति थी और जो स्थिति आज है, उसमें कोई अंतर नहीं है. अन्ना हजारे को देश भर में जो समर्थन मिला, उसका फायदा टीम अन्ना नहीं उठा सकी. या यूं कहें कि इस अपार जन समर्थन की ताक़त को आंकने में अन्ना हजारे से चूक हो गई.

जब से अन्ना हजारे ने जन लोकपाल के लिए आंदोलन शुरू किया है, तब से लेकर आज तक ऐसे कई मौ़के आए, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अन्ना ठोस फैसले नहीं ले पाते हैं. आंदोलन की शुरुआत से ही सरकार ने यह सा़फ कर दिया कि अन्ना हजारे जिस तरह का लोकपाल बनाना चाहते हैं, वह उसके पक्ष में नहीं है. सरकार के पक्ष को जानते हुए भी जंतर-मंतर के आंदोलन के पहले और बाद में उन्होंने कई चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई हल नहीं निकला. हल इसलिए नहीं निकला, क्योंकि सरकार अपनी ज़िद पर अड़ी थी. जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद संयुक्त बैठक में जो हुआ उससे भी यह सा़फ हो गया कि सरकार टाल-मटोल कर रही है. फिर भी अन्ना हजारे और उनकी टीम यह ठोस फैसला नहीं कर सकी कि सरकार के खिला़फ जाना है या नहीं. इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार ने अपनी मनमानी की. मजबूर होकर अन्ना को रामलीला मैदान में अनशन करना पड़ा. इस आंदोलन के दौरान सरकार ने उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया. आंदोलन के लिए जगह देने में कई रुकावटें खड़ी कीं. इतना सबकुछ होने के बावजूद अन्ना यह फैसला नहीं कर सके कि सरकार से किस तरह से लड़ना है. इसका नतीजा यह हुआ कि तेरह दिनों तक चला अन्ना का अनशन सरकार के साथ बातचीत में उलझ कर रह गया.

अन्ना हजारे को यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि रामलीला मैदान के अनशन से वह कुछ हासिल नहीं कर पाए. इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि रामलीला मैदान के अनशन से पहले जो जन लोकपाल बिल की स्थिति थी और जो स्थिति आज है, उसमें कोई अंतर नहीं है. अन्ना हजारे को देश भर में जो समर्थन मिला, उसका फायदा टीम अन्ना नहीं उठा सकी. या यूं कहें कि इस अपार जन समर्थन की ताक़त को आंकने में अन्ना हजारे से चूक हो गई. अब हालत यह है कि सरकार वैसा ही बिल लेकर आ रही है, जैसा वह पहले लाना चाहती थी. सरकार ने जो मसौदा तैयार किया है, उसमें प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे से बाहर हैं. सरकारी लोकपाल बिल में केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा और केंद्रीय सतर्कता आयोग को लोकपाल से बाहर रखा गया है. सरकार ने निचले स्तर के अधिकारियों को भी लोकपाल के दायरे से बाहर कर दिया. न्यायपालिका में होने वाला भ्रष्टाचार भी लोकपाल के दायरे में नहीं है. सरकार तो अपनी जगह से हिली नहीं, वह जैसा लोकपाल लाने के लिए पहले से तैयार थी, वैसा ही बिल तैयार किया है. तो अब सवाल पूछना लाज़िमी है कि टीम अन्ना को अनशन से क्या हासिल हुआ. प्रधानमंत्री से पटवारी तक लोकपाल के दायरे में हों, यह मांग कहां ग़ायब हो गई. प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में हों? इस पर अनशन खत्म करने से पहले समझौता क्यों नहीं हुआ? साधारण सा सवाल है. सरकार का जो लोकपाल बिल है, वह क्या जन लोकपाल बिल है. इस सवाल का साधारण सा जवाब है ही नहीं. इसका मतलब यही है कि अन्ना का पिछला आंदोलन सफल नहीं रहा. अन्ना ने पिछला आंदोलन शुरू किया था, तो यह नारा दिया कि जन लोकपाल बिल पास करो. लेकिन तेरह दिनों के बाद टीम अन्ना ने जन लोकपाल बिल को छोड़ दिया और स़िर्फ तीन मांगों तक सीमित रहकर अनशन तोड़ दिया. इन तीन मांगों में प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, सीबीआई, सीवीसी और निचले स्तर के अधिकारी कहां हैं? मामला संसद में चला गया. संसद में बहस हुई, लेकिन किस क़ानून के तहत हुई, यह किसी को पता नहीं है. इस बहस की क़ानून की नज़र में क्या प्रासंगिकता और मान्यता है? राजनीतिक दलों ने इसे सेंस ऑफ द हाउस बताया. लोकसभा की प्रक्रिया के मुताबिक़ इस प्रस्ताव को स्पीकर के समक्ष पेश करना था. क्या इस प्रस्ताव को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने रखा? नहीं, इसे प्रणव मुखर्जी ने रखा. लोकसभा में क्या इन मांगों पर मतदान हुआ? नहीं, सरकार ने पूरी बहस को स्टैंडिग कमेटी के पास भेज दिया. हैरानी की बात तो यह है कि इससे पहले भी अन्ना हजारे स्टैंडिंग कमेटी में अपनी बात कह चुके थे. एक सांसद ने तो जन लोकपाल बिल को ही स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया. मतलब यह है कि जो सुझाव अनशन के बाद स्टैंडिंग कमेटी को दिया गया, वह स्टैंडिंग कमेटी के पास पहले से ही था. इससे सा़फ पता चलता है कि टीम अन्ना से चूक हुई है. इसे भी स्वीकार करने की ज़रूरत है.

कोई भी आंदोलन दलील से नहीं, बल्कि जनभावना से ब़डा बनता है. जन लोकपाल के मामले में भी यही बात लागू होती है. जनभावना के सहारे अन्ना और उनकी टीम सरकार पर भारी प़ड गई. लेकिन जब बात समझौते तक पहुंची, तब दलील के आगे जनभावना कमज़ोर प़ड गई. लोकपाल बिल पास कराने की जल्दबाज़ी में जो कुछ हुआ, उसमें आम आदमी कहीं नहीं है. उधर, अन्ना भी संशय की स्थिति में हैं. भारत भ्रमण और जन जागरण का उनका कार्यक्रम अब तक अधर में है. दूसरी ओर, वह खुद लोकपाल बिल के भविष्य को लेकर दुविधा में हैं.

जिस व़क्त अन्ना हजारे रामलीला में अनशन कर रहे थे, उस समय देश के हर कोने में अनशन चल रहा था. अन्ना के समर्थन में देश में कहां-कहां आंदोलन हुए, यह तो टीम अन्ना को भी पता नहीं होगा. भारतीय नागरिकों ने तो अमेरिका में भी अनशन किया. गांवों और क़स्बों में जो लोग आंदोलन कर रहे थे, उन्होंने तो आंदोलन से पहले अन्ना का नाम तक नहीं सुना था. फिर भी आंदोलन में शामिल हुए. उनकी नाराज़गी सरकारी तंत्र के भ्रष्टाचार के खिला़फ थी. महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली आदि समस्याओं से जूझ रहे लोगों को लगा कि इस आंदोलन की वजह से बदलाव आएगा. सबकुछ बदल जाएगा. यही वजह है कि बच्चे, बूढ़े, नौजवान, औरतें, अमीर-ग़रीब, हर जाति और वर्ग के लोगों ने अन्ना हजारे को समर्थन दिया. हर राजनीतिक दल के समर्थकों के साथ-साथ हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सब अन्ना के आंदोलन में थे. ये लोग स़िर्फ जन लोकपाल के लिए अन्ना को समर्थन नहीं दे रहे थे. अन्ना में लोग गांधी देख रहे थे, जो भारत की तस्वीर बदलने की आशा जगा रहा था. अन्ना के पास यह एक मौका था कि वह इस आंदोलन को स़िर्फ लोकपाल की बजाय व्यवस्था परिवर्तन और सरकारी तंत्र के तौर-तरीक़ों को बदलने का आंदोलन बना सकते थे. लेकिन अन्ना ने लोगों को निराश किया. अनशन के बाद हॉस्पिटल और वहां से वापस अपने गांव जाकर बैठ गए. अगर अन्ना देश की यात्रा पर निकल जाते. हर राज्य में निस्वार्थ रूप से आंदोलन करने वाले युवाओं और जनता से मिलते तो आज सरकार को एक लुंजपुंज लोकपाल क़ानून बनाने की हिम्मत नहीं प़डती. फिर कभी अन्ना को आंदोलन करने की ज़रूरत पड़ती तो उनकी एक आवाज़ पर देश के हर कोने में आंदोलन शुरू हो जाते. वह लोगों की इस ताक़त को समझ नहीं पाए. वह यह नहीं समझ पाए कि लोगों की आकांक्षाओं और सपनों से ज़ुडने के बाद अपनी मर्ज़ी नहीं चलती. जनता की भावनाओं के साथ उन्हें चलना पड़ता है, लेकिन अन्ना हजारे ने ठीक उल्टा किया. जिस तरह सरकार लोगों की भावनाओं का मज़ाक़ उड़ा रही है, वैसा ही अन्ना हजारे कर रहे हैं.

सरकार अन्ना की इस कमज़ोरी को भली-भांति जानती है. यही वजह है कि सरकार एक लुंजपुंज लोकपाल बनाकर अन्ना के आंदोलन को खत्म करना चाहती है. सरकारी बिल में जन लोकपाल बिल के कई मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया है. बिल में स़िर्फ उन्हीं मुद्दों को शामिल किया गया है, जिससे सरकार टीवी चैनलों और संसद में बहस के दौरान विपक्ष के सवालों का गोलमोल जवाब दे सके. सरकार जानती है कि लोकपाल बिल पेश करने के साथ ही टीम अन्ना का समर्थन आधा हो जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो इसके लिए सरकार के साथ अन्ना हजारे भी ज़िम्मेदार होंगे. सरकार ने टीम अन्ना से निपटने के लिए दूसरे रास्ते भी खोल दिए हैं. सरकार उनके सहयोगियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उन्हें बदनाम करना चाहती है. पहले कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे को भ्रष्ट बताया. शशि भूषण और प्रशांत भूषण के खिला़फ सीडी निकल जाती है. अरविंद केजरीवाल पर जुर्माना लगाया जाता है और किरण बेदी को हवाई स़फर के टिकट के लिए ज़लील किया जाता है. सरकार हर तरी़के से अन्ना हजारे और टीम अन्ना के सदस्यों को परेशान कर रही है. इसके बावजूद टीम अन्ना के सदस्य टेलीविजन कैमरे को देखते ही भ्रम फैलाने वाले बयान दे देते हैं. वे मीडिया के दबाव में आ जाते हैं. उन बातों पर ध्यान देने लग जाते हैं, जिनकी कोई ज़रूरत नहीं होती है. एक तऱफ सरकार एक लुंजपुंज लोकपाल क़ानून ला रही है, तो दूसरी तऱफ अन्ना हजारे और उनकी टीम ऐसे कामों में लगी है, जिसकी ज़रूरत नहीं है. यह समय सरकार पर दबाव देने का है तथा ऐसी योजनाएं बनाने का है कि अगर सरकार अपनी बात पर अडिग रही तो क्या करना होगा. हैरानी तो इस बात से होती है कि अन्ना हजारे अपनी टीम में पारदर्शिता लाने और संगठन में प्रजातांत्रिक मूल्यों को बढ़ाने के लिए समाज के और लोगों को भी शामिल करने में समय नष्ट कर रहे हैं. लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि अगर सरकार मज़बूत लोकपाल क़ानून नहीं लाई, तब क्या होगा. क्या फिर से देश में पहले जैसा आंदोलन खड़ा हो सकेगा? ऐसे महौल में राजनीति और चुनावों पर अन्ना भी चौंकाने वाले बयान दे देते हैं. सरकार देश को गुमराह कर रही है, लेकिन टीम अन्ना भी इसमें पीछे नहीं है. लोकपाल के मुद्दे पर सरकार ने पब्लिक ओपिनियन यानी जनमत का अनादर किया है. संसद में लोकपाल पर हुई चर्चा के दौरान राजनीतिक दलों और सरकार ने लोगों की भावनाओं के साथ मज़ाक़ किया है. सरकार के इस अपराध में अन्ना भी शामिल हैं. प्रजातंत्र में लोकमत सर्वोपरि होता है. देश की जनता भ्रष्टाचार के खिला़फ एक कड़ा क़ानून चाहती है. यही जनमत है. देश की जनता घोटालों, महंगाई, भ्रष्टाचार, कालाधन, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और रोज़गार की कमी से त्रस्त हो चुकी है. अन्ना ने लोगों में आशा जगाई, इसलिए लोग अन्ना के आंदोलन से जुड़े. देश की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है. राजनीति का भी वही हाल है. उत्तर प्रदेश में चुनाव है. कुछ लोग यह मान रहे हैं कि लोकसभा का चुनाव भी ज़्यादा दूर नहीं है. यह व़क्त फैसला लेने का है. अन्ना को यह फैसला लेना है कि भ्रष्टाचार और मज़बूत लोकपाल की लड़ाई में वह कहां खड़े हैं. कुत्ता क्यों मरा-के ज़रिए प्रताप सिंह कैरो ने जो सीख देवीलाल को दी, वही सीख अन्ना हजारे को लेने की ज़रूरत है.
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