मंगलवार, 22 जून 2010

मंथन-समीक्षा में डूबा 'शिवÓ राज

मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तो प्रदेश बीमारू राज्यों की श्रेणी में था और लोगों को इस सरकार से एक बड़े विकास की उम्मीद थी। लेकिन सत्ता संघर्ष में जहां दो मुख्यमंत्री उमा भारती और बाबूलाल गौर कुछ नहीं कर सके वहीं तीसरे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके सलाहकारों ने कुछ करने नहीं दिया। ऐसा भी नहीं कि शिवराज विफल रहे लेकिन उन्होंने जिस अनुपात में घोषणाएं की थी उसे उस सीमा तक पूरा नहीं करा सके। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इसके लिए मुख्यमंत्री को ही दोष देना उचित नहीं होगा क्योंकि तब उनमें प्रशासनिक अनुभव की कमी थी।
शिवराज की मंशा साफ थी यह बात जनता जान चुकी थी और शुक्र हो लाड़ली लक्ष्मी योजना का जिसने मामा को विकास पुरूष के रूप में स्थापित कर दिया था। फिर क्या था विरासत में मिली सत्ता को अपने दम पर दूसरी बार हथिया कर शिवराज ने अपना लोहा मनवा दिया। लेकिन अपने अदम्य कोशिशों के बावजुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने दूसरे कार्यकाल के 14 माह बीत जाने के बाद भी मप्र को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर न ला सके। एक तरफ प्रदेश को विकसित राज्य बनाने की बात हो रही है, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की विकास दर उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्य से भी कम है। क्योंकि इस बार भी उनके इर्द-गिर्द वही सलाहकारों की मंडली कब्जा जमाए हुए है जो पहली पारी में थी।
शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनाव के पहले मध्यप्रदेश को समृद्ध व विकसित राज्य बनाने का संकल्प लिया था। दोबारा सरकार बनाते ही उस संकल्प को पूरा करने के लिए रोडमैप तैयार किया गया। इसके लिए सात कार्यदल बनाए गए थे। कार्यदल की रिपोर्टो पर अलग-अलग चर्चा की गई। इसके बाद मंत्रियों तथा अधिकारियों के साथ सामूहिक चर्चा के बाद विभागवार चर्चा की गई। मंथन में कुल 940 अनुशंसाएं आई थी, जिसमें 852 मान्य की गई 88 को अमान्य कर दिया गया। अनुशंसाओं को तीन श्रेणी में बांटा गया है। पहली वह अनुशंसाएं जो तत्काल लागू हो सकती हैं, इस संबंध में सभी अधिकारियों को 15 मार्च तक आदेश जारी करने को कहा गया है। दूसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हें लागू करने के लिए नियमों मे बदलाव करना पड़ेगा। इसमें तीन से छह माह का समय लग सकता है। तीसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हे पूरा करने के लिए अतिरिक्त राशि की आवश्यकता पड़ेगी। अतिरिक्त राशि कहां से आएगी, इसके लिए भी कार्य शुरू कर दिया गया । मंथन समृद्धि व विकास का रास्ता खोजने के लिए था, जो खोज लिया गया, मंजिल भी तय हो गई,मध्यप्रदेश को विकसित राज्य बनाने के लिए बस उड़ान भरने की जरूरत थी। लेकिन पायलटों सलाहकारों ने जहाज को दूसरी दिशा में उड़ाना शुरू कर दिया। और मात्र 14 माह की अल्प अवधि में 50 फीसदी घोषणाओं को पूरा करने का दावा भी कर डाला जो हकीकत से परे है। अगर इस औसत से देखें तो अगले 14 माह बाद सरकार के पास कोई काम ही नहीं रहेगा यानी शिवराज सरकार बेकाम हो जाएगी।
ये बड़ी विचित्र स्थिति है कि जब पूरे प्रदेश की जनता अपने मुख्यमंत्री को गरम तवे पर बैठकर ईमानदार मानने को तैयार है, इसके बावजूद उनके मुख्यमंत्री जमीनी हकीकत को जानने की बजाय अपने सलाहकारों की सलाह और आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। या यूं कहें कि वे अपने सलाहकारों की आंकड़ेबाजी पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं
क्योंकि सरकार का खजाना खाली है। 58 हजार करोड़ का कर्ज ऊपर से है। विकास एजेंसियों का बजट कम कर दिया गया है। प्रदेशभर की विकास योजनाएं ठप पड़ी हैं। लाडली बेहाल है। कहीं भी वह सुरक्षित नहीं है। पिछले कुछ सालों में यहां पड़े आयकर छापों से यह विदित हो गया है कि भ्रष्टाचार चरम पर है। प्रदेश में कानून व्यवस्था भंग हो गई है। इंदौर और फिर भोपाल में एसएसपी सिस्टम लागू करने के बावजूद अपराधों का ग्राफ बढ़ा है। ग्वालियर में डकैतों ने फिर सिर उठाना शुरू कर दिया है। हत्याओं के मामले में इंदौर तो लूट के मामलों में भोपाल नंबर वन है। सांप्रदायिक दंगों और सांप्रदायिक संवेदनशीलता के मामलों में मध्यप्रदेश नंबर वन है। दलित उत्पीडऩ में भी प्रदेश सिरमौर है। भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। सरेआम सरकारी जमीन हड़पकर बेचने के ढेरों मामले सामने आए हैं।
नौकरशाही बेलगाम हो गई। सरकार की उदासीनता से भ्रष्ट अफसरान करोड़ों में खेल रहे हैं। आयकर छापों में करोड़ों रुपयों के साथ अकूत संपत्तियों का भी खुलासा हो रहा है। भ्रष्टों पर सरकार की मेहरबानी का आलम यह है कि राज्य के मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) ने भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई न होने पर नाराजगी जताई है। मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) के सूत्रों की मानें तो सरकार ने भ्रष्टाचार के 2333 प्रकरण पेंडिंग रख रखे हैं। पीडब्ल्यूडी, पीएचई और जल संसाधन विभाग के इन प्रकरणों को दबाने के पीछे यह कारण पता चला है कि आला अफसरान ने उनसे साठगाँठ कर ली है। गृह राज्यमंत्री नारायण सिंह कुशवाह तो यहां तक कह चुके हैं कि कानून व्यवस्था को मुख्यमंत्री भी नहीं सुधार सकते। गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता स्वीकार चुके हैं कि आम जनता का पुलिस पर से भरोसा उठ रहा है। राजस्व राज्यमंत्री करणसिंह वर्मा विदिशा में चोरी की बढ़ती घटनाओं पर कहते हैं कि चोरों को गोली मार दो। मंत्रियों के ऐसे बयानों के बाद भी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। अफसरान खाली बैठे तनख्वाह ले रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री, अध्यक्ष, नेताप्रतिपक्ष और मंत्रियों का वेतन बढ़ा दिया गया है।
विद्युत मंडल घोटालेबाज के हाथों में है, जहां आम जनता को जमकर लूटा जा रहा है। पूरे प्रदेश में वन संरक्षण पर खर्च की राशि जितनी बढ़ रही है, उसी अनुपात में जंगल लगातार कम होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अफसरान सिर्फ और सिर्फ कमीशनखोरी में लगे हैं। केंद्रीय अनुदान में सरकार को कहां चूना लगाया जाए, यही मौका ढूंढते रहते हैं। कुपोषण के मामले में उड़ीसा के बाद मध्यप्रदेश का ही नाम आता है। महिला बाल विकास में को फर्जीवाड़े का रोग लग गया है। प्रदेश के चार लाख अतिकुपोषित बच्चों को पोषणाहार देने का कार्यक्रम थर्ड मील फेल हो गया है। उन्हें रोजाना दो रुपए का आहार देना तय है और वह भी नहीं मिल पा रहा है। आंगनबाडिय़ों की सवा लाख कार्यकर्ताओं को इसकी जिम्मेदारी थी, जो अब छीन कर एक कंपनी को दे दी गई है। पूरे प्रदेश में शिक्षा माफिया छाया हुआ है, जो दोनों हाथों से छात्रों और उनके अभिभावकों को लूट रहा है। निजी मेडिकल कॉलेजों में हर साल 10 हजार करोड़ का कारोबार हो रहा है। सरकार द्वारा करोड़ों रुपए फूंकने के बावजूद पॉलीटेक्निक कॉलेज बदहाल हैं। 50 में से 45 मेडिकल कॉलेज में तो प्राचार्य तक नहीं है। परिवहन विभाग में भ्रष्टों की पूछपरख बढ़ गई है। सड़क परिवहन निगम को सरकार ने बंद कर दिया, किंतु केंद्र ने इस पर रोक लगा दी। इसके बावजूद सरकार इसे चालू नहीं कर रही है। इससे हजारों कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो मंत्रालय के ए एसी कमरे में बैठकर मुख्यमंत्री अफसरों के साथ जो कार्ययोजना बनाई थी वह पूरी तरह फेल हो गई है। यानी कुल मिलाकर देखा जाय तो शिवराज इस बार भी शासन और प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर सके हैं। शिवराज की शासन और प्रशासन पर पकड़ तभी बन सकती है, जबकि वह सरकारी तंत्र पर सतत निगरानी की कोई व्यवस्था बनाएं। यह तभी संभव है, जबकि वह अपने सचिवालय के कामकाज की बारीकी से समीक्षा करें और ऐसा सिस्टम विकसित करें, जिससे कि वह संदेश जाए कि प्रदेश के एकमात्र चीफ मिनिस्टर वहीं है और दूसरा कोई सुपर सीएम नहीं है।
प्रदेश की मुख्यमंत्री पर ऐतबार करती है तो उनकी जिम्मेदारी पुरे तंत्र को भष्टाचार मुक्त बनाने की हैं इसकी शुरुआत योजनाओं के मूल से होना चाहिए। अफसर, राजनेता, ठेकेदार और बिचोलियों का गठजोड़ नई योजनाओ-पालिसियों पर कड़ी नजर रखता है। यह चिंतनीय और शोचनीय है। शिवराज सिंह चौहान भली भांति जानते है कि कौन भ्रष्ट है और कौन दलाल हैं, फिर भी वे मौन क्यों हैं?

मंथन-समीक्षा में डूबा 'शिवÓ राज

मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तो प्रदेश बीमारू राज्यों की श्रेणी में था और लोगों को इस सरकार से एक बड़े विकास की उम्मीद थी। लेकिन सत्ता संघर्ष में जहां दो मुख्यमंत्री उमा भारती और बाबूलाल गौर कुछ नहीं कर सके वहीं तीसरे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके सलाहकारों ने कुछ करने नहीं दिया। ऐसा भी नहीं कि शिवराज विफल रहे लेकिन उन्होंने जिस अनुपात में घोषणाएं की थी उसे उस सीमा तक पूरा नहीं करा सके। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इसके लिए मुख्यमंत्री को ही दोष देना उचित नहीं होगा क्योंकि तब उनमें प्रशासनिक अनुभव की कमी थी।
शिवराज की मंशा साफ थी यह बात जनता जान चुकी थी और शुक्र हो लाड़ली लक्ष्मी योजना का जिसने मामा को विकास पुरूष के रूप में स्थापित कर दिया था। फिर क्या था विरासत में मिली सत्ता को अपने दम पर दूसरी बार हथिया कर शिवराज ने अपना लोहा मनवा दिया। लेकिन अपने अदम्य कोशिशों के बावजुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने दूसरे कार्यकाल के 14 माह बीत जाने के बाद भी मप्र को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर न ला सके। एक तरफ प्रदेश को विकसित राज्य बनाने की बात हो रही है, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की विकास दर उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्य से भी कम है। क्योंकि इस बार भी उनके इर्द-गिर्द वही सलाहकारों की मंडली कब्जा जमाए हुए है जो पहली पारी में थी।
शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनाव के पहले मध्यप्रदेश को समृद्ध व विकसित राज्य बनाने का संकल्प लिया था। दोबारा सरकार बनाते ही उस संकल्प को पूरा करने के लिए रोडमैप तैयार किया गया। इसके लिए सात कार्यदल बनाए गए थे। कार्यदल की रिपोर्टो पर अलग-अलग चर्चा की गई। इसके बाद मंत्रियों तथा अधिकारियों के साथ सामूहिक चर्चा के बाद विभागवार चर्चा की गई। मंथन में कुल 940 अनुशंसाएं आई थी, जिसमें 852 मान्य की गई 88 को अमान्य कर दिया गया। अनुशंसाओं को तीन श्रेणी में बांटा गया है। पहली वह अनुशंसाएं जो तत्काल लागू हो सकती हैं, इस संबंध में सभी अधिकारियों को 15 मार्च तक आदेश जारी करने को कहा गया है। दूसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हें लागू करने के लिए नियमों मे बदलाव करना पड़ेगा। इसमें तीन से छह माह का समय लग सकता है। तीसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हे पूरा करने के लिए अतिरिक्त राशि की आवश्यकता पड़ेगी। अतिरिक्त राशि कहां से आएगी, इसके लिए भी कार्य शुरू कर दिया गया । मंथन समृद्धि व विकास का रास्ता खोजने के लिए था, जो खोज लिया गया, मंजिल भी तय हो गई,मध्यप्रदेश को विकसित राज्य बनाने के लिए बस उड़ान भरने की जरूरत थी। लेकिन पायलटों सलाहकारों ने जहाज को दूसरी दिशा में उड़ाना शुरू कर दिया। और मात्र 14 माह की अल्प अवधि में 50 फीसदी घोषणाओं को पूरा करने का दावा भी कर डाला जो हकीकत से परे है। अगर इस औसत से देखें तो अगले 14 माह बाद सरकार के पास कोई काम ही नहीं रहेगा यानी शिवराज सरकार बेकाम हो जाएगी।
ये बड़ी विचित्र स्थिति है कि जब पूरे प्रदेश की जनता अपने मुख्यमंत्री को गरम तवे पर बैठकर ईमानदार मानने को तैयार है, इसके बावजूद उनके मुख्यमंत्री जमीनी हकीकत को जानने की बजाय अपने सलाहकारों की सलाह और आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। या यूं कहें कि वे अपने सलाहकारों की आंकड़ेबाजी पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं
क्योंकि सरकार का खजाना खाली है। 58 हजार करोड़ का कर्ज ऊपर से है। विकास एजेंसियों का बजट कम कर दिया गया है। प्रदेशभर की विकास योजनाएं ठप पड़ी हैं। लाडली बेहाल है। कहीं भी वह सुरक्षित नहीं है। पिछले कुछ सालों में यहां पड़े आयकर छापों से यह विदित हो गया है कि भ्रष्टाचार चरम पर है। प्रदेश में कानून व्यवस्था भंग हो गई है। इंदौर और फिर भोपाल में एसएसपी सिस्टम लागू करने के बावजूद अपराधों का ग्राफ बढ़ा है। ग्वालियर में डकैतों ने फिर सिर उठाना शुरू कर दिया है। हत्याओं के मामले में इंदौर तो लूट के मामलों में भोपाल नंबर वन है। सांप्रदायिक दंगों और सांप्रदायिक संवेदनशीलता के मामलों में मध्यप्रदेश नंबर वन है। दलित उत्पीडऩ में भी प्रदेश सिरमौर है। भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। सरेआम सरकारी जमीन हड़पकर बेचने के ढेरों मामले सामने आए हैं।
नौकरशाही बेलगाम हो गई। सरकार की उदासीनता से भ्रष्ट अफसरान करोड़ों में खेल रहे हैं। आयकर छापों में करोड़ों रुपयों के साथ अकूत संपत्तियों का भी खुलासा हो रहा है। भ्रष्टों पर सरकार की मेहरबानी का आलम यह है कि राज्य के मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) ने भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई न होने पर नाराजगी जताई है। मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) के सूत्रों की मानें तो सरकार ने भ्रष्टाचार के 2333 प्रकरण पेंडिंग रख रखे हैं। पीडब्ल्यूडी, पीएचई और जल संसाधन विभाग के इन प्रकरणों को दबाने के पीछे यह कारण पता चला है कि आला अफसरान ने उनसे साठगाँठ कर ली है। गृह राज्यमंत्री नारायण सिंह कुशवाह तो यहां तक कह चुके हैं कि कानून व्यवस्था को मुख्यमंत्री भी नहीं सुधार सकते। गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता स्वीकार चुके हैं कि आम जनता का पुलिस पर से भरोसा उठ रहा है। राजस्व राज्यमंत्री करणसिंह वर्मा विदिशा में चोरी की बढ़ती घटनाओं पर कहते हैं कि चोरों को गोली मार दो। मंत्रियों के ऐसे बयानों के बाद भी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। अफसरान खाली बैठे तनख्वाह ले रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री, अध्यक्ष, नेताप्रतिपक्ष और मंत्रियों का वेतन बढ़ा दिया गया है।
विद्युत मंडल घोटालेबाज के हाथों में है, जहां आम जनता को जमकर लूटा जा रहा है। पूरे प्रदेश में वन संरक्षण पर खर्च की राशि जितनी बढ़ रही है, उसी अनुपात में जंगल लगातार कम होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अफसरान सिर्फ और सिर्फ कमीशनखोरी में लगे हैं। केंद्रीय अनुदान में सरकार को कहां चूना लगाया जाए, यही मौका ढूंढते रहते हैं। कुपोषण के मामले में उड़ीसा के बाद मध्यप्रदेश का ही नाम आता है। महिला बाल विकास में को फर्जीवाड़े का रोग लग गया है। प्रदेश के चार लाख अतिकुपोषित बच्चों को पोषणाहार देने का कार्यक्रम थर्ड मील फेल हो गया है। उन्हें रोजाना दो रुपए का आहार देना तय है और वह भी नहीं मिल पा रहा है। आंगनबाडिय़ों की सवा लाख कार्यकर्ताओं को इसकी जिम्मेदारी थी, जो अब छीन कर एक कंपनी को दे दी गई है। पूरे प्रदेश में शिक्षा माफिया छाया हुआ है, जो दोनों हाथों से छात्रों और उनके अभिभावकों को लूट रहा है। निजी मेडिकल कॉलेजों में हर साल 10 हजार करोड़ का कारोबार हो रहा है। सरकार द्वारा करोड़ों रुपए फूंकने के बावजूद पॉलीटेक्निक कॉलेज बदहाल हैं। 50 में से 45 मेडिकल कॉलेज में तो प्राचार्य तक नहीं है। परिवहन विभाग में भ्रष्टों की पूछपरख बढ़ गई है। सड़क परिवहन निगम को सरकार ने बंद कर दिया, किंतु केंद्र ने इस पर रोक लगा दी। इसके बावजूद सरकार इसे चालू नहीं कर रही है। इससे हजारों कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो मंत्रालय के ए एसी कमरे में बैठकर मुख्यमंत्री अफसरों के साथ जो कार्ययोजना बनाई थी वह पूरी तरह फेल हो गई है। यानी कुल मिलाकर देखा जाय तो शिवराज इस बार भी शासन और प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर सके हैं। शिवराज की शासन और प्रशासन पर पकड़ तभी बन सकती है, जबकि वह सरकारी तंत्र पर सतत निगरानी की कोई व्यवस्था बनाएं। यह तभी संभव है, जबकि वह अपने सचिवालय के कामकाज की बारीकी से समीक्षा करें और ऐसा सिस्टम विकसित करें, जिससे कि वह संदेश जाए कि प्रदेश के एकमात्र चीफ मिनिस्टर वहीं है और दूसरा कोई सुपर सीएम नहीं है।
प्रदेश की मुख्यमंत्री पर ऐतबार करती है तो उनकी जिम्मेदारी पुरे तंत्र को भष्टाचार मुक्त बनाने की हैं इसकी शुरुआत योजनाओं के मूल से होना चाहिए। अफसर, राजनेता, ठेकेदार और बिचोलियों का गठजोड़ नई योजनाओ-पालिसियों पर कड़ी नजर रखता है। यह चिंतनीय और शोचनीय है। शिवराज सिंह चौहान भली भांति जानते है कि कौन भ्रष्ट है और कौन दलाल हैं, फिर भी वे मौन क्यों हैं?

सीमा फार्मूला में फंसे नौकरशाह

देश में लोकतंत्र की स्थापना के 58 साल बाद भी हमारी नौकरशाही को लेकर एक आम शिकायत आज भी बनी हुई है कि उसका चाल, चेहरा, चरित्र वही पुराना है। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान देश में प्रशासन का जो ढांचा तैयार किया गया था उसका मकसद जनता की सेवा करना और उसके प्रति संवेदनशील और जवाबदेह होना कतई नहीं था। पारदर्शिता के बजाय सरकारी गोपनीयता पर ज्यादा जोर दिया गया और इसका कानून भी बना। लेकिन आजादी के बाद भी यह कानून चलता रहा। अब यह कानून अस्तित्व मेें नहीं है और सूचना के अधिकार के रूप में लोगों के पास अब पारदर्शिता का हथियार तो आ गया है, लेकिन सरकारी कामकाज का रंग-ढंग अब भी वैसा ही है। मध्यप्रदेश में तो हालात और बदतर होती जा रही है। कार्य करने की संस्कृति को नौकरशाहों ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
वेतन भत्तों से लबरेज और सुविधाएं पाने में सबसे आगे रहने वाले इन नौकरशाहों पर थैलीशाहों का कब्जा हो गया है। इनका अब कार्य करने में मन नहीं लगता है बल्कि किसी अच्छे काम को उलझाने में महारत हासिल हो चुकी है ताकि अपने बैंक के लॉकर भर सकें। यह हम नहीं कह रहे बल्कि कुछ जांच एजेंसियों की रिर्पोट और आयकर विभाग के छापों से उजागर हुआ है। प्रदेश में कई नौकरशाहों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापे के बाद देर से ही सही लेकिन दुरूस्त होकर जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जागे तो उन्होंने सभी आईएएस अधिकारियों को चल अचल संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश पारित कर दिया। परंतु पहले भी अधिकारियों द्वारा संपत्ति का ब्योंरा एक निर्धारित प्रपत्र में हर वित्तीय वर्ष में सामान्य प्रशासन विभाग को दिया जाता रहा है। परंतु उस प्रपत्र को देखने की फुर्सत किसको है, जो दिया वो सही। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आदेश तो दे डाला पर इसकी मॉनीटरिंग क्या वह स्वयं करेंगे या किसी इमानदार नौकरशाह की नजरों सेेे जांच पड़ताल करेंगे। आदेश के बाद आंकड़ेबाज नौकरशाहों ने जब अपनी संतुलित संपति को सार्वजनिक किया तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई। प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित देश की राजधानी दिल्ली में करोड़ों की संपत्ति का मामला सामने आया। एक बीमारू राज्य की नौकरशाहों द्वारा अकूत संपत्ति अर्जित करने की बात सामने आते ही केंद्र की खुफिया एजेंसियों ने अपनी आंखें तरेरनी शुरू कर दी है। खुफिया विभाग के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में केंद्रीय जांच एजेंसियों के 5 अधिकारी गुपचुप तरीके से मप्र के नौकरशाहों की कमाई और करतूतों की फाईल खंगाल रहें है। आयकर विभाग तो यह देखकर हैरान है कि अधिकारियों की काली कमाई को ठिकाने लगाने के लिए लगभग सभी बीमा कंपनियों ने अपना जाल बुना और सरकार को चूना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सभी कंपनियों और अधिकारियों ने सरकार के उस नियम का जमकर फायदा उठाया जिसमें 50 हजार से अधिक के लेनदेन पर पेन नंबर देना अनिवार्य होता है। बीमा कंपनी के एजेंटों ने इस नियम का तोड़ निकालते हुए लोगों की काली कमाई सफेद करने वहीं तरीका अपनाया जो सीमा जायसवाल ने अपनाया था।
सीमा ने भी प्रदेश के कई भ्रष्ट अफसरों की करोड़ों रुपए काली कमाई को अपनी बीमा कंपनी आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में निवेश कराया था। सीमा ने पचास हजार से कम के ड्राफ्ट आदि के माध्यम से बीमा पालिसी बनाई थी। ऐसे में आयकर विभाग को पता ही नहीं चल पाया कि कब लोगों के करोड़ों रुपए बीमा में निवेश के माध्यम से सफेद होते गए। उधर बीमा में निवेश को आयकर में छूट होने के कारण सरकार के पल्ले में कुछ भी नहीं आया। बताया जाता है कि आयकर विभाग अब सभी बीमा कंपनियों के रिकार्ड खंगाल रहा है। विभाग के पास इन बीमा कंपनियों में प्रदेश से किए गए निवेश की सूची आ गई है। इस सूची की पड़ताल में कई सफेदपोश नेताओं के अलावा अफसरों और कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपए निवेश किए जाने का पता चला है। विभाग इनकी सूची तैयार कर रहा है।
आयकर विभाग के पास बजाज एलायंस, बिरला सन लाईफ, एचडीएफसी, टाटा एआईजी, एसबीआई लाईफ आदि इंश्योरेंस कंपनियों का रिकार्ड आ चुका है। विभाग के अधिकारियों ने अपने साफ्टवेयर के माध्यम से इस सूची में से प्रदेश के कई ऐसे नाम खोज निकाले हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए बीमा के माध्यम से निवेश किया है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के कई अफसरों के अलावा तृतीय वर्ग के कर्मचारियों ने भी लाखों रुपए की बीमा पालिसी ले रखी है। इसमें पुलिस विभाग के कई आरक्षक भी शामिल हैं जिन्होंने लाखों रुपए बीमा कंपनियों में निवेश किया है। जानकारों के अनुसार विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन कार्यरत फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट (एफआईयू) से बड़ी संख्या में संदेहास्पद लेन-देन की जानकारी मिली है। वर्ष 2004 में स्थापित फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट रिजर्व बैंक, बीमा नियामक प्राधिकरण (आईआरडीए) और सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) की मदद से काम करती है। यह यूनिट हर संदेहास्पद लेन-देन पर नजर रखे हुए है। विभाग के सूत्रों के अनुसार पचास हजार से कम राशि के नगद ड्राफ्ट पर भी संदेह होने पर यह यूनिट नजर रखती है।
विभाग को एफआईयू के साथ आल इंडिया रिपोर्टिग (एआईआर) सिस्टम से भी जानकारी मिल रही है। इसमें के्रडिट कार्ड से किए गए बड़े भुगतान व अन्य तरीकों से किए गए निवेश व खर्चो की जानकारी भी संबंधित आयकर अधिकारी तक पहुंच रही है। विभाग के सूत्रों के अनुसार बीमा कंपनियों से भी पचास हजार से व उससे अधिक प्रीमियम का भुगतान करने वालों की जानकारी बुलवाई गई है।
विभाग के सूत्रों के अनुसार कुछ लोग बंगलुरू, पुणे या अन्य शहरों में पढऩे वाले बच्चों को हर माह 25 से 50 हजार रुपए भेज रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी छुपाते हैं। राशि भोपाल मे जमा होती है और किसी अन्य शहर में निकासी होती है जबकि संबंधित व्यक्ति का दावा होता है कि उसने केवल पैसा जमा किया और निकाला खर्च नहीं किया। इसके अलावा किसी अन्य शहर में टूर पर जाते समय राशि निकालते हैं, वहां खर्च करते हैं और भोपाल आकर फिर पैसे जमा करा देते हैं। यह लोग भी तर्क देते हैं कि उन्होंने खर्चा नहीं किया। आयकर विभाग इन सभी के द्वारा बीमा कंपनी में किए गए निवेश की पूरी सूची तैयार कर रहा है। विभाग साथ ही इनके आयकर रिटर्न की भी पड़ताल कर पता लगा रहा है कि इन लोगों ने बीमा में किए गए निवेश का उल्लेख रिटर्न में किया है या नहीं। इसके बाद विभाग सभी को नोटिस भेज कर इनके द्वारा किए गए निवेश के आय के स्त्रोतों की जानकारी मांगेगा।
आयकर विभाग के छापों के बाद मप्र को बीमारु राज्य कहने वालों को इस विषय पर दोबारा सोचने की जरूरत है। कारण प्रदेश में हर साल बढ़ते करोड़पति व्यापारियों के अलावा नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों के यहां से मिल रही करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति को देखकर नहीं लगता कि प्रदेश बीमारु राज्य है। आयकर विभाग के छापों ने प्रदेश के कई लोगों की पोल खोली वहीं पिछले तीन साल में ही आयकर छापों में करीब छह सौ करोड़ की अघोषित संपत्ति सरेंडर की जा चुकी है। इसके अलावा करीब 130 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति आयकर विभाग जब्त कर चुका है। यही नहीं छापों में मिले दस्तावेज बताते हैं कि कुछेक अधिकारियों, मंत्रियों और उद्योगपतियों के बीच बने गठजोड़ ने शासकीय योजनाओं के माध्यम से अकूत संपदा जोड़ी है। आयकर सूत्रों की मानें तो प्रदेश में दिनों दिन बढ़ रहे आय के स्त्रोतों में इन योजनाओं का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। आयकर छापे में सरेंडर अघोषित आय या फिर जब्त संपत्ति के अलावा आयकर विभाग ने छापों में हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति का पता लगाया।
ऐन-केन प्रकारेण धन पाने की लालसा ने अधिकारी की कार्य संस्कृति को मार दिया है। हालात यह हो गई कि वह चाहे मध्यप्रदेश हो या यूं कहिए कि सूबेदार अपने विवेक को ताले में बंद रखकर उनकी बनाई हुई राह पर चलता है। ऐसे में कौन अधिकारी मूर्ख होगा जो मुखिया को मुखिया मानकर व्यवहार करेगा। जब मुखिया की हालत वैसाखियों पर चलने जैसी हो जाए तब कौन इन अधिकारियों से हिसाब मांगेगा। जिस जनता के टैक्स से इन अधिकारियों की मोटी तनख्वाह निकलती है उनके काम करने में फाईल या तो मिलती नहीं है या फाईल इतनी मोटी हो जाती है कि उसका कि उसका निराकरण कोई जन भी नहीं कर सकता है। उपसचिव, सचिव और न जाने कितने सचिवों की एक जानलेवा शृंखला रावण की मुंडी की तरह एक दूसरे से जुडी हुई है।
सार्वजनिक शौचालय के काम भी इन मुंडियों के हस्ताक्षर के बिना पूरा नहीं होता है। ऐसे में कोई मुंडी बीच में से गायब हो जाए, तो मामला पेंडिंग। अब लंबित मामले को और लंबित करने की कला भी इनके ही पास है झट एक जिज्ञासा वाला प्रश्न लिखा और फाईल नीचे रख दी। फाईल जिस गति से आई थी उसी गति से सद्गति को प्राप्त हो जाती है और उसके मरने की खबर किसी को भी लगती नहीं है। लेकिन थैलीशाहों की फाईल पर नौकरशाहों की नजर ही नहीें होती है, बल्कि नजारे इनायत भी होती है। किसी जमीन का उपयोग बदलना हो या हाईराइज बिल्ंिडग की परमिशन, जंगल से खेत खेत से जंगल और कालानाइजर्स बंधुओ के काम के लिए एक नहीं दस-दस बार केबिनेट बैठ जाएगी। बार-बार अधिकारी वही फाईल मीटिंग में लेकर आएगा जिसका सौदा पट चुका है। इन सौदों की भनक तक नहीं लगती और क्या निर्णय लिए गए वह जानना तो आम आदमियों के लिए दूर की कौड़ी है। वैसे देखा जाए तो सन् 1993 से लेकर अभी तक आईएएस मंडली किसी न किसी विक्रम के कांधे पर बेताल की तरह चिपकी हुई है और उसे मालूम है कि विक्रम को उलझाकर रखेंगे तो पेड़ पर उल्टा लटकने की बारी नहीं आएगा।

























'सीमा फार्मूलाÓ में फंसे नौकरशाह



देश में लोकतंत्र की स्थापना के 58 साल बाद भी हमारी नौकरशाही को लेकर एक आम शिकायत आज भी बनी हुई है कि उसका चाल, चेहरा, चरित्र वही पुराना है। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान देश में प्रशासन का जो ढांचा तैयार किया गया था उसका मकसद जनता की सेवा करना और उसके प्रति संवेदनशील और जवाबदेह होना कतई नहीं था। पारदर्शिता के बजाय सरकारी गोपनीयता पर ज्यादा जोर दिया गया और इसका कानून भी बना। लेकिन आजादी के बाद भी यह कानून चलता रहा। अब यह कानून अस्तित्व मेें नहीं है और सूचना के अधिकार के रूप में लोगों के पास अब पारदर्शिता का हथियार तो आ गया है, लेकिन सरकारी कामकाज का रंग-ढंग अब भी वैसा ही है। मध्यप्रदेश में तो हालात और बदतर होती जा रही है। कार्य करने की संस्कृति को नौकरशाहों ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
वेतन भत्तों से लबरेज और सुविधाएं पाने में सबसे आगे रहने वाले इन नौकरशाहों पर थैलीशाहों का कब्जा हो गया है। इनका अब कार्य करने में मन नहीं लगता है बल्कि किसी अच्छे काम को उलझाने में महारत हासिल हो चुकी है ताकि अपने बैंक के लॉकर भर सकें। यह हम नहीं कह रहे बल्कि कुछ जांच एजेंसियों की रिर्पोट और आयकर विभाग के छापों से उजागर हुआ है। प्रदेश में कई नौकरशाहों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापे के बाद देर से ही सही लेकिन दुरूस्त होकर जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जागे तो उन्होंने सभी आईएएस अधिकारियों को चल अचल संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश पारित कर दिया। परंतु पहले भी अधिकारियों द्वारा संपत्ति का ब्योंरा एक निर्धारित प्रपत्र में हर वित्तीय वर्ष में सामान्य प्रशासन विभाग को दिया जाता रहा है। परंतु उस प्रपत्र को देखने की फुर्सत किसको है, जो दिया वो सही। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आदेश तो दे डाला पर इसकी मॉनीटरिंग क्या वह स्वयं करेंगे या किसी इमानदार नौकरशाह की नजरों सेेे जांच पड़ताल करेंगे। आदेश के बाद आंकड़ेबाज नौकरशाहों ने जब अपनी संतुलित संपति को सार्वजनिक किया तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई। प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित देश की राजधानी दिल्ली में करोड़ों की संपत्ति का मामला सामने आया। एक बीमारू राज्य की नौकरशाहों द्वारा अकूत संपत्ति अर्जित करने की बात सामने आते ही केंद्र की खुफिया एजेंसियों ने अपनी आंखें तरेरनी शुरू कर दी है। खुफिया विभाग के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में केंद्रीय जांच एजेंसियों के 5 अधिकारी गुपचुप तरीके से मप्र के नौकरशाहों की कमाई और करतूतों की फाईल खंगाल रहें है। आयकर विभाग तो यह देखकर हैरान है कि अधिकारियों की काली कमाई को ठिकाने लगाने के लिए लगभग सभी बीमा कंपनियों ने अपना जाल बुना और सरकार को चूना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सभी कंपनियों और अधिकारियों ने सरकार के उस नियम का जमकर फायदा उठाया जिसमें 50 हजार से अधिक के लेनदेन पर पेन नंबर देना अनिवार्य होता है। बीमा कंपनी के एजेंटों ने इस नियम का तोड़ निकालते हुए लोगों की काली कमाई सफेद करने वहीं तरीका अपनाया जो सीमा जायसवाल ने अपनाया था।
सीमा ने भी प्रदेश के कई भ्रष्ट अफसरों की करोड़ों रुपए काली कमाई को अपनी बीमा कंपनी आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में निवेश कराया था। सीमा ने पचास हजार से कम के ड्राफ्ट आदि के माध्यम से बीमा पालिसी बनाई थी। ऐसे में आयकर विभाग को पता ही नहीं चल पाया कि कब लोगों के करोड़ों रुपए बीमा में निवेश के माध्यम से सफेद होते गए। उधर बीमा में निवेश को आयकर में छूट होने के कारण सरकार के पल्ले में कुछ भी नहीं आया। बताया जाता है कि आयकर विभाग अब सभी बीमा कंपनियों के रिकार्ड खंगाल रहा है। विभाग के पास इन बीमा कंपनियों में प्रदेश से किए गए निवेश की सूची आ गई है। इस सूची की पड़ताल में कई सफेदपोश नेताओं के अलावा अफसरों और कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपए निवेश किए जाने का पता चला है। विभाग इनकी सूची तैयार कर रहा है।
आयकर विभाग के पास बजाज एलायंस, बिरला सन लाईफ, एचडीएफसी, टाटा एआईजी, एसबीआई लाईफ आदि इंश्योरेंस कंपनियों का रिकार्ड आ चुका है। विभाग के अधिकारियों ने अपने साफ्टवेयर के माध्यम से इस सूची में से प्रदेश के कई ऐसे नाम खोज निकाले हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए बीमा के माध्यम से निवेश किया है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के कई अफसरों के अलावा तृतीय वर्ग के कर्मचारियों ने भी लाखों रुपए की बीमा पालिसी ले रखी है। इसमें पुलिस विभाग के कई आरक्षक भी शामिल हैं जिन्होंने लाखों रुपए बीमा कंपनियों में निवेश किया है। जानकारों के अनुसार विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन कार्यरत फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट (एफआईयू) से बड़ी संख्या में संदेहास्पद लेन-देन की जानकारी मिली है। वर्ष 2004 में स्थापित फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट रिजर्व बैंक, बीमा नियामक प्राधिकरण (आईआरडीए) और सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) की मदद से काम करती है। यह यूनिट हर संदेहास्पद लेन-देन पर नजर रखे हुए है। विभाग के सूत्रों के अनुसार पचास हजार से कम राशि के नगद ड्राफ्ट पर भी संदेह होने पर यह यूनिट नजर रखती है।
विभाग को एफआईयू के साथ आल इंडिया रिपोर्टिग (एआईआर) सिस्टम से भी जानकारी मिल रही है। इसमें के्रडिट कार्ड से किए गए बड़े भुगतान व अन्य तरीकों से किए गए निवेश व खर्चो की जानकारी भी संबंधित आयकर अधिकारी तक पहुंच रही है। विभाग के सूत्रों के अनुसार बीमा कंपनियों से भी पचास हजार से व उससे अधिक प्रीमियम का भुगतान करने वालों की जानकारी बुलवाई गई है।
विभाग के सूत्रों के अनुसार कुछ लोग बंगलुरू, पुणे या अन्य शहरों में पढऩे वाले बच्चों को हर माह 25 से 50 हजार रुपए भेज रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी छुपाते हैं। राशि भोपाल मे जमा होती है और किसी अन्य शहर में निकासी होती है जबकि संबंधित व्यक्ति का दावा होता है कि उसने केवल पैसा जमा किया और निकाला खर्च नहीं किया। इसके अलावा किसी अन्य शहर में टूर पर जाते समय राशि निकालते हैं, वहां खर्च करते हैं और भोपाल आकर फिर पैसे जमा करा देते हैं। यह लोग भी तर्क देते हैं कि उन्होंने खर्चा नहीं किया। आयकर विभाग इन सभी के द्वारा बीमा कंपनी में किए गए निवेश की पूरी सूची तैयार कर रहा है। विभाग साथ ही इनके आयकर रिटर्न की भी पड़ताल कर पता लगा रहा है कि इन लोगों ने बीमा में किए गए निवेश का उल्लेख रिटर्न में किया है या नहीं। इसके बाद विभाग सभी को नोटिस भेज कर इनके द्वारा किए गए निवेश के आय के स्त्रोतों की जानकारी मांगेगा।
आयकर विभाग के छापों के बाद मप्र को बीमारु राज्य कहने वालों को इस विषय पर दोबारा सोचने की जरूरत है। कारण प्रदेश में हर साल बढ़ते करोड़पति व्यापारियों के अलावा नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों के यहां से मिल रही करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति को देखकर नहीं लगता कि प्रदेश बीमारु राज्य है। आयकर विभाग के छापों ने प्रदेश के कई लोगों की पोल खोली वहीं पिछले तीन साल में ही आयकर छापों में करीब छह सौ करोड़ की अघोषित संपत्ति सरेंडर की जा चुकी है। इसके अलावा करीब 130 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति आयकर विभाग जब्त कर चुका है। यही नहीं छापों में मिले दस्तावेज बताते हैं कि कुछेक अधिकारियों, मंत्रियों और उद्योगपतियों के बीच बने गठजोड़ ने शासकीय योजनाओं के माध्यम से अकूत संपदा जोड़ी है। आयकर सूत्रों की मानें तो प्रदेश में दिनों दिन बढ़ रहे आय के स्त्रोतों में इन योजनाओं का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। आयकर छापे में सरेंडर अघोषित आय या फिर जब्त संपत्ति के अलावा आयकर विभाग ने छापों में हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति का पता लगाया।
ऐन-केन प्रकारेण धन पाने की लालसा ने अधिकारी की कार्य संस्कृति को मार दिया है। हालात यह हो गई कि वह चाहे मध्यप्रदेश हो या यूं कहिए कि सूबेदार अपने विवेक को ताले में बंद रखकर उनकी बनाई हुई राह पर चलता है। ऐसे में कौन अधिकारी मूर्ख होगा जो मुखिया को मुखिया मानकर व्यवहार करेगा। जब मुखिया की हालत वैसाखियों पर चलने जैसी हो जाए तब कौन इन अधिकारियों से हिसाब मांगेगा। जिस जनता के टैक्स से इन अधिकारियों की मोटी तनख्वाह निकलती है उनके काम करने में फाईल या तो मिलती नहीं है या फाईल इतनी मोटी हो जाती है कि उसका कि उसका निराकरण कोई जन भी नहीं कर सकता है। उपसचिव, सचिव और न जाने कितने सचिवों की एक जानलेवा शृंखला रावण की मुंडी की तरह एक दूसरे से जुडी हुई है।
सार्वजनिक शौचालय के काम भी इन मुंडियों के हस्ताक्षर के बिना पूरा नहीं होता है। ऐसे में कोई मुंडी बीच में से गायब हो जाए, तो मामला पेंडिंग। अब लंबित मामले को और लंबित करने की कला भी इनके ही पास है झट एक जिज्ञासा वाला प्रश्न लिखा और फाईल नीचे रख दी। फाईल जिस गति से आई थी उसी गति से सद्गति को प्राप्त हो जाती है और उसके मरने की खबर किसी को भी लगती नहीं है। लेकिन थैलीशाहों की फाईल पर नौकरशाहों की नजर ही नहीें होती है, बल्कि नजारे इनायत भी होती है। किसी जमीन का उपयोग बदलना हो या हाईराइज बिल्ंिडग की परमिशन, जंगल से खेत खेत से जंगल और कालानाइजर्स बंधुओ के काम के लिए एक नहीं दस-दस बार केबिनेट बैठ जाएगी। बार-बार अधिकारी वही फाईल मीटिंग में लेकर आएगा जिसका सौदा पट चुका है। इन सौदों की भनक तक नहीं लगती और क्या निर्णय लिए गए वह जानना तो आम आदमियों के लिए दूर की कौड़ी है। वैसे देखा जाए तो सन् 1993 से लेकर अभी तक आईएएस मंडली किसी न किसी विक्रम के कांधे पर बेताल की तरह चिपकी हुई है और उसे मालूम है कि विक्रम को उलझाकर रखेंगे तो पेड़ पर उल्टा लटकने की बारी नहीं आएगा।






















'सीमा फार्मूलाÓ में फंसे नौकरशाह



देश में लोकतंत्र की स्थापना के 58 साल बाद भी हमारी नौकरशाही को लेकर एक आम शिकायत आज भी बनी हुई है कि उसका चाल, चेहरा, चरित्र वही पुराना है। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान देश में प्रशासन का जो ढांचा तैयार किया गया था उसका मकसद जनता की सेवा करना और उसके प्रति संवेदनशील और जवाबदेह होना कतई नहीं था। पारदर्शिता के बजाय सरकारी गोपनीयता पर ज्यादा जोर दिया गया और इसका कानून भी बना। लेकिन आजादी के बाद भी यह कानून चलता रहा। अब यह कानून अस्तित्व मेें नहीं है और सूचना के अधिकार के रूप में लोगों के पास अब पारदर्शिता का हथियार तो आ गया है, लेकिन सरकारी कामकाज का रंग-ढंग अब भी वैसा ही है। मध्यप्रदेश में तो हालात और बदतर होती जा रही है। कार्य करने की संस्कृति को नौकरशाहों ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
वेतन भत्तों से लबरेज और सुविधाएं पाने में सबसे आगे रहने वाले इन नौकरशाहों पर थैलीशाहों का कब्जा हो गया है। इनका अब कार्य करने में मन नहीं लगता है बल्कि किसी अच्छे काम को उलझाने में महारत हासिल हो चुकी है ताकि अपने बैंक के लॉकर भर सकें। यह हम नहीं कह रहे बल्कि कुछ जांच एजेंसियों की रिर्पोट और आयकर विभाग के छापों से उजागर हुआ है। प्रदेश में कई नौकरशाहों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापे के बाद देर से ही सही लेकिन दुरूस्त होकर जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जागे तो उन्होंने सभी आईएएस अधिकारियों को चल अचल संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश पारित कर दिया। परंतु पहले भी अधिकारियों द्वारा संपत्ति का ब्योंरा एक निर्धारित प्रपत्र में हर वित्तीय वर्ष में सामान्य प्रशासन विभाग को दिया जाता रहा है। परंतु उस प्रपत्र को देखने की फुर्सत किसको है, जो दिया वो सही। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आदेश तो दे डाला पर इसकी मॉनीटरिंग क्या वह स्वयं करेंगे या किसी इमानदार नौकरशाह की नजरों सेेे जांच पड़ताल करेंगे। आदेश के बाद आंकड़ेबाज नौकरशाहों ने जब अपनी संतुलित संपति को सार्वजनिक किया तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई। प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित देश की राजधानी दिल्ली में करोड़ों की संपत्ति का मामला सामने आया। एक बीमारू राज्य की नौकरशाहों द्वारा अकूत संपत्ति अर्जित करने की बात सामने आते ही केंद्र की खुफिया एजेंसियों ने अपनी आंखें तरेरनी शुरू कर दी है। खुफिया विभाग के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में केंद्रीय जांच एजेंसियों के 5 अधिकारी गुपचुप तरीके से मप्र के नौकरशाहों की कमाई और करतूतों की फाईल खंगाल रहें है। आयकर विभाग तो यह देखकर हैरान है कि अधिकारियों की काली कमाई को ठिकाने लगाने के लिए लगभग सभी बीमा कंपनियों ने अपना जाल बुना और सरकार को चूना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सभी कंपनियों और अधिकारियों ने सरकार के उस नियम का जमकर फायदा उठाया जिसमें 50 हजार से अधिक के लेनदेन पर पेन नंबर देना अनिवार्य होता है। बीमा कंपनी के एजेंटों ने इस नियम का तोड़ निकालते हुए लोगों की काली कमाई सफेद करने वहीं तरीका अपनाया जो सीमा जायसवाल ने अपनाया था।
सीमा ने भी प्रदेश के कई भ्रष्ट अफसरों की करोड़ों रुपए काली कमाई को अपनी बीमा कंपनी आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में निवेश कराया था। सीमा ने पचास हजार से कम के ड्राफ्ट आदि के माध्यम से बीमा पालिसी बनाई थी। ऐसे में आयकर विभाग को पता ही नहीं चल पाया कि कब लोगों के करोड़ों रुपए बीमा में निवेश के माध्यम से सफेद होते गए। उधर बीमा में निवेश को आयकर में छूट होने के कारण सरकार के पल्ले में कुछ भी नहीं आया। बताया जाता है कि आयकर विभाग अब सभी बीमा कंपनियों के रिकार्ड खंगाल रहा है। विभाग के पास इन बीमा कंपनियों में प्रदेश से किए गए निवेश की सूची आ गई है। इस सूची की पड़ताल में कई सफेदपोश नेताओं के अलावा अफसरों और कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपए निवेश किए जाने का पता चला है। विभाग इनकी सूची तैयार कर रहा है।
आयकर विभाग के पास बजाज एलायंस, बिरला सन लाईफ, एचडीएफसी, टाटा एआईजी, एसबीआई लाईफ आदि इंश्योरेंस कंपनियों का रिकार्ड आ चुका है। विभाग के अधिकारियों ने अपने साफ्टवेयर के माध्यम से इस सूची में से प्रदेश के कई ऐसे नाम खोज निकाले हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए बीमा के माध्यम से निवेश किया है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के कई अफसरों के अलावा तृतीय वर्ग के कर्मचारियों ने भी लाखों रुपए की बीमा पालिसी ले रखी है। इसमें पुलिस विभाग के कई आरक्षक भी शामिल हैं जिन्होंने लाखों रुपए बीमा कंपनियों में निवेश किया है। जानकारों के अनुसार विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन कार्यरत फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट (एफआईयू) से बड़ी संख्या में संदेहास्पद लेन-देन की जानकारी मिली है। वर्ष 2004 में स्थापित फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट रिजर्व बैंक, बीमा नियामक प्राधिकरण (आईआरडीए) और सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) की मदद से काम करती है। यह यूनिट हर संदेहास्पद लेन-देन पर नजर रखे हुए है। विभाग के सूत्रों के अनुसार पचास हजार से कम राशि के नगद ड्राफ्ट पर भी संदेह होने पर यह यूनिट नजर रखती है।
विभाग को एफआईयू के साथ आल इंडिया रिपोर्टिग (एआईआर) सिस्टम से भी जानकारी मिल रही है। इसमें के्रडिट कार्ड से किए गए बड़े भुगतान व अन्य तरीकों से किए गए निवेश व खर्चो की जानकारी भी संबंधित आयकर अधिकारी तक पहुंच रही है। विभाग के सूत्रों के अनुसार बीमा कंपनियों से भी पचास हजार से व उससे अधिक प्रीमियम का भुगतान करने वालों की जानकारी बुलवाई गई है।
विभाग के सूत्रों के अनुसार कुछ लोग बंगलुरू, पुणे या अन्य शहरों में पढऩे वाले बच्चों को हर माह 25 से 50 हजार रुपए भेज रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी छुपाते हैं। राशि भोपाल मे जमा होती है और किसी अन्य शहर में निकासी होती है जबकि संबंधित व्यक्ति का दावा होता है कि उसने केवल पैसा जमा किया और निकाला खर्च नहीं किया। इसके अलावा किसी अन्य शहर में टूर पर जाते समय राशि निकालते हैं, वहां खर्च करते हैं और भोपाल आकर फिर पैसे जमा करा देते हैं। यह लोग भी तर्क देते हैं कि उन्होंने खर्चा नहीं किया। आयकर विभाग इन सभी के द्वारा बीमा कंपनी में किए गए निवेश की पूरी सूची तैयार कर रहा है। विभाग साथ ही इनके आयकर रिटर्न की भी पड़ताल कर पता लगा रहा है कि इन लोगों ने बीमा में किए गए निवेश का उल्लेख रिटर्न में किया है या नहीं। इसके बाद विभाग सभी को नोटिस भेज कर इनके द्वारा किए गए निवेश के आय के स्त्रोतों की जानकारी मांगेगा।
आयकर विभाग के छापों के बाद मप्र को बीमारु राज्य कहने वालों को इस विषय पर दोबारा सोचने की जरूरत है। कारण प्रदेश में हर साल बढ़ते करोड़पति व्यापारियों के अलावा नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों के यहां से मिल रही करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति को देखकर नहीं लगता कि प्रदेश बीमारु राज्य है। आयकर विभाग के छापों ने प्रदेश के कई लोगों की पोल खोली वहीं पिछले तीन साल में ही आयकर छापों में करीब छह सौ करोड़ की अघोषित संपत्ति सरेंडर की जा चुकी है। इसके अलावा करीब 130 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति आयकर विभाग जब्त कर चुका है। यही नहीं छापों में मिले दस्तावेज बताते हैं कि कुछेक अधिकारियों, मंत्रियों और उद्योगपतियों के बीच बने गठजोड़ ने शासकीय योजनाओं के माध्यम से अकूत संपदा जोड़ी है। आयकर सूत्रों की मानें तो प्रदेश में दिनों दिन बढ़ रहे आय के स्त्रोतों में इन योजनाओं का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। आयकर छापे में सरेंडर अघोषित आय या फिर जब्त संपत्ति के अलावा आयकर विभाग ने छापों में हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति का पता लगाया।
ऐन-केन प्रकारेण धन पाने की लालसा ने अधिकारी की कार्य संस्कृति को मार दिया है। हालात यह हो गई कि वह चाहे मध्यप्रदेश हो या यूं कहिए कि सूबेदार अपने विवेक को ताले में बंद रखकर उनकी बनाई हुई राह पर चलता है। ऐसे में कौन अधिकारी मूर्ख होगा जो मुखिया को मुखिया मानकर व्यवहार करेगा। जब मुखिया की हालत वैसाखियों पर चलने जैसी हो जाए तब कौन इन अधिकारियों से हिसाब मांगेगा। जिस जनता के टैक्स से इन अधिकारियों की मोटी तनख्वाह निकलती है उनके काम करने में फाईल या तो मिलती नहीं है या फाईल इतनी मोटी हो जाती है कि उसका कि उसका निराकरण कोई जन भी नहीं कर सकता है। उपसचिव, सचिव और न जाने कितने सचिवों की एक जानलेवा शृंखला रावण की मुंडी की तरह एक दूसरे से जुडी हुई है।
सार्वजनिक शौचालय के काम भी इन मुंडियों के हस्ताक्षर के बिना पूरा नहीं होता है। ऐसे में कोई मुंडी बीच में से गायब हो जाए, तो मामला पेंडिंग। अब लंबित मामले को और लंबित करने की कला भी इनके ही पास है झट एक जिज्ञासा वाला प्रश्न लिखा और फाईल नीचे रख दी। फाईल जिस गति से आई थी उसी गति से सद्गति को प्राप्त हो जाती है और उसके मरने की खबर किसी को भी लगती नहीं है। लेकिन थैलीशाहों की फाईल पर नौकरशाहों की नजर ही नहीें होती है, बल्कि नजारे इनायत भी होती है। किसी जमीन का उपयोग बदलना हो या हाईराइज बिल्ंिडग की परमिशन, जंगल से खेत खेत से जंगल और कालानाइजर्स बंधुओ के काम के लिए एक नहीं दस-दस बार केबिनेट बैठ जाएगी। बार-बार अधिकारी वही फाईल मीटिंग में लेकर आएगा जिसका सौदा पट चुका है। इन सौदों की भनक तक नहीं लगती और क्या निर्णय लिए गए वह जानना तो आम आदमियों के लिए दूर की कौड़ी है। वैसे देखा जाए तो सन् 1993 से लेकर अभी तक आईएएस मंडली किसी न किसी विक्रम के कांधे पर बेताल की तरह चिपकी हुई है और उसे मालूम है कि विक्रम को उलझाकर रखेंगे तो पेड़ पर उल्टा लटकने की बारी नहीं आएगा।

शुक्रवार, 18 जून 2010

मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन के बीच बढ़ रही दूरियों

मध्य प्रदेश भाजपा आंतरिक संघर्ष से रूबरू है. सत्ता और संगठन के बीच क्रमश: बढ़ रही दूरियों के कारण राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बढ़ता जा रहा है. प्रभात झा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के अंदर एक नए राजनीतिक ध्रुव का जन्म हुआ है. भारतीय जनता पार्टी सत्ता की दूसरी पारी में आंतरिक संघर्ष की ओर बढ़ती नज़र आ रही है. शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा को राज्य में दूसरी राजनीतिक पारी खेलने का अवसर प्रदान किया है, परंतु राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली विजय का कारण बहुत कुछ कांगे्रस का आंतरिक संघर्ष भी था. भारतीय जनता पार्टी सरकार की पहली पारी में जिस स्तर पर मंत्रियों के भ्रष्टाचार, प्रशासनिक निरंकुशता और भाजपा कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता के मामले सामने आए थे, उससे दोबारा विजय के संकेत तो नहीं ही मिल रहे थे.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है.

भाजपा नेताओं का यह भी मानना है कि दूसरी पारी की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस के अंदरूनी बिखराव की भी रही है. भाजपा के शासनकाल में सत्ता और संगठन के मध्य कभी कोई टकराव नहीं नज़र आता था, लेकिन पिछले दिनों राज्य सरकार की जो गतिविधियां रहीं, उनसे यह सा़फ संकेत मिलने लगा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने अस्तित्व-संरक्षण के लिए नई बिसात बिछाना चाहते हैं. भाजपा संगठन में प्रभात झा की ताजपोशी से यह संदेश मिला था कि पार्टी राज्य में अपनी बुनियाद मज़बूत करने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए कुछ ज़मीनी प्रयोग करना चाहती है. प्रभात झा वास्तव में दल के लिए एक नई कर्मभूमि के निर्माण की कोशिश के लिए ही लाए गए थे. प्रभात झा ने हालांकि अभी तक अपनी टीम की घोषणा नहीं की है, पर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि उनकी टीम में उन्हें ही स्थान मिल पाएगा, जिनका जनता और कार्यकर्ताओं से संपर्क बना हुआ है.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है. भाजपा नेताओं का अंदाज़ा है कि नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता बढ़ाने के पीछे शिवराज सिंह चौहान की प्रशासनिक कमजोरियों को पूरा करने का लक्ष्य है. मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में फिलहाल परिवर्तन के संकेत नहीं हैं, फिर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों पर विभिन्न आरोपों का प्रमाणीकरण विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा कराया जा रहा है. केंद्र के साथ राज्य के संबंधों के प्रति शिवराज सिंह की लापरवाही ने कई केंद्रीय योजनाओं का धन आवंटन रुकवा दिया है. पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रियों द्वारा राज्य में दौरों के पूर्व राज्य सरकार से अनुमति लेने संबंधी सरकारी फतवा स्वयं शिवराज सिंह के लिए भारी पड़ गया है. बाद में मुख्यमंत्री को न स़िर्फ उक्त आदेश वापस लेना पड़ा, बल्कि केंद्रीय नेताओं के समक्ष अपनी स्थिति भी स्पष्ट करनी पड़ी. इधर शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र पुलिस को वापस ले लिया है. यह कार्रवाई कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ की गई, पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ नहीं. प्रशासन के ऐसे दोहरे मापदंड से मध्य प्रदेश सरकार के राजनीतिक-प्रशासनिक असंतुलन का पता चलता है.

प्रशासनिक अराजकता पर नियंत्रण पाने में राज्य सरकार खुद को सक्षम नहीं पा रही है. शासन के प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालने वाला जनसंपर्क विभाग भी अराजकता का गढ़ बन गया है. विभिन्न केंद्रीय विभागों द्वारा भेजे गए जांच दलों की रिपोर्टें केंद्र द्वारा आवंटित राशि में भ्रष्टाचार के खुलासे का प्रमाण बनती जा रही हैं. भाजपा शासनकाल में ही उज्जैन विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद नेताओं द्वारा प्रो. अग्रवाल की कथित हत्या की गुत्थी सुलझाने में सरकार पूरी तरह असफल रही. आज तक पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह और कमल पटेल के विरुद्ध कायम किए गए आपराधिक प्रकरणों में भी सरकार बचाव का कोई मार्ग नहीं तलाश सकी. प्रशासनिक अराजकता की हद तब हुई, जब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की पहल पर राज्य के मुख्य सचिव अवनि वैश्य के विरुद्ध बाक़ायदा वारंट जारी हुआ. राज्य सरकार की गतिविधियों पर संघ और संगठन दोनों की निगाह है. संगठन यह महसूस कर रहा है कि दूसरी बार सत्ता पाने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में दल का आधार निरंतर कम होता जा रहा है. यही कारण है कि वर्ष 2011 के फरवरी माह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिशानिर्देश पर मध्य प्रदेश के आदिवासी ज़िले मंडला में आदिवासी महाकुंभ की घोषणा की गई है.

इस महाकुंभ में बीस लाख आदिवासियों को एकत्र करने की योजना बनाई गई है. महाकुंभ को भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं द्वारा संबोधित किया जाना है. संघ की इस पहल पर आयोजन के एक वर्ष पूर्व राज्य सरकार सौ करोड़ रुपये से अधिक के अनुमानित व्यय का लक्ष्य बना चुकी है. वास्तव में भाजपा तीसरी बार सत्ता पाने के लिए परिवर्तन की लहर चलाना चाहती है. संगठन के पदाधिकारियों का मानना है कि यदि तीसरी बार भाजपा सत्ता पर क़ाबिज़ होती है तो मध्य प्रदेश को गुजरात की तरह सुरक्षित राज्य घोषित करने में परेशानी नहीं होगी. दूसरी ओर मध्य प्रदेश को केंद्र बनाकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी स्थायी सत्ता कायम रखी जा सकेगी. भाजपा ने इस कार्य के लिए अपने स्वयंसेवी संगठनों को भी सक्रिय करना शुरू कर दिया है. जन अभियान परिषद के माध्यम से मध्य प्रदेश के सुदूर आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में संघ समर्थित स्वयंसेवी संगठनों का एक बड़ा ताना-बाना तैयार किया जा रहा है. तीन वर्ष की अवधि में निर्धारित योजना के अनुसार सत्ता का लाभ भाजपा के छोटे से छोटे कार्यकर्ता तक पहुंचाना और उसे वित्तीय रूप से स्वावलंबी बनाना एकमात्र लक्ष्य नज़र आता है. भाजपा संगठन राजनीति में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका से भलीभांति परिचित है. उसे मालूम है कि राजनीति की कमज़ोरियों को ढकने के लिए यदि मीडिया एक प्रभावशाली तंत्र है तो स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. एक अनुमान के अनुसार, इस समय मध्य प्रदेश में 1700 से अधिक स्वयंसेवी संगठन भाजपा एवं स्वयंसेवक संघ की रीतियों और नीतियों के तहत काम करने के लिए सक्रिय हो चुके हैं. राज्य के समस्त वित्तीय संसाधन इन स्वयंसेवी संगठनों के लिए खुले रहेंगे.

प्रभात झा के सक्रिय होने के बाद संगठन की सक्रियता अब सत्ता पर नज़र आने लगी है. कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से लेकर प्रशासनिक परिवर्तनों तक संगठन की भूमिका को नकार पाना अब शिवराज सिंह के वश की बात नहीं है. यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सत्ता को स्वयंसेवक संघ की नीतियों के अंतर्गत संगठित रूप से संचालित करने के लिए अभी कई परिवर्तन नज़र आने शेष हैं. प्रभात झा की टीम के गठन के बाद यह स्पष्ट है कि भाजपा शिवराज पोषित रहेगी या अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहकर राज्य में एक स्थायी राजनीतिक आकार ग्रहण कर सकेगी.

कांग्रेस दौ़ड में ही नहीं देश में राजनीतिक रूप से कांग्रेस का अस्तित्व मृतप्राय है. कांग्रेस की गतिविधियां बताती हैं कि वह दौड़ में है ही नहीं. व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त राज्य के कांग्रेसी नेता भाजपा की किसी भी चाल का जवाब देने में असफल रहे हैं. मज़बूत संगठन शक्ति के प्रतीक समझे जाने वाले सुरेश पचौरी पिछले दो माह के दौरान केवल अपने राज्यसभा टिकट के लिए संघर्षरत दिखे. कांग्रेस के भविष्य को लेकर यह किंवदंती प्रचलित है कि जब भाजपा सरकार में बिना किसी रोक-टोक के व्यक्तिगत कमाई का रास्ता खुला हुआ है तो अपनी सरकार के लिए पहल करने की ज़रूरत ही क्या है. अपने-अपने राजनीतिक आकाओं को हाज़िरी देकर और हाईकमान के सामने मीडिया में छपे हुए तथ्यों का विश्लेषण करके राज्य कांग्रेस के नेता अपने राजनीतिक दायित्वों को पूरा कर रहे हैं. वे राजनीति से अधिक अपने व्यवसाय में व्यस्त हैं और कार्यकर्ता पूरी तरह उपेक्षित. कांग्रेस के लिए संभवत: मध्य प्रदेश अब प्राथमिकता सूची में नहीं है.

मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन के बीच बढ़ रही दूरियों

मध्य प्रदेश भाजपा आंतरिक संघर्ष से रूबरू है. सत्ता और संगठन के बीच क्रमश: बढ़ रही दूरियों के कारण राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बढ़ता जा रहा है. प्रभात झा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के अंदर एक नए राजनीतिक ध्रुव का जन्म हुआ है. भारतीय जनता पार्टी सत्ता की दूसरी पारी में आंतरिक संघर्ष की ओर बढ़ती नज़र आ रही है. शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा को राज्य में दूसरी राजनीतिक पारी खेलने का अवसर प्रदान किया है, परंतु राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली विजय का कारण बहुत कुछ कांगे्रस का आंतरिक संघर्ष भी था. भारतीय जनता पार्टी सरकार की पहली पारी में जिस स्तर पर मंत्रियों के भ्रष्टाचार, प्रशासनिक निरंकुशता और भाजपा कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता के मामले सामने आए थे, उससे दोबारा विजय के संकेत तो नहीं ही मिल रहे थे.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है.

भाजपा नेताओं का यह भी मानना है कि दूसरी पारी की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस के अंदरूनी बिखराव की भी रही है. भाजपा के शासनकाल में सत्ता और संगठन के मध्य कभी कोई टकराव नहीं नज़र आता था, लेकिन पिछले दिनों राज्य सरकार की जो गतिविधियां रहीं, उनसे यह सा़फ संकेत मिलने लगा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने अस्तित्व-संरक्षण के लिए नई बिसात बिछाना चाहते हैं. भाजपा संगठन में प्रभात झा की ताजपोशी से यह संदेश मिला था कि पार्टी राज्य में अपनी बुनियाद मज़बूत करने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए कुछ ज़मीनी प्रयोग करना चाहती है. प्रभात झा वास्तव में दल के लिए एक नई कर्मभूमि के निर्माण की कोशिश के लिए ही लाए गए थे. प्रभात झा ने हालांकि अभी तक अपनी टीम की घोषणा नहीं की है, पर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि उनकी टीम में उन्हें ही स्थान मिल पाएगा, जिनका जनता और कार्यकर्ताओं से संपर्क बना हुआ है.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है. भाजपा नेताओं का अंदाज़ा है कि नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता बढ़ाने के पीछे शिवराज सिंह चौहान की प्रशासनिक कमजोरियों को पूरा करने का लक्ष्य है. मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में फिलहाल परिवर्तन के संकेत नहीं हैं, फिर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों पर विभिन्न आरोपों का प्रमाणीकरण विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा कराया जा रहा है. केंद्र के साथ राज्य के संबंधों के प्रति शिवराज सिंह की लापरवाही ने कई केंद्रीय योजनाओं का धन आवंटन रुकवा दिया है. पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रियों द्वारा राज्य में दौरों के पूर्व राज्य सरकार से अनुमति लेने संबंधी सरकारी फतवा स्वयं शिवराज सिंह के लिए भारी पड़ गया है. बाद में मुख्यमंत्री को न स़िर्फ उक्त आदेश वापस लेना पड़ा, बल्कि केंद्रीय नेताओं के समक्ष अपनी स्थिति भी स्पष्ट करनी पड़ी. इधर शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र पुलिस को वापस ले लिया है. यह कार्रवाई कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ की गई, पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ नहीं. प्रशासन के ऐसे दोहरे मापदंड से मध्य प्रदेश सरकार के राजनीतिक-प्रशासनिक असंतुलन का पता चलता है.

प्रशासनिक अराजकता पर नियंत्रण पाने में राज्य सरकार खुद को सक्षम नहीं पा रही है. शासन के प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालने वाला जनसंपर्क विभाग भी अराजकता का गढ़ बन गया है. विभिन्न केंद्रीय विभागों द्वारा भेजे गए जांच दलों की रिपोर्टें केंद्र द्वारा आवंटित राशि में भ्रष्टाचार के खुलासे का प्रमाण बनती जा रही हैं. भाजपा शासनकाल में ही उज्जैन विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद नेताओं द्वारा प्रो. अग्रवाल की कथित हत्या की गुत्थी सुलझाने में सरकार पूरी तरह असफल रही. आज तक पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह और कमल पटेल के विरुद्ध कायम किए गए आपराधिक प्रकरणों में भी सरकार बचाव का कोई मार्ग नहीं तलाश सकी. प्रशासनिक अराजकता की हद तब हुई, जब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की पहल पर राज्य के मुख्य सचिव अवनि वैश्य के विरुद्ध बाक़ायदा वारंट जारी हुआ. राज्य सरकार की गतिविधियों पर संघ और संगठन दोनों की निगाह है. संगठन यह महसूस कर रहा है कि दूसरी बार सत्ता पाने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में दल का आधार निरंतर कम होता जा रहा है. यही कारण है कि वर्ष 2011 के फरवरी माह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिशानिर्देश पर मध्य प्रदेश के आदिवासी ज़िले मंडला में आदिवासी महाकुंभ की घोषणा की गई है.

इस महाकुंभ में बीस लाख आदिवासियों को एकत्र करने की योजना बनाई गई है. महाकुंभ को भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं द्वारा संबोधित किया जाना है. संघ की इस पहल पर आयोजन के एक वर्ष पूर्व राज्य सरकार सौ करोड़ रुपये से अधिक के अनुमानित व्यय का लक्ष्य बना चुकी है. वास्तव में भाजपा तीसरी बार सत्ता पाने के लिए परिवर्तन की लहर चलाना चाहती है. संगठन के पदाधिकारियों का मानना है कि यदि तीसरी बार भाजपा सत्ता पर क़ाबिज़ होती है तो मध्य प्रदेश को गुजरात की तरह सुरक्षित राज्य घोषित करने में परेशानी नहीं होगी. दूसरी ओर मध्य प्रदेश को केंद्र बनाकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी स्थायी सत्ता कायम रखी जा सकेगी. भाजपा ने इस कार्य के लिए अपने स्वयंसेवी संगठनों को भी सक्रिय करना शुरू कर दिया है. जन अभियान परिषद के माध्यम से मध्य प्रदेश के सुदूर आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में संघ समर्थित स्वयंसेवी संगठनों का एक बड़ा ताना-बाना तैयार किया जा रहा है. तीन वर्ष की अवधि में निर्धारित योजना के अनुसार सत्ता का लाभ भाजपा के छोटे से छोटे कार्यकर्ता तक पहुंचाना और उसे वित्तीय रूप से स्वावलंबी बनाना एकमात्र लक्ष्य नज़र आता है. भाजपा संगठन राजनीति में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका से भलीभांति परिचित है. उसे मालूम है कि राजनीति की कमज़ोरियों को ढकने के लिए यदि मीडिया एक प्रभावशाली तंत्र है तो स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. एक अनुमान के अनुसार, इस समय मध्य प्रदेश में 1700 से अधिक स्वयंसेवी संगठन भाजपा एवं स्वयंसेवक संघ की रीतियों और नीतियों के तहत काम करने के लिए सक्रिय हो चुके हैं. राज्य के समस्त वित्तीय संसाधन इन स्वयंसेवी संगठनों के लिए खुले रहेंगे.

प्रभात झा के सक्रिय होने के बाद संगठन की सक्रियता अब सत्ता पर नज़र आने लगी है. कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से लेकर प्रशासनिक परिवर्तनों तक संगठन की भूमिका को नकार पाना अब शिवराज सिंह के वश की बात नहीं है. यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सत्ता को स्वयंसेवक संघ की नीतियों के अंतर्गत संगठित रूप से संचालित करने के लिए अभी कई परिवर्तन नज़र आने शेष हैं. प्रभात झा की टीम के गठन के बाद यह स्पष्ट है कि भाजपा शिवराज पोषित रहेगी या अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहकर राज्य में एक स्थायी राजनीतिक आकार ग्रहण कर सकेगी.

कांग्रेस दौ़ड में ही नहीं देश में राजनीतिक रूप से कांग्रेस का अस्तित्व मृतप्राय है. कांग्रेस की गतिविधियां बताती हैं कि वह दौड़ में है ही नहीं. व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त राज्य के कांग्रेसी नेता भाजपा की किसी भी चाल का जवाब देने में असफल रहे हैं. मज़बूत संगठन शक्ति के प्रतीक समझे जाने वाले सुरेश पचौरी पिछले दो माह के दौरान केवल अपने राज्यसभा टिकट के लिए संघर्षरत दिखे. कांग्रेस के भविष्य को लेकर यह किंवदंती प्रचलित है कि जब भाजपा सरकार में बिना किसी रोक-टोक के व्यक्तिगत कमाई का रास्ता खुला हुआ है तो अपनी सरकार के लिए पहल करने की ज़रूरत ही क्या है. अपने-अपने राजनीतिक आकाओं को हाज़िरी देकर और हाईकमान के सामने मीडिया में छपे हुए तथ्यों का विश्लेषण करके राज्य कांग्रेस के नेता अपने राजनीतिक दायित्वों को पूरा कर रहे हैं. वे राजनीति से अधिक अपने व्यवसाय में व्यस्त हैं और कार्यकर्ता पूरी तरह उपेक्षित. कांग्रेस के लिए संभवत: मध्य प्रदेश अब प्राथमिकता सूची में नहीं है.

आज के आराध्य

आज के आराध्य वे हैं जो या तो हमारे दिलों में घुसकर हमें डरा सकें या हमारे दिल की हर मुराद पूरी कर सकें. कौन और कैसे हैं डराने और लुभाने वाले आज के दौर के हमारे ये आराध्य, बता रहे हैं अतुल चौरसिया

‘कोस-कोस पे पानी बदले सवा कोस पे बानी' वाली कहावत में बहुत आसानी-से अगला हिस्सा जोड़ा जा सकता है -‘दस कोस पे ध्यानी'. ध्यानी यानी भक्त.

हमारे देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज के आराधक और उनके आराध्य उतनी ही तेजी के साथ अपना चोला बदलते चलते हैं जितनी तेजी से यहां के लोगों की बोली. हर गांव-शहर-मुहल्ले के अपने आस्था के प्रतीकों का होना इस देश में उतना ही सहज है जितना जीने के लिए हवा-पानी. लमही के बेलवांबाबा, सरायमीर के अलीअश्कां बाबा, नरसिंहपुर के दुल्हादेव, लखनऊ के बाबा खम्मन पीर, रामदेवरा के रामदेव बाबा, मोकामा के चूहड़मल, छपरा की अंबा देवी से लेकर सुदूर दक्षिण भारत के अय्यप्पन तक स्थानीय देवी-देवताओं और श्रद्धा-उपासना के बिंबों की एक ऐसी अनवरत श्रृंखला है जिसका संबंध भारतीय पौराणिक संदर्भों से उतना गहरा या जुड़ा न भी हो तो भी सब के सब उसी परंपरा से प्रेरित-आस्वादित हैं जिसमें पहले से ही तैंतीस करोड़ देवी-देवता विद्यमान हैं.

आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं - शनिदेव, शिरडीवाले साईं बाबा, भैरवनाथ और विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें
अगर बारीकी से नजर दौड़ाएं तो हिंदू समुदाय की आस्था के प्रतीक कोस बदलने पर ही नहीं, बल्कि हर कोस पर दिन-हफ्ते-साल और संगत बदलने पर भी बदलते हैं. फलां देवता मनोकामनाएं पूरी नहीं कर पाए तो कुछ हफ्ते बाद हमारी आस्था नई शरण ढूंढ़ लेती है. किसी जानने वाले की मनोकामना पूरी हो गई तो हमारी श्रद्धा उस दिशा का रुख कर लेती है. ‘परिवर्तन संसार का अकाट्य सिद्धांत है' वाली परिपाटी को हम भारतीयों ने अपनी आस्था के संदर्भ में भी उतना ही बड़ा सत्य मान लिया है.

धर्मभीरुता भारतीय समाज के मूल में है इसके बावजूद धर्म और आस्था के मामलों में छोटी-मोटी छूट लेने और नए-नए प्रयोगों से हमें कोई परहेज नहीं. ये छूट और प्रयोग धीरे-धीरे कब एक नए चलन का सूत्रपात कर देते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते ये चलन किसी अलग ही मत, संप्रदाय या हमारी श्रद्धा के किसी जबर्दस्त प्रतीक का स्वरूप धारण कर लेते है. इसीलिए अब तक गुमनाम रहे कुछ आराध्य पिछले कुछ वर्षों में अचानक इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि टीवी चैनलों से लेकर सड़कों पर दौड़ती बेशुमार कारों के शीशों तक पर दिख जाते हैं. रातों-रात धरती का सीना फाड़कर प्रकट हो जाने वाले मंदिर-मस्जिद-मजारों और उनके ऊपर दो-चार दिन के भीतर ही 'अतीव शक्तिसंपन्न, प्राचीन सिद्धपीठ' का बोर्ड लटक जाने की परंपरा का एक अक्खड़ बनारसी नमूना वरिष्ठ साहित्यकार डॉ काशीनाथ सिंह ने अपने मशहूर उपन्यास 'काशी का अस्सी' में कुछ यूं पेश किया है- ‘कंपटीशन शुरू हो गया है जीटी रोड के किनारे मंदिर, मस्जिद, मजार बनाकर जमीन हड़पने का. वे भी हड़प रहे हैं, लेकिन तुम्हारे मुकाबले वे कहीं नहीं हैं. मस्जिद खड़ी करने में तो समय लगता है, यहां तो एक ईंट या पत्थर फेंका, गेरू या सेनुर पोता, फूल-पत्ती चढ़ाया और माथा टेक दिया- जै बजरंग बली. और दो आदमी ढोलक-झाल लेकर बैठ गए- अखंड हरिकीर्तन! भगवान धरती फोड़कर प्रकट भए हैं..'

आस्था की इसी चादर तले तमाम अनर्गल चीजें अनजाने में ही समाज का हिस्सा बनती जाती हैं जिनका उस समय हमें एहसास नहीं होता जिसमें हम उन्हें स्वीकार रहे होते हैं, क्योंकि यह बदलाव बहुत दबे पांव हमारे बीच पैठ बनाता है. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश इस प्रवृत्ति को हमारी पलायनवादी सोच का प्रतीक मानते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आता है. इसका मकसद होता है न्याय, सच्चाई और मानवता. लेकिन धर्म में जब विवेकशून्यता की स्थिति पैदा होती है तब यह पाखंड की ओर चल पड़ता है, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद को प्रतिबंधित कर दिया जाता है और धर्म और आस्था की आड़ में किसी भी सवाल-जवाब को अवैध घोषित कर दिया जाता है.' स्वामी अग्निवेश के विचारों को थोड़ा आगे ले जाएं तो इस स्थिति के बाद धर्म अपनी मार्गदर्शक वाली
मूल भूमिका से भटक कर कट्टरवाद की ओर बढ़ जाता है.

परंपरागत हिंदू देवी-देवताओं में भगवान विष्णु और उनके अवतारों की आराधना सबसे ज्यादा होती रही है. इसके अतिरिक्त शिवजी, गणेश, लक्ष्मी, दुर्गा आदि ऐसे देवी-देवता रहे हैं जिन्हें थोड़ी आसान भाषा में मुख्यधारा के भगवान कहा जा सकता है. तमाम स्थानीय देवी-देवताओं के साथ-साथ इनकी आराधना का ग्राफ कमोबेश पूरे देश में एक-सा रहता रहा है. किंतु विगत एक दशक के दौरान धर्मालुओं की पूजा-पाठ की शैलियों और व्यवस्थाओं में काफी बदलाव देखने को मिले हैं. कई अध्ययनों में भी इस तरह की चौंकाने वाली प्रवृत्तियां उजागर हुई हैं. साथ ही ये तथ्य कुछ और नई और रोचक परिपाटियों के गठन की ओर भी इशारा कर रहे हैं.

शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई ये भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है
भक्तों की धर्मभीरुता, पीर-पुजारियों के अलौकिक महिमामंडन और इन सबसे ऊपर मीडिया महाराज की कृपा से आराध्यों का एक नया समूह पिछले कुछ सालों में जबर्दस्त तरीके से उभरा है. परंपरागत देवी-देवता, भक्तों की संख्या और आराधना के मामले मे पीछे छूटते जा रहे हैं और मुख्य रूप से आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं - शनिदेव, शिरडीवाले साईं बाबा, भैरवनाथ और जगह-जगह दिखने वालीं विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें. यहां पहले तीन तो आस्था के एक प्रकार से निश्चित रंग-रूप, हानि-लाभ और पूजा-पद्धतियों वाले प्रतीक हैं लेकिन मजारों के मामले में ऐसा नहीं है. घड़ी वाले से लेकर मटके वाले पीर तक की मजारें इस देश के अमूमन हर हिस्से में फैली हुई हैं. ये अलग-अलग लोगों की मजारें है, जिनके संदेश-उपदेश, और जियारत के तौर-तरीके एक-दूसरे के जैसे होते हुए भी अलग हो सकते हैं. मसलन हर जगह मजारों पर चादर तो चढ़ाई जाती है लेकिन इसके साथ कहीं पर घड़ी और कही मटका चढ़ाने का चलन भी है.

इस श्रेणी के धार्मिक प्रतीकों को अगर एक दर्जे में रखकर देखें तो इनकी शरण में आने वालों की संख्या बड़े-बड़े देवी-देवताओं के भक्तों को मात दे सकती है. अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दरगाहों-मजारों की प्रतिष्ठा और हिंदू धर्म के नये-नये देवताओं के अचानक ही चलन में आने की क्या वजह हो सकती है? इस सवाल पर स्वामी अग्निवेश की राय है, ‘वक्त-वक्त पर लोग नए-नए प्रतीक गढ़ते हैं, फिर उनका भय दिखाकर लोगों का भयादोहन किया जाता है. धीरे-धीरे जब उनका असर कम होता है, तब यह तबका किसी नए प्रतीक को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाता है.'

महज कुछ साल पहले तक शनिदेव की छवि एक ऐसे देवता की थी जिनके न तो क्रोध की कोई सीमा थी और न ही कृपा का कोई पारावार. आमतौर पर भक्त उनके कोप से बचने की कोशिश में ही रहते थे. लेकिन हाल के कुछ वर्षो में टीवी और नए-नए बाबाओं के प्रचार-प्रसार ने इनकी लोकप्रियता को एकदम से आसमान पर पहुंचा दिया. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर में शनिदेव का सबसे विशाल मंदिर है. एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच सालों के दौरान शिंगणापुर में शनिदर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या और चढ़ावे ने यहां से थोड़ी ही दूर पर स्थित शिरडी के सांईबाबा की महिमा को भी फीका कर डाला है. एसी नेल्सन के एक सर्वे के मुताबिक शनिदेव ने देवताओं की लोकप्रियता सूची के सभी पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है. वे बाकी तमाम देवी-देवताओं के साथ ही साईंबाबा और भैरवनाथ जैसे भक्तप्रिय अाराध्यों को काफी पीछे छोड़ चुके हैं. जहां परंपरागत देवी देवताओं की भक्ति के पीछे भक्तों की श्रद्धा काम कर रही होती है वहीं शनि भक्ति की लहर आने की मुख्य वजह है उनके प्रकोप से खुद को बचाने की मुराद और साथ ही उनकी कृपा से खुद को धनधान्य से भरपूर बनाने की लालसा. वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘शनि मूलत: संकट के प्रतीक रहे हैं और इस संकट का निवारण भी उन्हीं की शरण में होने का प्रावधान है. और बीते दो दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन में जिस तरह से भौतिक आसक्ति बढ़ी है उससे लोगों की इच्छाएं भी बहुत बढ़ गईं. इस बढ़ी हुई लालसा से पैदा हुए संकट को दूर करने के लिए लोग शनि, भैरव आदि की शरण लेना कहीं ज्यादा मुफीद समझते हैं.' लोग शनिदेव के दर्शन तो करने जाते हैं पर उनसे नजरें चुराते हुए. शनिभक्ति की लहर शिंगणापुर से निकलकर भोपाल-दिल्ली के गलीकूचों तक फैल गई है. समय ने शनिदेव के पक्ष में पलटी खाई है और पिछले चार-पांच सालों के दौरान भोपाल में कदम-कदम पर शिंगणापुर वाले शनिदेव प्रकट हो गए हैं. हर नुक्कड़-बस्ती में उनके मंदिर दिख जाते हैं और शनिदेव की आस्था की लहर में हजारों एकड़ जमीन तमाम नियम कानूनों को धता बताकर शनिदेव को समर्पित हो गई है.

आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले धर्मालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक छूने लगीअगर इस तथ्य पर सावधानी से निगाह डालें तो हम पाएंगे कि शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई ये भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है. टीवी के इस विस्तार के साथ दाती मदन महाराज, आसाराम बापू, स्वामी रामदेव जैसे धर्म गुरुओं और संतों की पहुंच भी घर-घर में बढ़ी है. शनिदेव की बढ़ती लोकप्रियता में सबसे बड़ा योगदान हिंदी के एक बड़े 'समाचार' चैनल इंडिया टीवी और शनिदेव के परमभक्त दाती मदन महाराज का है. दाती महाराज शनिदेव की लोकप्रियता को अलग कोण से देखते हैं, ‘शनि शत्रु है, अमंगलकारी है, दुखदायी है, ये सब भ्रांतियां थी. अब समाज से भ्रम और भ्रांति का पर्दा उठा है तो लोगों को सच्चाई का अहसास हो गया है. मैं तो साधनमात्र था. टेलीविज़न ने मुझे आपसे जुड़ने का सुअवसर मुहैया कराया तो चुनौती थोड़ी आसान हो गई.'

डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे टीवी इवेंजलिस्म की संज्ञा देते हैं जिसकी शुरुआत अमेरिका में हुई थी. उनका मत है, ‘जिस भी समाज में टीवी का विस्तार हुआ वहां धार्मिकता का प्रसार बहुत तेजी से हुआ है. अमेरिका में अकेले ईसाइयत के अलग-अलग पंथों के कम से कम पचास धार्मिक चैनल हैं. भारत में भी टीवी के विस्तार ने इस दुर्गुण को अपना लिया है. चैनलों और नए-नए बाबाओं के गठजोड़ ने धार्मिकता को बढ़ाया है और लोगों को उसके मूल उद्देश्य से भटका दिया है.'

समय-समय पर देश के लोकप्रिय माध्यमों ने भी देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा के संतुलन को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाई है. मसलन 70 के दशक में आई बहुचर्चित और सिनेमा की कमाई के आंकड़े की नई इबारत लिखने वाली फिल्म जय संतोषी मां ने घर-घर में उनकी प्राण प्रतिष्ठा की थी. हर शुक्रवार को संतोषी माता की व्रत कथा की लहर पूरे देश में उमड़ पड़ी थी. संतोषीमाता का अभ्युदय एक निम्न मध्यवर्गीय परिघटना थी. गणेश की पुत्री मानी जाने वाली संतोषी माता धन और सुख-समृद्धि की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी. जाहिर-सी बात है जिस तबके को इन साधनों की सबसे अधिक इच्छा थी उन्हीं के बीच संतोषी माता की भक्ति का सागर उमड़ रहा था. कुछ ऐसी ही स्थितियां 80 के दशक में आई राजेश खन्ना की फिल्म अवतार और गुलशन कुमार के मातारानी के भजनों ने माता वैष्णो देवी के लिए पैदा की थीं. आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले धर्मालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक छूने लगी.
आस्था का यह ज्वार अभी थमा नहीं है, हां कालांतर में इसमें एक और आयाम जुड़ गया - भैरवनाथ. फिर कथा चली कि भैरवनाथ का दर्शन किए बिना वैष्णो देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. भैरवनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी वैष्णो देवी की गुफा से कुछ दूरी पर ही स्थित है.

फिलहाल यही भैरवनाथ शीर्ष गति से बढ़ रहे चार देवताओं में शामिल हो गए हैं. पौराणिक कथाओं के मुताबिक भैरवनाथ एक तांत्रिक थे जिन्होंने वैष्णो देवी का पीछा करते हुए उस मार्ग की खोज की थी जिसके जरिए आज 13 किलोमीटर लंबी वैष्णो देवी की यात्रा संचालित होती है. कथा यह थी कि वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध करने के साथ ही उन्हें माफ कर दिया था और उन्हें विद्वान की संज्ञा देते हुए अपने जितना ही पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया था. शिव के परम भक्त भैरवनाथ का प्रभाव दो दशक पहले तक देश के विस्तृत मैदानी इलाकों की बजाय हिमालय की पहाड़ियों तक ज्यादा था. अल्मोड़ा में काल भैरव, बटुक भैरव, भाल भैरव, शैव भैरव, आनंद भैरव, गौर भैरव और खटकूनियां नाम के आठ प्राचीन भैरव मंदिरों का अस्तित्व रहा है और लोगों के पास इनकी महिमा की अनगिनत दंतकथाएं भी बताने को हैं. लेकिन वैष्णो देवी के प्रसार के साथ ही भैरवनाथ का दायरा भी दुर्गम पहाड़ियों से निकल कर समतल मैदानों में फैल गया. दिल्ली में पुराने किले के पास स्थित मशहूर भैरव मंदिर है जहां चढ़ावे के रूप में शराब चढ़ाने की परंपरा है. इतना ही प्रसिद्ध और भीड़भाड़ से भरा और खुद को पांडव कालीन बताने वाला भैरव मंदिर दिल्ली के वीआईपी इलाके चाणक्यपुरी में भी स्थित है. यह अलग बात है कि भक्तों को इसका ज्ञान महज़ दशक भर पहले हुआ है. इस मंदिर से जुड़ी एक दिलचस्प दास्तान वहां पिछले दस सालों से बिना नागा दर्शन करने आने वाली एक भक्त सरोज शर्मा सुनाती हैं- ‘दस साल पहले तक यहां इक्का दुक्का ही कभी कोई दर्शन के लिए आता था. हम यहां आते थे और घंटों तक शांति से बैठ कर ध्यान-मग्न रहते थे. मंदिर के पुजारी अक्सर बातचीत के दौरान निराश होकर कहा करते थे, 'बहनजी क्या कभी हमारे मंदिर में भी पुराने किले वाले भैरव बाबा के जैसी रौनक होगी?' आखिर भैरव बाबा ने उनकी सुनी और आजकल चाणक्यपुरी का भैरव मंदिर हर रविवार वैसे ही गुलजार रहता है जैसे पुराने किले के पीछे वाले किलकारी भैरव महाराज.
लखनऊ के अमीनाबाद में स्थित बटुक भैरव मंदिर भी खुद के प्राचीन होने का दावा करता है. मगर यहां के महंत श्याम किशोर गिरि नितांत व्यावहारिक नजरिया रखते हैं- ‘मंदिर तो करीब सात सदी पुराना है लेकिन यहां लोगों की विशाल भीड़ पिछले सात-आठ सालों से आनी शुरू हुई है. यहां पंद्रह आने दुखी लोग आते हैं और सिर्फ एक आना भक्त आते हैं.'

सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा में भी भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा आज तक किसी को पता नहीं चल सकी है
भैरवनाथ की श्रद्धा के पीछे भी वही मानसिकता देखने को मिलती हैं जो कि शनिदेव के भक्तों की है. दंतकथा के मुताबिक अपने जीवन काल में भैरवनाथ एक अड़ियल गुस्सैल सिद्ध तांत्रिक थे. उन्होंने वैष्णो देवी को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी. लेकिन लगे हाथ भैरवनाथ उतने ही पहुंचे हुए ज्ञानी भी थे. तमाम काली सिद्धियों पर उनका एकाधिकार था और उनके अनुयायियों पर कोई कुदृष्टि कभी हावी नहीं होने पाती थी. भैरवनाथ की आस्था और प्रभाव का एक जीता-जागता नमूना हाल ही में कश्मीर घाटी में देखने को मिला जहां सालों पहले पलायन कर गए हिंदुओं के बंद पड़े भैरव मंदिर को वहां के मुसलमानों ने दोबारा से खुलवाकर उन्हें कश्मीरी पंडितों के हवाले कर दिया.

कुछ साल पहले तक साईंबाबा का जिक्र आते ही लोग सीधे शिरडी का ध्यान करते थे. शिरडी में स्थित साईमंदिर की महिमा के तमाम किस्से सुनने-सुनाने को मिल जाते हैं. साईंबाबा काफी कुछ भारत में सदियों से चली आ रही रमता जोगी और बहता पानी वाली पंरपरा की ही एक कड़ी थे. फक्कड़पना उनके स्वभाव में था, संतई और ईमानदारी उनके चरित्र के गुण थे और लोगों को सत्संगत की सीख देना उनकी विशेषता थी. इस परंपरा से जुड़ी तमाम दूसरी दास्तानंे भी देश के अन्य हिस्सों में देखने सुनने को मिल जाती हैं मसलन कबीर या फिर देश भर में जगह-जगह फैली पीरों की दरगाह और मजारें. समय बीतने के साथ किस तरह से इनके दामन से चमत्कारवाद जुड़ जाता है यह बात किसी पीएचडी छात्र के लिए शोध का बढ़िया विषय हो सकती है. पहले इस परंपरा के साथ एक सुंदर प्रवृत्ति का घालमेल भी देखने को मिलता था जिसे सही मायनों में गंगा जमुनी तहजीब कहा जा सकता था - इनके भक्तों में हिंदू-मुस्लिम और सिख सभी शामिल होते थे - पर हाल के दशकों में इस प्रवृत्ति का लोप हुआ है. कुछेक दशकों के दौरान देश भर में अस्सी हजार के करीब साईं मंदिर अस्तित्व में आ गए हैं जहां करोड़ों रुपए चढ़ावा आता है. दिल्ली स्थित मशहूर इस्कॉन मंदिर के ठीक सामने साई बाबा का नया मंदिर बना है. सुबह-शाम आरती होती है और महीने में दो दिन साईं बाबा की गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है. देश के दूसरे हिस्सों में फैलाव के साथ-साथ इसकी पूजा पद्धतियों में भी धीरे-धीरे भटकाव आता गया है जिसके साथ ही शिरडी और देश के दूसरे हिस्सों में बने साईं मंदिरो में मुसलमानों की भागीदारी भी धीरे-धीरे खत्म हो गई है. उनकी पूजा-अर्चना का पूरी तरह से हिंदूकरण हो गया है, पौराणिक हिंदू देवी देवताओं की भांति ही फूल-माला, धूप-बत्ती से सराबोर साईं मंदिर अपने मूल स्वरूप से ही भटक गए से लगते हैं. शिरडी साईं संस्थानम ट्रस्ट के चेयरमैन जयंत ससाने मुसलमानों की साईं से दूरी की बात स्वीकार करते हैं लेकिन उनके पास इसकी वजह भी बताने को है- ‘मुसलमान साईं से इसलिए दूर हुए हैं क्योंकि उन्हें साईं की मूर्ति से परेशानी होती है. यह इस्लाम की मूल धारणा के खिलाफ है. इसके चलते साईं भक्तों में मुस्लिमों की संख्या घटी है.' साईं संस्थान ट्रस्ट ने इस संकट को देखते हुए अपनी वेबसाइट पर देश के दूसरे हिस्सों में स्थित साईं मंदिरों के पुजारियों के लिए एक 15 दिन के ट्रेनिंग कार्यक्रम की व्यवस्था की है. शिरडी स्थित साईं धाम में इन लोगों के प्रशिक्षण का इंतजाम किया गया है ताकि पूजा-पद्धति में आते जा रहे भटकाव को रोका जा सके. जिस पथ के पुजारी साईं बाबा थे उसी की अगली कड़ी के तौर पर हम देश भर में प्रचलित दरगाहों-मजारों को रख सकते हैं. देश का कोई भी इलाका नहीं होगा जहां दरगाहों मजारों पर शीश नवाने वाले हिंदू श्रद्धालु न हों.

अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, नई दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन ऑलिया और फतेहपुर सीकरी की शेख सलीम चिश्ती की दरगाह जैसी मिसालों को छोड़ दिया जाए तो काफी दरगाहों और मजारों पर शीश नवाने वाले जियारतमंदों को उनके अतीत के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं होता है. सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा भी कायम है जिसमें भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा किसी को पता नहीं होती. लखनऊ के खम्मन पीर दरगाह में मन्नत मांगने आए मोहित मिश्रा से जब तहलका ने दरगाह की महिमा और खम्मन पीर की श्रद्धा के बारे में जानने की कोशिश की तो एक रोचक कारण सामने आया. मोहित ने बताया, ‘जब आपके काम नहीं बन रहे होते हैं तब आप मजहब की सीमाओं को पार कर जाते हैं.'

काफी हद तक वाचिक परंपरा या किस्सागोई की आदत की तरह महिमा की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हैं. स्वाभाविक है व्यक्ति दर व्यक्ति कहानियां परिष्कृत होती जाती हैं और समयातंर में एक बिल्कुल नई कहानी सामने आती है जिसमें चमत्कार, भय, आस्था, अपूर्ण इच्छा जैसे नवरसों का मिश्रण होता है.

किस तरह से कोई मजार समय के साथ सर्वशक्तिसंपन्न और हर ख्वाहिश को पूरी करने वाली पीठ बन जाती है इसकी एक दिलचस्प बानगी भगवानदास मोरवाल के उपन्यास रेत में है. एक वेश्या रतना जो कि उपन्यास की नायिका भी है, को एक बच्चे की लंबे समय से चाह है. एक दिन पुलिस से भागा हुआ भूरा उसके पास आता है जिसके संसर्ग में आने से रतना की यह मुराद पूरी हो जाती है. शराबी भूरा के देहांत के बाद रतना उसकी पक्की कब्र बनवा देती हैै. दो साल बाद कोई शरारतन कब्र के ऊपर 'भूरा पीर की मजार' लिख देता है और कुछ ही दिनों में वहां संतान की इच्छा रखने वाले जोड़े मन्नतें मांगने के लिए आने लग जाते हैं. इस कब्र पर जो बोर्ड लगा होता है उपन्यास में उसका जिक्र भी बड़ा दिलचस्प है.

दरगाह-ए -बाबा भूरा पीर.
सालाना उर्स- रबीउल अव्वल (जून की 25 तारीख)
भंडारा- हर महीने के अंतिम दिन
खादिम - मोहम्मद अमीन
‘यहां मर्द और औरत दोनों का शर्तिया इलाज होता है'
खुद मोरवाल के शब्दों में, 'उपन्यास का यह दृष्टांत मेरे निजी अनुभव पर आधारित है. जब मैं लिखने के सिलसिले में उस इलाके में शोध कर रहा था तब मुझे इस घटना के बारे में पता चला. मैंने जाकर देखा तो वहां उस मजार पर अगरबत्तियां जल रही थीं.'
स्वामी अग्निवेश धर्म के इस विकृत स्वरूप के विस्तार के लिए समाज में आते जा रहे दुर्गुणों की बात करते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म के प्रति अंध रुझान की जड़ें वर्तमान समाज में बढ़ते जा रहे भ्रष्टाचार, गंदगी और अनैतिक क्रिया कलापों से जुड़ी हुई हैं. जब समाज गलत चीजों में लगा होगा तो स्वाभाविक है कि उसके अंदर एक तरह का भय, असुरक्षा और ग्लानिबोध रहता है. इस ग्लानिबोध से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति धर्म के चमत्कारिक पहलू की ओर झुकता चला जाता है.'

देखते ही देखते अनजानी मजारों और दरगाहों के साथ लोग दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण, हर कामना की पूर्ति करने वाली, संतानहीनों को संतान और बेटी वालों को बेटे देने वाली जैसे विशेषण जोड़ते चले जाते हैं. एटा में सय्यद वाली गली के पीर से लेकर लखनऊ में लबे चारबाग रेलवे स्टेशन स्थित खम्मन पीर बाबा की मजार, दिल्ली में पुराने किले के पास दरगाह-ए-अबू बकर तूसी उर्फ मटके वाले पीर की दरगाह और हरियाणा के मलेरकोटला वाले पीर के आश्रम तक पूरे देश में दरगाहों की ऐसी ही एक अनवरत श्रृंखला देखी जा सकती है.
नई दिल्ली के प्रगति मैदान के पास स्थित मटके वाले पीर की दरगाह पर सालों से मटका चढ़ाने के लिए चांदनी चौक से यहां आने वाले साड़ियों के व्यापारी ईश्वरचंद गुप्ता को पीर के इतिहास के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है. पूछने पर वे बस इतना ही बता पाते हैं कि किसी ने उनसे यहां मन्नत मानने के लिए कहा था. संयोग से उनकी मन्नत पूरी हो गई और गुप्ता जी की श्रद्धा भी अटल हो गई. उनके मुताबिक, ‘अपने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा तो हम बचपन से ही करते चले आ रहे थे. इसके बाद भी हमारी मुश्किलें जब दूर नहीं हो रही थीं तो फिर पीर की मजार को आजमाने में क्या बुराई थी. मेरे तमाम परिचितों को यहां मुंहमांगी मुराद मिल चुकी है.'
साधकों की इस प्रकार की निष्ठा के पीछे विशिष्ट भूमिका होती है अंधश्रद्धा और तर्कवितर्क की क्षमता के अभाव की. पर इसकी अच्छाई की बात करें तो इन दरगाहों-मजारों पर शीश नवाने वालों में हिंदू-मुसलमान समान संख्या में होते हैं जो मौजूदा संवेदनशील, अस्थिर भारतीय समाज के नजरिए से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. यह अलग बात है कि एक बृहस्पतिवार को दरगाहों पर एक साथ सिर झुकाने वाले अगले शुक्रवार और मंगलवार को ही किसी मौलाना की तकरीर और पंडित के प्रवचन को गांठ बांधकर एक दूसरे को ललकारने से नहीं हिचकते.

अवध और लखनऊ के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले डॉ योगेश प्रवीण इस चलन को दो स्पष्ट हिस्सों में बांटकर देखते हैं- ‘भक्त जब मंदिर-मस्जिद में जाता है तब उसके मन में श्रद्धा का भाव होता है जबकि वही भक्त जब किसी मजार पर जाता है तो उसके मन में कोई न कोई मुराद होती है.' इन मजारों में भी मस्ती, सूफियाना फक्कड़पन जैसी शानदार हिंदुस्तानी परंपरा धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है. लोग धर्म के कट्टरवादी स्वरूप की तरफ जाने-अनजाने बढ़े जा रहे हैं.

डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे धार्मिक समूहों की मन:स्थिति में व्याप्त आत्मविश्वास की कमी से जोड़कर देखते हैं, ‘मस्ती और फक्कड़पना जो कबीर की विशेषता थी, असल में समाज के आत्मविश्वास से जुड़ी हुई चीज है. जब समाज में आत्मविश्वास की कमी होती है, असुरक्षा की भावना बढ़ती है तब वह इन चीजों से विमुख होकर कट्टरता, चमत्कार, अवतारवाद जैसी चीजों की तरफ चला जाता है. यह बात आज समाज के हर पहलू से जुड़ गई है चाहे वो पढ़ाई-लिखाई हो, रोजी रोटी हो नौकरी हो या फिर कुछ और.'

अच्छाइयों और बुराइयों की तुलना से इतर एक जरूरी प्रश्न यह उठता है कि यदि वास्तव में धर्म का स्वरूप समय सापेक्ष और परिवर्तनीय ही है तो आने वाले समय में भारत में इसका नया स्वरूप क्या उभरेगा? यह कबीर, कंबन, तुलसी, अकबर, विवेकानंद और गांधी के विचारों का सुंदर मिश्रण बनकर उभरेगा या तालिबानी तर्ज का कट्टरवादी प्रतीक या फिर आधुनिकता से ओत-प्रोत पूरी तरह अमेरिकी-यूरोपीय समाज की शक्ल ले लेगा?

वैसे तो संसार का कोई भी समाज या धर्म कभी भी इतना स्वाभाविक और व्यावहारिक नहीं रहा कि किसी समय में उसके नियम और परंपराएं हर किसी को स्वीकार्य रहे हों. हर समय के बीत जाने के बाद ही उसकी ठीक आलोचना की जा सकती है. बस देखना यह है कि भविष्य में हम आध्यात्मिक शांति के लिए ईश्वर की शरण में जाएंगे या बस मुरादें मांगने?

(हिमांशु बाजपेयी के योगदान के साथ)

मंगलवार, 8 जून 2010

25 साल के आंसूओं की कीमत 25 हजार

भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल बाद जो फैसला आया है उसने ना कितनी उम्मीदों को मौत दे दी है। 25 साल तक न्याय की आस में अपनो को खो जाने का दर्द समटे लोगों की आंखों के आंसूओं का मोल लगा महज 25 हजार। ये भारतीय न्याय प्रणाली। ये नरसंहार के लिए मिलने बाले दंड का स्वरूप अचानक ही दुर्घटना में बदल गया।
यूनियन कार्बाईड के डॉव केमिकल के कारखाने से निकली जानलेवा गैस ने पांच लाख से अधिक लोगों को अपनी जद में लिया और बीस हजार से ज्यादा काल कलवित हो गए थे। लेकिन इस त्रासदी के छब्बीसवें साल में जब निचली अदालत ने अपना फैसला सुनाया तो फैसला गैस त्रासदी से बड़ी त्रासदी साबित हो रही रही है.
यह त्रासदी भारतीय न्याय व्यवस्था और प्रशासन के नाकामी की है जो यह साबित करती है कि भारत में पूंजी के बल पर कुछ भी किया जा सकता है. आम आदमी के वोट से बनी सरकारें तो आम आदमी के खिलाफ काम करती ही हैं लेकिन न्याय प्रणाली भी कई बार आम आदमी के हक और हित की बजाय प्रभावी लोगों के गिरफ्त में फंसकर रह जाती है.
इस त्रासदी के उपरांत आज भी प्रभावित इलाके में भूजल बुरी तरह प्रदूषित है, इससे प्रभावित लोगों की आने वाली पीढियां बिना किसी जुर्म की सजा शारीरिक और मानसिक तौर पर भुगत रहीं हैं। विडम्बना तो यह है कि हजारों को असमय ही मौत की नींद सुलाने वाले दोषियों को 25 साल बाद महज दो दो साल की सजा मिली और तो और उन्हें जमानत भी तत्काल ही मिल गई। हमारे विचार से तो इस मुकदमे की सजा इतनी होनी चाहिए थी, कि यह दुनिया भर में इस तरह के मामलों के लिए एक नजीर पेश करती, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोईली खुद भी लाचार होकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि इस मामले में न्याय नहीं मिल सका है। फैसले में हुई देरी को वे दुर्भाग्यपूर्ण करार दे रहे हैं। दरअसल मोईली से ही यह प्रतिप्रश्न किए जाने की आवश्यक्ता है कि उन्होंने या उनके पहले रहे कानून मंत्रियों ने इस मामले में पीडितों को न्याय दिलवाने में क्या भूमिका निभाई है।
विश्व के इस सबसे बडे औद्योगिक हादसे का फैसला इस तरह का आया मानो किसी आम सडक या रेल दुर्घटना का फैसला सुनाया जा रहा हो। इस मामले में प्रमुख दोषी यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन सर्वेसर्वा वारेन एंडरसन के बारे में एक शब्द भी न लिखा जाना निश्चित तौर पर आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। यह सब तब हुआ जब इस घटना के घटने के महज तीन दिन बाद ही मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया हो। सीबीआई पर लोगों का विश्वास आज भी कायम है। इस जांच एजेंसी के बारे में लोगों का मानना है कि यह भले ही सरकार के दबाव में काम करे पर इसमें पारदर्शिता कुछ हद तक तो होती है। इस फैसले के बाद से लोगों का भरोसा सीबीआई से उठना स्वाभाविक ही है। इस पूरे मामले ने भारत के ''तंत्र'' को ही बेनकाब कर दिया है। क्या कार्यपलिका, क्या न्यायपालिक और क्या विधायिका। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि प्रजातंत्र के ये तीनों स्तंभ सिर्फ और सिर्फ बलशाली, बाहुबली, धनबली विशेष तबके की ''लौंडी'' बनकर रह गए हैं।
सीबीआई ने तीन साल तक लंबी छानबीन की और आरोप पत्र दायर किया था। इसके बाद आरोपियों ने उच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए थे। उच्च न्यायालय ने इनकी अपील को खारिज कर दिया था। इसके बाद आरोपी सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए और वहां से उन्होंने आरोप पत्र को अपने मुताबिक कमजोर करवाने में सफलता हासिल की। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सीबीआई इतनी कमजोर हो गई थी, कि उसने इस मामले की गंभीरता को न्यायालय के सामने नहीं रखा, या रखा भी तो पूरे मन से नहीं रख पाई। कारण चाहे जो भी रहे हों पर पीडितों के हाथ तो कुछ नहीं लगा।
आखिर क्या वजह थी कि एंडरसन को गिरफ्तार करने के बाद उसे गेस्ट हाउस में रखा गया। इसके बाद जब उसे जमानत मिली तो उसे विशेष विमान से भारत से भागने दिया गया। जब उसे 01 फरवरी 1992 को भगोडा घोषित कर दिया गया था, तब उसके प्रत्यापर्ण के लिए भारत सरकार द्वारा गंभीरता से प्रयास क्यों नहीं किए गए! 2004 में अमेरिका ने उसके प्रत्यापर्ण की अपील ठुकरा दी गई तो भारत सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई।
अगर यह हादसा अमेरिका में घटा होता तो डाव केमिकल और यूनियन कार्बाईड का नामोनिशान मिटने के साथ ही साथ अनेक बीमा कंपनियों के दिवाले निकल चुके होते। यही हादसा अगर दिल्ली में हुआ होता तो इसकी सूरत कुछ और होती। सवाल यह उठता है कि जब दिल्ली में उपहार सिनेमा में हुए हादसे के पीडितों को 15 से बीस लाख रूपए का मुआवजा मिल सकता है तो भोपाल गैस कांड के पीडितों को महज 25 - 25 हजार रूपए में क्यों टरका दिया गया।
भोपाल जैसे हृदय विदारक हादसे को अंजाम देने के बाद भी यह कंपनी भारत का मोह नहीं छोड पा रही है। भारत सरकार है कि इस कंपनी को देश में दूसरे हादसे के लिए उपजाउ माहौल भी मुहैया करवा रही है। इस कंपनी ने वियतनाम युद्ध में एक जहरीली गैस बनाकर कहर बरपाया था। अब इस कंपनी के निशाने पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र और गुजरात सूबे हैं। इस कंपनी के प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर अहसानों से दबे ही हैं केंद्र और सूबों के मंत्री, तभी तो ये डाव केमिकल की तारीफ में कशीदे गढने से नहीं चूकते। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्वयं ही भोपाल में कंपनी के बंद पडे संयंत्र में जहरीले कचरे को छूकर कंपनी को सीधे तौर पर मदद करने का कुत्सित प्रयास किया था। इस कंपनी का महाराष्ट्र में मुंबई गोवा राजमार्ग पर एक संयंत्र आरंभ हो चुका है, जिसमें कीटनाशक बनता है।
लेकिन विडम्बना देखिए महज 25 हजार के जुर्माने औऱ दो साल की कैद ये सज़ा है मौत के सौदागरों की। साल दर साल जाने कितनी लड़ाईयों के बाद पीडितों का ये सपना टूट गया है। 25 साल से जहरीली गैस से प्रभावित लोगों की नरक यात्रा आज भी उनकी पीढ़ी झेल रही है। ऐसे में इस फैसले ने त्रासदी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे लोगों को जीते जी ही मार डाला है। मामले में मुख्य अभियुक्त वॉरेन एंडरसन आज भी फरार दुनिया के पापा ने उसे भारत को सौपने से इंकार कर दिया है। एक तरफ इस तथाकथित वैश्विक पापा की एक हुंकार पर बाकी के सारे देशों की पेट गीली होने की नौबत तक आ जाती है ऐसे मैं कभी यह अपराधी सज़ा पा सकेगा इस बात पर भी नचिकेता प्रश्न लगा हुआ है क्या हम कभी इतने शक्तिशाली हो पायेगें कि इस वैश्विक पापा के सामने सीना तान के वारेन नामक इस अपराधी को समर्पण के लिए कह सके ना जाने कब ये समय आयेगा आयेगा या नहीं भी कोई नहीं जानता है।

यूनियन कार्बाइड़ कार्पोरेशन लिमिटेड़ की स्थापना से लेकर,गैस रिसाव और उसके बाद इस मामले की सुनवाई से लेकर फैसले के दिन तक हर बार लोगों की भावनाओं और उनके विश्वास को छला गया है और इस फैसले ने तो अब हमारे वैश्विक पप्पा के लिए एक दरवाजा औऱ खोल दिया है जाहिर सी बात है जब हमारे देश न ही हमारे लोगों को छला तो फिर अमेरिका क्यों चाहेगा इस मामले को आगे बढ़ाने सरकार है पूरी तरह से जिम्मेदार 25 साल के इस लंबे समय का सबसे कारण सरकार औरयूनियन कार्बाइड कंपनी के बीच 1989 को हुए एक समझौता है इसके तहत कंपनी को दिसंबर 1984 की गैस त्रासदी से जुड़े सभी आपराधिक और नागरिक उत्तरदायित्वों से मुक्त कर दिया गया था।

अदालत ने आठ में से सात दोषियों को दो-दो साल की सजा सुनाई है और प्रत्येक पर 1,01,750 रुपये का जुर्माना लगाया जबकि इस मामले में दोषी करार दी गई कंपनी यूनियन कार्बाइड इंडिया पर 5,01,750 रुपये का जुर्माना लगाया गया। त्रासदी के बाद के शुरूआती वर्षो में सरकार ने कंपनी और उसकी अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन पर आपराधिक मामले दर्ज करने की बजाए उसके साथ करार कर उसे हर तरह के उत्तरदायित्व से मुक्त करदिया। भोपाल गैस ट्रेजडी विक्टिम्स एसोसिएशनÓ के अनुसार 14-15 फरवरी 1989 को हुए इस करार के तहत यूनियन कार्बाइड के भारत और विदेशी अधिकारियों को 47 करोड़ डॉलर की एवज में हर प्रकार के नागरिक और आपराधिक उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया गया। इस करार में कहा गया कि कंपनी के खिलाफ सभी आपराधिक मामले खत्म करने के साथ-साथ सरकार इस त्रासदी के कारण भविष्य में होने वाली किसी भी खामी मसलन से उसके अधिकारियों की हर प्रकार के नागरिक और कानूनी उत्तरदायित्व से हिफाजत भी करेगी।जिसे सर्वोच्च न्यायालय अक्टूबर1991 में आंशिक रूप से खारिज कर दिया था।
मामला सिर्फ भोपाल गैस त्रासदी का ही नहीं है। सच्चाई तो ये है कि ऐसे सभी असाधारण मसलों से निपटने में भारतीय संविधान और भारतीय दंड संहिता की बाबा-आदम के जमाने की धाराएं, प्रावधान नाकाफी हैं। फिर चाहे वो भोपाल गैस त्रासदी हो या फिर देश पर हमला करने वाले अफजल गुरु की या कसाब की फांसी हो। एक जमाने में संघ परिवार और उनके अनुषांगिक संगठनों ने ऐसे ही असाधारण मामलों पर संविधान में बदलाव की बात बड़े जोर-शोर से उठाई थी लेकिन, पता नहीं क्यों जब बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार आई तो, कोई ठोस फैसला नहीं लिया जा सका। शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विचार परिवार की ये बड़ी कमी साबित हुई है कि वो अच्छे मुद्दों को भी उठाकर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते। जिसकी वजह से उस विशेष मुद्दे की वजह से संघ परिवार से जुडऩे वाले लोग फिर उसकी बातों से सहमत होते हुए भी उससे जुडऩे में मुश्किल महसूस करते हैं।

शुक्रवार, 4 जून 2010

आईएएस के लिए जुगाड़ डॉट कॉम

मध्यप्रदेश में एक बार फिर से गैर प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के लिए पिछले तीन वर्षों से जारी कवायद इस बार फिर तेज हो गई है। विगत दो वर्षों की भांति इस बार भी अधिकारी अपनी योग्यता नहीं बल्कि जुगाड़ के बल पर इस सर्वोच्च प्रशासनिक पद को पाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। हालांकि इनमें से कुछ अधिकारी तो ऐसे हैं, जो वर्षों से आईएएस बनने की जुगत भिड़ा रहे हैं, लेकिन दांव नहीं लग पा रहा है। सूत्रों के मुताबिक कुछ विभाग तो ऐसे हैं जो निर्धारित समय सीमा में एक भी नाम नहीं भेज पाए तो कुछ इक्का-दुक्का नाम ही ढूंढ पाएं हैं।
गत तीन वर्षों से आईएएस चयन की प्रक्रिया किसी न किसी कारण से नहीं हो पाने के कारण मध्यप्रदेश कैडर राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम हो गया है। सूत्र बताते हैं कि पिछली बार चयन की प्रक्रिया में करोड़ों रुपए के लेन-देन की बात सामने आने से राज्य सरकार और मप्र कैडर की जो बदनामी हुई थी उससे इस बार भी पीछा छूटता नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि जिन दागदार लोगों की शिकायत पिछले वर्ष कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं, गैर प्रशासनिक सेवा संगठन और आईएएस के दावेदारों ने की थी वे इस बार भी आईएएस बनने की सूची में शामिल किए गए हैं। जिससे अभी से अनुमान लगाया जाने लगा है कि अगर यही स्थिति रही तो चौथी बार भी आईएएस चयन की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
उधर आईएएस चयन कवायद शुरू होने के साथ ही गैर प्रशासनीक सेवा के अधिकारी जहां मुस्तैदी के साथ फिल्डिंग में जुटते नजर आए वहीं राज्य में अन्य विभागों से आईएएस में चयन के लिए कई विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने रूचि नहीं दिखाई है। आलम यह रहा कि अंतिम तिथि समाप्त होने तक केवल 30 अधिकारियों ने ही आवेदन पत्र जमा कराए थे, जबकि सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी सरकारी विभागों से पांच-पांच अधिकारियों के नाम आईएएस के लिए मंगवाए थे। उसके बाद 10 और नाम सामान्य प्रशासन विभाग को पहुंचे। यानी कुल 40 नाम इस बार आईएएस चयन के लिए सूची में शामिल किए गए है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जो नाम सामान्य प्रशासन विभाग के पास पहुंचे हैं उनमें जेल विभाग से एक, महिला एवं बाल विकास विभाग से तीन, नगरीय प्रशासन विभाग से 2 वित्त विभाग से पांच, उद्योग से पांच साथ ही जनसंपर्क और वाणिज्यिककर विभाग के अधिकारियों के नाम शामिल है। हालांकि जेल विभाग के सूत्रों का कहना है कि वहां से चार नाम भेजे गए थे लेकिन एक ही नाम को हरी झंडी मिली है। हद तो यह है कि जेल विभाग ने इस बार भी उसी अधिकारी का नाम भेजा है जिसको लेकर पिछली बार जमकर बवाल मचा था। उक्त अधिकारी वित्त मंत्री राघवजी के चहेते हैं। जब इस संबंध में जेल मंत्री जगदीश देवड़ा सेे बात की गई तो उन्होंने बताया कि नियम प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए ही एक नाम भेजा गया है। सामान्य प्रशासन विभाग इनमें से कुल 25 अधिकारियों के नाम छांटेगा और इनके नाम साक्षात्कार के लिए भेजे जाएंगे। चूंकि जीएडी द्वारा अपेक्षित नामों की संख्या कम है इसलिए अटकले लगाई जा रही हैं कि सामान्य प्रशासन विभाग एक बार फिर आवेदन मंगवाने की अंतिम तिथि को बढ़ाने पर विचार कर सकता है। वैसे देखा जाए तो विभिन्न विभागों द्वारा जिन अधिकारियों की सूची सामान्य प्रशासन विभाग को भेजी गई है उनमें से अधिकांश दागदार हैं। सूत्रों के अनुसार पिछली बार जो सूची आईएएस चयन के लिए भेजी गई थी उसमें जेल विभाग के यह अधिकारी सबसे दागदार थे। प्रश्न यह उठता है कि क्या जेल विभाग के पास पांच गैर प्रशासनिक सेवा के ऐसे अधिकारी नहीं है जो आईएएस बनने की पात्रता रखते हों।
उल्लेखनीय है कि गत वर्ष भी यह प्रक्रिया अपने अंतिम चरण तक पहुंच गई थी। मप्र से गैर सिविल सेवा से आईएएस चयन के लिए यूपीएससी को भेजी गई सूची लगातार तीसरे वर्ष भी लेप्स हो गई। इस सूची में 15 नाम शामिल थे। इन नामों को लेकर हुए विवाद के बाद राज्य सरकार ने भी इसमें रूचि नहीं ली थी। मध्यप्रदेश में गैर सिविल सेवा के अधिकारियों में आईएएस चयन को लेकर जबरदस्त खींचतान मची हुई थी। कुल पांच पदों के लिए राज्य सरकार ने सभी विभागों से नाम मंगवाए थे। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बनी एक कमेटी ने लगभग तीन दर्जन अधिकारियों के नामों में 15 नामों का चयन करके यूपीएससी को भेजा था। इन नामों को लेकर भोपाल से दिल्ली तक बवाल मचा रहा। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और कुछ मंत्रियों पर आईएएस चयन में अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए हस्तक्षेप और लाखों रूपए के लेनदेन का आरोप लगाया था। राज्य सरकार ने जिन पन्द्रह अधिकारियों के नाम दिल्ली भेजे थे, वे पिछले कई दिनों से दिल्ली में साक्षात्कार के लिए कॉल लेटर का इंतजार कर रहे थें।
इन अधिकारियों ने अपने अपने कार्यालयों से अवकाश लेकर साक्षात्कार की तैयारियों भी शुरू कर दी थी। लेकिन उन्हें 31 दिसम्बर के बाद सूची स्वत: लेप्स मानी जाती हैं। अब फिर से यह प्रक्रिया प्रारंभ हुई। यहां बता दें कि वर्ष 2007 में मप्र केडर में एक पद था, लेकिन डिप्टी कलेक्टरों के हस्तक्षेप के कारण चयन नहीें हो सका। वर्ष 2008 में दो पदों के राज्य सरकार ने दस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेजे थे। यूपीएससी ने 19 सितम्बर 2008 को साक्षात्कार रद्द कर दिया। बीते साल भी ऐसा ही हुआ है। इस संबंध में एक अधिकारी का कहना है कि राज्य सरकार ने इसमें रूचि ली होती तो ऐसा नहीं होता। इस बार भी गैर प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने का अधिकारी का सपना पूरा तब होगा जब राज्य सरकार के आलाअधिकारी सही ढंग से जांच पड़ताल कर नामों को भेजे।
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शुक्रवार, 28 मई 2010

मेडिकल एजूकेशन का माफिया डॉन




सीबीआई के शिकंजे में आया केतन देसाई शिक्षा में फैलते माफियागीरी का जीता जागता उदाहरण है। इस माफियागीरी से उसने कितना पैसा कमाया इसका अंदाजा इसी से लग सकता है कि उसके पास दर्जनों के हिसाब से आलीशान भवन, क्विटल के हिसाब से सोना तथा सैकड़ों करोड़ रुपयों के हिसाब से नगदी की बरामदगी हो रही है।
देश में फिसड्डी एवं अज्ञानी डॉक्टरों की भरमार का राज भी अब कहीं जाकर खुला जबकि गत् दो दशकों से भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अर्थात मेडिकल कौंसिल आफ इंडिया (एम.सी. आई)के अध्यक्ष पद पर तैनात केतन देसाई नामक एक महाभ्रष्ट व्यक्ति की काली करतूतों का सीबीआई द्वारा भंडाफोड़ किया गया। केतन देसाई ने देश में सैकड़ों ऐसे मेडिकल कॉलेज को मान्यता दे डाली है जो अपने आप में मेडिकल कॉलेज बनने की संपूर्ण आर्हता नहीं रखते थे। किसी मरीज की देखभाल, उसकी जांच-पड़ताल, मेडिकल शिक्षा संबंधी जरूरी मापदंड कहीं हों या न हों परंतु यदि कॉलेज के संचालक ने केतन देसाई की मु_ी गर्म कर दी है तो उस संचालक को मेडिकल कॉलेज की मान्यता अवश्य मिल जाती थी।
इतना ही नहीं एम सी आई के इस महाभ्रष्ट प्रमुख ने कुछ ऐसे अयोग्यतम व्यक्तियों को मेडिकल प्रेक्टिस किए जाने के प्रमाण पत्र जारी कर दिये थे जिन्होंने कभी विज्ञान की कक्षा में दाखिला तक नहीं लिया था। कला तथा संस्कृत जैसे विषयों के कई छात्र केतन देसाई की रिश्वतपूर्ण कृपा दृष्टि से डॉक्टर बन चुके हैं और यही नकली डॉक्टर भारत में अब तक न जाने कितने भोले-भाले मरीजों की जानों से खिलवाड़ कर चुके हैं। केतन की जलालत की हद यहीं खत्म नहीं होती बल्कि उसने तो कई ऐसे बंगला देशी नागरिकों को भी भारतीय डॉक्टर होने का प्रमाण पत्र जारी कर दिया जो स्वयं भारत के नागरिक होने का फर्जी प्रमाण पत्र लिए लुके-छुपे इधर-उधर फिरा करते थे। केतन देसाई को किसी को डॉक्टर बनाने में अथवा किसी संचालक को मेडिकल कॉलेज का मालिक बनाने में कोई आपत्ति नहीं होती थी बशर्ते कि वह इस एम सी आई प्रमुख की जेबें भरपूर तरीके से गर्म कर दे।
मेडिकल शिक्षा माफिया डॉन केतन देसाई ने अपने इस लूट-खसोट के महाषड्यंत्र को अंजाम देने के लिए अपने कुछ विशेष व भरोसेमंद व्यक्तियों की एक मंडली बनाई हुई थी। इसी मंडली के मात्र दसवीं कक्षा पास व्यक्ति एस एस राही को देसाई ने एमसीआई का सचिव नियुक्त किया हुआ था। और यही व्यक्ति एमसीआई के रजिस्ट्रेशन विभाग का भी प्रमुख था। जरा गौर फरमाईए कि देसाई के नेतृत्व में चल रही एमसीआई द्वारा मेडिकल कालेज की मान्यता देने तथा डाक्टरों को रजिस्ट्रेशन प्रदान करने, व उसकी स्क्रीनिंग करने का जिम्मा एक लगभग अशिक्षित सा व्यक्ति संभाले हुए था। बड़े आश्चर्यपूर्ण ढंग से गत् दो दशकों से लूट-खसोट का यह सारा तांडव सरेआम चलता रहा। आखिरकार 20 वर्षों तक स्वयं को सिकंदर महान समझने वाले इस भ्रष्टाचारी को पंजाब के एक मेडिकल कालेज से दो करोड़ रुपये की रिश्वत के इल्जाम में सीबीआई ने गिरफ्तार कर लिया। इससे पूर्व ही केतन देसाई आज अकूत धन संपत्ति का मालिक बन चुका है।
अपनी गिरफ्तारी के बाद केतन देसाई ने चूंकि त्याग पत्र दे दिया था इसलिए केंद्र सरकार की संस्तुति पर राष्ट्रपति ने एम सी आई को भंग करने की सिफारिश भी कर दी है। अब राष्ट्रपति द्वारा देश के 6 प्रतिष्ठित चिकित्सकों का एक पैनल बनाया गया है जो एम सी आई के कार्यों की अस्थाई रूप से निगरानी करेगा। केतन देसाई इस समय कानून के शिकंजे में है तथा अभी कई दिनों तक उससे और कई राज खुलने तथा उसके द्वारा दोनों हाथों से लूटी गई संपति का और अधिक खुलासा होने की उम्मीद की जा रही है। भारतीय यांत्रिकी शिक्षा संस्थान परिषद् तथा भारतीय आर्किटेक्ट शिक्षा संस्थान परिषद् में भी इसी प्रकार के घोटाले पहले उजागर हो चुके हैं। गोया हम यह कह सकते हैं कि रोजगारोन्मुख समझा जाने वाला तकनीकी शिक्षण का क्षेत्र इस समय लगभग पूरी तरह भ्रष्टाचार की पकड़ में है। ऐसे संगीन हादसे आखिर हमें क्या सोचने पर मजबूर करते हैं। देश के किस प्राईवेट मेडिकल कॉलेज पर हम विश्वास करें और किस पर न करें? देश का कौन सा डॉक्टर वास्तव में आयुर्विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात तकनीक व योग्यता के अनुसार डॉक्टर बना है और कौन डाक्टर संस्कृत, कला या संगीत का विद्यार्थी होने के बावजूद डाक्टर की डिग्री लिए घूम रहा है? गत् 20 वर्षों में ऐसे घोटालों व भ्रष्टाचारों के परिणामस्वरूम कितने मरीज इन जैसे अनाड़ी डाक्टरों के हाथों मौत के मुंह में जा चुके हैं। आखिर इन सवालों का जवाब कौन देगा तथा इनके लिए जिम्मेदार कौन है?
ऐसे भ्रष्टाचारों के उजागर होने के बाद एक सवाल और यह उठता है कि हमारे देश के सुप्रसिद्ध लचीले कानून के परिणामस्वरूप केतन देसाई जैसे खुली लूट-खसोट करने वाले तथा हजारों मरीजों की जान से खिलवाड़ करने का अधिकार पत्र बेचने वाले इस महापापी एवं महान मुजरिम को आखिर कब और क्या सजा मिलती है। जरा कल्पना कीजिए कि इसी भ्रष्टाचार का प्रतीक बने केतन देसाई की रिश्वतखोरी के चलते ही डॉक्टर की पढ़ाई पढऩेे के इच्छुक लाखों होनहार छात्र मात्र इसीलिए डॉक्टर ही नहीं बन सके क्योंकि उनके अभिभावक दस-बीस और तीस लाख रुपये खर्च कर अपने बच्चे को मेडिकल शिक्षा दिलवा पाने की हैसियत नहीं रखते थे। दूसरी ओर तमाम धनाढ्यों की अयोग्य संतानें मात्र अपने धन के बलबूते पर डॉक्टरी का प्रमाण पत्र लिए पूरे देश मे घूमते फिर रही हैं तथा अपना निजी नर्सिंग होम अथवा दवाखाना चलाकर मरीजों से अपनी खर्च की गई रकम बेदर्दी से वसूलने पर तुली हुई हैं।

कंगाली से बचने उपभोक्ताओं पर भार

प्रदेश में पिछले दस सालों से बिजली संकट गहराया हुआ है, लेकिन भाजपा के लिए यह केवल एक राजनीतिक मुद्दा भर है। 2003 के विधानसभा चुनाव में बिजली संकट पर हंगामा करके ही भाजपा ने जीत हासिल की थी। 2008 के चुनाव में भी बिजली संकट के लिए केंद्र को जिम्मेदार बताकर वह अपनी सत्ता बचाने में सफल हो गई। लेकिन, अब बिजली संकट भाजपा के गले की हड्डी बना हुआ है। फिर भी सरकार को इसकी कोई परवाह नहीं है। अब कंगाली की कगार पर खड़े बिजली विभाग ने लगभग 11 फीसदी महंगी बिजली का भार डाल दिया है।
वर्ष 2003 में राज्य में 800 मेगावाट बिजली की कमी थी, जो आज बढ़कर 1200 से 1500 मेगावाट तक हो गई है। बिजली संकट का समाधान ज़्यादा बिजली पैदा करके ही किया जा सकता है, लेकिन सरकार को इससे क्या लेना-देना। पार्टी नेता केवल हो-हल्ला मचाते हैं और समाधान के नाम पर सरकार बिजली खरीद कर चुपके से बेच देती है। एक बात तो साफ है कि बिजली की खरीद-बिक्री के इस काम में करोड़ों रुपये की काली कमाई की गुंजाइश जरूर हो जाती है। गौरतलब है कि पावर बैकिंग के नाम पर सरकार द्वारा बिजली की कमी पूरा करने के लिए दूसरे राज्यों और अन्य स्रोतों से बिजली खरीदना तो समझ में आता है, लेकिन उसी बिजली को बेच देना समझ में नहीं आता। जानकारों के अनुसार, कुछ निजी कंपनियों के माध्यम से बिजली की खरीद-बिक्री नेताओं और आला अफसरों के लिए फायदेमंद होती है, इसीलिए यह कारोबार बदनामी के बावजूद भी जारी है।
भीषण गर्मी और पेयजल संकट के बीच भारी बिजली कटौती का सामना कर रहे लोगों को नियामक आयोग ने 440 वॉल्ट के करंट का झटका दिया है। प्रदेश में तकरीबन दुर्लभ हो चुकी बिजली 1 जून से लगभग 11 फीसदी तक महंगी हो जाएगी।
बिजली इतनी महंगी क्यों हुई के सवाल पर राज्य नियामक आयोग के के.के. गर्ग कहते हैं कि वितरण कंपनियों का 79 प्रतिशत राजस्व जनरेशन, ट्रांसमिशन और अन्य स्रोतों से बिजली खरीदने में जाता है। 15-16 प्रतिशत ऑपरेशन मेंटेनेंस और स्थापना प्रभार है। इस साल जनरेशन और ट्रांसमिशन के टैरिफ में काफी वृद्धि हुई है और कंपनियां अपने कर्मचारियों को छठवां वेतनमान दे रही हैं। ऐसी स्थिति में दरें बढऩा लाजमी है। प्रदेश के इतिहास में तीसरी बार दस प्रतिशत से अधिक बिजली दरें बढ़ाई गई है। इससे पहले वर्ष-2001-02 में 14.73 प्रतिशत और 2004-05 में 14.47 प्रतिशत दर बढ़ी थी। इसके बाद से 2006-07 में करीब पांच प्रतिशत दर बढ़ाई गई थी। वहीं पिछले साल 2009-10 में 3.61 प्रतिशत दर बढ़ोत्तरी की गई। इसके अलावा 2007-08 में मात्र एक प्रतिशत और 2008-09 में तीन प्रतिशत दर बढ़ोत्तरी की गई थी। लेकिन बीते पांच सालों से दर बढ़ोत्तरी पांच प्रतिशत के अंदर सिमटी रही। अब 10.66 प्रतिशत दर बढऩे से आम आदमी के साथ सरकार भी चिंता में है। कीमत के लिहाज से देखे, तो इस साल उपभोक्ता प्रदेश के इतिहास की सबसे महंगी बिजली लेगा।
आयोग सदस्य (इंजीनियरिंग) केके गर्ग भी स्वीकारते हैं कि पिछले चार-पांच साल में यह सबसे अधिक बढ़ोत्तरी है। उनका कहना है कि इस बढ़ोत्तरी के अलावा कोई चारा नहीं था। दरअसल, इस साल महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तरप्रदेश की बिजली से मध्यप्रदेश की तुलना करना भी उपभोक्ताओं को भारी पड़ गया है। इन राज्यों की औसत लागत के अध्ययन के बाद हीं मध्यप्रदेश में बिजली लागत तय की गई। इन राज्यों में कही भी चार रुपए से कम औसत लागत नहीं है। ऐसे में मप्र में बिजली की लागत पिछले साल की 3 रुपए 71 पैसे प्रति यूनिट से बढ़ाकर 4 रुपए 22 पैसे आंकी गई है। उस पर ट्रांसमिशन सहित अन्य खर्चों को पाटने के लिए उपभोक्ताओं की जेब खाली करना तय कर लिया गया। नतीजा यह कि उपभोक्ताओं पर एक हजार नौ करोड़ का अतिरिक्त बोझ डाल दिया गया।
राज्य सरकार ने अपनी विद्युत उत्पादन क्षमता में वृद्धि के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं किए। वर्तमान में राज्य की कुल उपलब्ध विद्युत क्षमता 9878.25 मेगावाट है। इसमें केंद्रीय कोटे एवं संयुक्त उपक्रम जल विद्युत परियोजनाओं से मिलने वाली बिजली और उद्योगों के निजी केप्टिव उत्पादन की विद्युत क्षमता भी शामिल है। राज्य सरकार ने अपने स्रोतों से केवल 210 मेगावाट की एक ताप बिजली परियोजना पिछले वर्ष पूरी की है, जबकि चालू वित्तीय वर्ष के लिए सरकार ने किसी भी नई परियोजना को शुरू या पूरा करने की कोई योजना नहीं बनाई है। पूरा दारोमदार केंद्र और अन्य क्षेत्रों से प्राप्त होने वाली बिजली पर है, लेकिन इससे बिजली संकट दूर होने वाला नहीं है। बिजली के क्षेत्र में निवेश के लिए सरकार ने कई निवेशकों और निजी विद्युत कंपनियों को आकर्षित करने के उपाय किए, लेकिन शासन-प्रशासन के हठी और भ्रष्ट रवैये से तंग आकर निवेशक जल्दी ही भाग खड़े हुए। इससे राज्य में 26000 मेगावाट बिजली उत्पादन का सपना भी भंग हो गया। भारत सरकार ने कोयला भंडारों की सीमित क्षमता और जल भंडारों पर बढ़ते दबाव को ध्यान में रखते हुए गैर परंपरागत ऊर्जा क्षेत्र को बढ़ावा देने की योजना पर काम शुरू किया है। तमिलनाडु, गुजरात, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक एवं राजस्थान आदि राज्यों ने अपने यहां गैैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से बिजली पैदा करने के लिए पिछले तीन वर्षों में सराहनीय प्रयास किए हैं, लेकिन मध्य प्रदेश अभी भी फिसड्डी बना हुआ है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, राज्य में गैैर परंपरागत ऊर्जा स्रोतों से 212.800 मेगावाट बिजली पैदा किए जाने की क्षमता है, लेकिन वर्तमान में इसका केवल 18 फीसदी ही उपयोग हो रहा है। गैर परंपरागत ऊर्जा कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाना शिवराज सिंह सरकार की प्राथमिकता में नहीं है, इसलिए राज्य को केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। प्रदेश के चार महानगरों को सोलर सिटी के रूप में स्थापित करने का काम तो आज तक शुरू नहीं हो पाया, जबकि यह काम 2009 में पूरा हो जाना चाहिए था। भोपाल नगर निगम ने हाल में ही इस आशय का प्रस्ताव मध्य प्रदेश ऊर्जा विकास निगम को भेजा है, जबकि केंद्र सरकार बहुत पहले इसकी परियोजना रिपोर्ट तैयार करने के लिए 50 लाख रुपये की राशि स्वीकृत कर चुकी है। इतना ही नहीं, भारत सरकार एवं नवीनीकरण ऊर्जा मंत्रालय की माइग्रेशन योजना के तहत राज्य में अब तक एक भी सोलर प्रोजेक्ट नहीं लग सका है। मंत्रालय की ओर से इस योजना के लिए राज्य को भारी अनुदान मिलने की संभावना है। केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने भी केंद्र की सोलर परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए 18.44 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदने का प्रस्ताव पारित कर दिया है। बावजूद इसके ऐसे मामले जब राज्य सरकार के पास आते हैं तो अटक कर रह जाते हैं।

बेटियों की 'देह पर जिंदा समाज

जिस तरह देश में मंदसौर अफीम उत्पादन, तस्करी के लिए मशहूर है, उसी तरह नीमच, मंदसौर, रतलाम के कुछ खास इलाके भी बाछड़ा समाज की देह मंडी के रुप में कुख्यात है। जो वेश्यावृत्ति के दूसरे ठिकानों की तुलना में इस मायनें में अनूठे हैं, कि यहां सदियों से लोग अपनी ही बेटियों को इस काम में लगाए हुए हैं। इनके लिए ज्यादा बेटियों का मतलब है, ज्यादा ग्राहक! ऐसे में जब आप किसी टैक्सी वाले से नीमच चलने के लिए कहते हैं, तो उसके चेहरे में एक प्रश्नवाचक मुस्कुराहट स्वत: तैर आती है। इस यात्रा में अनायास ही ऐसे दृश्य सामने आने लगते हैं, जो आमतौर पर सरेराह दिनदहाड़े कम से कम मप्र में तो कहीं नहीं देखने को मिलते। हां, सिनेमा के रुपहले पर्दे पर जरूर कभी- कभार दिख रहते हैं। पलक झपकते ही मौसम की शर्मिला टैगोर, चांदनी बार की तब्बू, चमेली की करीना आंखों के सामने तैरने लगती हैं।
महू- नीमच राजमार्ग से गुजरते हुए जैसे ही मंदसौर शहर पीछे छूटता है। सड़क किनारे ही बने कच्चे-पक्के घरों के बाहर अजीब सी चेष्टाएं दिखने लगती हैं। वाहनों विशेषकर ट्रक, कारों को रुकने के इशारे करती अवयस्क, कस्बाई इत्र से महकती लड़कियों की कमनीय भाव-भंगिमाएं इतनी प्रवीण हैं कि पहली बार यहां से गुजरने वाले यात्री हक्का-बक्का रह जाते हैं। इस देह की खुली मंडी से गुजरना आसान है। रुककर देह की अतृप्त ग्रंथियों की वासना मिटाना सहज है। लेकिन किसी सेक्स वर्कर, महिला दलाल से बात हो जाए यह बेहद मुश्किल है। उनको पुलिस का डर नहीं है, क्योंकि वह इनकी पक्की हिस्सेदार है। किसी के देख लेने का डर नहीं, क्योंकि सारा काम सड़क के किनारे खुले में होता है। डर है, तो इस बात का कहीं टीवी चैनलों के स्टिंग ऑपरेशन में उनकी तस्वीर न दिखाई जाए। ग्राहकों को यह न लगे कि उनकी ऐशगाह असुरक्षित है। समुदाय में धंधे में लगी लड़कियों की संख्या पहले ही कम नहीं थी, उस पर से गरीबी, भुखमरी के चलते अब पड़ोसी जिलों, राज्यों से भी यहां पर जमकर लड़कियां लाई जा रही हैं। इनके मां-बाप इन्हें एक मुश्त रकम देकर बेच जाते हैं। या फिर तय अवधि में आते हैं और दलाल से उसके कमीशन, बेटी के रहने, खाने का खर्च काटकर उसकी कमाई ले जाते हैं। अर्थात बेटी अपनी जिंदगी महज दाल रोटी के लिए नरक कर रही है। लेकिन ऐसी लड़कियों को स्थानीय बाछड़ा लड़कियों की भीड़ में पहचानना बेहद मुश्किल है, क्योंकि उनके इर्द-गिर्द सुरक्षा घेरा भी है।
सड़क के किनारे बसे मल्लारगढ़ में बड़ी मुश्किल से अधेड़ उम्र की भंवरीबाई बातचीत को तैयार हुईं। वैसे उन्होंने भी पहले उनके मकान की ओर मुझे आते देख एक तेरह बरस की लड़की को मेरी ओर लपकाया था। भंवरीबाई ने अपने समाज की व्यवस्थाओं, देह व्यापार से जुड़े सवालों पर लाजवाब साफगोई से बात की। साठ से अधिक की हो चलीं भंवरी को उनके परिवार ने तेरह की उमर में ही इस धंधे में उतार दिया था। वह कहती हैं कि हमारे समाज में सिसकियों, मिन्नतों का कोई मोल नहीं है। क्योंकि परिवार के मर्द चाहते हैं कि बेटियां धंधा करें ताकि वह रोजी की फ्रिक से दूर शराब पीने में मशगूल रह सकें।
बाछड़ा समुदाय में बेटियों से वेश्यावृत्ति करवाना बेहद आम रिवाज है। रतलाम, मंदसौर और नीमच जिलों के सैकड़ों गांवों में यह कुप्रथा आज भी जारी है। इनमें कचनारा, रुंडी, परोलिया, सिमलिया, हिंगोरिया, मोया, चिकलाना आदि प्रमुख हैं। किसी को नहीं मालूम यह कब से चला आ रहा है, लेकिन जब बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि उनकी मां-दादी/ नानी भी धंधा करती थी, तो जाहिर है कि मामला दशकों का नहीं सदियों का है। दूसरी ओर ज्यादातर पुरुष निठल्ले, शराबखोर ही मिलेंगे। उनके लिए इस बात के कोई मायने नहीं हैं कि उनकी अपनी बेटी/बेटियों को स्लेट, कापियों की उम्र में ग्राहकों को रिझाने के गुर सिखाए जाते हैं। मंदसौर से नीमच के बीच सड़कों के किनारे जिस्मफरोशी की जितनी दुकाने हैं, उससे अधिक दुकाने, अड्डे गांवों के भीतर हैं। रास्ते से गुजरते वाहनों के सामने लिपस्टिक पोते, अपने उभारों को भरसक दिखाने की अधिक चेष्टा करती लड़कियां आपकी झिझक दूर करने की पूरी कोशिश करती हैं। ऐसी ही एक बाला ने कहा, साहब पहली बार आए हो! कोई बात नहीं, यहां पहली बार आने पर लोग ऐसे ही शर्माते हैं। झिझक मिटने में अधिक देर नहीं लगती।
भंवरी की बातों में खांटी सच्चाई और अनुभव की ताप है। उस अनुभव से उपजी पीड़ा की, जिसे न चाहते हुए भी वासना की भट्टी में झोंक दिया गया था। कमसिन उम्र में उसके नाजुक बदन को दिन-रात यहां से गुजरने वाले ट्रक चालकों और इलाके के सवर्णों के सामने परोस दिया गया। यह सिलसिला तब जाकर थमा, जब भंवरी के साथ उसके ग्राहक रामसिंह ने ही दिल मिलने के बाद (यहां प्यार होने के लिए यही जुमला चलता है) शादी कर ली थी।
एक औसत बाछड़ा लड़की की नियति यही है। जब तक वे ग्राहकों को रिझाने के काबिल होती हैं, उनके परिवार के मर्दों को यह कतई मंजूर नहीं होता कि लड़कियां घर दहलीज पार करें। क्योंकि ऐसा करने से उनको हर महीने मिलने वाली मोटी रकम से हाथ धोना पड़ सकता है। अनेक प्रगतिशील विचारों के धनी ऐसे भी हैं, जिन्होंने इस मोटे अर्थशास्त्र को समझा। यहीं बस गए। वेश्यावृत्ति करने वाली किसी लड़की से शादी कर ली फिर उसको तो इस धंधे से दूर रखा, लेकिन उसके नेटवर्क का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं और उसकी दूसरी बहनों से धंधा भी करवा रहे है। चलिए इनको तो फिर भी बख्शा जा सकता है, लेकिन उन भाइयों, पिताओं को कैसे क्षमा किया जा सकता है, जो बहन, बेटी की रक्षा का दम भरते हैं। उससे रिश्तों की दुहाई देते हैं। फिर उसे विवश करते हैं कि वह अपने जिस्म से उनके लिए रोटियां सेंके। उसे मजबूर करते हैं कि वह तितलियों को पकडऩे, सपने बुनने की उम्र में ग्राहकों की बाहों में मसली जाएं। एक ग्राहक के जाने के बाद दूसरे के लिए फिर सजकर रोड़ किनारे बैठ जाए। बाछड़ा समाज अपनी बेटियों से ही धंधा करवाता है। इस काम में बहुओं को आमतौर पर नहीं उतारा जाता है। भंवरी जोर देकर कहती हैं कि बहुएं पराए मर्द की ओर देख लें तो हमारे बेटे उनके हाथ-पांव काटकर फेंकने से भी नहीं हिचकते हैं। वह आगे कहती हैं, कमबख्त मर्द अपनी जोरू को संभल कर रखन चाहत हैं, और बेटी/ बहन को पैदा होत ही ग्राहक का बिस्तर गरम करन को बिठा देत हैं।
कुल मिलाकर बाछड़ा समाज के लिए बेटी मोटी कमाई का सहज, सुलभ साधन है। परिवार के उदर पोषण के लिए रुपया लाने वाला विद्रोह की संभावना रहित, ईमानदार माध्यम।
ग्राहकों को बुलाने और सौदा तय करने के काम में कहीं भी आपको कोई पुरूष नजर नहीं आएगा। इसे समाज के मर्दों की शान के खिलाफ समझा जाता है। यानि मां और उसकी बेटी/बेटियां ही धंधे के समय घर के दरवाजे और ढाबों, होटलों के इर्द-गिर्द नजर आती हैं। इनकी जाति पंचायतों की बात और भी निराली है। जहां एक ओर दुनिया के सामने मंच से शरीर के सौदे की मुखालफत की जाती है, वहीं दूसरी ओर पंचायत, सरकारी अफसर इसे बढ़ावा देते रहते हैं, ताकि उनकी दुकाने बंद न हों। वैसे भी यह सारा धंधा मर्दो के आलस और उनके निकम्मेपन की ही देन है। मर्दों के पास चूंकि एक तय रकम होती है, इसलिए वह मेहनत-मजदूरी से परहेज करते हैं।
एक ओर तो वह इस पेशे के लिए औरतों को ही जिम्मेदार मानते हैं, लेकिन दूसरी ओर इसी औरत (उनकी बहनों) के नोच खसोट का पैसा वह बिना शर्म पीढिय़ों से डकार रहे हैं। आमतौर पर कहा जाता है कि वेश्यावृत्ति के मूल में गरीबी, अशिक्षा है, लेकिन यहां आकर तो यह तर्क भी गले से नहीं उतरता है, क्योंकि अनेक पढ़े लिखे लोग इस काम को अपने घरों में अंजाम दे रहे हैं।
उनके पास ऐसी संभावना, योग्यता है कि वह दूसरे पेशे को अपनाकर जीवनयापन कर सकें, लेकिन वह ऐसा करते नहीं हैं। क्योंकि उनके पास रोजगार का सबसे बढिय़ा साधन है, उनकी बेटियां। इसी कारण वह ऐसी लड़कियों को भी इस धंधे में उतार देते हैं, जो पढ़ाई में जुटी हुई हैं। नीमच मार्ग पर ही बसे मुरली गांव में एक ऐसे दंपति ऐसे भी मुलाकात हुई, जिनके तीनों बच्चे सरकारी सेवा में हैं, लेकिन उसके बाद भी वह दलाली के काम में लगे हुए हैं। इसी तरह सड़क किनारे चारपाई पर बैठकर ग्राहकों को बुलाने एक प्रौढ़ महिला की कहानी भी खासी रोचक है। उसने अपनी दो बेटियों, बेटे की शादी कर दी है और अब बाहर यानि उड़ीसा, राजस्थान से आने वाली लड़कियों की दलाली खाती हैं। वह इस बात को बेहद अभिमान के साथ कहती है कि उसने अपनी बेटियों को इस धंधे में नहीं उतारा, लेकिन उसके पास इस बात का कोई उत्तर नहीं है कि फिर इस दलाली में क्यों हाथ काले कर रही हो। दरअसल इस काम के न छूटने के पीछे बिना मेहनत आने वाली रकम भी है। एक बार हराम का पैसा जीमने की आदत पड़ जाए तो जिंदगी भर नहीं छूटती। इस काम में यहां के पुरुर्षों की भूमिका बेहद अहम है, क्योंकि वही परिवार के नियंता हैं, और पूरी तरह से पर्दे के पीछे स्त्रियों को ही स्त्रियों की दलाली करने के लिए उकसाते, मजबूर करते हैं। बाछड़ा समुदाय पर काम कर रहे अनेक इस संगठनों और सरकार को यह बात चौंकाने वाली लग सकती है कि देह की इस मंडी में अब राजस्थान और उड़ीसा की लड़कियां उतारी जा रही हैं। तेरह साल की अनीता हालात की मारी एक ऐसी ही बेबस है, जिसे राजस्थान से उसका परिवार यहां छोड़ गया है। यह वही लड़की है, जिसे मेरी पीछे भंवरी बाई ने लपकाया था। वह दिनभर में कम से कम पांच ग्राहकों की वासना को संतुष्ट करती है। यह सारा इलाका ऐसी हजारों लड़कियों से भरता जा रहा है। इसके साथ ही महाराष्ट्र से बेकार होने के बाद बार बालाओं के ठुमके और जिस्म के सौदों के लिए भी यह राजमार्ग नया ठिकाना है। देह के कारोबार में तीस साल से अधिक बिताने के बाद उम्र के अंतिम पड़ाव पर जा पहुंची सेमरी बाई बताती हैं, हम लोग अपनी बच्चियों को सात की उम्र से ही ग्राहकों को पटाने के तरीके सिखाने लगते हैं। यह समय लड़कियों के च्प्रशिक्षणज् का होता है। कम उम्र में उनके विरोध का खतरा नहीं होता और इनकी कीमत भी मोटी मिलती होती है।
देह की इस मंडी में उतारी गई लड़कियों की साक्षरता के बारे में कोई स्पष्ट आंकड़ा तो नहीं है, लेकिन इन दिनों अनेक एसी लड़कियां खुद को ग्राहकों के सामने परोसने में लगीं हैं जो दसवीं और बारहवीं की छात्राएं हैं। अब वे इसके लिए तकनीक का भी भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। मोबाइल नंबरों की पहुंच इंदौर के अनेक माालदारों तक है। जो कभी यहां आते हैं, तो कभी लड़कियों की आपूर्ति बिजनेस मीटिंग के लिए इंदौर आने वाले सफेदपोश लोगों के लिए होती है। वासना के प्यासे धनकुबेरों और वैश्वीकरण की कथित कमाई से फूल कर कुप्पा हुए लोगों के सामने देह की ऐसी मंडी है, जिसका सारा कारोबार मासूम उम्र की लड़कियों के इर्द-गिर्द ही सिमटा है। जिनकी औसत उम्र नौ से पैंतीस साल है।
जिस तरह दिनदहाड़े सड़क पर बने कच्चे-पक्के मकानों में जिस्मफरोशी होती है, उससे जाहिर है कि पुलिस इस कारोबार में बराबर की हिस्सेदार है। बार-बार ग्राहकों, धंधा करने वालों को होने वाली दिक्कतों से अच्छा है एक मुश्त रकम एक बार दो। टेंशन फ्री होकर काम करो। पहरे में चलने वाले कारोबार का शाम गहराते ही नज़ारा ही बदल जाता है। दोपहर में सौ से दो सौ रुपए की मांग करने वाली लड़कियां बीस से पचास रुपए में ही राजी हो जाती हैं। वजह, रात को यहां कोई भी वाहन नहीं रुकता, साथ ही अब यहां लड़कियों की संख्या अधिक हो गई है, जिनके अनुपात में ग्राहक कम आते हैं। इस तरह रतलाम, मंदसौर, नीमच जिलों में बाछड़ा समुदाय की लड़कियां, महिलाएं एक ऐसा जीवन जीने को अभिशप्त हैं, जो उनके अपनों ने ही उनके लिए चुना है। इसलिए उनके नारकीय जीवन से मुक्ति के लिए भी महिला नेतृत्व को ही आगे आना होगा।