मंगलवार, 15 नवंबर 2011

पठार को खोदकर पाताल बना डाला माफिया ने




मध्य प्रदेश सरकार ने एक तरफ स्वर्णिम मध्यप्रदेश बनाने के लिए सात संकल्प, सात कार्यदल बना रखे हैं वहीं दूसरी तरफ सात किस्म के माफिया प्रदेश के विकास की राह में रोड़ा बने हुए हैं। प्रदेश में जमीन, शराब, वन, ड्रग, खनिज, गोवंश और गरीबों को मिलने वाले केरोसिन और अन्य सामग्री को पात्र व्यक्तियों तक नहीं पहुंचने देने वाले जैसे सात तरह के माफिया सक्रिय हैं। सात किस्म के इन माफियाओं में से खनिज माफिया सबसे कुख्यात हैं।
मध्य प्रदेश में खनिज माफियों का कहर सबसे अधिक बुंदेलखंड के पठार पर पड़ रहा है। यहां हरे रंग के बड़े बोर्ड पर लिखा है, सिद्धबाबा की पावन धरती पर आपका स्वागत है. 'सिद्धबाबाÓ जैसा नाम पढऩे से भ्रम होता है कि हम किसी धार्मिक स्थल पर आ गए हैं. लेकिन हाइवे के बगल में ही भारी हथौड़ा लिए ग्रेनाइट तोड़ती 12 साल की बच्ची को देखकर यह मुगालता दूर हो गया. जल्दी ही मालूम हुआ कि यह ग्रेनाइट के अवैध खनन के लिए कुख्यात बुंदेलखंड के सबसे बड़े खनन क्षेत्र का पता है. नेशनल हाइवे नंबर 76 पर महोबा जिले का यह कबरई इलाका है जहां काले ग्रेनाइट से लदे भारी-भरकम ट्रकों के बोझ से 20-25 किलोमीटर तक की सड़कें पूरी तरह चकनाचूर हो चुकी हैं. बुंदेलखंड इलाके की सबसे बड़ी कही जाने वाली सिद्धबाबा की पहाड़ी कभी समुद्र तट से 1,772 मीटर ऊंची हुआ करती थी, लेकिन इसके भीतर छिपे फौलादी ग्रेनाइट के खजाने के कारण इसे पाताल तक खोदा जा रहा है. आधिकारिक तौर पर महोबा से सालाना 65 करोड़ रु. का ग्रेनाइट कारोबार होता है, लेकिन कबरई मंडी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि यह मंडी साल में कम से कम 250 करोड़ रु. पत्थर सप्लाई करती है. इसे महज आंकड़ों का फर्क मान कर खारिज नहीं कर सकते. हिंदी पट्टी के पांच राज्यों में मीडिया की पड़ताल से पता चलता है कि महोबा का हाइवे नं. 76 तो अवैध खनन की महज एक मिसाल है. खनिज संपदा के मामले में इन पांच राज्यों में जो राज्य जितना संपन्न है वहां बेतहाशा अवैध खनन, राजस्व की जबरदस्त हानि, भूजल स्तर में तीव्र गिरावट के रूप में पर्यावरण को भारी नुक्सान और खनन क्षेत्रों में जानो-माल को बड़े पैमाने पर नुक्सान के कई चौंकाने वाले उदाहरण देखे जा सकते हैं.
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की विभिन्न रिपोर्ट को ही आधार मानें तो अवैध खनन के कारण पिछले पांच साल में मध्य प्रदेश में करीब 1,500 करोड़ रु. की चपत लगी है. बुंदेलखंड क्षेत्र में दो दशक से काम कर रहे पर्यावरणविद् भारतेंदु प्रकाश का कहना है, इस अवैध कारोबार की भारी कीमत कबरई ने कुछ इस तरह चुकाई कि इलाके का भूजल स्तर आज कई जगह 300 फुट नीचे तक चला गया है. जब कभी विस्फोट के बाद पहाड़ के परखच्चे उड़ते हैं और चट्टानें उड़कर किसी घर पर गिरती हैं, तो वहां खेलते बच्चे हमेशा के लिए सो जाते हैं. स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष मिश्र एक उदाहरण देते हुए कहते हैं, पिछले दिनों आठ साल का उत्तम प्रजापति एक दिन आंगन में खेलते-खेलते, ऐसे ही एक पत्थर के नीचे दबकर खत्म हो गया था. बाद में थोड़ी कानूनी लड़ाई के बाद परिजन हार गए, मामूली मुआवजे के मिलने के साथ ही नन्हे बच्चे की मौत मामूली दुर्घटना बन कर रह गई. 10वीं सदी के दुर्लभ चकरिया दाई स्मारक के ठीक बगल से पहाड़ काट दिया गया है. आल्हा-ऊदल की जमीन पर इस तरह के 50 से अधिक स्मारकों के आसपास अवैध खनन चल रहा है.
मध्य प्रदेश विधानसभा में पेश सीएजी की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2005-06 से 2009-10 के दौरान प्रदेश में खनन से जुड़ी गड़बडिय़ों के कारण प्रदेश सरकार को 6,906 मामलों में 1496.29 करोड़ रु. राजस्व का नुक्सान हुआ. मध्य प्रदेश में पिछले छह साल में अवैध खनन के 24,630 मामले सामने आए और 23,393 मामले अदालतों में दर्ज हुए हैं, यह देश के अन्य सभी राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है. मध्य प्रदेश देश का सबसे प्रमुख हीरा उत्पादक राज्य है. इसके अलावा यहां कॉपर (तांबे) के आधिक्य वाला पाइरोफाइलाइट और डाइसपोर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. खनन मंत्रालय के मुताबिक मध्य प्रदेश ने वर्ष 2009-10 में 9,701.87 करोड़ रु. के खनिज और 440.19 करोड़ रु. के उप खनिजों का उत्पादन किया.मध्यप्रदेश में खनन माफिया की जड़ें कितनी गहरी हैं इसका एक अंदाजा पिछले दिनों हुई आरटीआई कार्यकर्ता शेहला मसूद की हत्या से भी मिला. इस हत्याकांड की जांच सीबीआइ कर रही है और अब तक जांच किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है. लेकिन इस हत्याकांड में हीरा खनन करने वाली ऑस्ट्रेलिया की कंपनी रियो टिंटो का नाम भी उछला है. कंपनी के खिलाफ जबलपुर हाइकोर्ट में भी पर्यावरण संबंधी मामले लंबित हैं. लेकिन इससे कंपनी के विस्तार पर कोई असर नहीं हुआ, बल्कि उसकी ताकत बढ़ ही गई.मध्य प्रदेश सरकार ने हाल ही में रियो टिंटो कंपनी को छतरपुर जिले के बुंदर नामक स्थान पर भी हीरा उत्खनन की इजाजत दे दी है. एक अनुमान के मुताबिक बुंदर में जमीन के नीचे करीब 27.4 मिलियन कैरेट हीरे के भंडार हैं. हीरे की खुदाई के लिए मशहूर पन्ना के मझ्गवां में राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (एनडीएमसी) की जो खदान है, उसकी तुलना में रियो टिंटो को मिली खदान में हीरे का सात गुना ज्यादा भंडार है. इसके अलावा डेढ़ वर्ष पहले जबलपुर हाइकोर्ट ने आदेश दिया था कि ग्वालियर क्षेत्र में स्थित बटेश्वर और पडावली के पुरातत्व स्थलों के पास की खदानों को बंद कर दिया जाए. लेकिन जमीनी मुआयना करने पर पता चला कि यहां 25 खदानों से अभी भी गैरकानूनी उत्खनन किया जा रहा है. अवैध उत्खनन करने वाले पत्थर निकालने के लिए ब्लास्ट भी करते हैं जिससे ऐतिहासिक मंदिरों की दीवारों में दरारें पड़ रही हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की आपत्तियों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई. खुद प्रशासन ने 29 सितंबर को घाटीगांव स्थित सोन चिरैया अभायारण्य क्षेत्र में अवैध खनन पकड़ा. इस मामले में ग्वालियर के कलेक्टर आकाश त्रिपाठी का कहना है कि कि घाटीगांव इलाके में सख्ती से रोक लगाई जा रही है.गौरतलब है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के पास एक महीने से रिपोर्ट पड़ी है लेकिन मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई अब तक नहीं हो सकी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कहना है कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। मैं पूरी रिपोर्ट जब तक नहीं देख लूं तब तक कुछ नहीं कह सकता।
बुन्देलखण्ड का पठार प्रीकेम्बियन युग का है। पत्थर ज्वालामुखी पर्तदार और रवेदार चट्टानों से बना है। इसमें नीस और ग्रेनाइट की अधिकता पायी जाती है। इस पठार की समु्रद तल से ऊंचाई 150 मीटर उत्तर में और दक्षिण में 400 मीटर है। छोटी पहाडिय़ों में भी इसका क्षेत्र है, इसका ढाल दक्षिण से उत्तर और उत्तर पूर्व की और है। बुन्देलखण्ड का पठार मध्यप्रदेश के टीकमगढ़, छतरपुर, दतिया, ग्वालियर तथा शिवपुरी जिलो में विस्तृत है। सिद्धबाबा पहाड़ी (1722 मीटर) इस प्रदेश की सबसे ऊंची पर्वत छोटी है। बुन्देलखण्ड की भौगोलिक बनावट के अनुरूप गुलाबी, लाल और भूरे रंग के ग्रेनाइट के बड़ाबीज वाला किस्मों के लिये विन्ध्य क्षेत्र के जनपद झांसी, ललितपुर, महोबा, चित्रकूट- बांदा, दतिया, पन्ना और सागर जिले प्रमुखत: हैं। भारी ब्लाकों व काले ग्रेनाइट सागर और पन्ना के कुछ हिस्सों में पाये जाते हैं इसकी एक किस्म को झांसी रेड कहा जाता है। छतरपुर में खनन के अन्तर्गत पाये जाने वाले पत्थर को फार्च्यून लाल बुलाया जाता है। सफेद, चमड़ा, क्रीम, लाल बलुआ पत्थर अलग-अलग पहाडिय़ों की परतों में मिलते हैं। न्यूनतम परत बलुवा पत्थर एक उत्कृष्ट निर्माण सामग्री के लिये आसानी से तराषा जा सकता है। इसके अतिरिक्त बड़े भंडार, हल्के रंग का पत्थर झांसी, ललितपुर, महोबा, टीकमगढ़ तथा छतरपुर के कुछ हिस्सों में मिलता है। इस सामग्री भण्डार का उपयोग पूरे देष में 80 प्रतिशत सजावटी समान के लिये होता है। ललितपुर में पाया जाना वाला कम ग्रेड व लौह अयस्क (राक फास्फेट) के रूप से विख्यात है।
हाल ही के अध्ययन व सर्वेक्षण से जो तथ्य प्रकट हुये हैं वे चौकने वाले ही नहीं वरन् यह भी सिद्ध करते हैं कि भविष्य ये बुन्देलखण्ड की त्रासदी में वे अति सहयोगी होंगे। जहां पहाड़ों के खनन में मकानों की अनदेखी की जा रही है। वहीं खनन माफिया साढ़े 37 लाख घन मी. पत्थर रोजाना पहाड़ों से निकालते हैं। इसके लिये वह एक इंच होल में विस्फोटक के बजाय छ: इंच बड़े होल में बारूद भरकर विस्फोट करते हैं। जब यह विस्फोट होते हैं तो आस-पास 15-20 किमी की परिधि में बसने वाले वन क्षेत्रों के वन्य जीव इन धमाके की दहषत से भागने लगते हैं व कुछ की श्रवण क्षमता पूरी तरह नष्ट हो जाती है। इसके अतिरिक्त विस्फोट से स्थानीय जमीनों में जो दरारें पड़ती हैं उससे ऊपरी सतह का पानी नीचे चला जाता है और भूगर्भ जल बाधित होता है। इस सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड ग्रेनाइट करोबार जो कि यहां कुटीर उद्योग के नाम से चल रहा है में 1500 ड्रिलिंग मशीनें, पांच सैकड़ा जेसीबी, 20 हजार डंफर, 2000 बड़े जनरेटर, 50 क्रेन मशीन और हजारों चार पहिया ट्रैक्टर प्रतिदिन 6 करोड़, 83 लाख, पांच सौ ली0 डीजल की खपत करके और ओवरलोडिंग करते हैं। इन विस्फोटों से रोजाना 30-40 टन बारूद का धुआं यहां के वायुमंडल में घुलकर बड़ी मात्रा में सड़क राहगीरों व खदानों के मजदूरों को हृदय रक्तचाप, टी0वी0, श्वास-दमा का रोगी बना देता हैं। इसके साथ-साथ 22 क्रेसर मषीनों के प्रदूषण से प्रतिदिन औसतन 2 लोग की आकस्मिक मृत्यु, 2 से तीन लोग अपाहिज व 6 व्यक्ति टीवी के शिकार होते हैं।
गौरतलब है कि इस उद्योग से प्रतिदिन 10 हेक्टेयर भूमि (उपजाऊ) बंजर होती हैं 29 क्रेसर मषीनों को उ0प्र0 प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा अनापति प्रमाण पत्र जारी किया गया है लेकिन इन खनन मालिकों की खदानों में पत्थर तोडऩे के समय चलाया जाने वाला फव्वारा कभी नहीं चलता जो कि डस्ट को चारों तरफ फैलने से रोकने के लिये होता है ताकि प्रदूषण कम हो। अवैध रूप से लाखों रूपयों की विद्युत चोरी इनके द्वारा प्रतिदिन की जाती है इसके बाद भी यह उद्योग बहुत तेजी से बुन्देलखण्ड में पैर पसार रहा है क्योंकि सर्वाधिक राजस्व इस उद्योग से मिलता है। विन्ध्याचल पवर्त माला और कबरई (महोबा), मोचीपुरा, पचपहरा का ग्रेनाइट सर्वाधिक रूप से खनिज कीमतों में सर्वोत्तम माना जाता है प्राकृतिक संसाधनों के इस व्यापार से निकट समय में ही यदि निजात नहीं मिलती है तो बुन्देलखण्ड की त्रासदी में यह उद्योग बहुत बड़ी भूमिका के साथ दर्ज होने वाला काला अध्याय साबित होगा।
मारबल माफिया की करतूतें
मध्य प्रदेश के कटनी में सालों से संगमरमर का अवैध खनन हो रहा था। जहां जिला प्रशासन की संदिग्ध भूमिका के चलते पिछले पांच सालों से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की लगातार अवमानना होती आ रही है। हैरानी है कि इसके बावजूद कटनी के निमास गांव में न केवल मारबल माफिया सक्रिय हैं बल्कि इन्होंने आईएएस अफसरों को भी साथ ले रखा है, जो मार्बल माफियाओ को फायदा पहुंचाने का काम करते रहे हैं। कटनी के मार्बल माफियाओं पर डायलाग इंडिया के ब्यूरो चीफ कमलेश तिवारी की रिपोर्ट- देश की बुनियाद व्यवस्था का आधार कहे जाने वाले भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदस्थ आई.ए. एस. अफसर आज अकूत धन संग्रह के फेर में कितने पक्ष-भ्रष्ट हो चुके हैं। इसका औसत अनुमान तथाकथित अति-ईमानदार कहे जाने वाले आई.ए.एस. जोशी- दम्पत्ति द्वारा किये गये धन का संग्रह के मिजाज से सहज ही लगाया जा सकता है।
आश्चर्य होता है कि ,एक हद तक इनके हाथों में सामाजिक न्याय प्रबंधन के व्यवस्था की, संवेदनशील जिम्मेदारी भी होती है। इसीलिए किसी जिले में इनकी पदस्थापना के साथ इन्हें डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के नाम से भी संबोधित किया जाता है। ऐसे गरिमापूर्ण पद पर आसीन शख्स जब अपने ही लोकतंत्र की आस्तीन का सांप बन जाए तो, देश के आम नागरिकों और उनसे बने समाज तथा देश का क्या होगा? यह एक विचारणीय प्रश्न है ?
मध्यप्रदेश के कटनी जिले में मार्बल माफियाओं से जुड़ा एक ऐसा, ही मामला प्रकाश में आया है जहां जिला प्रशासन की अफसरशाही की सरपरस्ती में विगत लगभग पांच वर्षो से सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की निरंतर अवमानना होती आ रही है।
भारतीय लोकतंत्र में यदि ऐसे निरंकुश आई.ए.एस. हाकिमों और ऐसे मर्यादाहीन सामंतों का जहां गठजोड़ हो जाता है तो फिर वहां कुछ भी होना संभव है। जाहिर हैं कि वहां जिसकी लाठी उसकी भैंस जैसी उक्ति का सूत्र कारगार हो जाता है। इस हकीकत का ब्यौरा भी कुछ इसी तरह है।
कटनी जिला के मार्बल जोन में स्थित गांव निमास के ख-न- 220 के रकवा 29-31 हेक्टेयर में 1-96 हेक्टेयर छोड़कर मार्बल उत्खनन हेतु कुछ लीजें लीज धारकों के आवेदन पर शासन द्वारा 2005 में स्वीकृत की गई थी। जिनके विरूद्ध सामाजिक संस्था एकता परिषद् के जगत बहादुर सिंह द्वारा देश के सर्वोच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की गई थी जिसकी सुनवाई पश्चात् अंतिम निर्णय तक की अवधि के लिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विगत दिनांक 16-09-2005 को संबंधित भू-क्षेत्र के उत्खनन कार्य पर पूर्ण रोक का आदेश जारी किया गया था। माननीय सर्चोच्च न्यायालय के उक्त आदेश की प्रमाणित प्रतियों की छाया प्रतिंया भेजकर याचिकाकर्ता ने स्वत: संबंधित सभी विभागों को आगाह भी कर दिया था ताकि, किसी भी स्तर पर किसी तरह- माननीय न्यायालय की गरिमा भंग न हो सके। बावजूद इसके रसूखदार मार्बल उद्योगपतियों ने हार नही मानी और जिले के आला अफसरों से गठजोड़ का सिलसिला शुरू कर दिया।
इस गठजोड़ से जोड़-तोड़ बिठाया और रास्ता भी खोज निकाला। सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिबंधित भू-क्षेत्र में धड़ल्ले से उत्खन्न किया जाता रहा और इसे बाजार में बेचा जाता रहा। इसकी शिकायत भी कई बार प्रदेश शासन के मंत्रियों तथा सचिवों के साथ उच्चतम न्यायालय तक भी पहुचाई गई किन्तु, हाकिमों और सामंतों की संयुक्त पैतरेबाजी, माननीय न्यायालय को निरंतर गुमराह करती रही। सन 2010 में हुई शिकायतों के बाद से यह प्रकरण समाचारों की सुर्खियां बनने लगा। ऐसी दशा में अब यह मामला अपनी मूल विषय वस्तु से भटककर सीमांकन के सत्यापन जैसे विवाद का विषय बन गया है।
कटनी जिलें के मार्बल जोन में अनेक विसंगतियों के लिये बहुचर्चित एक गांव हैं निमास। जिसके भू-गर्भ में बेशकीमती अकूल खनिज सम्पदा का भण्डारण सफेद सोना यानि मार्बल के रूप में दबा पड़ा है। यही कारण है कि देश भर के मार्बल माफियाओं में इस क्षेत्र को हथियाने की प्रतिस्पर्धा चलती रही और इसी स्वार्थ के चलते यहां के मार्बल माफियाओं ने राज्य सरकार से लेकर केन्द्र तक के संबंधित लगभग सभी महकमों की कार्य शैली को कुछ इस तरह पंगु कर दिया कि, आज उनकी सारी कार्य प्रणाली बूझो तो जाने जैसी पहेली बन कर रह गई है।
ग्राम निमास तहसील बहोरीबंद जिला कटनी मध्यप्रदेश के खसरा नं- 220 की भूमि रकवा 29-31 हेक्टेयर यानी-73 एकड़ लगभग दस्तावेजों में दर्ज है। इसी खसरा नंबर में दर्ज भूमि के नाम जोख में हुई हेरा-फेरी के चलते, विगत वर्ष 2005 से सरकारी महकमों के आला अफसर बड़े और अपच भ्रष्ट्राचार के लिये जितने बदनाम हुए है अब उतना ही यह भू-क्षेत्र उनके गले की फांस बनता नजर आने लगा है। इसके कारणों में कई तरह की बातें कही-बताई जा रही है इस भू-भाग का विवाद आज भी अनसुलझा और संदेहों की परिधि में बना हुआ है।
प्रथम तो यह कि इस भू-क्षेत्र निमास के खसरा नं- 220 तथा इसके इर्द-गिर्द के क्षेत्र में वन्य प्राण्यिों की बहुतायत होने और खासकर बाघों तथा उनके शावकों के मौजूद होने की बात को प्रमाणित करते हुए विगत सन् 2000 में इस सम्पूर्ण राजस्व भू-क्षेत्र को वन विभाग ने अपने अधिपत्य में ले लिया था। (जिसे वन विभाग के दस्तावेजों में भूमि बैंक के रूप में दर्शाया भी गया है।
तत्ससंबंधी प्रक्रिया कमोवेश अंतिम दौर तक पहुंच ही चुकी थी मात्र, सरकारी राजपत्र में प्रकाशन होने की ओैपचारिकता शेष रह गई थी। इसी दौरान न जाने ऐसा क्या हुआ और वन- विभाग ने पांच सालों तक अपने अधिपत्य में रखी इस क्षेत्र की पूरी भूमि को 2005 में राजस्व विभाग के हवाले वापस लौटा दी? संदेहों के इसी तथ्य को आधार बनाकर याचिकाकर्ता ने जनहित याचिका के माध्यम से देश की सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय उक्त भू-क्षेत्र में उत्खनन कार्य प्रतिबंधित करने का आदेश जारी किया गया। दूसरी बात यह रही कि, निमास ख-न- 220 के रकवा 29-31 हेक्टेयर के भू-भाग की सीमांकन भी भू बंदोबस्त के साथ बीती सदी के सन् 1988-89 में हुआ था। इस दौरान बंदोबस्त के अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा अन्य गांवों की तरह निमास गांव की सीमा का निर्धारण कर, उक्त भू-क्षेत्र में 12 चांदे-मुनारे स्थापित किये गए थे। कालान्तर में इस भू-क्षेत्र में मार्बल लीजे स्वीकृत हुई। तब लीजधारकों में भू-अधिकार क्षेत्र को लेकर सन् 2005 में विवाद निर्मित हुई तब लीजधारकों में भू-अधिकार क्षेत्र को लेकर सन् 2005 में विवाद की स्थिति निर्मित होने लगी। इसी दौरान सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उत्खनन कार्य पर रोक संबंधी आदेश जारी हो जाने के कारण यह विवाद कुछ ठंडा तो हुआ लेकिन शीतयुद्ध की तर्ज पर चलता रहा। इस विवाद का प्रमुख कारण यह था कि बंदोबस्त विभाग द्वारा 1988-89 में स्थापित किये गए चांदे व मुनारे पूरी तरह नदारत थे। फिर जैसे तैसे 2007 में बंदोबस्त मुख्यालय ग्वालियर से एक जांच दल कटनी आया, जिसने कटनी जिले के राजस्व अमले के साथ क्षेत्र का सर्वेक्षण किया और अंतत: चांदे व मुनारे खोजने में पूरी टीम और उनके उपकरण तक असफल रहे।
यह बात तूल न पकड़े इस गरज से कटनी जिला मुख्यालय में भू- बंदोबस्त ग्वालियर एवं जिला राजस्व विभाग की त्वारित बैठक कलेक्टर के निर्देशन में हुई और आगामी दो दिनों की समयावधि में ही विवादित भू-क्षेत्र में अनुमानित आधार पर (सन् 2007 में) पुन:12 चांदे व मुनारे स्थापित करवा दिये गए। मामला फिर शांत पड़ गया। कुछ समय बीता। मार्बल माफिया और जिला प्रशासन के गठजोड़ ने रास्ता खोज निकाला।
भू-गर्भ का दोहन फिर शुरू हो गया जबकि, सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की मर्यादा बनाए रखने हेतु मध्यप्रदेश शासन, खनिज विभाग के सचिव द्वारा कार्य पर रोक लगाए रखने के निर्देश लिखित तौर पर, पहिले से ही सभी को प्राप्त हो चुके थे बाबजूद, इसके मार्बल उत्खनन का कार्य जारी रहा। इसके विरूद्ध शिकायतों का सिलसिला भी फिर चल पड़ा। लेकिन इस बार अप्रेल मई 2010 में मामला कुछ ज्यादा ही गरमा गया। निमास ख-न- 220 में स्वीकृत लीजों की सीमा निर्धारण करने हेतु इस बार आई-बी-एम-(इंडियन माइंस ब्यूरो) तथा सी-एल-आर (भू-बंदोबस्त) ग्वालियर की संयुक्त टीम 17 मई 2010 को जिला मुख्यालय कटनी पहुंची। जिसने कटनी जिला राजस्व तथा खनिज विभाग की टीम के साथ दिनांक 17,18, और 19 मई 2010 तक सर्वेक्षण किया।
आश्चर्य की बात यह रही कि, इस बार भी विगत 2007 में स्थापित किये गए चांदे व मुनारे फिर गायब हो गए? यह जादू था या कुछ और? कोई नही जानता। मामला ढाक के तीन पात जैसा बनकर फिर जस का तस रह गया।
अब प्रश्न यह उठता है कि , वे चांदे व मुनारे कहां गुम जो गए,? जबकि सीमांकन के दौरान दोनो बार (1988-89 तथा 2007 में भी चांदा के गढ़े गए पत्थरों को अन्य सांकेतिक सामग्री के साथ जमीन की सतह से पांच फुट नीचे गढ्ढों में रखकर ढांका गया था। और उसके ऊपर चतूबतरानुमा पक्के मुनारे खड़े कर दिये गये थे। यह सब भू-बदोबस्त विभाग द्वारा इसलिये किया जाता है ताकि, कभी किसी विवाद की स्थिति में जरीब की कडिय़ा डालकर भूमि की नाप-जोख करके सीमांकन का सत्यापन किया जा सके। लेकिन खसरा नं- 220 निमास के भू-भाग में उपजे इस विवाद से सरकारी महकमों के सारे आला अधिकारी आज भी कतराते नजर आ रहे है।? इसकी मात्र एक वजह है कि चंदा-मुनारा की निशान देही तक कहीं नजर नहीं आती। इतनी बड़ी धोखाधड़ी कब कैसे, क्यों और किसने की? शायद! प्रशासन के आला अफसर सब कुछ जानते समझते तो हैं लेकिन, ना समझी का मलम्मा परत दर परत चढ़ाते चले आ रहे है?
इस विवाद की तीसरी मुख्य वजह यह भी बताई जा रही हैं कि निमास ख-न- 220 में मूल रकवा 29-31 हेक्टेयर है जिसमें 1-96 हेक्टेयर का रकवा मंदिर रोड़ एवं हाईटेंशन लाइन के लिये छोड़कर शेष 4-80 हेक्टेयर सरिता मार्बल, 10 हेक्टेयर शारदा मार्बल तथा 12-55 हेक्टेयर एस-अंकुन मिनरल्स प्रा-लि- को 16-03-2005 को मार्बल उत्खनन हेतु स्वीकृत लीज के रूप में शासन द्वारा उक्त लीजधारकों को दिया गया है। जिसमें कटनी कलेक्टर द्वारा 31-03-2008 को भू-प्रवेश की अनुमति भी दे दी गई थी। इसी के समानांतर एक बात यह भी है कि ख-न- 220 के चारों ओर पूर्व से अन्य लीज धारकों की खदानें है जो विवादित भूमि से सटी हैं। इनमें ही, एक लीज धारक जिसे 12-55 हेक्टेयर रकवा की भूमि स्वीकृत हुई है। उस लीजधारक फर्म एस अंकुन मिनरल्स प्रा-लि- के डायरेक्टर का कहना हैं कि उनके स्वीकृत क्षेत्र में तीन दिशाओं से अतिक्रमण कर अन्य लीज धारकों द्वारा अवैधानिक तरीके से अरबों रूपयें का मार्बल (लीज स्वीकृत के पूर्व से अभी तक) उत्खनन करके बाजार में बेच लिया गया। लिहाजा उक्त भू-दोहन से हुई आय तथा शासकीय राजस्व की क्षतिपूर्ति का जिम्मेदार कौन रहेगा? इस वाजिव प्रश्न का जबाव भी शायद ! कटनी जिला प्रशासन के आला अफसरों के पास नही है! और यही कारण है उक्त लीजधारक नाप जोख कर सीमांकन की जिद् पर अड़ गया है। वजह यही रही कि उसने स्वीकृत लीज पर अभी तक काम का श्री गणेश भी नही किया।
ऐसे हालातों में सीमांकन का सत्यापन कैसे होगा और कौन करेगा? यदि यह कार्य दुष्कर नहीं, तो नाप- जोख करने से शासन व प्रशासन कतरा क्यों रहा?
दूसरा यह कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की अवमानना करते हुए जिस तरह का कुचक्र चलाकर मार्बल माफिया ने प्रतिबंधित क्षेत्र का भू-दोहनकर अरबों रूपये के मार्बल का अवैधानिक कारोबार किया और जिला प्रशासन अपनी नाक के नीचे होते इस अवैधानिक कारोबार की अनदेखी करता रहा, उसके लिये माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना संबंधी भंग हुई मर्यादा की क्षतिपूर्ति कैसे हो सकेगी? और कौन कर पाएगा?

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