बुधवार, 30 जून 2010

सियासत में न डूब जाए आंसू

भोपाल में 2 और 3 दिसंबर 1984 की दरम्यिानी रात को विश्व की भीषणतम गैस त्रासदी में बीस हजार से अधिक लोग असमय ही काल कलवित हो गए थे, पांच लाख से ज्यादा प्रभावित या तो अल्लाह को प्यारे हो चुके हैं या फिर घिसट घिसट कर जीवन यापन करने पर मजबूर हैं, पर जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है। लेना देना हो भी तो क्यों, उनका अपना कोई सगा इसमें थोड़े ही प्रभावित हुआ है। देश की जनता की जान की कीमत इन सभी जनसेवकों के लिए कीडे मकोडों से ज्यादा थोडे ही है। मोटी चमडी वाले जनसेवकों ने तो भोपाल हादसे में मारे गए लोगों के शवों पर सियासी रोटियां सेकने से भी गुरेज नहीं किया। छब्बीस साल तक गैस पीडित अपना दुखडा लेकर सरकारों के सामने गुहार लगाते रहे पर उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती ही साबित हुई है। अब जब फैसला आ गया है तब सारे दलों के लोगों का जमीर जागा है, वह भी जनता को लुभाने और दिखाने के लिए, अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए।
भोपाल के साथ यह विडंबना रही है कि चुनावी राजनीति में वह कभी भी निर्णायक की भूमिका में नहीं रहा। ना ही भारत में, ना ही अपने राज्य में जिसकी वजह से राजनीतिज्ञ उनके मतभेदों की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते। चार सप्ताह के अंदर भोपाल में आम चुनाव हुए थे, लेकिन 1984 में मतदाताओं के मन को इंदिरा गांधी की शहादत ने बदल दिया था। कांग्रेस मध्य प्रदेश के सारे सीट जीती और पूरे देश में लगभग यही आलम था। पांच साल बाद देश मंडल और राम मंदिर के साथ बोफोर्स घोटाले में व्यस्त हो गया। ऐसे में अगर यहां के वाशिंदों के आंसू सियासत की भेंट चढ़ जाते हैं तो हैरानी की कोई बात नहीं।
भारत गणराज्य में मानवीय मूल्यों पर निहित स्वार्थ पूरी तरह हावी हो गए हैं। कहने को तो भारत गणराज्य का प्रजातंत्र समूचे विश्व में अनूठा है, पर वास्तविकता इससे कोसों दूर है। आज सत्ताधारी दल के साथ ही साथ विपक्ष ने अपने आदर्श, नैतिकता, जनसेवा पर अपने खुद के बनाए गए स्वार्थों को हावी कर लिया है। ''हमें क्या लेना देना, हमारे साथ कौन सा बुरा हुआ, हम क्यों किसी के पचडे में फंसें, जनता कौन सा खाने को देती है, कल वो हमारे खिलाफ खड़ा हो गया तो, हमें राजनीति करनी है भईया, हम उनके मामले में नहीं बोलेंगे तो कल वे हमारे मामले में मुंह नहीं खोलेंगे, आदि जैसी सोच के चलते भारत में राजनैतिक स्तर रसातल से भी नीचे चला गया है।
छब्बीस साल पहले देश के हृदय प्रदेश भोपाल में हुई विश्व की सबसे भीषणतम औद्योगिक त्रासदी के बाद उसके लिए जिम्मेदार रहे अफसरान को न केवल उस वक्त केंद्र और सूबें में सत्ता की मलाई चखने वाली कांग्रेस ने मलाईदार ओहदों पर रखा, वरन जब विपक्ष में बैठी भाजपा को मौका मिला उसने भी भोपाल गैस त्रासदी के इन बदनुमा दागों को अपने भाल का तिलक बनाने से गुरेज नहीं किया। देश की सबसे बडी अदालत में जब जस्टिस ए.एस.अहमदी ने धाराओं को बदला तब केंद्र सरकार शांत रही। फिर उच्च पदों पर आसीन नौकरशाहों को सेवानिवृत्ति के बाद मोटी पेंशन देने के बाद भी उनके पुनर्वास के लिए उन्हें किसी निगम मण्डल, आयोग, ट्रस्ट का सदस्य या अध्यक्ष बनाने की अपनी प्रवृत्ति के चलते इनकी लाख गलतियां माफी योग्य हो जाती हैं।
इसी तर्ज पर जस्टिस अहमदी को भोपाल मेमोरियल ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया गया। क्या सरकार ने एक बारगी भी यह नहीं सोचा कि इन धाराओं को बदलकर जस्टिस अहमदी ने भोपाल में मारे गए बीस हजार से अधिक लोगों और पांच लाख से अधिक पीडि़त या उनके परिवारों के साथ अन्याय किया है। सच ही है राजनीति को अगर एक लाईन में परिभाषित किया जाए तो ''जिस नीति से राज हासिल हो वही राजनीति है।'' कांग्रेस या भाजपा को इस बात से क्या लेना देना था और है कि किन परिस्थितियों में धाराओं को बदला गया।
भोपाल में न्यायालय में मोहन प्रकाश तिवारी ने जो फैसला दिया उस पर उंगली नहीं उठाई जा सकती क्योंकि उन्होंने अपने विवेक से सही फैसला दिया है। जब प्रकरण को ही कमजोर कर प्रस्तुत किया गया तो भारतीय कानून के अनुसार उसके लिए जितनी सजा का प्रावधान होगा वही तो फैसला दिया जाएगा। चूंकि देश की सबसे बडी अदालत ने पहली बार आरोप तय किए थे, तो उससे निचली अदालत उसे किस आधार पर बदल सकती है। भारतीय कानून में यह अधिकार उपरी अदालतों को है कि वे अपने नीचे की अदालतों के फैसलों की समीक्षा कर नई व्यवस्था दें।
जब फैसला आ चुका है, देश व्यापी बहस आरंभ हो चुकी है, तब फिर पूर्व न्यायाधिपति को भोपाल मेमोरियल का अध्यक्ष बनाए रखने का ओचित्य समझ से परे है। सरकार को चाहिए था कि तत्काल प्रभाव से उन्हें इस पद से हटा देेते। मामला आईने की तरह साफ है। सबको सब कुछ समझ में आ रहा है कि दोषी कौन है, पर ''हमें क्या करना है'' वाली सोच के चलते जनता गुमराह होती जा रही है।
प्रधानमंत्री को भी लगा कि मामला कुछ संगीन और संवेदनशील होता जा रहा है। देश भर में इसके खिलाफ माहौल बनता जा रहा है तो उन्होंने भी मंत्री समूह के गठन की औपचारिकता निभा दी। इस मंत्री समूह में केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ को भी रखा गया है। कमल नाथ अस्सी से लगातार संसद सदस्य हैं, चौरासी में भी वे संसद सदस्य थे। राजीव और संजय गांधी के उपरांत प्रियदर्शनी स्व.श्रीमति इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे कमल नाथ का यह पहला टेन्योर था सांसद के रूप में। वे मध्य प्रदेश के छिंदवाडा संसदीय क्षेत्र से चुगे गए थे। इसके बाद वे नरसिंहराव सरकार में वन एवं पर्यवरण तथा वस्त्र मंत्री रहे हैं। इसके बाद वाणिज्य उद्योग और अब भूतल परिवहन मंत्री हैं। यक्ष प्रश्न यह है कि बतौर सांसद मध्य प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी कमल नाथ ने आज तक भोपाल गैस कांड के लिए क्या किया है!
इसका उत्तर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही आएगा। जब तीस सालों में उन्होंने अपने निर्वाचन वाले सूबे में भोपाल गैस कांड जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कुछ नहीं कहा और किया तो अब मंत्री समूह में रहकर वे क्या कर लेंगे। कमलनाथ ने वाशिंगटन में 28 जून 2007 को यूनियन कार्बाईड को खरीदने वाली कंपनी डाओ केमिकल की वकालत करते हुए कहा था कि हादसे के वक्त डाओ केमिकल अस्तित्व में नहीं थी इसलिए भोपाल त्रासदी की जिम्मेदारी इसकी नहीं है। वरिष्ठ राजनेता और तीस साल की सांसदी कर चुके कमल नाथ को डाओ केमिकल का पक्ष लेने के बजाए भोपाल गैस कांड के मृतकों के परिजनों और पीडितों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए था, जो उन्होंने किसी भी दृष्टि से नहीं दिखाया।
भोपाल कांड के मृतकों की कीमत पर डाओ केमिकल को देश में फिर से आमद देना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता है। हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि यह भोपाल गैस कांड के मृतकों और पीडितों को एक गाली से कम नहीं है। आज आरोप प्रत्यारोप के कभी न थमने वाले दौर आरंभ हो चुके हैं। भोपाल गैस कांड के फैसले से सियासी तंदूर फिर गरम होकर लाल हो चुका है। सभी जनसेवक अब अपने अपने हिसाब से इसमें अपने विरोधियों के खिलाफ तंदूरी रोटी सेंकना आरंभ कर चुके हैं। एक दूसरे के कपडे उतारने वाले राजनेता यह भूल जाते हैं कि मृतकों के परिजनों और पीडितों को उनके वर्चस्व की लड़ाई से कोई लेना देना चहीं है, वे तो बस न्याय चाह रहे हैं।
मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान गैस राहत मंत्री बाबूलाल गौर का जमीर भी अचानक जागा है। उन्होंने भी इस तंदूर में अपनी दो चार रोटियां चिपका दी हैं। गौर का कहना है कि 1991 में जब वे गैस राहत मंत्री थे तब उन्होंने 9 जुलाई 1991 को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव को पत्र भी लिखा था। बकौल गौर भोपाल के गैस प्रभावित 36 वार्ड के पांच लाख 58 हजार 245 गैस प्रभावितों में से महज 42 हजार 208 पीडितों को ही मुआवजा देने की बात कही थी उस समय के मंत्री समूह ने। गौर के इस प्रस्ताव पर कि शेष बीस वार्ड के पांच लाख 16 हजार 37 पीडि़तों को मुआवजा देने पर उस समय गठित मंत्री समूह के अध्यक्ष कुंवर अर्जुन सिंह सहमत थे। बाबूलाल गौर खुद अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, पर वे इस बात को बताने से क्यों कतरा रहे हैं कि उन्होंने विधायक रहते इस मामले को कितनी मर्तबा विधानसभा के पटल पर उठाया। वे भोपाल शहर से ही विधायक चुने जाते आए हैं, वे प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं, फिर उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए अपने विधानसभा क्षेत्र के भोपाल शहर के गैस पीडि़तों के लिए क्या प्रयास किए। बाबू लाल गौर को इन बातों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
कानून के जानकारों की मानें तो मध्य प्रदेश सरकार के हाथ बांध दिए गए हैं। अपने चुनाव क्षेत्र के दो वार्ड बाबूलाल गौर गैस पीडि़तों की सूची में इसके बावजूद नहीं जुड़वा पाए क्योंकि फैसला तो केंद्र सरकार को करना था। अब दूसरी बार भारत सरकार का मंत्रिमंडलीय समूह तब जाकर जीवित किया गया जब भोपाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ऐलान कर चुके थे कि वे इस लड़ाई को हारने वाले नहीं हैं और सरकार की ओर से उच्च न्यायालय में अपील करेंगे। भोपाल की जनता को शिवराज सिंह से ज्यादा उम्मीद हैं। पी चिदंबरम नए समूह के अध्यक्ष बनाए गए हैं मगर अब यह उनके ऊपर है कि वे वारेन एंडरसन से पहले निपटना चाहते हैं या माओवादी कातिलों से।
कमाल की बात तो यह है कि मध्य प्रदेश के एडवोकेट जनरल रह चुके और अब भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विवेक तन्खा शिवराज सिंह चौहान की बनाई कमेटी में शामिल है। भारत सरकार को उनकी मदद लेने का ध्यान भी नहीं रहा। वैसे भी भारत सरकार में 29 ग्रुप ऑफ मिनिस्टर पहले से हैं और अब 30 हो गए हैं। उम्मीद की जा रही थी कि शर्म से ही सही, भोपाल को न्याय दिलवाने में अब केंद्र सरकार कामयाब होगी और अमेरिका के साथ रिश्ते बिगडऩे का रोना नहीं रोएगी। लेकिन चार दिनों तक चली बैठक के बाद ग्रुप ऑफ मिनिस्टर ने गैस पीडि़तों के जख्मों पर मुआवजे का मरहम लगाने की कोशिश की है जो मिर्च से कम नहीं है। क्योंकि सरकार ने 21 साल पुराने वर्गीकरण यानी 1989 में डाक्टरों द्वारा आनन-फानन में मरीजों का जो वर्गीकरण किया था उसके आधार पर मुआवजा देने का ऐलान किया है। गैस पीडि़त संगठन के नेता अब्दुल जब्बार कहते हैं कि केन्द्र सरकार ने भोपाल के केवल उन लोगों को ही मुआवजा देने की बात कही है जिन्हें एक मुश्त 50 हजार या उससे अधिक की रकम मिली है। जबकि इस मामले में तत्कालीन स्वास्थ्य अधिकारी एसएन मिश्रा का कहना है कि उस समय जल्दीबाजी में पीडि़तों का वर्गीकरण किया गया था। सही तो यह होता कि एक बार फिर से पीडि़तों की पहचान और वर्गीकरण किया जाता।
भोपाल गैस कांड पर केंद्र सरकार अपनी खाल बचाने में जुटी है। छब्बीस साल तक कुंभकर्णी नींद सो रही केंद्र सरकार को अब भोपाल गैस पीडि़तों की सुध लेने की सूझी। इस बात पर सहमति बनी कि सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन यानी सुधार याचिका दाखिल की जाएगी और वॉरेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए नए सिरे से प्रक्रिया शुरू की जाएगी। यह फैसला भी देश की आवाम को बरगलाने की एक कोशिश है। एंडरसन पर सिर्फ लापरवाही के आरोप हैं और अमेरिका की अदालत ने इस मामले में इंटेंट साबित नहीं हो पाने की वजह से प्रत्यर्पण की अर्जी खारिज कर दी है। अब भारत सरकार को इसके लिए एक लंबी कानूनी लड़ाई लडऩी होगी। प्रत्यार्पण के लिए अपने अनुरोध पत्र को बदलना होगा। एंडरसन नब्बे की उम्र पार कर चुका है और अमेरिकी कानून में प्रत्यर्पण के लिए आरोपी की उम्र को भी ध्यान में रखा जाता है। कुल मिलाकर यह एक ऐसी कोशिश है जिसका कोई नतीजा नहीं निकलना लगभग तय है।
तकरीबन 20 हजार लोगों की मौत के बाद अचानक सरकार के सक्रिय दिखने की वजह कुछ और है। अदालत के फैसले के बाद केंद्र सरकार चौतरफ दबाव में थी। कांग्रेस अपने दामन पर लगे दाग को धोने और आरोपों के दलदल से निकलने के लिए बेचैन है। अदालती फैसले के बाद एंडरसन के भारत से भागने को लेकर जिस तरह से मीडिया ने सरकार को घेरा और उस वक्त के प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर आरोप लगे उससे कांग्रेस सकते में आ गई। पार्टी नेताओं ने बचाव में अलग-अलग तर्क देने शुरू किए जिसका नतीजा यह हुआ कि पार्टी में पहले भ्रम की स्थिति बनी। पार्टी के महासचिव और दस जनपथ के करीबी महासचिव दिग्विजय सिंह ने एंडरसन के भारत से भगाने को लेकर राजीव गांधी को घेरे में ले लिया। पार्टी के एक और नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी ने अलग राग अलापते हुए अर्जुन सिंह पर सवाल खड़े कर दिए। मामला बिगड़ता देख पार्टी डैमेज कंट्रोल में जुटी और नेताओं को भोपाल मसले पर मुंह बंद करने का फरमान जारी कर दिया गया। अब पार्टी के बड़बोले प्रवक्ता मनीष तिवारी यह तर्क दे रहे हैं कि अगर वॉरेन एंडरसन को नहीं भगाया जाता तो देश की जनता उसे मार डालती। मनीष के तर्क बेहद लचर और तथ्यहीन हैं। अगर भोपाल की जनता में गैस लीक कांड को लेकर गुस्सा था और इस बात की आशंका थी वो हिंसक हो सकती थी तो तो एंडरसन को वहां से निकाल कर देश के किसी भी हिस्से में रखा जा सकता था। देश में इतने खुफिया ठिकाने हैं जिसमें से कहीं भी एंडरसन को रखा जा सकता था लेकिन उसे तो शाही ठाठ-बाट के साथ भारत से विदा किया गया।
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह क्या सारे राजनेता इस बात को जानते हैं कि जनता की याददाश्त बहुत ही कमजोर होती है। अमेरिका के वल्र्ड ट्रेड सेंटर या संसद पर हमला हो या फिर देश की व्यवसायिक राजधानी मुंबई पर हुए अब तक के सबसे बडे आतंकी हमले की बात। हर मामले में जैसे ही घटना घटती है, वैसे ही चौक चौराहों, पान की दुकानों पर बहस गरम हो जाती है, फिर समय के साथ ही ये चर्चाएं दम तोड देती हैं। भोपाल गैस कांड में भी कुछ यही हो रहा है। मामला अभी गर्म है सो कुछ न कुछ तो करना ही है। मंत्री समूह का गठन कर जनता को भटकाना ही उचित लगा सरकार को।
क्या भाजपा के अंदर इतना माद्दा है कि वह केंद्र सरकार से प्रश्न करे कि गैस कांड के वक्त मुख्यमंत्री रहे कुंवर अर्जुन सिंह की अध्यक्षता में 1991 गठित मंत्री समूह की सिफारिशें क्या थीं, और क्या उन्हें लागू किया गया, अगर नहीं तो अब एक बार फिर से मंत्री समूह के गठन का ओचित्य क्या है! क्या इसका गठन मामले को शांत करने और जनता का ध्यान मूल मुद्दे से भटकाने के लिए है। हालांकि इस मामले में प्रदेश सरकार के हाथ बंधे हुए हैं।
गैस कांड में कानूनी फैसले के नाम पर जो अभूतपूर्व अन्याय हुआ है उसके पीछे की कहानियां अब सामने आती जा रही है। सीबीआई ने पहले सही धाराओं में मामला बनाया था। यह धारा 304 थी जिसका मतलब होता है कि अभियुक्त को पता था कि उसकी लापरवाही से व्यक्ति या व्यक्तियों की मौत हो सकती है और फिर भी सावधानी नहीं बरती गई। इस धारा में कम से कम दस साल और अधिक से अधिक उम्र कैद का प्रावधान है। भारत सरकार ने भोपाल आए यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वारेन एंडरसन को कैसे राजकीय अतिथि की मुद्रा में गिरफ्तार किया और कैसे दिल्ली से राजीव गांधी या पी नरसिंह राव या दोनों का फोन तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पास आया और तीन घंटे के भीतर वारेन एंडरसन को रिहा कर के सरकारी जहाज में दिल्ली पहुंचा दिया गया और वहां से वह अमेरिका उड़ गया। यह मेहरबानी तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति और उसके पहले सीग्रेड फिल्मों के हीरो रह चुके रोनाल्ड रीगन के एक फोन के बाद हुई थी।
फिर भारत सरकार ने एक विशेष अध्यादेश जारी कर के भोपाल की लड़ाई लडऩे के लिए सिर्फ खुद को अधिकार दे दिया। भारत सरकार ने अमेरिका की एक अदालत में तीन अरब तीस करोड़ डॉलर का मुआवजा मांगने के लिए अमेरिका की अदालत में मामला दायर किया मगर अदालत ने कहा कि जुर्म भोपाल में हुआ है और मामला भी वहीं चलना चाहिए। सीबीआई तो धारा 304 के तहत दिसंबर 1987 में ही वारेन एंडरसन और यूनियन कार्बाइड की अलग अलग शाखाओं के अधिकारियों के खिलाफ चार्ज शीट भी दाखिल कर चुकी है और फरवरी 1989 में भोपाल के चीफ जुडिशियल मजिस्ट्रेट ने एंडरसन के खिलाफ जमानत के दौरान किए गए वायदे के बावजूद अदालत में पेश नहीं होने पर गैर जमानती वारंट जारी कर दिया और इसको तामिल भी करवा लिया गया। मगर उसी महीने भारत सरकार को पता नहीं एंडरसन के प्रति दया का ऐसा दौरा आया कि तीन अरब तीस करोड़ डॉलर के बजाय सिर्फ चार करोड़ सत्तर लाख के मुआवजे पर सौदा कर लिया गया। भोपाल के लोग बहुत खफा थे और कई याचिकाएं और समीक्षा याचिकाएं भारत के सर्वोच्च न्यायालय मे डाली गई जिन्हें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश अहमदी ने खारिज ही नहीं कर दिया बल्कि 1996 में तो फैसला दे दिया कि मामला 304 का नहीं बल्कि 304 ए और बी का बनता है जिनमें अधिकतम सजा दो साल की हैं।
कोई आश्चर्य नहीं कि जब यूनियन कार्बाइड ने भोपाल हॉस्पीटल ट्रस्ट लंदन में बनाया तो अहमदी साहब उसके अध्यक्ष बनाए गए। फरवरी 2001 में तो यूनियन कार्बाइड ने घोषित ही कर दिया कि भारत की फैक्टरी के लिए उसकी कोई देनदारी शेष नहीं हैं। अगले साल हुई एक शोध ने साबित किया कि यूनियन कार्बाइड प्लांट के आसपास रहने वाली मांओ के दूध में पारा पाया गया हैं। अमेरिकी सरकार कहती रही कि उसे एंडरसन का कोई पता नहीं हैं जबकि एक ब्रिटिश अखबार के संवाददाता उसके घर पहुंच गए और गोल्फ खेलते हुए उसके फोटो भी खींच लाए। अमेरिका के साथ भारत की प्रत्यर्पण संधि है मगर अमेरिका ने एंडरसन को कभी भारत सरकार को नहीं सौंपा।
भारत सरकार अपने तरीके से काम कर रही थी। भोपाल में हादसा हुआ था लेकिन मध्य प्रदेश सरकार की कोई्र भूमिका नहीं रहने दी गई थी। सीबीआई के एक जांच अधिकारी ने आरोप लगाया है कि विदेश मंत्रालय ने बाकायदा संदेश भेज कर कहा था कि एंडरसन के प्रत्यर्पण पर ज्यादा जोर नहीं डाला जाए। उस समय पीवी नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे और विदेश मंत्री दिनेश सिंह बहुत बीमार थे इसलिए विदेश मंत्रालय के फैसले भी प्रधानमंत्री कार्यालय से होते थे। उस समय विदेश मंत्रालय में उप मंत्री रहे और अब अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद का दावा है कि उन्हें इस तरह के किसी संदेश के भेजे जाने की जानकारी नहीं है और तो और न्यायमूर्ति अहमदी कहते है कि उन्हें तो किसी समीक्षा याचिका की याद ही नहीं है।
अब भारत सरकार भोपाल के हजारों निष्पाप लोगों का कानूनी श्राध्द करने में लग गई हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर न्याय पाने के लिए भारत सरकार में मंत्रियों का एक समूह पहले से मौजूद था और यूपीए की पहली सरकार के दौरान ही बना लिया गया था। अर्जुन सिंह इस समूह के अध्यक्ष थे। भोपाल के फैसले के अगले ही दिन जब इस समूह को जीवित किया तो पता चला कि भारत सरकार का ऐसा समूह भी था। अगर यह समूह था और इसमें भारत सरकार के जिम्मेदार मंत्री मौजूद थे तो यह समीति इतने सालों से कर क्या रही थी? यह आश्चर्य खास तोैर पर इसलिए भी है क्योंकि इस समिति के अध्यक्ष खुद अर्जुन सिंह थे जिन्हें भोपाल गैस कांड के बारे मेंं दूसरों से ज्यादा पता था। अब भी जब इस मामले ने जोर पकड़ा है तो अर्जुन सिंह ने यह कहकर सनसनी फैला दी है कि एंडरसन को भगाने में उनका हाथ नहीं था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि उनके सूबे से हजारों लोगों का कातिल राजकीय सम्मान के साथ, राजकीय विमान पर, राजकीय अधिकारियों की मौजूदगी में भोपाल छोड़ता है और मुख्यमंत्री को इसका पता ही नहीं।
हालांकि श्री सिंह ने एक और सगूफा छोड़ दिया है कि मैं अपनी जीवनी लिख रहा हूं। उसमें मैं इस बात का खुलासा करूंगा कि एंडरसन को भगाने का दोषी कौन है। अब तो इस बात का इंतजार करना पड़ेगा कि अर्जुन सिंह अपनी जीवनी कब तक लिखते हैं या... वह अधूरी ही रहेगी। लेकिन इतना तो जरूर है कि भोपाल त्रासदी के शिकार पीडि़तों के आंसू सियासत के शिकार हो ही जाएंगे।

क्या कर रहे हैं शिवराज

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने सिपहसलारों की सलाह पर स्वर्णिम मध्य प्रदेश बनाने का सपना संजोए जहां-तहां हाथ-पैर चला रहे हैं। इसके लिए वे विदेशों की खाक भी छान रहे हैं लेकिन प्रदेशवासियों को स्वर्णिम मध्य प्रदेश का सपना दिखा रहे मुख्यमंत्री को शायद मालूम नहीं है कि उनके सुशासन में मध्य प्रदेश देश के अन्य राज्यों की तुलना में कितना पीछे चला गया है। प्रति व्यक्ति औसत सालाना आय के हिसाब से उत्तर प्रदेश के बाद मध्य प्रदेश, देश का सबसे कम आमदनी वाला राज्य है। अर्थात भारत में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय 42 हजार रुपये है, वहीं मध्य प्रदेश के नागरिक की यह आय मात्र 21 हजार रुपये है। साल 2001 में मध्य प्रदेश से अलग हुए छत्तीसगढ़ राज्य ने इतनी तरक्की कर ली कि आज वहां प्रति व्यक्ति आय 33 हजार 500 रुपये वार्षिक है, लेकिन हम पहले से छोटे राज्य होने के बाद भी तरक्की नहीं सके। इसका मुख्य कारण है हमारी दिशाहीन नीति।
मप्र की भौगोलिक स्थिति जानने वालों की माने तो प्रदेश में खनिज,खेती,उद्योग और पर्यटन की आपार संभावनाएं हैं। अगर इनका उचित तरीके से दोहन किया जाए तो मप्र को किसी के आगे हाथ पसारने की जरूरत नहीं है। लेकिन हमने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया और विदेशों में संभावनाएं तलाशते फिर रहे हैं। अभी हाल ही में अपनी इसी मंशा से शिवराज ने तीन देशों जर्मनी, नीदरलैंड और इटली की यात्रा की। यात्रा से लौटने के बाद मुख्यमंत्री श्री चौहान ने इस बात पर संतोष जताया कि इस यात्रा में मध्यप्रदेश की संभावनाओं का दिग्दर्शन करवाने में उन्हें सफलता मिली। उन्होंने यात्रा के दौरान संपन्न इंडस्ट्री इंटरऐक्टिव मीट्स को भी उल्लेखनीय रूप से सफल बताया। मुख्यमंत्री ने यात्रा के उद्देश्यों की जानकारी देते हुए कहा कि उनकी इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य इन देशों के कामर्स तथा इंडस्ट्री चेंबर्स, प्रमुख उद्योपतियों तथा अंतरदेशीय संगठनों में मध्यप्रदेश में कृषि तथा खाद्य प्रसंस्करण, न्यू एंड रिन्यूएबल इनर्जी, सुरक्षित उन्नत खेती, इंजीनियरिंग तथा फैशन डिजाइनिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों में उद्योग-व्यवसायों की स्थापना के लिये उपलब्ध संसाधनों तथा संभावनाओं के बारे में जागरूकता पैदा करना था।
अब शिवराज को कोई यह कैसे समझाए की मप्र में निवेश करने की संभावना से उन्होंने जिन तीन देशों की यात्रा कि वे आर्थिक मंदी के इस दौर में बदहाल हैं। जर्मनी और इटली की स्थिति तो फिर भी कुछ अच्छी है जबकि नीदरलैंड तो खुद भारत की ओर आंखे फैलाए हुए है। यह हम नहीं बल्कि भारत में नीदरलैंड के राजदूत बॉब हाइन्स कहते हैं। नीदरलैंड में इस समय 80 से अधिक भारतीय कंपनियां कार्यरत हैं जो कि आईटी से लेकर फॉर्मा तक के क्षेत्रों में काम कर रही हैं। नीदरलैंड सरकार भारतीय कंपनियों से लगातार निवेश का आग्रह कर रही है। हाइन्स ने माना कि बीते दो साल में आर्थिक मंदी का असर नीदरलैंड पर पड़ा है। बावजूद इसके मुख्यमंत्री के सलाहकार उन्हें ऐसे देश में निवेश की संभावना तलाशने ले जाते हैं। राज्य सरकार का सपना स्वर्णिम मध्यप्रदेश वास्तविकता के धरातल से काफी दूर है। लचर प्रशासन और कमजोर राजनीतिक इच्छा शक्ति के कारण यह कभी पूरा हो पाएगा, इसमें संदेह है। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का स्वर्णिम प्रदेश का सपना मानवीय दृष्टि से उनकी भावनाओं को व्यक्त करता हुआ प्रतीत होता है, परंतु मुख्यमंत्री मौजूदा प्रशासन वर्ग के साथ जनहित योजना के क्रियान्वयन में कितने सफल हो पाएंगे यह संदेह के दायरे में ही रहेगा। अब तक मिले परिणामों पर गौर किया जाए तो हम पाते है कि बेहतर वित्तीय प्रबंधन का दावा करने वाली सरकार ने मध्य प्रदेश को 58000 करोड़ रूपये के कर्ज में डुबा दिया है। स्थितियां इतनी खराब है कि कर्जों की अदायगी न होने के कारण कर्ज के बराबर की ही राशि ब्याज के रूप में राज्य पर अतिरिक्त वित्तीय भार बनकर आ चुकी है। इस वित्तीय वर्ष में इस ब्याज की राशि कितनी बड़ी है इसका आंकलन अभी शेष है। सरकार को प्रतिवर्ष अभी तक 6500 करोड़ रूपये का ब्याज चुकाना है। यह राशि आने वाले दस वर्षों में भुगतान की जानी है। राष्ट्रीय कार्यक्रमों के प्रति राज्य सरकार का रवैया बहुत प्रभावशाली नहीं है। नरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार की शिकायत आम हो चुकी है। राज्य सरकार द्वारा स्वयं कर्जे में डूबे रहने के बाद दूसरों को गारंटी देने की प्रवृत्ति राज्य को भीषण तंगी की ओर ले गई है। सरकार द्वारा इस तरह की गारंटी देने के बावजूद राज्य पर लगभग 60 करोड़ का कर्ज चढ़ चुका है। सरकार ने 13000 करोड़ के खर्च पर बैंक गारंटी दे रखी है। यह गारंटी कुछ निजी कंपनियों के अलावा अद्र्ध शासकीय संस्थाओं और निगम मण्डलों की वजह से दी गई है। सरकार के 2009-10 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक सन 1999-2000 में राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का अंशदान 28 प्रतिशत था जो 2008-09 में घटकर 20.53 प्रतिशत रह गया है। सरकार लाख दावे करे, पर कृषि क्षेत्र में विकास दर कम हो रही है। कृषि क्षेत्र आर्थिक रूप से जर्जर हो रहा है, इसलिए रोजगार अवसर भी कम हो रहे हैं। प्रदेश की ग्रामीण, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था अस्त-व्यस्त और बर्बाद हो गई है। जानकार कहते हैं कि मध्य प्रदेश में विकास की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उनका दोहन अभी तक नहीं हुआ है। अगर सरकार की मंशा विकास की है तो उसे कहीं जाने की जरूरत नहीं है वह अपनी संपदाओं का उचित तरीके से दोहन कर के तो देखे।

मामा की 'मेहरबानियोंÓ को कलंकित करते अनूप

अटल बिहारी वाजपेयी की जिंदगी में विवाद और अपवाद तो बहुत आये मगर कलंक का सामना उन्हे अब करना पड़ रहा है। इस कलंक का नाम अनूप मिश्रा है। अनूप मिश्रा भाजपा के नेता हैं पार्टी के बड़े पदों पर रह चुके हैं और मामाजी का नाम जितना अनूप मिश्रा ने भुनाया है उतना तो और किसी ने नही भुनाया होगा। अटलजी के पूर्वजों और वंशजों में अनूप मिश्रा बहुत ताकतवर माने जाते हैं और अटलजी कहते हों या न कहते हों, अटलजी की परावर्तित आभा उनपर पड़ी हुई है इसलिए जब भाजपा को ताकत मिलती है तो उसमें अनूप मिश्रा की भागीदारी हमेशा हो जाती है।
अपना परिवार अटलजी ने कभी नहीं बसाया लेकिन उनकी बहुतों पर कृपा होती रही है। उनमें से कुछ पात्र थे और ज्यादातर अपात्र थे। अपात्रों की इस सूची में अचानक अनूप मिश्रा का नाम मेरिट लिस्ट में आ गया है। अनूप मिश्रा ने माल काटा, अपने आपको राष्ट्रीय नेता के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की, मामाजी प्रधानमंत्री बने तो अनूप मिश्रा नेहरू युवा केंद्र के उपाध्यक्ष के तौर पर केंद्र के उपमंत्री का दर्जा पाकर दिल्ली में विराज गये। यहां के उनके कामों पर इतना विवाद हुआ और हिसाब किताब में इतनी गड़बड़ हुई कि आखिरकार रजिस्टर ही गायब करने पड़े। जल्दी ही अनूप मिश्रा को एहसास हो गया कि उनके अंदर मामाजी यानी अटल बिहारी वाजपेयी जैसे राजनेता और राजनायक बनने की क्षमता नहीं है। अगर अपने दम पर राजनीति करते तो शायद नगर निगम पार्षद भी नहीं होते। अब अटलजी का नाम जुड़ा है तो भाजपा और सत्ता जब भी करीब आते हैं तो अनूप मिश्रा की गाड़ी पर लाल बत्ती लग जाती है। यह जानने के लिए बहुत ज्ञानी होने की जरुरत नहीं है कि राजनैतिक प्रताप और महिमा बहुत क्षणभंगुर होती है। अनूप मिश्रा जैसे लोकल नेता भी इसे जानते हैं। अटल जी का परिवार में रहने का हमेशा से आग्रह रहा है और ग्वालियर की शिंदे की छावनी की तंग गलियों में प्रधानमंत्री रहने और उसके बाद भी उनका काफिला नहीं जा सकता था। इसलिए वे अनूप मिश्रा के यहां ही ठहरते थे। अनूप मिश्रा को इस बात ने भी बहुत ताकत दी। अब बूढ़े होने लगे हैं और कारोबार का शौक लग गया है। अनूप मिश्रा जानते हैं कि आज की तारीख में शिक्षा से अच्छा कोई कारोबार नहीं है। इसलिए उन्होंने एक बड़ा कॉलेज खोला और वह भी ग्वालियर के पास एक गांव में खोला।
अब कॉलेज को विश्वविद्यालय बनवाना था और इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों के अनुसार ज्यादा जमीन चाहिए थी तो बेला गांव की जमीन पर कब्जा किया गया। गांव और कॉलेज के बीच से जो मुख्य रास्ता जाता है उस पर चाहरदीवारी बनने लगी और इसके लिए बड़ी-बड़ी मशीने आ गयीं। गांव के लोगों को पता लगा तो पूरा गांव विरोध करने के लिए जमा हो गया। तब जाकर अनूप मिश्रा के बेटे साले और भाई ने बताया कि उन्होंने तो पूरा गांव सरकार से लीज पर ले लिया है। गांव वाले मानने को तैयार नहीं थे। गांव के सारे लोग महिला पुरुष बच्चे और बूढ़े जमा हो गये थे और इनके आगे नेतृत्व करने के लिए बीस साल का बारहवीं क्लास का भीकम सामने आया और उसने महाबली अनूप मिश्रा के गिरोह से सवाल करने की हिम्मत की। पहले तो उसे धक्के मारे गये मगर फिर अचानक भीकम के माथे पर पिस्तोल अड़ा कर गोली दाग दी गयी। उसका भेजा जमीन पर बिखर गया। एक दिन बाद ही परिवार में शादी थी और अचानक शादी का माहौल शोक में बदल गया।
पहले गोलियां हवा में चलाई गयीं थी मगर गांव वाले जब नहीं डरे तो फिर जान लेने का फैसला किया गया। ज्ञान, चरित्र और एकता पर जोर देने वाली पार्टी के मंत्रीजी का पूरा खानदान शराब में धुत था। मौत आयी और इसके बाद भी पुलिस खामोश थी क्योंकि अब मारने वाले सीधे मुख्यमंत्री और भाजपा के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी का नाम ले रहे थे।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान उस समय लंदन से दिल्ली की उड़ान में थे। पुलिस वाले रिपोर्ट तक नहीं लिख रहे थे। लाश जमीन पर पड़ी थी। गांव वाले रो-रो कर थक गये थे। मुख्यमंत्री के आधी रात से कुछ पहले भोपाल उतरने के पंद्रह मिनट के भीतर एफआईआर दर्ज हो गयी। शिवराज सिंह चौहान स्वंयसेवक हैं और नाम की धौंस में नहीं आते। अनूप मिश्रा के परिवार ने इस बार जो किया वह तो अक्षम्य है ही, एनडीए की सरकार के दौरान तो अनूप ने बकायदा एक काउंटर खोल रखा था जहां केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों से काम करवाने के बदले बकायदा वसूली की जाती थी। कम लोग जानते हैं कि बाबू लाल गौर को जब मुख्यमंत्री पद से हटाया गया तो अनूप मिश्रा भी मुख्यमंत्री बनने के दावेदारों में से थे। मगर अटलजी जानते थे कि उनके भांजे की असली औकात क्या है इसलिए उन्होंने किसी से कुछ नहीं कहा। स्थिर मन वाले और काम करना जानने वाले शिवराज सिंह मुख्यमंत्री बने।
अटल जी की तबियत ठीक नहीं है मगर भोपाल और मध्यप्रदेश के दूसरे इलाकों में बहुत सारे लोग ऐसे मिल जाएंगे जिनके सामने अनूप मिश्रा अटल जी के दिल्ली के घर का नंबर लगाते हैं और उनके सचिव जिंटा से लंबी बात करके कहते हैं कि मैंने मामाजी से बात कर ली है। जो लोग दुनियादारी की असलियत नहीं जानते वो जरूर प्रभावित हो जाते हैं। अनूप मिश्रा की दुकानदारी चलती रहती है। वैसे आपकी जानकारी के लिए जनता को दवाइयों की आपूर्ति के लिए केंद्र सरकार से जो कोष मध्यप्रदेश के स्वास्थ्य विभाग को गया था, उसके हिसाब में बड़ी गड़बड़ी है। स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा हैं जो अब शिक्षा के धन कुबेर होना चाहते हैं। अनूप मिश्रा ने जो किया और उनके परिवार के लोगों ने जो लाश गिराई, उम्मीद है कि अटलजी के जीवन इतिहास में यह बात हाशिए पर भी दर्ज नहीं की जाएगी। अटलजी का नाम इस्तेमाल करके बहुत लोगों ने दुकानदारी चलाई है मगर भांजे अनूप ने तो बाकायदा डाका ही डाल दिया।

मंगलवार, 22 जून 2010

मंथन-समीक्षा में डूबा 'शिवÓ राज

मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तो प्रदेश बीमारू राज्यों की श्रेणी में था और लोगों को इस सरकार से एक बड़े विकास की उम्मीद थी। लेकिन सत्ता संघर्ष में जहां दो मुख्यमंत्री उमा भारती और बाबूलाल गौर कुछ नहीं कर सके वहीं तीसरे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके सलाहकारों ने कुछ करने नहीं दिया। ऐसा भी नहीं कि शिवराज विफल रहे लेकिन उन्होंने जिस अनुपात में घोषणाएं की थी उसे उस सीमा तक पूरा नहीं करा सके। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इसके लिए मुख्यमंत्री को ही दोष देना उचित नहीं होगा क्योंकि तब उनमें प्रशासनिक अनुभव की कमी थी।
शिवराज की मंशा साफ थी यह बात जनता जान चुकी थी और शुक्र हो लाड़ली लक्ष्मी योजना का जिसने मामा को विकास पुरूष के रूप में स्थापित कर दिया था। फिर क्या था विरासत में मिली सत्ता को अपने दम पर दूसरी बार हथिया कर शिवराज ने अपना लोहा मनवा दिया। लेकिन अपने अदम्य कोशिशों के बावजुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने दूसरे कार्यकाल के 14 माह बीत जाने के बाद भी मप्र को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर न ला सके। एक तरफ प्रदेश को विकसित राज्य बनाने की बात हो रही है, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की विकास दर उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्य से भी कम है। क्योंकि इस बार भी उनके इर्द-गिर्द वही सलाहकारों की मंडली कब्जा जमाए हुए है जो पहली पारी में थी।
शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनाव के पहले मध्यप्रदेश को समृद्ध व विकसित राज्य बनाने का संकल्प लिया था। दोबारा सरकार बनाते ही उस संकल्प को पूरा करने के लिए रोडमैप तैयार किया गया। इसके लिए सात कार्यदल बनाए गए थे। कार्यदल की रिपोर्टो पर अलग-अलग चर्चा की गई। इसके बाद मंत्रियों तथा अधिकारियों के साथ सामूहिक चर्चा के बाद विभागवार चर्चा की गई। मंथन में कुल 940 अनुशंसाएं आई थी, जिसमें 852 मान्य की गई 88 को अमान्य कर दिया गया। अनुशंसाओं को तीन श्रेणी में बांटा गया है। पहली वह अनुशंसाएं जो तत्काल लागू हो सकती हैं, इस संबंध में सभी अधिकारियों को 15 मार्च तक आदेश जारी करने को कहा गया है। दूसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हें लागू करने के लिए नियमों मे बदलाव करना पड़ेगा। इसमें तीन से छह माह का समय लग सकता है। तीसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हे पूरा करने के लिए अतिरिक्त राशि की आवश्यकता पड़ेगी। अतिरिक्त राशि कहां से आएगी, इसके लिए भी कार्य शुरू कर दिया गया । मंथन समृद्धि व विकास का रास्ता खोजने के लिए था, जो खोज लिया गया, मंजिल भी तय हो गई,मध्यप्रदेश को विकसित राज्य बनाने के लिए बस उड़ान भरने की जरूरत थी। लेकिन पायलटों सलाहकारों ने जहाज को दूसरी दिशा में उड़ाना शुरू कर दिया। और मात्र 14 माह की अल्प अवधि में 50 फीसदी घोषणाओं को पूरा करने का दावा भी कर डाला जो हकीकत से परे है। अगर इस औसत से देखें तो अगले 14 माह बाद सरकार के पास कोई काम ही नहीं रहेगा यानी शिवराज सरकार बेकाम हो जाएगी।
ये बड़ी विचित्र स्थिति है कि जब पूरे प्रदेश की जनता अपने मुख्यमंत्री को गरम तवे पर बैठकर ईमानदार मानने को तैयार है, इसके बावजूद उनके मुख्यमंत्री जमीनी हकीकत को जानने की बजाय अपने सलाहकारों की सलाह और आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। या यूं कहें कि वे अपने सलाहकारों की आंकड़ेबाजी पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं
क्योंकि सरकार का खजाना खाली है। 58 हजार करोड़ का कर्ज ऊपर से है। विकास एजेंसियों का बजट कम कर दिया गया है। प्रदेशभर की विकास योजनाएं ठप पड़ी हैं। लाडली बेहाल है। कहीं भी वह सुरक्षित नहीं है। पिछले कुछ सालों में यहां पड़े आयकर छापों से यह विदित हो गया है कि भ्रष्टाचार चरम पर है। प्रदेश में कानून व्यवस्था भंग हो गई है। इंदौर और फिर भोपाल में एसएसपी सिस्टम लागू करने के बावजूद अपराधों का ग्राफ बढ़ा है। ग्वालियर में डकैतों ने फिर सिर उठाना शुरू कर दिया है। हत्याओं के मामले में इंदौर तो लूट के मामलों में भोपाल नंबर वन है। सांप्रदायिक दंगों और सांप्रदायिक संवेदनशीलता के मामलों में मध्यप्रदेश नंबर वन है। दलित उत्पीडऩ में भी प्रदेश सिरमौर है। भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। सरेआम सरकारी जमीन हड़पकर बेचने के ढेरों मामले सामने आए हैं।
नौकरशाही बेलगाम हो गई। सरकार की उदासीनता से भ्रष्ट अफसरान करोड़ों में खेल रहे हैं। आयकर छापों में करोड़ों रुपयों के साथ अकूत संपत्तियों का भी खुलासा हो रहा है। भ्रष्टों पर सरकार की मेहरबानी का आलम यह है कि राज्य के मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) ने भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई न होने पर नाराजगी जताई है। मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) के सूत्रों की मानें तो सरकार ने भ्रष्टाचार के 2333 प्रकरण पेंडिंग रख रखे हैं। पीडब्ल्यूडी, पीएचई और जल संसाधन विभाग के इन प्रकरणों को दबाने के पीछे यह कारण पता चला है कि आला अफसरान ने उनसे साठगाँठ कर ली है। गृह राज्यमंत्री नारायण सिंह कुशवाह तो यहां तक कह चुके हैं कि कानून व्यवस्था को मुख्यमंत्री भी नहीं सुधार सकते। गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता स्वीकार चुके हैं कि आम जनता का पुलिस पर से भरोसा उठ रहा है। राजस्व राज्यमंत्री करणसिंह वर्मा विदिशा में चोरी की बढ़ती घटनाओं पर कहते हैं कि चोरों को गोली मार दो। मंत्रियों के ऐसे बयानों के बाद भी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। अफसरान खाली बैठे तनख्वाह ले रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री, अध्यक्ष, नेताप्रतिपक्ष और मंत्रियों का वेतन बढ़ा दिया गया है।
विद्युत मंडल घोटालेबाज के हाथों में है, जहां आम जनता को जमकर लूटा जा रहा है। पूरे प्रदेश में वन संरक्षण पर खर्च की राशि जितनी बढ़ रही है, उसी अनुपात में जंगल लगातार कम होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अफसरान सिर्फ और सिर्फ कमीशनखोरी में लगे हैं। केंद्रीय अनुदान में सरकार को कहां चूना लगाया जाए, यही मौका ढूंढते रहते हैं। कुपोषण के मामले में उड़ीसा के बाद मध्यप्रदेश का ही नाम आता है। महिला बाल विकास में को फर्जीवाड़े का रोग लग गया है। प्रदेश के चार लाख अतिकुपोषित बच्चों को पोषणाहार देने का कार्यक्रम थर्ड मील फेल हो गया है। उन्हें रोजाना दो रुपए का आहार देना तय है और वह भी नहीं मिल पा रहा है। आंगनबाडिय़ों की सवा लाख कार्यकर्ताओं को इसकी जिम्मेदारी थी, जो अब छीन कर एक कंपनी को दे दी गई है। पूरे प्रदेश में शिक्षा माफिया छाया हुआ है, जो दोनों हाथों से छात्रों और उनके अभिभावकों को लूट रहा है। निजी मेडिकल कॉलेजों में हर साल 10 हजार करोड़ का कारोबार हो रहा है। सरकार द्वारा करोड़ों रुपए फूंकने के बावजूद पॉलीटेक्निक कॉलेज बदहाल हैं। 50 में से 45 मेडिकल कॉलेज में तो प्राचार्य तक नहीं है। परिवहन विभाग में भ्रष्टों की पूछपरख बढ़ गई है। सड़क परिवहन निगम को सरकार ने बंद कर दिया, किंतु केंद्र ने इस पर रोक लगा दी। इसके बावजूद सरकार इसे चालू नहीं कर रही है। इससे हजारों कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो मंत्रालय के ए एसी कमरे में बैठकर मुख्यमंत्री अफसरों के साथ जो कार्ययोजना बनाई थी वह पूरी तरह फेल हो गई है। यानी कुल मिलाकर देखा जाय तो शिवराज इस बार भी शासन और प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर सके हैं। शिवराज की शासन और प्रशासन पर पकड़ तभी बन सकती है, जबकि वह सरकारी तंत्र पर सतत निगरानी की कोई व्यवस्था बनाएं। यह तभी संभव है, जबकि वह अपने सचिवालय के कामकाज की बारीकी से समीक्षा करें और ऐसा सिस्टम विकसित करें, जिससे कि वह संदेश जाए कि प्रदेश के एकमात्र चीफ मिनिस्टर वहीं है और दूसरा कोई सुपर सीएम नहीं है।
प्रदेश की मुख्यमंत्री पर ऐतबार करती है तो उनकी जिम्मेदारी पुरे तंत्र को भष्टाचार मुक्त बनाने की हैं इसकी शुरुआत योजनाओं के मूल से होना चाहिए। अफसर, राजनेता, ठेकेदार और बिचोलियों का गठजोड़ नई योजनाओ-पालिसियों पर कड़ी नजर रखता है। यह चिंतनीय और शोचनीय है। शिवराज सिंह चौहान भली भांति जानते है कि कौन भ्रष्ट है और कौन दलाल हैं, फिर भी वे मौन क्यों हैं?

मंथन-समीक्षा में डूबा 'शिवÓ राज

मध्य प्रदेश में वर्ष 2003 में जब भाजपा सत्ता में आई थी तो प्रदेश बीमारू राज्यों की श्रेणी में था और लोगों को इस सरकार से एक बड़े विकास की उम्मीद थी। लेकिन सत्ता संघर्ष में जहां दो मुख्यमंत्री उमा भारती और बाबूलाल गौर कुछ नहीं कर सके वहीं तीसरे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को उनके सलाहकारों ने कुछ करने नहीं दिया। ऐसा भी नहीं कि शिवराज विफल रहे लेकिन उन्होंने जिस अनुपात में घोषणाएं की थी उसे उस सीमा तक पूरा नहीं करा सके। राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो इसके लिए मुख्यमंत्री को ही दोष देना उचित नहीं होगा क्योंकि तब उनमें प्रशासनिक अनुभव की कमी थी।
शिवराज की मंशा साफ थी यह बात जनता जान चुकी थी और शुक्र हो लाड़ली लक्ष्मी योजना का जिसने मामा को विकास पुरूष के रूप में स्थापित कर दिया था। फिर क्या था विरासत में मिली सत्ता को अपने दम पर दूसरी बार हथिया कर शिवराज ने अपना लोहा मनवा दिया। लेकिन अपने अदम्य कोशिशों के बावजुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने दूसरे कार्यकाल के 14 माह बीत जाने के बाद भी मप्र को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर न ला सके। एक तरफ प्रदेश को विकसित राज्य बनाने की बात हो रही है, दूसरी तरफ मध्यप्रदेश की विकास दर उड़ीसा जैसे पिछड़े राज्य से भी कम है। क्योंकि इस बार भी उनके इर्द-गिर्द वही सलाहकारों की मंडली कब्जा जमाए हुए है जो पहली पारी में थी।
शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा चुनाव के पहले मध्यप्रदेश को समृद्ध व विकसित राज्य बनाने का संकल्प लिया था। दोबारा सरकार बनाते ही उस संकल्प को पूरा करने के लिए रोडमैप तैयार किया गया। इसके लिए सात कार्यदल बनाए गए थे। कार्यदल की रिपोर्टो पर अलग-अलग चर्चा की गई। इसके बाद मंत्रियों तथा अधिकारियों के साथ सामूहिक चर्चा के बाद विभागवार चर्चा की गई। मंथन में कुल 940 अनुशंसाएं आई थी, जिसमें 852 मान्य की गई 88 को अमान्य कर दिया गया। अनुशंसाओं को तीन श्रेणी में बांटा गया है। पहली वह अनुशंसाएं जो तत्काल लागू हो सकती हैं, इस संबंध में सभी अधिकारियों को 15 मार्च तक आदेश जारी करने को कहा गया है। दूसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हें लागू करने के लिए नियमों मे बदलाव करना पड़ेगा। इसमें तीन से छह माह का समय लग सकता है। तीसरी वे अनुशंसाएं हैं, जिन्हे पूरा करने के लिए अतिरिक्त राशि की आवश्यकता पड़ेगी। अतिरिक्त राशि कहां से आएगी, इसके लिए भी कार्य शुरू कर दिया गया । मंथन समृद्धि व विकास का रास्ता खोजने के लिए था, जो खोज लिया गया, मंजिल भी तय हो गई,मध्यप्रदेश को विकसित राज्य बनाने के लिए बस उड़ान भरने की जरूरत थी। लेकिन पायलटों सलाहकारों ने जहाज को दूसरी दिशा में उड़ाना शुरू कर दिया। और मात्र 14 माह की अल्प अवधि में 50 फीसदी घोषणाओं को पूरा करने का दावा भी कर डाला जो हकीकत से परे है। अगर इस औसत से देखें तो अगले 14 माह बाद सरकार के पास कोई काम ही नहीं रहेगा यानी शिवराज सरकार बेकाम हो जाएगी।
ये बड़ी विचित्र स्थिति है कि जब पूरे प्रदेश की जनता अपने मुख्यमंत्री को गरम तवे पर बैठकर ईमानदार मानने को तैयार है, इसके बावजूद उनके मुख्यमंत्री जमीनी हकीकत को जानने की बजाय अपने सलाहकारों की सलाह और आंकड़ों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। या यूं कहें कि वे अपने सलाहकारों की आंकड़ेबाजी पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रहे हैं
क्योंकि सरकार का खजाना खाली है। 58 हजार करोड़ का कर्ज ऊपर से है। विकास एजेंसियों का बजट कम कर दिया गया है। प्रदेशभर की विकास योजनाएं ठप पड़ी हैं। लाडली बेहाल है। कहीं भी वह सुरक्षित नहीं है। पिछले कुछ सालों में यहां पड़े आयकर छापों से यह विदित हो गया है कि भ्रष्टाचार चरम पर है। प्रदेश में कानून व्यवस्था भंग हो गई है। इंदौर और फिर भोपाल में एसएसपी सिस्टम लागू करने के बावजूद अपराधों का ग्राफ बढ़ा है। ग्वालियर में डकैतों ने फिर सिर उठाना शुरू कर दिया है। हत्याओं के मामले में इंदौर तो लूट के मामलों में भोपाल नंबर वन है। सांप्रदायिक दंगों और सांप्रदायिक संवेदनशीलता के मामलों में मध्यप्रदेश नंबर वन है। दलित उत्पीडऩ में भी प्रदेश सिरमौर है। भू-माफियाओं के हौसले बुलंद हैं। सरेआम सरकारी जमीन हड़पकर बेचने के ढेरों मामले सामने आए हैं।
नौकरशाही बेलगाम हो गई। सरकार की उदासीनता से भ्रष्ट अफसरान करोड़ों में खेल रहे हैं। आयकर छापों में करोड़ों रुपयों के साथ अकूत संपत्तियों का भी खुलासा हो रहा है। भ्रष्टों पर सरकार की मेहरबानी का आलम यह है कि राज्य के मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) ने भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई न होने पर नाराजगी जताई है। मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) के सूत्रों की मानें तो सरकार ने भ्रष्टाचार के 2333 प्रकरण पेंडिंग रख रखे हैं। पीडब्ल्यूडी, पीएचई और जल संसाधन विभाग के इन प्रकरणों को दबाने के पीछे यह कारण पता चला है कि आला अफसरान ने उनसे साठगाँठ कर ली है। गृह राज्यमंत्री नारायण सिंह कुशवाह तो यहां तक कह चुके हैं कि कानून व्यवस्था को मुख्यमंत्री भी नहीं सुधार सकते। गृहमंत्री उमाशंकर गुप्ता स्वीकार चुके हैं कि आम जनता का पुलिस पर से भरोसा उठ रहा है। राजस्व राज्यमंत्री करणसिंह वर्मा विदिशा में चोरी की बढ़ती घटनाओं पर कहते हैं कि चोरों को गोली मार दो। मंत्रियों के ऐसे बयानों के बाद भी सरकार के कानों पर जूं नहीं रेंग रही है। अफसरान खाली बैठे तनख्वाह ले रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री, अध्यक्ष, नेताप्रतिपक्ष और मंत्रियों का वेतन बढ़ा दिया गया है।
विद्युत मंडल घोटालेबाज के हाथों में है, जहां आम जनता को जमकर लूटा जा रहा है। पूरे प्रदेश में वन संरक्षण पर खर्च की राशि जितनी बढ़ रही है, उसी अनुपात में जंगल लगातार कम होते जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के अफसरान सिर्फ और सिर्फ कमीशनखोरी में लगे हैं। केंद्रीय अनुदान में सरकार को कहां चूना लगाया जाए, यही मौका ढूंढते रहते हैं। कुपोषण के मामले में उड़ीसा के बाद मध्यप्रदेश का ही नाम आता है। महिला बाल विकास में को फर्जीवाड़े का रोग लग गया है। प्रदेश के चार लाख अतिकुपोषित बच्चों को पोषणाहार देने का कार्यक्रम थर्ड मील फेल हो गया है। उन्हें रोजाना दो रुपए का आहार देना तय है और वह भी नहीं मिल पा रहा है। आंगनबाडिय़ों की सवा लाख कार्यकर्ताओं को इसकी जिम्मेदारी थी, जो अब छीन कर एक कंपनी को दे दी गई है। पूरे प्रदेश में शिक्षा माफिया छाया हुआ है, जो दोनों हाथों से छात्रों और उनके अभिभावकों को लूट रहा है। निजी मेडिकल कॉलेजों में हर साल 10 हजार करोड़ का कारोबार हो रहा है। सरकार द्वारा करोड़ों रुपए फूंकने के बावजूद पॉलीटेक्निक कॉलेज बदहाल हैं। 50 में से 45 मेडिकल कॉलेज में तो प्राचार्य तक नहीं है। परिवहन विभाग में भ्रष्टों की पूछपरख बढ़ गई है। सड़क परिवहन निगम को सरकार ने बंद कर दिया, किंतु केंद्र ने इस पर रोक लगा दी। इसके बावजूद सरकार इसे चालू नहीं कर रही है। इससे हजारों कर्मचारियों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। यानी कुल मिलाकर देखा जाए तो मंत्रालय के ए एसी कमरे में बैठकर मुख्यमंत्री अफसरों के साथ जो कार्ययोजना बनाई थी वह पूरी तरह फेल हो गई है। यानी कुल मिलाकर देखा जाय तो शिवराज इस बार भी शासन और प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत नहीं कर सके हैं। शिवराज की शासन और प्रशासन पर पकड़ तभी बन सकती है, जबकि वह सरकारी तंत्र पर सतत निगरानी की कोई व्यवस्था बनाएं। यह तभी संभव है, जबकि वह अपने सचिवालय के कामकाज की बारीकी से समीक्षा करें और ऐसा सिस्टम विकसित करें, जिससे कि वह संदेश जाए कि प्रदेश के एकमात्र चीफ मिनिस्टर वहीं है और दूसरा कोई सुपर सीएम नहीं है।
प्रदेश की मुख्यमंत्री पर ऐतबार करती है तो उनकी जिम्मेदारी पुरे तंत्र को भष्टाचार मुक्त बनाने की हैं इसकी शुरुआत योजनाओं के मूल से होना चाहिए। अफसर, राजनेता, ठेकेदार और बिचोलियों का गठजोड़ नई योजनाओ-पालिसियों पर कड़ी नजर रखता है। यह चिंतनीय और शोचनीय है। शिवराज सिंह चौहान भली भांति जानते है कि कौन भ्रष्ट है और कौन दलाल हैं, फिर भी वे मौन क्यों हैं?

सीमा फार्मूला में फंसे नौकरशाह

देश में लोकतंत्र की स्थापना के 58 साल बाद भी हमारी नौकरशाही को लेकर एक आम शिकायत आज भी बनी हुई है कि उसका चाल, चेहरा, चरित्र वही पुराना है। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान देश में प्रशासन का जो ढांचा तैयार किया गया था उसका मकसद जनता की सेवा करना और उसके प्रति संवेदनशील और जवाबदेह होना कतई नहीं था। पारदर्शिता के बजाय सरकारी गोपनीयता पर ज्यादा जोर दिया गया और इसका कानून भी बना। लेकिन आजादी के बाद भी यह कानून चलता रहा। अब यह कानून अस्तित्व मेें नहीं है और सूचना के अधिकार के रूप में लोगों के पास अब पारदर्शिता का हथियार तो आ गया है, लेकिन सरकारी कामकाज का रंग-ढंग अब भी वैसा ही है। मध्यप्रदेश में तो हालात और बदतर होती जा रही है। कार्य करने की संस्कृति को नौकरशाहों ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
वेतन भत्तों से लबरेज और सुविधाएं पाने में सबसे आगे रहने वाले इन नौकरशाहों पर थैलीशाहों का कब्जा हो गया है। इनका अब कार्य करने में मन नहीं लगता है बल्कि किसी अच्छे काम को उलझाने में महारत हासिल हो चुकी है ताकि अपने बैंक के लॉकर भर सकें। यह हम नहीं कह रहे बल्कि कुछ जांच एजेंसियों की रिर्पोट और आयकर विभाग के छापों से उजागर हुआ है। प्रदेश में कई नौकरशाहों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापे के बाद देर से ही सही लेकिन दुरूस्त होकर जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जागे तो उन्होंने सभी आईएएस अधिकारियों को चल अचल संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश पारित कर दिया। परंतु पहले भी अधिकारियों द्वारा संपत्ति का ब्योंरा एक निर्धारित प्रपत्र में हर वित्तीय वर्ष में सामान्य प्रशासन विभाग को दिया जाता रहा है। परंतु उस प्रपत्र को देखने की फुर्सत किसको है, जो दिया वो सही। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आदेश तो दे डाला पर इसकी मॉनीटरिंग क्या वह स्वयं करेंगे या किसी इमानदार नौकरशाह की नजरों सेेे जांच पड़ताल करेंगे। आदेश के बाद आंकड़ेबाज नौकरशाहों ने जब अपनी संतुलित संपति को सार्वजनिक किया तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई। प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित देश की राजधानी दिल्ली में करोड़ों की संपत्ति का मामला सामने आया। एक बीमारू राज्य की नौकरशाहों द्वारा अकूत संपत्ति अर्जित करने की बात सामने आते ही केंद्र की खुफिया एजेंसियों ने अपनी आंखें तरेरनी शुरू कर दी है। खुफिया विभाग के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में केंद्रीय जांच एजेंसियों के 5 अधिकारी गुपचुप तरीके से मप्र के नौकरशाहों की कमाई और करतूतों की फाईल खंगाल रहें है। आयकर विभाग तो यह देखकर हैरान है कि अधिकारियों की काली कमाई को ठिकाने लगाने के लिए लगभग सभी बीमा कंपनियों ने अपना जाल बुना और सरकार को चूना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सभी कंपनियों और अधिकारियों ने सरकार के उस नियम का जमकर फायदा उठाया जिसमें 50 हजार से अधिक के लेनदेन पर पेन नंबर देना अनिवार्य होता है। बीमा कंपनी के एजेंटों ने इस नियम का तोड़ निकालते हुए लोगों की काली कमाई सफेद करने वहीं तरीका अपनाया जो सीमा जायसवाल ने अपनाया था।
सीमा ने भी प्रदेश के कई भ्रष्ट अफसरों की करोड़ों रुपए काली कमाई को अपनी बीमा कंपनी आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में निवेश कराया था। सीमा ने पचास हजार से कम के ड्राफ्ट आदि के माध्यम से बीमा पालिसी बनाई थी। ऐसे में आयकर विभाग को पता ही नहीं चल पाया कि कब लोगों के करोड़ों रुपए बीमा में निवेश के माध्यम से सफेद होते गए। उधर बीमा में निवेश को आयकर में छूट होने के कारण सरकार के पल्ले में कुछ भी नहीं आया। बताया जाता है कि आयकर विभाग अब सभी बीमा कंपनियों के रिकार्ड खंगाल रहा है। विभाग के पास इन बीमा कंपनियों में प्रदेश से किए गए निवेश की सूची आ गई है। इस सूची की पड़ताल में कई सफेदपोश नेताओं के अलावा अफसरों और कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपए निवेश किए जाने का पता चला है। विभाग इनकी सूची तैयार कर रहा है।
आयकर विभाग के पास बजाज एलायंस, बिरला सन लाईफ, एचडीएफसी, टाटा एआईजी, एसबीआई लाईफ आदि इंश्योरेंस कंपनियों का रिकार्ड आ चुका है। विभाग के अधिकारियों ने अपने साफ्टवेयर के माध्यम से इस सूची में से प्रदेश के कई ऐसे नाम खोज निकाले हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए बीमा के माध्यम से निवेश किया है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के कई अफसरों के अलावा तृतीय वर्ग के कर्मचारियों ने भी लाखों रुपए की बीमा पालिसी ले रखी है। इसमें पुलिस विभाग के कई आरक्षक भी शामिल हैं जिन्होंने लाखों रुपए बीमा कंपनियों में निवेश किया है। जानकारों के अनुसार विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन कार्यरत फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट (एफआईयू) से बड़ी संख्या में संदेहास्पद लेन-देन की जानकारी मिली है। वर्ष 2004 में स्थापित फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट रिजर्व बैंक, बीमा नियामक प्राधिकरण (आईआरडीए) और सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) की मदद से काम करती है। यह यूनिट हर संदेहास्पद लेन-देन पर नजर रखे हुए है। विभाग के सूत्रों के अनुसार पचास हजार से कम राशि के नगद ड्राफ्ट पर भी संदेह होने पर यह यूनिट नजर रखती है।
विभाग को एफआईयू के साथ आल इंडिया रिपोर्टिग (एआईआर) सिस्टम से भी जानकारी मिल रही है। इसमें के्रडिट कार्ड से किए गए बड़े भुगतान व अन्य तरीकों से किए गए निवेश व खर्चो की जानकारी भी संबंधित आयकर अधिकारी तक पहुंच रही है। विभाग के सूत्रों के अनुसार बीमा कंपनियों से भी पचास हजार से व उससे अधिक प्रीमियम का भुगतान करने वालों की जानकारी बुलवाई गई है।
विभाग के सूत्रों के अनुसार कुछ लोग बंगलुरू, पुणे या अन्य शहरों में पढऩे वाले बच्चों को हर माह 25 से 50 हजार रुपए भेज रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी छुपाते हैं। राशि भोपाल मे जमा होती है और किसी अन्य शहर में निकासी होती है जबकि संबंधित व्यक्ति का दावा होता है कि उसने केवल पैसा जमा किया और निकाला खर्च नहीं किया। इसके अलावा किसी अन्य शहर में टूर पर जाते समय राशि निकालते हैं, वहां खर्च करते हैं और भोपाल आकर फिर पैसे जमा करा देते हैं। यह लोग भी तर्क देते हैं कि उन्होंने खर्चा नहीं किया। आयकर विभाग इन सभी के द्वारा बीमा कंपनी में किए गए निवेश की पूरी सूची तैयार कर रहा है। विभाग साथ ही इनके आयकर रिटर्न की भी पड़ताल कर पता लगा रहा है कि इन लोगों ने बीमा में किए गए निवेश का उल्लेख रिटर्न में किया है या नहीं। इसके बाद विभाग सभी को नोटिस भेज कर इनके द्वारा किए गए निवेश के आय के स्त्रोतों की जानकारी मांगेगा।
आयकर विभाग के छापों के बाद मप्र को बीमारु राज्य कहने वालों को इस विषय पर दोबारा सोचने की जरूरत है। कारण प्रदेश में हर साल बढ़ते करोड़पति व्यापारियों के अलावा नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों के यहां से मिल रही करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति को देखकर नहीं लगता कि प्रदेश बीमारु राज्य है। आयकर विभाग के छापों ने प्रदेश के कई लोगों की पोल खोली वहीं पिछले तीन साल में ही आयकर छापों में करीब छह सौ करोड़ की अघोषित संपत्ति सरेंडर की जा चुकी है। इसके अलावा करीब 130 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति आयकर विभाग जब्त कर चुका है। यही नहीं छापों में मिले दस्तावेज बताते हैं कि कुछेक अधिकारियों, मंत्रियों और उद्योगपतियों के बीच बने गठजोड़ ने शासकीय योजनाओं के माध्यम से अकूत संपदा जोड़ी है। आयकर सूत्रों की मानें तो प्रदेश में दिनों दिन बढ़ रहे आय के स्त्रोतों में इन योजनाओं का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। आयकर छापे में सरेंडर अघोषित आय या फिर जब्त संपत्ति के अलावा आयकर विभाग ने छापों में हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति का पता लगाया।
ऐन-केन प्रकारेण धन पाने की लालसा ने अधिकारी की कार्य संस्कृति को मार दिया है। हालात यह हो गई कि वह चाहे मध्यप्रदेश हो या यूं कहिए कि सूबेदार अपने विवेक को ताले में बंद रखकर उनकी बनाई हुई राह पर चलता है। ऐसे में कौन अधिकारी मूर्ख होगा जो मुखिया को मुखिया मानकर व्यवहार करेगा। जब मुखिया की हालत वैसाखियों पर चलने जैसी हो जाए तब कौन इन अधिकारियों से हिसाब मांगेगा। जिस जनता के टैक्स से इन अधिकारियों की मोटी तनख्वाह निकलती है उनके काम करने में फाईल या तो मिलती नहीं है या फाईल इतनी मोटी हो जाती है कि उसका कि उसका निराकरण कोई जन भी नहीं कर सकता है। उपसचिव, सचिव और न जाने कितने सचिवों की एक जानलेवा शृंखला रावण की मुंडी की तरह एक दूसरे से जुडी हुई है।
सार्वजनिक शौचालय के काम भी इन मुंडियों के हस्ताक्षर के बिना पूरा नहीं होता है। ऐसे में कोई मुंडी बीच में से गायब हो जाए, तो मामला पेंडिंग। अब लंबित मामले को और लंबित करने की कला भी इनके ही पास है झट एक जिज्ञासा वाला प्रश्न लिखा और फाईल नीचे रख दी। फाईल जिस गति से आई थी उसी गति से सद्गति को प्राप्त हो जाती है और उसके मरने की खबर किसी को भी लगती नहीं है। लेकिन थैलीशाहों की फाईल पर नौकरशाहों की नजर ही नहीें होती है, बल्कि नजारे इनायत भी होती है। किसी जमीन का उपयोग बदलना हो या हाईराइज बिल्ंिडग की परमिशन, जंगल से खेत खेत से जंगल और कालानाइजर्स बंधुओ के काम के लिए एक नहीं दस-दस बार केबिनेट बैठ जाएगी। बार-बार अधिकारी वही फाईल मीटिंग में लेकर आएगा जिसका सौदा पट चुका है। इन सौदों की भनक तक नहीं लगती और क्या निर्णय लिए गए वह जानना तो आम आदमियों के लिए दूर की कौड़ी है। वैसे देखा जाए तो सन् 1993 से लेकर अभी तक आईएएस मंडली किसी न किसी विक्रम के कांधे पर बेताल की तरह चिपकी हुई है और उसे मालूम है कि विक्रम को उलझाकर रखेंगे तो पेड़ पर उल्टा लटकने की बारी नहीं आएगा।

























'सीमा फार्मूलाÓ में फंसे नौकरशाह



देश में लोकतंत्र की स्थापना के 58 साल बाद भी हमारी नौकरशाही को लेकर एक आम शिकायत आज भी बनी हुई है कि उसका चाल, चेहरा, चरित्र वही पुराना है। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान देश में प्रशासन का जो ढांचा तैयार किया गया था उसका मकसद जनता की सेवा करना और उसके प्रति संवेदनशील और जवाबदेह होना कतई नहीं था। पारदर्शिता के बजाय सरकारी गोपनीयता पर ज्यादा जोर दिया गया और इसका कानून भी बना। लेकिन आजादी के बाद भी यह कानून चलता रहा। अब यह कानून अस्तित्व मेें नहीं है और सूचना के अधिकार के रूप में लोगों के पास अब पारदर्शिता का हथियार तो आ गया है, लेकिन सरकारी कामकाज का रंग-ढंग अब भी वैसा ही है। मध्यप्रदेश में तो हालात और बदतर होती जा रही है। कार्य करने की संस्कृति को नौकरशाहों ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
वेतन भत्तों से लबरेज और सुविधाएं पाने में सबसे आगे रहने वाले इन नौकरशाहों पर थैलीशाहों का कब्जा हो गया है। इनका अब कार्य करने में मन नहीं लगता है बल्कि किसी अच्छे काम को उलझाने में महारत हासिल हो चुकी है ताकि अपने बैंक के लॉकर भर सकें। यह हम नहीं कह रहे बल्कि कुछ जांच एजेंसियों की रिर्पोट और आयकर विभाग के छापों से उजागर हुआ है। प्रदेश में कई नौकरशाहों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापे के बाद देर से ही सही लेकिन दुरूस्त होकर जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जागे तो उन्होंने सभी आईएएस अधिकारियों को चल अचल संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश पारित कर दिया। परंतु पहले भी अधिकारियों द्वारा संपत्ति का ब्योंरा एक निर्धारित प्रपत्र में हर वित्तीय वर्ष में सामान्य प्रशासन विभाग को दिया जाता रहा है। परंतु उस प्रपत्र को देखने की फुर्सत किसको है, जो दिया वो सही। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आदेश तो दे डाला पर इसकी मॉनीटरिंग क्या वह स्वयं करेंगे या किसी इमानदार नौकरशाह की नजरों सेेे जांच पड़ताल करेंगे। आदेश के बाद आंकड़ेबाज नौकरशाहों ने जब अपनी संतुलित संपति को सार्वजनिक किया तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई। प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित देश की राजधानी दिल्ली में करोड़ों की संपत्ति का मामला सामने आया। एक बीमारू राज्य की नौकरशाहों द्वारा अकूत संपत्ति अर्जित करने की बात सामने आते ही केंद्र की खुफिया एजेंसियों ने अपनी आंखें तरेरनी शुरू कर दी है। खुफिया विभाग के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में केंद्रीय जांच एजेंसियों के 5 अधिकारी गुपचुप तरीके से मप्र के नौकरशाहों की कमाई और करतूतों की फाईल खंगाल रहें है। आयकर विभाग तो यह देखकर हैरान है कि अधिकारियों की काली कमाई को ठिकाने लगाने के लिए लगभग सभी बीमा कंपनियों ने अपना जाल बुना और सरकार को चूना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सभी कंपनियों और अधिकारियों ने सरकार के उस नियम का जमकर फायदा उठाया जिसमें 50 हजार से अधिक के लेनदेन पर पेन नंबर देना अनिवार्य होता है। बीमा कंपनी के एजेंटों ने इस नियम का तोड़ निकालते हुए लोगों की काली कमाई सफेद करने वहीं तरीका अपनाया जो सीमा जायसवाल ने अपनाया था।
सीमा ने भी प्रदेश के कई भ्रष्ट अफसरों की करोड़ों रुपए काली कमाई को अपनी बीमा कंपनी आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में निवेश कराया था। सीमा ने पचास हजार से कम के ड्राफ्ट आदि के माध्यम से बीमा पालिसी बनाई थी। ऐसे में आयकर विभाग को पता ही नहीं चल पाया कि कब लोगों के करोड़ों रुपए बीमा में निवेश के माध्यम से सफेद होते गए। उधर बीमा में निवेश को आयकर में छूट होने के कारण सरकार के पल्ले में कुछ भी नहीं आया। बताया जाता है कि आयकर विभाग अब सभी बीमा कंपनियों के रिकार्ड खंगाल रहा है। विभाग के पास इन बीमा कंपनियों में प्रदेश से किए गए निवेश की सूची आ गई है। इस सूची की पड़ताल में कई सफेदपोश नेताओं के अलावा अफसरों और कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपए निवेश किए जाने का पता चला है। विभाग इनकी सूची तैयार कर रहा है।
आयकर विभाग के पास बजाज एलायंस, बिरला सन लाईफ, एचडीएफसी, टाटा एआईजी, एसबीआई लाईफ आदि इंश्योरेंस कंपनियों का रिकार्ड आ चुका है। विभाग के अधिकारियों ने अपने साफ्टवेयर के माध्यम से इस सूची में से प्रदेश के कई ऐसे नाम खोज निकाले हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए बीमा के माध्यम से निवेश किया है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के कई अफसरों के अलावा तृतीय वर्ग के कर्मचारियों ने भी लाखों रुपए की बीमा पालिसी ले रखी है। इसमें पुलिस विभाग के कई आरक्षक भी शामिल हैं जिन्होंने लाखों रुपए बीमा कंपनियों में निवेश किया है। जानकारों के अनुसार विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन कार्यरत फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट (एफआईयू) से बड़ी संख्या में संदेहास्पद लेन-देन की जानकारी मिली है। वर्ष 2004 में स्थापित फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट रिजर्व बैंक, बीमा नियामक प्राधिकरण (आईआरडीए) और सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) की मदद से काम करती है। यह यूनिट हर संदेहास्पद लेन-देन पर नजर रखे हुए है। विभाग के सूत्रों के अनुसार पचास हजार से कम राशि के नगद ड्राफ्ट पर भी संदेह होने पर यह यूनिट नजर रखती है।
विभाग को एफआईयू के साथ आल इंडिया रिपोर्टिग (एआईआर) सिस्टम से भी जानकारी मिल रही है। इसमें के्रडिट कार्ड से किए गए बड़े भुगतान व अन्य तरीकों से किए गए निवेश व खर्चो की जानकारी भी संबंधित आयकर अधिकारी तक पहुंच रही है। विभाग के सूत्रों के अनुसार बीमा कंपनियों से भी पचास हजार से व उससे अधिक प्रीमियम का भुगतान करने वालों की जानकारी बुलवाई गई है।
विभाग के सूत्रों के अनुसार कुछ लोग बंगलुरू, पुणे या अन्य शहरों में पढऩे वाले बच्चों को हर माह 25 से 50 हजार रुपए भेज रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी छुपाते हैं। राशि भोपाल मे जमा होती है और किसी अन्य शहर में निकासी होती है जबकि संबंधित व्यक्ति का दावा होता है कि उसने केवल पैसा जमा किया और निकाला खर्च नहीं किया। इसके अलावा किसी अन्य शहर में टूर पर जाते समय राशि निकालते हैं, वहां खर्च करते हैं और भोपाल आकर फिर पैसे जमा करा देते हैं। यह लोग भी तर्क देते हैं कि उन्होंने खर्चा नहीं किया। आयकर विभाग इन सभी के द्वारा बीमा कंपनी में किए गए निवेश की पूरी सूची तैयार कर रहा है। विभाग साथ ही इनके आयकर रिटर्न की भी पड़ताल कर पता लगा रहा है कि इन लोगों ने बीमा में किए गए निवेश का उल्लेख रिटर्न में किया है या नहीं। इसके बाद विभाग सभी को नोटिस भेज कर इनके द्वारा किए गए निवेश के आय के स्त्रोतों की जानकारी मांगेगा।
आयकर विभाग के छापों के बाद मप्र को बीमारु राज्य कहने वालों को इस विषय पर दोबारा सोचने की जरूरत है। कारण प्रदेश में हर साल बढ़ते करोड़पति व्यापारियों के अलावा नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों के यहां से मिल रही करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति को देखकर नहीं लगता कि प्रदेश बीमारु राज्य है। आयकर विभाग के छापों ने प्रदेश के कई लोगों की पोल खोली वहीं पिछले तीन साल में ही आयकर छापों में करीब छह सौ करोड़ की अघोषित संपत्ति सरेंडर की जा चुकी है। इसके अलावा करीब 130 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति आयकर विभाग जब्त कर चुका है। यही नहीं छापों में मिले दस्तावेज बताते हैं कि कुछेक अधिकारियों, मंत्रियों और उद्योगपतियों के बीच बने गठजोड़ ने शासकीय योजनाओं के माध्यम से अकूत संपदा जोड़ी है। आयकर सूत्रों की मानें तो प्रदेश में दिनों दिन बढ़ रहे आय के स्त्रोतों में इन योजनाओं का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। आयकर छापे में सरेंडर अघोषित आय या फिर जब्त संपत्ति के अलावा आयकर विभाग ने छापों में हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति का पता लगाया।
ऐन-केन प्रकारेण धन पाने की लालसा ने अधिकारी की कार्य संस्कृति को मार दिया है। हालात यह हो गई कि वह चाहे मध्यप्रदेश हो या यूं कहिए कि सूबेदार अपने विवेक को ताले में बंद रखकर उनकी बनाई हुई राह पर चलता है। ऐसे में कौन अधिकारी मूर्ख होगा जो मुखिया को मुखिया मानकर व्यवहार करेगा। जब मुखिया की हालत वैसाखियों पर चलने जैसी हो जाए तब कौन इन अधिकारियों से हिसाब मांगेगा। जिस जनता के टैक्स से इन अधिकारियों की मोटी तनख्वाह निकलती है उनके काम करने में फाईल या तो मिलती नहीं है या फाईल इतनी मोटी हो जाती है कि उसका कि उसका निराकरण कोई जन भी नहीं कर सकता है। उपसचिव, सचिव और न जाने कितने सचिवों की एक जानलेवा शृंखला रावण की मुंडी की तरह एक दूसरे से जुडी हुई है।
सार्वजनिक शौचालय के काम भी इन मुंडियों के हस्ताक्षर के बिना पूरा नहीं होता है। ऐसे में कोई मुंडी बीच में से गायब हो जाए, तो मामला पेंडिंग। अब लंबित मामले को और लंबित करने की कला भी इनके ही पास है झट एक जिज्ञासा वाला प्रश्न लिखा और फाईल नीचे रख दी। फाईल जिस गति से आई थी उसी गति से सद्गति को प्राप्त हो जाती है और उसके मरने की खबर किसी को भी लगती नहीं है। लेकिन थैलीशाहों की फाईल पर नौकरशाहों की नजर ही नहीें होती है, बल्कि नजारे इनायत भी होती है। किसी जमीन का उपयोग बदलना हो या हाईराइज बिल्ंिडग की परमिशन, जंगल से खेत खेत से जंगल और कालानाइजर्स बंधुओ के काम के लिए एक नहीं दस-दस बार केबिनेट बैठ जाएगी। बार-बार अधिकारी वही फाईल मीटिंग में लेकर आएगा जिसका सौदा पट चुका है। इन सौदों की भनक तक नहीं लगती और क्या निर्णय लिए गए वह जानना तो आम आदमियों के लिए दूर की कौड़ी है। वैसे देखा जाए तो सन् 1993 से लेकर अभी तक आईएएस मंडली किसी न किसी विक्रम के कांधे पर बेताल की तरह चिपकी हुई है और उसे मालूम है कि विक्रम को उलझाकर रखेंगे तो पेड़ पर उल्टा लटकने की बारी नहीं आएगा।






















'सीमा फार्मूलाÓ में फंसे नौकरशाह



देश में लोकतंत्र की स्थापना के 58 साल बाद भी हमारी नौकरशाही को लेकर एक आम शिकायत आज भी बनी हुई है कि उसका चाल, चेहरा, चरित्र वही पुराना है। अंग्रेजी शासनकाल के दौरान देश में प्रशासन का जो ढांचा तैयार किया गया था उसका मकसद जनता की सेवा करना और उसके प्रति संवेदनशील और जवाबदेह होना कतई नहीं था। पारदर्शिता के बजाय सरकारी गोपनीयता पर ज्यादा जोर दिया गया और इसका कानून भी बना। लेकिन आजादी के बाद भी यह कानून चलता रहा। अब यह कानून अस्तित्व मेें नहीं है और सूचना के अधिकार के रूप में लोगों के पास अब पारदर्शिता का हथियार तो आ गया है, लेकिन सरकारी कामकाज का रंग-ढंग अब भी वैसा ही है। मध्यप्रदेश में तो हालात और बदतर होती जा रही है। कार्य करने की संस्कृति को नौकरशाहों ने रद्दी की टोकरी में फेंक दिया है।
वेतन भत्तों से लबरेज और सुविधाएं पाने में सबसे आगे रहने वाले इन नौकरशाहों पर थैलीशाहों का कब्जा हो गया है। इनका अब कार्य करने में मन नहीं लगता है बल्कि किसी अच्छे काम को उलझाने में महारत हासिल हो चुकी है ताकि अपने बैंक के लॉकर भर सकें। यह हम नहीं कह रहे बल्कि कुछ जांच एजेंसियों की रिर्पोट और आयकर विभाग के छापों से उजागर हुआ है। प्रदेश में कई नौकरशाहों के यहां पड़े आयकर विभाग के छापे के बाद देर से ही सही लेकिन दुरूस्त होकर जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जागे तो उन्होंने सभी आईएएस अधिकारियों को चल अचल संपत्ति सार्वजनिक करने का आदेश पारित कर दिया। परंतु पहले भी अधिकारियों द्वारा संपत्ति का ब्योंरा एक निर्धारित प्रपत्र में हर वित्तीय वर्ष में सामान्य प्रशासन विभाग को दिया जाता रहा है। परंतु उस प्रपत्र को देखने की फुर्सत किसको है, जो दिया वो सही। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आदेश तो दे डाला पर इसकी मॉनीटरिंग क्या वह स्वयं करेंगे या किसी इमानदार नौकरशाह की नजरों सेेे जांच पड़ताल करेंगे। आदेश के बाद आंकड़ेबाज नौकरशाहों ने जब अपनी संतुलित संपति को सार्वजनिक किया तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गई। प्रदेश की राजधानी भोपाल सहित देश की राजधानी दिल्ली में करोड़ों की संपत्ति का मामला सामने आया। एक बीमारू राज्य की नौकरशाहों द्वारा अकूत संपत्ति अर्जित करने की बात सामने आते ही केंद्र की खुफिया एजेंसियों ने अपनी आंखें तरेरनी शुरू कर दी है। खुफिया विभाग के सूत्रों के अनुसार वर्तमान में केंद्रीय जांच एजेंसियों के 5 अधिकारी गुपचुप तरीके से मप्र के नौकरशाहों की कमाई और करतूतों की फाईल खंगाल रहें है। आयकर विभाग तो यह देखकर हैरान है कि अधिकारियों की काली कमाई को ठिकाने लगाने के लिए लगभग सभी बीमा कंपनियों ने अपना जाल बुना और सरकार को चूना लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सभी कंपनियों और अधिकारियों ने सरकार के उस नियम का जमकर फायदा उठाया जिसमें 50 हजार से अधिक के लेनदेन पर पेन नंबर देना अनिवार्य होता है। बीमा कंपनी के एजेंटों ने इस नियम का तोड़ निकालते हुए लोगों की काली कमाई सफेद करने वहीं तरीका अपनाया जो सीमा जायसवाल ने अपनाया था।
सीमा ने भी प्रदेश के कई भ्रष्ट अफसरों की करोड़ों रुपए काली कमाई को अपनी बीमा कंपनी आईसीआईसीआई प्रूडेंशियल में निवेश कराया था। सीमा ने पचास हजार से कम के ड्राफ्ट आदि के माध्यम से बीमा पालिसी बनाई थी। ऐसे में आयकर विभाग को पता ही नहीं चल पाया कि कब लोगों के करोड़ों रुपए बीमा में निवेश के माध्यम से सफेद होते गए। उधर बीमा में निवेश को आयकर में छूट होने के कारण सरकार के पल्ले में कुछ भी नहीं आया। बताया जाता है कि आयकर विभाग अब सभी बीमा कंपनियों के रिकार्ड खंगाल रहा है। विभाग के पास इन बीमा कंपनियों में प्रदेश से किए गए निवेश की सूची आ गई है। इस सूची की पड़ताल में कई सफेदपोश नेताओं के अलावा अफसरों और कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपए निवेश किए जाने का पता चला है। विभाग इनकी सूची तैयार कर रहा है।
आयकर विभाग के पास बजाज एलायंस, बिरला सन लाईफ, एचडीएफसी, टाटा एआईजी, एसबीआई लाईफ आदि इंश्योरेंस कंपनियों का रिकार्ड आ चुका है। विभाग के अधिकारियों ने अपने साफ्टवेयर के माध्यम से इस सूची में से प्रदेश के कई ऐसे नाम खोज निकाले हैं, जिन्होंने करोड़ों रुपए बीमा के माध्यम से निवेश किया है। सूत्र बताते हैं कि प्रदेश के कई अफसरों के अलावा तृतीय वर्ग के कर्मचारियों ने भी लाखों रुपए की बीमा पालिसी ले रखी है। इसमें पुलिस विभाग के कई आरक्षक भी शामिल हैं जिन्होंने लाखों रुपए बीमा कंपनियों में निवेश किया है। जानकारों के अनुसार विभाग को वित्त मंत्रालय के अधीन कार्यरत फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट (एफआईयू) से बड़ी संख्या में संदेहास्पद लेन-देन की जानकारी मिली है। वर्ष 2004 में स्थापित फाइनेंशियल इंटलिजेंस यूनिट रिजर्व बैंक, बीमा नियामक प्राधिकरण (आईआरडीए) और सिक्युरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया (सेबी) की मदद से काम करती है। यह यूनिट हर संदेहास्पद लेन-देन पर नजर रखे हुए है। विभाग के सूत्रों के अनुसार पचास हजार से कम राशि के नगद ड्राफ्ट पर भी संदेह होने पर यह यूनिट नजर रखती है।
विभाग को एफआईयू के साथ आल इंडिया रिपोर्टिग (एआईआर) सिस्टम से भी जानकारी मिल रही है। इसमें के्रडिट कार्ड से किए गए बड़े भुगतान व अन्य तरीकों से किए गए निवेश व खर्चो की जानकारी भी संबंधित आयकर अधिकारी तक पहुंच रही है। विभाग के सूत्रों के अनुसार बीमा कंपनियों से भी पचास हजार से व उससे अधिक प्रीमियम का भुगतान करने वालों की जानकारी बुलवाई गई है।
विभाग के सूत्रों के अनुसार कुछ लोग बंगलुरू, पुणे या अन्य शहरों में पढऩे वाले बच्चों को हर माह 25 से 50 हजार रुपए भेज रहे हैं, लेकिन इसकी जानकारी छुपाते हैं। राशि भोपाल मे जमा होती है और किसी अन्य शहर में निकासी होती है जबकि संबंधित व्यक्ति का दावा होता है कि उसने केवल पैसा जमा किया और निकाला खर्च नहीं किया। इसके अलावा किसी अन्य शहर में टूर पर जाते समय राशि निकालते हैं, वहां खर्च करते हैं और भोपाल आकर फिर पैसे जमा करा देते हैं। यह लोग भी तर्क देते हैं कि उन्होंने खर्चा नहीं किया। आयकर विभाग इन सभी के द्वारा बीमा कंपनी में किए गए निवेश की पूरी सूची तैयार कर रहा है। विभाग साथ ही इनके आयकर रिटर्न की भी पड़ताल कर पता लगा रहा है कि इन लोगों ने बीमा में किए गए निवेश का उल्लेख रिटर्न में किया है या नहीं। इसके बाद विभाग सभी को नोटिस भेज कर इनके द्वारा किए गए निवेश के आय के स्त्रोतों की जानकारी मांगेगा।
आयकर विभाग के छापों के बाद मप्र को बीमारु राज्य कहने वालों को इस विषय पर दोबारा सोचने की जरूरत है। कारण प्रदेश में हर साल बढ़ते करोड़पति व्यापारियों के अलावा नेताओं, अफसरों और उद्योगपतियों के यहां से मिल रही करोड़ों की अनुपातहीन संपत्ति को देखकर नहीं लगता कि प्रदेश बीमारु राज्य है। आयकर विभाग के छापों ने प्रदेश के कई लोगों की पोल खोली वहीं पिछले तीन साल में ही आयकर छापों में करीब छह सौ करोड़ की अघोषित संपत्ति सरेंडर की जा चुकी है। इसके अलावा करीब 130 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति आयकर विभाग जब्त कर चुका है। यही नहीं छापों में मिले दस्तावेज बताते हैं कि कुछेक अधिकारियों, मंत्रियों और उद्योगपतियों के बीच बने गठजोड़ ने शासकीय योजनाओं के माध्यम से अकूत संपदा जोड़ी है। आयकर सूत्रों की मानें तो प्रदेश में दिनों दिन बढ़ रहे आय के स्त्रोतों में इन योजनाओं का भी एक बहुत बड़ा हिस्सा शामिल है। आयकर छापे में सरेंडर अघोषित आय या फिर जब्त संपत्ति के अलावा आयकर विभाग ने छापों में हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति का पता लगाया।
ऐन-केन प्रकारेण धन पाने की लालसा ने अधिकारी की कार्य संस्कृति को मार दिया है। हालात यह हो गई कि वह चाहे मध्यप्रदेश हो या यूं कहिए कि सूबेदार अपने विवेक को ताले में बंद रखकर उनकी बनाई हुई राह पर चलता है। ऐसे में कौन अधिकारी मूर्ख होगा जो मुखिया को मुखिया मानकर व्यवहार करेगा। जब मुखिया की हालत वैसाखियों पर चलने जैसी हो जाए तब कौन इन अधिकारियों से हिसाब मांगेगा। जिस जनता के टैक्स से इन अधिकारियों की मोटी तनख्वाह निकलती है उनके काम करने में फाईल या तो मिलती नहीं है या फाईल इतनी मोटी हो जाती है कि उसका कि उसका निराकरण कोई जन भी नहीं कर सकता है। उपसचिव, सचिव और न जाने कितने सचिवों की एक जानलेवा शृंखला रावण की मुंडी की तरह एक दूसरे से जुडी हुई है।
सार्वजनिक शौचालय के काम भी इन मुंडियों के हस्ताक्षर के बिना पूरा नहीं होता है। ऐसे में कोई मुंडी बीच में से गायब हो जाए, तो मामला पेंडिंग। अब लंबित मामले को और लंबित करने की कला भी इनके ही पास है झट एक जिज्ञासा वाला प्रश्न लिखा और फाईल नीचे रख दी। फाईल जिस गति से आई थी उसी गति से सद्गति को प्राप्त हो जाती है और उसके मरने की खबर किसी को भी लगती नहीं है। लेकिन थैलीशाहों की फाईल पर नौकरशाहों की नजर ही नहीें होती है, बल्कि नजारे इनायत भी होती है। किसी जमीन का उपयोग बदलना हो या हाईराइज बिल्ंिडग की परमिशन, जंगल से खेत खेत से जंगल और कालानाइजर्स बंधुओ के काम के लिए एक नहीं दस-दस बार केबिनेट बैठ जाएगी। बार-बार अधिकारी वही फाईल मीटिंग में लेकर आएगा जिसका सौदा पट चुका है। इन सौदों की भनक तक नहीं लगती और क्या निर्णय लिए गए वह जानना तो आम आदमियों के लिए दूर की कौड़ी है। वैसे देखा जाए तो सन् 1993 से लेकर अभी तक आईएएस मंडली किसी न किसी विक्रम के कांधे पर बेताल की तरह चिपकी हुई है और उसे मालूम है कि विक्रम को उलझाकर रखेंगे तो पेड़ पर उल्टा लटकने की बारी नहीं आएगा।

शुक्रवार, 18 जून 2010

मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन के बीच बढ़ रही दूरियों

मध्य प्रदेश भाजपा आंतरिक संघर्ष से रूबरू है. सत्ता और संगठन के बीच क्रमश: बढ़ रही दूरियों के कारण राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बढ़ता जा रहा है. प्रभात झा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के अंदर एक नए राजनीतिक ध्रुव का जन्म हुआ है. भारतीय जनता पार्टी सत्ता की दूसरी पारी में आंतरिक संघर्ष की ओर बढ़ती नज़र आ रही है. शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा को राज्य में दूसरी राजनीतिक पारी खेलने का अवसर प्रदान किया है, परंतु राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली विजय का कारण बहुत कुछ कांगे्रस का आंतरिक संघर्ष भी था. भारतीय जनता पार्टी सरकार की पहली पारी में जिस स्तर पर मंत्रियों के भ्रष्टाचार, प्रशासनिक निरंकुशता और भाजपा कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता के मामले सामने आए थे, उससे दोबारा विजय के संकेत तो नहीं ही मिल रहे थे.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है.

भाजपा नेताओं का यह भी मानना है कि दूसरी पारी की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस के अंदरूनी बिखराव की भी रही है. भाजपा के शासनकाल में सत्ता और संगठन के मध्य कभी कोई टकराव नहीं नज़र आता था, लेकिन पिछले दिनों राज्य सरकार की जो गतिविधियां रहीं, उनसे यह सा़फ संकेत मिलने लगा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने अस्तित्व-संरक्षण के लिए नई बिसात बिछाना चाहते हैं. भाजपा संगठन में प्रभात झा की ताजपोशी से यह संदेश मिला था कि पार्टी राज्य में अपनी बुनियाद मज़बूत करने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए कुछ ज़मीनी प्रयोग करना चाहती है. प्रभात झा वास्तव में दल के लिए एक नई कर्मभूमि के निर्माण की कोशिश के लिए ही लाए गए थे. प्रभात झा ने हालांकि अभी तक अपनी टीम की घोषणा नहीं की है, पर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि उनकी टीम में उन्हें ही स्थान मिल पाएगा, जिनका जनता और कार्यकर्ताओं से संपर्क बना हुआ है.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है. भाजपा नेताओं का अंदाज़ा है कि नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता बढ़ाने के पीछे शिवराज सिंह चौहान की प्रशासनिक कमजोरियों को पूरा करने का लक्ष्य है. मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में फिलहाल परिवर्तन के संकेत नहीं हैं, फिर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों पर विभिन्न आरोपों का प्रमाणीकरण विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा कराया जा रहा है. केंद्र के साथ राज्य के संबंधों के प्रति शिवराज सिंह की लापरवाही ने कई केंद्रीय योजनाओं का धन आवंटन रुकवा दिया है. पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रियों द्वारा राज्य में दौरों के पूर्व राज्य सरकार से अनुमति लेने संबंधी सरकारी फतवा स्वयं शिवराज सिंह के लिए भारी पड़ गया है. बाद में मुख्यमंत्री को न स़िर्फ उक्त आदेश वापस लेना पड़ा, बल्कि केंद्रीय नेताओं के समक्ष अपनी स्थिति भी स्पष्ट करनी पड़ी. इधर शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र पुलिस को वापस ले लिया है. यह कार्रवाई कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ की गई, पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ नहीं. प्रशासन के ऐसे दोहरे मापदंड से मध्य प्रदेश सरकार के राजनीतिक-प्रशासनिक असंतुलन का पता चलता है.

प्रशासनिक अराजकता पर नियंत्रण पाने में राज्य सरकार खुद को सक्षम नहीं पा रही है. शासन के प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालने वाला जनसंपर्क विभाग भी अराजकता का गढ़ बन गया है. विभिन्न केंद्रीय विभागों द्वारा भेजे गए जांच दलों की रिपोर्टें केंद्र द्वारा आवंटित राशि में भ्रष्टाचार के खुलासे का प्रमाण बनती जा रही हैं. भाजपा शासनकाल में ही उज्जैन विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद नेताओं द्वारा प्रो. अग्रवाल की कथित हत्या की गुत्थी सुलझाने में सरकार पूरी तरह असफल रही. आज तक पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह और कमल पटेल के विरुद्ध कायम किए गए आपराधिक प्रकरणों में भी सरकार बचाव का कोई मार्ग नहीं तलाश सकी. प्रशासनिक अराजकता की हद तब हुई, जब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की पहल पर राज्य के मुख्य सचिव अवनि वैश्य के विरुद्ध बाक़ायदा वारंट जारी हुआ. राज्य सरकार की गतिविधियों पर संघ और संगठन दोनों की निगाह है. संगठन यह महसूस कर रहा है कि दूसरी बार सत्ता पाने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में दल का आधार निरंतर कम होता जा रहा है. यही कारण है कि वर्ष 2011 के फरवरी माह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिशानिर्देश पर मध्य प्रदेश के आदिवासी ज़िले मंडला में आदिवासी महाकुंभ की घोषणा की गई है.

इस महाकुंभ में बीस लाख आदिवासियों को एकत्र करने की योजना बनाई गई है. महाकुंभ को भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं द्वारा संबोधित किया जाना है. संघ की इस पहल पर आयोजन के एक वर्ष पूर्व राज्य सरकार सौ करोड़ रुपये से अधिक के अनुमानित व्यय का लक्ष्य बना चुकी है. वास्तव में भाजपा तीसरी बार सत्ता पाने के लिए परिवर्तन की लहर चलाना चाहती है. संगठन के पदाधिकारियों का मानना है कि यदि तीसरी बार भाजपा सत्ता पर क़ाबिज़ होती है तो मध्य प्रदेश को गुजरात की तरह सुरक्षित राज्य घोषित करने में परेशानी नहीं होगी. दूसरी ओर मध्य प्रदेश को केंद्र बनाकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी स्थायी सत्ता कायम रखी जा सकेगी. भाजपा ने इस कार्य के लिए अपने स्वयंसेवी संगठनों को भी सक्रिय करना शुरू कर दिया है. जन अभियान परिषद के माध्यम से मध्य प्रदेश के सुदूर आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में संघ समर्थित स्वयंसेवी संगठनों का एक बड़ा ताना-बाना तैयार किया जा रहा है. तीन वर्ष की अवधि में निर्धारित योजना के अनुसार सत्ता का लाभ भाजपा के छोटे से छोटे कार्यकर्ता तक पहुंचाना और उसे वित्तीय रूप से स्वावलंबी बनाना एकमात्र लक्ष्य नज़र आता है. भाजपा संगठन राजनीति में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका से भलीभांति परिचित है. उसे मालूम है कि राजनीति की कमज़ोरियों को ढकने के लिए यदि मीडिया एक प्रभावशाली तंत्र है तो स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. एक अनुमान के अनुसार, इस समय मध्य प्रदेश में 1700 से अधिक स्वयंसेवी संगठन भाजपा एवं स्वयंसेवक संघ की रीतियों और नीतियों के तहत काम करने के लिए सक्रिय हो चुके हैं. राज्य के समस्त वित्तीय संसाधन इन स्वयंसेवी संगठनों के लिए खुले रहेंगे.

प्रभात झा के सक्रिय होने के बाद संगठन की सक्रियता अब सत्ता पर नज़र आने लगी है. कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से लेकर प्रशासनिक परिवर्तनों तक संगठन की भूमिका को नकार पाना अब शिवराज सिंह के वश की बात नहीं है. यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सत्ता को स्वयंसेवक संघ की नीतियों के अंतर्गत संगठित रूप से संचालित करने के लिए अभी कई परिवर्तन नज़र आने शेष हैं. प्रभात झा की टीम के गठन के बाद यह स्पष्ट है कि भाजपा शिवराज पोषित रहेगी या अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहकर राज्य में एक स्थायी राजनीतिक आकार ग्रहण कर सकेगी.

कांग्रेस दौ़ड में ही नहीं देश में राजनीतिक रूप से कांग्रेस का अस्तित्व मृतप्राय है. कांग्रेस की गतिविधियां बताती हैं कि वह दौड़ में है ही नहीं. व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त राज्य के कांग्रेसी नेता भाजपा की किसी भी चाल का जवाब देने में असफल रहे हैं. मज़बूत संगठन शक्ति के प्रतीक समझे जाने वाले सुरेश पचौरी पिछले दो माह के दौरान केवल अपने राज्यसभा टिकट के लिए संघर्षरत दिखे. कांग्रेस के भविष्य को लेकर यह किंवदंती प्रचलित है कि जब भाजपा सरकार में बिना किसी रोक-टोक के व्यक्तिगत कमाई का रास्ता खुला हुआ है तो अपनी सरकार के लिए पहल करने की ज़रूरत ही क्या है. अपने-अपने राजनीतिक आकाओं को हाज़िरी देकर और हाईकमान के सामने मीडिया में छपे हुए तथ्यों का विश्लेषण करके राज्य कांग्रेस के नेता अपने राजनीतिक दायित्वों को पूरा कर रहे हैं. वे राजनीति से अधिक अपने व्यवसाय में व्यस्त हैं और कार्यकर्ता पूरी तरह उपेक्षित. कांग्रेस के लिए संभवत: मध्य प्रदेश अब प्राथमिकता सूची में नहीं है.

मध्य प्रदेश में सत्ता और संगठन के बीच बढ़ रही दूरियों

मध्य प्रदेश भाजपा आंतरिक संघर्ष से रूबरू है. सत्ता और संगठन के बीच क्रमश: बढ़ रही दूरियों के कारण राज्य में राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बढ़ता जा रहा है. प्रभात झा के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के अंदर एक नए राजनीतिक ध्रुव का जन्म हुआ है. भारतीय जनता पार्टी सत्ता की दूसरी पारी में आंतरिक संघर्ष की ओर बढ़ती नज़र आ रही है. शिवराज सिंह चौहान ने भाजपा को राज्य में दूसरी राजनीतिक पारी खेलने का अवसर प्रदान किया है, परंतु राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले विधानसभा चुनाव में मिली विजय का कारण बहुत कुछ कांगे्रस का आंतरिक संघर्ष भी था. भारतीय जनता पार्टी सरकार की पहली पारी में जिस स्तर पर मंत्रियों के भ्रष्टाचार, प्रशासनिक निरंकुशता और भाजपा कार्यकर्ताओं की अनुशासनहीनता के मामले सामने आए थे, उससे दोबारा विजय के संकेत तो नहीं ही मिल रहे थे.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है.

भाजपा नेताओं का यह भी मानना है कि दूसरी पारी की विजय में महत्वपूर्ण भूमिका कांग्रेस के अंदरूनी बिखराव की भी रही है. भाजपा के शासनकाल में सत्ता और संगठन के मध्य कभी कोई टकराव नहीं नज़र आता था, लेकिन पिछले दिनों राज्य सरकार की जो गतिविधियां रहीं, उनसे यह सा़फ संकेत मिलने लगा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने अस्तित्व-संरक्षण के लिए नई बिसात बिछाना चाहते हैं. भाजपा संगठन में प्रभात झा की ताजपोशी से यह संदेश मिला था कि पार्टी राज्य में अपनी बुनियाद मज़बूत करने और कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए कुछ ज़मीनी प्रयोग करना चाहती है. प्रभात झा वास्तव में दल के लिए एक नई कर्मभूमि के निर्माण की कोशिश के लिए ही लाए गए थे. प्रभात झा ने हालांकि अभी तक अपनी टीम की घोषणा नहीं की है, पर ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि उनकी टीम में उन्हें ही स्थान मिल पाएगा, जिनका जनता और कार्यकर्ताओं से संपर्क बना हुआ है.

मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में अब तक उपेक्षित रहे नरोत्तम मिश्रा को पिछले दिनों सरकारी प्रवक्ता का पद दिया गया. सरकार की ओर से जारी विज्ञप्ति में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि नरोत्तम मिश्रा विभिन्न विभागों के ज़िले के अधिकारियों से विभिन्न कार्यक्रमों और घटनाओं के बारे में सीधे जानकारी प्राप्त करने के लिए अधिकृत होंगे. यह माना जा रहा है कि संस्कृति कार्य विभाग के साथ आवास विभाग को जोड़कर नरोत्तम मिश्रा को मुख्यमंत्री के साथ एक समकक्ष स्थान दिया गया है. भाजपा नेताओं का अंदाज़ा है कि नरोत्तम मिश्रा की सक्रियता बढ़ाने के पीछे शिवराज सिंह चौहान की प्रशासनिक कमजोरियों को पूरा करने का लक्ष्य है. मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में फिलहाल परिवर्तन के संकेत नहीं हैं, फिर भी मंत्रिमंडल के सदस्यों पर विभिन्न आरोपों का प्रमाणीकरण विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा कराया जा रहा है. केंद्र के साथ राज्य के संबंधों के प्रति शिवराज सिंह की लापरवाही ने कई केंद्रीय योजनाओं का धन आवंटन रुकवा दिया है. पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रियों द्वारा राज्य में दौरों के पूर्व राज्य सरकार से अनुमति लेने संबंधी सरकारी फतवा स्वयं शिवराज सिंह के लिए भारी पड़ गया है. बाद में मुख्यमंत्री को न स़िर्फ उक्त आदेश वापस लेना पड़ा, बल्कि केंद्रीय नेताओं के समक्ष अपनी स्थिति भी स्पष्ट करनी पड़ी. इधर शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की सुरक्षा में तैनात सशस्त्र पुलिस को वापस ले लिया है. यह कार्रवाई कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं के साथ की गई, पर भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ नहीं. प्रशासन के ऐसे दोहरे मापदंड से मध्य प्रदेश सरकार के राजनीतिक-प्रशासनिक असंतुलन का पता चलता है.

प्रशासनिक अराजकता पर नियंत्रण पाने में राज्य सरकार खुद को सक्षम नहीं पा रही है. शासन के प्रचार-प्रसार का दायित्व संभालने वाला जनसंपर्क विभाग भी अराजकता का गढ़ बन गया है. विभिन्न केंद्रीय विभागों द्वारा भेजे गए जांच दलों की रिपोर्टें केंद्र द्वारा आवंटित राशि में भ्रष्टाचार के खुलासे का प्रमाण बनती जा रही हैं. भाजपा शासनकाल में ही उज्जैन विश्वविद्यालय में विद्यार्थी परिषद नेताओं द्वारा प्रो. अग्रवाल की कथित हत्या की गुत्थी सुलझाने में सरकार पूरी तरह असफल रही. आज तक पूर्व मंत्री रुस्तम सिंह और कमल पटेल के विरुद्ध कायम किए गए आपराधिक प्रकरणों में भी सरकार बचाव का कोई मार्ग नहीं तलाश सकी. प्रशासनिक अराजकता की हद तब हुई, जब राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की पहल पर राज्य के मुख्य सचिव अवनि वैश्य के विरुद्ध बाक़ायदा वारंट जारी हुआ. राज्य सरकार की गतिविधियों पर संघ और संगठन दोनों की निगाह है. संगठन यह महसूस कर रहा है कि दूसरी बार सत्ता पाने के बाद आदिवासी क्षेत्रों में दल का आधार निरंतर कम होता जा रहा है. यही कारण है कि वर्ष 2011 के फरवरी माह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दिशानिर्देश पर मध्य प्रदेश के आदिवासी ज़िले मंडला में आदिवासी महाकुंभ की घोषणा की गई है.

इस महाकुंभ में बीस लाख आदिवासियों को एकत्र करने की योजना बनाई गई है. महाकुंभ को भाजपा और संघ के वरिष्ठ नेताओं द्वारा संबोधित किया जाना है. संघ की इस पहल पर आयोजन के एक वर्ष पूर्व राज्य सरकार सौ करोड़ रुपये से अधिक के अनुमानित व्यय का लक्ष्य बना चुकी है. वास्तव में भाजपा तीसरी बार सत्ता पाने के लिए परिवर्तन की लहर चलाना चाहती है. संगठन के पदाधिकारियों का मानना है कि यदि तीसरी बार भाजपा सत्ता पर क़ाबिज़ होती है तो मध्य प्रदेश को गुजरात की तरह सुरक्षित राज्य घोषित करने में परेशानी नहीं होगी. दूसरी ओर मध्य प्रदेश को केंद्र बनाकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में भी स्थायी सत्ता कायम रखी जा सकेगी. भाजपा ने इस कार्य के लिए अपने स्वयंसेवी संगठनों को भी सक्रिय करना शुरू कर दिया है. जन अभियान परिषद के माध्यम से मध्य प्रदेश के सुदूर आदिवासी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में संघ समर्थित स्वयंसेवी संगठनों का एक बड़ा ताना-बाना तैयार किया जा रहा है. तीन वर्ष की अवधि में निर्धारित योजना के अनुसार सत्ता का लाभ भाजपा के छोटे से छोटे कार्यकर्ता तक पहुंचाना और उसे वित्तीय रूप से स्वावलंबी बनाना एकमात्र लक्ष्य नज़र आता है. भाजपा संगठन राजनीति में स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका से भलीभांति परिचित है. उसे मालूम है कि राजनीति की कमज़ोरियों को ढकने के लिए यदि मीडिया एक प्रभावशाली तंत्र है तो स्वयंसेवी संगठनों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. एक अनुमान के अनुसार, इस समय मध्य प्रदेश में 1700 से अधिक स्वयंसेवी संगठन भाजपा एवं स्वयंसेवक संघ की रीतियों और नीतियों के तहत काम करने के लिए सक्रिय हो चुके हैं. राज्य के समस्त वित्तीय संसाधन इन स्वयंसेवी संगठनों के लिए खुले रहेंगे.

प्रभात झा के सक्रिय होने के बाद संगठन की सक्रियता अब सत्ता पर नज़र आने लगी है. कार्यक्रमों के क्रियान्वयन से लेकर प्रशासनिक परिवर्तनों तक संगठन की भूमिका को नकार पाना अब शिवराज सिंह के वश की बात नहीं है. यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सत्ता को स्वयंसेवक संघ की नीतियों के अंतर्गत संगठित रूप से संचालित करने के लिए अभी कई परिवर्तन नज़र आने शेष हैं. प्रभात झा की टीम के गठन के बाद यह स्पष्ट है कि भाजपा शिवराज पोषित रहेगी या अपने मूल सिद्धांतों पर कायम रहकर राज्य में एक स्थायी राजनीतिक आकार ग्रहण कर सकेगी.

कांग्रेस दौ़ड में ही नहीं देश में राजनीतिक रूप से कांग्रेस का अस्तित्व मृतप्राय है. कांग्रेस की गतिविधियां बताती हैं कि वह दौड़ में है ही नहीं. व्यक्तिगत स्वार्थों में लिप्त राज्य के कांग्रेसी नेता भाजपा की किसी भी चाल का जवाब देने में असफल रहे हैं. मज़बूत संगठन शक्ति के प्रतीक समझे जाने वाले सुरेश पचौरी पिछले दो माह के दौरान केवल अपने राज्यसभा टिकट के लिए संघर्षरत दिखे. कांग्रेस के भविष्य को लेकर यह किंवदंती प्रचलित है कि जब भाजपा सरकार में बिना किसी रोक-टोक के व्यक्तिगत कमाई का रास्ता खुला हुआ है तो अपनी सरकार के लिए पहल करने की ज़रूरत ही क्या है. अपने-अपने राजनीतिक आकाओं को हाज़िरी देकर और हाईकमान के सामने मीडिया में छपे हुए तथ्यों का विश्लेषण करके राज्य कांग्रेस के नेता अपने राजनीतिक दायित्वों को पूरा कर रहे हैं. वे राजनीति से अधिक अपने व्यवसाय में व्यस्त हैं और कार्यकर्ता पूरी तरह उपेक्षित. कांग्रेस के लिए संभवत: मध्य प्रदेश अब प्राथमिकता सूची में नहीं है.

आज के आराध्य

आज के आराध्य वे हैं जो या तो हमारे दिलों में घुसकर हमें डरा सकें या हमारे दिल की हर मुराद पूरी कर सकें. कौन और कैसे हैं डराने और लुभाने वाले आज के दौर के हमारे ये आराध्य, बता रहे हैं अतुल चौरसिया

‘कोस-कोस पे पानी बदले सवा कोस पे बानी' वाली कहावत में बहुत आसानी-से अगला हिस्सा जोड़ा जा सकता है -‘दस कोस पे ध्यानी'. ध्यानी यानी भक्त.

हमारे देश के बहुसंख्यक हिंदू समाज के आराधक और उनके आराध्य उतनी ही तेजी के साथ अपना चोला बदलते चलते हैं जितनी तेजी से यहां के लोगों की बोली. हर गांव-शहर-मुहल्ले के अपने आस्था के प्रतीकों का होना इस देश में उतना ही सहज है जितना जीने के लिए हवा-पानी. लमही के बेलवांबाबा, सरायमीर के अलीअश्कां बाबा, नरसिंहपुर के दुल्हादेव, लखनऊ के बाबा खम्मन पीर, रामदेवरा के रामदेव बाबा, मोकामा के चूहड़मल, छपरा की अंबा देवी से लेकर सुदूर दक्षिण भारत के अय्यप्पन तक स्थानीय देवी-देवताओं और श्रद्धा-उपासना के बिंबों की एक ऐसी अनवरत श्रृंखला है जिसका संबंध भारतीय पौराणिक संदर्भों से उतना गहरा या जुड़ा न भी हो तो भी सब के सब उसी परंपरा से प्रेरित-आस्वादित हैं जिसमें पहले से ही तैंतीस करोड़ देवी-देवता विद्यमान हैं.

आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं - शनिदेव, शिरडीवाले साईं बाबा, भैरवनाथ और विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें
अगर बारीकी से नजर दौड़ाएं तो हिंदू समुदाय की आस्था के प्रतीक कोस बदलने पर ही नहीं, बल्कि हर कोस पर दिन-हफ्ते-साल और संगत बदलने पर भी बदलते हैं. फलां देवता मनोकामनाएं पूरी नहीं कर पाए तो कुछ हफ्ते बाद हमारी आस्था नई शरण ढूंढ़ लेती है. किसी जानने वाले की मनोकामना पूरी हो गई तो हमारी श्रद्धा उस दिशा का रुख कर लेती है. ‘परिवर्तन संसार का अकाट्य सिद्धांत है' वाली परिपाटी को हम भारतीयों ने अपनी आस्था के संदर्भ में भी उतना ही बड़ा सत्य मान लिया है.

धर्मभीरुता भारतीय समाज के मूल में है इसके बावजूद धर्म और आस्था के मामलों में छोटी-मोटी छूट लेने और नए-नए प्रयोगों से हमें कोई परहेज नहीं. ये छूट और प्रयोग धीरे-धीरे कब एक नए चलन का सूत्रपात कर देते हैं पता ही नहीं चलता. देखते ही देखते ये चलन किसी अलग ही मत, संप्रदाय या हमारी श्रद्धा के किसी जबर्दस्त प्रतीक का स्वरूप धारण कर लेते है. इसीलिए अब तक गुमनाम रहे कुछ आराध्य पिछले कुछ वर्षों में अचानक इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि टीवी चैनलों से लेकर सड़कों पर दौड़ती बेशुमार कारों के शीशों तक पर दिख जाते हैं. रातों-रात धरती का सीना फाड़कर प्रकट हो जाने वाले मंदिर-मस्जिद-मजारों और उनके ऊपर दो-चार दिन के भीतर ही 'अतीव शक्तिसंपन्न, प्राचीन सिद्धपीठ' का बोर्ड लटक जाने की परंपरा का एक अक्खड़ बनारसी नमूना वरिष्ठ साहित्यकार डॉ काशीनाथ सिंह ने अपने मशहूर उपन्यास 'काशी का अस्सी' में कुछ यूं पेश किया है- ‘कंपटीशन शुरू हो गया है जीटी रोड के किनारे मंदिर, मस्जिद, मजार बनाकर जमीन हड़पने का. वे भी हड़प रहे हैं, लेकिन तुम्हारे मुकाबले वे कहीं नहीं हैं. मस्जिद खड़ी करने में तो समय लगता है, यहां तो एक ईंट या पत्थर फेंका, गेरू या सेनुर पोता, फूल-पत्ती चढ़ाया और माथा टेक दिया- जै बजरंग बली. और दो आदमी ढोलक-झाल लेकर बैठ गए- अखंड हरिकीर्तन! भगवान धरती फोड़कर प्रकट भए हैं..'

आस्था की इसी चादर तले तमाम अनर्गल चीजें अनजाने में ही समाज का हिस्सा बनती जाती हैं जिनका उस समय हमें एहसास नहीं होता जिसमें हम उन्हें स्वीकार रहे होते हैं, क्योंकि यह बदलाव बहुत दबे पांव हमारे बीच पैठ बनाता है. मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश इस प्रवृत्ति को हमारी पलायनवादी सोच का प्रतीक मानते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म अपने साथ जिम्मेदारियां लेकर आता है. इसका मकसद होता है न्याय, सच्चाई और मानवता. लेकिन धर्म में जब विवेकशून्यता की स्थिति पैदा होती है तब यह पाखंड की ओर चल पड़ता है, तर्क-वितर्क, वाद-विवाद को प्रतिबंधित कर दिया जाता है और धर्म और आस्था की आड़ में किसी भी सवाल-जवाब को अवैध घोषित कर दिया जाता है.' स्वामी अग्निवेश के विचारों को थोड़ा आगे ले जाएं तो इस स्थिति के बाद धर्म अपनी मार्गदर्शक वाली
मूल भूमिका से भटक कर कट्टरवाद की ओर बढ़ जाता है.

परंपरागत हिंदू देवी-देवताओं में भगवान विष्णु और उनके अवतारों की आराधना सबसे ज्यादा होती रही है. इसके अतिरिक्त शिवजी, गणेश, लक्ष्मी, दुर्गा आदि ऐसे देवी-देवता रहे हैं जिन्हें थोड़ी आसान भाषा में मुख्यधारा के भगवान कहा जा सकता है. तमाम स्थानीय देवी-देवताओं के साथ-साथ इनकी आराधना का ग्राफ कमोबेश पूरे देश में एक-सा रहता रहा है. किंतु विगत एक दशक के दौरान धर्मालुओं की पूजा-पाठ की शैलियों और व्यवस्थाओं में काफी बदलाव देखने को मिले हैं. कई अध्ययनों में भी इस तरह की चौंकाने वाली प्रवृत्तियां उजागर हुई हैं. साथ ही ये तथ्य कुछ और नई और रोचक परिपाटियों के गठन की ओर भी इशारा कर रहे हैं.

शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई ये भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है
भक्तों की धर्मभीरुता, पीर-पुजारियों के अलौकिक महिमामंडन और इन सबसे ऊपर मीडिया महाराज की कृपा से आराध्यों का एक नया समूह पिछले कुछ सालों में जबर्दस्त तरीके से उभरा है. परंपरागत देवी-देवता, भक्तों की संख्या और आराधना के मामले मे पीछे छूटते जा रहे हैं और मुख्य रूप से आस्था के जो चार प्रतीक हमारे इन पारंपरिक आराध्यों से काफी आगे निकल गए दिखते हैं, वे हैं - शनिदेव, शिरडीवाले साईं बाबा, भैरवनाथ और जगह-जगह दिखने वालीं विभिन्न पीरों-औलियाओं की मजारें. यहां पहले तीन तो आस्था के एक प्रकार से निश्चित रंग-रूप, हानि-लाभ और पूजा-पद्धतियों वाले प्रतीक हैं लेकिन मजारों के मामले में ऐसा नहीं है. घड़ी वाले से लेकर मटके वाले पीर तक की मजारें इस देश के अमूमन हर हिस्से में फैली हुई हैं. ये अलग-अलग लोगों की मजारें है, जिनके संदेश-उपदेश, और जियारत के तौर-तरीके एक-दूसरे के जैसे होते हुए भी अलग हो सकते हैं. मसलन हर जगह मजारों पर चादर तो चढ़ाई जाती है लेकिन इसके साथ कहीं पर घड़ी और कही मटका चढ़ाने का चलन भी है.

इस श्रेणी के धार्मिक प्रतीकों को अगर एक दर्जे में रखकर देखें तो इनकी शरण में आने वालों की संख्या बड़े-बड़े देवी-देवताओं के भक्तों को मात दे सकती है. अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दरगाहों-मजारों की प्रतिष्ठा और हिंदू धर्म के नये-नये देवताओं के अचानक ही चलन में आने की क्या वजह हो सकती है? इस सवाल पर स्वामी अग्निवेश की राय है, ‘वक्त-वक्त पर लोग नए-नए प्रतीक गढ़ते हैं, फिर उनका भय दिखाकर लोगों का भयादोहन किया जाता है. धीरे-धीरे जब उनका असर कम होता है, तब यह तबका किसी नए प्रतीक को गढ़ने के लिए आगे बढ़ जाता है.'

महज कुछ साल पहले तक शनिदेव की छवि एक ऐसे देवता की थी जिनके न तो क्रोध की कोई सीमा थी और न ही कृपा का कोई पारावार. आमतौर पर भक्त उनके कोप से बचने की कोशिश में ही रहते थे. लेकिन हाल के कुछ वर्षो में टीवी और नए-नए बाबाओं के प्रचार-प्रसार ने इनकी लोकप्रियता को एकदम से आसमान पर पहुंचा दिया. महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर में शनिदेव का सबसे विशाल मंदिर है. एक आंकड़े के मुताबिक बीते पांच सालों के दौरान शिंगणापुर में शनिदर्शन के लिए आने वाले भक्तों की संख्या और चढ़ावे ने यहां से थोड़ी ही दूर पर स्थित शिरडी के सांईबाबा की महिमा को भी फीका कर डाला है. एसी नेल्सन के एक सर्वे के मुताबिक शनिदेव ने देवताओं की लोकप्रियता सूची के सभी पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है. वे बाकी तमाम देवी-देवताओं के साथ ही साईंबाबा और भैरवनाथ जैसे भक्तप्रिय अाराध्यों को काफी पीछे छोड़ चुके हैं. जहां परंपरागत देवी देवताओं की भक्ति के पीछे भक्तों की श्रद्धा काम कर रही होती है वहीं शनि भक्ति की लहर आने की मुख्य वजह है उनके प्रकोप से खुद को बचाने की मुराद और साथ ही उनकी कृपा से खुद को धनधान्य से भरपूर बनाने की लालसा. वरिष्ठ समाजशास्त्री डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘शनि मूलत: संकट के प्रतीक रहे हैं और इस संकट का निवारण भी उन्हीं की शरण में होने का प्रावधान है. और बीते दो दशकों के दौरान हमारे सामाजिक जीवन में जिस तरह से भौतिक आसक्ति बढ़ी है उससे लोगों की इच्छाएं भी बहुत बढ़ गईं. इस बढ़ी हुई लालसा से पैदा हुए संकट को दूर करने के लिए लोग शनि, भैरव आदि की शरण लेना कहीं ज्यादा मुफीद समझते हैं.' लोग शनिदेव के दर्शन तो करने जाते हैं पर उनसे नजरें चुराते हुए. शनिभक्ति की लहर शिंगणापुर से निकलकर भोपाल-दिल्ली के गलीकूचों तक फैल गई है. समय ने शनिदेव के पक्ष में पलटी खाई है और पिछले चार-पांच सालों के दौरान भोपाल में कदम-कदम पर शिंगणापुर वाले शनिदेव प्रकट हो गए हैं. हर नुक्कड़-बस्ती में उनके मंदिर दिख जाते हैं और शनिदेव की आस्था की लहर में हजारों एकड़ जमीन तमाम नियम कानूनों को धता बताकर शनिदेव को समर्पित हो गई है.

आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले धर्मालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक छूने लगीअगर इस तथ्य पर सावधानी से निगाह डालें तो हम पाएंगे कि शनिदेव की लोकप्रियता का आंकड़ा पिछले चार-पांच सालों के दौरान गगनगामी हुआ है. इस तथ्य के साथ एक और सच्चाई ये भी जुड़ी है कि लगभग इसी समयांतराल के बीच हमारे देश में टेलीविजन मीडिया का विस्तार भी बहुत तेजी से हुआ है. टीवी के इस विस्तार के साथ दाती मदन महाराज, आसाराम बापू, स्वामी रामदेव जैसे धर्म गुरुओं और संतों की पहुंच भी घर-घर में बढ़ी है. शनिदेव की बढ़ती लोकप्रियता में सबसे बड़ा योगदान हिंदी के एक बड़े 'समाचार' चैनल इंडिया टीवी और शनिदेव के परमभक्त दाती मदन महाराज का है. दाती महाराज शनिदेव की लोकप्रियता को अलग कोण से देखते हैं, ‘शनि शत्रु है, अमंगलकारी है, दुखदायी है, ये सब भ्रांतियां थी. अब समाज से भ्रम और भ्रांति का पर्दा उठा है तो लोगों को सच्चाई का अहसास हो गया है. मैं तो साधनमात्र था. टेलीविज़न ने मुझे आपसे जुड़ने का सुअवसर मुहैया कराया तो चुनौती थोड़ी आसान हो गई.'

डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे टीवी इवेंजलिस्म की संज्ञा देते हैं जिसकी शुरुआत अमेरिका में हुई थी. उनका मत है, ‘जिस भी समाज में टीवी का विस्तार हुआ वहां धार्मिकता का प्रसार बहुत तेजी से हुआ है. अमेरिका में अकेले ईसाइयत के अलग-अलग पंथों के कम से कम पचास धार्मिक चैनल हैं. भारत में भी टीवी के विस्तार ने इस दुर्गुण को अपना लिया है. चैनलों और नए-नए बाबाओं के गठजोड़ ने धार्मिकता को बढ़ाया है और लोगों को उसके मूल उद्देश्य से भटका दिया है.'

समय-समय पर देश के लोकप्रिय माध्यमों ने भी देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा के संतुलन को निर्धारित करने में अहम भूमिका निभाई है. मसलन 70 के दशक में आई बहुचर्चित और सिनेमा की कमाई के आंकड़े की नई इबारत लिखने वाली फिल्म जय संतोषी मां ने घर-घर में उनकी प्राण प्रतिष्ठा की थी. हर शुक्रवार को संतोषी माता की व्रत कथा की लहर पूरे देश में उमड़ पड़ी थी. संतोषीमाता का अभ्युदय एक निम्न मध्यवर्गीय परिघटना थी. गणेश की पुत्री मानी जाने वाली संतोषी माता धन और सुख-समृद्धि की देवी के रूप में प्रतिष्ठित हो गई थी. जाहिर-सी बात है जिस तबके को इन साधनों की सबसे अधिक इच्छा थी उन्हीं के बीच संतोषी माता की भक्ति का सागर उमड़ रहा था. कुछ ऐसी ही स्थितियां 80 के दशक में आई राजेश खन्ना की फिल्म अवतार और गुलशन कुमार के मातारानी के भजनों ने माता वैष्णो देवी के लिए पैदा की थीं. आजादी के तकरीबन 30 साल बाद तक सामान्य तीर्थस्थल रही वैष्णो देवी की गुफा रातोंरात सर्वदुखहर्ता तीर्थ के रूप में विख्यात हो गई. देखते ही देखते यहां पहुंचने वाले धर्मालुओं की संख्या एक साल में 10-10 लाख तक छूने लगी.
आस्था का यह ज्वार अभी थमा नहीं है, हां कालांतर में इसमें एक और आयाम जुड़ गया - भैरवनाथ. फिर कथा चली कि भैरवनाथ का दर्शन किए बिना वैष्णो देवी की यात्रा अधूरी मानी जाती है. भैरवनाथ का प्रसिद्ध मंदिर भी वैष्णो देवी की गुफा से कुछ दूरी पर ही स्थित है.

फिलहाल यही भैरवनाथ शीर्ष गति से बढ़ रहे चार देवताओं में शामिल हो गए हैं. पौराणिक कथाओं के मुताबिक भैरवनाथ एक तांत्रिक थे जिन्होंने वैष्णो देवी का पीछा करते हुए उस मार्ग की खोज की थी जिसके जरिए आज 13 किलोमीटर लंबी वैष्णो देवी की यात्रा संचालित होती है. कथा यह थी कि वैष्णो देवी ने भैरवनाथ का वध करने के साथ ही उन्हें माफ कर दिया था और उन्हें विद्वान की संज्ञा देते हुए अपने जितना ही पूजनीय होने का आशीर्वाद दिया था. शिव के परम भक्त भैरवनाथ का प्रभाव दो दशक पहले तक देश के विस्तृत मैदानी इलाकों की बजाय हिमालय की पहाड़ियों तक ज्यादा था. अल्मोड़ा में काल भैरव, बटुक भैरव, भाल भैरव, शैव भैरव, आनंद भैरव, गौर भैरव और खटकूनियां नाम के आठ प्राचीन भैरव मंदिरों का अस्तित्व रहा है और लोगों के पास इनकी महिमा की अनगिनत दंतकथाएं भी बताने को हैं. लेकिन वैष्णो देवी के प्रसार के साथ ही भैरवनाथ का दायरा भी दुर्गम पहाड़ियों से निकल कर समतल मैदानों में फैल गया. दिल्ली में पुराने किले के पास स्थित मशहूर भैरव मंदिर है जहां चढ़ावे के रूप में शराब चढ़ाने की परंपरा है. इतना ही प्रसिद्ध और भीड़भाड़ से भरा और खुद को पांडव कालीन बताने वाला भैरव मंदिर दिल्ली के वीआईपी इलाके चाणक्यपुरी में भी स्थित है. यह अलग बात है कि भक्तों को इसका ज्ञान महज़ दशक भर पहले हुआ है. इस मंदिर से जुड़ी एक दिलचस्प दास्तान वहां पिछले दस सालों से बिना नागा दर्शन करने आने वाली एक भक्त सरोज शर्मा सुनाती हैं- ‘दस साल पहले तक यहां इक्का दुक्का ही कभी कोई दर्शन के लिए आता था. हम यहां आते थे और घंटों तक शांति से बैठ कर ध्यान-मग्न रहते थे. मंदिर के पुजारी अक्सर बातचीत के दौरान निराश होकर कहा करते थे, 'बहनजी क्या कभी हमारे मंदिर में भी पुराने किले वाले भैरव बाबा के जैसी रौनक होगी?' आखिर भैरव बाबा ने उनकी सुनी और आजकल चाणक्यपुरी का भैरव मंदिर हर रविवार वैसे ही गुलजार रहता है जैसे पुराने किले के पीछे वाले किलकारी भैरव महाराज.
लखनऊ के अमीनाबाद में स्थित बटुक भैरव मंदिर भी खुद के प्राचीन होने का दावा करता है. मगर यहां के महंत श्याम किशोर गिरि नितांत व्यावहारिक नजरिया रखते हैं- ‘मंदिर तो करीब सात सदी पुराना है लेकिन यहां लोगों की विशाल भीड़ पिछले सात-आठ सालों से आनी शुरू हुई है. यहां पंद्रह आने दुखी लोग आते हैं और सिर्फ एक आना भक्त आते हैं.'

सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा में भी भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा आज तक किसी को पता नहीं चल सकी है
भैरवनाथ की श्रद्धा के पीछे भी वही मानसिकता देखने को मिलती हैं जो कि शनिदेव के भक्तों की है. दंतकथा के मुताबिक अपने जीवन काल में भैरवनाथ एक अड़ियल गुस्सैल सिद्ध तांत्रिक थे. उन्होंने वैष्णो देवी को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ रखी थी. लेकिन लगे हाथ भैरवनाथ उतने ही पहुंचे हुए ज्ञानी भी थे. तमाम काली सिद्धियों पर उनका एकाधिकार था और उनके अनुयायियों पर कोई कुदृष्टि कभी हावी नहीं होने पाती थी. भैरवनाथ की आस्था और प्रभाव का एक जीता-जागता नमूना हाल ही में कश्मीर घाटी में देखने को मिला जहां सालों पहले पलायन कर गए हिंदुओं के बंद पड़े भैरव मंदिर को वहां के मुसलमानों ने दोबारा से खुलवाकर उन्हें कश्मीरी पंडितों के हवाले कर दिया.

कुछ साल पहले तक साईंबाबा का जिक्र आते ही लोग सीधे शिरडी का ध्यान करते थे. शिरडी में स्थित साईमंदिर की महिमा के तमाम किस्से सुनने-सुनाने को मिल जाते हैं. साईंबाबा काफी कुछ भारत में सदियों से चली आ रही रमता जोगी और बहता पानी वाली पंरपरा की ही एक कड़ी थे. फक्कड़पना उनके स्वभाव में था, संतई और ईमानदारी उनके चरित्र के गुण थे और लोगों को सत्संगत की सीख देना उनकी विशेषता थी. इस परंपरा से जुड़ी तमाम दूसरी दास्तानंे भी देश के अन्य हिस्सों में देखने सुनने को मिल जाती हैं मसलन कबीर या फिर देश भर में जगह-जगह फैली पीरों की दरगाह और मजारें. समय बीतने के साथ किस तरह से इनके दामन से चमत्कारवाद जुड़ जाता है यह बात किसी पीएचडी छात्र के लिए शोध का बढ़िया विषय हो सकती है. पहले इस परंपरा के साथ एक सुंदर प्रवृत्ति का घालमेल भी देखने को मिलता था जिसे सही मायनों में गंगा जमुनी तहजीब कहा जा सकता था - इनके भक्तों में हिंदू-मुस्लिम और सिख सभी शामिल होते थे - पर हाल के दशकों में इस प्रवृत्ति का लोप हुआ है. कुछेक दशकों के दौरान देश भर में अस्सी हजार के करीब साईं मंदिर अस्तित्व में आ गए हैं जहां करोड़ों रुपए चढ़ावा आता है. दिल्ली स्थित मशहूर इस्कॉन मंदिर के ठीक सामने साई बाबा का नया मंदिर बना है. सुबह-शाम आरती होती है और महीने में दो दिन साईं बाबा की गाजे-बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है. देश के दूसरे हिस्सों में फैलाव के साथ-साथ इसकी पूजा पद्धतियों में भी धीरे-धीरे भटकाव आता गया है जिसके साथ ही शिरडी और देश के दूसरे हिस्सों में बने साईं मंदिरो में मुसलमानों की भागीदारी भी धीरे-धीरे खत्म हो गई है. उनकी पूजा-अर्चना का पूरी तरह से हिंदूकरण हो गया है, पौराणिक हिंदू देवी देवताओं की भांति ही फूल-माला, धूप-बत्ती से सराबोर साईं मंदिर अपने मूल स्वरूप से ही भटक गए से लगते हैं. शिरडी साईं संस्थानम ट्रस्ट के चेयरमैन जयंत ससाने मुसलमानों की साईं से दूरी की बात स्वीकार करते हैं लेकिन उनके पास इसकी वजह भी बताने को है- ‘मुसलमान साईं से इसलिए दूर हुए हैं क्योंकि उन्हें साईं की मूर्ति से परेशानी होती है. यह इस्लाम की मूल धारणा के खिलाफ है. इसके चलते साईं भक्तों में मुस्लिमों की संख्या घटी है.' साईं संस्थान ट्रस्ट ने इस संकट को देखते हुए अपनी वेबसाइट पर देश के दूसरे हिस्सों में स्थित साईं मंदिरों के पुजारियों के लिए एक 15 दिन के ट्रेनिंग कार्यक्रम की व्यवस्था की है. शिरडी स्थित साईं धाम में इन लोगों के प्रशिक्षण का इंतजाम किया गया है ताकि पूजा-पद्धति में आते जा रहे भटकाव को रोका जा सके. जिस पथ के पुजारी साईं बाबा थे उसी की अगली कड़ी के तौर पर हम देश भर में प्रचलित दरगाहों-मजारों को रख सकते हैं. देश का कोई भी इलाका नहीं होगा जहां दरगाहों मजारों पर शीश नवाने वाले हिंदू श्रद्धालु न हों.

अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, नई दिल्ली की हजरत निजामुद्दीन ऑलिया और फतेहपुर सीकरी की शेख सलीम चिश्ती की दरगाह जैसी मिसालों को छोड़ दिया जाए तो काफी दरगाहों और मजारों पर शीश नवाने वाले जियारतमंदों को उनके अतीत के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं होता है. सत्यनारायण भगवान की कथा की तरह ही मजारों की प्रतिष्ठा भी कायम है जिसमें भक्त के कायाकल्प का गुणगान तो पन्ना दर पन्ना होता है पर मूलकथा किसी को पता नहीं होती. लखनऊ के खम्मन पीर दरगाह में मन्नत मांगने आए मोहित मिश्रा से जब तहलका ने दरगाह की महिमा और खम्मन पीर की श्रद्धा के बारे में जानने की कोशिश की तो एक रोचक कारण सामने आया. मोहित ने बताया, ‘जब आपके काम नहीं बन रहे होते हैं तब आप मजहब की सीमाओं को पार कर जाते हैं.'

काफी हद तक वाचिक परंपरा या किस्सागोई की आदत की तरह महिमा की कहानियां पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती हैं. स्वाभाविक है व्यक्ति दर व्यक्ति कहानियां परिष्कृत होती जाती हैं और समयातंर में एक बिल्कुल नई कहानी सामने आती है जिसमें चमत्कार, भय, आस्था, अपूर्ण इच्छा जैसे नवरसों का मिश्रण होता है.

किस तरह से कोई मजार समय के साथ सर्वशक्तिसंपन्न और हर ख्वाहिश को पूरी करने वाली पीठ बन जाती है इसकी एक दिलचस्प बानगी भगवानदास मोरवाल के उपन्यास रेत में है. एक वेश्या रतना जो कि उपन्यास की नायिका भी है, को एक बच्चे की लंबे समय से चाह है. एक दिन पुलिस से भागा हुआ भूरा उसके पास आता है जिसके संसर्ग में आने से रतना की यह मुराद पूरी हो जाती है. शराबी भूरा के देहांत के बाद रतना उसकी पक्की कब्र बनवा देती हैै. दो साल बाद कोई शरारतन कब्र के ऊपर 'भूरा पीर की मजार' लिख देता है और कुछ ही दिनों में वहां संतान की इच्छा रखने वाले जोड़े मन्नतें मांगने के लिए आने लग जाते हैं. इस कब्र पर जो बोर्ड लगा होता है उपन्यास में उसका जिक्र भी बड़ा दिलचस्प है.

दरगाह-ए -बाबा भूरा पीर.
सालाना उर्स- रबीउल अव्वल (जून की 25 तारीख)
भंडारा- हर महीने के अंतिम दिन
खादिम - मोहम्मद अमीन
‘यहां मर्द और औरत दोनों का शर्तिया इलाज होता है'
खुद मोरवाल के शब्दों में, 'उपन्यास का यह दृष्टांत मेरे निजी अनुभव पर आधारित है. जब मैं लिखने के सिलसिले में उस इलाके में शोध कर रहा था तब मुझे इस घटना के बारे में पता चला. मैंने जाकर देखा तो वहां उस मजार पर अगरबत्तियां जल रही थीं.'
स्वामी अग्निवेश धर्म के इस विकृत स्वरूप के विस्तार के लिए समाज में आते जा रहे दुर्गुणों की बात करते हैं. उनके शब्दों में, ‘धर्म के प्रति अंध रुझान की जड़ें वर्तमान समाज में बढ़ते जा रहे भ्रष्टाचार, गंदगी और अनैतिक क्रिया कलापों से जुड़ी हुई हैं. जब समाज गलत चीजों में लगा होगा तो स्वाभाविक है कि उसके अंदर एक तरह का भय, असुरक्षा और ग्लानिबोध रहता है. इस ग्लानिबोध से मुक्ति पाने के लिए व्यक्ति धर्म के चमत्कारिक पहलू की ओर झुकता चला जाता है.'

देखते ही देखते अनजानी मजारों और दरगाहों के साथ लोग दैवीय शक्तियों से परिपूर्ण, हर कामना की पूर्ति करने वाली, संतानहीनों को संतान और बेटी वालों को बेटे देने वाली जैसे विशेषण जोड़ते चले जाते हैं. एटा में सय्यद वाली गली के पीर से लेकर लखनऊ में लबे चारबाग रेलवे स्टेशन स्थित खम्मन पीर बाबा की मजार, दिल्ली में पुराने किले के पास दरगाह-ए-अबू बकर तूसी उर्फ मटके वाले पीर की दरगाह और हरियाणा के मलेरकोटला वाले पीर के आश्रम तक पूरे देश में दरगाहों की ऐसी ही एक अनवरत श्रृंखला देखी जा सकती है.
नई दिल्ली के प्रगति मैदान के पास स्थित मटके वाले पीर की दरगाह पर सालों से मटका चढ़ाने के लिए चांदनी चौक से यहां आने वाले साड़ियों के व्यापारी ईश्वरचंद गुप्ता को पीर के इतिहास के बारे में ज्यादा कुछ नहीं पता है. पूछने पर वे बस इतना ही बता पाते हैं कि किसी ने उनसे यहां मन्नत मानने के लिए कहा था. संयोग से उनकी मन्नत पूरी हो गई और गुप्ता जी की श्रद्धा भी अटल हो गई. उनके मुताबिक, ‘अपने तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं की पूजा तो हम बचपन से ही करते चले आ रहे थे. इसके बाद भी हमारी मुश्किलें जब दूर नहीं हो रही थीं तो फिर पीर की मजार को आजमाने में क्या बुराई थी. मेरे तमाम परिचितों को यहां मुंहमांगी मुराद मिल चुकी है.'
साधकों की इस प्रकार की निष्ठा के पीछे विशिष्ट भूमिका होती है अंधश्रद्धा और तर्कवितर्क की क्षमता के अभाव की. पर इसकी अच्छाई की बात करें तो इन दरगाहों-मजारों पर शीश नवाने वालों में हिंदू-मुसलमान समान संख्या में होते हैं जो मौजूदा संवेदनशील, अस्थिर भारतीय समाज के नजरिए से एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है. यह अलग बात है कि एक बृहस्पतिवार को दरगाहों पर एक साथ सिर झुकाने वाले अगले शुक्रवार और मंगलवार को ही किसी मौलाना की तकरीर और पंडित के प्रवचन को गांठ बांधकर एक दूसरे को ललकारने से नहीं हिचकते.

अवध और लखनऊ के इतिहास की गहरी समझ रखने वाले डॉ योगेश प्रवीण इस चलन को दो स्पष्ट हिस्सों में बांटकर देखते हैं- ‘भक्त जब मंदिर-मस्जिद में जाता है तब उसके मन में श्रद्धा का भाव होता है जबकि वही भक्त जब किसी मजार पर जाता है तो उसके मन में कोई न कोई मुराद होती है.' इन मजारों में भी मस्ती, सूफियाना फक्कड़पन जैसी शानदार हिंदुस्तानी परंपरा धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है. लोग धर्म के कट्टरवादी स्वरूप की तरफ जाने-अनजाने बढ़े जा रहे हैं.

डॉ पुरुषोत्तम अग्रवाल इसे धार्मिक समूहों की मन:स्थिति में व्याप्त आत्मविश्वास की कमी से जोड़कर देखते हैं, ‘मस्ती और फक्कड़पना जो कबीर की विशेषता थी, असल में समाज के आत्मविश्वास से जुड़ी हुई चीज है. जब समाज में आत्मविश्वास की कमी होती है, असुरक्षा की भावना बढ़ती है तब वह इन चीजों से विमुख होकर कट्टरता, चमत्कार, अवतारवाद जैसी चीजों की तरफ चला जाता है. यह बात आज समाज के हर पहलू से जुड़ गई है चाहे वो पढ़ाई-लिखाई हो, रोजी रोटी हो नौकरी हो या फिर कुछ और.'

अच्छाइयों और बुराइयों की तुलना से इतर एक जरूरी प्रश्न यह उठता है कि यदि वास्तव में धर्म का स्वरूप समय सापेक्ष और परिवर्तनीय ही है तो आने वाले समय में भारत में इसका नया स्वरूप क्या उभरेगा? यह कबीर, कंबन, तुलसी, अकबर, विवेकानंद और गांधी के विचारों का सुंदर मिश्रण बनकर उभरेगा या तालिबानी तर्ज का कट्टरवादी प्रतीक या फिर आधुनिकता से ओत-प्रोत पूरी तरह अमेरिकी-यूरोपीय समाज की शक्ल ले लेगा?

वैसे तो संसार का कोई भी समाज या धर्म कभी भी इतना स्वाभाविक और व्यावहारिक नहीं रहा कि किसी समय में उसके नियम और परंपराएं हर किसी को स्वीकार्य रहे हों. हर समय के बीत जाने के बाद ही उसकी ठीक आलोचना की जा सकती है. बस देखना यह है कि भविष्य में हम आध्यात्मिक शांति के लिए ईश्वर की शरण में जाएंगे या बस मुरादें मांगने?

(हिमांशु बाजपेयी के योगदान के साथ)

मंगलवार, 8 जून 2010

25 साल के आंसूओं की कीमत 25 हजार

भोपाल गैस त्रासदी के 25 साल बाद जो फैसला आया है उसने ना कितनी उम्मीदों को मौत दे दी है। 25 साल तक न्याय की आस में अपनो को खो जाने का दर्द समटे लोगों की आंखों के आंसूओं का मोल लगा महज 25 हजार। ये भारतीय न्याय प्रणाली। ये नरसंहार के लिए मिलने बाले दंड का स्वरूप अचानक ही दुर्घटना में बदल गया।
यूनियन कार्बाईड के डॉव केमिकल के कारखाने से निकली जानलेवा गैस ने पांच लाख से अधिक लोगों को अपनी जद में लिया और बीस हजार से ज्यादा काल कलवित हो गए थे। लेकिन इस त्रासदी के छब्बीसवें साल में जब निचली अदालत ने अपना फैसला सुनाया तो फैसला गैस त्रासदी से बड़ी त्रासदी साबित हो रही रही है.
यह त्रासदी भारतीय न्याय व्यवस्था और प्रशासन के नाकामी की है जो यह साबित करती है कि भारत में पूंजी के बल पर कुछ भी किया जा सकता है. आम आदमी के वोट से बनी सरकारें तो आम आदमी के खिलाफ काम करती ही हैं लेकिन न्याय प्रणाली भी कई बार आम आदमी के हक और हित की बजाय प्रभावी लोगों के गिरफ्त में फंसकर रह जाती है.
इस त्रासदी के उपरांत आज भी प्रभावित इलाके में भूजल बुरी तरह प्रदूषित है, इससे प्रभावित लोगों की आने वाली पीढियां बिना किसी जुर्म की सजा शारीरिक और मानसिक तौर पर भुगत रहीं हैं। विडम्बना तो यह है कि हजारों को असमय ही मौत की नींद सुलाने वाले दोषियों को 25 साल बाद महज दो दो साल की सजा मिली और तो और उन्हें जमानत भी तत्काल ही मिल गई। हमारे विचार से तो इस मुकदमे की सजा इतनी होनी चाहिए थी, कि यह दुनिया भर में इस तरह के मामलों के लिए एक नजीर पेश करती, वस्तुत: एसा हुआ नहीं। देश के कानून मंत्री वीरप्पा मोईली खुद भी लाचार होकर यह स्वीकार कर रहे हैं कि इस मामले में न्याय नहीं मिल सका है। फैसले में हुई देरी को वे दुर्भाग्यपूर्ण करार दे रहे हैं। दरअसल मोईली से ही यह प्रतिप्रश्न किए जाने की आवश्यक्ता है कि उन्होंने या उनके पहले रहे कानून मंत्रियों ने इस मामले में पीडितों को न्याय दिलवाने में क्या भूमिका निभाई है।
विश्व के इस सबसे बडे औद्योगिक हादसे का फैसला इस तरह का आया मानो किसी आम सडक या रेल दुर्घटना का फैसला सुनाया जा रहा हो। इस मामले में प्रमुख दोषी यूनियन कार्बाईड के तत्कालीन सर्वेसर्वा वारेन एंडरसन के बारे में एक शब्द भी न लिखा जाना निश्चित तौर पर आश्चर्यजनक ही माना जाएगा। यह सब तब हुआ जब इस घटना के घटने के महज तीन दिन बाद ही मामले को सीबीआई के हवाले कर दिया गया हो। सीबीआई पर लोगों का विश्वास आज भी कायम है। इस जांच एजेंसी के बारे में लोगों का मानना है कि यह भले ही सरकार के दबाव में काम करे पर इसमें पारदर्शिता कुछ हद तक तो होती है। इस फैसले के बाद से लोगों का भरोसा सीबीआई से उठना स्वाभाविक ही है। इस पूरे मामले ने भारत के ''तंत्र'' को ही बेनकाब कर दिया है। क्या कार्यपलिका, क्या न्यायपालिक और क्या विधायिका। हालात देखकर यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि प्रजातंत्र के ये तीनों स्तंभ सिर्फ और सिर्फ बलशाली, बाहुबली, धनबली विशेष तबके की ''लौंडी'' बनकर रह गए हैं।
सीबीआई ने तीन साल तक लंबी छानबीन की और आरोप पत्र दायर किया था। इसके बाद आरोपियों ने उच्च न्यायालय के दरवाजे खटखटाए थे। उच्च न्यायालय ने इनकी अपील को खारिज कर दिया था। इसके बाद आरोपी सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गए और वहां से उन्होंने आरोप पत्र को अपने मुताबिक कमजोर करवाने में सफलता हासिल की। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सीबीआई इतनी कमजोर हो गई थी, कि उसने इस मामले की गंभीरता को न्यायालय के सामने नहीं रखा, या रखा भी तो पूरे मन से नहीं रख पाई। कारण चाहे जो भी रहे हों पर पीडितों के हाथ तो कुछ नहीं लगा।
आखिर क्या वजह थी कि एंडरसन को गिरफ्तार करने के बाद उसे गेस्ट हाउस में रखा गया। इसके बाद जब उसे जमानत मिली तो उसे विशेष विमान से भारत से भागने दिया गया। जब उसे 01 फरवरी 1992 को भगोडा घोषित कर दिया गया था, तब उसके प्रत्यापर्ण के लिए भारत सरकार द्वारा गंभीरता से प्रयास क्यों नहीं किए गए! 2004 में अमेरिका ने उसके प्रत्यापर्ण की अपील ठुकरा दी गई तो भारत सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई।
अगर यह हादसा अमेरिका में घटा होता तो डाव केमिकल और यूनियन कार्बाईड का नामोनिशान मिटने के साथ ही साथ अनेक बीमा कंपनियों के दिवाले निकल चुके होते। यही हादसा अगर दिल्ली में हुआ होता तो इसकी सूरत कुछ और होती। सवाल यह उठता है कि जब दिल्ली में उपहार सिनेमा में हुए हादसे के पीडितों को 15 से बीस लाख रूपए का मुआवजा मिल सकता है तो भोपाल गैस कांड के पीडितों को महज 25 - 25 हजार रूपए में क्यों टरका दिया गया।
भोपाल जैसे हृदय विदारक हादसे को अंजाम देने के बाद भी यह कंपनी भारत का मोह नहीं छोड पा रही है। भारत सरकार है कि इस कंपनी को देश में दूसरे हादसे के लिए उपजाउ माहौल भी मुहैया करवा रही है। इस कंपनी ने वियतनाम युद्ध में एक जहरीली गैस बनाकर कहर बरपाया था। अब इस कंपनी के निशाने पर तमिलनाडू, महाराष्ट्र और गुजरात सूबे हैं। इस कंपनी के प्रत्यक्ष और परोक्ष तौर पर अहसानों से दबे ही हैं केंद्र और सूबों के मंत्री, तभी तो ये डाव केमिकल की तारीफ में कशीदे गढने से नहीं चूकते। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने स्वयं ही भोपाल में कंपनी के बंद पडे संयंत्र में जहरीले कचरे को छूकर कंपनी को सीधे तौर पर मदद करने का कुत्सित प्रयास किया था। इस कंपनी का महाराष्ट्र में मुंबई गोवा राजमार्ग पर एक संयंत्र आरंभ हो चुका है, जिसमें कीटनाशक बनता है।
लेकिन विडम्बना देखिए महज 25 हजार के जुर्माने औऱ दो साल की कैद ये सज़ा है मौत के सौदागरों की। साल दर साल जाने कितनी लड़ाईयों के बाद पीडितों का ये सपना टूट गया है। 25 साल से जहरीली गैस से प्रभावित लोगों की नरक यात्रा आज भी उनकी पीढ़ी झेल रही है। ऐसे में इस फैसले ने त्रासदी के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे लोगों को जीते जी ही मार डाला है। मामले में मुख्य अभियुक्त वॉरेन एंडरसन आज भी फरार दुनिया के पापा ने उसे भारत को सौपने से इंकार कर दिया है। एक तरफ इस तथाकथित वैश्विक पापा की एक हुंकार पर बाकी के सारे देशों की पेट गीली होने की नौबत तक आ जाती है ऐसे मैं कभी यह अपराधी सज़ा पा सकेगा इस बात पर भी नचिकेता प्रश्न लगा हुआ है क्या हम कभी इतने शक्तिशाली हो पायेगें कि इस वैश्विक पापा के सामने सीना तान के वारेन नामक इस अपराधी को समर्पण के लिए कह सके ना जाने कब ये समय आयेगा आयेगा या नहीं भी कोई नहीं जानता है।

यूनियन कार्बाइड़ कार्पोरेशन लिमिटेड़ की स्थापना से लेकर,गैस रिसाव और उसके बाद इस मामले की सुनवाई से लेकर फैसले के दिन तक हर बार लोगों की भावनाओं और उनके विश्वास को छला गया है और इस फैसले ने तो अब हमारे वैश्विक पप्पा के लिए एक दरवाजा औऱ खोल दिया है जाहिर सी बात है जब हमारे देश न ही हमारे लोगों को छला तो फिर अमेरिका क्यों चाहेगा इस मामले को आगे बढ़ाने सरकार है पूरी तरह से जिम्मेदार 25 साल के इस लंबे समय का सबसे कारण सरकार औरयूनियन कार्बाइड कंपनी के बीच 1989 को हुए एक समझौता है इसके तहत कंपनी को दिसंबर 1984 की गैस त्रासदी से जुड़े सभी आपराधिक और नागरिक उत्तरदायित्वों से मुक्त कर दिया गया था।

अदालत ने आठ में से सात दोषियों को दो-दो साल की सजा सुनाई है और प्रत्येक पर 1,01,750 रुपये का जुर्माना लगाया जबकि इस मामले में दोषी करार दी गई कंपनी यूनियन कार्बाइड इंडिया पर 5,01,750 रुपये का जुर्माना लगाया गया। त्रासदी के बाद के शुरूआती वर्षो में सरकार ने कंपनी और उसकी अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कार्पोरेशन पर आपराधिक मामले दर्ज करने की बजाए उसके साथ करार कर उसे हर तरह के उत्तरदायित्व से मुक्त करदिया। भोपाल गैस ट्रेजडी विक्टिम्स एसोसिएशनÓ के अनुसार 14-15 फरवरी 1989 को हुए इस करार के तहत यूनियन कार्बाइड के भारत और विदेशी अधिकारियों को 47 करोड़ डॉलर की एवज में हर प्रकार के नागरिक और आपराधिक उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया गया। इस करार में कहा गया कि कंपनी के खिलाफ सभी आपराधिक मामले खत्म करने के साथ-साथ सरकार इस त्रासदी के कारण भविष्य में होने वाली किसी भी खामी मसलन से उसके अधिकारियों की हर प्रकार के नागरिक और कानूनी उत्तरदायित्व से हिफाजत भी करेगी।जिसे सर्वोच्च न्यायालय अक्टूबर1991 में आंशिक रूप से खारिज कर दिया था।
मामला सिर्फ भोपाल गैस त्रासदी का ही नहीं है। सच्चाई तो ये है कि ऐसे सभी असाधारण मसलों से निपटने में भारतीय संविधान और भारतीय दंड संहिता की बाबा-आदम के जमाने की धाराएं, प्रावधान नाकाफी हैं। फिर चाहे वो भोपाल गैस त्रासदी हो या फिर देश पर हमला करने वाले अफजल गुरु की या कसाब की फांसी हो। एक जमाने में संघ परिवार और उनके अनुषांगिक संगठनों ने ऐसे ही असाधारण मामलों पर संविधान में बदलाव की बात बड़े जोर-शोर से उठाई थी लेकिन, पता नहीं क्यों जब बीजेपी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार आई तो, कोई ठोस फैसला नहीं लिया जा सका। शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े विचार परिवार की ये बड़ी कमी साबित हुई है कि वो अच्छे मुद्दों को भी उठाकर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते। जिसकी वजह से उस विशेष मुद्दे की वजह से संघ परिवार से जुडऩे वाले लोग फिर उसकी बातों से सहमत होते हुए भी उससे जुडऩे में मुश्किल महसूस करते हैं।

शुक्रवार, 4 जून 2010

आईएएस के लिए जुगाड़ डॉट कॉम

मध्यप्रदेश में एक बार फिर से गैर प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में चयन के लिए पिछले तीन वर्षों से जारी कवायद इस बार फिर तेज हो गई है। विगत दो वर्षों की भांति इस बार भी अधिकारी अपनी योग्यता नहीं बल्कि जुगाड़ के बल पर इस सर्वोच्च प्रशासनिक पद को पाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। हालांकि इनमें से कुछ अधिकारी तो ऐसे हैं, जो वर्षों से आईएएस बनने की जुगत भिड़ा रहे हैं, लेकिन दांव नहीं लग पा रहा है। सूत्रों के मुताबिक कुछ विभाग तो ऐसे हैं जो निर्धारित समय सीमा में एक भी नाम नहीं भेज पाए तो कुछ इक्का-दुक्का नाम ही ढूंढ पाएं हैं।
गत तीन वर्षों से आईएएस चयन की प्रक्रिया किसी न किसी कारण से नहीं हो पाने के कारण मध्यप्रदेश कैडर राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम हो गया है। सूत्र बताते हैं कि पिछली बार चयन की प्रक्रिया में करोड़ों रुपए के लेन-देन की बात सामने आने से राज्य सरकार और मप्र कैडर की जो बदनामी हुई थी उससे इस बार भी पीछा छूटता नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि जिन दागदार लोगों की शिकायत पिछले वर्ष कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं, गैर प्रशासनिक सेवा संगठन और आईएएस के दावेदारों ने की थी वे इस बार भी आईएएस बनने की सूची में शामिल किए गए हैं। जिससे अभी से अनुमान लगाया जाने लगा है कि अगर यही स्थिति रही तो चौथी बार भी आईएएस चयन की प्रक्रिया बाधित हो सकती है।
उधर आईएएस चयन कवायद शुरू होने के साथ ही गैर प्रशासनीक सेवा के अधिकारी जहां मुस्तैदी के साथ फिल्डिंग में जुटते नजर आए वहीं राज्य में अन्य विभागों से आईएएस में चयन के लिए कई विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों ने रूचि नहीं दिखाई है। आलम यह रहा कि अंतिम तिथि समाप्त होने तक केवल 30 अधिकारियों ने ही आवेदन पत्र जमा कराए थे, जबकि सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी सरकारी विभागों से पांच-पांच अधिकारियों के नाम आईएएस के लिए मंगवाए थे। उसके बाद 10 और नाम सामान्य प्रशासन विभाग को पहुंचे। यानी कुल 40 नाम इस बार आईएएस चयन के लिए सूची में शामिल किए गए है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जो नाम सामान्य प्रशासन विभाग के पास पहुंचे हैं उनमें जेल विभाग से एक, महिला एवं बाल विकास विभाग से तीन, नगरीय प्रशासन विभाग से 2 वित्त विभाग से पांच, उद्योग से पांच साथ ही जनसंपर्क और वाणिज्यिककर विभाग के अधिकारियों के नाम शामिल है। हालांकि जेल विभाग के सूत्रों का कहना है कि वहां से चार नाम भेजे गए थे लेकिन एक ही नाम को हरी झंडी मिली है। हद तो यह है कि जेल विभाग ने इस बार भी उसी अधिकारी का नाम भेजा है जिसको लेकर पिछली बार जमकर बवाल मचा था। उक्त अधिकारी वित्त मंत्री राघवजी के चहेते हैं। जब इस संबंध में जेल मंत्री जगदीश देवड़ा सेे बात की गई तो उन्होंने बताया कि नियम प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए ही एक नाम भेजा गया है। सामान्य प्रशासन विभाग इनमें से कुल 25 अधिकारियों के नाम छांटेगा और इनके नाम साक्षात्कार के लिए भेजे जाएंगे। चूंकि जीएडी द्वारा अपेक्षित नामों की संख्या कम है इसलिए अटकले लगाई जा रही हैं कि सामान्य प्रशासन विभाग एक बार फिर आवेदन मंगवाने की अंतिम तिथि को बढ़ाने पर विचार कर सकता है। वैसे देखा जाए तो विभिन्न विभागों द्वारा जिन अधिकारियों की सूची सामान्य प्रशासन विभाग को भेजी गई है उनमें से अधिकांश दागदार हैं। सूत्रों के अनुसार पिछली बार जो सूची आईएएस चयन के लिए भेजी गई थी उसमें जेल विभाग के यह अधिकारी सबसे दागदार थे। प्रश्न यह उठता है कि क्या जेल विभाग के पास पांच गैर प्रशासनिक सेवा के ऐसे अधिकारी नहीं है जो आईएएस बनने की पात्रता रखते हों।
उल्लेखनीय है कि गत वर्ष भी यह प्रक्रिया अपने अंतिम चरण तक पहुंच गई थी। मप्र से गैर सिविल सेवा से आईएएस चयन के लिए यूपीएससी को भेजी गई सूची लगातार तीसरे वर्ष भी लेप्स हो गई। इस सूची में 15 नाम शामिल थे। इन नामों को लेकर हुए विवाद के बाद राज्य सरकार ने भी इसमें रूचि नहीं ली थी। मध्यप्रदेश में गैर सिविल सेवा के अधिकारियों में आईएएस चयन को लेकर जबरदस्त खींचतान मची हुई थी। कुल पांच पदों के लिए राज्य सरकार ने सभी विभागों से नाम मंगवाए थे। मुख्य सचिव की अध्यक्षता में बनी एक कमेटी ने लगभग तीन दर्जन अधिकारियों के नामों में 15 नामों का चयन करके यूपीएससी को भेजा था। इन नामों को लेकर भोपाल से दिल्ली तक बवाल मचा रहा। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और कुछ मंत्रियों पर आईएएस चयन में अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के लिए हस्तक्षेप और लाखों रूपए के लेनदेन का आरोप लगाया था। राज्य सरकार ने जिन पन्द्रह अधिकारियों के नाम दिल्ली भेजे थे, वे पिछले कई दिनों से दिल्ली में साक्षात्कार के लिए कॉल लेटर का इंतजार कर रहे थें।
इन अधिकारियों ने अपने अपने कार्यालयों से अवकाश लेकर साक्षात्कार की तैयारियों भी शुरू कर दी थी। लेकिन उन्हें 31 दिसम्बर के बाद सूची स्वत: लेप्स मानी जाती हैं। अब फिर से यह प्रक्रिया प्रारंभ हुई। यहां बता दें कि वर्ष 2007 में मप्र केडर में एक पद था, लेकिन डिप्टी कलेक्टरों के हस्तक्षेप के कारण चयन नहीें हो सका। वर्ष 2008 में दो पदों के राज्य सरकार ने दस अधिकारियों के नाम यूपीएससी को भेजे थे। यूपीएससी ने 19 सितम्बर 2008 को साक्षात्कार रद्द कर दिया। बीते साल भी ऐसा ही हुआ है। इस संबंध में एक अधिकारी का कहना है कि राज्य सरकार ने इसमें रूचि ली होती तो ऐसा नहीं होता। इस बार भी गैर प्रशासनिक सेवा से भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने का अधिकारी का सपना पूरा तब होगा जब राज्य सरकार के आलाअधिकारी सही ढंग से जांच पड़ताल कर नामों को भेजे।
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