सोमवार, 1 जुलाई 2013

मोदी और राजगणित

भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया है. यानी वे 2014 में होने वाले 16वें आम चुनाव में भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी की कमान संभालेंगे. अक्टूबर, 2001 में मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी एक दिन इतने बड़े हो जाएंगे कि उन्हें देश की सबसे बड़ी गद्दी के दावेदार के तौर पर देखा जाएगा. तब तक वे भाजपा के उन नेताओं में हुआ करते थे जो परदे के पीछे रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि यह एक दुर्लभ विशेषाधिकार है जो पार्टी के 33 साल के इतिहास में सिर्फ दो लोगों को मिला है. पहले अटल बिहारी वाजपेयी जो इस दावेदारी के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने में सफल भी हुए और दूसरे लाल कृष्ण आडवाणी, जो उपप्रधानमंत्री रहे और 2009 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने. 33 साल की इस अवधि में भाजपा के कई अध्यक्ष हुए, लेकिन इनमें सिर्फ वाजपेयी और आडवाणी थे जिन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य समझा गया. मोदी इस सूची में तीसरा नाम बन गए हैं. आम चुनाव में अब एक साल से भी कम का वक्त बचा है. इस लिहाज से देखें तो जीत के लिए टीम और रणनीति बनाने या 2002 के गुजरात दंगों के चलते बनी विभाजनकारी नेता की अपनी छवि बदलने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है. पिछले आम चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व के साथ मैदान में उतरी भाजपा को पराजय मिली थी. सवाल उठता है कि क्या मोदी पार्टी को विजय दिला पाएंगे. क्या वे उन मोर्चों पर सफल हो पाएंगे जहां आडवाणी नाकामयाब रहे थे? क्या 2009 के आडवाणी के मुकाबले वोटरों में मोदी का ज्यादा आकर्षण है? क्या भाजपा के मौजूदा या संभावित सहयोगी प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी को स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के समर्थकों और विरोधियों, दोनों में उनकी मुस्लिमविरोधी छवि है. इसके चलते गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के साथ भाजपा की तनातनी हुई. मोदी उन कुछ राजनेताओं में से हैं जिन्हें भारत की बहुलतावादी राजनीति के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है. क्या उनकी मुस्लिम विरोधी छवि भारत की 80 फीसदी हिंदू जनसंख्या में भाजपा के समर्थन का तूफान पैदा कर सकेगी? या फिर इसके चलते भाजपा को एक बार फिर पराजय का सामना करना पड़ेगा? मोदी की एक दूसरी छवि भी है. एक ऐसे नेता की छवि जिसने तेज आर्थिक विकास के बूते अपने राज्य में खुशहाली पैदी की. वे अपनी इस उपलब्धि का जिक्र जमकर करते भी हैं. सवाल उठता है कि गुजरात में सुशासन का मोदी का दावा क्या भारत के 80 करोड़ वोटरों का उतना हिस्सा अपनी तरफ खींच पाएगा जिसके बल पर उनकी पार्टी की सरकार बन सके. 2004 में भाजपा ने भारत उदय और इंडिया शाइनिंग के नारों के साथ ऐसा ही दावा किया था जिसका लोगों पर इतना असर नहीं हो पाया कि भाजपा सत्ता में वापसी कर पाती. और आखिरी सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में लगातार तीन बार जीत क्या संसदीय चुनाव में पहली बार विजय पताका फहराने की उनकी कोशिश में उनके काम आएगी. राज्यों में भाजपा का हाल 2009 के मुकाबले इस वक्त भाजपा की हालत पतली है. इसका मतलब यह हुआ कि मोदी की राह 2009 के आडवाणी से कहीं ज्यादा मुश्किल है. आडवाणी उस समय तुलनात्मक रूप से फायदे की स्थिति में थे. पांच साल पहले भाजपा के पास सात राज्यों की सत्ता थी. आज उसके पास सिर्फ चार राज्य हैं- मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और गोवा. इसमें राजनीतिक प्रासंगिकता के हिसाब से गोवा न के बराबर है. बिहार में वह जदयू के साथ गठबंधन के सहारे सत्ता में है. 2005 से यह गठबंधन वहां अटूट रहा है. 2009 में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 12 जीती थीं और 1999 में अपने सबसे बढ़िया प्रदर्शन की बराबरी की थी. 2010 के विधानसभा चुनाव में भी इसने बढ़िया प्रदर्शन किया. लेकिन आज भाजपा-जदयू गठबंधन टूट के कगार पर है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चिंता है कि मोदी के साथ दिखने से बिहार के 17 फीसदी मुस्लिम मतदाता उनसे दूर जा सकते हैं. पड़ोसी राज्य झारखंड में अवसरवादी राजनीति के चलते इस साल जनवरी में ही भाजपा ने सरकार गंवाई है. राज्य में अब राष्ट्रपति शासन है. पिछले साल उत्तराखंड और हिमाचल में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी सत्ता से बाहर हुई है. जनसंख्या और राजनीतिक असर के हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में भी पार्टी का हाल बुरा है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी 403 में से सिर्फ 48 सीटें जीत पाई थी और तीसरे स्थान पर रही थी. उसका यह प्रदर्शन 2007 के मुकाबले तो खराब ही था जब उसने 51 सीटें जीती थीं 2002 की तुलना में तो यह कोसों दूर था जब उसने 88 सीटों पर विजय हासिल की थी. यह दिखाता है कि भाजपा 2002 से राज्य की सत्ता में रही सपा और बसपा सरकारों की असफलताओं का फायदा उठाने में नाकामयाब रही है. उसके लिए चिंता की बात यह भी है कि 2007 के मुकाबले 2012 में जहां सपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ा वहीं भाजपा का वोट प्रतिशत 17 फीसदी के मुकाबले 15 फीसदी रह गया. वैसे देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से पार्टी का लगातार पतन हुआ है. 1996 से अब तक हुए चार विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत दोनों में गिरावट आई है. 1996 में पार्टी ने 32.5 फीसदी वोटों के साथ 425 में से 174 सीटें जीती थीं. केंद्र की सत्ता का रास्ता जिस उत्तर प्रदेश से होकर जाता है वहां भाजपा इस वक्त अपने सबसे बुरे दौर में चल रही है महाराष्ट्र का हाल भी कुछ ऐसा ही है. 1999 से अब तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में वहां भाजपा-शिवसेना गठबंधन हर बार हारा है. सीट संख्या और वोट प्रतिशत दोनों लिहाज से भाजपा का प्रदर्शन लगातार गिरा है. यानी जनसंख्या के मामले में इस दूसरे सबसे बड़े राज्य में भी वह अपने सबसे बुरे दौर में है. उड़ीसा में जब बीजू जनता दल नेता और राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 2009 में इससे गठबंधन तोड़ा तो इसकी नैया ही डूब गई थी. भाजपा को कुछ राहत पिछले साल पंजाब में मिली जहां शिरोमणि अकाली दल के साथ इसके गठबंधन ने विधानसभा चुनाव में अपनी सत्ता कायम रखी थी. बड़े लाभ की उम्मीद भाजपा को सिर्फ राजस्थान में है जहां वह नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के सहारे सत्तासीन कांग्रेस को हराने के सपने देख रही है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 2003 से लगातार दो बार सरकार बनाई है. यहां भी विधानसभा चुनाव छह महीने दूर हैं. हालांकि वहां की भाजपा सरकारें खुद को लोकप्रिय बता रही हैं, लेकिन कांग्रेस को उम्मीद है कि दस साल से सत्ता में बैठी इन सरकारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बनेगी और वहां वह वापसी करेगी. अगर भाजपा ने इन दो में से एक भी राज्य गंवा दिया तो वोटरों और पार्टी दोनों में मोदी की अपील बुरी तरह घट सकती है. लोकसभा में भाजपा केंद्र में भाजपा की पहली सरकार सिर्फ 13 दिन चली थी. 1996 में तब उसे बहुमत के आंकड़े यानी 272 सीटों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त दलों का समर्थन नहीं मिल पाया था. 1998 में बनी पार्टी की दूसरी सरकार 13 महीने चली. 1999 में बनी इसकी तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया. 1998 में भाजपा ने 182 सीटें जीती थीं. 1999 में यह आंकड़ा 183 हुआ. दोनों बार दूसरे दलों के समर्थन से उसकी सरकार बनी. माना जा सकता है कि अगर भाजपा अगले आम चुनाव में 185 सीटों के आस-पास पहुंच जाती है तो वह केंद्र में सरकार बनाने की दावेदार होगी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी के रास्ते में जो अड़चनें हैं वे उन अड़चनों से कहीं बड़ी हैं जो 2009 में आडवाणी के सामने थीं. 2009 में जब भाजपा आडवाणी के नेतृत्व में मैदान में उतरी थी तो उसके खाते में 2004 के आम चुनावों में मिली 137 लोकसभा सीटों की पूंजी थी. यानी पार्टी को करीब 45 सीटों की खाई पाटनी थी. अभी भाजपा के पास 116 लोकसभा सीटें हैं. यानी मोदी को दूसरी पार्टियों से 70 के करीब सीटें छीननी होंगी. जिस तरह से 2009 के बाद हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन गिरा है, उसे देखते हुए उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती है. खासकर तब तो बहुत ही बड़ी अगर पिछली बार की तरह इस बार भी भाजपा 543 में से 365 लोकसभा सीटों पर लड़ी और बाकी सीटें उसे गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ीं. उत्तर प्रदेश अपनी पार्टी को सत्ता में लाने और खुद प्रधानमंत्री बनने का जो सपना मोदी देख रहे हैं वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक वे उत्तर प्रदेश में पार्टी की किस्मत नहीं बदल देते. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं जो किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा हैं. इनमें से सिर्फ नौ ही आज भाजपा के पास हैं. 1996, 1998 और 1999 के तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई थी. इन चुनावों में उसने क्रमश: 52, 59 और 29 सीटें जीती थीं. 2004 में जब वाजपेयी सरकार सत्ता से बाहर हुई तब भाजपा सिर्फ 10सीटें जीत पाई थी. यह रिकॉर्ड इशारा करता है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी करने के लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश में कम से कम 25 सीटें तो जीतनी ही होंगी. यानी मौजूदा सीटों से 16 सीट ज्यादा. अगले साल 25 सीटें जीतना भाजपा के लिए 1999 की स्थिति की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है. 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 30 प्रतिशत वोट हासिल करके 25 सीटें जीती थीं. दरअसल 1991 से 1999 का दौर उत्तर प्रदेश में भाजपा का स्वर्णिम दौर रहा था. इस दौरान हुए चारों लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए. 1998 में तो यह आंकड़ा 37.5 प्रतिशत तक भी पहुंचा. लेकिन 2004 में यह घटकर 22 प्रतिशत पर आ गया और 2009 में तो पार्टी को कुल 17.5 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए. कोढ़ में खाज यह कि 14 साल में सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल उत्तर प्रदेश में मजबूत ही हुए हैं. 90 के दशक में हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत या तो सबसे ज्यादा होता था या फिर वह इस मामले में दूसरे स्थान पर रहती थी. लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है. अपवाद के रूप में 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें जब कांग्रेस ने बसपा से एक ज्यादा यानी 21 सीटें हासिल की थीं, तो वोट प्रतिशत का सबसे बड़ा हिस्सा अब सपा और बसपा में बंटता है. सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का यह हाल क्यों हुआ. इसकी प्रमुख वजह यह रही कि सवर्ण वोटों पर उसकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई. प्रदेश में सवर्ण वोट लगभग 18 प्रतिशत हैं. पहले यह वोट कांग्रेस को जाता था, लेकिन 1989 के बाद से ही भाजपा लगातार इसे अपने पक्ष में करने में कामयाब हो रही थी. 1999 तक प्रदेश के सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) वोट का एक बड़ा हिस्सा पार्टी को मिल रहा था. लेकिन पिछले दस साल में सपा और बसपा ने अपना प्रभाव बढ़ाकर और सवर्ण प्रत्याशियों को मैदान में उतार कर ऊंची जातियों के वोट का अच्छा-खासा हिस्सा अपनी तरफ खींच लिया. 1996 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने प्रदेश के कुल सवर्ण वोटों का 74 प्रतिशत हासिल किया था. यानी तीन-चौथाई सवर्ण वोट भाजपा के पास थे. लेकिन 2002 में यह घटकर मात्र 47 प्रतिशत रह गए. इसके ठीक उलट बसपा के पास जहां 1996 में सिर्फ चार प्रतिशत ब्राह्मण वोट थे, वे 2002 में बढ़कर 14 प्रतिशत हो गए. बसपा को मिलने वाले अन्य सवर्ण जातियों के वोट भी इस दौर में लगभग दोगुने हो गए. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सपा को लगभग 19 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले. सपा और बसपा दोनों ही एक दौर में जाति आधारित पार्टियां मानी जाती थीं. लेकिन सवर्ण वोटों को अपने पक्ष में करने के बाद इन पार्टियों की राजनीति लगातार समावेशी हुई है. पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में सपा और बसपा ने ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर प्रत्याशियों को रिकॉर्ड संख्या में टिकट दिए. इस कारण सवर्ण वोट का एक बड़ा हिस्सा उनके खाते में गया जिसने पिछड़े और दलित वोट के साथ मिलकर भाजपा की नैया डुबो दी. 2009 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा का हर पांच में से एक प्रत्याशी ब्राह्मण था. बसपा में ब्राह्मण प्रत्याशियों की संख्या दलित प्रत्याशियों से भी ज्यादा थी, जबकि दलित ही बसपा के अस्तित्व का मुख्य कारण रहे हैं. ऐतिहासिक तौर पर उत्तर प्रदेश में हमेशा ठाकुर और ब्राह्मण की चुनावी लड़ाई रही है. भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ब्राह्मण विरोधी छवि वाले ठाकुर हैं. मोदी के लिए राजनाथ सिंह के साथ मिलकर राज्य के ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करना आसान नहीं होगा. फिर भी भाजपा किसी तरह से उत्तर प्रदेश में 25 सीटें जीत भी जाती है तो भी मोदी को दौड़ में बने रहने के लिए पूरे देश से 160 सीटें और जोड़नी होंगी. ये सीटें वे कहां से लाएंगे? ला भी पाएंगे या नहीं? जानने के लिए दूसरे राज्यों की स्थितियों पर गौर करते हैं. महाराष्ट्र महाराष्ट्र में भाजपा क्षेत्रीय दल शिव सेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है. यहां 48 लोकसभा सीटें हैं. इनमें सबसे ज्यादा 18 भाजपा ने 1996 में जीती थीं. 1999 में भी पार्टी का प्रदर्शन यहां ठीक रहा और उसे 14 सीटें हासिल हुईं. 2004 में भाजपा के खाते में 13 सीटें आईं, लेकिन 2009 में ये घटकर सिर्फ नौ रह गईं . जबकि 2009 में भाजपा को अपनी बड़ी जीत की उम्मीद थी. चुनाव से छह महीने पहले ही मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था जिसमें 150 लोगों की जान चली गई थी. प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और भाजपा ने इस हमले को सुरक्षा के मामले पर सरकार की नाकामयाबी बताते हुए मुद्दा बनाया था . लेकिन पार्टी मुंबई की ही छह लोकसभा सीटों में से एक भी नहीं जीत सकी. 2009 में भाजपा को अपने बेजोड़ नेता प्रमोद महाजन की कमी भी काफी खली जिनकी 2006 में उन्हीं के भाई द्वारा हत्या कर दी गई थी . पिछले साल शिव सेना ने भी अपने संस्थापक बाल ठाकरे को खो दिया. उनके बेटे और राजनीतिक वारिस उद्धव ठाकरे की क्षमताओं पर ज्यादातर लोगों को संदेह है. इसके अलावा उद्धव के चचेरे भाई राज ठाकरे द्वारा 2006 में बनाई गई अलग पार्टी मनसे भी लगातार कांग्रेस विरोधी वोटों को बांटने में कामयाब रही है. इस लिहाज से यहां 2014 का पूर्वानुमान भाजपा के लिए बहुत उजले नहीं दिखाई पड़ते . पश्चिम बंगाल पश्चिम बंगाल में भाजपा का अस्तित्व लगभग शून्य ही रहा है. 2009 में पार्टी यहां की कुल 42 में से 40 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इनमें से सिर्फ पार्टी के दिग्गज जसवंत सिंह ही दार्जीलिंग से जीत पाए. (संयोग से जसवंत सिंह मोदी के कट्टर विरोधी हैं) बंगाल में भाजपा का सबसे अच्छा प्रदर्शन 1999 में रहा था जब उसे दो सीटें हासिल हुई थीं. वाजपेयी ने तुरंत ही दोनों जीते हुए प्रत्याशियों को अपनी सरकार में मंत्री बना दिया था. दोनों 2004 और 2009 के आम चुनाव में खेत रहे. भाजपा को 1999 में मिली दो सीटों की जीत भी सिर्फ तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन के कारण ही संभव हो पाई थी. तृणमूल कांग्रेस ही राज्य में मुख्य विपक्षी दल थी जिसने 2011 के विधानसभा चुनाव में 34 साल पुराने साम्यवादी गठबंधन को ध्वस्त किया. भाजपा के लिए 2009 का चुनाव और भी ज्यादा दुखद रहा होगा जब उसके बंगाल के दोनों पूर्व सांसद तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों से चुनाव हार गए. तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर से भाजपा से हाथ मिला सकती हैं. खास तौर से तब जब उन्होंने कांग्रेस से अपना सात साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया है. लेकिन क्या वे मोदी का नेतृत्व स्वीकार करेंगी? यह काफी मुश्किल है. पश्चिम बंगाल के लगभग एक चौथाई मतदाता मुस्लिम हैं और तृणमूल के 19 में से दो सांसद भी. ऐसे में ममता बनर्जी मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देने से बचना ही चाहेंगी. आंध्र प्रदेश जहां तक आंध्र प्रदेश में भाजपा की संभावनाओं की बात है तो इस बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा. 2009 के आम चुनाव में पार्टी ने प्रदेश की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 37 पर उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन किसी को संसद में जाने का मौका नहीं मिला. हालांकि इससे पहले भाजपा यहां उम्मीद जगाने वाला प्रदर्शन कर चुकी थी. तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ मिलकर जब उसने 1999 के आम चुनाव में भागीदारी की थी तब उसे सात सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन पिछले दो आम चुनावों से उसका एक भी उम्मीदवार संसद नहीं पहुंच पा रहा है. विधानसभा चुनावों में भी उसका प्रदर्शन इतना ही बुरा रहा है. 2009 के चुनावों में प्रदेश की 294 सीटों में से 271 पर भाजपा के उम्मीदवार थे. इनमें से दो के अलावा सभी को हार का मुंह देखना पड़ा. 1998-99 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनवाने में टीडीपी की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी. 2004 में यह रिश्ता टूट गया. अब अगर यह जुड़ता भी है तो इससे किसी चमत्कार के होने की खास संभावना नहीं है क्योंकि टीडीपी खुद अपनी चमक खो चुकी है. 2004 के विधानसभा चुनाव में जनता ने पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया था. 1999 के आम चुनाव में जहां उसके पास राज्य की 42 में से 29 सीटें थीं वहीं 2004 और 2009 के आम चुनावों में इनकी संख्या छह से आगे नहीं बढ़ पाई. इस बार प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन अपनी नई पार्टी के साथ कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले हैं. इन जटिल समीकरणों के बीच टीडीपी 2009 के आम चुनावों में 31 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने की कोशिश करेगी. बिहार 2009 में भाजपा को 12 सीटों पर जीत मिली थी. पार्टी के इस प्रदर्शन की 2004 के आम चुनाव, जब उसकी झोली में सिर्फ चार सीटें आई थीं, से तुलना करें तो साफ होता है कि जदयू से गठबंधन उसके लिए फायदेमंद साबित हुआ. इससे पहले 1998 के आम चुनावों में जब भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी तब भी आज के बिहार में उसके पास महज आठ सीटें थीं (शेष 12 सीटें झारखंड वाले हिस्से में थीं). इस समय भाजपा के बड़े नेता दावा कर रहे हैं कि यदि जदयू अगले साल आम चुनाव से पहले गठबंधन से अलग होता है तो उसे बिहार में काफी नुकसान उठाना पड़ेगा, पर सच्चाई उलट हो सकती है. जदयू की वजह से भाजपा को पिछड़े और मुस्लिम दोनों वर्गों के वोट मिले हैं. 1996 में जब वह पहली बार लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी तब उसे बिहार में सिर्फ छह सीटें हासिल हुई थीं. 1991 में राम मंदिर अभियान के समय जब उसने पहली बार लोकसभा सांसदों के मामले में तीन अंकों का आंकड़ा पार किया था तब तो बिहार में उसका खाता शून्य पर पहुंच गया था. इससे पहले 1989 में वर्तमान बिहार में भाजपा को 40 में से महज चार सीटों पर जीत मिली थी (इनमें झारखंड की सीटें शामिल नहीं हैं). तमिलनाडु यहां लोकसभा की 39 सीटें हैं. अतीत में भाजपा के पास एक ऐसा मौका आया है जब उसने इस राज्य से बड़ी उम्मीदें बांध ली थीं. 1998 के आम चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियों को चौंकाते हुए उसने न सिर्फ यहां खाता खोला बल्कि 1999 में हुए आम चुनाव में उसने अपनी सीटें बढ़ाकर पांच कर ली थीं. लेकिन खुशहाली का यह किस्सा यहीं खत्म हो गया और इसके बाद वह राज्य में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीती. आज के हालात में राज्य की दोनों क्षेत्रीय पार्टियां द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (एआईएडीएमके) के बीच भाजपा के लिए गुंजाइश बहुत कम है. इन दोनों पार्टियों का अतीत बताता है कि वे खांटी अवसरवादी हैं. दोनों ही मोदी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में शामिल होने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर सकती हैं. लेकिन यहां लोकसभा चुनावों में ऐसा दुर्लभता से ही होता है कि एक पार्टी दूसरी का पूरी तरह से सफाया कर दे. यानी इनमें से कोई भी मोदी को समर्थन देती है तो संभावना कम ही है कि वह सीटों के आंकड़े में बहुत बड़ी संख्या जोड़ पाए. मध्य प्रदेश मोदी यह बिल्कुल अपेक्षा नहीं कर सकते कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के बड़े नेता उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करेंगे. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो सीधे उनके प्रतिस्पर्धी हैं. वे 13 साल की उम्र से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं. एक हिसाब से तो भाजपा का वर्तमान संकट उसी समय से शुरू हुआ था जब कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी ने चौहान की तारीफ करते हुए उन्हें बधाई दी कि उन्होंने गुजरात में मोदी द्वारा किए गए काम की तुलना में मध्य प्रदेश में बेहतर काम करके दिखाया है. यह भी दिलचस्प है कि 2009 के आम चुनाव में चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश से भाजपा के 16 (29 सीटों में से) उम्मीदवार जीते थे, तो वहीं नरेंद्र मोदी के गुजरात में इससे कम 15 (26 सीटों में से). हालांकि पिछले दिनों दो सीटों पर हुए लोकसभा के उपचुनावों में जीत के बाद यह संख्या 17 हो चुकी है. सौम्य स्वभाव के चौहान पार्टी में दिग्गज नेता नहीं हैं लेकिन वे हमेशा से राष्ट्रीय नेताओं के प्रिय रहे हैं. इनमें भाजपा की दूसरी पांत के नेता अरुण जेतली, अनंत कुमार से लेकर सुषमा स्वराज तक शामिल हैं. संघ परिवार भी उनका समर्थन करता है. इस साल नवंबर में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और मोदी के लिए मुश्किल होगा कि उम्मीदवारों के चयन में वे चौहान की पसंद को नजरअंदाज करें. राज्य में यदि तीसरी बार फिर भाजपा की सरकार बनती है तो लोकसभा चुनावों में भी वे अपने करीबियों को टिकट दिलवाएंगे. मोदी को याद रखना होगा कि वे चौहान को हल्के में नहीं ले सकते. 2003 में भारी बहुमत के साथ भाजपा को सत्ता दिलाने वाली उमा भारती लाख कोशिशों के बाद भी न चौहान को उनके पद से हटने के लिए मजबूर कर पाईं और न ही भाजपा में वापसी के बाद मध्य प्रदेश में उनका राजनीतिक पुनर्वास हो पाया. राजस्थान राजस्थान में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसकी पूरी संभावना है कि राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इनमें मोदी की सक्रियता पर उत्साहित न दिखें. दरअसल राजे अभी से मानकर चल रही हैं कि राज्य में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिली हुई है और वे कांग्रेसनीत सरकार को आसानी से हरा देंगी. उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा 2003 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई थी. हालांकि यह प्रदर्शन 2008 में वे दोहरा नहीं पाईं और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई. चौहान की तरह ही यदि वे राजस्थान में भाजपा को जिता पाईं तो अगले साल होने वाले आम चुनाव में राज्य की लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में मोदी एकतरफा फैसला नहीं ले पाएंगे. राजस्थान भाजपा के लिहाज से इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि यहां की कुल 25 लोकसभा सीटों में से फिलहाल उसके पास मात्र चार सीटें हैं. यानी अगले आम चुनाव में उसके पास बड़ा मौका होगा. कर्नाटक आगामी आम चुनाव में बहुत कम वक्त बचा है और उसे देखते हुए अगर मोदी कर्नाटक से दूरी बनाए रखने का फैसला करते हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं होनी चाहिए. 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य की 28 में से 18 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. यह आंकड़ा गुजरात में उसे हासिल सीटों से बेहतर था. लेकिन तीन माह पहले कर्नाटक की सत्ता गंवाने के बाद से वहां पार्टी जनता दल (सेक्युलर) से भी पिछड़ते हुए तीसरे स्थान पर खिसक गई. पार्टी को राज्य के मुख्यमंत्री रहे कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा ने भी अपूरणीय क्षति पहुंचाई. भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भाजपा से इस्तीफा देने वाले येदियुरप्पा ने नई पार्टी बना ली और पुरानी पार्टी के महत्वपूर्ण वोट काट लिए. उड़ीसा उड़ीसा में मोदी के सफल होने की गुंजाइश कम ही है. राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा है कि भाजपा के इस नए नायक के पास देश की समस्याओं को हल करने के लिए कम ही सुझाव हैं. वर्तमान में उड़ीसा से भाजपा का एक भी सांसद नहीं है. 1999 में बीजू जनता दल (बीजद) की लहर पर सवार भाजपा को 21 में से नौ सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी. वर्ष 2004 में पार्टी को सात सीटों पर जीत हासिल हुई और उसने 1998 के अपने प्रदर्शन की बराबरी कर ली. लेकिन संघ से जुड़े लोगों की ईसाई विरोधी हिंसा से नाराज पटनायक ने 2009 के आम चुनाव से एक महीने पहले गठबंधन तोड़ दिया. भाजपा का वहां से सफाया हो गया. जाहिर है कि मोदी वहां कोई करामात नहीं कर पाएंगे. झारखंड 20 से कम लोकसभा सीटों वाले राज्यों में झारखंड शामिल है. भाजपा एक समय यहां सत्ता पर काबिज रह चुकी है. 14 लोकसभा सीट वाले इस प्रदेश में उसे सन 1996 और 1998 के चुनावों में 12 सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी. लेकिन 2004 में यहां उसका सफाया हो गया. हालांकि 2009 में उसने कुछ हद तक वापसी की और सात सीटों पर जीत हासिल की. लेकिन आज राज्य के बिखरे राजनीतिक हालात को देखते हुए लगता नहीं कि मोदी और भाजपा 1996 और 1998 वाली कामयाबी दोहरा पाएंगे. दिल्ली भाजपा शिद्दत से चाह रही होगी कि मोदी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पार्टी की हालत सुधार दें. यहां सात लोकसभा सीटें हैं. 1999 में भाजपा ने यहां सभी सीटों पर जीत हासिल की थी. इससे पहले 1989 में उसे चार, 1996 में पांच और 1998 में छह सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन 2004 में उसे बड़ा झटका लगा और पार्टी एक को छोड़कर सभी सीटों पर हार गई. 2009 में तो वह इकलौती सीट भी चली गई और पार्टी का सफाया हो गया. अन्य राज्य बहरहाल भाजपा को छत्तीसगढ़ में अच्छी-खासी सीटें मिल सकती हैं जहां अभी उसके 11 में से 10 सांसद हैं. पिछले महीने हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के मारे जाने के बाद प्रदेश में पार्टी और अधिक कमजोर हुई है. लेकिन असम में जहां भाजपा के 14 में से चार सांसद हैं वहां मोदी के लिए यह संख्या बढ़ाना आसान नहीं होगा क्योंकि यह अब तक का पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन है. हरियाणा में जहां भाजपा 1999 में 10 में से पांच सीटें जीतने में सफल रही थी वहां भी 2009 में उसका सफाया हो गया. राज्य में उसके पूर्व सहयोगी दलों की हालत और भी खस्ता है. केरल में वामपंथी गठबंधन और कांग्रेस गठबंधन हावी हैं और दोनों ही भाजपा के खिलाफ हैं. फिर क्या होगा? तो फिर मोदी कहां पहुंचेंगे? अगर 1984 से लेकर अब तक भाजपा के राज्यवार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की एक सूची बनाई जाए तो भी आंकड़ा कुल 251 सीटों तक पहुंचता है जो सामान्य बहुमत से 21 कम है. अगर मोदी चमत्कारिक रूप से यहां तक भी पहुंच जाते हैं तो भी उनके लिए महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में अकाली दल और तमिलनाडु में द्रमुक या अन्नाद्रमुक के अलावा अपना कोई अन्य हिमायती तलाश पाना मुश्किल होगा. कहा जा सकता है कि ये तो अतीत के आंकड़े हैं और इनसे भविष्य की तस्वीर ऐसी ही होगी, यह बात निश्चितता के साथ नहीं कही जा सकती. लेकिन इन आंकड़ों से यह अंदाजा तो लग ही जाता है कि अगले आम चुनाव में भाजपा और मोदी की राह कितनी कठिन है. विश्लेषक मानते हैं कि मोदी के लिए हो रहे इस मौजूदा शोर में उतनी ऊर्जा नहीं है जितनी उन अभियानों में देखने को मिली थी जिन्होंने भाजपा को अतीत में दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाया. 1980 में बनी भाजपा को 1984 के लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें मिली थीं. उस चुनाव में कांग्रेस ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उठी शोकलहर पर सवार होकर भारी जीत हासिल की थी. यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज चुनाव हार गए थे. लेकिन पांच साल बाद भाजपा ने 89 सीटों के साथ वापसी की. 1991 में वह 121 सीटों तक जा पहुंची. इन दोनों विजयों में अयोध्या राममंदिर निर्माण के लिए छेड़े गए देशव्यापी अभियान की अहम भूमिका थी. उस अभियान की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ 16 साल और चार आम चुनावों का सामना करने के बाद भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. इतने कम वक्त में ही उसने आजादी की लड़ाई लड़ने वाली एक सदी पुरानी कांग्रेस को पछाड़ दिया. राम मंदिर लहर के दौरान 1991 में जब पहली बार पार्टी के 100 से ज्यादा सांसद जीते तो बिहार में उसका खाता शून्य पर पहुंच गया था1998 और 1999 में भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी. संजीदा, समझदार और अनुभवी राजनेता की छवि रखने वाले वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे दोनों बार केंद्र की सत्ता हासिल हुई. लेकिन जब उनकी सरकार भी पुरानी सरकारों जैसी ही निकली तो 2004 में जनता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया. क्या मोदी के पास वाजपेयी जैसी अपील है? कम से कम इस वक्त तो ऐसा नहीं लगता. 2002 में गुजरात दंगों के बाद मोदी की एक कट्टर नेता की छवि बनी थी जिसके सहारे वे गुजरात की सत्ता में लौटे. लेकिन यह भी अब 11 साल पुरानी बात हो चुकी है और अब इसके सहारे उतने वोट नहीं बटोरे जा सकते जितने वोटों की मोदी उम्मीद कर रहे होंगे. भाजपा ने 2004 और 2009 के चुनावों में उनकी इस छवि का इस्तेमाल किया भी था, लेकिन नतीजे बहुत उत्साहजनक नहीं रहे. 2009 में मुंबई में मोदी ने जमकर प्रचार किया फिर भी पार्टी वहां की सभी छह सीटों पर हार गई. यह 26/11 के हमले के बाद की बात है. तुलनात्मक रूप से देखें तो 1990 के दशक में अयोध्या आंदोलन के चलते आम मानस में भाजपा की कट्टर हिंदूवादी छवि कहीं अधिक प्रभावी थी जिसका फायदा उसे 1996, 1998 और 1999 के चुनावों में मिला भी. मोदी का दूसरा दांव है अच्छे प्रशासन और 11 साल मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में किए गए विकास का दावा. लेकिन इसमें भी उतना दम नहीं लगता कि उनके लिए पूरे देश में वोटों का तूफान खड़ा हो जाए. पिछले दिनों जब आडवाणी ने कहा कि गुजरात पहले से ही विकसित था और मोदी ने सिर्फ उसकी हालत सुधारी है तो वे तो निश्चित रूप से राजनीति कर रहे थे, लेकिन अगर यह बात पूरी तरह गलत होती तो आडवाणी ऐसा कहते ही नहीं. अब जब आम चुनाव करीब हैं तो स्वाभाविक ही है कि गुजरात में अच्छे प्रशासन और आर्थिक विकास के मोदी के दावों की पहले के मुकाबले कहीं सघन समीक्षा की जाएगी. तो सवाल यह उठता है कि भाजपा के भीतर और बाहर मोदी समर्थक उनके पार्टी की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनने पर इतने अधिक उत्साहित क्यों हैं. इसका जवाब आसान है. कई बार व्यक्ति के उठान में उसकी खूबियों से ज्यादा परिस्थितियों का भी हाथ होता है. दरअसल भाजपा में विश्वसनीय नेतृत्व का पूर्णतया अभाव है. भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार की छवि पर कई बट्टे लग चुके हों फिर भी भाजपा के मन में संशय है कि शायद सिर्फ सरकार के खिलाफ पड़ा वोट उसे दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त न हो. भाजपा की प्रचार मशीनरी ढोल पीट रही है कि पार्टी के कार्यकर्ता आगामी चुनाव में एकमत से मोदी का नेतृत्व चाहते हैं. अगर यह सच भी है तो इसे तभी सही माना जा सकता है जब कस्बों और शहरों में पार्टी कार्यकर्ता ऐसी मांग के साथ नजर आने लगें. जानकारों के मुताबिक जो बात सच है वह यह है कि भाजपा में दूसरी, तीसरी और चौथी पांत के नेताओं और उनके खेमों को लग रहा है कि अगले साल का आम चुनाव उनके लिए केंद्र की सत्ता और उससे जुड़े फायदों तक पहुंचने का आखिरी मौका है. उनका मानना है कि 2009 में फेल हुए आडवाणी उन्हें यह मौका नहीं दे सकते इसलिए उन्होंने मोदी पर दांव लगाया है.

मातम में मार्केटिंग

उत्तराखंड की त्रासदी जहां अपनी भयावहता के लिए लोगों के जेहन में हमेशा जिंदा रहेगी तो दूसरी तरफ यह राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से द्वारा मातम के इस मौके को भुना कर सस्ता प्रचार पाने की कोशिशों के लिए भी याद रखी जाएगी. इस तबाही के बाद से ही पूरे देश से लोग मदद के लिए आगे आए. विभिन्न राज्य सरकारों और नेताओं ने जहां शांतिपूर्वक और गरिमापूर्ण तरीके से सहायता राशि से लेकर राहत सामग्री उत्तराखंड पहुंचाई वहीं कुछ नेता ऐसे भी रहे जो इस मौके पर अपनी छवि चमकाने की कोशिश करते दिखे. टीवी कैमरों के सामने एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हुए कर्नाटक के टीडीपी और कांग्रेसी सांसदों की तस्वीरें यह बताने के लिए काफी थीं कि मातम के इस मौके को भुनाने की जद्दोजहद किस हद तक पहुंच गई है. हालांकि इसकी शुरुआत तो त्रासदी के साथ ही हो गई थी, लेकिन दिन गुजरने के साथ यह और गहरी होती गई. सस्ती लोकप्रियता पाने की इस राजनीति को एक अलग ऊंचाई पर ले जाने का आरोप गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लगा. इसकी शुरुआत उस खबर से हुई जिसके मुताबिक गुजरात सरकार ने एक दिन के भीतर ही उत्तराखंड आपदा में जगह-जगह फंसे 15 हजार गुजरातियों को सुरक्षित निकालकर उनके घर पहुंचा दिया था. इस काम के लिए मोदी को ‘रैंबो’ करार देते हुए एक अखबार ने दावा किया कि गुजरातियों को देहरादून के सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए 80 टोयोटा इनोवा गाड़ियां मंगाई गईं. लोगों को बचाने और सकुशल घर तक पहुंचाने के लिए चार बोइंग विमानों के साथ 25 लग्जरी बसों की भी सहायता ली गई. मोदी को महामानव बताने वाली यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई. विरोधी दल इस दावे को असंभव और हास्यास्पद ठहराते नजर आए तो मोदी समर्थक इसे उनकी काबिलियत का एक और प्रमाण बताते. गुजरात सरकार की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ था? सूत्रों की मानें तो 15 हजार लोगों को बचाने की खबर बड़ी हद तक कोरी अफवाह थी जो मोदी की पीआर एजेंसी एपको की तरफ से फैलाई गई थी. तहलका ने उत्तराखंड में राहत कार्य का काम देख रहे गुजरात सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदीप कुमार से बात की तो उनका कहना था, '15 हजार का कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है. हां, हरिद्वार से अब तक लगभग 1,800 के करीब लोगों को गुजरात भेजा गया है. बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो राज्य सरकार नहीं बल्कि खुद के इंतजाम से वापस गुजरात गए हैं.' हरिद्वार के शांति कुंज में गुजरात सरकार का सबसे बड़ा कैंप है. वहां के एक अधिकारी विष्णु पंड्या कहते हैं, '15 हजार लोगों को निकाले जाने की बात तो हमें नहीं पता है. हां, हमारे यहां से लगभग 2000 के करीब गुजराती लोगों को गुजरात सरकार ने अब तक अपनी व्यवस्था से गुजरात भेजा है.' हरिद्वार के अलावा देहरादून और ऋषिकेश में भी गुजरात सरकार के कैंप लगे हैं लेकिन ये कैंप हरिद्वार के कैंप से बेहद छोटे हैं. ऐसे में अगर हम बाकी दो अन्य कैंपों से भी 2000-2000 लोगों को जोड़ दें तो आंकड़ा छह हजार तक पहुंचता है, जो 15 हजार के आधे से भी कम है. ऐसी खबरें भी आईं कि गुजरात सरकार ने गुजरात के लोगों को सीधा वहीं से बचाया जहां वे फंसे थे. लेकिन गुजरात सरकार की वेबसाइट पर 21 और 22 जून को बचाए गए जिन लोगों का नाम दर्ज है उनकी आपबीती कुछ और ही बताती है. उन्हीं लोगों में से एक विट्ठलभाई पटेल कहते हैं, ‘मैं गौरीकुंड में फंसा हुआ था. काफी संघर्ष के बाद सेना की मदद से किसी तरह हरिद्वार पहुंचा. वहां गुजरात सरकार के राहत कैंप में संपर्क किया. फिर वहां से उन्होंने आगे अहमदाबाद जाने के लिए मेरी मदद की.’ यही कहानी मयूर शाह की भी है. वे जोशीमठ में फंसे थे. शाह बताते हैं,' वहां से हरिद्वार आने के लिए 15 हजार रुपये में प्राइवेट टैक्सी की. गुजरात सरकार के कुछ अधिकारियों से हमारी फोन पर जरूर बात हुई थी लेकिन हरिद्वार तक हम अपनी व्यवस्था से ही पहुंचे थे. बाद में सरकार के राहत शिविर की तरफ से हमें अहमदाबाद भेजने की व्यवस्था की गई.' यही व्यवस्था लगभग हर राज्य सरकार ने की है. यानी सेना लोगों को जहां वे फंसे होते हैं वहां से बचाकर हरिद्वार और देहरादून जैसे बेस कैंपों तक लाती है. फिर वहां लोग अपने-अपने राज्यों द्वारा लगाए गए राहत शिविरों में जाते हैं या फिर अन्य शिविरों में. गुजरात सरकार ने भी ऐसा ही किया. लेकिन विभिन्न माध्यमों से ऐसी खबरें आईं मानो बाढ़ में फंसे गुजरातियों को गुजरात सरकार ने चुन-चुन कर निकाला हो और फिर उन्हें उनके घर भेजा हो. अहम सवाल यह उठता है कि इस पूरे दुष्प्रचार में गुजरात सरकार की क्या भूमिका है. 15 हजार लोगों को बचाने का दावा न तो मोदी की तरफ से किया गया था और न ही गुजरात सरकार की तरफ से. वे यह कह कर अपना बचाव भी कर सकते हैं. लेकिन अगर उनकी तरफ से यह दावा नहीं था और इस दावे में उनकी सहमति नहीं थी तो जब इसको लेकर चारों तरफ चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने इसका खंडन क्यों नहीं किया? सूत्रों की मानें तो ये सारा किया-धरा उस पीआर एजेंसी का है जिस पर गुजरात सरकार और मोदी की छवि को चमकाने की जिम्मेदारी है. कहा जा रहा है कि पीआर एजेंसी ने ही यह खबर मीडिया में प्लांट कराई जिससे गुजरात सरकार और मोदी को ‘रैंबो’ दिखाया जा सके. लेकिन आंकड़ों को लेकर गड़बड़ी हो गई इसलिए दावों का दांव उल्टा पड़ गया और स्थिति हास्यास्पद हो गई. उत्तराखंड पहुंचने के बाद मोदी के केदारनाथ मंदिर बनवाने की पेशकश की भी विभिन्न हलकों में आलोचना हुई. भाजपा नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस प्रस्ताव पर मांगी गई प्रतिक्रिया के जवाब में मीडिया से कहा, 'पहले लोगों को बचाना जरूरी है. घर बनाना जरूरी है. मंदिर बाद में भी बन जाएगा.' मोदी की आलोचना इस बात के लिए भी हुई कि जो राज्य खुद के सबसे ज्यादा संपन्न होने का दम भरता है उसने उत्तराखंड की इस त्रासदी पर शुरुआत में सिर्फ दो करोड़ रुपये का सहयोग देने की घोषणा की. दूसरी तरफ देखें तो उत्तर प्रदेश ने 25 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र, दिल्ली व हरियाणा ने 10-10 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडि़शा जैसे राज्यों ने पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता राशि भेजी. हरियाणा ने तो 25 गांवों को गोद लेने का भी एलान किया. इसके साथ ही वह पहला ऐसा राज्य भी बना जिसने इस त्रासदी में बराबर के शिकार बेजुबानों की सुध ली. हरियाणा ने आपदा से प्रभावित पशुओं के इलाज के लिए दवाओं के साथ डॉक्टरों की एक टीम भी भेजी है. उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने 25 करोड़ रुपये की सहायता राशि देने के साथ ही राज्य परिवहन की 300 बसें फंसे हुए यात्रियों को ले आने के लिए भेज दीं. साथ में डॉक्टरों का एक बड़ा दल भी प्रभावितों के इलाज के लिए उत्तराखंड रवाना किया. भाजपा शासित मध्य प्रदेश ने त्रासदी के कुछ समय बाद ही राज्य के संस्कृति मंत्री के साथ एक सात सदस्यीय टीम को देहरादून रवाना किया. इसके साथ ही राज्य के लोगों को वहां से लाने के लिए सरकार ने ट्रेन के साथ ही सरकारी और प्राइवेट विमानों का भी इंतजाम किया. इस तरह से उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद राहत को लेकर विभिन्न राज्यों की भूमिका को देखें तो बाकी के राज्य राहत पहुंचाने के मामले में गुजरात से कहीं आगे दिखाई देते हैं. हां, यह जरूर है कि उन्होंने इसका ढिंढोरा नहीं पीटा और न अपनी ‘महानता’ की खबरें फैलाईं. मातम की मार्केटिंग के लिए सिर्फ मोदी की ही आलोचना नहीं हुई बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव राहुल गांधी भी आलोचना के घेरे में आए. त्रासदी के आठ दिन बाद तक राहुल गांधी का न तो इस हृदयविदारक घटना पर कोई बयान आया और न ही वे कहीं दिखाई दिए. सोशल मीडिया से लेकर बाकी जगहों पर जब हो-हल्ला मचा तो कुछ दिन बाद वे सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस दफ्तर के पास राहत सामग्री लेकर जाने को तैयार ट्रकों को झंडा दिखाते दिखे. लेकिन इसके बाद खबरें आईं कि ट्रक तीन दिन पहले से राहत सामग्री लेकर तैयार खड़े थे, लेकिन राहुल के देश से बाहर होने के कारण उन्हें रवाना नहीं किया गया. खैर, ट्रक जैसे-तैसे गए, लेकिन आधे रास्ते में जाकर वे फिर से खड़े हो गए. उनके ड्राइवरों के हवाले से बताया गया कि उन्हें इतना ही डीजल दिया गया था.

तिरस्कार की मार

बात सितंबर, 1893 की है. उत्तराखंड के चमोली में बहने वाली बिरही नदी में एक पहाड़ गिर गया. बिरही आगे जाकर अलकनंदा में मिलती है जिसके भागीरथी में मेल के बाद बनी धारा को गंगा कहा जाता है. बिरही में पहाड़ गिरने से एक विशाल झील बन गई. ताल के एक छोर पर गौणा गांव था और दूसरे पर दुर्मी तो कोई इसे गौणा ताल कहता और कोई दुर्मी ताल. तब के शासकों यानी अंग्रेजों ने उस ताल से पैदा हुआ खतरा भांपते हुए दुर्मी में एक तारघर खोल दिया. तारघर से एक अंग्रेज कर्मचारी हर रोज पानी के स्तर की जानकारी नीचे बसे गांवों में भेजता. आशंका गलत नहीं थी. एक साल बाद 16 अगस्त 1894 को भारी बारिश और पहाड़ धसकने से ताल का एक हिस्सा टूट गया. कुछ सालों बाद इस ताल का अध्ययन करने आए स्विस भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक इस चार किमी लंबे, एक किमी चौड़े और 300 मीटर गहरे गौणा ताल में करीब 15 करोड़ घन मीटर पानी था. अनुमान है कि ताल टूटने के बाद भारी मात्रा में पानी बिरही की संकरी घाटी से होते हुए चमोली, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, ऋषिकेश और हरिद्वार की ओर बढ़ा होगा. दस्तावेजों के मुताबिक उस भारी जल प्रवाह से भले ही अलकनंदा घाटी में खेती और संपत्ति को भारी नुकसान हुआ, लेकिन मौत सिर्फ एक हुई थी. वह भी उस साधु की जो लाख समझाने के बावजूद जलसमाधि लेने पर अड़ा हुआ था. यानी नुकसान इसलिए बहुत कम हुआ कि संकट को समझने और उससे बचने के लिए समय पर सटीक उपाय करने की अंतर्दृष्टि दिखाई गई थी. ताल बनते ही बचाव के उपाय शुरू हो गए थे. अंग्रेज तुरंत सूचना भेजने और लोगों को चौकन्ना करने की व्यवस्था की अहमियत समझते थे इसलिए उन्होंने तब दुर्लभ मानी जाने वाली लगभग 100 मील लंबी तार लाइन भी बना ली थी. कई दशक बाद 20 जुलाई, 1970 को ताल पूरी तरह से टूट गया. बेलाकूची नाम का एक गांव इस जल प्रलय में बह गया. उस समय भी कई यात्री गाड़ियों के बहने और कुल 70 मौतें होने की बात रिकॉर्ड में दर्ज है. यह आजाद भारत का किस्सा है. आज देश को आजाद हुए करीब 66 साल हो चुके हैं. उत्तराखंड को अलग राज्य बने भी 13 साल हो गए. लेकिन लगता है कि ऐसी आपदाओं को संभालने के मामले में हम एक मायने में 1893 से भी पीछे चले गए हैं. केदारनाथ में आए जलप्रलय का कारण बना गांधी सरोवर यानी चौरबाड़ी ताल केवल 400 मीटर लंबा और 100 मीटर चौड़ा था. इसकी गहराई अधिकतम दो मीटर थी. यानी गौणा ताल की तुलना में इसका आकार एक तलैया से अधिक नहीं था. फिर भी इससे हुई तबाही ने करीब सवा सदी पहले हुई उस तबाही को कहीं पीछे छोड़ दिया. अब तक 1000 से अधिक मौतों और कई हजार करोड़ रु के नुकसान की पुष्टि हो चुकी है. वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ मनीश मेहता के शोध पत्र के अनुसार चौरबाड़ी ताल 3000 साल पुराना था. इसके किनारे थामने वाला मौरेन (हिमनदों का चट्टानरूपी अवक्षेप) 100 मीटर मोटाई का था, लेकिन यह कुछ सालों से रिस भी रहा था. ताल के नीचे रोज हजारों यात्री आते थे फिर भी सरकार ने न तो इसके टूटने की संभावनाओं को परखा और न बचाव के उपाय किए. उत्तरकाशी में दो साल से तबाही का कारण बन रही असिगंगा का मूल स्रोत भी डोडीताल नाम का एक तालाब ही है. आज सूचना और आवागमन के साधन हर जगह मौजूद हैं. लेकिन उनका प्रयोग करके भी इस आपदा के असर को कम नहीं किया जा सका. दरअसल आपदा के पहले और बाद में जो हुआ उसे गहराई से देखें तो इसका सीधा कारण व्यवस्था थामने वालों में जिम्मेदारी की भावना और संवेदनशीलता का अभाव दिखता है. वहीं, आम जनता भी परंपरागत ज्ञान और जीवन पद्धति को याद रखती तो नुकसान इतना ज्यादा नहीं होता. आगे जो दर्ज है वह बताता है कि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक कानून का उत्तराखंड में जो तिरस्कार हुआ है, एक समाज के रूप में उसकी कीमत चुकाने के लिए हम अभिशप्त हैं. किसी भी नेतृत्व की असली परीक्षा संकट में होती है. इस लिहाज से देखा जाए तो हाल की आपदा के दौरान जो हुआ उसने उत्तराखंड सरकार की पोल खोल दी है. सरकार का कहना है कि उसे ऐसी आपदाओं से निपटने का कोई अनुभव नहीं है. लेकिन सच यह है कि जो गंभीरता और इच्छाशक्ति उस अनुभव के लिए जरूरी है वही इस त्रासदी के दौरान उसके व्यवहार में गायब दिखी. ऐसी आपदा के लिए अलग और बड़ी व्यवस्था तो दूसरी बात है, राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व को यही पता नहीं कि जो संसाधन उसके पास उपलब्ध हैं उनका ही इस्तेमाल ऐसे संकट में अच्छी तरह से कैसे किया जाए. सरकार भले ही तर्क दे कि यह तो अचानक आई आफत थी, पर सच यह है कि यह आपदा न तो दबे पांव आई थी और न ही उत्तराखंड ने ऐसी आपदा पहली बार देखी है. यहां बादल फटने और भूस्खलन का इतिहास रहा है. फिर मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी के संकेत दे दिए थे. प्रकृति ने भी कई इशारे करते हुए धीरे-धीरे ही विकराल रूप धारण किया था. पर न तो समय रहते चेता गया और न ही आपदा के शुरुआती दिनों में सरकार ने पर्याप्त गंभीरता दिखाई. नतीजा सबके सामने है. केदारनाथ की घटना भले ही 16-17 जून को हुई हो लेकिन 13 जून से ही पहाड़ों में भारी बारिश से हजारों यात्रियों का जगह-जगह फंसना शुरू हो गया था. समय से 15 दिन पहले उत्तराखंड पहुंच गए मानसून की मोटी बौछारों ने माहौल में चिंता घोल दी थी. 15 जून को मौसम विभाग ने फिर अगले 48 से लेकर 72 घंटों तक भारी वर्षा की भविष्यवाणी कर दी थी. ऐसा ही हुआ भी. 15 जून की शाम तक ही नदियां उफान पर आ गई थीं और रुद्रप्रयाग जिले में फाटा, रामपुर, सीतापुर आदि जगहों पर टूट-फूट और जनहानि की घटनाएं दर्ज होने लगी थीं. लेकिन आपदा के सारे संकेतों के बावजूद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 16 जून को दिल्ली के लिए रवाना हो गए. उसी दिन दोपहर बाद उत्तरकाशी में भागीरथी के उफनते पानी ने नदी किनारे बने चार-चार मंजिला घरों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया. 16 जून की ही रात साढ़े आठ बजे भारी बारिश के बाद आए पानी के सैलाब ने केदारनाथ के एक हिस्से को तो बहाया ही, उससे सात किमी नीचे रामबाड़ा और 14 किमी नीचे गौरीकुंड का बड़ा हिस्सा भी साफ कर दिया. सूत्र बताते हैं कि पानी और मलबे के इस पहले वेग ने ही केदारनाथ से लेकर 20 किमी नीचे घाटी में बसे सीतापुर तक मरने वालों का आंकड़ा तीन अंकों में पहुंचा दिया था. कई पुल और मकान बह गए थे. इन सभी घटनाओं की सूचना जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार को थी. रामबाड़ा से रात को अंतिम बार पुलिस वायरलेस से संपर्क हुआ था. यात्रियों ने भी अपने-अपने घरों में इस जलजले की सूचना पहुंचा दी थी. भागीरथी, उसकी सहायक नदियों और मंदाकिनी नदी से हो रहे विनाश की खबरों से स्थानीय लोगों, यात्रियों और उनके परिजनों की बेचैनी बढ़ रही थी. उफनाई अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी और असीगंगा नदियां खतरे के निशानों से कई मीटर ऊपर बह रही थीं. इन सबसे मिलकर बनने वाली गंगा हरिद्वार में खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी. 16 जून तक राज्य में 123 सड़कों के टूटने की सरकारी सूचना थी. लेकिन इस सबसे निर्लिप्त मुख्यमंत्री बहुगुणा देश की राजधानी दिल्ली में बैठकर प्रदेश का हाल-चाल ले रहे थे. 17 जून को वे देहरादून वापस आए. उस दिन सुबह करीब आठ बजे तक जल प्रलय से केदारनाथ और उसके नीचे के क्षेत्र पूरी तरह से तबाह हो गए थे. लेकिन उस दिन हुई राज्य मत्रिमंडल की बैठक में मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के सहयोगी मंत्रियों से इस जल प्रलय से हुई तबाही पर कोई चर्चा नहीं की. इससे लगता है कि मुख्यमंत्री इस आपदा से या तो खुद ही निपटना चाहते थे या वे अपने सहयोगियों की राय को महत्वहीन समझते हैं. यही नहीं, प्रत्येक राज्य की सरकार हर दिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की आपदा प्रबंधन डिवीजन को उस दिन राज्य में हुई आपदाओं और फौरी नुकसान की सूचना भेजती है. रिकॉर्ड बताते हैं कि 16 और 17 जून को उत्तराखंड सरकार ने राज्य में आपदा से जान-माल की कोई हानि नहीं दिखाई है. राज्य में 17 जून तक केदारनाथ तबाह हो गया था. फिर भी राज्य सरकार क्यों ये सूचनाएं नहीं भेज रही थी या छिपा रही थी, कोई नहीं जानता. 17 जून तक केदारनाथ पूरी तरह तबाह हो गया था लेकिन उस दिन हुई राज्य मत्रिमंडल की बैठक में मुख्यमंत्री ने इस विषय पर कोई चर्चा नहीं की 18 जून को मौसम साफ हो गया था. राज्य सरकार के एक मंत्री और कुछ अधिकारी केदारनाथ की हवाई यात्रा करके देहरादून पहुंच गए थे. उनके द्वारा दी गई तस्वीरों से केदारनाथ की तबाही की खबर सार्वजनिक हो गई थी. इतनी बड़ी तबाही देखकर कई राज्यों के अधिकारी उसी दिन शाम तक देहरादून पहुंच गए थे और किसी भी तरह अपने प्रदेश से आए यात्रियों से संपर्क बनाने की कोशिश में लगे थे. लेकिन दूसरी ओर उत्तराखंड सचिवालय में आम दिनों की तरह ही कामकाज दिख रहा था. आपदा प्रबंधन विभाग से जुडे़ शासन के एक अधिकारी अकेले बचाव, राहत और समन्वय की जिम्मेदारी तो देख ही रहे थे, अपने मोबाइल पर कई राज्यों के लोगों की आशंकाएं भी शांत कर रहे थे. यानी देश-दुनिया को परेशान करने वाली आपदा के बचाव और राहत कार्य में न तो अतिरिक्त अधिकारी ही लगाए गए थे और न ही कर्मचारी. अगले दो दिन तक राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र का यही हाल रहा. 18 जून को ही मुख्यमंत्री ने केदारनाथ और उत्तरकाशी के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय राजधानी देहरादून में अपने प्रिय दो विधायकों के क्षेत्रों में ढहे पुश्तों का जायजा लेना उचित समझा. 19 जून को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आपदाग्रस्त इलाकों के हवाई सर्वेक्षण से पहले बहुगुणा ने पहली बार आपदा प्रभावित क्षेत्रों में से कुछ का हवाई दौरा किया. उस दिन राज्य के एक बड़े अधिकारी ने हवाई सर्वेक्षण करने के बाद बचाव कार्य और फंसे हुए लोगों को निकालने की रणनीति बताने के बजाय यह बयान दिया कि उन्होंने सारे प्रदेश का दौरा कर लिया है और केंद्र के साथ हुई बैठक में राहत और पुनर्निर्माण के लिए तीन हजार करोड़ रु का प्रस्ताव भेज दिया है. इस बयान से समझा जा सकता है कि उस दिन राज्य सरकार की प्राथमिकता क्या थी. दरअसल उत्तराखंड में आपदा राहत के लिए केंद्र से ज्यादा से ज्यादा धन मांगने और वह धन आने के बाद उसकी बंदरबांट का पुराना और हर पार्टी का इतिहास है. प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के दौरे और अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों-अधिकारियों के देहरादून में डेरा डालने से उत्तराखंड सरकार थोड़ी हरकत में तो आई, लेकिन उसके पास बचाव और राहत कार्य संचालित करने की न तो कोई निश्चित रूपरेखा थी और न कोई प्रबंधन तंत्र. तब तक दिल्ली में केंद्र सरकार की हाई पावर कमेटी सहित कई बैठकें हो चुकी थीं. कांग्रेस पार्टी के दिग्गज भी दिल्ली में बैठक कर चुके थे. लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री अपने दो सहयोगियों और एक बड़े अधिकारी के साथ ही आपदा से निपटने की कोशिश में लगे थे. आपदा के बाद अभी तक एक बार भी राज्य में बड़े निर्णय लेने के लिए कैबिनेट बैठक नहीं हुई. ये मंत्री और कुछ विधायक हेलीकाप्टरों में यहां-वहां उड़ कर महत्वपूर्ण समय और संसाधन बर्बाद कर रहे थे. इन्हीं दिनों दुर्गम पहाड़ों में मौत से जूझती हजारों जानें बचने की एक आस में ऊपर उड़ रहे इन हेलीकाप्टरों को टुकुर-टुकुर देख रही होंगी. 20 जून की रात मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के कुछ सहयोगियों से अलग-अलग जिलों की कमान संभालने को कहा. वे 21 जून तक ही प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच पाए. तब तक पांच दिन बीत चुके थे. राजनीतिक नेतृत्व की तरह प्रशासनिक नेतृत्व भी सुस्त और दिशाहीन दिखा. 18 जून को केदारनाथ की स्थिति देखने के बाद रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी बीमार होकर देहरादून स्थित अस्पताल में भर्ती हो गए थे. अगले चार दिन तक जिला बिना जिलाधिकारी के ही रहा. उनका काम देखने के लिए ऐसा कोई प्रशासनिक अधिकारी तैनात नहीं किया गया जो अनुभवी हो और प्रशासन, सेना, आईटीबीपी और केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से समन्वय की क्षमता रखता हो. नतीजतन कि सारी व्यवस्थाएं चरमरा गईं और सूचना तंत्र फेल हो गया. सेना और आईटीबीपी युद्ध-स्तर पर बचाव का काम तो कर रही थी, लेकिन कौन फंसा है, कौन आ गया, किसे अस्पताल भेजा गया है, कौन मर गया है, यह बताने के लिए कोई व्यवस्था नहीं बन पाई. केदारनाथ, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, फाटा और गुप्तकाशी में पांच दिन तक कोई डिप्टी कलेक्टर तक तैनात नहीं किया गया जो राजधानी देहरादून तक सही स्थिति बताता और उसके अनुसार आगे की योजना तय होती. देश-दुनिया में इतने शोर के बाद भी प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व और शीर्ष नौकरशाही की आंख नहीं खुल रही थी. सूत्र बताते हैं कि आपदा के पहले ही दिन से राज्य के कई युवा अधिकारी आगे बढ़कर आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर काम करने की इच्छा अपने बड़े अधिकारियों को बता चुके थे , लेकिन उनसे काम लेने को कोई तैयार ही नहीं था. उत्तरकाशी स्थित दुनिया भर में चर्चित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में ऊंचे हिमालयी इलाकों में बचाव और राहत का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. जब 18 जून तक यहां कोई सरकारी आदेश नहीं पहुंचा तो संस्थान के अधिकारी खुद ही प्रशिक्षकों सहित 110 बचाव विशेषज्ञों की सूची लेकर जिलाधिकारी के पास गए और उनसे बचाव कार्य में लगने की इजाजत मांगी. इसके बाद उन्होंने जिले के अलग-अलग इलाकों से करीब 46 विदेशियों सहित करीब 6,500 लोगों को बचाया. साफ था कि सरकार अपने ही संसाधनों की अहमियत से अनजान थी. अव्यवस्था और देश भर में हो रही बदनामी के बीच केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने माना कि समन्वय में कमी है. इस बीच केंद्र ने आपदाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन की मदद के लिए कुछ युवा परिवीक्षाधीन अधिकारी भेजे. इतना सब होने के बाद 21 जून की शाम शासन ने राज्य के 12 युवा अधिकारियों को अलग-अलग आपदाग्रस्त क्षेत्रों में नोडल अधिकारियों के रूप में तैनात करने के आदेश जारी किए. ये अधिकारी 22 जून की रात या 23 जून दोपहर तक किसी तरह इन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचे. तब तक तबाही हुए छह दिन बीत गए थे, लोगों को बचाने और उनके परिजनों को सांत्वना व सूचना देने का समय जा चुका था. आपदा कभी शोर मचा कर नहीं आती, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक गंभीरता से उसकी आहट सुनी जा सकती है. उससे निपटने की तैयारी पहले से की जा सकती है. इस बार भी राज्य में ही मौजूद संसाधनों के जरिये अविलंब मदद पहुंचाकर कई जिंदगियां बचाई जा सकती थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बात का जवाब किसी के पास नहीं कि संकट की ऐसी घड़ी में उत्तराखंड की सरकार को अहम निर्णय लेने में पांच-छह दिन क्यों लगे. अब यह हाल था तो आम दिनों में वह कैसे काम करती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है.

नाम का मनरेगा!

राजधानी भोपाल के सीहोर रोड पर बन रही एक गगनचुंबी इमारत के नीचे कुछ मजदूर परिवारों ने ईंटों की अस्थायी चारदीवारी बना ली है. इन्हें अंदाजा है कि वे कुछ महीनों तक यहीं रहेंगे. ठीक से हिंदी न बोल पाने वाले ये सभी लोग धार जिले की डही जनपद पंचायत के भिलाला आदिवासी हैं और अपने घर में भूखों मरने से बचने के लिए 500 किलोमीटर का सफर तय करके यहां तक पहुंचे हैं. मार्च के बाद प्रदेश में खेतीबाड़ी के काम बंद हो जाते हैं. इसके बाद मजदूरों को काम की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है. कुछ सालों पहले तक इन दिनों में निमाड़, मालवा सहित बाकी आदिवासी अंचल के लाखों लोग पड़ोसी राज्य गुजरात और महाराष्ट्र के बड़े शहरों की ओर कूच कर जाते थे. किंतु महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरटी योजना आने के बाद उनका हर साल का यह क्रम टूट गया. उन्हें गांव में ही काम मिलने लगा. इसीलिए पिछले छह साल में प्रदेश से अप्रैल, मई और जून के महीनों में होने वाला पलायन रुक-सा गया था. धार जिले के डही पंचायत के ही सुगरलाल बताते हैं कि उनके लिए यह योजना मुसीबत के दिनों में घर चलाने का अच्छा जरिया बन गई थी. मगर इस साल एक अप्रैल के बाद से उनकी पंचायत में किसी को एक दिन का भी काम नसीब नहीं हुआ. इसलिए एक बार फिर आस-पास के गांव के गांव खाली हो गए हैं. दरअसल मध्य प्रदेश में सतपुड़ा और विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच बसे लाखों लोगों के लिए काम की उम्मीद जगाने वाली मनरेगा इस वित्तीय वर्ष में अकाल मौत के मुंह में चली गई है. हालत यह है कि जिन महीनों में कई सौ करोड़ रुपये खर्च होने चाहिए थे, उनमें यह आंकड़ा अभी तक पचास करोड़ रुपये तक भी नहीं पहुंचा. नतीजा यह कि मनरेगा से बेदखल लोग जिंदा रहने के लिए सालों पुरानी परंपरा यानी पलायन पर लौट आए हैं. आधे दशक के बाद प्रदेश के लाखों मजदूर काम की तलाश में अब फिर से इधर-उधर भटक रहे हैं. मध्य प्रदेश पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं. लेकिन तहलका के पास मौजूद विभाग की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं. बीते साल अप्रैल से जून तक मनरेगा में 12 सौ करोड़ रुपये खर्च हुए थे. इस साल सरकार ने इस अवधि के लिए अनुमानित राशि 16 सौ करोड़ रुपये रखी थी. पर हैरानी की बात है कि इस साल अप्रैल से अब तक मप्र के सभी 50 जिलों में 25 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हुए. दूसरे शब्दों में मनरेगा के तहत हर साल इन तीन महीनों में खर्च की जाने वाली राशि का यह दो प्रतिशत पैसा भी नहीं है. ऐसा तब है जब बीते साल धार और बालाघाट जैसे एक-एक आदिवासी जिले में सौ-सौ करोड़ रुपये का काम हुआ था. यही वजह है कि इस बार मनरेगा का पैसा गांवों तक नहीं पहुंचने से जहां गांवों में विकास का काम ठप पड़ा है वहीं जिस संख्या में ग्रामीण गांवों से पलायन कर रहे हैं उसे भांपते हुए विभाग के होश उड़ गए हैं. लिहाजा बीती 27 मई को विभाग आयुक्त ने सभी कलेक्टरों को यह फरमान भेजा है कि वे कैसे भी राज्य के 20 लाख मजदूरों को पलायन से रोकें. सवाल उठता है कि बीते सालों तक जो योजना ठीक-ठाक चल रही थी वह यह साल शुरू होने से पहले ही ठप क्यों हो गई. दरअसल ऐसा हुआ राजधानी भोपाल में बैठे चंद अदूरदर्शी नौकरशाहों के चलते. इन्होंने मनरेगा को हाईटेक बनाने के लिए इस साल जनवरी में बिना तैयारी के सभी जिलों में ई-वित्तीय प्रबंधन लागू कर दिया. इसके लिए उन्हें लाखों मजदूरों के खातों को न केवल राष्ट्रीयकृत बैंक से जुड़वाना था बल्कि उन खातों को ‘नरेगा सॉफ्ट’ नामक सॉफ्टवेयर में डलवाते हुए सभी का ई-मस्टर (कम्प्यूटर पर मजदूर की मजदूरी का ब्योरा) बनवाना था. प्रदेश में मनरेगा के 50 लाख से ज्यादा मजदूर हैं, इस लिहाज से एक जिले के एक लाख मजदूरों के खाते बैंकों में खुलवाना इतना बड़ा काम था जिसे कुछ दिनों में कर पाना संभव नहीं था. यह सारा काम मार्च तक हो जाना था, लेकिन नहीं हुआ. इस तरह योजना का सारा काम रुक गया और इसका खामियाजा बेकसूर मजदूरों को भुगतना पड़ा. प्रदेश में इसके पहले 13वें वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग की राशि ग्राम पंचायतों को सौंपी जाती थी और पंचायतें ग्रामसभा के जरिए निर्माण कार्य कराती थीं. मगर अब जबकि मनरेगा सहित सभी कामों के वित्तीय अधिकार से सरपंचों को बेदखल किया जा चुका है तो उनमें असंतोष है और इसलिए उन्होंने मार्च के बाद से मनरेगा से खुद को अलग कर लिया है. इसके पहले मनरेगा के मामले में मध्य प्रदेश अव्वल राज्यों में गिना जाता था. बालाघाट, बैतूल और अनूपपुर जैसे जिलों को प्रधानमंत्री ने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अवॉर्ड भी दिया था. आज इन्हीं जिलों के लाचार मजदूर अधिकारियों से काम की गुहार लगा रहे हैं. इस मुद्दे पर कोई भी आला अधिकारी आधिकारिक जवाब नहीं देना चाहता. पंचायत और ग्रामीण मंत्री गोपाल भार्गव इस बारे में विभाग की अतिरिक्त प्रमुख सचिव अरुणा शर्मा से संपर्क साधने को कहते हैं. शर्मा मानती हैं कि मनरेगा के मामले में प्रदेश पिछड़ गया है. वे कहती हैं, ‘आने वाले दिनों में इसकी भरपाई कर ली जाएगी.’ सवाल है कि भरपाई होगी कैसे. आने वाले तीन महीने बारिश में निकल जाएंगे और उसके बाद का समय चुनावी सरगर्मियों में जाएगा. वहीं एक वर्ग की सोच है कि मनरेगा में मनमानी, कामचोरी और अनियमितताओं के चलते भी राज्य में यह योजना बैठ गई. दिल्ली में बहस चल रही है कि मनरेगा के चलते किसानों को खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते. जबकि राज्य में मनरेगा इतना फटेहाल है कि मजदूर मनरेगा में काम करने के बजाय शहर जाना चाहता है. बड़वानी में काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता माधुरी कृष्णास्वामी बताती हैं कि मनरेगा में मजदूरों को एक तो आधा-अधूरा पैसा बांटा जाता है और उस पर भी यह उन तक छह महीने के बाद तक पहुंचता है. वे कहती हैं, ‘बीते कुछ सालों में ही मनरेगा में मजदूर आदिवासियों की तेजी से घटती संख्या उनका मोहभंग दिखाती है.’ मनरेगा के चलते बीते सालों तक मप्र के 52 हजार गांवों में सालाना साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये आते थे. इसलिए यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अहम धुरी बन गई थी. भले ही यह पैसा मजदूरों के खातों से निकलकर छोटे-छोटे दुकानदारों तक पहुंचता था, लेकिन धनराशि का यह चक्र करीब दो करोड़ आबादी के बीच चलता था. इन दिनों यदि यह पैसा दिल्ली से प्रदेश के गांवों तक पहुंचता तो न केवल मजदूर परिवारों को काम मिलता बल्कि उनके खर्च की क्षमता भी बढ़ती. और इसका असर तीज-त्योहार और हाट बाजारों पर पड़े बिना नहीं रहता. लेकिन ऐसा नहीं होने से ग्रामीण इलाके के हाट बाजारों में जहां पिछले साल के मुकाबले लाखों रुपये की कम खरीदी हुई है वहीं इन बाजारों की रौनक भी उड़ी हुई है.

नेटवर्क के जरिए नक्सलवाद से लोहा

कहने को जम्मू-कश्मीर और छत्तीसगढ़ में 2,100 किलोमीटर का फासला हो, लेकिन वे इस मायने में एक जैसे हैं कि दोनों ही लंबे समय से अलगाववादी हिंसा की मार झेल रहे हैं. जम्मू-कश्मीर ने जहां आतंकियों से निपटने में मोबाइल फोन नेटवर्क का कुशलता से इस्तेमाल किया है वहीं छत्तीसगढ़ और दूसरे नक्सल प्रभावित राज्य अभी इस मामले में काफी पीछे हैं. अब केंद्र सरकार अपनी नक्सल विरोधी रणनीति के तहत इस कमी को दूर करने की योजना बना रही है. इसके तहत नौ नक्सल प्रभावित राज्यों में करीब 2,200 मोबाइल टावर लगाने की योजना है. ये टावर उन इलाकों में लगाए जाएंगे जो अभी तक किसी भी तरह के मोबाइल नेटवर्क के कवरेज से बाहर रहे हैं. गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक यह परियोजना सुरक्षा बलों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी जिन्हें घने जंगलों की मौजूदगी वाले करीब 80 नक्सल प्रभावित जिलों में नक्सलियों का पता लगाने में बहुत मुश्किल होती है. दरअसल यह जम्मू-कश्मीर में किए गए प्रयोग की सफलता दोहराने की कोशिश है. 2003 में जब केंद्र ने इस राज्य में मोबाइल फोन सेवा शुरू करने का फैसला किया था तो सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों ने इसका काफी विरोध किया था. उन्होंने चेतावनी दी थी कि मोबाइल फोन से आतंकियों को फायदा होगा जो इसका इस्तेमाल बम धमाकों और आतंकी हमलों के बेहतर समन्वय के लिए करेंगे. ऐसा हुआ भी. मोबाइल सेवा का इस्तेमाल करके आतंकियों ने कई हमले किए, लेकिन जल्द ही यह रणनीति उल्टे उन पर भारी पड़ने लगी. श्रीनगर के एक सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं, 'आतंकियों के मोबाइल सिग्नल और उनकी आपसी बातचीत रिकॉर्ड करके सुरक्षा बलों ने ज्यादातर आतंकियों का सफाया कर दिया. यानी आखिरकार तकनीक ने हमें ही फायदा पहुंचाया.' आज घाटी में हाल यह है कि सक्रिय आतंकियों की संख्या 100 से भी कम रह गई है. 2003 में यह हजारों में थी. हाल की बात करें तो 2011 में मोबाइल फोन की वजह से ही सुरक्षा बलों को लश्कर-ए-तोएबा और जैश-ए-मोहम्मद के कुख्यात आतंकियों अब्दुल्ला उनी और हमाद तक पहुंचने में आसानी हुई और ये दोनों ही अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए. 2012 में मोबाइल फोन नेटवर्क की निगरानी के चलते अब्दुल राशिद शिगन नाम के पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी मुमकिन हुई. अब्दुल ने अपने एक साथी के साथ मिलकर एक ग्रुप बनाया था और इसने सुरक्षा बलों पर 13 बार हमले किए थे. अब सरकार को उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ सहित तमाम नक्सल प्रभावित राज्यों में भी मोबाइल कवरेज बढ़ाने से कुछ ऐसे ही नतीजे आएंगे. सूत्र बताते हैं कि टावर लगाने के लिए करीब 2,200 लोकशन भी तय कर लिए गए हैं और अगर यह योजना पूरी तरह से लागू होती है तो इस पर करीब तीन हजार करोड़ रु का खर्च आएगा. छत्तीसगढ़ में ऐसे करीब 500 लोकेशन हैं. संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री किल्ली कृपारानी ने हाल ही में संसद को जानकारी दी कि प्रस्तावित 2,200 लोकेशनों में से 363 पर भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) मोबाइल टावर लगा भी चुका है. छत्तीसगढ़ में बीएसएनएल ऐसे 351 नए टावरों को स्वीकृति दे चुका है. टावर लगाने के लिए 2000 या उससे ज्यादा आबादी वाले गांव चुने गए हैं.' गौरतलब है कि गरीब और दुर्गम नक्सल प्रभावित इलाकों में पड़ने वाले ज्यादातर गांवों में मोबाइल सेवा नहीं है. इसकी एक वजह यह भी है कि निजी ऑपरेटरों को लगता है कि ये इलाके बिक्री के लिहाज से उतने फायदेमंद नहीं हैं. लेकिन जब नवंबर, 2011 में शीर्ष माओवादी नेता किशनजी को एक मुठभेड़ में मार गिराया गया और इसमें मोबाइल फोन के जरिए हुई निगरानी ने अहम भूमिका निभाई तो सरकार को समझ में आ गया कि अगर इन इलाकों में मोबाइल सेवा का विस्तार किया जाए तो इससे नक्सलवाद से निपटने में काफी मदद मिल सकती है. इसके बाद तुरंत ही नक्सल प्रभावित राज्यों में 500 से ज्यादा नए मोबाइल टावर लगाए गए. हाल के समय में जिस तरह नक्सली मोबाइल टावरों को भी निशाना बनाते रहे हैं उससे भी साफ होता है कि उन्हें इनसे खतरा महसूस होता है. उन्हें डर है कि स्थानीय लोग उनकी गतिविधियों की सूचना देने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर सकते हैं जिससे सुरक्षा बलों को सटीक कार्रवाई में मदद मिल सकती है. आंकड़े उनके इस डर की गवाही देते हैं. एक अनुमान के मुताबिक 2008 में नक्सलियों ने 38 टावर उड़ाए थे जबकि 2011 में यह संख्या 71 हो गई. इसीलिए गृह मंत्रालय नक्सलवाद से निपटने में मोबाइल नेटवर्क के इस्तेमाल की सोच रहा है. सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ समय से मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट से हो रहे संवाद पर निगरानी की एक एकीकृत व्यवस्था बनाने की दिशा में काम हो रहा है. हाल ही में 400 करोड़ रु की लागत से एक केंद्रीय निगरानी व्यवस्था बनाई गई है. इसकी मदद से केंद्रीय और राज्यों की खुफिया एजेंसियां कॉल रिकॉर्ड, संदेश और ईमेल प्राप्त कर सकेंगी और स्रोत एक ही होने की वजह से इस जानकारी में पहले से ज्यादा स्पष्टता होगी. इस व्यवस्था की मदद से मोबाइल फोनों और इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटरों के लोकेशन का भी पता लगाया जा सकेगी. साफ है कि जितना ज्यादा नक्सल प्रभावित इलाका मोबाइल कवरेज में लाया जाएगा उतनी नक्सलियों की गतिविधियों के बारे में पुख्ता जानकारी मिलने की उतनी ही अधिक संभावना होगी. हालांकि एक वर्ग इस पहल पर चिंता जता रहा है. कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मोबाइल फोन को बाकी देश से कटे गरीब आदिवासियों से संवाद बढ़ाने के बजाय नक्सल विरोधी रणनीति के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है जो गलत है. दिल्ली स्थित एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स से जुड़े सुहास चकमा को लगता है कि सरकार अब तक विकास और नक्सलवाद के रिश्ते को ठीक से नहीं समझ पाई है. वे कहते हैं, 'इतने बड़े बुनियादी ढांचे को सिर्फ माओवादियों को ढूंढ़ने के लिए इस्तेमाल करना सिर्फ पैसे की बर्बादी होगी.' पूर्व पत्रकार और मोबाइल आधारित एक समाचार सेवा सीजीनेटस्वर चलाने वाले शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं, 'आदिवासी भारत और मुख्यधारा के बीच कोई संवाद नहीं है. मोबाइल फोन इस खाई को पाटने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. अगर वे सिर्फ नक्सल विरोधी अभियानों के लिए इस्तेमाल होंगे तो मुझे पता नहीं कि इसका कितना फायदा होगा.' छत्तीसगढ़ में सात साल बिता चुके और माओवादी समस्या को काफी नजदीक से देखने वाले चौधरी के मुताबिक छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए बाकी देश को अपनी आवाज सुनाना बहुत मुश्किल है. वे कहते हैं, 'ब्यूरोक्रेटों या नेताओं के अलावा राज्य में काम कर रहे ज्यादातर पत्रकार भी उनकी भाषा यानी गोंडी नहीं समझते. इसलिए जब लोग आदिवासी इलाकों से रिपोर्टिंग की कोशिश करते हैं तो ज्यादातर मौकों पर उन्हें उन लोगों द्वारा दी गई जानकारी से काम चलाना पड़ता है जो थोड़ी हिंदी या अंग्रेजी जानते हैं. इसलिए उन रिपोर्टों में उनकी अपनी आवाज नहीं होती.' हालांकि चौधरी को उम्मीद है कि नक्सल विरोधी रणनीति के तहत ही सही, इन इलाकों में मोबाइल सेवा बढ़ेगी तो इसका फायदा सुरक्षा एजेंसियों के अलावा आम आदिवासी को भी होगा जिसकी आवाज सुने जाने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी.

गुरुवार, 14 मार्च 2013

अफसरों के आगे पंगू बने सात मंत्री

भोपाल। प्रदेश सरकार में 7 मंत्री ऐसे हैं जिन्हें पद और प्रतिष्ठा तो मिला है लेकिन उनके पास करने के लिए कोई काम नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि विभाग के पास काम नहीं है। विभागों में काम की भरमार है,लेकिन अधिकारी स्व-विवेक से फाइलें निपटा देते हैं और मंत्री को पता ही नहीं चलता है। हां,मंत्रियों को विधानसभा में सवालों के उत्तर देने की आजादी तो मिलती है, लेकिन महत्वपूर्ण फैसले और फाइलों के मामलों में ऐसा नहीं होता। हाल ही में दो मंत्रियों की जिम्मेदारी भी बढ़ाई गई, लेकिन इनके पास फाइलें ही नहीं पहुंच रही हैं। पर्यटन, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री तुकोजीराव पवार के बीमार होने के कारण मुख्यमंत्री ने इनके विभागों की जिम्मेदारी राज्यमंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह को दे दी। लोक सेवा प्रबंधन विभाग का स्वतंत्र प्रभार संभाल रहे मंत्री सिंह के पास किसान कल्याण तथा कृषि विभाग की जिम्मेदारी पहले से ही है। इसी प्रकार अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण विभाग के राज्यमंत्री हरिशंकर खटीक को घुमक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ विभाग की जिम्मेदारी भी दी गई है। इसके पहले इस विभाग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री स्वयं संभाल रहे थे। इन्हें इस विभाग की जिम्मेदारी तो मिल गई, लेकिन महकमे की फाइलें इनके पास नहीं पहुंच रही हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति खेल एवं युवा कल्याण विभाग की है। यहां की महत्वपूर्ण फाइलें मुख्यमंत्री के पास ही जाती हैं। इतना जरूर है कि विधानसभा सत्र के दौरान विधायकों के सवाल देने के लिए इन्हें अधिकृत किया गया है। इनके पास भी पॉवर की कमी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग राज्य मंत्री देवी सिंह, परिवहन, जेल एवं गृह राज्यमंत्री नारायण सिंह कुशवाह, वन एवं राज्यमंत्री जयसिंह मरावी, स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री नानाभाऊ मोहोड़, नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री मनोहर ऊंटवाला ऐसे राज्यमंत्रियों में शुमार हैं, जिनके पास अधिकाों की कमी है। इसमें से कुछ मंत्री तो ऐसे हैं, जिनके पास विभागों की फाइलों ही नहीं पहुंचती हैं। कैबिनेट मंत्रियों की गैर मौजूदगी में इन्हें विधानसभा मे विधायकों के सवालों का जवाब देने का मौका जरूर मिल जाता है। इनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं लंबे समय से बीमार चल रहे कैबिनेट मंत्री तुकोजीराव के पास अब सरकार में किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं है। मुख्यमंत्री इनके विभाग खेल एवं युवा कल्याण जिम्मेदारी किसान कल्याण एवं कृषि राज्यमंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह को पहले ही दे चुके हैं, अब इनके प्रभार का जिला दतिया की जिम्मेदारी भी बृजिन्द्र प्रताप सिंह को दे दी गई है। शनिवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है। इस तरह सिंह अब कैबिनेट में सबसे अधिक जिलों के प्रभारी मंत्री हो गए हैं। मालूम हो कि इसके पास होशंगाबाद औरा रायसेन जिले का प्रभर प्रहले से ही है, दतिया की जिम्मेदारी मिलने के बाद अब ये तीन जिलों के प्रभारी मंत्री हो गए हैं।

जनता को ढ़ूंढऩे निकलेंगे मंत्री

भोपाल। प्रदेश में भाजपा की सत्ता की हैट्रिक को लेकर टीम शिवराज और टीम तोमर भले ही आश्वस्त हो लेकिन आलाकमान किसी भी गफलत में नहीं रहना चाहता है। इसलिए उसने प्रदेश संगठन को निर्देश दिया है कि विधानसभा के बजट सत्र के बाद मंत्रियों को उनके विधानसभा क्षेत्र और प्रभार वाले जिलों में सघन जनसंपर्क करने की कार्ययोजना तैयार करे। संगठन से निर्देश मिलते ही मंत्री मंत्रालय छोड़ जनता को ढूंढऩे(कौन सरकार से खुश है और कौन नाखुश)निकल पड़ेंगे। महाजनसंपर्क अभियान की रिपोर्ट के बाद बनेगी कार्ययोजना 20 फरवरी को महाजनसंपर्क अभियान की समाप्ति के बाद संगठन अपने रणनीतिकारों के साथ बैठ कर कार्ययोजना तैयार करेगा। कार्ययोजना में क्षेत्र की समस्या और उसके समाधान,जनता की भाजपा से नाराजगी की वजह, कांग्रेस की क्षेत्र में स्थिति और कांग्रेस के प्रभाव को कम करने के उपायों का भी समावेश रहेगा। उल्लेखनीय है कि प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार ने भी मंत्रियों और विधायकों को फील्ड में रहने की हिदायत दी थी। शिव,तोमर और मेनन पर दारोमदार आगामी विधानसभा चुनाव में संघ और संगठन के विभिन्न सर्वे में कई मंत्रियों और विधायकों की स्थिति पतली बताई गई है। इससे भाजपा में चिन्ता की लकीरें हैं। पार्टी के माथे पर बल लगातार गहरा हो रहा है। मुख्यमंत्री भले ही कितने भी लोकप्रिय क्यों न हो किन्तु सत्ता विरोधी रुझान कम नहीं हो रहा। इसके अलावा विधायकों के प्रति नाराजगी भी बढ़ती जा रही है। पार्टी के आंतरिक सर्वे ने प्रदेश नेतृत्व को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस सर्वे में परम्परागत सीटें छोड़ कर बाकी जगह प्लस-मायनस का गुणा भाग सामने आया है। इन सीटों पर भाजपा को मजबुत करने का दारोमदार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और संगठन मंत्री अरविंद मेनन पर है। ब्रांड शिवराज को भुनाने के लिये विशेष कार्य योजना मुख्यमंत्री के कुछ विश्वस्त अफसरों व पार्टी नेताओं ने बनाई है। परदे के पीछे कार्य करने वाले दो भाजपा पदाधिकारियों की देखरेख में जो रणनीति बनाई गई है उसके अनुसार मुख्यमंत्री निकट भविष्य में पूरे प्रदेश का दौरा करेंगे। इस दौरान सभी 230 विधानसभा क्षेत्र का जायजा लिया जायेगा। शहर से ज्यादा प्राथमिकता ग्रामीण इलाके को दी जायेगी। मुख्यमंत्री की इस यात्रा के दौरान तोमर और मेनन भी रहेंगे। मिशन 2013 के लिए टारगेट फिक्स प्रदेश में मिशन 2013 के लिए आलाकमान ने टारगेट फिक्स कर दिया है। उसने प्रदेश के नेताओं को एक लाइन की यह हिदायत दी है कि हर हाल में इस बार प्रदेश में सत्ता बरकरार रखना है। यही वजह है कि महाजनसंपर्क अभिायान के बाद उसने मंत्रियों को मैदानी मोर्चा संभालने का निर्देश दिया है। प्रदेश में उसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर ही भरोसा है। कई मंत्रियों की विवादस्पाद कार्यशैली से वह बेहद खफा हैं। इसीलिए उसने मंत्रियों से कह दिया है कि वे अब मंत्रालयों में बैठकर अपना वक्त जाया नहीं करें बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों में पहुंचकर जनता के दुखदर्द की फेहरिस्त बनाएं। भाजपा के मंत्रियों ने इसे टारगेट 2013 नाम दिया है। मंत्रियों को हिदायत दी गई है कि वे सरकार की उपलब्धियों से जनता को अवगत कराएं। कुछ मंत्री इस काम को आसानी से अंजाम देने में सक्षम हैं, लेकिन दिक्कत आएगी उन मंत्रियों को जो मंत्री पद मिलने के बाद से ही जनता से कट गए हैं। चुनाव के सिलसिले में अब तक हुई दर्जन से ज्यादा बैठकों में विधायकों और सांसदों ने बिजली, पानी, सड़क और भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाकर अपनी-अपनी परेशानी बताई। विवादस्पद मंत्रियों और विधायकों के टिकट काटने तक की चर्चा हुई। पार्टी ने इस पर कड़े फैसले इस अंदेशे से नहीं लिए की कहीं पार्टी में बगावत न हो जाए। आखिरकार बीच का रास्ता निकाल गया जिसके तहत यह तय किया गया कि मंत्री अब मंत्रालयों में न बैठकर निर्वाचन क्षेत्रों में जाएं, जनता के सवालों का जवाब दें, उनकी समस्याओं का समाधान करें और यह देखें की चुनाव के दौरान आने वाली चुनौतियों का सामना किस तरह किया जा सकता है। यही वजह है कि मंत्रियों ने विधानसभा सम्मेलनों में रूचि दिखाई। यद्यपि इस दौरान वे जनता पर खास असर नहीं छोड़ पाए। क्योंकि क्षेत्रीय जनता ने उनके बारे में यही टिप्पणी की कि चुनाव नजदीक आते ही अब मंत्रियों और विधायकों को वोट की चिंता सताने लगी है। यह समस्या सिर्फ भाजपा के साथ ही नहीं है, कई कांग्रेसी विधायकों से भी जनता की यही शिकायतें हैं। चूंकि भाजपा सत्ता में है इसलिए उनके विधायकों और मंत्रियों पर आक्रमण ज्यादा हो रहे हैं।

विंध्य की उपेक्षा भारी न पड़ जाए भाजपा को

भोपाल। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाने में विंध्य क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है लेकिन इस क्षेत्र के नेताओं को जितना तव्वजों कांग्रेस ने दिया है उतना भाजपा ने नहीं। यही कारण है कि विंध्य में भाजपा के पास ऐसा कोई बड़ा नाम नहीं है जिसको आगे करके पार्टी कांग्रेस के कदावर नेताओं की घेराबंदी कर सके। बावजुद इसके इस क्षेत्र की 30 विधानसभा सीटों में से 25 पर भाजपा का कब्जा है। चेहरा बदला है, समीकरण नहीं प्रदेश में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की ओर अग्रसर है, लेकिन विधानसभा चुनाव को लेकर चुनावी रणनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति में भेदभाव का शिकार हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भाजपा क्षेत्रीय संतुलन नहीं बना पाई और फिर उसने पुरानी रणनीति के तहत ही कदम बढ़ाते हुए चेहरा बदला है, समीकरण नहीं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के बहाने सूबे में क्षेत्रीय संतुलन बना सकती थी, लेकिन वह इसे दरकिनार कर गई। दूसरी रूप में कहा जाए तो भाजपा में हमेशा ही की तरह मालवा और ग्वालियर क्षेत्र से बाहर अपने दायरे को बढ़ा नहीं सकी और विंध्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए कोई करिश्मा नहीं कर सकी, जबकि पार्टी की विंध्य में तो स्थिति ठीक है। यही नहीं प्रदेश संगठन की कमान नहीं मिलने के कारण विंध्य के लोगों को संगठन के अन्य पदों में भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। हालांकि, यह बात अलग है कि भाजपा की वर्तमान में विंध्य में 30 में से 25 सीटों पर कब्जा है, बावजूद इसके भाजपा ने विंध्य की उपेक्षा बरकरार रखी है। हालांकि, इसके पहले के चुनाव में जरूर यहां भाजपा की स्थिति पतली थी। विंध्य में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए संगठन स्तर पर भाजपा की कोई रणनीति भी नहीं दिख रही है, ऐसे में फिर उम्मीद है कि आगामी विधानसभा चुनाव में विंध्य में भाजपा को तगड़ा झटका लगे। आंकड़ों पर गौर करें तो भाजपा में अब तक मालवा और ग्वालियर संभाग का ही दबदबा रहा है। जो अनवरत जारी है। भाजपा में अभी तक सबसे ज्यादा प्रदेश अध्यक्ष की कमान 14 प्रदेश अध्यक्षों में से 8 बार मालवा को कमान मिली है, जबकि तीन बार ग्वालियर को मौका मिला है। जनसंघ के समय था विंध्य का प्रभाव प्रदेश में भाजपा से पहले जनसंघ के समय विंध्य का काफी प्रभाव था। भाजपा के आने के बाद जहां विंध्य क्षेत्र की उपेक्षा बढ़ती गई, वहीं जनसंघ के समय विंध्य के साथ ही सभी क्षेत्रों को समान प्रतिनिधित्व का अवसर मिला था। जनसंघ के दौरान मप्र में करीब 10 प्रदेश अध्यक्ष बने, जिसमें से दो बार विंध्य को मौका मिला था, जबकि इसमें से एक बार महाकौशल, एक बार भोपाल, तीन बार मालवा, एक बार ग्वालियर और दो बार छग को मौका मिला था, लेकिन जनसंघ के विघटन और भाजपा के अस्तित्व में आते ही सबकुछ उल्टा हो गया।

प्रत्यासी ढूंढने प्रदेश भर का दौरा करेंगे सांसद

भोपाल। भाजपा के गढ़ के रूप में स्थापित हो रहे पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने जिस फॉर्मूले से भाजपा को हराया था उसी शैली में मैदानी राज्य मप्र को फतह करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए प्रदेश के सभी 12 कांग्रेसी सांसद प्रदेश भर का दौरा करेंगे। इस दौरे के दौरान वे विधानसभा चुनाव के जीताऊ प्रत्यासियों की खोज के साथ ही क्षेत्रवार चुनावी रणनीति भी तैयार कर आलाकमान को देंगे। उसके आधार पर पार्टी रणनीति बनाकर चुनावी समर में उतरेगी। यह संकेत पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रदेश के सांसदों के साथ नई दिल्ली में हुई बैठक में दिया है। हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव से पार्टी में उत्साह हिमाचल प्रदेश और गुजरात चुनाव के बाद कांग्रेस में उत्साह का माहौल बना हुआ है। इन चुनावों में कांग्रेस अपनी रणनीति में सफल रही है। हिमाचल प्रदेश में जहां सत्ता उसके हाथ लगी है, वहीं गुजरात में भी कांग्रेस को नरेंद्र मोदी के मजबूत कुनबे में दो सीटें कम करने में सफलता मिली है। कांग्रेस का मानना है कि अगर 2013 में मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में हिमाचल की नीति पर चलें, तो सफलता हाथ लग सकती है। वैसे देखा जाए तो प्रदेश कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा चुनौतियों भरा है। कांग्रेस यहां सबसे ज्यादा कमजोर है और इस कमजोरी का कारण सिर्फ और सिर्फ गुटबाजी है। क्या है हिमाचल फार्मूला मप्र की तरह ही हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस टूकड़ों में बंटी थी। वहां के दिग्गज नेता किसी की नहीं सुन रहे थे। आलाकमान ने सभी नेताओं को पार्टी या किसी भी नेता के खिलाफ जाने वालों को बाहर का रास्ता दिखाने की हिदायत के साथ लाख विरोधों के बावजूद भी वीरभद्र सिंह को कमान सौंपी दी। फार्मूले के अनुसार वीरभद्र ने विधानसभा क्षेत्रों का सर्वे सासदों,विधायकों और पदाधिकारियों से करवाया। उसके बाद एक रिपोर्ट तैयार कर आलाकमान को सौंपी गई और उसके आधार पर सभी को महत्व देते हुए प्रत्यासियों का चयन कर पार्टी मैदान में उतरी और वीरभद्र ने कांग्रेस को सत्ता दिला दी। आलाकमान का मानना है कि अगर यही प्रयोग मध्य प्रदेश में भी होता है, तो दस वर्ष बाद कांग्रेस वहां फिर से वापसी कर सकती है। दिग्विजय और सिंधिया के हाथ कमान मप्र में पार्टी की कमान कांतिलाल भूरिया के पास रहेगी और चुनावी कमान होगी दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास। कांग्रेस में व्याप्त गुटबंदी को कम करने के लिए यह कदम उठाया गया है। दिग्विजय और सिंधिया इसके लिए तैयार भी हैं और चुनावी सफलता के लिए राहुल मॉडल पर चुनाव लडऩे की तैयारी में लगे हैं। दिग्विजय सिंह सप्ताह भर पहले तक अपने दिल्ली स्थित कार्यालय और घर पर लगातार कार्यकर्ताओं से मिल रहे थे और उनकी शिकायतों को संजीदगी से ले रहे थे। वहीं केंद्रीय राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने तो प्रदेश में दौरा भी शुरू कर दिया है। राहुल मॉडल और हिमाचल फार्मूला का ही प्रभाव है कि लंबे अर्से दिग्विजय और ज्योतिरादित्य के बीच दूरियां कम होने लगी हंै। ऐसा माना जा रहा है कि ये सब राहुल गांधी के मॉडल पर चलने की शुरुआत है, ताकि इन आपसी दूरियों का फायदा कहीं शिवराज सिंह चौहान को न मिल जाए। दोनों के बीच घटती दूरियों का एक उदाहरण उस वक्त देखने को मिला, जब गुना में सिंधिया और दिग्विजय एक साथ पहुंचे, तो दिग्विजय सिंह खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया का स्वागत करने गए, जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया और दिग्विजय द्वारा पहनाए गए हार को सिंधिया ने उन्हीं को पहनाकर जिंदादिली का परिचय दिया। जानकारों का भी कहना है कि इस तरह से निकटता बढ़ जाती है, तो निश्चित तौर पर आगामी चुनावों में इसका लाभ प्रदेश कांग्रेस को मिलेगा। इधर कुछ महिनों से देखा जा रहा है कि दिग्विजय सिंह अपने सभी विरोधियों से हाथ मिला रहे हैं। स्पष्ट है कि आगामी चुनावों में वे कोई भी विरोधी तेवर नहीं चाहते। इस प्रकार से कांग्रेस की राजनीति में लगातार हो रहे बदलावों का कितना असर होगा, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन फिलहाल माहौल बनाने की कोशिशें लगातार की जा रही है। यह सिलसिला अगर जारी रहा, तो निश्चित तौर पर कांग्रेस को लाभ होगा। भूरिया को सुझाव 20 जुझारू और अनुभवी नेताओं की एक टीम बनाएं। दस नेता कार्यालय में बैठकर रणनीति बनाएंगे। दस नेताओं को मैदानी संघर्ष की जिम्मेदारी सौंपी जाए। मजबूत जनाधार वाले नेताओं को सक्रिय करें। बिना जनाधार वाले नेताओं को कांग्रेस में कोई जगह न दें। दिग्गज नेताओं को जिम्मेदारी सौंपे और उनके अनुभवों का लाभ लें। तेज-तर्रार विधायकों को सक्रिय करें और मतभेद दूर करें।

संघ की मेहनत...पंजे पर भारी पड़ेगा कमल

भोपाल। भाजपा के अंदुरूनी सर्वे में भले ही प्रदेश में पार्टी की स्थिति ठीक नहीं है लेकिन उज्जैन संभाग के छह जिलों(शाजापुर,देवास,रतलाम,मंदसौर,नीमच और उज्जैन) की 29 विधानसभा सीटों में से 23 पर भाजपा की स्थिति बेहतर बताई जा रही है। इसकी मुख्य वजह क्षेत्र में संघ की पकड़ और सक्रियता है। वर्तमान में संभाग की 29 विधानसभा सीटों में से 19 सीटों पर भाजपा का कब्जा है,जबकि कांग्रेस के पास 9 सीटें हैं,एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार के पास है। बताया जाता है कि 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को संभाग की जिन सीटों पर हार का सामना करना पड़ा वहां संघ ने अपनी गतिविधियां बढ़ा दी और भाजपा के लिए वोट बैंक तैयार करना शुरू कर दिया। यहां भाजपा करेगी कमबैक पार्टी के सर्वे में भाजपा अपनी वर्तमान विधानसभा सीटों के अलावा उज्जैन जिले के नागदा खाचरोद,रतलाम जिले के रतलाम ग्रामिण,रतलाम सिटी और नीमच जिले की मनासा सीट पर अच्छी स्थिति में नजर आ रही है। नागदा खाचरोद में भाजपा के दिलीप सिंह शेखावत को कांग्रेस के दिलीप गुर्जर ने 9892 मतों से मात दी थी। 2003 के विधानसभा चुनाव में गुर्जर ने निर्दनीय चुनाव लड़ा था और भाजपा के लालसिंह राणावत को हराया था। अब इस सीट पर भाजपा को मजबुत स्थिति में बताया जा रहा है। रतलाम जिले की रतलाम ग्रामीण (एसटी)सीट पर भाजपा के मथुरालाल डामर को कांग्रेस की लक्ष्मीदेवी खराड़ी ने 2551 वोटों से हराया था,जबकि 2003 के विधानसभा चुनाव में यह सीट भाजपा के कब्जे में थी। भाजपा के धूलजी चौधरी ने कांग्रेस के मोतीलाल दवे को हराया था। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सबसें बड़ा झटका रतलाम सिटी विधानसभा सीट पर लगा था। यहां निर्दलीय पारस सखलेचा ने तत्कालीन गृहमंत्री हिम्मत कोठारी को 29872 के मतों से मात देकर सबको चौका दिया था। बताया जाता है कि एक बार फिर से इस सीट पर भाजपा ने अपने आप को मजबुत कर लिया है। मनासा विधानसभा सीट पर भाजपा के पूर्व मंत्री कैलाश चावला को कांग्रेस के विजेन्द्र सिंह मालाखेड़ा 11485 मतों से हराया था। संघ की मेहनत से इस सीट पर भाजपा एक बार फिर मजबुत हो गई है। विकास नहीं संघ के नाम पर वोट इस संभाग से प्रदेश मंत्रिमंडल में चार मंत्री शामिल हैं,लेकिन विकास के मामले में पूरा क्षेत्र पिछड़ा हुआ है। देवास सीट से विधायक तुकांजीराव पंवार,मंदसौर जिले के मल्हारगढ़ के विधायक जगदीश देवड़ा परिवहन एवं जेल,उज्जैन उत्तर के विधायक पारस जैन खाद्य,नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण और आलोट के विधायक मनोहर ऊॅटवाल को नगरीय प्रशासन एवं विकास राज्य मंत्री बनाया गया है,लेकिन आरोप है कि संभाग में विकास के लिए मंत्रियों ने कोई विशेष प्रयास नहीं किया है। सर्वे में कहा गया है कि संभाग में संघ की सक्रियता और घर-घर में पहुंच ने यहां भाजपा को नुकसान नहीं होने दिया है। किसके पास कितनी सीट भाजपा तराना (अजा)-रोड़मल राठौर उज्जैन उत्तर-पारस जैन उज्जैन दक्षिण-शिवनारायण जागीरदार बडऩगर-शांतिलाल घवई आलोट (अजा)-मनोहर उटवाल मंदसौर-यशपाल सिसोदिया मल्हारगढ़ (अजा)-जगदीश देवड़ा सुवासरा-राधेश्याम पाटीदार नीमच- खुमान सिंह शिवाजी जावद-ओमप्रकाश सकलेचा सुसनेर-संतोष जोशी आगर (अजा)-लालजी राम शुजालपुर-जसवंत सिंह हाड़ा कालापीपल-बाबूलाल वर्मा सोनकच्छ (अजा)-फूलचंद वर्मा देवास-तुकोजीराव पवार हाटपिपल्या-दीपक जोशी खातेगाँव-बृजमोहन धूत बागली-चम्पालाल देवड़ा कांग्रेस- नागदा खाचरोद-दिलीप गुर्जर महिदपुर-कल्पना परूलेकर घटिया (अजा)-रामलाल मालवीय रतलाम ग्रामीण (एसटी-लक्ष्मीदेवी खराड़ी सैलाना (एसटी)-प्रभुदयाल गहलोत जावरा-महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा गरोठ -सुभाष सोजतिया मनासा-विजेन्द्र सिंह मालाखेड़ा शाजापुर-हुकुम सिंह कराड़ा निर्दलीय रतलाम सिटी-पारस सखलेचा

थ्री डी पोस्टरों से आईना दिखाएगी सरकार

भोपाल। प्रदेश में लगातार तीसरी बार सत्ता पर काबिज होने के लिए भाजपा के रणनीतिकार विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेश भर में शिवराज सिंह चौहान को महिमा मंडित करने नरेंद्र मोदी का थ्री डी फार्मूला अपनाने जा रहे हैं। इसके तहत भाजपा थ्री डी पोस्टरों के जरिए जहां शिवराज सरकार की योजनाओं का बखान करेगी वहीं कांग्रेस शासनकाल की बदहाली को लोगों के सामने परोसेगी। कांग्रेस को 2003 और 2013 की तस्वीर दिखाने की तैयारी मुंबई की एक कंपनी ने थ्री डी पोस्टरों को लेकर अपनी एक प्रस्तुति सरकार के सामने पेश की थी। उसके आईडिया को सरकार ने सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इन पोस्टरों की थीम भी तैयार कर ली गई है। अब उसे मूर्त रूप देने का काम तेजी से जारी है। सरकार इन थ्री डी पोस्टरों के जरिए जनता को यह बताएगी कि मध्यप्रदेश 2003 में कहां और कैसा था और अब 2013 में राज्य ने विकास की पायदानों को कितना चढ़ा है। थ्री डी पोस्टरों की खासियत यह रहेगी कि जब भी कोई व्यक्ति एक कोण से देखेगा तो उसे 2003 की तस्वीर दिखेगी। जब वह कोण बदलकर देखेगा तो 2013 का स्वरूप उसे नजर आएगा। 2003 बनाम 2013 के इन पोस्टरों में सड़क,बिजलीऔर पानी के साथ ही विकास के तमाम सूचकांकों के लिहाज से दिखाकर यह साबित करने की कोशिश की जाएगी कि कांग्रेस के दिग्विजय सिंह के दस साल के कार्यकाल के मुकाबले भाजपा सरकार के दस साल में कितना ज्यादा विकास किया। भाजपा इस बहाने शिवराज को विकास पुरूष के बतौर स्थापित करना चाहती है। भाजपा मीडिया सेल से जुड़े कार्यकर्ताओं की माने तो 2008 के चुनाव की तरह ही इस बार मोबाइल पर एसएमएस, कॉल और कॉलर ट्यून से प्रचार की तैयारी कर चुके हैं। नेट यूजर्स युवाओं से नेट के जरिए संपर्क किया जाएगा। जनवरी में हुई युवा पंचायत के जरिए भाजपा कार्याकर्ताओं ने इसमें शामिल हुए युवाओं का लेखा-जोखा रखा था। मीडिया सेल अब इसी डाटा के जरिए संपर्क साधने की तैयारी में है। यहां प्रचार हाईटेक प्रचार को मंजूरी मिलती है तो भाजपा चार बड़े व प्रमुख शहरों में इससे प्रचार करेगी। इनमें भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर होंगे। इसके अलावा उन जिलों को भी शामिल किए जाने की योजना है, जिनकी ग्रामीण सीमाएं अधिक हैं। प्रचार में उन क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान रहेगा, जहां से 2008 के चुनाव में भाजपा को शिकस्त मिली थी। इनका कहना है ऐसी दो कंपनियों ने हमसे संपर्क किया है, जो थ्रीडी मॉड्यूल पर काम करती हैं। हमने उनके प्रपोजल्स का प्रजेन्टेशन देखा है। विचार-विमर्श के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल अन्य माध्यमों से भाजपा ने प्रचार-प्रसार की तैयारी पूरी कर ली है। डॉ. हितेष वाजपेयी, प्रदेश भाजपा संवाद प्रमुख

मप्र में कपाट बंद... तो उप्र कार्यकारिणी में उमा का नाम नहीं..!

भोपाल। कभी भाजपा की राजनीति की धूरी रही साध्वी उमा भारती की स्थिति यह हो गई है कि न उन्हें घर(मप्र) में जगह मिल रही है और ना ही बाहर(उप्र) वाले पुछ रहे हैं। उधर खबर है कि पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह की टीम में भी उनको जगह मिलने की संभावना कम नजर आ रही है। ऐसे में उमा कहां जाएंगी यह सवाल हर किसी के मन में उठ रहा है। 7 साल से राजनीति वजूद अधर में 2005 में जब उमा भारती को पार्टी से निकाला गया था तब से लेकर अब तक वे अपना दमदार राजनीतिक वजूद बनाने में लगी हुई हैं लेकिन उन्हें मजबुत आधार नहीं मिल पा रहा है। जून 2011 में भाजपा में वापसी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश में अजमाया गया लेकिन वह वहां नहीं चल सकी। विधानसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी हार के बाद उन्होंने मप्र में सक्रिय होने के प्रयास किए लेकिन यहां पर नेताओं ने उनके लिए कपाट बंद कर दिए। यहां अपनी सक्रियता बढ़ाने के लिए उन्होंने संघ और संगठन का भी सहारा लिया लेकिन मप्र में सबकुछ बेहतर चल रहा है कह कर टाल दिया गया। अभी हाल ही में बांद्राभान में आयोजित एक कार्यक्रम में भी वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ मंच पर दिखी। प्रदेश में यह पहला आयोजन था जहां दोनों नेता एक साथ दिखे। उसके बाद खबर आई की उमा प्रदेश में सक्रिय होने के प्रयास में लगी हुई हैं। ऐसे में उनके लिए हैरान करने वाली एक खबर यह आई है कि उन्हें भाजपा उत्तर प्रदेश इकाई की कार्यकारिणी में भी जगह नहीं मिल पाई है। प्रदेश नेतृत्व की तरफ से हालांकि संशोधित सूची जारी करने की बात भी कही जा रही है। उमा को नई टीम में जगह नहीं मिलने के बारे में प्रदेश अध्यक्ष वाजपेयी का कहना है कि उमा भारती का नाम भूलवश छूट गया है, संशोधित सूची जल्द ही जारी की जाएगी, जिसमें उनका नाम स्थाई आमंत्रित सदस्यों के साथ शामिल किया जाएगा। वाजपेयी ने कहा कि उमा भारती राष्ट्रीय स्तर की नेता हैं और इस नाते उन्हें स्थाई आमंत्रित सदस्यों की श्रेणी में आने का अधिकार प्राप्त है। दो बार पार्टी से हो चुकी हैं बाहर राम मंदिर आंदोलन के अग्रदूतों में से एक रहीं उमा भारती एक समय न सिर्फ भाजपा और हिंदुत्व का चेहरा तो थी हीं बल्कि सामाजिक न्याय का भी प्रतिनिधित्व किया करती थीं। भाजपा की प्रमुख प्रचारकों में से एक रहीं उमा भारती अपने उग्र भाषणों के जरिए बार-बार पार्टी के लिए लोगों के वोट को खींचने का काम करती रहीं। मध्य प्रदेश में सत्ताधारी कांग्रेस सरकार को बेदखल करने का श्रेय भी उमा भारती को ही जाता है। साल 2003 के चुनावों में भारी जीत हासिल करने वाली भाजपा की ओर से उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनाई गईं। उमा भारती को दो बार भारतीय जनता पार्टी से निकाला गया। पहली बार साल 2004 में उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी के खिलाफ बयानबाजी की। हालांकि जल्द ही वर्ष 2005 में उनकी पार्टी में वापसी हो गई। इसके बाद 2005 के अंत में पार्टी द्वारा शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री निर्वाचित करने पर उन्होंने फिर भड़काऊ बयान दिए, जिसके कारण उन्हें एक बार से बाहर का रास्ता देखना पड़ा। जून 2011 में उमा भारती को पार्टी में दोबारा शामिल कर लिया गया और उनकी अगुआई में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव लड़ा गया लेकिन उनका जादू नहीं चल पाया और भाजपा को करारी हार मिली।

ज्योतिरादित्य पर मिशन का दारोमदार

भोपाल। कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी राहुल गांधी के संभालने के बाद से उनकी युवा ब्रिगेड के साथी केंद्रीय ऊर्जा राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की सक्रियता ग्वालियर-चंबल संभाग के बाहर तेजी से बढ़ रही है। उनकी इस सक्रियता के सियासी मायने निकाले जाने लगे हैं और बताया जा रहा है कि कांग्रेस के मिशन 2013 फतह का पूरा दारोमदार सिंधिया के कंधे पर ही होगा। राहुल आगामी विधानसभा चुनाव में राज्य में कांग्रेस की सत्ता में वापसी हर कीमत पर चाहते हैं। इसके लिए वे तमाम नेताओं को गुटबाजी भुलाकर काम करने के निर्देश भी दे चुके हैं। पार्टी की रणनीति के मुताबिक सक्रिय हैं सिंधिया लंबे अरसे से सिंधिया को पार्टी की ओर से राज्य की कमान सौंपे जाने की चर्चा सियासी गलियारे में है। पार्टी सूत्रों पर भरोसा करें तो सिंधिया पर पार्टी दांव लगाने को तैयार है। यह बात अलग है कि चुनाव से पूर्व पार्टी मुख्यमंत्री का उम्मीदवार किसी को घोषित नहीं करने वाली है। पार्टी की रणनीति के मुताबिक सिंधिया राज्य के कई हिस्सों में राजीव गांधी विद्युतीकरण योजना के विस्तार के नाम पर दौरा करेंगे। मालवा निमाड़ दौरे से इसकी शुरुआत भी कर चुके हैं। सिंधिया पर दांव लगाने की वजह भी हैं। सिंधिया किसी तरह के विवाद में नहीं हैं। युवा व उर्जावान हैं। अपनी बात साफगोई से रखते हैं। इतना ही नहीं उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया का भी राजनीति में दखल रहा है। उनकी छवि भी साफ सुथरे नेता की रही है। क्षत्रपों नहीं कार्यकर्ताओं के साथ यात्रा सिंधिया की इस सक्रियता में एक बात देखने को मिल रही है वह बिना किसी क्षत्रप के साथ लिए ही घूम रहे हैं। सिंधिया पार्टी में चलने वाली गुटबाजी से अपने को दूर रखना चाहते हैं। उनकी यह भी कोशिश है कि जिस इलाके में जाएं वहां के सभी गुट के कार्यकर्ता उनसे जुड़ें। यही कारण है कि वे किसी अन्य को साथ लेकर चलने की बजाय अकेले ही दौरा करने में भरोसा कर रहे हैं। यही सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। सिंधिया ने अभी हाल ही में सीहोर से लेकर शाजापुर, रतलाम व मंदसौर में तूफानी दौरा करने के दौरान साफ कर दिया कि पार्टी की मजबूती उनकी प्राथमिकता है। उनके इन कार्यक्रमों के दौरान वे नेता भी नजर आए जिनकी निष्ठा किसी दूसरे नेता के प्रति जग जाहिर है। सक्रियता को लेकर हर तरफ से उठ रहे सवालों पर वे खुद विराम लगाने की कोशिश करने से नहीं चूकते। राहुल की टीम ने सिंधिया को बताया सीएम मटेरियल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी में पहली दफा उपयुक्त प्रत्याशियों के साथ-साथ मुख्यमंत्री पद के लिए संभावित चेहरों का गोपनीय सर्वे विगत दो माह से चल रहा था, इस सर्वे में ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री पद के लिए सर्वाधिक अंक मिले हैं। कांग्रेस कल्चर में मुख्यमंत्री पद के लिए किसी व्यक्ति विशेष को प्रोजेक्ट करने की परंपरा नहीं है, लेकिन राजनीति में कार्पोरेट कल्चर हावी हाने के बाद शीर्ष नेतृत्व सीएम प्रोजेक्शन का यह उपक्रम किया। यह सर्वे राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की सीधी निगरानी में किया गया। प्रदेश की सभी लोकसभा सीटों के लिए बनाए गए पर्यवेक्षकों को क्रमश: दस-दस सीटों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने की जवाबदारी देते हुए उन्हें राज्य के विधानसभा सीटों के लिए भी उपयुक्त दावेदारों का पैनल बनाने को कहा गया था। साथ ही मुख्यमंत्री पद के लिए कौन सबसे ज्यादा उपयुक्त है? यह पता लगाने के लिए भी कहा गया था। पर्यवेक्षकों ने पार्टी नेता, कार्यकर्ता एवं आम जन से यह पता लगाने की कोशिश की कि आपकी नजर में मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे बेहतर कौन है? मध्यप्रदेश की दस लोकसभा सीटों के लिए सर्वे पर आए महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री विजय विट्टीवार ने पिछले दिनों टीकमगढ़, छतरपुर, खजुराहो, पन्ना, सतना, रीवा, कटनी, दमोह और सागर का दौरा किया इस दौरान पूछे गए सवालों में संभावित मुख्यमंत्री का सवाल भी शामिल था। सवालों के जवाब के लिए पार्टी द्वारा बनाया गया प्रोफर्मा बाकायदा भरवाया गया। जिसमें मुख्यमंत्री पद के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रोजेक्ट करने की बात सामने आई। कांग्रेस में दिखाई पड़ रहे इस बदलाव को पिछले दिनों राहुल गांधी द्वारा दिल्ली में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष, नेता प्रतिपक्षों की बैठक के असर से जोड़कर देखा जा रहा है। जो लगातार पार्टी के रिफार्मेशन में लगे हुए हैं।

जनाधार वाले मुस्लिम नेताओं को साधेगी कांग्रेस

भोपाल। विधानसभा चुनाव की चुनौती का सामना करने के लिए खुद को तैयार कर रही कांग्रेस के पास मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने के लिए अब मुस्लिम नेता के नाम पर सिर्फ भोपाल से आरिफ अकील बचे हैं। ऐसे में पार्टी प्रदेश में मुस्लिम नेतृत्व को तरस गई है। नेतृत्व के अभाव से जूझ रही पार्टी की मुसीबत उन मुस्लिम नेताओं ने और बढ़ा दी है जो उसके पाले में मौजूद हैं। उनमें से पूर्व सांसद गुफराने आजम और असलम शेर खां ने लंबे अरसे से पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बागी तेवर अख्तियार कर रखे हैं। ऐसी ही तेवर दिखाने वाले पूर्व सांसद अजीज कुरैशी उत्तराखंड के राज्यपाल बनकर प्रदेश से बाहर हो गए हैं। लेकिन अब इस चुनावी साल में पार्टी सभी मतभेद भुलाकर जनाधार वाल मुस्लिम नेताओं को साधने की तैयारी कर रही है। उपचुनावों में कांग्रेस से बिछड़ गए मुस्लिम प्रदेश में कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहे मुस्लिम मतदाता पिछले 5 सालों में भाजपा के खेमें में आ गए हैं। 2003 की अपेक्षा 2008 के विधानसभा चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं ने भाजपा के पक्ष में कुछ हद तक अधिक मतदान किया तो उसके बाद हुए 5 उपचुनावों के तो उन्होंने कांग्रेस से नाता तोडऩे का संकेत दे दिया। अब इस चुनावी साल में जब कांग्रेस ने इसका विश£ेषण किया तो उसके होश ही उड़ गए। साल 2011 में हुए तीन विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में मुस्लिम बहुल मतदान केंद्रों पर भाजपा को कांग्रेस से ज्यादा वोट हासिल हुए। जबेरा उपचुनाव में मुस्लिम बहुल 29 मतदान केंद्रों पर कांग्रेस के 6,506 के मुकाबले भाजपा को 8,665 वोट मिले। इसी तरह हाई प्रोफाइल सीट कुक्षी के 40 मुस्लिम बहुल मतदान केंद्रों पर कांग्रेस को 8,699 और भाजपा को 15,058 एवं सोनकच्छ सीट के 53 मुस्लिम बहुल मतदान केंद्रों पर कांग्रेस को 15,800 और भाजपा को 18,308 वोट मिले। 2008 के विधानसभा चुनाव में सोनकच्छ में उन 53 केंद्रों पर भाजपा को महज 12,939 और कांग्रेस को 16,167 वोट मिले थे। शिवराज की छवि बनी बाधा कांग्रेस और मुस्लिम मतदाओं के बीच लगातार बढ़ रही दूरी की मुख्य वजह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धर्मनिरपेक्ष छवि है। मध्यप्रदेश अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष हिदायतुल्ला शेख कहते हैं,प्रदेश में कांग्रेस के पक्ष में मुसलमानों का मतदान अब इतिहास की बात है। भाजपा केवल लुभावने नारों एवं बातों तक ही सीमित नहीं है। मुस्लिम समुदाय के नेताओं को तरजीह देते हुए पार्टी ने उन्हें विभिन्न पदों से नवाजा है। मध्यप्रदेश राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष पद लगभग ढाई साल तक खाली रहने पर कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगाया था कि वह अल्पसंख्यकों की उपेक्षा कर रही है.भाजपा ने तत्काल अनवर मोहम्मद खान को राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया। मध्यप्रदेश मदरसा बोर्ड, मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी एवं मध्यप्रदेश हज कमिटी में अध्यक्ष पद पर भाजपा ने राजनीतिक नियुक्ति करने के अलावा मध्यप्रदेश कुक्कुट विकास निगम, भोपाल विकास प्राधिकरण एवं देवास विकास प्राधिकरण में उपाध्यक्ष पद पर भी मुस्लिम समुदाय के नेताओं को ही बिठाया है। मुस्लिम नेताओं में समन्वय नहीं कांग्रेस में जितने भी मुस्लिम नेता हैं उनमें समन्वय नहीं है। 230 सदस्यों वाली मप्र विधानसभा में अकेले मुसलिम विधायक आरिफ अकील अपनी मर्जी के मालिक हैं। उनका गुफराने आजम से भी 36 का आंकड़ा है। मुसलिम नेतृत्व के संकट से जूझ रही कांग्रेस की परेशानी वरिष्ठ नेता गुफराने आजम और असलम शेर खां ने और बढ़ा दी है। गुफराने लोकसभा, राज्यसभा व कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य, पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष और युवा कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री और असलम पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री व हाकी के ओलंपिक खिलाड़ी रहे हैं। दोनों नेता पार्टी में अल्पसंख्यकों व जमीनी मुद्दों की अनदेखी का आरोप लगाते हुए लगातार कांग्रेस नेतृत्व को कोस रहे हैं। गुफराने ने तो पार्टी प्रदेशाध्यक्ष कांतिलाल भूरिया को नकारा करार देते हुए यहां तक कह दिया कि 2003 और 2008 की तरह 2013 का विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस नहीं जीत पाएगी। असलम भी कह चुके हैं कि पार्टी का यही हाल रहा तो उसका बेड़ा पार होना मुश्किल होगा। वहीं प्रदेश कांग्रेस इब्राहिम कुरैशी,सचिव अब्दुल रज्जाक, प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य निजामुद्दीन अंसारी 'चांदÓ,सईद अहमद सुरूर,नासीर इस्लाम,हफीज कुरैशी,शबाना सोहेल व पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग के प्रदेशाध्यक्ष हाजी हारुन भी अपनी डफली अपना राग अलाप रहे हैं।

चुनावी साल में कांग्रेसियों को साल रहे भूरिया

भोपाल। यह चुनावी साल है। ऐसे में हर नेता अपनी पार्टी के मुखिया के इर्द-गिर्द नजर आता है,लेकिन कांग्रेस में आलम यह है कि प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया अपने ही नेताओं को साल (खटक)रहे हैं। यही कारण है कि अब नेता भूरिया से दूरी बनाने लगे हैं। इसका नजारा भूरिया के कार्यक्रमों में देखने को मिल रहा है। इसके पीछे वजह यह बताई जा रही है कि भूरिया ने जिस प्रकार एकला चलो की नीति अपनाई है उससे पार्टी पदाधिकारियों और नेताओं में रोष व्याप्त है। सलमान के नाम पर भीड़ जुटाने की कवायद 24 फरवरी को पन्ना जिले के शाहनगर कस्बे में भूरिया की सभा थी। सभा में भरसक प्रयास कर करीब पंद्रह हजार की भीड़ जुटाई गयी थी। लोगों के बीच बोलने के लिए उज्जैन के सांसद प्रेमचंद गुड्डू साथ आए थे। लेकिन कांग्रेस का कोई भी कद्दावर और बड़ा नेता वहां नहीं पंहुचा। प्रचार खूब किया गया कि अभिनेता सलमान खान वहाँ पहुंच रहे हैं, दिग्विजय सिंह भी वहां पहुचेंगे और नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के पहुंचने का माहौल बनाया गया लेकिन पहुंचे सिर्फ भूरिया और गुड्डू ही। मुख्य मेहमानों के आने के पहले आयोजकों ने एक युवक जो दूर से देखने में कुछ-कुछ सलमान खान की बनावट का था, कद-कांठी का कतई नहीं। उसे सलमान के तौर पर पेश किया और जैसे हीभूरिया मंच पर पहुंचे, क्षण भर में ही उसे गायब कर दिया गया। समझने वालों से यह बात छुपी नहीं रह सकी, समझदार जनता भी सब जान गई। पहले दो बार पवई विधानसभा से विधायक चुनकर मंत्री रह चुके मुकेश नायक ने भी सभा में जाना उचित नहीं समझा, जबकि इलाके में उनका अच्छा लोकव्यवहार और सम्मान है। वे पिछला चुनाव वर्तमान राज्य मंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह के मुकाबले मात्र ग्यारह सौ मतों से हारे थे। वैसे वस्तु स्थिति भी यही है कि पार्टी जनों और जनता के बीच कांतिलाल भूरिया की साख दिन पर दिन गिरती जा रही है। पिछले डेढ़ वर्ष में वे अनेक बार गुहार लगा चुके हैं कि मध्यप्रदेश कमेटी के अध्यक्ष वही हैं और उन्हें हटाया नहीं जा रहा है। हरिबोला की तरह बार-बार चिल्लाने के बाद भी कि वही राज्य में कांग्रेस के तारनहार हैं, हर जिम्मेदार नेता उनसे बचकर भाग क्यों रहा है? आज आदिवासी वोट बैंक को पुन: कबजाने के लिए कांतिलाल भूरिया को प्रदेश अध्यक्ष बना कर भेजा गया, लेकिन वो भी गुटबाजी की गांठ को और भी कस दिये। नतीजा पार्टी के अंदर उनका जमकर विरोध शुरू हो गया है। गत वर्ष विधायक कल्पना पारूलेकर सहित बीस विधायकों ने दमदारी के साथ भूरिया की खिलाफत करके बता दिया कि कांतिलाल नहीं चलेंगे। कल्पना पारूलेकर कहती हैं, कांतिलाल भूरिया की वजह से कांग्रेस रसातल में जा रही है। कांग्रेस को मजबूत करने की बजाय उन्होंने उसे गुटों में बांट दिया है। उन्हें मुद्दे उठाना नहीं आता। कई मामले में ऐसा लगता है कि उनकी सांठ गांठ सत्ता पक्ष से है। केवल प्रवक्ताओं की फौज खड़ी करने से काम नहीं चलेगा। यदि 2013 का चुनाव कांग्रेस जीतना चाहती है तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमान सौंपना ही होगा। अन्यथा कांग्रेस एक बार फिर औंधे मुंह गिर जाएगी। यह अकेले कल्पना की ही आवाज नहीं है। देखा जा रहा है कि कमलनाथ के आदमी हों या फिर दिग्विजय के समर्थक सभी ज्योतिरादित्य के साथ खड़े होने को आतुर हैं। विधायक अमृतलाल जायसवाल कहते हैं, कांतिलाल भूरिया के आने से कांग्रेस में तेजी आई है। अभी कांग्रेस में जैसा चल रहा है उसे ठीक ठाक कहा जा सकता है। चुनाव का जहां तक सवाल है, तो राजनीति हमेशा लोकप्रियता पर चलती है। लोकप्रिय व्यक्ति की ही बात सुनी जाती है। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के स्टार प्रचारक की भूमिका निबाह सकते हैं। उनमें युवाओं को जोडऩे का आकर्षण है। जितने युवा जुड़ेंगे वो कांग्रेस के लिए प्लस होगा।

भाजपा का कटघरा...कांग्रेस का रथ

भोपाल। मप्र में चुनावी बिसात बिछ गई है। भाजपा और कांग्रेस के रणनीतिकारों ने मोहरे बिछानी शुरू कर दी है। शह-मात के इस द्वंद्व में बाजी कौन मारेगा यह तो नवंबर में चुनाव के बाद आने वाले परिणाम के बाद ही पता चलेगा,लेकिन एक-दूसरे को घेरने के लिए दोनों दलों ने मैदानी अभियान तेज कर दिया है। कांग्रेस को घेरने के लिए भाजपा ने महाजनसंपर्क अभियान के रूप में कटघरा बना रखा है वहीं कांग्रेसी ने भाजपा को घेरने के लिए किसान बचाओ रथ पर सवार हैं। महाजनसंपर्क अभियान बनाम किसान बचाओ रथयात्रा विधानसभा चुनाव को अभी करीब 8 माह समय बचा है,लेकिन काम करने के लिए 3-4 माह ही मिलेंगे। इसलिए दोनों पाटिर्यों ने बरसात से पहले ग्रमीण इलाकों के मतदाताओं को पटाने का अभियान शुरू कर दिया है। कांग्रेस किसान मोर्चा ने 1 फरवरी से किसान बचाओ रथयात्रा निकाल कर भाजपा सरकार को किसान और आम आदमी विरोधी होने का प्रचार करती फिर रही है वहीं भाजपा ने 25 फरवरी से महाजनसंपर्क अभियान शुरू कर दिया है। इस अभियान के तहत भाजपा शिवराज सिंह चैहान की आम आदमी-गरीब आदमी के कल्याण की कुछ अद्भुत और अति लोकप्रिय योजनाओं के सहारे विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने की उधेड़बुन में लगी है और गरीब आदमी का आम आदमी का मुख्यमंत्री शिवराज सिंह वाली छवि के साथ अपने अभियान को गति देने में लगी है। 'महाजनसंपर्कÓ अभियान 20 मार्च तक प्रदेश के 14 नगर निगम, 88 नगरपालिकाओं और 236 नगर पंचायतों, 23 हजार ग्राम पंचायतों तक करीब 3500 टोलियां 53 हजार मतदान केन्द्रों के $ढ़ाई करोड़ मतदाताओं के बीच पहुंचेगी। इस अभियान के दौरान भाजपा नेता केंद्र सरकार की जनविरोधी छवि को मतदाताओं से सामने प्रस्तुत कर रही है। जिसमें महंगाई और भ्रष्टाचार प्रमुख है। गुप्त अभियान पर सिंधिया कांग्रेस इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में बदली रणनीति के साथ उतरेगी। खास तौर से मध्यप्रदेश कांग्रेस के एजेंडे में सबसे ऊपर है, जहां उसकी कोशिश किसी भी कीमत में भाजपा को जीत की हैट्रिक बनाने से रोकने की है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का हर सीट पर अपना एक वोटबैंक बनने की रिपोर्ट से कांग्रेस हलकान है। इसीलिए, तमाम सिर फुटौव्वल के बावजूद राज्य में केंद्रीय ऊर्जा राज्य मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को आलाकमान ने एक गुप्त एजेंडे के तहत प्रदेश मेें सक्रिय कर दिया है। शायद यही कारण है कि भाजपा के महाजनसंपर्क अभियान बनाम कांग्रेस के किसान बचाओ रथयात्रा के इतर केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया प्रदेश के ग्रामिण अंचलों का दौरा कर रहे हैं। शिवराज के व्यक्तिगत वोटबैंक बाधक बताया जाता है कि मध्यप्रदेश में एक दशक बाद सत्ता में वापसी की कोशिश में कांग्रेस शिवराज के व्यक्तिगत वोटबैंक को अपने मिशन में बाधक मान रही है। चुनावों की तैयारियों से पहले जमीनी हकीकत की समीक्षा के बाद कांग्रेस हाईकमान ने इन हालात को देखते हुए तय किया है कि प्रदेश में पार्टी बिना चेहरे के नहीं दिखेगी। दिग्विजय सिंह, कमलनाथ,सुरेश पचौैरी, ज्योतिरादित्य सिंधिया आदि तमाम क्षत्रपों के गुटों में बंटी कांग्रेस कहीं से भी शिवराज के सामने खड़ी नहीं दिख रही है। लिहाजा, पार्टी ने तय किया कि यहां पर युवा चेहरे के रूप में ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे बढ़ाया जाएगा। हालांकि सिंधिया पार्टी का चेहरा बनने की खबर से इंकार कर रहे हैं लेकिन प्रदेश में उनकी सक्रियता इसका संकेत दे रही है। इनका कहना है भाजपा सरकार ने प्रत्येक वर्ग की चिंता की है। प्रदेश के संवेदनशील मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रत्येक वर्ग की महापंचायत बुलाकर उनकी समस्याओं का निराकरण किया है। अपने प्रदेश को स्वर्णिम बनाने के सपने के मुख्यमंत्री पूरा करने में लगे है। जितने विकास कार्य इस सरकार में हुए है। उतने पहले कभी किसी सरकार में देखने को नहीं मिले है। माखन सिंह पूर्व प्रदेश संगठन महामंत्री,भाजपा प्रदेश में भाजपा सरकार ने पिछले 9 साल में घोषणाओं के अलावा कुछ नहीं किया है। किसान बचाओ रथयात्रा के दौरान किसानों के साथ प्रदेश सरकार द्वारा किए गए छलावे की हकीकत सामने आ रही है। हमारी रथ यात्रा का समापन 28 फरवरी को होगा। इस दिन तीजबडली में सम्मेलन आयोजित कर सरकार के खिलाफ शंखनाद किया जाएगा। वीरेंद्र सिंह राणा प्रदेशाध्यक्ष किसान कांग्रेस

गढ़ घेरने निकले ज्योतिरादित्य

भोपाल। सरकार के खिलाफ अंडरकरंट की खबर के बाद भी कांग्रेस में करंट नजर नहीं आ रहा है। इन सब के बीच केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मप्र भाजपा के दिग्गज नेताओं को उनके गढ़ में घेरने के लिए निकल पड़े हैं। सिंधिया के इस अभियान ने भाजपा को चिंता में डाल दिया है, क्योंकि सिंधिया का अभियान भी ग्रामीण इलाकों पर केंद्रित है जहां पर आज से भाजपा ने पहुंचने के लिए महाजनसंपर्क अभियान शुरू किया है। कांग्रेस में सुन-सपाटा सिंधिया के अभियान से भले ही भाजपा के नेता चिंतिन हों लेकिन गुटों में बटीं कांग्रेस में सुन-सपाटा है। एक ओर भाजपा नेतृत्व ने मप्र में शिवराज सिंह चौहान को फ्रीहैंड दिया है और संगठन में भी उनकी पसंद का ध्यान रखा जा रहा है। यह भी तय है कि भाजपा अगला चुनाव शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में और उन्हें तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने के नाम पर लडऩे जा रही है। शिवराज के खास नरेन्द्र सिंह तोमर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद चुनावी तैयारियों में जुट गए हैं। वहीं कांग्रेस अभी तक कोई कार्य योजना ही नहीं बना पाई है। चुनावी साल में सिंधिया की इस यात्रा ने प्रदेश की राजनीतिक गतिविधियां तेज कर दी है। चुनाव मैदान में उतरने की इच्छा रखने वाले कांग्रेस नेताओं की सक्रियता भी बढ़ गई है। नए राजनीतिक समीकरण बनने के संकेत भी नजर आ रहे हैं, कांग्रेस सांसद सज्जन सिंह वर्मा के निर्वाचन क्षेत्र में केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के अनेक आयोजनों में आने से कांग्रेस कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ा हुआ है। सदन में सक्रिय, सड़क पर ठंडी कांग्रेस के बारे में यह कहा जाता है कि विधानसभा के अंदर अजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस विधायक दल बेहतर भूमिका निभा रहा है। पिछले कई सत्रों में मुद्दों के आधार पर कांग्रेस ने राज्य सरकार को घेरने का प्रयास किया, लेकिन सड़क पर कांग्रेस कहीं दिखाई नहीं दे रही। कांग्रेस के शो पीस प्रदेश कांग्रेस में अध्यक्ष के अलावा 11 उपाध्यक्ष, 1 कोषाध्यक्ष, 16 महामंत्री, 48 सचिव, 51 कार्यकारिणी सदस्य, 40 विशेष आमंत्रित सदस्यों के अलावा 20 सदस्यीय निगरानी समिति है जिसे केन्द्र सरकार द्वारा पोषित योजनाओं की निगरानी का जिम्मा है। इसके अलावा 11 सदस्यीय अनुशासन समिति। महिला कांग्रेस, युवक कांग्रेस, कांग्रेस सेवा दल, भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ की शाखाएं प्रदेशभर में बनाई गई हैं। यही नहीं कांग्रेस ने 9 विभाग अलग से काम कर रहे हैं। इनमें आरोप पत्र विभाग, किसान खेत मजदूर विभाग, विधि एवं मानव अधिकार विभाग, अनुसूचित जाति विभाग, अनुसूचित जनजाति विभाग, अल्पसंख्यक विभाग, भूतपूर्व सैनिक विभाग, विचार विभाग, मीडिया विभाग। कांग्रेस की सदन में ताकत प्रदेश विधानसभा के 230 सदस्यों में 66 कांग्रेस के विधायक हैं। इसी प्रकार लोकसभा की 29 सीटों में 12 सदस्य कांग्रेस के हैं। राज्यसभा की 11 सीटों में कांग्रेस मात्र 1 सीट पर काबिज है।

भाजपा तलाश कर रही है जीतने वाले चेहरे

भोपाल। खुफिया महकमें से प्रदेश के हर जिले में विधानसभावार उम्मीदवारों को तलाशने में लगी है भाजपा। भाजपा उन चेहरों को तलाश रही है, जो जीत सकते हैं तथा उन मंत्रियों और विधायकों की वर्तमान स्थिति भी तलाशी जा रही है। यह रिपोर्ट सत्ता और संगठन तक पहुंचेगी। संघ के लोग इस प्रक्रिया को लेकर अंदरखाने नाराज हैं। अभी तक यह काम संघ करता रहा है। बताया जाता है कि सूची पर सत्ता का शिखर नेतृत्व जिलों के कलेक्टरों से भी राय ले सकता है। सत्ता और संगठन ने समन्वय की दृष्टि से इस बार यह नई प्रक्रिया अपनाई है। खुफिया सोर्स से पार्टियां अपने लिए सूचनाएं मंगाती रहती है, यह कोई नई बात नहीं है। कांग्रेस में यह परम्परा बहुत पुरानी है। पहली बार संघ के अलावा भी भाजपा ऐसे सूत्रों से जीतने वाले उम्मीदवार तलाश रही है। संगठन का सीधे खुफिया स्रोतों से कोई सीधा वास्ता नहीं पड़ता और सत्ता के कई ध्रुव है जो संपर्क में रहते। संघ के एक प्रचारक इस बात की जांच करने इंदौर संभाग पर निकले हैं। धार और झाबुआ के बीच में रुकते-रुकते वे इस खबर की तफ्तीश कर रहे थे। अचानक वे झाबुआ जिला पंचायत के एक अधिकारी की बात से चौंक गए। उन्होंने जिले के तमाम भाजपा नेताओं से कहा कि प्रशासन बड़ी ताकत होती है। हमसे आपकी पार्टी के लोग कई सूचनाएं लेते हैं, अच्छा व्यवहार करो अन्यथा आपका टिकट कट सकता है। उसने पूछा कि क्यों और कैसे। तब उसने राज खोला कि हम लोग एक रिपोर्ट पर काम कर रहे हैं, जिसमें जितने वालों की जानकारी इक_ा की हुई है। संघ का वह प्रचारक चौंक पड़ा। जब वह इंदौर से निकला था तो उसके कान पर इस तरह की वार्ता पुराने संघ से सम्पर्क रखने वाले लोगों द्वारा सुनाई दी थी। उसे तब तो विश्वास नहीं हुआ, लेकिन जब वह झाबुआ में उक्त अधिकारी के संपर्क में आया तो फिर उसे दाल में काला दिखा। लौटते समय आलीराजपुर, बड़वानी, खंडवा, खरगोन, बुरहानपुर और धार होते हुए उसने सही तथ्य जुटाए। अब वे इस जानकारी को किस तरह संघ से संगठन तक पहुंचाते हैं, यह देखने वाली बात होगी। पिछले दिनों एक बात अंदरखाने तेजी से चल रही है कि प्रदेश में प्रशासन राज चल रहा है। भोजशाला के संदर्भ में संघ ने यही कुछ महसूस किया। हालांकि उसके पुख्ता प्रमाण अभी तक नहीं मिले हैं। कहा जा रहा है कि सत्ता और संघ के बीच एक हल्की नाराजी की लकीर खिंच आई है। संगठन के नवनियुक्त कप्तान इस खाई को पाटने में लगे हैं। उनकी कोशिश यह है कि चुनाव इतने नजदीक है, तब भोजशाला के नाम पर प्रशासन से कोई नया पंगा भी न हो और कार्यकर्ताओं की नाराजी को भी दूर कर लिया जाए, मगर यह यक्ष प्रश्न तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं के सामने खड़ा हो गया है कि क्या उनके जिले में विधानसभा की टिकट प्रशासन की हरी झंडी पर आधारित होगी? 60 से 80 भाजपा विधायक खतरे के निशान पर भाजपा के जिस आंतरिक सर्वे ने मुख्यमंत्री तक की नींद उड़ाई हुई है उसमें मंत्रियों को भी निशाना बनाया गया है। एक डेढ़ दर्जन से अधिक मंत्रियों के हारने की आशंका जताई गई है। महाकोशल के दो मंत्रियों पर संदेह का साया दिखाया गया है। कई विधायक भी खतरे के निशान पर है और यही वजह है कि निकट भविष्य में मुख्यमंत्री स्वंय प्रदेश का दौरा करने निकलेंगे। सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री (संगठन) भोपाल आये थे और उन्हें भी इस सर्वे रिपोर्ट से अवगत कराया गया। दावा यह भी हो रहा है कि राष्ट्रीय महामंत्री ने खुद उन नेताओं से चर्चा किया जिन्होंने यह सर्वे कराया। एक एनजीओ तथा कुछ इंटेलिजेंस अधिकारियों से सर्वे कराने की बात कही गई। यह भी राष्ट्रीय महामंत्री को बताया गया कि सर्वे से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व नये प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर भी वाकिफ हैं। मुख्यमंत्री ने सर्वे के मुताबिक कार्य भी शुरू कर दिया है और वे अफसरों तथा मंत्रियों से वन-टू-वन विचार विमर्श भी कर रहे हैं। श्री चौहान पूरे प्रदेश का दौरा भी करेंगे। जिन मंत्रियों पर लाल यानि हार जायेंगे या पीला यानि हार सकते हंै का निशान लगा है की भी जानकारी दी गई। तकरीबन 6 से ज्यादा केबिनेट मंत्रियों की हालत खराब है और इतने से ही अधिक राज्यमंत्रियों से भी क्षेत्र की जनता नाराज है। यह भी राष्ट्रीय महामंत्री को फीड किया गया। महाकोशल क्षेत्र के दो मंत्रियों के नाम उनमें शामिल बताये गये जो मंत्री हार जायेंगे या हार सकते हैं। 60 से 80 ऐसे विधायक का भी खुलासा किया गया जो सत्ता विरोधी और स्वंय के कारनामे से पार्टी की साख पर बट्टा लगा देंगे। दबी जुबान से यह भी कहा गया कि इस बार सर्वे के आधार पर प्रत्याशी चयन किया जाये तथा ज्यादा से ज्यादा नये चेहरे उतारे जायें। आखिर में यह तय किया गया कि जल्द ही चुनाव की रणनीति बनाई जाये और पार्टी को एकजुट करने के प्रयास हों। 25 फरवरी का महा जनसम्पर्क अभियान भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है। इसके बाद प्रभारी मंत्रियों की गुद्दी कसी जायेगी और जिला व संभाग स्तर पर संगठन द्वारा विधायक कार्य की समीक्षा होगी। कलेक्टर्स से मंगवाए जिताऊ नेताओं के नाम मध्यप्रदेश में इन दिनों ठीक वैसा ही प्रशासनिक चुनावी प्रबंधन दिखाई दे रहा है जैसा कि कभी इंदिरा गांधी के समय दिखाई दिया करता था। सीएम के सचिवालय ने कलेक्टरों से भाजपा के ऐसे नेताओं के नाम मांगे हैं जो आगामी विधानसभा चुनावों में जिताऊ प्रत्याशी हो सकते हैं। सामान्यत: प्रशासनिक अधिकारी चुनावों पर अपनी रायशुमारी दिया ही करते हैं और वो हमेशा अनआफिसीयल ही होती है परंतु उनकी रायशुमारी का यूज नहीं किया जाता। कम से कम भाजपा में तो यह कल्चर कतई नहीं रहा कि प्रशासनिक अधिकारियों की राय को वेल्यू दी जाए। भाजपा में वेल्यू आरएसएस के सुझावों को दी जाती है, परंतु टीम शिवराज ने भाजपा की परंपरा के इतर वही पेटर्न यूज करने का मन बनाया है जो इंदिरा गांधी यूज किया करतीं थीं। सीएम का सचिवालय इन दिनों कलेक्टरों से रायशुमारी कर रहा है कि इलाके में जमीनी लेवल पर किस भाजपा नेता की पकड़ मजबूत है और कौन आगामी विधानसभा चुनावों में जिताऊ प्रत्याशी हो सकता है। इसके लिए बाकायदा सूची बनाई जा रही है और कई जिलों के कलेक्टर्स गंभीरतापूर्वक अपनी रिपोर्टस भी भेज रहे हैं। ब्यूरोक्रेट्स और शिवराज सिंह की जुगलबंदी किसी से छिपी नहीं है और मध्यप्रदेश में तीसरी बार सरकार बनाने के लिए भाजपा में शिवराज सिंह को फ्रीहेंड भी मिला हुआ है अत: माना जा रहा है कि कलेक्टर्स की इस रिपोर्ट्स का बेहतर यूज किया जाएगा। सनद रहे कि इसी तरह की प्रक्रिया इंदिरा गांधी भी आजमाया करतीं थीं। उन्होंने पीएम आफिस को देश का सबसे ताकतवर आफिस बना दिया था और पीएम आफिस का दखल भारत के सभी जिलों तक होता था। कांग्रेस में प्रत्याशियों को टिकिट से पहले संबंधित जिलों के कलेक्टर्स की रिपोर्ट पर भी गंभीरता से विचार किया जाता था, इसी प्रक्रिया के चलते कई बार कांग्रेस में इंदिरा गांधी को तानाशाह भी कहा गया। भाजपा ने इस पेटर्न का यूज कभी नहीं किया। भाजपा का मानना रहा है कि आफिसों में बंद वरिष्ठ अधिकारियों को जमीनी स्तर की जानकारी नहीं होती जबकि आरएसएस इसका सबसे बेहतर सोर्स है। मध्यप्रदेश में भी आरएसएस की योजना से भाजपा में भेजे गए नेताओं की कमी नहीं है परंतु टिकिट वितरण में किसकी चलेगी यह तो समय ही बताएगा।