गुरुवार, 9 जुलाई 2015

ईस्टर्न बाघ परियोजना को भूली मप्र सरकार

भोपाल। नौ दिन चले अढ़ाई कोस यह कहावत इन दिनों बालाघाट जिले में अंतरराज्यीय ईस्टर्न बाघ परियोजना पर सटीक बैठ रही है। 7 साल बीत जाने के बाद भी यह योजना अमल में नहीं आ पाई है। खास बात ये है कि इस योजना को लेकर सीएम शिवराज सिंह ने जोर-शोर से घोषणा की थी, लेकिन अब उन्हीं की सरकार इसमें रुचि नहीं ले रही है। इस योजना को अब तक प्रदेश सरकार की ओर से हरी झंडी नहीं मिल पाई है। गत वर्ष बालाघाट प्रवास के दौरान जयंत मलैया ने ईस्टर्न बाघ परियोजना की जानकारी नहीं होने की बात कही थी। साथ ही इसे पूरी जानकारी लेकर पूरा करने का वादा भी किया था। लेकिन अब तक इसकी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई है। दरअसल, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार की इस साझा योजना पर प्रदेश सरकार की अरूचि के कारण संकट गहरा गया है। खास बात यह है कि योजना को लेकर सीएम शिवराज सिंह ने भले ही घोषणा कर वृहद सिंचाई परियोजना को पूरा करने का वादा किया हो वहीं उनके कैबिनेट के जल संसाधन विभाग के मंत्री जयंत मलैया के अनभिज्ञता जाहिर करते एक बयान ने सीएम की घोषणा और उसके पूरे होने की आस पर अटकलें बढ़ा दी हैं। सर्वे रिपोर्ट तक अटकी योजना जानकारी के मुताबिक ईस्टर्न बाघ परियोजना का लाभ महाराष्ट्र सरकार को मिलना है। इसमें करीब 4 हजार हेक्टेयर का जंगल मध्य प्रदेश का डूब में जा रहा है। इसके चलते इस योजना पर सहमति नहीं बन पाई है। हालांकि 6 मई 2011 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लांजी प्रवास के दौरान इस योजना का सर्वे कार्य शीघ्र कराने के आदेश दिए थे। अप्रैल माह में परियोजना का सर्वे तो करा लिया गया, लेकिन अब तक सर्वे रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है। क्या है योजना छत्तीसगढ़ राज्य की ईस्टर्न बाघ नदी पर बांध बनाकर करीब 14 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता के लिए पानी एकत्रित करने वृहद सिंचाई परियोजना बनाई गई है। ईस्टर्न बाघ परियोजना से करीब 14 हजार हेक्टेयर में से 8 हजार हेक्टेयर रकबे के लिए पानी का सिंचाई के लिए उपयोग किया जाना है। जबकि शेष पानी महाराष्ट्र सरकार पाइप लाइन के जरिए आपूर्ति के लिए चाह रही है। यह एक मप्र, महाराष्ट्र एवं छत्तीसगढ़ राज्य की अंतरराज्यीय परियोजना है। जिसके डूब क्षेत्र में मप्र एवं महाराष्ट्र का वनक्षेत्र 460 हेक्टर आता है। जिससे 65 मिलियन घ.मी. प्राप्त यील्ड से म.प्र. का 75 प्रतिशत तथा महाराष्ट्र का 25 प्रतिशत क्षेत्र में महाराष्ट्र को 25 प्रतिशत क्षेत्र में पानी दिया जा सकेगा। जिससे म.प्र. का 7637 हेक्ट. एवं महाराष्ट्र का 3022 हेक्ट. में सिंचाई की जा सकेगी। म.प्र. एवं छ.ग. राज्य के जल संसाधन विभाग की उच्चस्तरीय बैठक दिनांक 15.12.2006 स्थान छत्तीसगढ़ शासन मंत्रालय रायपुर में संपन्न बैठक में लिये गये निर्णय अनुसार म.प्र. महाराष्ट व छत्तीसगढ़ राज्य को लिखे वचन पत्र दिये जाने की कार्यवाही प्रक्रियाधीन है। बांध के जलग्रहण क्षेत्र में से छ.ग. राज्य का अंश छोड़कर योजना बनाने के लिये छ.ग. राज्य की सहमति ली जाना है। तीनों राज्य की सहमति उपरांत ही योजना का क्रियान्वयन संभव होगा। वर्तमान में इस योजना के कमाण्ड क्षेत्र का अधिक कमाण्ड क्षेत्र पूर्व से संचालित बाघ कम्पलेक्स परियोजना एवं खराड़ी मध्यम योजना से सिंचाई हो रही है। कार्या. ज्ञाप क्र. 2210/कार्य/दिनांक 31.10.2014 को अधीक्षण यंत्री जल संसाधन मण्डल को अवगत कराया जा चुका है। अत: कमाण्ड क्षेत्र के आंकलन में यह योजना साध्य नहीं है। लाभान्वित होंगे किसान इस योजना से जिले के पहुंच विहीन क्षेत्रों में करीब 352 हेक्टेयर रकबे में कृषि कार्य की संभावनाएं बढ़ जाएगी। करीब 200 किसान सिंचाई का लाभ ले सकेंगे। लांजी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में पहुंच विहीन गांवों में इस परियोजना के पूर्ण होने से किसानों को लाभ मिलेगा। क्यों अटकी योजना योजना के जरिए महाराष्ट्र सरकार पानी ले जाना चाह रही है, तो वहीं मध्य प्रदेश सरकार अपना जंगल बचाना चाह रही है। दोनों ही सरकारों के मंसूबे अलग-अलग होने के कारण इस योजना पर सहमति नहीं बन पा रही है। हालांकि जानकारों का मानना है कि अंतर्राज्यीय ईस्टर्न बाघ परियोजना मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र राज्य सरकार के दस्तावेजों में उलझी हुई है। भू-अर्जन में परेशानी परियोजना के अमल में आने के बाद विभागीय अधिकारियों को भू-अर्जन की समस्या का सामना करना पड़ेगा। विभागीय सूत्रों के अनुसार योजना में 14 हजार हेक्टेयर में से लगभग 8 हजार हैक्टेयर भूमि की ही सिंचाई हो पाएगी। वहीं विभाग के कार्यपालन यंत्री एसएस गहरवार का कहना है कि सर्वे का प्रतिवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। परियोजना की स्थिति पिछले पांच साल से यह परियोजना केवल कागजों में ही स्वीकृति के लिए दफ्तरों में भटक रही है। पूर्व में सचिव स्तर के अधिकारियों की बैठक 17 अप्रैल 2007 को हुई थी। अब तक परियोजना के विस्तृत परियोजना प्रस्ताव (डीपीआर) के लिए दोनों राज्यों की सहमति नहीं बन पाई है। वहीं महाराष्ट्र शासन से परियोजना का शीर्ष कार्य का डीपीआर और 30-35 वर्ष पुराने आवश्यक आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। सरकार नहीं ले रही रुचि मप्र सरकार शिवराज सिंह चौहान की घोषणा के बाद भी इसे लेकर रुचि नहीं दिखा रही है। जबकि महाराष्ट्र सरकार हर कीमत पर इस योजना को पूरा करना चाह रही है। जानकारी के मुताबिक ईस्टर्न बाघ परियोजना का लाभ महाराष्ट्र सरकार को मिलना है। इसमें करीब 4 हजार हेक्टेयर का जंगल मप्र का डूब में जा रहा है। इसके चलते इस योजना पर सहमति नहीं बन पाई है। हालांकि 6 मई 2011 को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लांजी प्रवास के दौरान इस योजना का सर्वे कार्य शीघ्र कराने के आदेश दिए थे। अप्रैल माह में इस परियोजना का सर्वे तो करा लिया गया है, लेकिन अब तक सर्वे रिपोर्ट तैयार नहीं हो पाई है। ये है योजना छत्तीसगढ़ राज्य की ईस्टर्न बाघ नदी पर बांध बनाकर करीब 14 हजार हेक्टेयर सिंचाई क्षमता के लिए पानी एकत्रित करने वृहद सिंचाई परियोजना बनाई गई है। ईस्टर्न बाघ परियोजना से करीब 14 हजार हेक्टेयर में से 8 हजार हेक्टेयर रकबे के लिए पानी का सिंचाई के लिए उपयोग किया जाना है। शेष पानी महाराष्ट्र सरकार पाइप लाइन के जरिए आपूर्ति के लिए ले जाना चाह रही है। इस योजना से जिले के पहुंचविहीन क्षेत्रों में करीब 352 हेक्टेयर रकबे में कृषि कार्य की संभावनाएं बढ़ जाएगी। करीब 200 किसान सिंचाई का लाभ ले सकेंगे। लांजी आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में पहुंचविहीन गांवों में इस परियोजना के पूर्ण होने से किसानों को लाभ मिलेगा। जिले में लगभग 8 हजार हेक्टेयर कुल रकबा सिंचाई का होगा। हालांकि सर्वे रिपोर्ट के बाद अधिकारी सिंचाई रकबा तथा परियोजना की क्षमता के आकलन को आधार मान रहे हैं। क्यों अटकी योजना इस योजना के जरिए महाराष्ट्र सरकार पानी ले जाना चाह रही है तो वहीं मप्र सरकार अपना जंगल बचाना चाह रही है। दोनों ही सरकारों के मंसूबे अलग-अलग होने के कारण इस योजना पर सहमति नहीं बन पा रही है। सरकारी पेंच में उलझी ईस्टर्न बाघ परियोजना पर संकट गहरा गया है। जानकारों के अनुसार अंतरराज्यीय ईस्टर्न बाघ परियोजना मप्र और महाराष्ट्र राज्य सरकार के दस्तावेजों में उलझी हुई है। इस योजना को मप्र सरकार से स्वीकृति नहीं मिल पाई है। भू-अर्जन में परेशानी खास बात तो यह है कि परियोजना के अमल में आने के बाद विभागीय अधिकारियों को भू-अर्जन की समस्या का सामना करना पड़ेगा। विभागीय सूत्रों के अनुसार इस अंतरराज्यीय परियोजना तैयार होने के बाद 14 हजार हेक्टेयर में से लगभग 8 हजार हैक्टेयर कृषि भूमि में ही सिंचाई हो पाएगी। उक्त क्षेत्र में वृहद सिंचाई के लिए विभाग के पास पर्याप्त भूमि नहीं है। जिसके चलते वृहद सिंचाई योजना पर कार्य नहीं हो पा रहा है। जबकि इस मामले में विभाग के कार्यपालन यंत्री एसएस गहरवार का कहना है कि ईस्टर्न बाघ परियोजना के लिए कराए गए सर्वे का प्रतिवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। फिलहाल शासन स्तर पर इस परियोजना के लिए सहमति नहीं बन पाई है। मप्र का अधिकांश मात्रा में जंगल डूब में आ रहा है। जिसके चलते कार्रवाई प्रभावित हो रही है। स्वीकृति के उपरांत भू-अर्जन की समस्या भी सर्वे के दौरान सामने आई है। फिलहाल सर्वे रिपोर्ट के उपरांत ही इस मामले में कुछ कहा जा सकता है। परियोजना की स्थिति परियोजना की स्वीकृति के लिए दोनों ही राज्यों के अधीक्षण यंत्री स्तर के अधिकारियों की बैठक भी हो चुकी है। जिसमें सहमति नहीं बन पाई है। पिछले पॉंच साल से यह परियोजना केवल कागजों में ही स्वीकृति के लिए दफ्तरों में भटक रही है। पूर्व में सचिव स्तर के अधिकारियों की बैठक 17 अप्रैल 2007 को हुई थी। जिसमें दोनों राज्यों से सहमति बनाए जाने का निर्णय लिया गया था। अब तक परियोजना के विस्तृत परियोजना प्रस्ताव (डीपीआर) के लिए दोनों राज्यों की सहमति नहीं बन पाई है। महाराष्ट्र शासन से परियोजना का शीर्ष कार्य का डीपीआर और 30-35 वर्ष पुराने आवश्यक आंकड़े भी उपलब्ध नहीं हो पाए हैं। इस परियोजना में दाई तट नहर निर्माण के लिए 3056.71 लाख रुपए का प्राक्कलन तैयार किया गया है, जो प्रमुख अभियंता जल संसाधन विभाग भोपाल के पास स्वीकृति के लिए वर्ष 2009 में भेजा गया है। परियोजना के बनने के बाद क्षेत्र के 14 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि में सिंचाई की जा सकेगी। इनका कहना है ईस्टर्न बाघ परियोजना के बारे में जानकारी ली जा चुकी है। इसके लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध नहीं है योजना की गतिविधि को बढ़ाने और हितग्राहियों को लाभांवित कराने योजना बनाई जाएगी। सिंचाई परियोजना के काम को बावनथड़ी की तर्ज पर आगे बढ़ाया जाएगा। जयंत मलैया प्रभारी मंत्री बालाघाट

10 साल तक भूखंड खाली तो हजार रु. रोज जुर्माना

एक जून से भवन निर्माण न करने वाले बीडीए के भूखंड मालिकों को झटका, जुर्माने की दरें भी तय
भोपाल। शासन के निर्देशानुसार अब बीडीए अपने भूखंडों पर भवन निर्माण नहीं करने वाले लीजधारकों से तगड़ा जुर्माना वसूल करेगा। 10 साल तक जितने भी भूखंडों पर किसी तरह का कोई निर्माण नहीं किया गया, उनसे अब एक जून से हजार रुपए रोज की दर से जुर्माना लिया जाएगा। भोपाल विकास प्राधिकरण की संपदा शाखा द्वारा ऐसे तमाम लीजधारकों की योजनावार सूची बनाई जा रही है, जिन्हें नोटिस थमाए जाएंगे। साथ ही 4 वर्ष के भीतर निर्माण न करने वालों के लिए भी सालाना जुर्माने की राशि तय की गई है। शासन ने लगभग दो साल पहले प्राधिकरणों के लिए नए व्ययन नियम बनाकर लागू किए, जिसमें भूखंडों के आवंटन की शर्तों को और कड़ा कर दिया, जिसमें लॉटरी या पहले आओ, पहले पाओ की प्रक्रिया को भी समाप्त कर दिया गया और अब आवंटन सिर्फ टेंडर या खुली नीलामी के जरिए ही किया जा सकता है।
वहीं जुर्माने यानी कंपाउंडिंग के लिए भी शासन ने प्राधिकरण को निर्देश दिए थे कि वह बोर्ड संकल्प इस संबंध में पारित कर सकता है। लिहाजा जब प्राधिकरण में राजनीतिक बोर्ड काबिज नहीं था और अफसरों का बोर्ड था, तब कम्पाउंडिंग की राशि निर्धारित की गई थी, जिसे संकल्प के जरिए पारित कर शासन को भिजवाया गया। अभी पिछले दिनों आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इसकी मंजूरी प्राधिकरण को दे दी, जिसके अनुसार अब लगभग 10 साल तक आवंटित भूखंड पर किसी भी तरह का निर्माण न करने पर जुर्माने की राशि आरोपित की जा सकेगी, जो कि एक हजार रुपए रोज रहेगी और आगामी एक जून से यह दर लागू कर दी जाएगी। इस दर के अनुसार महीने में 30 हजार रुपए और साल के 365 हजार यानी 3 लाख 65 हजार रुपए तक भारी-भरकम जुर्माना आवंटिती को चुकाना पड़ेगा।
प्राधिकरण का कहना है कि चूंकि वह भूखंड इसलिए आवंटित करता है, ताकि समयसीमा में निर्माण हो सके, लेकिन शहर में प्राधिकरण की संपत्तियां कई लोग निवेश के लिए भी खरीदते हैं। यही कारण है कि कई योजनाओं में सैकड़ों की संख्या में अभी भी भूखंड खाली पड़े हैं। इसके साथ ही प्राधिकरण ने यह भी तय किया है कि भूखंड का कब्जा देने के 4 साल के भीतर अगर भवन निर्माण स्वीकृत मानचित्र के अनुसार नहीं किया जाता है तो इसके लिए भी आवंटन निरस्त किया जा सकता है या फिर बदले में सालाना जुर्माने की राशि वसूल की जाएगी। इसके लिए प्राधिकरण ने कमजोर आय वर्ग यानी ईडब्ल्यूएस के भूखंडों पर सालाना 3 हजार रुपए, अन्य आवासीय भूखंडों पर 5 हजार रुपए और व्यावसायिक एवं अन्य उपयोग के भूखंडों जिनमें पीएसपी, शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य अथवा मास्टर प्लान में निर्धारित अन्य उपयोग शामिल हैं, के भूखंडों पर 10 हजार रुपए साल का जुर्माना वसूल किया जाएगा। साथ ही जिन भूखंडों की लीज डीड हो चुकी है और उसके भी 6 साल बाद तक निर्माण नहीं किया गया है, यानी भूखंड के कब्जा देने के 4 साल बाद और लीज डीड के 6 साल बाद यानी कुल 10 साल तक अगर कोई निर्माण नहीं किया गया तो फिर हजार रुपए रोज के हिसाब से जुर्माना वसूल किया जाएगा। एक जून से यह जुर्माना लागू हो जाएगा। लिहाजा ऐसे तमाम आवंटितों की सूची तैयार की जा रही है और योजनावार संबंधित अधिकारियों से इन आवंटनों की रिपोर्ट भी मांगी जा रही है, ताकि जुर्माना राशि की वसूली शुरू की जा सके।
कानूनी तौर पर गलत है निर्णय
जिन आवंटनों में निर्माण कार्य शुरू करने की अवधि निर्धारित नहीं है, उन आवंटनों के विरुद्ध प्राधिकरण का यह निर्णय गैर कानूनी रहेगा। यहां तक कि प्राधिकरण के स्वयं के पास ही योजना के अनेक भूखंड खाली पड़े हैं और अधिग्रहण नियम के अनुसार योजनाओं का संपूर्ण होना और प्लॉटों की बिक्री आवश्यक है, लेकिन प्राधिकरण ने भी उन प्लॉटों की बिक्री नहीं की। यहां तक कि प्राधिकरण अपने खाली प्लॉटों पर निगम को संपत्ति कर नहीं चुका रहा है, जबकि नगर निगम पूरे शहर में खाली भूखंडों का संपत्ति कर वसूल कर रहा है।
हाईराइज कमेटी के साथ एनओसी का झमेला होगा दूर
वहीं दूसरी तरफ चौपट पड़े रियल एस्टेट कारोबार को पटरी पर लाने के लिए मुख्यमंत्री ने एक बार फिर कॉलोनाइजरों-बिल्डरों को आश्वासनों का झुनझुना थमाया है। हाईराइज कमेटी को खत्म करने के साथ ही नजूल, सीलिंग व प्राधिकरण की एनओसी का झमेला भी समाप्त होगा और ये एनओसी वेबसाइट में दर्ज रिकॉर्ड के आधार पर आसानी से दी जाएगी। 30 मीटर तक ऊंची इमारतों के लिए दो एफएआर के प्रावधानों का महीनों से अटका आदेश भी जल्द जारी होगा और पूर्व इंदौर कलेक्टर द्वारा जारी किया गया मिसल बंदोबस्त का फरमान भी मुख्यमंत्री ने गलत माना, जिसमें 1959 से पहले के भी रिकॉर्ड जमीन मालिक से मांगे जा रहे थे। अब नगर निगम द्वारा मंजूर किए जाने वाले नक्शे भवन अधिकारियों के डिजिटल सिग्नेचर से ही मंजूर होंगे।
राजधानी सहित पूरे प्रदेश का रियल एस्टेट कारोबार जबर्दस्त मंदी का शिकार है। मध्यप्रदेश सरकार की अडिय़ल और बेतुकी नीति के चलते कारोबारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं और कई मर्तबा मुख्यमंत्री से लेकर विभागीय मंत्री तमाम आयोजनों में रियल एस्टेट कारोबार को राहत देने की घोषणाएं कर चुके हैं। इसी कड़ी में कल क्रेडाई के बैनर तले हुए आयोजन में फिर बिल्डरों और कॉलोनाइजरों को मुख्यमंत्री ने उनकी सभी लम्बित मांगों को जल्द पूरा करने का भरोसा दिलाया है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने भोपाल में ही इज ऑफ डुइंग बिजनेस के सेमिनार में यह घोषणा की थी कि हाईराइज कमेटी को विलोपित किया जा रहा है, मगर अभी तक इस आशय के आदेश जारी नहीं किए गए। कल मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कहा कि जल्दी ही इसके आदेश जारी कर दिए जाएंगे। अब हाईराइज कमेटी में संभागायुक्त नहीं रहेंगे, बल्कि निगमायुक्त उसके अध्यक्ष होंगे और प्राधिकरण के सीईओ को भी शामिल किया गया है।
वेबसाइट पर देखी जा सकेगी एनओसी
इसी तरह नजूल, सीलिंग से लेकर प्राधिकरण की एनओसी बार-बार मांगी जाती है। इसके लिए आवेदक को सारे दस्तावेज राजस्व विभाग द्वारा ही जारी किए जाते हैं और प्रदेश सरकार 1996 में ही सीलिंग समाप्त कर चुकी है और इसकी अंतिम सूची वर्ष 2000 में तैयार कर ली गई थी। लिहाजा राजस्व विभाग सीलिंग और नजूल की जमीनों की सूची, खसरे नंबर और क्षेत्रफल के साथ वेबसाइट पर प्रकाशित कर दे तो सीधे ही इसे देखा जा सकता है
30 मीटर की उंचाई पर दो एफएआर का प्रावधान शीघ्र
इसी तरह पिछले दिनों 30 मीटर तक ऊंचाई वाले हाईराइज यानी बहुमंजिला इमारतों के लिए ये प्रावधान किया था कि बिना हाईराइज कमेटी में जाए 30 मीटर तक की अनुमति सीधे निगम अथवा पंचायत से मिल जाएगी, मगर इसके लिए दो एफएआर लागू नहीं किया और पिछले कई महीनों से यह आदेश अटका पड़ा है। इस पर मुख्यमंत्री के साथ-साथ मौजूद प्रमुख सचिव और आयुक्त ने आश्वस्त किया कि दो एफएआर का आदेश जल्द जारी कर दिया जाएगा,
नजुल एनओसी के लिए नहीं देखेंगे बंदोबस्थ रिकार्ड
इधर पूर्व इंदौर कलेक्टर ने मिसल बंदोबस्त का भी एक आदेश जारी किया था, जिसमें बंदोबस्त रिकार्ड 1925 से दस्तावेजों की छानबीन करने की बात कही, जबकि नियमों में ही स्पष्ट है कि 1959 से पहले के दस्तावेजों को नहीं मांगा जा सकता है। इस विसंगति का खुलासा अग्निबाण ने ही प्रमुखता से किया था। इस पर मुख्यमंत्री ने भी सहमति जताई कि 1959 से पहले के दस्तावेजों को नहीं मांगा जाना चाहिए।
निगम की लीज का मुद्दा जल्द हल होगा
इसी तरह एक मुद्दा नगर निगम की लीज से संबंधित भी उठाया गया। 2010 से सभी तरह के भूखंडों की लीज के नामांतरण और नवीनीकरण के प्रकरण अटके पड़े हैं। कई मर्तबा शासन को प्रतिवेदन दे दिया बावजूद इसके स्थानीय अधिकारियों द्वारा एक भी प्रकरण नहीं किया गया। इस पर निगम नगरीय प्रशासन आयुक्त विवेक अग्रवाल ने स्पष्ट कहा कि लीज की नई पॉलिसी जल्द प्रकाशित की जा रही है।
एफएआर बढ़ा दें तो सस्ते हो जाएंगे आवास
क्रेडाई के राष्ट्रीय अध्यक्ष गीतांबर आनंद ने कहा कि एफएआर ही अत्यंत कम है, जिसके चलते इंदौर-भोपाल जैसे प्रमुख शहरों में अभी भी निर्मित मकानों या फ्लैटों की कीमतें ज्यादा हैं, क्योंकि जमीन की कीमतें लगातार बढ़ रही हंै। जिस तरह गुडग़ांव-नोएडा जैसे शहरों में सरकार ने तीन एफएआर कर दिया, जिसके कारण कीमतों में कमी भी आई, उसी तरह यहां भी एफएआर बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे वर्टीकल ग्रोथ भी शहरों को मिलेगी। इंदौर में ही मास्टर प्लान में अधिकतम दो एफएआर का प्रावधान है, जिसे बढ़ाकर कम से कम तीन एफएआर किया जाना चाहिए, जिससे फ्लैटों की कीमतें और कम हो जाएंगी।
डिजिटल सिग्नेचर से ही मंजूर होंगे नक्शे
शासन ने सिंगल विंडो सिस्टम भी लागू किया है, जिसके चलते नगर तथा ग्राम निवेश में आवेदन लेना बंद कर दिए और यह काम नगर निगम के कॉलोनी सेल को सौंप दिया है। वहीं नगर निगम द्वारा ऑनलाइन नक्शों की मंजूरी का दावा तो किया जाता है, मगर जोड़-तोड़ के लिए सारा काम मैन्युअल ही होता है। आयुक्त विवेक अग्रवाल ने स्पष्ट कहा कि अब इंदौर नगर निगम में भी डिजिटल सिग्नेचर से ही नक्शे मंजूर होंगे और इसकी तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है। सभी भवन अधिकारियों के डिजिटल सिग्नेचर तैयार करवाए जा रहे हैं और अब वाकई ऑनलाइन नक्शे मंजूर होंगे ताकि इसमें होने वाले भ्रष्टाचार को समाप्त किया जा सके। अभी शासन ने 2400 स्क्वेयर फीट तक के नक्शे बिना निगम के आर्किटेक्ट की सहायता से मंजूर करवाने का आदेश जारी किया है, अब उसी तर्ज पर सभी तरह के बड़े नक्शे भी ऑनलाइन ही मंजूर होंगे।
तय भू उपयोग में डायवर्शन की जरूरत नहीं
मध्यप्रदेश भू राजस्व संहिता 1959 की धारा 172 में भूमि के उपयोग में परिवर्तन के अधिकार अनुविभागीय अधिकारी राजस्व को दिए गए थे, मगर मास्टर प्लान आने के बाद यह तय हो गया कि जिस जमीन का भू उपयोग निर्धारित किया गया है, उसी के अनुरूप अनुमति मिलेगी। इस संबंध में 2008 के बाद 2013 में भी राजस्व विभाग ने सभी कलेक्टरों को यह आदेश दिए थे कि डायवर्शन के लिए अलग से कोई अनुज्ञा अपेक्षित नहीं है। बावजूद इसके डायवर्शन जारी है, जबकि निर्धारित भू उपयोग के मुताबिक आवेदक को सिर्फ लिखित सूचना दी जाना चाहिए ताकि निर्धारित दर के अनुसार भू व्यपवर्तन शुल्क का निर्धारण हो सके और वह राशि उसके द्वारा जमा कराई जा सके। डायवर्शन की जगह आवेदक को सिर्फ लैंड यूज सर्टिफिकेट ही लगाना होगा, जिसके आधार पर प्रीमियम व कर का निर्धारण संबंधित एसडीओ द्वारा किया जाएगा। --------------

सस्ती बिजली का सपना दिखा मप्र को 1147 करोड़ के घाटे में डाला रिलायंस पॉवर ने

कंपनी ने 7 राज्यों को लगाया 3058 करोड़ का चूना
राज्यों को इस तरह हुआ घाटा
राज्य एमयू घाटा (करोड़ में)
मध्यप्रदेश 2868 1147
पंजाब 1147 459
उत्तरप्रदेश 956 382
दिल्ली 860 344
हरियाणा 860 344
राजस्थान 765 306
उत्तराखंड 191 76
कुल घाटा 7647 3058
भोपाल। मप्र में जिन कंपनियों के बलबुते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 24 घंटे बिजली देने का वादा किया था, वहीं अब मप्र में अंधेरे का कारण बनने लगी हैं। उनमें से एक रिलायंस पावर ने तो ऐसा खेल खेला है कि न केवल मप्र में बल्कि अन्य छह प्रदेशों को भी अरबों रूपए का चूना लगाया है। मप्र सहित कई राज्यों में महंगा बिजली उत्पादन और महंगी बिजली के खेल के पीछे रिलायंस पॉवर है। रिलायंस पावर लिमिटेड ने मध्यप्रदेश स्थित सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट (यूएमपीपी)के प्लांट को ठप रखकर 7 राज्यों को चूना लगाया गया है। सब कुछ जानते हुए सरकारों का मौन समझ से परे है। सासन पॉवर प्लांट से बिजली नहीं मिलने के चलते मप्र, पंजाब, उप्र, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड को महंगी बिजली खरीदना पड़ रही है। दूसरे सासन के नाम पर आवंटित कोयले को रिलायंस अपने चितरंगी प्रोजेक्ट में ले जाना चाहता है, जहां से वह महंगी बिजली बेच सकेगा। अगस्त 2013 से अब तक प्रदेश 1147 करोड़ का घाटा उठा चुका है। ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन ने इस मामले को पूरे देश के सामने लाने का फैसला किया है, जो जल्दी ही बड़े आंदोलन के रूप में दिखेगा।
7 राज्यों को हुए नुकसान का मुद्दा उठाया
ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन ने केंद्रीय ऊर्जा मंत्री को लिखे पत्र में रिलायंस पॉवर के सासन प्लांट से कम उत्पादन के चलते 7 राज्यों को हुए नुकसान का मुद्दा उठाया है। गौरतलब है कि सासन प्लांट की पहली इकाई में अगस्त 2013 में कमर्शियल ऑपरेशन शुरू हुआ था। तब से अभी तक इसकी एक भी इकाई सतत् 95 प्रतिशत क्षमता पर नहीं चलाई गई। आरोप है कि ऐसा जान-बूझकर किया जा रहा है, ताकि बाद में बचे कोयले को चितरंगी के मर्चेंट पॉवर प्लांट में उपयोग में लाया जा सके। अधिक मुनाफा कमाया जा सके। जानकारी है कि इस कंपनी को भारत सरकार द्वारा आवश्यकता से अधिक क्षमता का कोल रिजर्व आवंटित किया जा चुका है।
अब तक लगभग 3058 करोड़ रुपए का नुकसान
इस गड़बड़ी के चलते 7 राज्यों को अब तक लगभग 3058 करोड़ रुपए का नुकसान हो चुका है, क्योंकि उक्त बिजली न मिलने से ये राज्य अन्य स्रोतों से महंगी बिजली खरीद रहे हैं। इसमें मप्र को सबसे ज्यादा 1147 करोड़ रुपए का घाटा हुआ है। इस पत्र के माध्यम से ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन ने मांग की है कि क्षमता का 95 प्रतिशत उत्पादन करने के लिए उक्त फर्म को नोटिस दिया जाए और 95 प्रतिशत उत्पादन न कर पाने की स्थिति में शेष कोयले का आवंटन कोल इंडिया को दिया जाए। साथ ही पूरे प्रकरण पर ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन द्वारा श्वेत-पत्र भी जारी किया गया है। उल्लेखनीय है कि सरकार के दबाव और औद्योगिक जगत में छिछालेदर के बाद आखिरकार 22 अप्रैल 2015 को रिलायंस पावर ने 3960 मेगावाट क्षमता वाले सासन पावर प्रोजेक्ट की छठी यूनिट भी शुरू हो गई। इसके साथ ही 3960 मेगावाट क्षमता वाले इस प्लांट ने कॉमर्शियल आपरेशन भी शुरू कर दिया। कंपनी ने दावा किया है कि पावर परचेज अग्रीमेंट के अनुसार तय हुई अवधि से एक साल पहले प्लांट ने कॉमर्शियल आपरेशन करना शुरू कर दिया। कंपनी ने इसे अपनी उपलब्धि बताया है। अब रिलायंस पॉवर लिमिटेड कुल क्षमता बढ़कर 5945 मेगावाट हो गई है, जिसमें 5760 मेगावाट थर्मल और 185 मेगावाट रिन्यूअबल एनर्जी पर आधारित है। सासन अल्ट्रा मेगा पॉवर प्रोजेक्ट विश्व की सबसे बड़ी इंटीग्रेटिड पॉवर प्लांट और कोल माइन प्रोजेक्ट है और इसमें कुल 27000 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। लेकिन इस कंपनी ने जिस तरह समय-समय पर अपने प्लांट को ठप कर सरकारों को चूना लगाया है, उसके खिलाफ किसी भी सरकार ने अभी तक कोई भी कड़ा कदम नहीं उठाया है।
जानबूझकर कम बिजली उत्पादन कर रहा रिलायंस
बिजली संकट से जूझते कई प्रदेश को और संकट में डालने के लिए जिम्मेदार मानते हुए ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने रिलायंस पावर की सासन परियोजना के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री और मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब, राजस्थान और दिल्ली के मुख्य मंत्रियों को पत्र लिखकर फेडरेशन ने दावा किया है कि रिलायंस जानबूझकर सासन परियोजना से कम बिजली का उत्पादन कर रहा है। ऐसा इसलिए किया जा रहा है जिससे सभी सरकारें बिजली संकट से बचने के लिए रिलायंस के दूसरे पावर प्लांटों से महंगी दरों पर बिजली खरीदें। मप्र के अलावा यूपी को सासन से कम बिजली मिलने के चलते लगभग पांच सौ करोड़ की चपत लगी है। ऐसे में इस नुकसान की वसूली रिलायंस से की जानी चाहिए और सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। दरअसल, सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट प्रतिस्पर्धात्मक बिडिंग के जरिए रिलायंस को दिया गया था। 16 अगस्त 2013 को सासन की पहली परियोजना चली। फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे का कहना है कि 16 अगस्त 2013 से 31 मार्च 2015 तक मात्र 65.42 फीसदी प्लांट लोड फैक्टर पर यह परियोजना चली, जबकि एनटीपीसी और अन्य समान प्लांट 95 फीसदी पीएलएफ पर चल रहे हैं। ऐसे में 95 फीसदी से कम पीएलएफ के चलते राज्यों को 7,647 मिलियन यूनिट कम बिजली मिली। फेडरेशन ने दावा किया कि कम बिजली मिलने के कारण मध्य प्रदेश, पंजाब, यूपी, दिल्ली राजस्थान, हरियाणा और उत्तराखंड को लगभग तीन हजार करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ है। इतने भारी नुकसान के बावजूद किसी भी प्रदेश के मुख्यमंत्री ने मामले में आपत्ति नहीं की। फेडरेशन ने अब राज्य सरकारों से प्रभावी कदम उठाने की मांग की है जिससे बिजली संकट से ग्रस्त प्रदेशों को राहत मिल सके।
1.19 प्रति यूनिट की दर पर मिलनी है बिजली
सासन परियोजना से 1.19 रुपए प्रति यूनिट की दर पर राज्यों को बिजली मिलनी है, जिसमें पहले वर्ष की दर मात्र 70 पैसे प्रति यूनिट है। फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दुबे कहते हैं कि इतनी सस्ती दर पर बिजली मिलने पर राज्यों को ज्यादा बजट अतिरिक्त बिजली खरीद के लिए नहीं खर्च करना पड़ेगा। लेकिन सासन में कम उत्पादन और सप्लाई की वजह से राज्यों को लगभग पांच रुपए प्रति यूनिट की दर पर बाजार से बिजली खरीदनी पड़ रही है। कम उत्पादन की वजह से राज्यों को करीब 7,647 मिलियन यूनिट कम बिजली मिलने के कारण राज्यों को तीन हजार करोड़ रुपए से अधिक की क्षति हुई है। करार के अनुसार, सासन बिजली घर से पैदा होने वाली कुल बिजली में मप्र को 37.5 फीसदी, पंजाब को 15 फीसदी, यूपी को 12.5 फीसदी, दिल्ली को 11.25 फीसदी, हरियाणा को 11.25 फीसदी, राजस्थान को 10 फीसदी और उत्तराखंड को 2.5 फीसदी बिजली मिलती है। 16 अगस्त 2013 से 31 मार्च 2015 तक यूपी को 95 फीसदी से कम बिजली मिलने के कारण 955.88 मिलियन यूनिट का नुकसान हुआ, जिसका मूल्य 382 करोड़ रुपए है।
महंगी दरों पर खरीदनी पड़ रही बिजली
रिलायंस के सासन पावर प्लांट से सस्ती दरों पर बिजली नहीं मिल पाने की वजह से यूपी को रिलायंस की ही रोजा परियोजना से लगभग छह रुपए प्रति यूनिट पर बिजली खरीदना पड़ रही है। यदि इसे आधार माना जाए तो सासन से 70 पैसे प्रति यूनिट की बिजली नहीं मिल पाने पर होने वाली क्षति पांच सौ करोड़ रुपए से अधिक की है। ऑल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने मांग की है कि केन्द्र सरकार रिलायंस को नोटिस दे कि यदि 95 फीसदी पीएलएफ पर प्लांट न चलाया गया तो कोयला ब्लॉक का आवंटन घटा कर शेष कोयला कोल इंडिया लिमिटेड को सरकारी बिजली घरों के उपयोग के लिए दे दिया जाएगा। फेडरेशन ने यह भी मांग की है कि सातों राज्यों का एक मॉनिटरिंग ग्रुप बनाया जाए, जो सासन से जानबूझ कर किए जा रहे कम उत्पादन की जांच करे और रिलायंस से दंड वसूलने का प्रस्ताव दे।
रिलायंस के चलते हो रहा बिजली संकट
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने मध्य प्रदेश की सासन परियोजना से कम बिजली मिलने से होने वाली क्षति की भरपाई रिलायंस से कराने की मांग की है। साथ ही कठोर कार्यवाही के लिए सरकारों से प्रभावी हस्तक्षेप करने की अपील की है। फेडरेशन ने आरोप लगाया है कि कम टैरिफ होने से रिलायंस जान-बूझकर सासन बिजलीघर की इकाई नहीं चला रहा है जो अत्यंत गंभीर मामला है। पत्र में बताया गया है कि करार के मुताबिक बिजली न मिलने से प्रदेश को महंगी दर से बिजली खरीदनी पड़ी। इससे अकेले उत्तर प्रदेश को 41 करोड़ रुपए की चपत लगी है। फेडरेशन के सेक्रेटरी जनरल शैलेंद्र दुबे ने पत्र लिखकर प्रभावी हस्तक्षेप की अपील की है। पत्र में उन्होंने लिखा है कि रिलायंस की सासन परियोजना से यूपी, एमपी, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड को बिजली मिलनी है। करार के अनुसार पहले वर्ष में मिलने वाली बिजली का मूल्य मात्र 69.80 पैसे प्रति यूनिट है। सासन की पहली इकाई चार माह विलंब से 16 अगस्त, 2013 को चली है। आंकड़ों के अनुसार 16 अगस्त से 24 अक्तूबर तक सासन की इकाई से 27.72 प्रतिशत प्लांट लोड फैक्टर (पीएलएफ) पर मात्र 288.922 मिलियन यूनिट बिजली पैदा हुई। जबकि 100 प्रतिशत पीएलएफ पर इकाई चलाने से 1042.272 मिलियन यूनिट बिजली पैदा होनी चाहिए थी। दुबे ने बताया कि कम उत्पादन होने से प्रदेशों को इस अवधि में आवंटन से कम बिजली मिली है।
प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले लग चुका है 1252 करोड़ का चूना
रिलायंस पावर के स्वामित्व वाले सासन पावर लिमिटेड के सासन प्रोजेक्ट के शुरू होने से पहले ही मप्र सरकार को 1252 करोड़ का चूना लग चुका है। भारत के महालेखा परीक्षक ने भी गत वर्ष रिलायंस पावर के स्वामित्व वाले सासन प्रोजेक्ट के लिए अवांछित सहयोग देने पर पर्यावरण मंत्रालय की खिंचाई की थी। अब कैग ने बताया है, कि इस प्रोजेक्ट को 15 माह देरी से प्रारंभ किए जाने के कारण मध्यप्रदेश को 1252 करोड़ रुपए अधिक चुकाकर बिजली खरीदनी पड़ी है।
मध्यप्रदेश की जमीन पर सासन प्रोजेक्ट बनाया जा रहा था उस वक्त कैग ने कई कमियां निकाली थीं और बताया था कि किस तरह वन संरक्षण नियम 1980 का उल्लंघन इस 1384.96 एकड़ प्रोजेक्ट को स्थापित करने में किया गया था। अब नए सिरे से कैग की रिपोर्ट में बताया गया है कि जो बिजली इस प्रोजेक्ट से 70 पैसे प्रति यूनिट मिल सकती थी। उसे 3.50 रुपए प्रति यूनिट की दर से लगातार 15 महीने खरीदकर उपभोक्ताओं को दिया गया। इस प्रकार 447.14 करोड़ यूनिट बिजली पर प्रति यूनिट 2.80 पैसे का अधिक भुगतान करना पड़ा। जिससे 1252 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है।
20 हजार करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्ट की क्षमता 3960 मेगावाट बिजली उत्पादन की है, इसमें 6 इकाईयां लगी हुई हंै और प्रत्येक इकाई 660 मेगावाट बिजली पैदा करने में सक्षम है। इसमें से मप्र को प्रत्येक इकाई से 247 मेगावाट बिजली मिलती है और कुल 1482 मेगावाट बिजली वर्ष 2012 से ही मिलनी थी, लेकिन यह बिजली अगस्त 2013 से तकरीबन 15 माह विलंब से मिली और घाटा हो गया। हालांकि पावर मैनेजमेंट कंपनी इसे घाटा नहीं मानती। कंपनी के अधिकारियों का कहना है कि पहले यह इकाई मई 2012 में चालू होने का अनुमान था, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा जमीन आवंटन में विलंब होने के कारण उत्पादन में देरी हुई इसलिए प्रोजेक्ट पिछड़ गया। महंगी दर पर बिजली खरीदने के अलावा प्रदेश सरकार के पास कोई विकल्प नहीं था। याद रहे कि सासन प्रोजेक्ट अनिल अंबानी के स्वामित्व वाले समूह ने बनाया है। पहले यह पावर फाइनेंस कार्पोरेशन की पूर्णता स्वामित्व वाली सब्सिडरी हुआ करता था, बाद में इसे रिलायंस पावर लिमिटेड को ट्रांसफर किया गया। वन अधिनियम 1980 के अनुसार इस तरह के प्रोजेक्ट बनाने के लिए जो वन भूमि अधिग्रहित की जाती है। उसके एवज में उतनी ही गैर वन भूमि वन विभाग को देनी पड़ती है ताकि वहां जंगल फिर से लगाया जा सके। उस समय मप्र के प्रमुख सचिव ने एक सर्टिफिकेट जारी करते हुए कहा था कि सीधी जिले में सरकार के पास कोई गैर वन भूमि नहीं है। इस सर्टिफिकेट को आधार बनाकर सासन पावर लिमिटेड अधिग्रहित भूमि के एवज में गैर वन भूमि देने से बच गया। कैग ने इस करतूत को उस समय ही पकड़ लिया था, लेकिन लीपापोती कर दी गई। देखा जाए तो इस प्रोजेक्ट के कुछ किलोमीटर के दायरे में ही वह भूमि दी जानी चाहिए थी, जिस पर वृक्षारोपण किया जा सकता है। कैग का कहना है, कि न तो सरकार न ही मंत्रालय ने वन अधिनियम के प्रावधानों को लागू करवाने में कोई रुचि दिखाई जिसके चलते इस प्रोजेक्ट में भूमि का घालमेल हुआ। बहरहाल देरी किसी भी कारण से हुई हो, सासन प्रोजेक्ट में समय पर बिजली न मिल पाने के कारण प्रदेश सरकार को जो राजस्व हानि हुई है, उसकी वसूली क्या संभव है देखा जाए तो इसमें किसी को भी दोषी नहीं ठहराया जाएगा, क्योंकि सभी अपना गला बचाने में माहिर हैं। जहां तक रिलायंस जैसी कंपनियों का प्रश्न है, उन्हें शासन का वरदहस्त पहले से ही प्राप्त है इसलिए उनका कुछ बिगड़ता नहीं है।
21 माह तक महंगी बिजली खरीदना पड़ा मप्र को
अगस्त 2013 से लेकर 22 अप्रैल 2015 तक प्रोजेक्ट की 5 इकाईयों से उत्पादन हो रहा है। इसका मतलब यह कि लगभग 660 मेगावाट बिजली मप्र सरकार को महंगे मोल की खरीदनी पड़ी। यह पहला अवसर नहीं है जब मप्र में रिलायंस की यह परियोजना विवादों में आई है, इससे पहले भी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने छत्रसाल कोल माइन से कोयला निकालने के रिलायंस पावर के निर्णय को चुनौती दी थी। जिस जल्दबाजी में बिजली प्राप्त करने के लिए ऐसे बड़े प्रोजेक्ट्स को मानकों का उल्लंघन करते हुए अनापेक्षित सहयोग प्रदान किया जा रहा है। उससे प्रदेश का अहित ही होता है। इतना होने के बावजूद भी निर्धारित कोटे की बिजली भी प्रदेश को नहीं दी जाती है।
इधर, सेंट्रल ट्रिब्यूनल ने औद्योगिक केंद्र विकास निगम (एकेवीएन) की अपील खारिज करते हुए सेज इकाइयों को 42 करोड़ की राशि वापस लौटाने के आदेश दिए हैं। यह राशि एकेवीएन द्वारा वर्ष 2010 से 2012 के बीच इकाईयों से बिजली के बिलों में वसूली गई थी। पीथमपुर स्थित विशेष आर्थिक प्रेक्षत्र की बिजली व्यवस्था एकेवीएन द्वारा देखी जाती है। इसके लिए एकेवीएन को निर्धारित कोटे के अनुसार बिजली रियायती दरों पर दी जाती है। एकेवीएन को प्रतिवर्ष बिजली की दरें विद्युत नियामक आयोग से तय करवाना होती है। निगम अफसरों द्वारा दो वर्षों तक औसत आधार पर दरें बढ़ा कर बिलिंग की जाती रही। इसके बाद एआरआर आयोग के समक्ष पेश की गई। सुनवाई के बाद आयोग ने अधिक वसूली गई राशि वापस लौटाने के आदेश दिए।
परचेस एग्रीमेंट का उल्लंघन
पावर रेगुलेटर सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन (सीईआरसी) ने कहा था कि यह प्रोजेक्ट ऑपरेशनल नहीं है। उसके मुताबिक, इसने 2013 तक तय टेस्टिंग मानकों को पूरा नहीं किया था। सासन यूएमपीपी 4,000 मेगावाट कैपेसिटी वाला प्लांट है। इसकी 600 मेगावाट की पहली यूनिट कमर्शियल तौर पर ऑपरेशनल है। इसे इंडिपेंडेंट इंजीनियर (आईटी) ने 30 मार्च 2013 को सर्टिफाई किया था। इसे प्रोक्योरर और सासन पावर ने अप्वाइंट किया था। इसे सभी 14 प्रोक्योरर ने लिखित में माना था। वहीं, रेगुलेटर ने कंपनी को यूनिट की नए सिरे से टेस्टिंग के लिए कहा है। उसका कहना है कि तभी इस प्लांट को फॉर्मल तौर पर ऑपरेशनल घोषित किया जाएगा। रेगुलेटर के मुताबिक, कंपनी ने पावर परचेज एग्रीमेंट की शर्तों के हिसाब से काम नहीं किया है। रेगुलेटर ने अपने ऑर्डर में कहा है कि यह पता चला है कि सासन पावर लिमिटेड (एसपीएल) ने डब्ल्यूआरएलडीसी की ईमेल (30 मार्च 2013) में पावर परचेज एग्रीमेंट (पीपीए) के तहत सुझाए गए वाजिब कदम उठाने के बजाए 31 मार्च 2013 को एक यूनिट का कमर्शियल ऑपरेशन शुरू कर दिया। उल्लेखनीय है कि सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट को लेकर कैग ने पर्यावरण मंत्रालय की कड़ी खिंचाई की थी। कैग का कहना था कि पर्यावरण मंत्रालय ने रिलायंस पावर लिमिटेड के इस प्रोजेक्ट को गैर वाजिब रियायतें दी हैं। कैग ने संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में कहा था कि मुख्य सचिव द्वारा जारी एक अनुचित सर्टिफिकेट के आधार पर पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने रिलायंस पावर को 1,384.96 हेक्टेयर गैर-वनीय भूमि मुहैया न कराने की छूट दे दी थी। हालांकि, रिलायंस पावर ने कैग के इस अवलोकन से असहमति जताई थी। इस कंपनी ने कहा था कि 4,000 मेगावाट के सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रोजेक्ट के लिए वन भूमि अधिग्रहीत करते वक्त उसे कोई भी रियायत नहीं दी गई थी।
एक कोल ब्लॉक को रद्द किया
सरकार ने अनिल अंबानी ग्रुप के सासन अल्ट्रा मेगा पावर प्रॉजेक्ट से जुड़े एक कोल ब्लॉक को रद्द करने का निर्णय लिया है। सरकार का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के अनुसार है जिसमें अन्य प्लांटों के लिए इस प्रकार की यूनिटों से अधिक कोयले के कमर्शल इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए कहा गया है। इस निर्णय में अन्य प्लांटों के लिए 4,000 मेगावाट प्रॉजेक्ट के अन्य खानों के कोयले के इस्तेमाल से भी मना किया गया है। इस आदेश में रिलायंस पावर के सासन प्रॉजेक्ट को आरंभ में दी गई खास व्यवस्था को भी समाप्त किया गया है। इससे रिलायंस को 21,000 करोड़ रुपए के अपने चित्रांगी पॉवर प्रॉजेक्ट को शुरू करने में मदद मिलती।
हाल ही में कंपनी ने 36,000 करोड़ रुपये के तिलैया प्रॉजेक्ट को भी रद्द कर दिया जबकि कृष्णपट्टम प्रॉजेक्ट पर कोयल के निर्यात मूल्य के बहुत ही ज्यादा बढ़ जाने के कारण कोई खास प्रगति नहीं हुई है। एक सरकारी अधिकारी ने बताया, सरकार का नजरिया है कि इस निर्णय में संलिप्त पक्षों पर ध्यान न देकर राष्ट्रीय हित के लिए नियमों का सख्ती से पालन किया जाए। संसद की पीएसी ने भी अतिरिक्त कोयले के इस्तेमाल के बारे में उल्लेख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 25 अगस्त को व्यवस्था दी थी कि यूएमपीपी को जो कोयला भंडारों का आवंटन किया गया है उसका इस्तेमाल सिर्फ यूएमपीपी के लिए ही किया जाएगा और कोयले के कमर्शल इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने कई कंपनियों को आवंटित कोयला खानों को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था ने कोयला मंत्री को यूएमपीपी से जुड़े खानों पर फिर से गौर करने के लिए प्रेरित किया।
कोयला मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी ने बताया, यह निर्णय पिछले साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर के मद्देनजर लिया गया है। सरकार ने अतिरिक्त कोयले के इस्तेमाल के लिए रिलायंस पावर को दिए गए अधिकार को वापस लेने का निर्णय किया है। छत्रसाल कोयला भंडार के आवंटन को रद्द कर दिया क्योंकि यह सरप्लस है और मोहर एवं मोहर अमलोहरी कोयल भंडारों में कोयला का इस्तेमाल सासन युएमपीपी तक ही सीमित रहेगा।
मप्र में अपना कारोबार समेटने में जुटी रिलायंस इंडस्ट्री
मध्यप्रदेश को उद्योग के सब्जबाग दिखाकर रिलायंस गु्रप चंपत होने का प्रयास कर रहा है। केंद्र सरकार ने कोल ब्लॉक आवंटन निरस्त कर दिए तो रिलायंस सरकारी खजाने में जमा 9.51 करोड़ की धरोहर राशि वापस लेने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। फाइल सीएम सचिवालय से चलकर रैवेन्यू विभाग तक पहुंच चुकी है और रिलायंस के कर्मचारी बार-बार सीएम सचिवालय से लेकर रैवेन्यू विभाग तक फाइल के बारे में पूछताछ कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में कुछ भी हो सकता है।
मध्यप्रदेश में अरबों लगाने का झांसा देकर सरकार से जमीन लेने वाली रिलायंस इंडस्ट्री अब अपना कारोबार समेट रही है और सरकार के पास जमा पैसा भी वापस चाहती है। रिलांयस ने सिंगरौली जिले के ग्राम मोहर अमरोटी में 125 हैक्टेयर जमीन कोयला उत्खनन के लिए ली थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र सरकार ने कोल ब्लॉक आवंटन निरस्त कर दिया, अब यह जमीन रिलायंस के किसी काम की नहीं है। इसलिए रिलायंस सरकार को यह जमीन लौटाना चाहती है पर सवाल यह उठता है कि रिलांयस से जमीन वापस लेना तभी संभव है जब वहां कोई सरकारी प्रोजेक्ट आ रहा हो।
मध्यप्रदेश सरकार तो वैसे भी निजीकरण को बढ़ावा दे रही है इसलिए वह इस प्रोजेक्ट में हाथ नहीं डाल सकती। रिलायंस को जमीन से मतलब नहीं है, जमीन उसे मिले तो उसका लैंडबैंक मजबूत ही होगा लेकिन रिलायंस की चालाकी यह है कि वह सरकारी खजाने में जमा 9.51 करोड़ की धरोहर राशि वापस लेना चाहती है। इसके लिए रिलायंस के कर्मचारी मंत्रालय के चक्कर काट रहे हैं। रिलायंस का मकसद दोनोंं होथों में मिठाई रखने का है- रुपया वापस मिल जाए और जमीन भी सुरक्षित रहे। अब देखना यह है कि रिलायंस को लाभ पहुंचाने के लिए सरकार अपने ही नियमों को ताक में रखती है अथवा नहीं। वर्ष 2007 में जब अगस्त माह में रिलायंस पावर लिमिटेड ने सासन पावर लिमिटेड का अधिग्रहण किया था, उस समय केंद्र में यूपीए सरकार ने बिना आवश्यक प्रक्रिया अपनाए कई बड़े औद्योगिक घरानों को कोल ब्लॉक आवंटित कर दिए थे। रिलायंस जो 4 हजार मेगावॉट का विशाल पावर प्रोजेक्ट मध्यप्रदेश के शासन में चला रहा है, उसके लिए कोयले की आपूर्ति हेतु उसने भी बोली लगाई थी लेकिन अब जिस खदान के लिए बोली लगाई गई उसमें 5 इकाइयों से 3 हजार से अधिक मेगावॉट के करीब विद्युत उत्पादन हो रहा है। ऐसी स्थिति में प्लांट को अधिक उत्पादन के लिए कोयले की जरूरत कोल ब्लॉक से ही पूरी हो सकती है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद कोयला मिलना संदिग्ध हो गया है। इसलिए रिलायंस सिंगरौली में ली गई जमीन में रुचि नहीं दिखा रही। दरअसल रिलायंस की 4 हजार मेगावॉट बिजली में से कुछ बिजली मध्यप्रदेश को अत्यंत रियायती दरों पर मिल सकती है। इसीलिए मध्यप्रदेश में रिलायंस को इतनी रियायत दी जा रही है। लेकिन यह रियायत राज्य सरकार को महंगी पड़ सकती है।
धीरूभाई अंबानी यूनिवर्सिटी बनाने से इंकार
भोपाल के अचारपुरा गांव में बनने वाली धीरूभाई अंबानी यूनिवर्सिटी से अचानक इंकार करने पर इसे अनिल अंबानी का सरकार के साथ धोखा बताया जा रहा है। राज्य सरकार ने मात्र तीन करोड़ रूपए में लगभग पचास करोड़ रुपए की जमीन धीरूभाई अंबानी न्यास को दी थी। अंबानी के कहने पर सरकार ने एयरपोर्ट से अचारपुरा तक पांच किलोमीटर सड़क भी बना दी, लेकिन अब अंबानी न केवल यूनिवर्सिटी खोलने से मना कर रहे हैं, बल्कि इस प्रोजेक्ट पर खर्च दस करोड़ रुपए भी मांग रहे हैं। राज्य सरकार के आमंत्रण पर 2008 में अनिल अंबानी भोपाल पहुंचे थे। उन्होंने मुख्यमंत्री निवास पर सीएम के साथ नाश्ता करते - करते धीरूभाई अंबानी ट्रस्ट की ओर से अचारपुरा में विश्वविद्यालय खोलने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किये थे। पत्रकारों और अफसरों की उपस्थिति में अनिल अंबानी को 110 एकड़ जमीन के कागजात सौंपे गए। अंबानी ने भी वायदा किया कि अगले दो तीन साल में यूनिवर्सिटी शुरू कर देंगे।
अंबानी ने जमीन का आधिपत्य लेते ही वहां जैसे ही बाउंड्रीवाल का काम शुरू किया तथा राज्य सरकार ने अचारपुरा से एयरपोर्ट तक सड़क बनाना शुरू की तो अचारपुरा और मणीखेड़ी में दस लाख रूपए एकड़ की जमीन चालीस से पचास एकड़ तक पहुंच गई। शिक्षा व्यावसाय से जुड़े कई संस्थानों ने भी अंबानी को देखते हुए वहां एजूकेशन हब में धड़ाधड़ जमीनें आबंटित करा ली। अंबानी ने इसी माह राज्य सरकार को पत्र भेजकर इस प्रोजेक्ट से हटने की सूचना दी है। अंबानी के इस पत्र को मंत्रालय के अधिकारी धोखे के रूप में देख रहे हैं। चर्चा है कि भोपाल में पहले से जो कॉलेज चल रहे हैं उन्हे ही छात्र नहीं मिल रहे हैं, ऐसे में अंबानी को यूनिवर्सिटी की सफलता पर संदेह होने लगा था। प्रदेश में महर्षि योगी विश्व विद्यालय के लगभग फेल हो चुका है। यह भी चर्चा है कि अंबानी प्रदेश में चल रहे अपने अन्य प्रोजेक्टों में अनुमतियों को लेकर सरकार की टालने वाली नीति से दुखी है। इसी कारण उन्होंने यूनिवर्सिटी से हाथ खीचा है।
अब स्नैपडील भी दिखा रही है सुनहरे सपने
जानी-मानी ऑनलाइन कम्पनी स्नैपडील भी अब मप्र को सुनहरे सपने दिखा रही है। कंपनी के सीईओ कुणाल बहल अभी 20 मई को भोपाल में आयोजित शिवराज सरकार के युवा उद्यमी पंचायत में ना सिर्फ शामिल हुए बल्कि उन्होंने शासन के साथ एमओयू भी साइन किया। स्नैपडील के मामले में चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि महाराष्ट्र सरकार के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने कुणाल बहल सहित अन्य निदेशकों के खिलाफ गैर जमानती धाराओं में पनवेल थाने पर एफआईआर दर्ज करवाई है। यह एफआईआर स्नैपडील डॉट कॉम द्वारा आपत्तिजनक दवाइयां बेचने के मामले में दर्ज हुई है, जिसकी पुलिसिया जांच शुरू हो गई, जिसके चलते संभव है कि स्नैपडील के कर्ताधर्ताओं की गिरफ्तारी भी हो सकती है। स्नैपडील देश की दूसरी सबसे बड़ी ऑनलाइन सामान विक्रेता कंपनी है। इसके सीईओ कुणाल बहल व्हार्टन के स्नातक हैं। उन्होंने 2010 में इस कंपनी की स्थापना की थी।
यह पहला मौका नहीं है जब ऑनलाइन कम्पनी की इस तरह की गड़बड़ी सामने आई है। पूर्व में भी कुछ बड़ी कम्पनियों के खिलाफ इसी तरह के प्रकरण दर्ज हुए, जिसके बाद केन्द्र सरकार ने ऐसी ई-कॉमर्स वाली कम्पनियों पर निगाह भी रखना शुरू किया है। इसी कड़ी में स्नैपडील का भी नाम सामने आया है। अभी पिछले दिनों ही महाराष्ट्र सरकार के खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानि एफडीए ने चिकित्सकों के पर्चे पर बेची जाने वाली दवाइयों को ऑनलाइन बिकते पाया और उसके उत्तर मुंबई कार्यालय पर छापा भी डाला गया। इसके पश्चात स्नैपडील के कुणाल बहल और कम्पनी के अन्य निदेशकों के खिलाफ एफडीए ने रायगढ़ जिले के पनवेल पुलिस थाने पर एफआईआर दर्ज करवा दी। यह एफआईआर औषधि एवं सौंदर्य सामग्री कानून 1940 और औषधि एवं चमत्कारी उपाय (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 के प्रावधानों के तहत दर्ज करवाई गई और जो धथाराओं इसमें लगाई गईं वे संज्ञेय है यानि उनमें जमानत नहीं मिल सकती। ये एफआईआर एफडीए के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और आयुक्त हर्षदीप काम्बले के निर्देश पर दर्ज करवाई गई। सूत्रों का कहना है कि स्नैपडील डॉट कॉम ने कम्पनी कानून के तहत जेस्पर इन्फोटेक प्रा.लि. बनाई जो भारत के दवा विक्रेताओं के साथ करार कर उनकी दवाएं ऑनलाइन बेचती है। ऐसी 45 दवा भी बिक्री के लिए रख दी गई जिनमें आपत्तिजनक दावे किए गए और जो औषधि एवं चमत्कारी उपाय कानून 1954 के खिलाफ है। इनमें सिलडेनॉफिल साइरेट जैसी टैबलेट भी शामिल है जो मनोचिकित्सकों, यौन रोगियों और त्वचा चिकित्सकों द्वारा सिर्फ अधिकृत पर्चे पर ही बेची जा सकती है, लेकिन स्नैपडील द्वारा उसे सहजता से ऑनलाइन उपलब्ध करवाया जाता रहा। हालांकि जांच के दौरान कम्पनी ने इन दवाइयों को ऑनलाइन बिक्री से तुरंत हटा भी लिया, लेकिन एफडीए ने बाद में यह भी पाया कि लिखित वायदा करने के बाद भी स्नैपडील 'आई पिलÓ और 'अनवांटेड 72Ó जैसी दवा बेचते भी पाया गया। इस संबंध में भी अलग से कार्रवाई की जा रही है। पनवेल थाने के अफसर मनीष कोलहटकर से अवश्य पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि स्नैपडील के कुणाल बहल और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, जिसकी जांच-पड़ताल की जा रही है और जांच में तथ्य सही पाए गए तो कुणाल बहल सहित अन्य की गिरफ्तारियां भी होंगी। चूंकि गैर जमानती धाराओं में प्रकरण दर्ज हुआ है लिहाजा अभी कुणाल बहल को अग्रिम जमानत भी नहीं मिल सकती। गौरतलब है कि एफडीए ने पिछले हफ्ते स्नैपडील के गोरगांव स्थित कार्यालय पर छापा मारा था। स्नैपडील पर विगोरा टैबलेट, एस्कोरिल कफ सीरप, अनवांटेड 72 और आइ-पिल जैसी दवाएं ऑनलाइन बेचने का आरोप था। जबकि ये दवाएं डॉक्टर की सलाह पर ही खरीदी जानी चाहिए। ऐसी दवाओं की ऑनलाइन बिक्री खरीदार के लिए भी नुकसानदेह हो सकती हैं। ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट-1940 के सेक्शन 18(सी) के अनुसार सिर्फ लाइसेंस प्राप्त खुदरा दवा विक्रेता ही चिकित्सक की लिखित सलाह पर ये दवाएं बेच सकते हैं। एफडीए कमिश्नर हर्षदीप कांबले के अनुसार इस तरह की दवाओं की ऑनलाइन बिक्री गैरकानूनी है। कांबले ने बताया कि दूसरी ई-कामर्स कंपनियों जैसे फ्लिपकार्ट और अमेजान के खिलाफ भी जांच जारी है। अगर ये कंपनियां भी ऐसे काम करती पाई गईं, तो इनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
बिना जांच पड़ताल मप्र ने कैसे कर लिया करार
अब यहां सवाल यह है कि जिस कम्पनी और उसके सीईओ के खिलाफ कुछ दिनों पूर्व ही महाराष्ट्र सरकार के एक जिम्मेदार महकमे खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने एफआईआर दर्ज करवाई हो उसी के सीईओ के साथ मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने एमओयू कैसे साइन कर लिया? क्या प्रदेश के अफसरों ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को भी अंधेरे में रखा, जिस तरह पूर्व में ये अफसर ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में भी भूमाफियाओं और कई दागियों को उपकृत कर चुके हैं? भोपाल आए स्नैपडील के सीईओ कुणाल बहल को जबरदस्त पब्लिसिटी भी प्रदेश सरकार द्वारा दिलवाई गई और बकायदा मुख्यमंत्री की मौजूदगी में स्नैपडील और मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के बीच एक एमओयू भी साइन किया गया, जिसमें कुणाल बहल के साथ निगम के प्रबंध संचालक बीएल कांताराव ने हस्ताक्षर किए। इस मौके पर मुख्यमंत्री के साथ वाणिज्य एवं उद्योगमंत्री यशोधराराजे सिंधिया और मुख्य सचिव एंटोनी जेसी डीसा भी मौजूद रहे। मध्यप्रदेश सरकार के जनसम्पर्क संचालनालय ने बकायदा इसका प्रेस नोट भी जारी किया और दावा किया कि प्रदेश के बुनकर और हस्त शिल्पियों द्वारा निर्मित उत्पादों का स्नैपडील के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से विक्रय किया जाएगा। प्रदेश शासन ने यह भी कहा कि स्नैपडील देश की तेजी से बढ़ती ई-कॉमर्स कम्पनी है, जिसका वार्षिक विक्रय 3 बिलियन डॉलर यानि 30 हजार करोड़ है।
भोपाल के युवा उद्यमी पंचायत में बांटा था ज्ञान
मध्यप्रदेश सरकार ने अभी भोपाल में युवा उद्यमी पंचायत का आयोजन किया जिसमें सुक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को कई तरह की सौगातें देने की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने की। इस अवसर पर स्नैपडील के सीईओ कुणाल बहल ने भी मीडिया के साथ-साथ युवा उद्यमियों को जबरदस्त ज्ञान बांटा, जिसमें उन्होंने बताया कि 5 बार असफल होने के बाद वे अपने छटवें बिजनेस मॉडल यानि ई-कॉमर्स में सफल हुए। वे प्रदेश के युवा उद्यमियों के उत्पादों को अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध करवाएंगे। इसी तरह के इंटरव्यू कुणाल बहल के मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित हुए मगर महाराष्ट्र सरकार द्वारा दर्ज करवाई गई एफआईआर की सच्चाई किसी ने उजागर नहीं की।
मृगनयनी के प्रोडक्ट भी स्नैपडील पर
अधिकारियों का दावा है कि स्नैपडील और मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के बीच हुए एमओयू के तहत प्रदेश के बुनकर और हस्तशिल्पियों द्वारा निर्मित उत्पादों का इस ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से विक्रय होगा। इस माध्यम से उत्पादों के विक्रय से प्रदेश के बुनकरों और हस्तशिल्पियों के उत्पादन में वृद्धि होगी। इससे प्रदेश के बुनकरों एवं हस्तशिल्पियों को स्व-रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे। बिना प्रचार-प्रसार और लागत बढ़ाये उत्पादों के विक्रय की सुविधा उपलब्ध होगी। जन-सामान्य को मृगनयनी जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड का लाभ प्राप्त होगा। मृगनयनी और स्नैपडील दोनों के अनुभवों का लाभ बुनकरों और हस्तशिल्पियों को मिलेगा। ग्राहक को प्रतियोगी दरों पर उत्पाद उपलब्ध होगा। बिचौलियों के न होने से सीधे बुनकरों और हस्तशिल्पियों को फायदा होगा। इस पोर्टल के माध्यम से क्रेताओं को चौबीस घंटे और सातो दिन उत्पाद क्रय की सुविधा होगी। स्नैपडील कंपनी देश की तेजी से बढ़ रही है ई-कामर्स कंपनी है और जिसका वार्षिक विक्रय 3 बिलियन डालर है।

ई-कॉमर्स कम्पनी स्नैपडील का गोलमाल

vinod upadhyay
शिवराज सरकार से एमओयू महाराष्ट्र में एफआईआर
महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने पनवेल थाने में दर्ज करुवाया है प्रकरण-पुलिसिया जांच शुरू
भोपाल। जानी-मानी ऑनलाइन कम्पनी स्नैपडील के सीईओ कुणाल बहल अभी 20 मई को भोपाल में आयोजित शिवराज सरकार के युवा उद्यमी पंचायत में ना सिर्फ शामिल हुए बल्कि उन्होंने शासन के साथ एमओयू भी साइन किया। स्नैपडील के मामले में चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि महाराष्ट्र सरकार के खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने कुणाल बहल सहित अन्य निदेशकों के खिलाफ गैर जमानती धाराओं में पनवेल थाने पर एफआईआर दर्ज करवाई है। यह एफआईआर स्नैपडील डॉट कॉम द्वारा आपत्तिजनक दवाइयां बेचने के मामले में दर्ज हुई है, जिसकी पुलिसिया जांच शुरू हो गई, जिसके चलते संभव है कि स्नैपडील के कर्ताधर्ताओं की गिरफ्तारी भी हो सकती है। स्नैपडील देश की दूसरी सबसे बड़ी ऑनलाइन सामान विक्रेता कंपनी है। इसके सीईओ कुणाल बहल व्हार्टन के स्नातक हैं। उन्होंने 2010 में इस कंपनी की स्थापना की थी।
यह पहला मौका नहीं है जब ऑनलाइन कम्पनी की इस तरह की गड़बड़ी सामने आई है। पूर्व में भी कुछ बड़ी कम्पनियों के खिलाफ इसी तरह के प्रकरण दर्ज हुए, जिसके बाद केन्द्र सरकार ने ऐसी ई-कॉमर्स वाली कम्पनियों पर निगाह भी रखना शुरू किया है। इसी कड़ी में स्नैपडील का भी नाम सामने आया है। अभी पिछले दिनों ही महाराष्ट्र सरकार के खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानि एफडीए ने चिकित्सकों के पर्चे पर बेची जाने वाली दवाइयों को ऑनलाइन बिकते पाया और उसके उत्तर मुंबई कार्यालय पर छापा भी डाला गया। इसके पश्चात स्नैपडील के कुणाल बहल और कम्पनी के अन्य निदेशकों के खिलाफ एफडीए ने रायगढ़ जिले के पनवेल पुलिस थाने पर एफआईआर दर्ज करवा दी। यह एफआईआर औषधि एवं सौंदर्य सामग्री कानून 1940 और औषधि एवं चमत्कारी उपाय (आपत्तिजनक विज्ञापन) कानून 1954 के प्रावधानों के तहत दर्ज करवाई गई और जो धथाराओं इसमें लगाई गईं वे संज्ञेय है यानि उनमें जमानत नहीं मिल सकती। ये एफआईआर एफडीए के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और आयुक्त हर्षदीप काम्बले के निर्देश पर दर्ज करवाई गई। सूत्रों का कहना है कि स्नैपडील डॉट कॉम ने कम्पनी कानून के तहत जेस्पर इन्फोटेक प्रा.लि. बनाई जो भारत के दवा विक्रेताओं के साथ करार कर उनकी दवाएं ऑनलाइन बेचती है। ऐसी 45 दवा भी बिक्री के लिए रख दी गई जिनमें आपत्तिजनक दावे किए गए और जो औषधि एवं चमत्कारी उपाय कानून 1954 के खिलाफ है। इनमें सिलडेनॉफिल साइरेट जैसी टैबलेट भी शामिल है जो मनोचिकित्सकों, यौन रोगियों और त्वचा चिकित्सकों द्वारा सिर्फ अधिकृत पर्चे पर ही बेची जा सकती है, लेकिन स्नैपडील द्वारा उसे सहजता से ऑनलाइन उपलब्ध करवाया जाता रहा। हालांकि जांच के दौरान कम्पनी ने इन दवाइयों को ऑनलाइन बिक्री से तुरंत हटा भी लिया, लेकिन एफडीए ने बाद में यह भी पाया कि लिखित वायदा करने के बाद भी स्नैपडील 'आई पिलÓ और 'अनवांटेड 72Ó जैसी दवा बेचते भी पाया गया। इस संबंध में भी अलग से कार्रवाई की जा रही है। पनवेल थाने के अफसर मनीष कोलहटकर से अवश्य पूछा गया तो उन्होंने स्वीकार किया कि स्नैपडील के कुणाल बहल और अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, जिसकी जांच-पड़ताल की जा रही है और जांच में तथ्य सही पाए गए तो कुणाल बहल सहित अन्य की गिरफ्तारियां भी होंगी। चूंकि गैर जमानती धाराओं में प्रकरण दर्ज हुआ है लिहाजा अभी कुणाल बहल को अग्रिम जमानत भी नहीं मिल सकती। गौरतलब है कि एफडीए ने पिछले हफ्ते स्नैपडील के गोरगांव स्थित कार्यालय पर छापा मारा था। स्नैपडील पर विगोरा टैबलेट, एस्कोरिल कफ सीरप, अनवांटेड 72 और आइ-पिल जैसी दवाएं ऑनलाइन बेचने का आरोप था। जबकि ये दवाएं डॉक्टर की सलाह पर ही खरीदी जानी चाहिए। ऐसी दवाओं की ऑनलाइन बिक्री खरीदार के लिए भी नुकसानदेह हो सकती हैं। ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट-1940 के सेक्शन 18(सी) के अनुसार सिर्फ लाइसेंस प्राप्त खुदरा दवा विक्रेता ही चिकित्सक की लिखित सलाह पर ये दवाएं बेच सकते हैं। एफडीए कमिश्नर हर्षदीप कांबले के अनुसार इस तरह की दवाओं की ऑनलाइन बिक्री गैरकानूनी है। कांबले ने बताया कि दूसरी ई-कामर्स कंपनियों जैसे फ्लिपकार्ट और अमेजान के खिलाफ भी जांच जारी है। अगर ये कंपनियां भी ऐसे काम करती पाई गईं, तो इनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
बिना जांच पड़ताल मप्र ने कैसे कर लिया करार
अब यहां सवाल यह है कि जिस कम्पनी और उसके सीईओ के खिलाफ कुछ दिनों पूर्व ही महाराष्ट्र सरकार के एक जिम्मेदार महकमे खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने एफआईआर दर्ज करवाई हो उसी के सीईओ के साथ मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने एमओयू कैसे साइन कर लिया? क्या प्रदेश के अफसरों ने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को भी अंधेरे में रखा, जिस तरह पूर्व में ये अफसर ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में भी भूमाफियाओं और कई दागियों को उपकृत कर चुके हैं? भोपाल आए स्नैपडील के सीईओ कुणाल बहल को जबरदस्त पब्लिसिटी भी प्रदेश सरकार द्वारा दिलवाई गई और बकायदा मुख्यमंत्री की मौजूदगी में स्नैपडील और मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के बीच एक एमओयू भी साइन किया गया, जिसमें कुणाल बहल के साथ निगम के प्रबंध संचालक बीएल कांताराव ने हस्ताक्षर किए। इस मौके पर मुख्यमंत्री के साथ वाणिज्य एवं उद्योगमंत्री यशोधराराजे सिंधिया और मुख्य सचिव एंटोनी जेसी डीसा भी मौजूद रहे। मध्यप्रदेश सरकार के जनसम्पर्क संचालनालय ने बकायदा इसका प्रेस नोट भी जारी किया और दावा किया कि प्रदेश के बुनकर और हस्त शिल्पियों द्वारा निर्मित उत्पादों का स्नैपडील के ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से विक्रय किया जाएगा। प्रदेश शासन ने यह भी कहा कि स्नैपडील देश की तेजी से बढ़ती ई-कॉमर्स कम्पनी है, जिसका वार्षिक विक्रय 3 बिलियन डॉलर यानि 30 हजार करोड़ है।
भोपाल के युवा उद्यमी पंचायत में बांटा था ज्ञान
मध्यप्रदेश सरकार ने अभी भोपाल में युवा उद्यमी पंचायत का आयोजन किया जिसमें सुक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को कई तरह की सौगातें देने की घोषणा मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने की। इस अवसर पर स्नैपडील के सीईओ कुणाल बहल ने भी मीडिया के साथ-साथ युवा उद्यमियों को जबरदस्त ज्ञान बांटा, जिसमें उन्होंने बताया कि 5 बार असफल होने के बाद वे अपने छटवें बिजनेस मॉडल यानि ई-कॉमर्स में सफल हुए। वे प्रदेश के युवा उद्यमियों के उत्पादों को अपने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध करवाएंगे। इसी तरह के इंटरव्यू कुणाल बहल के मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित हुए मगर महाराष्ट्र सरकार द्वारा दर्ज करवाई गई एफआईआर की सच्चाई किसी ने उजागर नहीं की।
मृगनयनी के प्रोडक्ट भी स्नैपडील पर
अधिकारियों का दावा है कि स्नैपडील और मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के बीच हुए एमओयू के तहत प्रदेश के बुनकर और हस्तशिल्पियों द्वारा निर्मित उत्पादों का इस ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से विक्रय होगा। इस माध्यम से उत्पादों के विक्रय से प्रदेश के बुनकरों और हस्तशिल्पियों के उत्पादन में वृद्धि होगी। इससे प्रदेश के बुनकरों एवं हस्तशिल्पियों को स्व-रोजगार के नए अवसर उपलब्ध होंगे। बिना प्रचार-प्रसार और लागत बढ़ाये उत्पादों के विक्रय की सुविधा उपलब्ध होगी। जन-सामान्य को मृगनयनी जैसे प्रतिष्ठित ब्रांड का लाभ प्राप्त होगा। मृगनयनी और स्नैपडील दोनों के अनुभवों का लाभ बुनकरों और हस्तशिल्पियों को मिलेगा। ग्राहक को प्रतियोगी दरों पर उत्पाद उपलब्ध होगा। बिचौलियों के न होने से सीधे बुनकरों और हस्तशिल्पियों को फायदा होगा। इस पोर्टल के माध्यम से क्रेताओं को चौबीस घंटे और सातो दिन उत्पाद क्रय की सुविधा होगी। स्नैपडील कंपनी देश की तेजी से बढ़ रही है ई-कामर्स कंपनी है और जिसका वार्षिक विक्रय 3 बिलियन डालर है।
केन्द्र सरकार की निगाहें भी ऑनलाइन कम्पनियों पर
पिछले दिनों यह तथ्य सामने आया कि ऑनलाइन कम्पनियों द्वारा बड़ी मात्रा में टैक्स चोरी भी की जा रही है। साथ ही उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी भी हो रही है, लिहाजा इन पर केन्द्र सरकार शिकंजा सके। संसद में भी यह मामला उठा जिस पर वाणिज्य विभाग की मंत्री ने घोषणा भी कि सरकार इस तरह की ई-कॉमर्स कम्पनियों पर निगाह रख रही है। पूर्व में भी इन ऑनलाइन कम्पनियों द्वारा की जाने वाली ठगी की खबरें आती रही हैं। अब देखना यह है कि स्नैपडील के खिलाफ महाराष्ट्र एफडीए ने जो एफआईआर दर्ज करवाई है उसका परिणाम क्या निकलता है और स्नैपडील के साथ-साथ फ्लीपकार्ड और अमेजन के दफ्तरों की भी जांच-पड़ताल की गई।
राज्यों ने भी कसा शिकंजा
ऑनलाइन कारोबार की बढ़ती धाक के बीच टैक्स चोरी को लेकर राज्यों के टैक्स डिपार्टमेंट चौकन्ने हो गए हैं। दिल्ली के टैक्स डिपार्टमेंट ने करीब 8 हजार से अधिक ऐसे डीलर्स की पड़ताल शुरू की है जो ऑनलाइन कंपनियों के माध्यम से अपना माल बेचते हैं। डिपार्टमेंट देश की बड़ी ई कॉमर्स कंपनियों से उनके डीलर्स की जानकारी भी तलब की है। इससे पहले कर्नाटक का टैक्स डिपार्टमेंट भी अमेजन डॉट कॉम से जुड़े डीलर्स पर कार्रवाई कर चुका है। इसी महीने महाराष्ट्र सरकार भी एक अन्य ऑनलाइन कंपनी नापतौल डॉट कॉम के खाते सील कर चुकाह है। कर्नाटक, तमिलनाडु और अब महाराष्ट्र जैसे राज्यों द्वारा ईकॉमर्स कारोबार पर नकेल कसने की शुरूआत के बाद गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों ने भी ऑनलाइन कारोबार पर टैक्स लगाने के लिए टैक्स नियमों में बदलाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं।
दिल्ली टैक्स डिपार्टमेंट के रडार पर डीलर्स
दिल्ली के वाणिज्यिक कर विभाग ने देश की तीन दिग्गज ऑनलाइन कंपनी फ्लिपकार्ट, स्नेपडील और अमेजन से जुड़े डीलर्स की पड़ताल शुरू की है। एक अंग्रेजी अखबार दिल्ली के टैक्स डिपार्टमेंट ने ऑनलाइन कंपनियों से उनके डीलर्स की सूची मांगी है। विभाग इस बात की पड़ताल कर रहा है कि ऑनलाइन कंपनियों के माध्यम से कारोबार करने वाले कितने डीलर्स टैक्स डिपार्टमेंट में रजिस्टर्ड हैं। टैक्स डिपार्टमेंट के अनुसार अभी तक की पड़ताल में यह पता चला है कि करीब 8 से 10 फीसदी डीलर्स ने वैट रजिस्ट्रेशन कराया ही नहीं है। वहीं एक ई-कॉमर्स कंपनी के अधिकारी ने बताया कि वे ऑनलाइन बिक्री के लिए सिर्फ एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराते हैं, ऐसे में उन पर किसी प्रकार की वैट देनदारी नहीं बनती। जहां तक डीलर्स का सवाल है हम जरूर उन्हें अपना ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से पहले वैट रजिस्ट्रेशन एवं टिन नंबर आदि मांगते हैं।
डीलर्स की मांग ईकॉमर्स के लिए बने टैक्स सिस्टम
कर्नाटक के बैंगलुरू स्थित एक ऑनलाइन मर्चेंट सिंप्किन्स अपैरल के प्रोपराइटर सिद्धार्थ शेखर बताते हैं कि कर्नाटक में टैक्स डिपार्टमेंट ऑनलाइन कंपनियों और उनसे जुड़े डीलर्स को लेकर बहुत सख्त है। इस साल जुलाई अगस्त से डिपार्टमेंट टैक्स देनदारी के लिए कुर्की के नोटिस दे रहा है। कई बार दूसरे राज्यों के टेक्स विभाग भी पड़ताल के लिए फोन करते हैं। वे बताते हैं कि हमारे पास ट्रेड रजिस्ट्रेशन है, लोकल अथॉरिटी को हम टैक्स अदा करते हैं। लेकिन फिर भी हम पर टैक्स डिपार्टमेंट कार्रवाई करता है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि राज्य और केंद्र दोनों में ही टैक्स को लेकर स्पष्टता नहीं है। मुंबई स्थित डीलर योगेंद्र वानखेड़े बताते हैं कि ऑनलाइन बिजनेस अभी देश में उभर रहा है। कारोबार की ग्रोथ के चलते टैक्स डिपार्टमेंट भी इसमें हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन जब तक टैक्स नीति स्पष्ट नहीं होगी तब तक कारोबारी और टैक्स विभाग दोनों ही कार्रवाई के लिए असमंजस में रहेंगे।
महाराष्ट्र में निशाने पर ईबिजनेस
महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ कर अधिकारी ने बताया कि ऑनलाइन कारोबार के बढ़ते दायरे को देखते हुए अब राज्य की सरकार सख्त कदम उठाने की तैयारी शुरू कर दी है। महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे ैसे मेट्रो शहरों से इन कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिलते हैं। ऑनलाइन कंपनियां मुंबई के कई थर्ड पार्टी डीलरों से प्रॉडक्ट लेकर ग्राहकों को बेचती हैं। टैक्स डिपार्टमेंट इस पर नजर रख रही है। हाल ही में महाराष्ट्र के टैक्स डिपार्टमेंट ने दिसंबर में ऑनलाइन कंपनी नापतौल पर कार्रवाई की है। राजस्व विभाग के सूत्रों के अनुसार कंपनी पर 2008 से लेकर 2014 के बीच करीब 32 करोड़ रुपये की देनदारी है। जिसके चलते कंपनी के बैंक खाते सीज कर दिए गए हैं। हालांकि कंपनी ने इसके लिए बॉम्बे हाइकोर्ट में अपील दर्ज की है।
उत्तर प्रदेश में ट्रेडर्स पर नजर
कंपनियों पर यूपी में भी टैक्स प्रशासन ने भी निगाह टेढ़ी करनी शुरू कर दी हैं। उत्तर प्रदेश के प्रमुख कारोबारी शहर नोयडा में टैक्स प्रशासन ने ऑनलाइन कंपनियों को माल सप्लाई करने वाले रिटेलर्स पर कार्रवाई की है। ये रिटेलर्स 50 से 70 करोड़ के उत्पाद ऑनलाइन कंपनियों को सप्लाई करते हैं। इसके अलावा कंपनी कानपुर, आगरा और मथुरा में मौजूद डिस्ट्रीब्यूटर्स पर भी नजर रखे है।
बिहार ने शुरू की सीलिंग की कार्रवाई
ऑनलाइन बिजनेस पर लगाम कसने के लिए जहां गुजरात तैयारी कर रहा है। वहीं उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और बिहार जैसे राज्यों ने कार्रवाई भी शुरू कर दी हैं। बिहार में टैक्स प्रशासन ने पिछले 3 महीने में कई ऑनलाइन कंपनियों से जुड़े ट्रेडर्स और गोदाम की भी जांच की है। पिछले दिनों राज्य सरकार ने एक ईकॉमर्स कंपनी का गोदाम भी सील किया है। राज्य शासन के अधिकारी ने बताया कि ये कंपनियां राज्य सरकार को कर चुकाए बगैर ही कूरियर के जरिये अपने सामान को उपभोक्ताओं तक पहुंचा रही थीं। कर नहीं चुकाने की वजह से उनके सामान बाकी विक्रेताओं के मुकाबले सस्ते होते हैं।
कर्नाटक और तमिलनाडु भी कर चुके हैं कार्रवाई
ईकॉमर्स कारोबार को टैक्स दायरे में लाने के लिए कर्नाटक और तमिलनाडु की सरकारों ने सबसे पहले कार्रवाई शुरू की है। कर्नाटक के कर विभाग के राडार पर इन ऑनलाइन कंपनियों को माल सप्लाई करने वाले रिटेलर्स हैं। विभाग ने रिटेलर्स को नोटिस भेजे थे। इसके साथ ही नोटिस का जवाब नहीं देने वाले रिटेलर्स पर दिसंबर की शुरूआत में नोटिस का जवाब नहीं देने वाले ऑनलाइन कंपनी अमेजन के रिटेलर्स पर जब्ती की कार्रवाई शुरू कर दी है। कर्नाटक सरकार थर्ड पार्टी वेयर हाउसेस को भी वैट के दायरे में लाने की कोशिश कर रही है। उल्लेखनीय है कि देश की दो प्रमुख कंपनियों फ्लिप-कार्ट और अमेजन के हेडक्वार्टर कर्नाटक में हैं, वहीं आईटी का प्रमुख केंद्र होने के चलते ईकॉमर्स कंपनियों को बड़ा बिजनेस कर्नाटक से हासिल होता है। नियमों में बदलाव के साथ ही राज्य सरकार ने नए ट्रेडर्स लाइसेंस देने से मना कर दिया है। वहीं विभाग ने ऑनलाइन कंपनियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की शुरूआत कर दी है।
पंजाब और राजस्थान ने बढ़ाया दबाव
ऑनलाइन बिजनेस ने रिटेलर्स के बिजनेस और मार्जिन्स पर जबर्दस्त चोट दी है। ऐसे में पंजाब और राजस्थान के रिटेलर्स और होल सेलर्स ने ऑनलाइन कारोबार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू किया है। नवंबर में पंजाब और राजस्थान दोनों राज्यों के कंप्यूटर्स और मोबाइल डीलर्स ने कारोबार बंद कर सरकार से कानून सख्त बनाने के लिए बनाया।
ई-कॉमर्स के लिए गुजरात बनाएगा फ्रेमवर्क
गुजरात सरकार ने ईकॉमर्स कंपनियों के बिजनेस मॉडल और उनके कारोबार से जुड़े टैक्स ढांचे का विशेष अध्ययन शुरू किया है। गुजरात के वित्त मंत्री सौरभ पटेल के अनुसार फिलहाल हम इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि गुजरात में ईकॉमर्स कंपनियों को किस प्रकार टैक्स दायरे में शामिल किया जाए। साथ ही इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि राज्य की मौजूदा टैक्स प्रणाली ईकॉमर्स कारोबार को लेकर कोई कमजोरी तो नहीं हैं। इस कोशिश के साथ राज्य सरकार टैक्स ढांचे में सुधार के साथ सस्ती दरों पर प्रॉडक्ट उपलब्ध करा रही ई-कॉमर्स वेबसाइट से स्थानीय कारोबारियों को सुरक्षा देने कोशिश कर रही है। साथ ही इस स्टडी से ऑनलाइन कारोबार को लेकर टैक्स ढांचे में मौजूद कमियों को भी दूर किया जाएगा।

बलराम तालाब योजना में सामने आया फर्जीवाड़ा

7 साल में 8055000000 के तालाब गायब
8055 लापता तालाबों को ढूंढने में जुटे अधिकारी
भोपाल। प्रदेश में सरकार खेती को लाभ का धंधा बनाने में जुटी हुई है। इसके लिए सरकार ने कई योजनाएं परियोजनाएं संचालित कर रखी हैं। इसी में से एक बलराम तालाब योजना में बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। इस योजना के तहत किसानों ने सरकार से अनुदान तो ले लिया है, लेकिन तालाब का निर्माण नहीं करवाया है। यही नहीं अधिकारियों ने कागजी भौतिक सत्यापन कर इनका भुगतान भी कर दिया है। आलम यह है कि प्रारंभिक पड़ताल में करीब 8055 से अधिक तालाब लापता बताए जा रहे हैं। इन लापता तालाबों को ढूढऩे के लिए अधिकारी जुट गए हैं। इस फर्जीवाड़े में करीब 8055000000 रूपए का घोटाला सामने आया है। जानकारों का कहना है कि जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी फर्जीवाड़े का आंकड़ा भी बढ़ता जाएगा। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2007-08 में बारिश का पानी सहेजने, सिंचाई करने और जमीनी जल स्तर बढ़ाने के लिए बलराम तालाब योजना प्रारम्भ किया था। इसमें किसान के अपने खेत पर तालाब बनाने के लिए करीब 40 से 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। प्रदेश के अधिकांश जिलों में किसान इस योजना का लाभ उठाने के लिए आगे आए पर कुछ जगह स्थानीय मैदानी अमले, पंचायत की मिलीभगत से यह योजना पैसा कमाने का जरिया बन गई। आलम यह है कि जमीन पर तालाब बने ही नहीं लेकिन तालाबों के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रूपए निकाल लिए गए। कहीं एक ही तालाब को तीन-चार लोगों ने अपना-अपना बताकर तो कहीं सरकारी जमीं पर गड्ढा खोदकर पैसा हजम कर लिया गया। मोटी रकम के लालच में यह गोरखधंधा खूब फला-फूला। कमाल यह है कि सरकार अब जागी है जब कितनी ही चिडिय़ाएं खेत चुग गई।
कागजों पर बना लिए बलराम तालाब
खेतों में पानी सहेजने के लिए बलराम तालाब योजना के तहत बनाए गए अधिकतर तालाब केवल कागजों पर बन कर तैयार हो गए हैं। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विभाग ने जो लक्ष्य दिया था उसके अनुरूप विकासखंडों में तालाब नहीं बन सके है। वहीं किसी विकास खंड में लक्ष्य से दो गुने तालाब बन कर तैयार हो गए और बिना भौतिक सत्यापन के किसानों को अनुदान राशि भी जारी कर दी गई है। ऐसे में विभाग की कार्यप्रणाली पर सावालिया निशान खड़े हो गए हैं कि विभाग ने तालाबों का बिना सत्यापन किए अरबों रूपए की अनुदान राशि कैसे जारी कर दी। उल्लेखनीय है कि शासन द्वारा उन्हीं बलराम तालाबों के निर्माण पर अनुदान की सुविधा दी जाती है जिनका निर्माण निर्धारित मापदंड के अनुसार कराया जाता है। इसके लिए कृषि विभाग द्वारा अनुदान राशि तभी जारी की जाती है जब बनाए गए तालाब का भौतिक सत्यापन कर लिया जाता है। शासन द्वारा बलराम तालाब तीन स्तर पर भूमि की उपलब्धता के आधार पर स्वीकृत किए जाते हैं। जिन किसानों के पास कम भूमि होती है ऐसे किसानों को 55 मीटर लंबा और 30 मीटर चौड़ा तथा 3 मीटर गहरा तालाब बनाने की स्वीकृति दी जाती है। इन तालाबों का निचला तल 46 मीटर लंबा 21 मीटर चौड़ा होता है। इसी प्रकार जिन किसानों के पास अधिक भूमि है उन्हें 63 से 68 मीटर लंबा, 30 मीटर चौड़ा और तीन मीटर गहराई वाले तालाब बनाने की स्वीकृति दी जाती है। लेकिन अधिक भूमि वाले किसान भी जिस तालाब की अनुमति मिलती है उसे न बनाते हुए कम भूमि में तालाबों का निर्माण कर लेते हैं। जो उन्हें मिली स्वीकृति के विपरीत होता है। लेकिन विभागीय अधिकारी तालाब के भौतिक सत्यापन के समय इसकी अनदेखी कर अनुदान की राशि उपलब्ध करा देते हैं।
सबसे अधिक देवास में घपला
जहां प्रदेशभर में सरकारी अधिकारी इन दिनों खेत-खेत जाकर लापता करीब 8055 तालाबों की पड़ताल कर रहे हैं वहीं अकेले देवास जिले में 2000 से ज्यादा तालाबों को जमीन पर ढूंढा जा रहा है। शुरूआती जांच में ही जिन 107 तालाबों की खोजबीन की गई, उनमें से सिर्फ 7 तालाब ही मौके पर मौजूद मिले, जबकि 100 तालाब जमीन पर बने ही नहीं। हद यह कि वे सिर्फ कागजों पर ही बन गए और सरकार के खजाने से इन तालाबों के नाम पर सब्सिडी के करोड़ों रूपए डकार लिए गए। ढोल की पोल उजागर हुई तो आनन-फानन में 13 कर्मचारियों को निलम्बित कर दिया गया है। दरअसल देवास जिले के गांव-गांव में किसानों के खेत पर सरकार की बलराम योजना के तहत कागजों के मुताबिक बीते 3 सालों में करीब 2000 से ज्यादा तालाब बनाए जा चुके हैं लेकिन जब सरकारी कागजों के सहारे अधिकारी खेत-खेत पंहुचे तो वहां खेत लहलहा रहे थे। जिन तालाबों को लाखों रुपये की लागत से बनाया गया अब ये ढूंढे नही मिल रहे यानी तालाब के तालाब ही गायब हो गये। अब मामले की जांच करने पंहुची टीम गांव-गांव पंहुच कर तालाबों का पता ठिकाना ढूंढ रही है। हैरानी की बात ये है कि सरकारी कागजातों में जिस जमीन पर तालाब हिलोरें ले रहे है वहां कीचड़ तक नहीं है। हालांकि इतना बड़ा खुलासा होने के बाद भी जांच का काम अभी बहुत धीमा चल रहा है। इससे तथ्य भी प्रभावित हो सकते हैं और दोषियों को बचने का मौका भी मिल सकता है। कलेक्टर की बार-बार की चेतावनी के बाद भी दो माह से ज्यादा समय बीतने पर भी जांच रिपोर्ट तैयार नहीं हो सकी है। देवास के उप संचालक कृषि जीके वास्केल कहते हैं कि जिला कलेक्टर के आदेश से 2000 तालाबों की जांच की जा रही है। टोंकखुर्द क्षेत्र में तालाब नहीं मिलने पर कर्मचारियों पर कार्रवाई की जा चुकी है। जांच रिपोर्ट जल्दी ही जिला कलेक्टर को सौंप दी जाएगी। देवास जिले चुरलाय गांव के किसान किसान राजेंद्रसिंह कहते हैं कि सरकारी अफसर ध्यान देते तो बहुत पहले ही यह सब सामने आ जाता। वह तो कुछ लोगों ने शिकायत न की होती तो दूसरी योजनाओं की तरह यहां भी अंधेरगर्दी चलती रहती। देवास जिले के करीब 5 हजार की आबादी वाले जिरवाय गांव में बड़ा घोटाला सामने आया है। यहां जब सज्जनसिंह और इन्दरसिंह के खेत पर सरकारी टीम पहुंची तो जमीन पर तालाब की जगह लहसुन की फसल खड़ी थी। पर यह अकेला गांव नहीं है, ऐसे कई गांव हैं। शुरुआती दौर में ये आंकडा बेहद चौंका देने वाला है। फिलहाल पूरे मामले में 13 अफसरों-कर्मचारियों को कलेक्टर ने दोषी पाते हुए निलंबित कर दिया है।
धार, नालछा व तिरला में जांच शुरू
इसी तरह धार जिले के धार, नालछा व तिरला में किसानों को दी जाने वाली योजनाओं में अनुदान, कृषि यंत्रों के वितरण व बलराम तालाब निर्माण योजना में अनियमितिता करने के मामले की जांच शुरू हो चुकी है। कृषि विभाग भोपाल द्वारा जांच के लिए बनाई गई 6 टीमों ने जिले के विकासखंडों में पहुंचकर जहां पर सूची में दर्ज किसान को ढूंढकर उससे योजना के तहत मिलने वाले अनुदान की जानकारी ली वहीं बलराम तालाब योजना के भौतिक सत्यापन की भी प्रक्रिया भी कर रही है। हालांकि प्रारंभिक रूप से टीम अपनी रिपोर्ट तैयार करने में लगी है। जिसे शासन को सौंपा जाएगा। लेकिन प्रारंभिक जांच में ही अनियमितताओं की जानकारी सामने आ रही है। सूत्रों के अनुसार जो किसान सूची में दर्ज है, वह संबंधित गांव व पते पर नहीं मिल रहे है। गौरतलब है कि कृषि विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. राजेश राजौरा ने प्रदेश के चार जिलों में हितग्राहियों को दी गई योजनाओं व अनुदान के प्रकरणों की जांच करवाई थी। प्रारंभिक जांच में इसमें 80 करोड़ की अनियमितता की बात सामने आई थी। इसके चलते धार कृषि उप संचालक आरपी कनेरिया को निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद चारों जिले में भौतिक सत्यापन व आगे की जांच के लिए टीमें बनाई गई थी। धार जिले की जांच के लिए शासन ने आलीराजपुर, बड़वानी व आसपास के कृषि अधिकारियों वाली 6 टीमे बनाई है। बलराम तालाब योजना के तहत बनाए गए 100 तालाबों के भौतिक सत्यापन के लिए धार, नालछा व तिरला में दल खेत-खेत घूमा। लेकिन कई जगह तालाब की जगह सपाट जमीन दिखी। वहीं सूची में दर्ज कई किसानों के मैदानी स्तर पर पते नहीं है। ऐसे में भौतिक सत्यापन में टीम को भटकना पड़ रहा है। धार जिले के कृषि विभाग के अधिकारी डीएस मौर्य का कहना है कि जांच दल ने अपनी भौतिक सत्यापन व जांच की प्रक्रिया पूरी कर ली है। बलराम तालाब निर्माण योजना के साथ ही ड्रिप स्प्रिकंलर वितरण, कृषि यंत्रीकरण खरीदी व वितरण, डीजल पंप व पाइप लाइन वितरण आदि की भी जांच की जा रही है।
अधूरे तलाबों का भी कर दिया भुगतान
सीहोर जिले में कृषि विभाग ने पांच विकास खंड सीहोर, इछावार, आष्टा, बुधनी और नसरुल्लागंज के लिए 50-50 तालाब बनाने लक्ष्य स्वीकृत किया था। लेकिन नसरुल्लागंज विकास खंड में लक्ष्य से दो गुने तालाब बना दिए गए। विभाग से मिले आंकड़ों के अनुसार यहां 100 में से 98 तालाब बन कर तैयार हो गए हैं। वहीं सीहोर, आष्टा, बुधनी और इछावार में अभी लक्ष्य अनुरूप भी तालाब नहीं बन सके हैं। लेकिन अधिकारियों ने बिना भौतिक सत्यापन किए हुए ही अधूरे तलाबों का भी भुगतान कर दिया। अब अधिकारी इसकी जांच में जुट गए हैं। दरअसल, शासन की योजनानुसार बलराम तालाब का निर्माण करने वाले अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति के किसानों को 50 प्रतिशत का अनुदान दिया जाता है। वहीं सामान्य तथा पिछड़ा वर्ग के किसानों को 40 प्रतिशत अनुदान दिया जाता है। एक बलराम तालाब की लागत 2 लाख रुपए है उस मान से अजा और अजजा के हितग्राही किसान को 1 लाख और सामान्य तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के किसान को 80 हजार रुपए का अनुदान दिया जाता है। शेष राशि किसान को स्वयं खर्च करनी पड़ती है। पिछले वित्तीय वर्ष में 252 तालाबों में से 225 तालाबों का कार्य पूर्ण बताकर बिना भौतिक सत्यापन कराए ही अनुदान की राशि 176.920 लाख रुपए का भुगतान कर दिया गया जबकि कई तालाब अभी भी अधूरे पड़े हुए हैं। यही नहीं बिना भौतिक सत्यापन के बनाए गए बलराम तालाबों में भारी लीपापोती की गई है। सत्यापन नहीं होने के कारण जिन किसानों ने तालाब बनाए है उन्हें तो अनुदान मिला ही है। लेकिन जिन किसानों ने तालाब नहीं बनाए है उनकों को भी विभाग अधिकारियों और कर्मचारियों ने सांठगांठ कर अनुदान राशि जारी कर दी है। इससे यह बात तो साफ हो गई है कि मौके पर पहुंच कर तालाबों का भौतिक सत्यापन इसी कारण से नहीं किया गया। सीहोर जिले के उपसंचालक कृषि रामेश्वर पटेल कहते हैं कि जिले में 252 बलराम तालाबों को स्वीकृति दी गई थी, जिसमें से 225 तालाबों का निर्माण कार्य पूरा हो जाने के बाद विभाग द्वारा अनुदान राशि दे दी गई है। यदि भौतिक सत्यापन में गड़बड़ी हुई है तो जांच कराई जाएगी।
फोटोकॉपी लगाकर पैसे निकाले गए
कृषि विभाग द्वारा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, लघुत्तम सिंचाई योजना, नाफेड निर्माण, नलकूप योजना, वर्मी कम्पोस्ट, बलराम तालाब, बीज ग्राम, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, डीजल पंप, फसल प्रदर्शन, कृषि यंत्र, गन्ना विकास योजना, सघन कपास विकास कार्यक्रम आदि के लिए किसानों को मिलने वाली सब्सिडी में किस तरह घपला हो रहा है इसका नजारा धार और रतलाम की जांच में सामने आया है। यहां बिल की फोटोकॉपी लगाकर पैसे निकाल लिए गए। सब्सिडी किसान के खातों में जमा नहीं कराई गई। पंचायती राज संस्थाओं के अधिकारों को ताक पर रखकर हितग्राहियों का मनमर्जी से चयन किया गया। हितग्राहियों को जो सामग्री वितरण किया गया वो संदेहास्पद पाया गया। केन्द्रीय योजनाओं में किसानों से यंत्रों का चयन नहीं कराकर निजी कंपनियों को सीधे क्रय आदेश दिए गए। लक्ष्य के विरुद्ध अधिक पूर्ति कराकर शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया। डॉ.राजौरा ने बताया कि महालेखाकार मप्र ने कैशबुक की जांच में 200 प्रकरण गबन और शासकीय धन की क्षति के पाए हैं। महालेखाकर की रिपोर्ट पर जांच के लिए संचालक कृषि की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई है। कमेटी एक-एक प्रकरण का परीक्षण कर जिम्मेदारी तय करेगी। साथ ही जो अधिकारी दस्तावेज मुहैया नहीं करा रहे हैं उनके खिलाफ कार्रवाई करेगी। गौरतलब है कि कृषि विभाग धार में करोड़ों रुपए का सबसिडी घोटाला हुआ है। इसकी जांच के लिए 6 टीमें बनाई गई है। इसके तहत वर्ष 2012 से 2015 तक जिले में बनाए गए बलराम तालाबों का भौतिक सत्यापन करवाया जाएगा। साथ ही अन्य दो योजनाओं के मामले में भी जांच शुरू करवाई जा रही है।
हर जिले में करोड़ों की हेराफरी
कृषि विभाग द्वारा मिलने वाले अनुदान का अनैतिक लाभ उठाने के लिए अधिकारियों, पंचायत प्रतिनिधियों और किसानों की मिलीभगत से जमकर हेराफेरी की गई है। केंद्र में एनडीए सरकार को सत्तासीन हुए तो महज एक वर्ष ही हुआ है। लेकिन इससे पहले वर्षों तक केंद्र से मिलने वाली करोड़ों रुपए की सहायता के भरोसे तीन-तीन बार कृषि कर्मण अवार्ड लेने वाले मध्यप्रदेश के कृषि विभाग में किस तरह घोटाला और घपला किया जा रहा था, इसकी परतें अब खुल रही हैं। विभाग एक तरफ कृषि को लाभ का धंधा बनाने में जुटा रहा दूसरी तरफ सरकारी सब्सिडी के गोरखधंधे खेल चलता रहा। रतलाम, धार तथा सतना जिलों में कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा भारत सरकार एवं राज्य पोषित योजनाओं में गंभीर अनियमितताएं की गईं। अकेले सतना जिले में करोड़ों रुपए की हेराफेरी हुई। स्प्रिंकलर सेट के वितरण, छोटे एवं बड़े कृषि यंत्रों के वितरण, बीज वितरण कार्यक्रम, सूरज धारा एवं अन्नपूर्णा योजना में बीज अदला-बदली-स्वालंबन-उत्पादन, बीज ग्राम योजना, बलराम तालाब योजना जैसी केंद्र और राज्य सरकार की तमाम योजनाओं में जमकर भ्रष्टाचार हुआ। कई योजनाओं में वित्तीय सीमा से बाहर जाकर लाखों रुपए खर्च कर दिए गए। वर्ष 2013-2014 में आईसोपाम योजना के अन्तर्गत 60 पाइप लाइन डाली जानी थी लेकिन 72 पाइप लाइन डाली गई। इस प्रकार जहां 9 लाख रुपए तक खर्च करने की सीमा थी वहां 27 लाख 23 हजार रुपए खर्च कर दिए गए। यह खर्चा तो कागजों पर लिखा हुआ है। वे 72 पाइप कहां हैं, किस जमीन में बिछे हुए हैं। बिछाए गए भी हैं या नहीं। इसमें भी संदेह है। क्योंकि जब हिसाब गलत है तो बाकी जगह भी गड़बड़ी हो सकती है। किसानों को स्प्रिंकलर सेट देने के लिए फर्जी आवेदन मंगाए गए। आवेदन में किसान द्वारा किस कंपनी का स्प्रिंकलर सेट मांगा गया है इसका कोई उल्लेख नहीं है। जाहिर है कागजों में स्प्रिंकलर सेट बांटे गए। केवल स्प्रिंकलर सेट ही नहीं बल्कि एनएफ.एसएम धान के अंतर्गत वर्ष 2012-2013 में 88 लोगों को 16.20 लाख रुपए के यंत्र बांटने की योजना थी जिसमें 252 लोगों को 36 लाख रुपए के यंत्र बांटे गए। बिना किसी अतिरिक्त स्वीकृति के। जनपद पंचायत की कृषि स्थायी समिति से अनुमोदन प्राप्त किए बगैर किसानों के खाते में पैसा डाल दिया गया। बलराम तालाब योजना में भी कई कृषकों के खाते में पैसे तो डाल दिए गए लेकिन उनकी प्रशासकीय स्वीकृतियां जारी ही नहीं हुई। जब पैसा स्वीकृत नहीं हुआ तो खाते में कैसे पहुंचा। कई ऐसे किसानों को 1-1 लाख रुपए का अनुदान दे दिया गया जो सामान्य वर्ग के संपन्न किसान थे तथा जिन्हें नियमानुसार बलराम तालाब योजना के तहत अनुदान या अन्य लाभ लेने की पात्रता ही नहीं थी। बताया जाता है कि 40 हजार रुपए से लेकर 1 लाख रुपए तक की राशि बिना किसी शासकीय स्वीकृति के किसानों के खाते में डाल दी गई। जो गंभीर अनियमितता की ओर इशारा करती है। कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन का कहना है कि कुछ गड़बड़ी की शिकायत मिली थी इसलिए जांच कराई जा रही है। जांच चलती रहती है। 30-35 जिलों में जांच कराई जाएगी। जांच का किसी के कार्यकाल से कोई लेना-देना नहीं है। मैं अपने कार्यकाल की भी जांच कर रहा हूं। कुछ अधिकारियों ने फंड जारी करते समय अनुमोदन नहीं लिया इसलिए गड़बड़ी हुई।
अधिकारी घपला करते रहे, सरकार आंख मूंदकर देखती रही
अभी तो केवल तीन जिलों का काला-पीला सामने आया है। बाकी जिलों का हाल कहना मुश्किल है। सतना जिले में भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में यह भ्रष्टाचार किया गया और सरकार आंख मूंदकर देखती रही। वैसे भी बलराम तालाब योजना में अनुदान राशि का भुगतान प्रथम निर्माण प्रथम अनुदान पद्धति से किया जाता है। लेकिन इसमें वह पद्धति अपनाई ही नहीं गई। यहां तक कि अधिकारियों ने बलराम तालाबों का भौतिक सत्यापन करना भी उचित नहीं समझा। वर्ष 2012 के मार्च माह से लेकर दिसंबर 2014 तक उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विभाग सतना के पद पर एस के शर्मा, संजीव कुमार शाक्य (प्रभारी उपसंचालक) एपी सुमन पदस्थ रहे। इस दौरान रोकड़ पुस्तिका भी नियमित रूप से नहीं भरी गई। विभाग वित्तीय वर्ष 2014-15 के अंतिम दिवस 31 मार्च 2015 को कार्यालय अवशेष राशि 4 करोड़ 47 लाख 69 हजार 40 रुपए का वर्गीकरण बताने में भी असफल रहा। कई मामलों में अनुदान की राशि पहले ही निकाल ली गई जबकि इसे अग्रिम न निकालने का निर्देश शासन का है। एक जिले में 250 से अधिक गांव आते हैं। ऐसी स्थिति में सभी गांवों में दिए गए अनुदान और विभिन्न योजनाओं के तहत करवाए गए हर एक काम की जांच करना संभव नहीं है। अधिकारियों द्वारा जो जांच पड़ताल की जा रही है। वह बड़ी वित्तीय अनियमितताओं की है। छोटे-बड़े सभी मामलों को मिलाया जाए तो यह एक बड़ी धांधली हो सकती है। विभाग का अनुमान है कि केवल तीन जिले में 75 करोड़ रुपए की हेराफेरी हुई है। राजेश राजौरा ने इस संबंध में सभी 51 जिलों के कलेक्टरों को 22 मार्च को पत्र लिखते हुए 30 अप्रैल तक समस्त जांच करने का कहा था। लेकिन अभी तक कुल तीन जिलों धार, सतना, रतलाम से जांच प्राप्त की गई है। अब कलेक्टरों को और अधिक समय दिया जा रहा है। तीन उप संचालक निलंबित कर दिए गए हैं। जिनके विरुद्ध आपराधिक प्रकरण भी दर्ज किए जा सकते हैं। इसी प्रकार धार जिले में भी उप संचालक कृषि द्वारा गंभीर वित्तीय अनियमितता करने का मामला सामने आया है। लाखों रुपए की राशि तो मार्च 2015 तक समयोजित नहीं की गई थी। रोकड़ पुस्तिका में बाउचर तक अंकित नहीं थे और किसानों के खाते में राशि तक जमा नहीं कराई गई थी। उप संचालक ने न तो कार्यालयों को नियंत्रित किया और न ही नियमानुसार हितग्राही कृषकों का चयन किया। बीज, उर्वरक, कीटनाशक, औषधि आदि बेचने वाले विक्रेताओं के संस्थानों का निरीक्षण तक नहीं किया न ही उनके द्वारा प्रयुक्त अमानक सामग्री आदि के संबंध में कोई उपयुक्त कार्यवाही की गई। हितग्राही कृषकों को कृषि सामग्री का वितरण संदेहास्पद पाया गया। अन्नपूर्णा-सूरजधारा योजना में हितग्राही कृषकों से उनका अंशदान नहीं लिया गया, बल्कि वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी स्तर से लगने वाली राशि की गणना कर अपने स्तर से राशि जमा कर, दर्शाया गया। 46 लाख 28 हजार 178 रुपए की राशि का समयोजन ही नहीं किया गया। विभिन्न योजनाओं के तहत कृषकों को जो सामग्री वितरित की गई उसकी पावती तक नहीं दी गई। लगभग 22 लाख रुपए की राशि एमपी एग्रो धार को बिना किसी सक्षम अधिकारी की स्वीकृति के अग्रिम दे दी गई। मूल प्रति के बगैर छायाप्रति पर ही बिल की राशि ले ली गई। लगभग सभी विकासखण्डों में कुछ न कुछ गड़बड़ी पाई गई है। स्प्रिंकलर, ड्रिप, पाइप लाइन, डीजल पंप, विद्युत पंप, सीड ड्रिल आदि की खरीद के लिए जो कोटेशन प्रक्रिया अपनाई गई वह भी त्रुटिपूर्ण थी। ज्ञात रहे कि इन यंत्रों की आपूर्ति कृषि विभाग द्वारा विभिन्न कंपनियों से लेते हुए की जाती है। इसके लिए किसान अपना अंश जमा कराते हैं और बाकी सरकारी अनुदान से मिलती है। लेकिन कतिपय कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए किसानों को उनके मन पसंद यंत्र न देकर उप संचालक ने स्वयं कोटेशन दिए और बाद में उसी के अनुरूप यंत्र प्रदान करवा दिए। इन यंत्रों तथा अन्य योजनाओं के लिए हितग्राही के चयन में कई तरह की गड़बडिय़ा मिली हैं। धार जिले में 573 बीज विक्रेता हैं जिनके निरीक्षण का दायित्व उप संचालक का है। लेकिन इस निरीक्षण में भी कंजूसी बरती गई। कई मामलों में नमूने अमानक पाए जाने के बाद भी कार्रवाई लंबित रखी गई। रोकड़ पुस्तिका, कंटेंजेट रजिस्टर, अग्रिम पंजी आदि के रखरखाव में भी गंभीर अनियमितता पाई गई है। कहीं बाउचर नहीं है तो कहीं पेमेेंट में पारदर्शिता नहीं है। राष्ट्रीय खाद सुरक्षा मिशन की दलहन योजना में भी भारी गड़बड़ी की गई है। बीज ग्राम योजना, बीजों पर अनुदान की योजना, संकर मक्का विस्तार कार्यक्रम, नलकूल योजना सहित तमाम योजना में छोटी से बड़ी गड़बड़ी मिली है। 1 करोड़ 15 लाख 75 हजार रुपए की राशि के बिलों का भुगतान तो किया गया लेकिन इनके भुगतान से संबंधित कॉन्टीजैन्ट रजिस्टर में कोई प्रविष्टी नहीं है तथा बिलों में रजिस्टर का पेज नंबर, पेड एवं केंसिल आदि का भी विवरण नहीं है। यह घपलेबाजी लंबे समय से चल रही है।
अनुदान की प्रक्रिया का नहीं हुआ पालन
रतलाम जिले में भी इसी तरह से उप संचालक द्वारा जमकर भ्रष्टाचार किया गया। फसल प्रदर्शन मेंं बीज, उर्वरक, कीट-नाशक औषधियों के प्रदाय एवं वितरण में वित्तीय अनियमितताएं पाई गई है। जिले में उप संचालक ने वर्ष 2011 से 2015 तक शासन के निर्देशों का न केवल उल्लंघन किया बल्कि त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत लक्ष्य से अधिक खर्च किए गए। स्प्रिंकलर, पाइप लाइन, पंंप सेट आदि में किसानों को अनुदान देते समय उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उप संचालक ने अपने अधीनस्थ कृषि विकास अधिकारियों को कोई लक्ष्य नहीं दिए और मौखिक निर्देशानुसार बिलों का सत्यापन करवाया। वर्ष 2011-12 में 5 लाख 71 हजार रुपए बिना प्रदाय आदेश के खर्च कर दिए। इसी वर्ष प्रदाय सामग्री को झूठा दर्शाकर हड़पने का प्रयास किया और किसानों के नाम पर लूट खसौट की गई। इतना ही नहीं बीज नियंत्रण आदेश 1983 के अंतर्गत उप संचालक कृषि ने बीज गुण नियंत्रण में नियमानुसार वैधानिक कार्रवाई न करते हुए व्यापारियों को संरक्षण प्रदान किया और अपने दायित्व की अवहेलना की। बीज ग्राम योजना में भी किसी भी स्तर पर भौतिक सत्यापन नहीं किया। विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत वितरित माइक्रो न्यूट्रियेंट में भी भारी अनियमितता पाई गई। अस्थाई अग्रिम राशि जो कि 17 लाख 3 हजार के करीब थी के समायोजन में मध्यप्रदेश कोषालय संहिता के सहायक नियम 53 (4) का पालन नहीं किया गया। ऐसा एक नहीं अनेक बार हुआ। शासकीय वाहन से जो यात्रा की गई उसमें भी अनियमितताएं पाई गईं। महालेखाकार द्वारा किए गए ऑडिट में भी 20 वर्ष पुराना सोयाबीन बीज खरीद के मामले में 6 लाख 19 हजार 9 सौ 20 रुपए की अनियमित भुगतान की बात सामने आई है इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में 13 लाख 50 हजार 500 रुपए व आईसोपाम तिलहन योजना में 44 लाख 99 हजार 140 रुपए की अनियमितताएं पाई गईं। कुछ मामलों में कृषकों की बजाए सीधे संस्थाओं को पैसा दे दिया गया। किसानों के हितों को ताक में रखकर अमानक उर्वरक और दवाएं वितरित की गईं। ये तो कुछ बानगी है। अनियमितताओं और घोटाले की सूची तो बहुत लंबी है। अकेले तीन जिलों में सैकड़ों छोटे-बड़े मामले पकड़ में आए हैं।
...तो फाइलों में दब जाता घोटाला
सब्सिडी के नाम पर प्रदेश में पिछले सात साल से हो रहा घोटाला फाइलों में दब जाता, अगर विभाग के प्रमुख सचिव राजेश राजौरा सजग नहीं रहते। उनकी जागरूकता और सजगता से ये घोटाला पकड़ा गया। अन्यथा सारी अनियमितताएं फाइलों में दफन होकर कहां गोल हो जाती पता ही नहीं चलता। राजौरा के कहने पर ही विभाग ने प्रदेश भर के सारे जिलों में कृषि से संबंधित किए गए खर्चों को फिर से खंगालना शुरू किया है। इस कारण उनकी पूर्व संचालक डॉ. डीएन शर्मा से सीधी टक्कर भी हुई थी। बताया जाता है कि राजौरा को कई दिनों से अनियमितताओं की शिकायत मिल रही थी उन्होंने जांच में देरी नहीं की और परिणाम सामने आया। अब यह जांच करना बाकी है कि सभी 51 जिलों में से कितने जिलों में ये घोटाला हुआ है। इसके लिए उन्होंने सभी जिलों के कलेक्टरों से कृषि क्षेत्र में दी जाने वाली सब्सिडी की रिपोर्ट मांगी है।
जिलों ने दबाई सब्सिडी घोटाले की जांच रिपोर्ट
भोपाल कृषि योजनाओं में दी जाने वाली सब्सिडी में घोटाले की जांच रिपोर्ट जिलों में कलेक्टरों ने दबा ली है। 30 अप्रैल तक सभी कलेक्टरों को जिले में एक विकास खंड की हितग्राहीवार जांच कर रिपोर्ट कृषि विभाग को देनी थी, लेकिन विभाग के प्रमुख सचिव डॉ.राजेश कुमार राजौरा को रिपोर्ट नहीं मिली, वहीं विभागीय स्तर पर जांच के बाद धार के तत्कालीन उप संचालक आरपी कनेरिया और रतलाम के सीके जैन को निलंबित कर दिया है। यह खुलासा ड्रिप स्प्रिंकलर योजना की जांच में सामने आया था। इसके बाद प्रमुख सचिव कृषि ने सभी कलेक्टरों से वर्ष 2014-15 में जांच करके प्रतिवेदन 30 अप्रैल तक मांगे थे। जिला पंचायतों के सीईओ ने भी नहीं बताया कि हितग्रहियों के चयन में पंचायतीराज संस्थाओं के अधिकारों का हनन हुआ या नहीं। डॉ.राजौरा ने बताया कि धार, रतलाम में विभागीय स्तर पर कराई जांच में गड़बड़ी के प्रमाण मिले हैं। इसके आधार पर रतलाम के तत्कालीन उप संचालक सीके जैन और धार के आरपी कनेरिया को निलंबित कर संचालनालय में अटैच कर दिया है। इसी तरह सतना में उप संचालक रहे एसके शर्मा के खिलाफ आरोप पत्र जारी कर जवाब तलब किया जाएगा। शर्मा अभी राज्य कृषि विस्तार एवं प्रशिक्षण संस्थान में पदस्थ हैं। रीवा के तत्कालीन उप संचालक अमिताभ तिवारी को भी जांच में दोषी पाया गया है। तिवारी करीब चार माह से निलंबित चल रहे हैं।

अफसरों की मेहरबानी से कंगाल हुईं कंपनियां

vinod upadhyay
मूलधन देने के लिए पैसे नहीं ब्याज चढ़ा 4,193 करोड़
भोपाल। प्रदेश के सबसे बड़े ऋण घोटाले में औद्योगिक विकास निगम (एमपीएसआईडीसी) के अधिकारियों ने जिस तरह 714 करोड़ रुपए का वितरण किया था, उससे कई कंपनियों की वित्तीय स्थिति इस कदर बिगड़ी की आज वे ऋण का मूलधन देने की स्थिति में भी नहीं हैं। ऐसे में उन पर करीब 4 हजार 193 करोड़ 19 लाख रुपए का ब्याज चढ़ गया है। आलम यह है कि एमपीएसआईडीसी के अफसरों के साथ सांठ-गांठ करके कंपनियों ने ऋण तो ले लिया, लेकिन उसको लौटाने में देरी कर दी। इससे आज यह स्थिति बनी है कि निगम को अभी भी 27 कपंनियों से मूलधन के रूप में जहां 283 करोड़ की राशि वसूलनी है, वहीं ब्याज के रूप में ही उसे 4 हजार 193 करोड़ 19 लाख रुपए इन कंपनियों से लेना है। लेकिन कंपनियों के पास मूलधन लौटाने के लिए पैसा नहीं है। ऐसे में वे ब्याज की इतनी बड़ी रकम कैसे लौटाएंगी। उधर, अब इस मामले में राज्य आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो (ईओडब्ल्यू)और लोकायुक्त के साथ सरकार ने भी इस घोटाले के मुख्य आरोपी अपर मुख्य सचिव सुधि रंजन मोहंती के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी शुरू कर दी है।
उल्लेखनीय है कि लगभग डेढ़ दशक पहले एमपीएसआईडीसी के तत्कालीन प्रबंध संचालक एसआर मोहंती और अन्य अफसरों ने बिना किसी नियम का पालन करते हुए देशभर की लगभग 177 कंपनियों को 714 करोड़ का ऋण बांट दिया था। इस मामले में 30.11.1998 को तत्कालीन प्रबंधक संचालक एमपी राजन ने संचालक मंडल की बैठक में यह प्रस्ताव भी पारित कराया था कि एमपीएसआईडीसी किसी भी संस्थान से 175 करोड़ के स्थान पर 500 करोड़ तक की सहायता राशि प्राप्त करें। शासन द्वारा इस प्रस्ताव के संबंध में आपत्ति भी की गई। लेकिन इन अधिकारियों ने जानबूझकर प्रस्ताव के संबंध में शासन को गुमराह करते हुए किसी तरह का अनुमोदन नहीं लिया और न ही कार्पोरेट डिपाजिट दिए जाने के लिए कोई नियम ही बनाए। इस तरह अल्प अवधि के लिए दिए जाने वाले डिपाजिट (एक वर्ष से कम अवधि के लिए) को प्रबंध संचालक द्वारा तीन वर्ष एवं पांच वर्ष तक की अवधि में तब्दील कर एमपीएसआईडीसी के तात्कालीन प्रबंध संचालक एमपी राजन एवं एसआर मोहंती ने अनाधिकृत रूप से डिपाजिट प्राप्त किया एवं उसे आईसीडी के रूप में वितरित कर दिया। जबकि प्रस्ताव में यह पारित कराया गया था कि एमपीएसआईडीसी के सरप्लस फंड का उपयोग किया जाएगा। प्रबंध संचालकों ने कार्पोरेट डिपाजिट के रूप में वितरित की जाने वाली राशि बिना सिक्योरिटी जमा कराए ही वितरित कर दी। जिसमें इस तथ्य को भी नजर अंदाज किया गया कि उपरोक्त राशि वापस होने की संभावना है या नहीं। घोटाला उजागर होने पर सरकार ने एमपीएसआईडीसी द्वारा जिन 42 कंपनियों को आईसीडी की राशि वितरित की गई उसका मूल रिकॉर्ड जब्त किया गया एवं 23 अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ कर कथन भी लिए गए थे। मामले में तात्कालीक चेयरमैन और दोनों पूर्व प्रबंध संचालकों के अलावा जिन कंपनियों को ऋण वितरित किया गया उनमें से 17 कंपनियों के संचालकों से पूछताछ की जा चुकी है। तत्कालीन मुख्यमंत्री उमाभारती ने लगभग सवा सात अरब रुपए से अधिक के घोटाले पर कार्रवाई करने के निर्देश देते हुए आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो में प्रकरण दर्ज कराया। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने प्रकरण क्रमांक 25/04 अंडरसेक्शन 409, 420, 467, 468, 120 बी, 13 (आई) (डी) आरडब्ल्यू 13 (आईआई) पीसी-एसीटी का समावेश कर मोहंती के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की। नियम विरूद्व कर्ज बांटने पर मोहंती के खिलाफ जांच 2004 में शुरू की गई थी।
ब्याज की राशि मूलधन से 15 गुना अधिक हुई
एमपीएसआईडीसी के अधिकारियों ने जिन कंपनियों को 714 करोड़ का ऋण बांटा था उनमें से कई कंपनियों ने निगम को पैसा लौटा भी दिया है, फिर भी कई बड़ी कंपनियां करोड़ों की बकायादार बनी हुई हैं। ब्याज की राशि मूलधन से 15 गुना अधिक होने की वजह से यह कंपनियां निगम को पैसा लौटाने से कतरा रही हैं, जबकि निगम ने जिन संस्थाओं से पैसा लेकर इन कंपनियों को बांटा था, उन्हें समझौता योजना में भुगतान करना पड़ा। यानी निगम को अभी भी इन कंपनियों से 4 हजार करोड़ रुपए वसूलना है। इस मामले में वसूली के लिए कुछ कंपनियों को आरआरसी भी जारी की गई, मगर कंपनियों ने सरकार को पैसा लौटाना उचित नहीं समझा। खासकर इस घोटाले में कई अफसर और तत्कालीन निगम के दो अध्यक्षों के विरुद्ध ईओडब्ल्यू द्वारा प्रकरण दर्ज किए गए थे और न्यायालय में लंबित हैं। कुछ कंपनियों ने पैसा वापस भी किया, लेकिन इसके लिए सरकार को काफी पापड़ बेलना पडेÞ। 25 कंपनियों को आरआरसी जारी की गई है। बकायादार कंपनियों में मेसर्स अर्चना एयरवेज से एक करोड़, मेसर्स पशुमई इरीगेशन से मूलधन 50 लाख के एवज में ब्याज सहित 47.74 करोड़, एसबीआई लिमिटेड पर मूलधन एक करोड़ की जगह ब्याज ही 36.48 करोड़, मेसर्स गरहा युटिल ब्रोस लिमि. से मूलधन 16 लाख के बदले 23 लाख, गरहा समूह से 18 लाख की जगह ब्याज सहित 27 लाख, माया स्पिनर्स लिमि. से 2 करोड़ के बदले ब्याज सहित 35.17 करोड़, मेसर्स एईसी इंडिया लि. से 1.50 करोड़ की एवज में ब्याज सहित 28.16 करोड़ तथा मेसर्स एईसी इन्टरप्राईजेस लि. से 10.10 करोड़ के बदले ब्याज सहित 200.93 करोड़ की राशि वसूलनी है। इनके प्रकरण समापन में आयशर समूह की कंपनियों में आयशर एग्रो से 2 करोड़ के एवज में ब्याज सहित 51.12 करोड़, आयशर फायनेंस प्रायवेट से 2.50 करोड़ मूलधन के बदले 50.70 करोड़ तथा आयशर अलाय स्टील से 10.50 करोड़ मूलधन के स्थान पर 257.29 करोड़ की राशि वसूलनी है। इस समूह के समापन के लिए शासकीय परिसामपक नियुक्त किया गया है।
जांच में मोहंती पाए गए दोषी
औद्योगिक विकास निगम में 719 करोड़ रूपए के घोटाले के आरोपी अपर मुख्य सचिव सुधि रंजन मोहंती की घेराबंदी शुरू हो गई है। आरोप है कि इस घोटाले में औद्योगिक विकास निगम के तत्कालीन प्रबंध संचालक एसआर मोहंती ने बिना किसी नियम का पालन करते हुए जिस तरह कंपनियों को ऋण वितरीत किया है। अब इस घोटाले की फाइल एक बार फिर से खुल गई है। ईओडब्ल्यू ने घोटाले में राज्य सरकार से स्कूल शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव एसआर मोहंती के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश करने के लिए अभियोजन स्वीकृति मांगी है। ईओडब्ल्यू ने कहा कि राज्य उद्योग विकास निगम में हुए करोड़ों के गोलमाल मामले का सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नए सिरे से परीक्षण किया गया है, इस पूरे मामले में मोहंती पूरी तरह शामिल पाए गए हैं। ऐसे में इनके खिलाफ कोर्ट में चालान पेश करने के लिए अभियोजन स्वीकृति दी जाए। सामान्य प्रशासन कार्मिक विभाग ने पूरा प्रकरण तैयार कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भेज दिया है। उनके अनुमोदन के बाद उक्त प्रकरण को केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय को भेजा जाएगा। केंद्र की अनुमति मिलने के बाद ईओडब्ल्यू मोहंती के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश कर अभियोजन दायर कर सकेगी। उधर, खबर यह है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इससे संबंधित फाइल तलब की है।
जांच को प्रभावित करने की कोशिश
मामले की जांच चल रही थी, तभी तत्कालीन मुख्य सचिव विजय सिंह ने वर्ष 2005 में केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय को एक पत्र लिखा था। पत्र में यह कहा गया था कि आईएएस अफसर एसआर मोहंती की इस मामले में कोई भूमिका नहीं है। वे निर्दोष हैं। पत्र मोहंती की होने वाली पदोन्नति के मद्देनजर लिखा गया था। मोहंती ने उक्त पत्र को जबलपुर हाईकोर्ट में पेश कर अपने को निर्दोष बताया था। इस मामले में मुख्य सचिव विजय सिंह के दबाब में सामान्य प्रशासन विभाग ने भी उपसचिव सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से उच्च न्यायालय में 18 जनवरी 2006 को हलफनामा प्रस्तुत किया। इस मामले में एसआर मोहंती ने हलफनामा प्रस्तुत करने के दिन 18 जनवरी 2006 को ही उच्च न्यायालय में आवेदन लगाकर जल्दी सुनवाई करने का निवेदन किया। राज्य सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा मोहंती के पक्ष में हलफनामा प्रस्तुत करने से उच्च न्यायालय ने भी मोहंती के पक्ष में निर्णय दिया। न्यायालय द्वारा अरबों रुपए के घपले में फंसे सुधी रंजन मोहंती को क्लीन चिट देने की जानकारी जब समाचार पत्रों द्वारा प्रमुखता से प्रकाशित हुई तब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपना स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उन्हें अंधेरे में रखते हुए शपथपत्र तैयार कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। बताया जाता है कि इस अरबों रुपए के घोटाले में प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव विजय सिंह ने बिना मुख्यमंत्री को विश्वास में लिए ही उच्च न्यायालय में शपथपत्र प्रस्तुत कराया था। इससे खिन्न होकर मुख्यमंत्री ने तत्कालीन मुख्य सचिव को बुलाकर अप्रसंन्नता व्यक्त करते हुए नाराजगी जाहिर की और मुख्य सचिव बदल दिया। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, इसके चलते हो रही देरी को ध्यान में रखते हुए शासन ने आदेश देकर मोहंती के विरुद्ध पुन: कार्रवाई आरंभ करने कि निर्देश दिए हैं। मामले की जांच कर रही ईओडब्ल्यू ने उस समय माना था कि हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी (ईओडब्ल्यू) को पक्ष सुने बिना फैसला सुना दिया है। उसके विरोध में ईओडब्ल्यू ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी। मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना आईएएस अफसर एसआर मोहंती का नाम एफआईआर से हटाया जाना गलत है। यह भी उचित नहीं है कि 84 आरोपियों में से एक के खिलाफ जांच नहीं की जाए। सुप्रीम कोर्ट ने नए सिरे से जांच करने और सबूत जुटाने के निर्देश ईओडब्ल्यू को दिए थे। ईओडब्ल्यू इस मामले में पूर्व मंत्री व निगम के अध्यक्ष सहित सभी आईएएस अधिकारियों (मोहंती को छोड़ कर) के खिलाफ अदालत में चालान पेश कर चुका है। मोहंती के खिलाफ चालान जबलपुर हाईकोर्ट के कारण पेश नहीं किया गया था। अब तक 14 कंपनियों को दोषी माना गया है और उनके खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है। उल्लेखनीय है कि मोहंती के खिलाफ केंद्र सरकार ने 28 जून 2011 को अभियोजन स्वीकृति जारी की थी, लेकिन मोहंती ने इस मामले में ईओडब्ल्यू की कार्रवाई को गलत ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने ईओडब्ल्यू को नए सिरे से जांच करने के निर्देश दिए। हाल ही में ईओडब्ल्यू ने दोबारा मामले की जांच कर पाया है कि इस पूरे घपले में मोहंती दोषी हैं इसलिए एक बार फिर अभियोजन स्वीकृति जारी करने की मांग की है। ईओडब्ल्यू द्वारा अभियोजन स्वीकृति मांगे जाने की भनक लगते ही मोहंती ने मुख्यमंत्री को रिप्रजेंटेशन देकर अपनी बात कही। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जिन 13 बिंदुओं पर जांच करने के निर्देश दिए थे, ईओडब्ल्यू ने उनमें से केवल एक बिंदू पर जांच कर अपनी रिपोर्ट सरकार को दी है, जो कि सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है। मोहंती का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने ईओडब्ल्यू को मेरा पक्ष लेने के भी निर्देश दिए थे, जो नहीं लिया गया। मुझे फंसाने की साजिश हो रही है। मोहंती का पक्ष सुनने के बाद मुख्यमंत्री ने पूरे मामले को विधि विभाग को परीक्षण के लिए भेज दिया है। विधि विभाग से अभिमत आने के बाद ही कार्रवाई होगी।
महाधिवक्ता ने सीबीआई जांच की मांग की थी
कर्ज वितरण का यह मामला कितना गंभीर यह यह इसी बात से समझा जा सकता है कि प्रदेश के तत्कालीन महाधिवक्ता ने स्पष्ट लिखा है कि यह मामला इतना गंभीर है कि राज्य सरकार को तत्काल सीबीआई जांच के आदेश देने चाहिए क्योंकि बड़े पदों पर बैठे लोगों ने एक सुनियोजित आपराधिक षड्यंत्र के तहत जनता की गाढ़ी कमाई का अरबों रुपया लुटा दिया। निगम सूत्रों के मुताबिक सीआईआई से जुड़े उद्योगपति खासतौर से इस लूट में भागीदार रहे हैं। इनके मुताबिक, इस पूरे घोटाले का सूत्रधार और निगम के तत्कालीन महाप्रबंधक एमपी राजन स्वयं करीब चार साल तक सीआईआई मध्य प्रदेश के अध्यक्ष रहे। उस दौरान उन्होंने सीआईआई से जुड़े उद्योगपतियों को सभी नियमों को ताक पर रखकर पैसे दिए दिए गए। सीआईआई मध्य प्रदेश से जुड़े लोग ही निगम का करोड़ों रुपया दबाए बैठे हैं। राजन नौकरी छोड़ चुके हैं और पेंशन ले रहे हैं। सीआईआई के सदस्य- एनबी ग्रुप, स्टील ट्यूबस ऑफ इंडिया, अल्पाइन ग्रुप, एसार ग्रुप , सोम ग्रुप , जमना ऑटो, सिद्धार्थ ट्यूब , गिल्ट पैक लि. आदि उद्योगों को राजन ने सबसे ज्यादा फायदा पहुंचाया था। इस घोटाले की ओर मीडिया का ध्यान न जाए इसके लिए सीआईआई ने मध्य प्रदेश के कुछ पत्रकारों को लंदन का दौरा भी करवाया था। इनका खर्चा सीआईआई के एक सदस्य ने ही उठाया था। उस सदस्य को अभी निगम को करीब 33 करोड़ रुपए लौटाने हैं लेकिन वह नहीं दे रहा है। निगम का रिकॉर्ड इस बात का गवाह है कि किस तरह मनमाने ढंग से पैसा बांटा गया। कई तो ऐसे मामले है जिनमें पुराना पैसा वापस न मिलने पर भी आगे इंटर कॉरपोरेट डिपॉजिट दिया जाता रहा। यह काम एसआर मोहंती के प्रबंध संचालक बनने तक जारी रहा। सूत्रों के मुताबिक 14 मई 1998 को संचालक मंडल द्वारा प्रबंध संचालक को ऋण लेने और उसे आगे उधार देने का फैसला ही पूरी तरह नियमों के खिलाफ था। उन्हें ऐसा करने का अधिकार ही नहीं था लेकिन उद्योगपतियों को सरकारी संरक्षण के कारण ऐसा हुआ। सरकार जानबूझ कर आंख बंद किए रही। आज निगम की हालत खस्ता है। वह करीब 600 करोड़ के घाटे में है। जिन लोगों से पैसा उधार लिया गया था, वे अब निगम पर मुकदमे कर रहे हैं। देश की विभिन्न संस्थाओं के कर्मचारियों के प्रॉविडेंट फंड, ऑर्गनाइजेशन , पेंशन फंड , छोटे निवेशकों और बैंक आदि से बॉन्ड के तहत निगम ने करीब 81 करोड़ रुपए लिए थे। इनको वापस चुकाने की मियाद पूरी हो चुकी है। फलस्वरूप कई मुकदमे दर्ज कराए जा चुके हैं।
दोराहे पर प्रदेश सरकार
वर्तमान सरकार दोराहे पर खड़ी है। एक ओर उसे करीब 719 करोड़ उद्योगपतियों से वसूलने हैं तो दूसरी ओर वह चाहती है कि प्रदेश का औद्योगीकरण हो। अरबों रुपए दबाए बैठे उद्योगपति वसूली के लिए हो रही सख्ती को अपना उत्पीडऩ मानकर विरोध कर रहे हैं। चारों ओर से इन डिफॉल्टरों को बचाने की कोशिशें हो रही हैं। इसके चलते वसूली मुहिम चलाने वाले अफसर परेशान हैं। यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि जो लोग बड़े डिफॉल्टर हैं, वे पूर्व सरकार के काफी करीब रहे हैं। एक सज्जन तो केंद्र में सत्तारूढ़ दल के राज्यसभा सदस्य भी रहे हैं। सबसे ज्यादा पैसा करीब 117 करोड़ उन्हें ही वापस करना है। वही वसूली की इस मुहिम का विरोध कर रहे हैं।
दो धड़े में बंटे मप्र के आईएएस
बताते हैं कि मोहंती के भ्रष्टाचार की फाइल खुलते ही प्रदेश के आईएएस अफसर दो धड़ों में बंट गए हैं। एक धड़ा अभी भी एसीएस मोहंती को बचाने में लगा है तो जाहिर है कि दूसरा निपटाने में। एक धड़े के अफसरों का कहना है कि सुधि रंजन मोहंती आईसीडी लोन प्रकरण में अकेले दोषी कैसे हो सकते हैं। मोहंती आज भी और पहले भी उसी सरकार का हिस्सा रहे हैं जिसे शीर्ष पर बैठे राजनेता चलाते आए हैं। कोई भी अफसर अपने बॉस की नाफरमानी नहीं कर सकता। जाहिर है कि मोहंती अगर दोषी ठहराए जा रहे हैं तब इसके पीछे बड़ी राजनीति का हाथ है। राजनीति एक काबिल अफसर का भविष्य चौपट करने पर आमादा नजर आती है। वहीं दूसरे धड़े के अफसर गड़े मुर्दे उखाडऩे में लगे हुए हैं। अफसरों की नुराकुश्ती में यह बात निकलकर सामने आई है कि भ्रष्टाचार के प्रकरणों पर खासकर किसी आईएएस के खिलाफ लोकायुक्त या ईओडब्ल्यू को चालान पेश करने की अनुमति देने के बारे में कांग्रेस और भाजपा सरकार का ट्रेक रिकार्ड एक जैसा है। दोनों पार्टियों की सरकार अपने-अपने शासनकाल के दौरान बड़े अफसर के विरुद्ध बड़ी मुश्किल से मुकदमा चलाने के लिए इन संगठनों को हरी झंडी देती है। और फिर जब एसआर मोहंती जैसा अधिकारी हो तो यह निर्णय लेना सरकार के मुखिया के लिए भी सचमुच मुश्किल होगा। वर्ष 2005 में जब तत्कालीन मुख्य सचिव विजय सिंह और सामान्य प्रशासन की प्रमुख सचिव आभा अस्थाना ने मोहंती व अन्य के पक्ष में हाईकोर्ट को एफिडेविट देकर क्लीन चिट दिलवाई थी तब भी यह मामला उछला था। फिर कुछ दिनों के बाद मुख्यमंत्री पद पर पहली दफा काबिज होते ही शिवराज सिंह ने सीएस विजय सिंह को हटा दिया था और आभा अस्थाना तथा एक जीएडी अफसर को निलंबित कर दिया था। लेकिन बाद में मोहंती के सुप्रीम कोर्ट जाने से यह मसला लटक गया था और इस तरह तब वे ईओडब्ल्यू की चपेट में आने से बच गए थे। अब इतने अंतराल के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर नए सिरे से परीक्षण के उपरांत ईओडब्ल्यू ने इस प्रकरण में आगे बढ़ते हुए सरकार से चालान पेश करने की अनुमति मांगी है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 की शुरूआत में ही लोकायुक्त जस्टिस पीपी नावलेकर ने भी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर मोहंती सहित 135 अफसरों-कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति मांगी थी। 8 जनवरी को मुख्यमंत्री को लिखे खत में नावलेकर ने लिखा था कि कई शासकीय सेवक ऐसे हैं जिनके खिलाफ लोकायुक्त द्वारा चालान पेश किए दो साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन संबंधित को निलंबित किया है अथवा नहीं, इसकी जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। चि_ी में लिखा है 'भ्रष्टÓ शासकीय सेवकों के विरुद्ध त्वरित एवं प्रभावी कार्यवाही की शासन की मंशा के प्रति समाज में जहां प्रतिकूल छवि निर्मित होती है वहीं भ्रष्ट सेवकों के यथावत पद पर बने रहने से साक्ष्य/साक्षियों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
दिग्विजय के साथ उमा-गौर भी रहे हैं मोहंती के रक्षक
कांग्रेस शासन काल में हुए इस घोटाले के आरापी मोहंती को पहले पांच साल दिग्विजय सिंह का संरक्षण मिलता रहा, उसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और बाबूलाल गौर भी उनके रक्षक रहे। हालांकि मोहंती के खिलाफ 2004 में उमा भारती के निर्देश पर ही ईओडब्ल्यू में मामला दर्ज हुआ था। उसके बाद बाबूलाल गौर ने भी मोहंती को बचाने की भरपूर कोशिश की। उल्लेखनीय है कि जब आईसीडी घोटाले के आरोपी सुधि रंजन मोहंती को क्लीन चिट देने के मामले में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तत्कालीन मुख्य सचिव विजय सिंह को हटा दिया था। इसके अलावा प्रमुख पद पर बैठे मोहंती को भी हटा दिया गया था। इस दौरान फरवरी 2006 में जब कांग्रेस विधायक आरिफ अकील ने तत्कालीन वाणिज्य कर मंत्री बाबूलाल गौर से एक लिखित सवाल में पूछा था कि क्या आईसीडी घोटाले में अनुसंधान ब्यूरो ने कोई मुकदमा दर्ज किया है? अगर मुकदमा दर्ज हुआ तो किन अफसरों और उद्योगपतियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया? तब गौर ने यह बताकर पल्ला झाडऩे की कोशिश की कि इस मामले में जानकारी एकत्र की जा रही है जबकि मामले के पूरे तथ्य स्वयं औद्योगिक विकास निगम 2004 में ही सार्वजनिक कर चुका है। 18 जनवरी को जबलपुर हाई कोर्ट द्वारा मोहंती के खिलाफ दर्ज याचिका खारिज किए जाने के बाद यह मामला उछला था। उसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग की प्रमुख सचिव आभा अस्थाना, उप सचिव सुभाष डाफणे, मुख्य सचिव विजय सिंह पद से हटाए गए थे और मोहंती का विभाग बदला गया था। गौर ने ही मुख्यमंत्री बनने पर आरोपी अधिकारी मोहंती को प्रमुख विभाग में नियुक्त कर उनके खिलाफ मामला वापस लिए जाने की स्वीकृति दी थी। गौर ने मुख्य सचिव को हटाने का भी विरोध किया था।
भ्रष्ट अफसरों पर अड़ीबाजी करती हैं जांच एजेंसियां!
ईओडब्ल्य ने सरकार से जैसे ही चालान पेश करने की अनुमति मांगी है वैसे ही प्रदेश की जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर आईएएस सहित अन्य अफसर सवाल उठाने लगे हैं। अफसरों का कहना है कि ईओडब्ल्यू, लोकायुक्त, आयकर विभाग, क्राइम ब्रांच, एसटीएफ और ऐसी ही तमाम ऐजेंसियों को समाज में ईमानदार और शक्तिशाली जांच ऐजेन्सियों की मान्यता प्राप्त है परंतु लगतार कुछ इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं, जिससे संदेह होता है कि इन जांच ऐजेन्सियों के अधिकारी भ्रष्ट अफसरों पर अड़ीबाजी करते हैं और जो अफसर इनकी मुराद पूरी नहीं करता, केवल उसी के खिलाफ कार्रवाई करते हैं। अपना पक्ष रखते हुए मोहंती ने कहा है कि ' सुप्रीम कोर्ट ने जिन 13 बिंदुओं पर जांच करने के निर्देश दिए थे, ईओडब्ल्यू ने उनमें से केवल एक बिंदू पर जांच कर अपनी रिपोर्ट सरकार को दी है, जो कि सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है। मोहंती ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने ईओडब्ल्यू को मेरा पक्ष लेने के भी निर्देश दिए थे, जो नहीं लिया गया। मुझे फंसाने की साजिश हो रही है।Ó इसके अलावा मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार के ब्रांच एम्बेसडर योगीराज शर्मा के मामले में भी ईओडब्ल्यू सस्पेक्टेड है। यदि आप भोपाल पुलिस के एक सिपाही को भी योगीराज शर्मा की काली कमाई पता लगाने का जिम्मा सौंपे तो वो 7 दिन में जांच पूरी कर लेगा परंतु ईओडब्ल्यू लगतार योगीराज शर्मा के खिलाफ जांच को टालती जा रही है। कभी-कभी एक हुड़की भरा प्रेस बयान जारी होता है और फिर मामला शांत हो जाता है। धीमी जांच यह संदेह पैदा करती है कि योगीराज शर्मा के साथ ईओडब्ल्यू के अफसरों की सेटिंग हो गई है। जब तक किश्तें आ रहीं हैं ईओडब्लयू की जांच ठंडी ही रहेगी। संभव है यह नस्तीबद्ध भी हो जाए। अभी तक समाज में ईओडब्ल्यू की बड़ी ईमानदार छवि है। आर्थिक अपराधों के मामले में ईओडब्ल्यू को आम आदमी सीबीआई के समतुल्य मानते हैं और यदि ईओडब्ल्यू अपनी जांच में किसी अफसर या कारोबारी को भ्रष्टाचार का दोषी प्रमाणित करता है तो लोग बिना न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा किए, संबंधित को दोषी मान लेते हैं परंतु अब कुछ ऐसे मामले सामने आने लगे हैं जो ईओडब्ल्यू की छवि को धूमिल कर रहे हैं।
कंपनियों को वितरित ऋण की सूची 1. एस. कुमार पॉवर कार्पोरेशन 4475.00 लाख, 2. मोडक रबर एंड टेक्सरीज 325.00 लाख, 3.प्रोग्रेसिव इक्सटेंशन एंड एक्सपोर्ट 675.00 लाख, 4. सूर्या एग्रो लिमि. 1475 लाख, 5. एलपिन इंडस्ट्रीज लिमि. 2845 लाख, 6. स्नोकम इंडिया लिमि. 2800 लाख, 7. किलिक निक्सोन लिमि. 1500 लाख, 8. स्टील ट्यूब ऑफ इंडिया लिमि. 1700 लाख, 9. एसटीआई प्रोड्क्स 800 लाख, 10. सोम डिस्टलरीज लिमि. 1475 लाख, 11. सोम डिस्टलरीज एंड बेवरीज 700 लाख, 12. सोम पॉवर लिमि. 200 लाख, 13. सिद्धार्थ ट्यूब्स लिमि.1450 लाख, 14. भानू आयरन एंड स्टील कम्पनी 1000 लाख, 15. रिस्टसपिन साइट्रिक्स लिमि. 1100 लाख, 16 आईसर आलोयस एंड स्टील 1050 लाख, 17. आइसर एग्रो लिमि. 200 लाख, 18. हेरीटेज इंवेस्टमेंट 70 लाख, 19. आइसर फाइनेंस प्राइवेट लिमि. 250 लाख, 20. एईसी इंटरप्राइज लिमि. 1010 लाख, 21. एईसी इंडिया लिमि. 150 लाख, 22. राजेंद्र स्टील लिमि. 855 लाख, 23. भास्कर इंडस्ट्रीज लिमि. 669.50 लाख, 24. अर्चना एयरवेज लिमि. 300 लाख, 25. माया स्पिनरर्स 200 लाख, 26. गजरा बेवल गेयर्स 100 लाख, 27. बीएसआई लिमि. 100 लाख, 28. पसुमाई ऐरीगेशन 50 लाख, 29. जीके एक्जिम 2400 लाख, 30. गिल्ट पैक लिमि. 150 लाख। कुल- 30074.50 लाख।
जांच में दोषी पाई गईं कंपनियां 1. एनबी इंडस्ट्रीज लिमि. 3000 लाख, 2. सूर्या एग्रो आइल्स लिमि. 1500 लाख, 3. फ्लोर एंड फूड्स लिमि. 40 लाख, 4. स्टील ट्यूब्स ऑफ इंडिया लिमि. 878.11 लाख, 5. एसटीआई प्रोड्क्स लिमि. 155 लाख, 6. एसटीएल एक्सपोर्ट लिमि. 165.86 लाख, 7. भानू आयरन एंड स्टील कम्पनी 440 लाख, 8. जमुना ऑटो इंडस्ट्रीज 400 लाख, 9. वेस्टर्न टोबेको 350 लाख, 10. सरिता साफ्टवेयर इंडस्ट्रीज 300 लाख, 11. केएन रिसोर्सेज 27.01 लाख, 12. इटारसी ऑयल एंड फ्लोर्स लिमि. 126.13 लाख, 13. गजरा बेवल गेयर्स 50 लाख, 14. गरहा यूटीब्रोक्सेस लिमि. 134.55 लाख, 15. बैतूल आयल एंड फ्लोर्स 80 लाख, 16. पोद्दार इंटरनेशनल 72.60 लाख, 17. महामाया स्टील 100 लाख। कुल-7819.26 लाख।
इधर, हाईकोर्ट ने दिया मोहंती को नोटिस स्कूल शिक्षा विभाग में एरिया एज्यूकेशन अधिकारी की भर्ती मामले में हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं करने पर शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव एसआर मोहंती को कोर्ट ने शोकाज नोटिस जारी किया है। साथ ही कहा है कि 6 हफ्ते के भीतर आदेश का पालन कर ओर कोर्ट को सूचित को सूचित किया जाए। कोर्ट के आदेश का पालन नहीं करने पर याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में अर्जी लगाई गई थी। जबलपुर हाईकोर्ट की डबल बैंच ने 8 सितंबर 2014 को आदेश दिया था कि शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2010-11 में व्यापमं के माध्यम से एरिया एज्यूकेशन अधिकारियों की भर्ती की गईं, जिन्होंने परीक्षा उत्तीर्ण की उन्हें नियुक्ति दी जाए। इस मामले में सरकार की ओर से रखी गईं सभी दलीलें कोर्ट में खारिज हो चुकी है। 9 महीने में आदेश का पालन नहीं होने पर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई है, इस संबंध में शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव एसआर मोहंती को शोकाज नोटिस भेजा है। ज्ञात हो कि शिक्षा विभाग ने स्कूलों के कामकाज की निगरानी के लिए एरिया एज्यूकेशन अधिकारी के पद पर भर्ती की गई थी। जिसमें अध्यापक वर्ग से सिलेक्ट हुए। जिस पर पुराने शिक्षकों ने आपत्ति जताई और वे कोर्ट गए। इसके बाद सरकार ने परीक्षा पास करने वालों की नियुक्ति पर रोक लगाई। कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों के सुनने के बाद परीक्षा पास करने वालों को नियुक्ति करने का फैसला सुनाया था, जिस पर सरकार ने अमल नहीं किया। -------------------------