गुरुवार, 26 सितंबर 2013

230 में से 45 विधायक निकले काम के

विधानसभा सत्र के दौरान विधायको की परफार्मेंस रिपोर्ट में हुआ खुलासा महिला नेत्रियों का रिपोर्ट कार्ड सबसे पुअर भोपाल। मध्यप्रदेश में अघोषित तौर पर चुनावी बिगुल बज गया है। सभी पार्टियां चुनावी जीत की रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं। उधर वर्तमान विधायक फिर से चुनाव लडऩे के लिए दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में पाक्षिक मालव समाचार ने एक रिपोर्ट तैयार कर इस बात की पड़ताल की है कि अब तक के करीब पांच वर्ष में हमारे मंत्री, विधायक जनता की उम्मीदों पर कितने खरे उतर पाए हैं? इस सर्वे रिपोर्ट में यह बात सामने आई की 230 विधायकों में से मात्र 45 विधायक ही ऐसे रहे जिन्होंने विधानसभा की कार्रवाही में अच्छा परफार्मेंस किया। सदन की पूरी कार्यवाही इन्हीं के इर्दगिर्द घुमती रही। सबसे हैरानी की बात यह रही की इस दौरान महिला विधायकों की रिपोर्ट सबसे खराब रही। रिपोर्ट में विभिन्न सत्रों के दौरान विधायकों के विधायी कामकाज का आकलन कर उन्हें तय सूचकांक के आधार पर अंक दिए गए। यहां हम सामान्य, 60 से 79 एवं 80 से अधिक नम्बर लाने वाले विधायकों का रिपोर्ट कार्ड बता रहे हैं, देखिए आपके विधायक इस श्रेणी में कहां खड़े हैं। इसके अलावा शेष विधायकों का परफार्मेंस कैसा रहा यह भी जान सकेंगे। सबसे पहले बात करते हैं विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी की। इन्होंने ने सभी के साथ समन्वय बनाकर सदन को सुचारू ढंग से चलाया। हालांकि कई बार इनपर भाजपा का पक्ष लेने का आरोप लगा,लेकिन इसे महत्व नहीं दिया गया।
विधायक जिनकों मिले 80 से अधिक नम्बर सत्ता पक्ष- शिवराज सिंह चौहान, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान, नरोत्तम मिश्रा,कैलाश विजयवर्गीय, गोपाल भार्गव,राजेन्द्र शुक्ला,महेन्द्र हार्डिया,लक्ष्मीकांत शर्मा,उमाशंकर गुप्ता,अरविंद भदौरिया ,शंकरलाल तिवारी, विश्वास सारंग,ध्रुवनारायण सिंह। विपक्ष- अजय सिंह,आरिफ अकील,महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा, रामनिवास रावत,चौधरी राकेश सिंह (अब भाजपा), लहार गोविंद सिंह, संजय पाठक, स्व.हरिवंश सिंह कांग्रेस,पुरुषोतम दांगी कांग्रेस,हेमराज कल्पानी कांग्रेस,पारस सखलेचा निर्दलीय, विधायक जिनको मिले 60-79 नम्बर प्रद्युमन सिंह तोमर कांग्रेस,केपी सिंह कांग्रेस, देशराज सिंह भाजपा,गोविंद सिंह राजपूत कांग्रेस,प्रदीप लारिया भाजपा,नारायण प्रजापती कांग्रेस,सुरेन्द्र गहरवार भाजपा,रामलखन पटेल बसपा, गिरीश गौतम भाजपा,बिसाहू लाल सिंह कांग्रेस,निशीत पटेल कांग्रेस,प्रताप ग्रेवाल कांग्रेस,प्राचीलाल मेड़ा कांग्रेस, लखन घंघोरिया कांग्रेस,प्रदीप जायसवाल कांग्रेस,एनपी प्रजापति कांग्रेस,दीपक सक्सेना कांग्रेस,कल्पना परूलेकर। सामान्य प्रदर्शन बृजराज सिंह चौहान कांग्रेस,सुरेश चौधरी कांग्रेस, मणिराम धाकड़ बसपा, ऐदल सिंह कंसाना कांग्रेस, मुरैना परसुराम मुदगल (अब भाजपा),शिवमंगल सिंह भाजपा,कमलेश सुमन भाजपा, राकेश शुक्ला भाजपा, माखनलाल जाटव कांग्रेस, मदन कुशवाह बसपा,नारायण सिंह कुशवाह भाजपा,लाखन सिंह यादव कांग्रेस,इमरतीदेवी सुमन कांग्रेस, राधेश्याम बघेल बसपा,आशाराम जाटव भाजपा,रमेश खटीक भाजपा,प्रहलाद भारती भाजपा, माखनलाल राठौर भाजपा, देवेन्द्र जैन भाजपा, राजेंद्र सलूजा भाजपा, शिव नारायण मीणा कांग्रेस ,मूल सिंह कांग्रेस,लट्टूलाल कोरी भाजपा, राव राजकुमार सिंह भाजपा,श्रीमती विनोद पंथी भाजपा,अरुणोदय चौबे कांग्रेस, भानू राणा भाजपा, शैलेंद्र जैन भाजपा, यादवेन्द्र सिंह कांग्रेस, बृजेन्द्र सिंह राठौर कांग्रेस,मीरा यादव सपा,अजय यादव भाजपा,भँवर राज मानवेंद्र सिंह निर्दलीय,रामदयाल अहिरवार भाजपा,विक्रम सिंह नातीराजा कांग्रेस,ललिता यादव भाजपा,आशारानी सिंह भाजपा,रेखा यादव भाजपा, दशरथ सिंह लोधी भाजपा,उमा देवी खटीक भाजपा,राजेश वर्मा भाजपा, जुगल किशोर बागरी भाजपा, मोतीलाल तिवारी भाजपा,रामखिलावन पटेल भाजपा, राजकुमार उरमलिया बसपा, अभय मिश्रा भाजपा,रामगरीब कौल बसपा, लक्ष्मण तिवारी भाजपा,पन्नाबाई प्रजापति भाजपा,नगेन्द्र सिंह भाजपा,केदारनाथ शुक्ला भाजपा,विश्वामित्र पाठक भाजपा, रामलल्लू वैश्य भाजपा,देवी सिंह भाजपा, बाला बच्चन कांग्रेस,प्रेम सिंह भाजपा,नागरसिंह चौहान भाजपा,सुलोचना रावत, जेवियर मेड़ा कांग्रेस,वीर सिह भूरिया कांग्रेस,निर्मला भूरिया कांग्रेस ,उमंग सिंघार,नीना वर्मा भाजपा,राजवर्धन दत्तीगांव कांग्रेस,सत्यनारायण पटेल कांग्रेस,कांग्रेस,सुदर्शन गुप्ता भाजपा ,रमेश मेंदोला भाजपा, अश्विन जोशी कांग्रेस,मालिनी गौड़ भाजपा,जीतू जिराती भाजपा,रामचरित्र भाजपा, कुँवर सिंह भाजपा,बलिसिंह मरावी भाजपा,सुंदर सिंह परस्ते भाजपा ,जयराम मरावी भाजपा,दिलीप जायसवाल भाजपा, सुदामा सिंह भाजपा,ज्ञान सिंह भाजपा,मीना सिंह भाजपा, मोतीलाल कश्यप भाजपा,गिरीराज किशोर भाजपा, प्रतिभा सिंह भाजपा, शरद जैन भाजपा भाजपा, हरजिन्दर सिंह बब्बू भाजपा,नरेन्द्र त्रिपाठी भाजपा,नन्दिनी मरावी भाजपा,गंगाबाई उरेती कांग्रेस,ओमकार सिंह मरकाम ,नारायण पट्टा कांग्रेस,रामप्यारे कुलस्ते,भाजपा, भगत सिंह नेताम भाजपा,रमेश भटेरे भाजपा,रामकिशोर काँवरे भाजपा,विश्वेश्वर भगत कांग्रेस,कमल मस्कुले भाजपा,नीता पटेरिया भाजपा, शशि ठाकुर भाजपा,सुनील जायसवाल कांग्रेस,उदयप्रताप सिंह कांग्रेस ,साधना स्थापक कांग्रेस, तेजीलाल सरेयाम कांग्रेस,प्रेम नारायण ठाकुर भाजपा ,मेहर सिंह चौधरी कांग्रेस,ताराचंद बावरिया भाजपा,रामराव कवरेती भाजपा,चन्द्रशेखर देखमुख कांग्रेस,)चेतराम मानेकर भाजपा,अल्केश आर्य भाजपा, गीता रामजीलाल उइके भाजपा,धरमू सिंह, संजय शाह निर्दलीय,कमल पटेल भाजपा, गिरजा शंकर शर्मा भाजपा, विजय पाल सिंह भाजपा,ठाकुरदास नागवंशी भाजपा, भगवान सिंह राजपूत कांग्रेस,सुरेन्द्र पटवा भाजपा,प्रभुराम चौधरी कांग्रेस,देवेंद्र पटेल भाजपा, राघवजी भाई भाजपा, हरी सिंह रघुवंशी भाजपा,हरी सप्रे भाजपा,सूरज प्रकाश मीणा,ब्रह्मानंद रत्नाकर भाजपा,जितेन्द्र डागा भाजपा,रणजीत सिंह गुणवान भाजपा,करण सिंह वर्मा भाजपा,रमेश सक्सेना भाजपा,मोहन शर्मा भाजपा, प्रियव्रत सिंह कांग्रेस,गौतम टेटवाल भाजपा,संतोष जोशी भाजपा,लालजी राम भाजपा, हुकुम सिंह कराड़ा,जसवंत सिंह हाड़ा भाजपा, बाबूलाल वर्मा भाजपा,दीपक जोशी भाजपा,बृजमोहन धूत भाजपा,चम्पालाल देवड़ा भाजपा,लोकेन्द्र सिंह तोमर भाजपा, देवेन्द्र वर्मा,अनारसिंह बास्कले,राजेन्द्र दादू भाजपा, भाजपा,धूल सिंह भाजपा, हितेन्द्र सोलंकी ,राजकुमार मेव भाजपा,आत्माराम पटेल भाजपा,बालकृष्ण पाटीदार भाजपा,जमुना सिंह सोलंकी भाजपा, तुलसी सिलावट कांग्रेस,दिलीप गुर्जर कांग्रेस,रोड़मल राठौर भाजपा,रामलाल मालवीय कांग्रेस,शिवनारायण जागीरदार भाजपा,शांतिलाल घवई भाजपा,लक्ष्मीदेवी खराड़ी कांग्रेस,प्रभुदयाल गहलोत कांग्रेस,यशपाल सिसोदिया भाजपा, ,राधेश्याम पाटीदार भाजपा,सुभाष सोजतिया कांग्रेस,विजेन्द्र सिंह मालाखेड़ा कांग्रेस, खुमान सिंह शिवाजी भाजपा,ओमप्रकाश सखलेचा भाजपा। कौन मंत्री रहे सक्रिय, निष्क्रिय विधायकों के साथ ही अलग से राज्य सरकार के मंत्रियों का भी आकलन किया गया। कुछ मंत्रियों को छोड़कर अधिकतर मंत्री विशेष छाप नहीं छोड़ पाए। मंत्रियों को प्रश्नकाल में सबसे ज्यादा तैयारी कर के आने की जरूरत होती है लेकिन तीन-चार वरिष्ठ मंत्रियों को छोड़ दें तो अधिकतर मंत्री सवाल पूछने वालों को संतुष्ट ही नहीं कर पाए। सक्रिय-शिवराज सिंह चौहान, बाबूलाल गौर,नरोत्तम मिश्रा,कैलाश विजयवर्गीय, गोपाल भार्गव,लक्ष्मीकांत शर्मा,उमाशंकर गुप्ता,अजय विश्नोई,राजेन्द्र शुक्ला,महेन्द्र हार्डिया। निष्क्रिय- अनूप मिश्रा,जयंत मलैया,केएल अग्रवाल,हरिशंकर खटीक,रामकृष्ण कुसमारिया,बृजेन्द्र प्रताप सिंह,नागेंद्र सिंह,जगन्नाथ सिंह,गौरीशंकर बिसेन,सरताज सिंह,जगदीश देवड़ा,रंजना बघेल, करण सिंह वर्मा,तुकोजीराव पवार,विजय शाह,पारस जैन,अर्चना चिटनीस,नारायण सिंह कुशवाह,मनोहर उटवाल,देवीसिंह सैयाम,जयसिंह मरावी,नानभाऊ मोहोड़,अंतरसिंह आर्य, रामदयाल अहिरवार,दशरथ लोधी। रेटिंग का तरीका संसदीय विषयों से संबंधित शोध और विभिन्न विश्लेषणों के आधार पर विधायिका और विधायकों के परफॉर्मेन्स रेटिंग के सूचकांकों की फेहरिस्त तैयार की गई। इसके बाद अनुभवी राजनेताओं, विशेषज्ञों, कार्यपालिका के अधिकारियों और सदन की नियमित कवरेज से जुड़े पत्रकारों से व्यापक चर्चा के बाद 10 सूचकांक निश्चित किए गए। प्रत्येक सूचकांक के लिए दस अंक तय किए। इन सूचकांक के आधार पर सदन की हर बैठक के बाद विधायकों का आकलन कर सदन के सितारे तय किए गए। हर सत्र के बाद सदन में उपस्थित रहने वाले वरिष्ठ पत्रकारों ने विधायकों को सत्र के दौरान प्रदर्शन के लिए निर्घारित सूचकांक के आधार पर अंक दिए। पिछले साढ़े चार वर्षो तक विधानसभा के हर सत्र के दौरान यह प्रक्रिया अपनाई गई। इस तरह से सुव्यवस्थित प्रणाली से विधायकों की परफॉर्मेस पर नजर रखी गई। साढ़े चार वर्ष के इन्हीं आंकड़ों के आधार पर विधायकों का यह रिपोर्ट कार्ड तैयार किया गया है। सूचकांक सदन में अनुशासन का आकलन। भाषा, धैर्य, संयम और शालीनता का स्तर। सकारात्मक सोच एवं रचनात्मक योगदान से शिष्टता व व्यवहार। सदन के नियम, कार्यप्रणाली की जानकारी का स्तर एवं उनका प्रभावी उपयोग। विधायी कार्यों में भूमिका, विधायी विषयों की तैयारी एवं सदन में प्रस्तुतिकरण। बहस और सवाल-जवाब एवं शून्यकाल में सदस्य की भूमिका का स्तर। राज्य एवं विधानसभा क्षेत्र सम्बन्धी जनहित के मुद्दों पर प्रश्न, ध्यानाकर्षण, स्थगन द्वारा दखल। राज्य के लिए महत्वपूर्ण और राष्ट्रीय मुद्दों की पकड़ एवं समझ का स्तर। विषय विशेष की अच्छी पकड़ एवं समझ और सदन में उसका प्रस्तुतिकरण। अन्य प्रतिनिधियों से शिष्टता व अन्य व्यवहार का स्तर। सदन में शैली, मुद्दों पर बहस तथा ठोस तर्को एवं आंकड़ों के आधार पर बात रखने की क्षमता। ---------- दिग्गजों की सीटों पर पानी की तरह बहेगा पैसा चुनाव आयोग ने निगरानी के लिए 60 सीटों को किया चिहिंत भोपाल। आगामी विधानसभा चुनाव में दिग्गज नेताओं की कब्जे वाली वर्तमान सीटों को जीतने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाएगा। चुनाव आयोग ने ऐसी 60 सीटें छांटी हैं, जो चुनावी खर्च को लेकर संवेदनशील हैं। अंदेशा है कि इन क्षेत्रों में चुनावी व्यय की सीमा से ज्यादा खर्च हो सकता है। इन सीटों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बुधनी सहित मंत्रिपरिषद के 25 सदस्यों की सीटें शामिल हैं। इनके अलावा विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी की सीट जबलपुर केन्ट, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की चुरहट सहित कांग्रेस के कब्जे वाली 11 सीटें भी रखी गई हैं। जानकारी के मुताबिक चुनाव आयोग के निर्देश पर कलेक्टरों ने इस सूची को तैयार किया है। इसमें क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति के कद और उद्योग सहित रकम के आने के जरिए को आधार बनाया गया है। चुनावी खर्च के मद्देनजर संवेदनशील की श्रेणी में रखी 60 सीटों में से 47 भाजपा (मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल के 25 सदस्य और 22 भाजपा विधायक) के प्रतिनिधित्व वाली हैं। दुराचरण के मामले में भाजपा से बाहर हुए राघवजी की सीट विदिशा को भी चुनावी व्यय के मद्देजनर फोकस पर रखा गया है। इसी श्रेणी में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की चुरहट सहित 11 सीटें रखी गई हैं। इनमें भिण्ड से कांग्रेस विधायक चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी की सीट भी शामिल हैं। चौधरी इस वक्त भाजपा में हैं। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के अधिकारियों का कहना हैं कि इन क्षेत्रों में चुनाव के दौरान विशेष नजर रखी जाएगी। इसके लिए आयोग जो केन्द्रीय व्यय पर्यवेक्षक भेजेगा उसके अलावा निगरानी के इंतजाम किए जाएंगे। इसमें तीन-तीन फ्लाइंग स्क्वॉड के साथ हर छोटे-बड़े आयोजन की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। संवेदनशील सीट विधायक भोपाल उत्तर आरिफ अकील नरेला विश्वास सारंग भोपाल दक्षिण-पश्चिम उमाशंकर गुप्ता भोपाल मध्य ध्रुवनारायण सिंह गोविंदपुरा बाबूलाल गौर हुजूर जितेन्द्र डागा बुधनी शिवराज सिंह चौहान सीहोर रमेश सक्सेना देवास तुकोजीराव पवार हाटपिपल्या दीपक जोशी हरसूद विजय शाह बुरहानपुर अर्चना चिटनिस महेश्वर राजकुमार मेव पानसेमल बाला बच्चन मनावर रंजना बघेल धार नीना वर्मा इंदौर 2 रमेश मेंदोला इंदौर 3 अश्विन जोशी इंदौर 4 मालिनी गौड़ इंदौर 5 महेन्द्र हार्डिया महू कैलाश विजयवर्गीय महिदपुर डॉ.कल्पना परूलेकर उज्जैन उत्तर पारस जैन जावरा महेन्द्रसिंह कालूखेड़ा मंदसौर यशपाल सिसोदिया मल्हारगढ़ जगदीश देवड़ा जावद ओमप्रकाश सखलेचा भिंड चौधरी राकेश चतुर्वेदी लहार डॉ.गोविंद सिंह ग्वालियर पूर्व अनूप मिश्रा दतिया डॉ.नरोत्तम मिश्रा पिछोर केपी सिंह बीना डॉ.विनोद पंथी रेहली गोपाल भार्गव जतारा हरिशंकर खटीक बिजावर आशा रानी पथरिया डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया दमोह जयंत मलैया पवई बृजेन्द्र प्रताप सिंह सतना शंकरलाल तिवारी नागौद नागेन्द्र सिंह मनगवां पन्नाबाई प्रजापति रीवा राजेन्द्र शुक्ल चुरहट अजय सिंह चितरंगी जगन्नाथ सिंह सिंगरौली रामलल्लू वैश्य बड़वारा मोतीलाल कश्यप संवेदनशील सीट विधायक मुड़वारा गिरिराज किशोर पाटन अजय विश्नोई जबलपुर केन्ट ईश्वरदास रोहाणी बालाघाट गौरीशंकर बिसेन गोटेगांव नर्मदा प्रसाद प्रजापति छिंदवाड़ा दीपक सक्सेना हरदा कमल पटेल सिवनी मालवा सरताज सिंह सोहागपुर विजयपाल सिंह भोजपुर सुरेन्द्र पटवा सिलवानी देवेन्द्र पटेल विदिशा राघवजी सिरोंज लक्ष्मीकांत शर्मा

मप्र के जलसंसाधन विभाग में 5000 करोड़ रुपये का घोटाला

भोपाल। प्रदेश में भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी के भाजपा सरकार की किरकिरी बने भाजपा नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा पर सीबीआई का फंदा कसता जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में जलसंसाधन विभाग में 5000 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है। ऐन चुनावी वक्त पर भाजपा सरकार को ये मामले परेशानी में डाल सकते है। कांग्रेस भाजपा को घेरने के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने शिवराज सरकार पर जल संसाधन विभाग में पांच हजार करोड़ रूपये के घोटाले का आरोप लगाया है। श्री सिंह ने कहा कि चुनाव के लिए पैसा एकत्रित कर मतदाता प्रभावित करने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने सभी निर्माण विभागों को ताबड़तोड़ टेंडर जारी करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें सभी नियम-कानूनों को ताक में रख दिया गया है। प्रतिपक्ष श्री सिंह ने कहा कि अपने आप को ईमानदार कहने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान , उनके चहेते प्रमुख सचिव जल संसाधन आर.एस. जुलानिया पांच हजार करोड़ के टेंडर अपने-अपने ठेकेदारों के उपक्रत करने के अभियान में लगे हैं। जिसके एवज में करोड़ों रूपये का लेन-देन हो गया है। बगैर किसी तकनीकी सलाह और प्रक्रिया को पूरी किए बिना लगभग 3000 करोड़ की स्वीकृति आदेश भी जारी कर दिए गए हैं। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि जल संसाधन विभाग की योजनाओं का निर्माण एक अत्यंत तकनीकी विषय है। योजना प्रारंभ करने के लिए एक लंबी नेता तकनीकी प्रक्रिया से किसी भी प्रोजेक्ट से गुजरना पड़ता है। इसके अंतर्गत परियोजनाओं का विस्तृत यांत्रिकी तथा जियो टेक्नीकल सर्वेक्षण तथा अन्वेषण करना होता है। इस सर्वेक्षण के आधार पर ही जल संसाधन विभाग की बड़ी योजनाओं की उपयोगिता और उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सकता है जबकि वर्तमान में ताबड़तोड़ ठेके देने के लिए योजनाओं को मात्र जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया के नक्शों पर संभावनाओं के आधार पर बांध तथा नहरों की लाइन अंकित कर प्रस्ताव तैयार किए गए है जिनका कोई तकनीकी आधार नहीं है। इसमें सबसे गंभीर मुद्दा यह है कि ये सभी अधिकांश प्रस्ताव मूल रूप ये अंकित विभाग के तकनीकी अधिकारियों के द्वारा तैयार न करते हुए प्रदेश के बाहर के बड़े ठेकेदारों की सलाह एवं परामर्श पर तैयार किए गए है। विभाग के अधिकारियों ने झूठे आंकड़ों के आधार पर तैयार किए गए प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किए हैं। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि नियमानुसार किसी भी प्रोजेक्ट के लिए विभागीय स्तर पर दस्तावेजीकरण एवं लागत निकालकर टेंडर आमंत्रित किए जाते थे, लेकिन इसमें ठीक इसके उलट निविदा की टर्न की प्रक्रिया अपनाई गई जिसमें विभाग को पूरी तरह मुक्त कर ठेकेदारों की मर्जी के मुताबिक निविदाएं जारी की गई। जिसमें टेंडर मंजूर होने के बाद प्रोजेक्ट की डीपीआर स्वयं ठेकेदार द्वारा बनाई जाएगी। जिसके आधार पर वह मनमर्जी से काम करेगा। श्री सिंह ने बताया कि जल संसाधन विभाग ने न केवल तकनीकि प्रक्रिया को अनदेखा किया बल्कि प्रोजेक्ट के पूर्व न तो भूअर्जन की कार्यवाही की और न ही सेक्शन 4-6 के अंतर्गत नोटिस जारी किए गए। यहां तक की निर्माण कार्य का नक्शा तक तैयार नहीं किया गया। नहरों और बांधो को बनाने की योजना नक्शे पर तो बना ली लेकिन जमीन कहां और कौन-सी है इसका पता न तो विभाग को है न ही ठेकेदार को। नेता प्रतिपक्ष श्री अजय सिंह ने कहा कि कांग्रेस शासन में टर्न की प्रक्रिया के प्रकरण प्रस्तुत किए गए थे जिसे तत्कालीन सरकार ने अमान्य कर दिया था, क्योंकि इस प्रक्रिया से योजना की उपयोगिता और व्यवहारिकता अनिश्चित होती है, भ्रष्टाचार पनपता है और प्रदेश को गंभीर आर्थिक क्षति होती है। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि विभाग से प्राप्त की गई जानकारी के अनुसार प्रदेश के बाहर हैदराबाद की एक कंपनी प्रमुख भूमिका निभा रही है। वह मंत्रालय में बैठकर प्रस्ताव तैयार कर अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर रही है। अभी तक इस कंपनी को टर्न की प्रक्रिया के तहत जल संसाधन विभाग और एनव्हीडीए ने एक हजार करोड़ से अधिक के कार्य आवंटित कर दिए गए तथा इतनी ही राशि के कार्य उसे देने की तैयारी है। इन सभी प्रकरणों में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय यह है कि भारत सरकार के द्वारा जो दिशा निर्देश सिंचाई योजनाओं को प्रारंभ करने के पूर्व अपनाए जाना चाहिए उसकी पूर्ण रूप से अवेहलना की जा रहीं है। जैसे- 1. केन्द्रीय जल आयोग भारत सरकार ने योजनाओं की निविदा आमंत्रित करने से पूर्व प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया निर्धारित की है जिसका पालन शून्य है। 2. निविदा जारी होने से पूर्व प्रभावित तथा लाभान्वित जनता की सुनवाई आवश्यक है। जिसके लिए भारत सरकार के स्पष्ट दिशा निर्देश है। इसका कोई पालन नहीं किया गया। 3. जल संसाधन विभाग की बड़ी योजनाओं में आवश्यक है कि निर्माण प्रारंभ करने से पूर्व पर्यावरण तथा प्रभावित वन के प्रस्ताव तैयार कर स्वीकृति प्राप्त करें। चूंकि परियोजनाओं का वास्तवविक सर्वेक्षण किया ही नहीं किया गया है अत: पर्यावरण के नियमों के उल्लंघन तथा वास्तविक रूप से प्रभावित न भूमि का आकलन नहीं हो सका। इस प्रकार इन सभी प्रकरणों में वन संरक्षण अधिनियम 1980 का स्पष्ट उल्लंघन किया गया है। जिसमें दोषी अधिकारियों के जेल जाने तक का प्रावधान है। 4. भारत सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का गठन इस कारण किया है कि विकास से जुड़ी योजनाओं में वन एवं पर्यावरण के कारण विलंब न हो जबकि मध्यप्रदेश सरकार नियमों का उल्लंघन कर योजनाओं के निर्माण में बाधा पहुंचाने की कर रहीं है, क्योंकि उसे योजनाओं से अधिक कमीशन की चिंता हंै। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार की बू जो पूरे विभाग में फैल गई है कि नहर एवं बांध निर्माण के बड़े-बड़े टेंडर निकाले जा रहे हैं। इसके कारण प्रदेश के ठेकेदार बाहर हो गए है। ऐसा जानबूझकर इसलिए किया गया ताकि बाहर के ठेकेदार ही इन ठेकों को लें। ये ठेकेदार जो गुजरात, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु राज्यों के है। इनसे बड़ी रकम वसूलने की सांठगांठ हुई है। खनिज घोटाले ने सरकार के सारे रिकार्ड तोड़े प्रकरण क्रमांक एफ-2-57-13 की सुनवाई के लिए 31 अगस्त को नोटिस जारी किया गया और तीन सितम्बर को सुनवाई रख दी। मामला सतना जिले का है। तीन सितम्बर को सुनवाई की गई जिसमें तीन में से मात्र एक कंपनी उपस्थित हुई और मंत्री राजेंद्र षुक्ला ने रिलायंस के पक्ष में फैसला भी दे दिया। जिसे सचिव खनिज साधन ने मानने से इंकार कर दिया । मंत्री जी ने बहुत प्रयास किया और सचिव जब नहीं माने तो 19 सितम्बर को फिर सुनवाई लगा दी लेकिन जिस कंपनी को दिया था उसका इतना दबाव था कि सुनवाई स्थगित कर दी गई ।सरकार खनिज लीज आंवटन का अधिकार मई 2012 में कलेक्टरों को दिया लेकिन चुनाव आते ही 29 मार्च, 2013 में कलेक्टरों से अधिकार वापस ले लिया इसका मतलब साफ है कि खनिज मंत्री ने भ्रष्टाचार के लिए यह किया है। तीन दिन में निपटाई 128 खनन स्थलों की फाइलें प्रदेश के खनिज विभाग की कार्यप्रणाली में अचानक चौंकाने वाली तेजी दिखाई दी है। खदानों के लीज, सर्वे और नवीनीकरण आवेदन निपटाने का काम रफ्तार से चल रहा है। खुद खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल रात-रात तक प्रकरणों की सीधी सुनवाई कर रहे हैं। सामान्य तौर पर एक माह में अधिकतम 10-15 सुनवाई करने वाले महकमे ने महज तीन दिन में ही 128 खनन स्थलों की फाइलें निपटा दीं। चुनाव आचार संहिता प्रभावी होने से पहले काम निपटाने की इस तत्परता पर सवाल उठ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि मप्र में खदान लीज और इसके प्रोसेसिंग लाइसेंस को जारी करने की प्रक्रिया कैग भी सवाल उठा चुका है। कैग रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2011 के दरम्यान विभाग की अनियमितताओं के कारण प्रदेश को 2350 करोड़ रूपए के राजस्व का नुकसान हुआ है। इस नुकसान का कारणों में कैग ने बताया कि विभाग द्वारा खनिज नियमों का सही तरीके से पालन न होना, रायल्टी का कम आकलन और वसूली में लापरवाही है। 3 सितंबर को 33 खनन स्थलों पर खदान आवंटन के लिए कुल 226 आवेदक वल्लभ भवन की लिस्ट में थे। अनुमानत: 4 से 5 मिनट भी एक आवेदक को सुना गया हो तो सभी आवेदकों को निपटाने में 15 से 18 घंटे सुनवाई लाजमी है। इसी प्रकार 20 अगस्त को यदि 400 में से आधे आवेदकों को ही लगातार सुना गया हो तो भी 13-15 घंटे लगे होंगे। ऐसी ही तमाम व्यावहारिक विसंगतियों ने शंकाओं को जन्म दिया है। प्रदेश के 135 से अधिक खनन स्थलों के लिए लीज और नवीनीकरण के औसतन 10 आवेदन आते हैं। हर आवेदन को देखना, ड्राफ्ट बनाना, प्रोसेस में लगाना और फिर आवेदनों को छांटना कठिन काम है। लीज और सर्वे संबंधित दस्तावेजों को क्रॉस चेक करना और लीज देने की शर्तो सहित डीड तैयार करने की प्रक्रिया 20 से अधिक पेजों की हैै। ऐसे एक आवेदन के दस्तावेज तैयार करने में 3-4 दिन लगते हैं। व्यापमं द्वारा पीएमटी घोटाले को दबाया जा रहा है पीएमटी घोटाले में बड़े लोगों के नाम आने के बाद मामले की जॉच धीमी कर दी गई है। मुख्यमंत्री ने आला अफसरों से जांच बहुत गहराई से न करने का कहा हैं। मेरी जानकारी है की दो दिन पूर्व इंदौर हाईकोर्ट ने परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी को आरोपी न बनाए जाने पर पुलिस को फटकार लगाई है। पीमएटी द्वारा पिछले पांच साल में एडमीषन लेने वाले छात्रों की जानकारी नही दी जा रही है । इसमें अधिकतर प्रदेश के बाहर के छात्र है जिनके जाति प्रमाण पत्र भी फर्जी बने है। इसमें प्रदेश के छात्रों के साथ छलावा हुआ है। रियो-टिंटो घोटाला रियो-टिंटो को प्रास्पैक्टिव लायसेंस के तहत कौन सी भूमि से कितना हीरा है इसकी जांच करने हेतु अनुमति प्रदान की गई थी। जब उत्खनन हेतु भूमि दी जाती है तो किस खसरे की कितनी भूमि है यह स्पष्ट उल्लेखित होता है। परंतु रियो-टिंटो को जो भूमि दी गई उसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई और रियो-टिंटो पूरे क्षेत्र में जांच करने की आड़ में अनधिकृत रूप से माइनिंग कर रहा है। रियो-टिंटो को जो अनुमति दी गई थी उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेखित था कि किसी भी स्थिति में पेड़ों को नहीं काटा जाएगा परंतु रियो-टिंटो द्वारा अवैधानिक रूप से बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई है। जिसके संबंध में माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष पहल एनजीओ द्वारा याचिका प्रस्तुत की गई थी जिस पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेष 20.08.2013 को दिया गया। रियो-टिंटो द्वारा जो प्रोसेसिंग प्लांट लगाया गया है वह आदिवासी की भूमि पर लगाया गया है। यह भूमि आदिवासी को कृषि हेतु शासन ने पट्टे पर दी है। परंतु रियो-टिंटो ने उस भूमि के किराए पर लेकर प्रोसेसिंग प्लांट लगवा दिया। इसके अतिरिक्त रियो-टिंटो ने कई आदिवासियों पर दबाव डालकर उन्हें धोखे में रखकर जमीन खरीद ली और उस पर भी अवैधानिक रूप से प्रास्पैक्टिव लायसेंस की आड़ में अवैध उत्खनन किया जा रहा है और बड़े पैमाने पर हीरे निकाले जा रहे है। शिकायत बहुत की गई परंतु उस पर अधिकांष अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई परंतु उमाकांत उमराव एवं राजेश बहुगुणा ने कार्यवाही की तो उन्हें हटा दिया गया। और ऐसे बन गया एक टीचर 3000 करोड़ का मालिक! 3000 करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने वाले कभी शिक्षक रहे खनिज कारोबारी सुधीर के खिलाफ कालेधन के मामले में चल रही सीबीआई की जांच-पड़ताल में नये खुलासे हुए हैं। सीबीआई को पुख्ता सबूत मिले हैं कि सुधीर की कंपनी एसआर ने खनिज विभाग के अफसरों को घूस दी थी। इसके अलावा वर्ष, 2008 में मप्र भाजपा के चुनावी अभियान आपरेशन विजय को भी फंडिंग की गई थी। इस खुलासे के बाद मप्र की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है। प्रदेश की भाजपा सरकार की किरकिरी बने भाजपा नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा पर सीबीआई का फंदा कसता जा रहा है। सीबीआई को पुख्ता सबूत मिले हैं कि सुधीर की कंपनी एसआर फेरो ने आईबीएम(इंडियन ब्यूरो आफ माइंस) के अफसर को रिश्वत दी थी। यह अफसर नागपुर में पदस्थ था। इस मामले में भोपाल सीबीआई यूनिट ने प्राथमिकी दर्ज की है। आयकर विभाग की रिपोर्ट में सीबीआई को बताया गया है कि आईबीएम के अधिकारियों को सुधीर की कंपनी से पैसा दिया गया था। सीबीआई ने इन तथ्यों को गहरी पड़ताल के बाद एसआर फेरो के खिलाफ बुधवार को प्राथमिकी दर्ज की है। बताया जाता है कि सीबीआई मुख्यालय दिल्ली के कुछ अफसर पिछले दिनों भोपाल आए थे। यहां उन्होंने आयकर विभाग की अन्वेषण विंग के अफसरों के साथ इस मामले में लंबी बातचीत की थी। जानकारी के मुताबिक, नागपुर में पदस्थ आईबीएम के अफसरों को सुधीर की कंपनी ने घूस दी थी। इन अफसरों ने सुधीर की खदानों की सेटेलाइट मैपिंग की थी। भाजपा की चुनावी अभियान को भी की थी फंडिंग सुधीर शर्मा की जो 42 पेज की एप्रेजल रिपोर्ट आयकर विभाग को मिली थी, उसके 32 नंबर पेज पर प्रदेश भाजपा के वर्ष, 2008 के चुनावी अभियान आपरेशन विजय को भी फंडिंग करने का खुलासा हुआ है। सुधीर शर्मा की कंपनी एसआर ने चुनाव के लिए पैसा दिया था। इस मामले के खुलासे के बाद एक बार फिर मध्यप्रदेश की राजनीति में भूचाल की स्थिति बन गई है। दो मंत्रियों पर भी लग चुका है रिश्वत का आरोप प्रदेश के खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा द्वारा इन दो बड़े कारोबारियों से घूस लिए जाने के आरोपों के बाद मप्र में सियासी बवाल मच गया था । जुलाई में एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि कारोबारियों दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के यहां एक साल पहले आयकर विभाग ने छापा मारा था। इस छापे में एक डायरी बरामद हुई है, जिसमें घूस लिए जाने का जिक्र है। ये दस्तावेज आयकर विभाग ने सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को पहले ही दे दिए हैं। इसको लेकर कांग्रेस ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दोनों मंत्रियों से इस्तीफा मांगा था। वहीं दोनों मंत्रियों ने इन आरोपों को झूठा बताते हुए इसे कांग्रेस की राजनीतिक साजिश करार दिया था। नेता प्रतिपक्ष ने एक बयान में कहा कि छापों के तत्काल बाद कांग्रेस विधायक दल ने इस संबंध में 11 सवाल मुख्यमंत्री से पूछे थे, लेकिन एक का भी जवाब नहीं दिया गया। सुधीर का दबदबा आयकर छापों के बाद सुधीर शर्मा को शासकीय उपक्रम 'क्रिस्पÓ का अध्यक्ष बना दिया गया था। नेता प्रतिपक्ष ने मीडिया को विधानसभा का 28 जनवरी 2011 का कार्यवाही विवरणदिया था, जिसमें छापों से जुड़े दोनों कारोबारियों का जिक्र था।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

मध्यप्रदेश में भाजपा का बंटाढार तय

प्रदेश में मिलेगी भाजपा को 95 व कांग्रेस को 110 सीटें ! जन सर्वेक्षण में सामने आया आंकड़ा दलवार संभावित सीटें भाजपा-95, कांग्रेस-110, बसपा-10, सपा-7, गोंगपा-2, जदयू-1 व अन्य-5। कुल सीट संख्या- 230 भोपाल। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की अघोषित बिगुल बज गया है.....कांग्रेस के दिग्गजों ने उत्साहपूर्वक मोर्चा संभाल लिया है.....लेकिन भाजपा में खलबली है.....। खलबली की वजह है वे सर्वे रिपोट्र्स जो निजी एजेंसियों और प्रदेश के खुफिया विभाग ने सरकार को दिया है। इन सर्वे रिपोट्र्स में भाजपा की हार और कांग्रेस की बढ़त का दावा किया गया है। भाजपा संगठन और सरकार में मची खलबली के बाद बिच्छू डॉट कॉम ने एक बार फिर प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर जन सर्वेक्षण कराया। इस जन सर्वेक्षण में जो आंकड़ा निकलकर आया है वह चौकाने वाला है। हमारे आंकलन के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल अभी की स्थिति में सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत जुटाने में सफल नहीं होगा। क्षेत्रवार विश्लेषण के अनुसार भाजपा को 95, कांग्रेस को 110, बसपा को 10, सपा को 7, गोंगपा को 2 तो जदयू को 1 और अन्य को 5 सीटें मिलती दिख रही हैं। चुनावी आंकलन: मध्यप्रदेश में किसी को बहुमत मिलने के आसार नहीं मध्यप्रदेश में चुनाव नवंबर में होने है। इसलिए राजनीति में रूचि रखने वाले पाठकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, ब्लॉगरों समेत विभिन्न पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं में चुनाव पूर्व यह जिज्ञासा काफी तीव्र है कि जनता का फैसला क्या होगा? किसे मिलेगा सत्ता का ताज और कौन होगा बेताज? बिच्छू डॉट कॉम एडिटोरियल डेस्क, भोपाल द्वारा इस जिज्ञासा पर ठोस विश्लेषण के लिए वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों, लेखकों व पत्रकारों से विश्लेण मंगवाये गये। इसके तहत प्रदेश के लगभग 200 से अधिक पत्रकारों और सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बातचीत के आधार पर विस्तार से चुनावी आंकलन किया है। इस चुनावी आंकलन में कितना दम है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश के प्रशासनिक अमले के एक सर्वे और इसी राज्य के खुफिया तंत्रों के आंकलन से प्राप्त नतीजे भी बिच्छू डॉट कॉम के चुनावी आंकलन के लगभग आसपास हैं। जनता को अब शिवराज पर तो भरोसा नहीं लोकतंत्र के यज्ञ में आहुति देने के लिए अभी 4 माह का वक्त है। लेकिन परिणाम को लेकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में संशय की स्थिति बनी हुई है। ऊपरी तौर पर भले ही कुछ भी दावें किए जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत से सब वाकिफ हैं। भाजपा की बात हम करें, तो उनके सभी बड़े महारथी मैदानी इलाकों में जाने से कतरा रहे हैं। दरअसल, प्रदेश की जनता को शिवराज पर से अब भरोसा उठ गया है। उनसे न सिर्फ जनता नाराज है, बल्कि उसकी नजर में ये विश्वासघाती भी हैं। यही वजह है कि अंकों का गणित सत्तासीन भाजपा के गणितज्ञों को उलझन में डाले हुए है। इन सब के बावजुद यहां सभी शिवगण अब मोदी स्टाइल में शिवराज के भरोसे हैं। वहीं शिवराज भी 'मैं हूं नÓ का भरोसा दिलाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के लिए भले यह अच्छी बात हो सकती है कि इस बार जनता सबक सिखाने के लिए तैयार है। महानगरों में नहीं गलेगी दाल पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश के चारों महानगरों(भोपाल,इंदौर,जबलपुर और ग्वालियर जिला )में से भोपाल,इंदौर और जबलपुर में अच्छा प्रदर्शन किया था,जबकि ग्वालियर में उसकी भद्द पिटी थी। 2008 में भाजपा ने इंदौर जिले की 9 में 6 सीट जीती थी लेकिन इस बार यहां उसे मात्र 3 सीट ही मिलने के आसार हैं। इसी प्रकार भोपाल में भाजपा 7में से 4 सीटों पर कमजोर है वहीं जबलपुर में भी 6 सीटें भाजपा से छिनने के संकेत है। जबकि ग्वालियर जिले में 6 में से इस बार भाजपा को मात्र एक सीट मिलने की संभावना है। इसके पीछे मुख्य वजह बताई जा रही है कि महानगरों में सरकार के वादों की पोल खुल गई है। प्रदेश के नव मतदाताओं ने जब सरकार के 9 साल के कार्यकाल का आंकलन किया तो पाया की आम आदमी को सरकार ने वादों के अलावा विशेष कुछ नहीं दिया है। महाकौशल और विंध्य में हालत पतली भाजपा महाकौशल और विंध्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए कोई करिश्मा नहीं कर सकी। महाकौशल में तो पार्टी की हालत पहले से ही पतली है और अब और पतली हो गई है। वर्तमान में यहां 38 सीटों में से मात्र 23 पर ही भाजपा का कब्जा है, जबकि 15 सीटों पर कांग्रेस बरकरार है। लेकिन क्षेत्र में विकास नहीं होने के कारण जनता आक्रोशित है। बिच्छू डॉट कॉम के ताजा सर्वे में यहां इस बार भाजपा को करीब 13 सीटों को नुकसान होता दिख रहा है। यानी महाकौशल में इस बार भाजपा को मात्र 10 सीट से ही संतोष करना पड़ेगा। महाकौशल क्षेत्र में आने वाले जिले जबलपुर,कटनी,डिंडौरी,मंडला,बालाघाट नरसिंहपुर और छिंदवाड़ा में भाजपा को जनता पूरी तरह नकारने को तैयार बैठी है। उधर, पिछले चनाव में विंध्य में 30 सीटों में से 25 कब्जे में लेकर इतरा रही भाजपा को जोरदार झटका लगा है। विंध्य में कभी कांग्रेस की तूती बोलती थी। यहां से भाजपा को दहाई के अंक तक की सीटें नसीब नहीं होती थी, लेकिन आज जब जनता ने भाजपा को मौका दिया है, तब भाजपा विंध्य को दरकिनार कर गई। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। विंध्य में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए संगठन स्तर पर भाजपा की कोई रणनीति भी नहीं दिख रही है। बिच्छू डॉट कॉम के ताजा सर्वे में इस बार यहां भाजपा को 11-12 सीटों तक ही सिमटना पड़ सकता है। बुंदेलखंड में की 26 सीटों में से 14 सीटें भाजपा हैंं, उनमें इस बार 8-10 सीटें ही भाजपा की झोली में आ सकती हैं। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि दो विपरीत दिशाओं के आदिवासी जिले मंडला और झाबुआ में भाजपा की पकड़ बेहद मजबूत है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा 34 में से 17 सीटों पर फिलहाल काबिज है, पर यह संख्या इस बार घटकर 10-12 होने के आसार हैं। मालवा क्षेत्र में भाजपा अभी भी मजबूत स्थिति में दिख रही है, लेकिन नर्मदा के दोनों किनारों की जनता भाजपा से दूर होती नजर आ रही है। शिवराज-तोमर को सता रहा भीतरघात का डर सर्वे रिपोर्ट के अनुसार एक तिहाई विधायकों से जनता खुश नहीं है। इसको देखते हुए भाजपा कर स्थिति सांप-छुछंदर जैसी हो गई है। क्योंकि अगर टिकट नहीं बदला तो भी खतरा है और बदलता तो भीतरघात का डर। कांग्रेस विधायक चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी और बसपा विधायक परसराम मुदगल को भाजपा में लाकर नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह चौहान ने अपने असंतुष्ट विधायकों के लिए राह दिखा दी है। जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान 107 सीटों पर रहेगी विशेष नजर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान कमजोर सीटों पर अधिक वक्त देंगे। पार्टी ने करीब 107 ऐसी सीटों का चयन किया है जहां मुख्यमंत्री को अधिक समय देना है। संगठन की ओर से कोशिश की जा रही है कि कमजोर क्षेत्रों में जन आशीर्वाद यात्रा को ज्यादा समय मिल सके। इसके लिए कमजोर क्षेत्रों की सूची तैयार की जा रही है। भाजपा के पास जन आशीर्वाद यात्रा के जरिए कमजोरी दूर करने का आखिरी मौका है। पार्टी की कोशिश है कि कम से कम समय में मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का लाभ लिया जाए। शहरी क्षेत्र में मुख्यमंत्री ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच जाने का प्रयास करेंगे। इसके लिए भीड़भाड़ वाले क्षेत्र देखे जा रहे हैं। 61 विधायक रेड जोन में एक तरफ कांग्रेस इसी माह अपने 100 उम्मीदवारों की घोषणा करने की तैयारी कर रही है, वहीं भाजपा अगस्त के अंत तक उन 61 विधायकों के भविष्य पर फैसला करेगी, जो रेड जोन में हैं। इन 61 विधायकों की सूची भाजपा के प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार के पास पहुंचा दी गई है। इसमें भोपाल के भी 3 विधायक हैं। भाजपा के जो विधायक रेड जोन में आ चुके हैं, उन्हें अगस्त में एक मौका आखिरी बार अपनी बात कहने के लिए दिया जाएगा। जिस विधायक को बुलाया जाएगा, उसके बारे में पूरा चिट्ठा कमेटी अपने पास रखेगी। ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि इसमें अनिल माधव दवे, अरविंद मेनन जैसे तेजतर्रार नेता रहेंगे। पिछले दिनों भोपाल आए प्रदेश प्रभारी इस तरह की स्क्रीनिंग को हरी झंडी दे गए हंै। जो विधायक इस कमेटी के सामने फेल होगा, उसे तत्काल टिकट काटने का फार्म पकड़ा दिया जाएगा। भाजपा संसदीय बोर्ड जो सुपर पॉवर है, एक उप समिति मप्र के लिए बनाएगा। इसमें सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी जैसे नेताओं को शामिल किया जाएगा। ये नेता विधायकों के परफार्मेंस की पड़ताल करेंगे, उसके बाद तय होगा कि किसे टिकट देना है, किसे नहीं। 9 मंत्री भी रेड जोन में भाजपा की रेड जोन सूची में 9 मंत्री भी शामिल हैं। फिलहाल केन्द्रीय नेतृत्व ने अभी किसी भी विधायक की टिकट रोकने को हरी झंडी नहीं दिखाई है। प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार जरूर रेड जोन लिस्ट को अपने साथ ले गए हैं। वे नई दिल्ली से कोई निर्देश भेजेंगे। वहीं रेड जोन में सर्वे के लिए पर्यवेक्षक भी इस माह अपने-अपने जिले में सक्रिय हो जाएंगे। उन्हें यह रिपोर्ट 31 जुलाई तक देनी है। 20 लाख दिखाओ और टिकट ले जाओ दस साल तक प्रदेश में राज करने के बाद भी भाजपा का खजाना खाली है। पार्टी ने कुछ अपवाद छोड़कर हर विधानसभा में 20 लाख का चंदा इक_ा करने का प्रोग्राम बनाया है। बहुत जल्द इस बारे में विधिवत नीति जारी कर दी जाएगी। सूत्रों का इस संबंध में कहना है कि इस योजना को घुमा फिरा कर पार्टी वालों के सामने रखा जाएगा। पार्टी कार्यकर्ता को भावनात्मक रूप से उत्तेजित करने के लिए आव्हान किया जाएगा कि भाजपा लक्ष्मी पुत्रों की पार्टी नहीं है। यह जनता की पार्टी है और जनता से ही चंदा लेकर चुनाव लड़ा जाए। कमजोर आर्थिक स्थिति वाले व पिछड़ी विधानसभा सीट को छोड़ कर सभी विधानसभा में 20-20 लाख का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए विधानसभा वार प्रभारी बनाए जायेंगे। जो मंडल स्तर पर अपने खजांची नियुक्त करेंगे। अब जिसे भी अपनी दावेदारी मजबूत करनी होगी वह पकड़-पकड़ कर चन्दा इक_ा करवाएगा। वर्तमान विधायक के भी सामने नाक का सवाल आ जाएगा और उन्हें भी इतने कम समय में ज्यादा से ज्यादा रसीद फाडऩी पड़ेगी। चूंकि पार्टी यहां सिर से लेकर पांव तक हावी है इसलिए 20 लाख इक_ा होना मुश्किल नहीं रहेगा। किन्तु इसके लिए पार्टी नेता आपस में ही उलझेंगे। बिल्डर, ठेकेदार, सप्लायर , शराब लॉबी, प्रापर्टी दलाल सहित अन्य वैध-अवैध काम करने वाले यहां भाजपा के सबसे बड़े डोनर हैं। यहां के कुछ नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे मुर्दे की जेब से भी पैसा निकलवा लेते हैं। मोदी भक्त देंगे दगा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में हैट्रिक लगवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गुजरात के पूर्णकालिक विजयव्रतियों की मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की हैट्रिक में रूचि नहीं है। प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए गुजरात से 70, उत्तरप्रदेश से 30, महाराष्ट से 40 और बिहार से 15 पूर्णकालिक विजयव्रतियों को बुलाया था। ताकि उन्हें सीमावर्ती जिलों में पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जा सके। लेकिन सिर्फ 55 पूर्णकालिक विजयव्रती ही आए। जो उनमें से 41उन विधानसभा क्षेत्रों में नहीं गए जहां उन्हें भेजा गया था।

सोमवार, 1 जुलाई 2013

मोदी और राजगणित

भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया है. यानी वे 2014 में होने वाले 16वें आम चुनाव में भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी की कमान संभालेंगे. अक्टूबर, 2001 में मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी एक दिन इतने बड़े हो जाएंगे कि उन्हें देश की सबसे बड़ी गद्दी के दावेदार के तौर पर देखा जाएगा. तब तक वे भाजपा के उन नेताओं में हुआ करते थे जो परदे के पीछे रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि यह एक दुर्लभ विशेषाधिकार है जो पार्टी के 33 साल के इतिहास में सिर्फ दो लोगों को मिला है. पहले अटल बिहारी वाजपेयी जो इस दावेदारी के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने में सफल भी हुए और दूसरे लाल कृष्ण आडवाणी, जो उपप्रधानमंत्री रहे और 2009 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने. 33 साल की इस अवधि में भाजपा के कई अध्यक्ष हुए, लेकिन इनमें सिर्फ वाजपेयी और आडवाणी थे जिन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य समझा गया. मोदी इस सूची में तीसरा नाम बन गए हैं. आम चुनाव में अब एक साल से भी कम का वक्त बचा है. इस लिहाज से देखें तो जीत के लिए टीम और रणनीति बनाने या 2002 के गुजरात दंगों के चलते बनी विभाजनकारी नेता की अपनी छवि बदलने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है. पिछले आम चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व के साथ मैदान में उतरी भाजपा को पराजय मिली थी. सवाल उठता है कि क्या मोदी पार्टी को विजय दिला पाएंगे. क्या वे उन मोर्चों पर सफल हो पाएंगे जहां आडवाणी नाकामयाब रहे थे? क्या 2009 के आडवाणी के मुकाबले वोटरों में मोदी का ज्यादा आकर्षण है? क्या भाजपा के मौजूदा या संभावित सहयोगी प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी को स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के समर्थकों और विरोधियों, दोनों में उनकी मुस्लिमविरोधी छवि है. इसके चलते गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के साथ भाजपा की तनातनी हुई. मोदी उन कुछ राजनेताओं में से हैं जिन्हें भारत की बहुलतावादी राजनीति के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है. क्या उनकी मुस्लिम विरोधी छवि भारत की 80 फीसदी हिंदू जनसंख्या में भाजपा के समर्थन का तूफान पैदा कर सकेगी? या फिर इसके चलते भाजपा को एक बार फिर पराजय का सामना करना पड़ेगा? मोदी की एक दूसरी छवि भी है. एक ऐसे नेता की छवि जिसने तेज आर्थिक विकास के बूते अपने राज्य में खुशहाली पैदी की. वे अपनी इस उपलब्धि का जिक्र जमकर करते भी हैं. सवाल उठता है कि गुजरात में सुशासन का मोदी का दावा क्या भारत के 80 करोड़ वोटरों का उतना हिस्सा अपनी तरफ खींच पाएगा जिसके बल पर उनकी पार्टी की सरकार बन सके. 2004 में भाजपा ने भारत उदय और इंडिया शाइनिंग के नारों के साथ ऐसा ही दावा किया था जिसका लोगों पर इतना असर नहीं हो पाया कि भाजपा सत्ता में वापसी कर पाती. और आखिरी सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में लगातार तीन बार जीत क्या संसदीय चुनाव में पहली बार विजय पताका फहराने की उनकी कोशिश में उनके काम आएगी. राज्यों में भाजपा का हाल 2009 के मुकाबले इस वक्त भाजपा की हालत पतली है. इसका मतलब यह हुआ कि मोदी की राह 2009 के आडवाणी से कहीं ज्यादा मुश्किल है. आडवाणी उस समय तुलनात्मक रूप से फायदे की स्थिति में थे. पांच साल पहले भाजपा के पास सात राज्यों की सत्ता थी. आज उसके पास सिर्फ चार राज्य हैं- मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और गोवा. इसमें राजनीतिक प्रासंगिकता के हिसाब से गोवा न के बराबर है. बिहार में वह जदयू के साथ गठबंधन के सहारे सत्ता में है. 2005 से यह गठबंधन वहां अटूट रहा है. 2009 में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 12 जीती थीं और 1999 में अपने सबसे बढ़िया प्रदर्शन की बराबरी की थी. 2010 के विधानसभा चुनाव में भी इसने बढ़िया प्रदर्शन किया. लेकिन आज भाजपा-जदयू गठबंधन टूट के कगार पर है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चिंता है कि मोदी के साथ दिखने से बिहार के 17 फीसदी मुस्लिम मतदाता उनसे दूर जा सकते हैं. पड़ोसी राज्य झारखंड में अवसरवादी राजनीति के चलते इस साल जनवरी में ही भाजपा ने सरकार गंवाई है. राज्य में अब राष्ट्रपति शासन है. पिछले साल उत्तराखंड और हिमाचल में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी सत्ता से बाहर हुई है. जनसंख्या और राजनीतिक असर के हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में भी पार्टी का हाल बुरा है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी 403 में से सिर्फ 48 सीटें जीत पाई थी और तीसरे स्थान पर रही थी. उसका यह प्रदर्शन 2007 के मुकाबले तो खराब ही था जब उसने 51 सीटें जीती थीं 2002 की तुलना में तो यह कोसों दूर था जब उसने 88 सीटों पर विजय हासिल की थी. यह दिखाता है कि भाजपा 2002 से राज्य की सत्ता में रही सपा और बसपा सरकारों की असफलताओं का फायदा उठाने में नाकामयाब रही है. उसके लिए चिंता की बात यह भी है कि 2007 के मुकाबले 2012 में जहां सपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ा वहीं भाजपा का वोट प्रतिशत 17 फीसदी के मुकाबले 15 फीसदी रह गया. वैसे देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से पार्टी का लगातार पतन हुआ है. 1996 से अब तक हुए चार विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत दोनों में गिरावट आई है. 1996 में पार्टी ने 32.5 फीसदी वोटों के साथ 425 में से 174 सीटें जीती थीं. केंद्र की सत्ता का रास्ता जिस उत्तर प्रदेश से होकर जाता है वहां भाजपा इस वक्त अपने सबसे बुरे दौर में चल रही है महाराष्ट्र का हाल भी कुछ ऐसा ही है. 1999 से अब तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में वहां भाजपा-शिवसेना गठबंधन हर बार हारा है. सीट संख्या और वोट प्रतिशत दोनों लिहाज से भाजपा का प्रदर्शन लगातार गिरा है. यानी जनसंख्या के मामले में इस दूसरे सबसे बड़े राज्य में भी वह अपने सबसे बुरे दौर में है. उड़ीसा में जब बीजू जनता दल नेता और राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 2009 में इससे गठबंधन तोड़ा तो इसकी नैया ही डूब गई थी. भाजपा को कुछ राहत पिछले साल पंजाब में मिली जहां शिरोमणि अकाली दल के साथ इसके गठबंधन ने विधानसभा चुनाव में अपनी सत्ता कायम रखी थी. बड़े लाभ की उम्मीद भाजपा को सिर्फ राजस्थान में है जहां वह नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के सहारे सत्तासीन कांग्रेस को हराने के सपने देख रही है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 2003 से लगातार दो बार सरकार बनाई है. यहां भी विधानसभा चुनाव छह महीने दूर हैं. हालांकि वहां की भाजपा सरकारें खुद को लोकप्रिय बता रही हैं, लेकिन कांग्रेस को उम्मीद है कि दस साल से सत्ता में बैठी इन सरकारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बनेगी और वहां वह वापसी करेगी. अगर भाजपा ने इन दो में से एक भी राज्य गंवा दिया तो वोटरों और पार्टी दोनों में मोदी की अपील बुरी तरह घट सकती है. लोकसभा में भाजपा केंद्र में भाजपा की पहली सरकार सिर्फ 13 दिन चली थी. 1996 में तब उसे बहुमत के आंकड़े यानी 272 सीटों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त दलों का समर्थन नहीं मिल पाया था. 1998 में बनी पार्टी की दूसरी सरकार 13 महीने चली. 1999 में बनी इसकी तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया. 1998 में भाजपा ने 182 सीटें जीती थीं. 1999 में यह आंकड़ा 183 हुआ. दोनों बार दूसरे दलों के समर्थन से उसकी सरकार बनी. माना जा सकता है कि अगर भाजपा अगले आम चुनाव में 185 सीटों के आस-पास पहुंच जाती है तो वह केंद्र में सरकार बनाने की दावेदार होगी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी के रास्ते में जो अड़चनें हैं वे उन अड़चनों से कहीं बड़ी हैं जो 2009 में आडवाणी के सामने थीं. 2009 में जब भाजपा आडवाणी के नेतृत्व में मैदान में उतरी थी तो उसके खाते में 2004 के आम चुनावों में मिली 137 लोकसभा सीटों की पूंजी थी. यानी पार्टी को करीब 45 सीटों की खाई पाटनी थी. अभी भाजपा के पास 116 लोकसभा सीटें हैं. यानी मोदी को दूसरी पार्टियों से 70 के करीब सीटें छीननी होंगी. जिस तरह से 2009 के बाद हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन गिरा है, उसे देखते हुए उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती है. खासकर तब तो बहुत ही बड़ी अगर पिछली बार की तरह इस बार भी भाजपा 543 में से 365 लोकसभा सीटों पर लड़ी और बाकी सीटें उसे गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ीं. उत्तर प्रदेश अपनी पार्टी को सत्ता में लाने और खुद प्रधानमंत्री बनने का जो सपना मोदी देख रहे हैं वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक वे उत्तर प्रदेश में पार्टी की किस्मत नहीं बदल देते. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं जो किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा हैं. इनमें से सिर्फ नौ ही आज भाजपा के पास हैं. 1996, 1998 और 1999 के तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई थी. इन चुनावों में उसने क्रमश: 52, 59 और 29 सीटें जीती थीं. 2004 में जब वाजपेयी सरकार सत्ता से बाहर हुई तब भाजपा सिर्फ 10सीटें जीत पाई थी. यह रिकॉर्ड इशारा करता है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी करने के लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश में कम से कम 25 सीटें तो जीतनी ही होंगी. यानी मौजूदा सीटों से 16 सीट ज्यादा. अगले साल 25 सीटें जीतना भाजपा के लिए 1999 की स्थिति की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है. 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 30 प्रतिशत वोट हासिल करके 25 सीटें जीती थीं. दरअसल 1991 से 1999 का दौर उत्तर प्रदेश में भाजपा का स्वर्णिम दौर रहा था. इस दौरान हुए चारों लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए. 1998 में तो यह आंकड़ा 37.5 प्रतिशत तक भी पहुंचा. लेकिन 2004 में यह घटकर 22 प्रतिशत पर आ गया और 2009 में तो पार्टी को कुल 17.5 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए. कोढ़ में खाज यह कि 14 साल में सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल उत्तर प्रदेश में मजबूत ही हुए हैं. 90 के दशक में हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत या तो सबसे ज्यादा होता था या फिर वह इस मामले में दूसरे स्थान पर रहती थी. लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है. अपवाद के रूप में 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें जब कांग्रेस ने बसपा से एक ज्यादा यानी 21 सीटें हासिल की थीं, तो वोट प्रतिशत का सबसे बड़ा हिस्सा अब सपा और बसपा में बंटता है. सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का यह हाल क्यों हुआ. इसकी प्रमुख वजह यह रही कि सवर्ण वोटों पर उसकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई. प्रदेश में सवर्ण वोट लगभग 18 प्रतिशत हैं. पहले यह वोट कांग्रेस को जाता था, लेकिन 1989 के बाद से ही भाजपा लगातार इसे अपने पक्ष में करने में कामयाब हो रही थी. 1999 तक प्रदेश के सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) वोट का एक बड़ा हिस्सा पार्टी को मिल रहा था. लेकिन पिछले दस साल में सपा और बसपा ने अपना प्रभाव बढ़ाकर और सवर्ण प्रत्याशियों को मैदान में उतार कर ऊंची जातियों के वोट का अच्छा-खासा हिस्सा अपनी तरफ खींच लिया. 1996 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने प्रदेश के कुल सवर्ण वोटों का 74 प्रतिशत हासिल किया था. यानी तीन-चौथाई सवर्ण वोट भाजपा के पास थे. लेकिन 2002 में यह घटकर मात्र 47 प्रतिशत रह गए. इसके ठीक उलट बसपा के पास जहां 1996 में सिर्फ चार प्रतिशत ब्राह्मण वोट थे, वे 2002 में बढ़कर 14 प्रतिशत हो गए. बसपा को मिलने वाले अन्य सवर्ण जातियों के वोट भी इस दौर में लगभग दोगुने हो गए. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सपा को लगभग 19 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले. सपा और बसपा दोनों ही एक दौर में जाति आधारित पार्टियां मानी जाती थीं. लेकिन सवर्ण वोटों को अपने पक्ष में करने के बाद इन पार्टियों की राजनीति लगातार समावेशी हुई है. पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में सपा और बसपा ने ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर प्रत्याशियों को रिकॉर्ड संख्या में टिकट दिए. इस कारण सवर्ण वोट का एक बड़ा हिस्सा उनके खाते में गया जिसने पिछड़े और दलित वोट के साथ मिलकर भाजपा की नैया डुबो दी. 2009 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा का हर पांच में से एक प्रत्याशी ब्राह्मण था. बसपा में ब्राह्मण प्रत्याशियों की संख्या दलित प्रत्याशियों से भी ज्यादा थी, जबकि दलित ही बसपा के अस्तित्व का मुख्य कारण रहे हैं. ऐतिहासिक तौर पर उत्तर प्रदेश में हमेशा ठाकुर और ब्राह्मण की चुनावी लड़ाई रही है. भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ब्राह्मण विरोधी छवि वाले ठाकुर हैं. मोदी के लिए राजनाथ सिंह के साथ मिलकर राज्य के ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करना आसान नहीं होगा. फिर भी भाजपा किसी तरह से उत्तर प्रदेश में 25 सीटें जीत भी जाती है तो भी मोदी को दौड़ में बने रहने के लिए पूरे देश से 160 सीटें और जोड़नी होंगी. ये सीटें वे कहां से लाएंगे? ला भी पाएंगे या नहीं? जानने के लिए दूसरे राज्यों की स्थितियों पर गौर करते हैं. महाराष्ट्र महाराष्ट्र में भाजपा क्षेत्रीय दल शिव सेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है. यहां 48 लोकसभा सीटें हैं. इनमें सबसे ज्यादा 18 भाजपा ने 1996 में जीती थीं. 1999 में भी पार्टी का प्रदर्शन यहां ठीक रहा और उसे 14 सीटें हासिल हुईं. 2004 में भाजपा के खाते में 13 सीटें आईं, लेकिन 2009 में ये घटकर सिर्फ नौ रह गईं . जबकि 2009 में भाजपा को अपनी बड़ी जीत की उम्मीद थी. चुनाव से छह महीने पहले ही मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था जिसमें 150 लोगों की जान चली गई थी. प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और भाजपा ने इस हमले को सुरक्षा के मामले पर सरकार की नाकामयाबी बताते हुए मुद्दा बनाया था . लेकिन पार्टी मुंबई की ही छह लोकसभा सीटों में से एक भी नहीं जीत सकी. 2009 में भाजपा को अपने बेजोड़ नेता प्रमोद महाजन की कमी भी काफी खली जिनकी 2006 में उन्हीं के भाई द्वारा हत्या कर दी गई थी . पिछले साल शिव सेना ने भी अपने संस्थापक बाल ठाकरे को खो दिया. उनके बेटे और राजनीतिक वारिस उद्धव ठाकरे की क्षमताओं पर ज्यादातर लोगों को संदेह है. इसके अलावा उद्धव के चचेरे भाई राज ठाकरे द्वारा 2006 में बनाई गई अलग पार्टी मनसे भी लगातार कांग्रेस विरोधी वोटों को बांटने में कामयाब रही है. इस लिहाज से यहां 2014 का पूर्वानुमान भाजपा के लिए बहुत उजले नहीं दिखाई पड़ते . पश्चिम बंगाल पश्चिम बंगाल में भाजपा का अस्तित्व लगभग शून्य ही रहा है. 2009 में पार्टी यहां की कुल 42 में से 40 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इनमें से सिर्फ पार्टी के दिग्गज जसवंत सिंह ही दार्जीलिंग से जीत पाए. (संयोग से जसवंत सिंह मोदी के कट्टर विरोधी हैं) बंगाल में भाजपा का सबसे अच्छा प्रदर्शन 1999 में रहा था जब उसे दो सीटें हासिल हुई थीं. वाजपेयी ने तुरंत ही दोनों जीते हुए प्रत्याशियों को अपनी सरकार में मंत्री बना दिया था. दोनों 2004 और 2009 के आम चुनाव में खेत रहे. भाजपा को 1999 में मिली दो सीटों की जीत भी सिर्फ तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन के कारण ही संभव हो पाई थी. तृणमूल कांग्रेस ही राज्य में मुख्य विपक्षी दल थी जिसने 2011 के विधानसभा चुनाव में 34 साल पुराने साम्यवादी गठबंधन को ध्वस्त किया. भाजपा के लिए 2009 का चुनाव और भी ज्यादा दुखद रहा होगा जब उसके बंगाल के दोनों पूर्व सांसद तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों से चुनाव हार गए. तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर से भाजपा से हाथ मिला सकती हैं. खास तौर से तब जब उन्होंने कांग्रेस से अपना सात साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया है. लेकिन क्या वे मोदी का नेतृत्व स्वीकार करेंगी? यह काफी मुश्किल है. पश्चिम बंगाल के लगभग एक चौथाई मतदाता मुस्लिम हैं और तृणमूल के 19 में से दो सांसद भी. ऐसे में ममता बनर्जी मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देने से बचना ही चाहेंगी. आंध्र प्रदेश जहां तक आंध्र प्रदेश में भाजपा की संभावनाओं की बात है तो इस बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा. 2009 के आम चुनाव में पार्टी ने प्रदेश की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 37 पर उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन किसी को संसद में जाने का मौका नहीं मिला. हालांकि इससे पहले भाजपा यहां उम्मीद जगाने वाला प्रदर्शन कर चुकी थी. तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ मिलकर जब उसने 1999 के आम चुनाव में भागीदारी की थी तब उसे सात सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन पिछले दो आम चुनावों से उसका एक भी उम्मीदवार संसद नहीं पहुंच पा रहा है. विधानसभा चुनावों में भी उसका प्रदर्शन इतना ही बुरा रहा है. 2009 के चुनावों में प्रदेश की 294 सीटों में से 271 पर भाजपा के उम्मीदवार थे. इनमें से दो के अलावा सभी को हार का मुंह देखना पड़ा. 1998-99 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनवाने में टीडीपी की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी. 2004 में यह रिश्ता टूट गया. अब अगर यह जुड़ता भी है तो इससे किसी चमत्कार के होने की खास संभावना नहीं है क्योंकि टीडीपी खुद अपनी चमक खो चुकी है. 2004 के विधानसभा चुनाव में जनता ने पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया था. 1999 के आम चुनाव में जहां उसके पास राज्य की 42 में से 29 सीटें थीं वहीं 2004 और 2009 के आम चुनावों में इनकी संख्या छह से आगे नहीं बढ़ पाई. इस बार प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन अपनी नई पार्टी के साथ कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले हैं. इन जटिल समीकरणों के बीच टीडीपी 2009 के आम चुनावों में 31 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने की कोशिश करेगी. बिहार 2009 में भाजपा को 12 सीटों पर जीत मिली थी. पार्टी के इस प्रदर्शन की 2004 के आम चुनाव, जब उसकी झोली में सिर्फ चार सीटें आई थीं, से तुलना करें तो साफ होता है कि जदयू से गठबंधन उसके लिए फायदेमंद साबित हुआ. इससे पहले 1998 के आम चुनावों में जब भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी तब भी आज के बिहार में उसके पास महज आठ सीटें थीं (शेष 12 सीटें झारखंड वाले हिस्से में थीं). इस समय भाजपा के बड़े नेता दावा कर रहे हैं कि यदि जदयू अगले साल आम चुनाव से पहले गठबंधन से अलग होता है तो उसे बिहार में काफी नुकसान उठाना पड़ेगा, पर सच्चाई उलट हो सकती है. जदयू की वजह से भाजपा को पिछड़े और मुस्लिम दोनों वर्गों के वोट मिले हैं. 1996 में जब वह पहली बार लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी तब उसे बिहार में सिर्फ छह सीटें हासिल हुई थीं. 1991 में राम मंदिर अभियान के समय जब उसने पहली बार लोकसभा सांसदों के मामले में तीन अंकों का आंकड़ा पार किया था तब तो बिहार में उसका खाता शून्य पर पहुंच गया था. इससे पहले 1989 में वर्तमान बिहार में भाजपा को 40 में से महज चार सीटों पर जीत मिली थी (इनमें झारखंड की सीटें शामिल नहीं हैं). तमिलनाडु यहां लोकसभा की 39 सीटें हैं. अतीत में भाजपा के पास एक ऐसा मौका आया है जब उसने इस राज्य से बड़ी उम्मीदें बांध ली थीं. 1998 के आम चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियों को चौंकाते हुए उसने न सिर्फ यहां खाता खोला बल्कि 1999 में हुए आम चुनाव में उसने अपनी सीटें बढ़ाकर पांच कर ली थीं. लेकिन खुशहाली का यह किस्सा यहीं खत्म हो गया और इसके बाद वह राज्य में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीती. आज के हालात में राज्य की दोनों क्षेत्रीय पार्टियां द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (एआईएडीएमके) के बीच भाजपा के लिए गुंजाइश बहुत कम है. इन दोनों पार्टियों का अतीत बताता है कि वे खांटी अवसरवादी हैं. दोनों ही मोदी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में शामिल होने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर सकती हैं. लेकिन यहां लोकसभा चुनावों में ऐसा दुर्लभता से ही होता है कि एक पार्टी दूसरी का पूरी तरह से सफाया कर दे. यानी इनमें से कोई भी मोदी को समर्थन देती है तो संभावना कम ही है कि वह सीटों के आंकड़े में बहुत बड़ी संख्या जोड़ पाए. मध्य प्रदेश मोदी यह बिल्कुल अपेक्षा नहीं कर सकते कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के बड़े नेता उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करेंगे. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो सीधे उनके प्रतिस्पर्धी हैं. वे 13 साल की उम्र से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं. एक हिसाब से तो भाजपा का वर्तमान संकट उसी समय से शुरू हुआ था जब कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी ने चौहान की तारीफ करते हुए उन्हें बधाई दी कि उन्होंने गुजरात में मोदी द्वारा किए गए काम की तुलना में मध्य प्रदेश में बेहतर काम करके दिखाया है. यह भी दिलचस्प है कि 2009 के आम चुनाव में चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश से भाजपा के 16 (29 सीटों में से) उम्मीदवार जीते थे, तो वहीं नरेंद्र मोदी के गुजरात में इससे कम 15 (26 सीटों में से). हालांकि पिछले दिनों दो सीटों पर हुए लोकसभा के उपचुनावों में जीत के बाद यह संख्या 17 हो चुकी है. सौम्य स्वभाव के चौहान पार्टी में दिग्गज नेता नहीं हैं लेकिन वे हमेशा से राष्ट्रीय नेताओं के प्रिय रहे हैं. इनमें भाजपा की दूसरी पांत के नेता अरुण जेतली, अनंत कुमार से लेकर सुषमा स्वराज तक शामिल हैं. संघ परिवार भी उनका समर्थन करता है. इस साल नवंबर में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और मोदी के लिए मुश्किल होगा कि उम्मीदवारों के चयन में वे चौहान की पसंद को नजरअंदाज करें. राज्य में यदि तीसरी बार फिर भाजपा की सरकार बनती है तो लोकसभा चुनावों में भी वे अपने करीबियों को टिकट दिलवाएंगे. मोदी को याद रखना होगा कि वे चौहान को हल्के में नहीं ले सकते. 2003 में भारी बहुमत के साथ भाजपा को सत्ता दिलाने वाली उमा भारती लाख कोशिशों के बाद भी न चौहान को उनके पद से हटने के लिए मजबूर कर पाईं और न ही भाजपा में वापसी के बाद मध्य प्रदेश में उनका राजनीतिक पुनर्वास हो पाया. राजस्थान राजस्थान में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसकी पूरी संभावना है कि राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इनमें मोदी की सक्रियता पर उत्साहित न दिखें. दरअसल राजे अभी से मानकर चल रही हैं कि राज्य में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिली हुई है और वे कांग्रेसनीत सरकार को आसानी से हरा देंगी. उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा 2003 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई थी. हालांकि यह प्रदर्शन 2008 में वे दोहरा नहीं पाईं और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई. चौहान की तरह ही यदि वे राजस्थान में भाजपा को जिता पाईं तो अगले साल होने वाले आम चुनाव में राज्य की लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में मोदी एकतरफा फैसला नहीं ले पाएंगे. राजस्थान भाजपा के लिहाज से इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि यहां की कुल 25 लोकसभा सीटों में से फिलहाल उसके पास मात्र चार सीटें हैं. यानी अगले आम चुनाव में उसके पास बड़ा मौका होगा. कर्नाटक आगामी आम चुनाव में बहुत कम वक्त बचा है और उसे देखते हुए अगर मोदी कर्नाटक से दूरी बनाए रखने का फैसला करते हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं होनी चाहिए. 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य की 28 में से 18 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. यह आंकड़ा गुजरात में उसे हासिल सीटों से बेहतर था. लेकिन तीन माह पहले कर्नाटक की सत्ता गंवाने के बाद से वहां पार्टी जनता दल (सेक्युलर) से भी पिछड़ते हुए तीसरे स्थान पर खिसक गई. पार्टी को राज्य के मुख्यमंत्री रहे कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा ने भी अपूरणीय क्षति पहुंचाई. भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भाजपा से इस्तीफा देने वाले येदियुरप्पा ने नई पार्टी बना ली और पुरानी पार्टी के महत्वपूर्ण वोट काट लिए. उड़ीसा उड़ीसा में मोदी के सफल होने की गुंजाइश कम ही है. राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा है कि भाजपा के इस नए नायक के पास देश की समस्याओं को हल करने के लिए कम ही सुझाव हैं. वर्तमान में उड़ीसा से भाजपा का एक भी सांसद नहीं है. 1999 में बीजू जनता दल (बीजद) की लहर पर सवार भाजपा को 21 में से नौ सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी. वर्ष 2004 में पार्टी को सात सीटों पर जीत हासिल हुई और उसने 1998 के अपने प्रदर्शन की बराबरी कर ली. लेकिन संघ से जुड़े लोगों की ईसाई विरोधी हिंसा से नाराज पटनायक ने 2009 के आम चुनाव से एक महीने पहले गठबंधन तोड़ दिया. भाजपा का वहां से सफाया हो गया. जाहिर है कि मोदी वहां कोई करामात नहीं कर पाएंगे. झारखंड 20 से कम लोकसभा सीटों वाले राज्यों में झारखंड शामिल है. भाजपा एक समय यहां सत्ता पर काबिज रह चुकी है. 14 लोकसभा सीट वाले इस प्रदेश में उसे सन 1996 और 1998 के चुनावों में 12 सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी. लेकिन 2004 में यहां उसका सफाया हो गया. हालांकि 2009 में उसने कुछ हद तक वापसी की और सात सीटों पर जीत हासिल की. लेकिन आज राज्य के बिखरे राजनीतिक हालात को देखते हुए लगता नहीं कि मोदी और भाजपा 1996 और 1998 वाली कामयाबी दोहरा पाएंगे. दिल्ली भाजपा शिद्दत से चाह रही होगी कि मोदी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पार्टी की हालत सुधार दें. यहां सात लोकसभा सीटें हैं. 1999 में भाजपा ने यहां सभी सीटों पर जीत हासिल की थी. इससे पहले 1989 में उसे चार, 1996 में पांच और 1998 में छह सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन 2004 में उसे बड़ा झटका लगा और पार्टी एक को छोड़कर सभी सीटों पर हार गई. 2009 में तो वह इकलौती सीट भी चली गई और पार्टी का सफाया हो गया. अन्य राज्य बहरहाल भाजपा को छत्तीसगढ़ में अच्छी-खासी सीटें मिल सकती हैं जहां अभी उसके 11 में से 10 सांसद हैं. पिछले महीने हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के मारे जाने के बाद प्रदेश में पार्टी और अधिक कमजोर हुई है. लेकिन असम में जहां भाजपा के 14 में से चार सांसद हैं वहां मोदी के लिए यह संख्या बढ़ाना आसान नहीं होगा क्योंकि यह अब तक का पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन है. हरियाणा में जहां भाजपा 1999 में 10 में से पांच सीटें जीतने में सफल रही थी वहां भी 2009 में उसका सफाया हो गया. राज्य में उसके पूर्व सहयोगी दलों की हालत और भी खस्ता है. केरल में वामपंथी गठबंधन और कांग्रेस गठबंधन हावी हैं और दोनों ही भाजपा के खिलाफ हैं. फिर क्या होगा? तो फिर मोदी कहां पहुंचेंगे? अगर 1984 से लेकर अब तक भाजपा के राज्यवार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की एक सूची बनाई जाए तो भी आंकड़ा कुल 251 सीटों तक पहुंचता है जो सामान्य बहुमत से 21 कम है. अगर मोदी चमत्कारिक रूप से यहां तक भी पहुंच जाते हैं तो भी उनके लिए महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में अकाली दल और तमिलनाडु में द्रमुक या अन्नाद्रमुक के अलावा अपना कोई अन्य हिमायती तलाश पाना मुश्किल होगा. कहा जा सकता है कि ये तो अतीत के आंकड़े हैं और इनसे भविष्य की तस्वीर ऐसी ही होगी, यह बात निश्चितता के साथ नहीं कही जा सकती. लेकिन इन आंकड़ों से यह अंदाजा तो लग ही जाता है कि अगले आम चुनाव में भाजपा और मोदी की राह कितनी कठिन है. विश्लेषक मानते हैं कि मोदी के लिए हो रहे इस मौजूदा शोर में उतनी ऊर्जा नहीं है जितनी उन अभियानों में देखने को मिली थी जिन्होंने भाजपा को अतीत में दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाया. 1980 में बनी भाजपा को 1984 के लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें मिली थीं. उस चुनाव में कांग्रेस ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उठी शोकलहर पर सवार होकर भारी जीत हासिल की थी. यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज चुनाव हार गए थे. लेकिन पांच साल बाद भाजपा ने 89 सीटों के साथ वापसी की. 1991 में वह 121 सीटों तक जा पहुंची. इन दोनों विजयों में अयोध्या राममंदिर निर्माण के लिए छेड़े गए देशव्यापी अभियान की अहम भूमिका थी. उस अभियान की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ 16 साल और चार आम चुनावों का सामना करने के बाद भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. इतने कम वक्त में ही उसने आजादी की लड़ाई लड़ने वाली एक सदी पुरानी कांग्रेस को पछाड़ दिया. राम मंदिर लहर के दौरान 1991 में जब पहली बार पार्टी के 100 से ज्यादा सांसद जीते तो बिहार में उसका खाता शून्य पर पहुंच गया था1998 और 1999 में भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी. संजीदा, समझदार और अनुभवी राजनेता की छवि रखने वाले वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे दोनों बार केंद्र की सत्ता हासिल हुई. लेकिन जब उनकी सरकार भी पुरानी सरकारों जैसी ही निकली तो 2004 में जनता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया. क्या मोदी के पास वाजपेयी जैसी अपील है? कम से कम इस वक्त तो ऐसा नहीं लगता. 2002 में गुजरात दंगों के बाद मोदी की एक कट्टर नेता की छवि बनी थी जिसके सहारे वे गुजरात की सत्ता में लौटे. लेकिन यह भी अब 11 साल पुरानी बात हो चुकी है और अब इसके सहारे उतने वोट नहीं बटोरे जा सकते जितने वोटों की मोदी उम्मीद कर रहे होंगे. भाजपा ने 2004 और 2009 के चुनावों में उनकी इस छवि का इस्तेमाल किया भी था, लेकिन नतीजे बहुत उत्साहजनक नहीं रहे. 2009 में मुंबई में मोदी ने जमकर प्रचार किया फिर भी पार्टी वहां की सभी छह सीटों पर हार गई. यह 26/11 के हमले के बाद की बात है. तुलनात्मक रूप से देखें तो 1990 के दशक में अयोध्या आंदोलन के चलते आम मानस में भाजपा की कट्टर हिंदूवादी छवि कहीं अधिक प्रभावी थी जिसका फायदा उसे 1996, 1998 और 1999 के चुनावों में मिला भी. मोदी का दूसरा दांव है अच्छे प्रशासन और 11 साल मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में किए गए विकास का दावा. लेकिन इसमें भी उतना दम नहीं लगता कि उनके लिए पूरे देश में वोटों का तूफान खड़ा हो जाए. पिछले दिनों जब आडवाणी ने कहा कि गुजरात पहले से ही विकसित था और मोदी ने सिर्फ उसकी हालत सुधारी है तो वे तो निश्चित रूप से राजनीति कर रहे थे, लेकिन अगर यह बात पूरी तरह गलत होती तो आडवाणी ऐसा कहते ही नहीं. अब जब आम चुनाव करीब हैं तो स्वाभाविक ही है कि गुजरात में अच्छे प्रशासन और आर्थिक विकास के मोदी के दावों की पहले के मुकाबले कहीं सघन समीक्षा की जाएगी. तो सवाल यह उठता है कि भाजपा के भीतर और बाहर मोदी समर्थक उनके पार्टी की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनने पर इतने अधिक उत्साहित क्यों हैं. इसका जवाब आसान है. कई बार व्यक्ति के उठान में उसकी खूबियों से ज्यादा परिस्थितियों का भी हाथ होता है. दरअसल भाजपा में विश्वसनीय नेतृत्व का पूर्णतया अभाव है. भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार की छवि पर कई बट्टे लग चुके हों फिर भी भाजपा के मन में संशय है कि शायद सिर्फ सरकार के खिलाफ पड़ा वोट उसे दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त न हो. भाजपा की प्रचार मशीनरी ढोल पीट रही है कि पार्टी के कार्यकर्ता आगामी चुनाव में एकमत से मोदी का नेतृत्व चाहते हैं. अगर यह सच भी है तो इसे तभी सही माना जा सकता है जब कस्बों और शहरों में पार्टी कार्यकर्ता ऐसी मांग के साथ नजर आने लगें. जानकारों के मुताबिक जो बात सच है वह यह है कि भाजपा में दूसरी, तीसरी और चौथी पांत के नेताओं और उनके खेमों को लग रहा है कि अगले साल का आम चुनाव उनके लिए केंद्र की सत्ता और उससे जुड़े फायदों तक पहुंचने का आखिरी मौका है. उनका मानना है कि 2009 में फेल हुए आडवाणी उन्हें यह मौका नहीं दे सकते इसलिए उन्होंने मोदी पर दांव लगाया है.

मातम में मार्केटिंग

उत्तराखंड की त्रासदी जहां अपनी भयावहता के लिए लोगों के जेहन में हमेशा जिंदा रहेगी तो दूसरी तरफ यह राजनीतिक वर्ग के एक हिस्से द्वारा मातम के इस मौके को भुना कर सस्ता प्रचार पाने की कोशिशों के लिए भी याद रखी जाएगी. इस तबाही के बाद से ही पूरे देश से लोग मदद के लिए आगे आए. विभिन्न राज्य सरकारों और नेताओं ने जहां शांतिपूर्वक और गरिमापूर्ण तरीके से सहायता राशि से लेकर राहत सामग्री उत्तराखंड पहुंचाई वहीं कुछ नेता ऐसे भी रहे जो इस मौके पर अपनी छवि चमकाने की कोशिश करते दिखे. टीवी कैमरों के सामने एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हुए कर्नाटक के टीडीपी और कांग्रेसी सांसदों की तस्वीरें यह बताने के लिए काफी थीं कि मातम के इस मौके को भुनाने की जद्दोजहद किस हद तक पहुंच गई है. हालांकि इसकी शुरुआत तो त्रासदी के साथ ही हो गई थी, लेकिन दिन गुजरने के साथ यह और गहरी होती गई. सस्ती लोकप्रियता पाने की इस राजनीति को एक अलग ऊंचाई पर ले जाने का आरोप गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लगा. इसकी शुरुआत उस खबर से हुई जिसके मुताबिक गुजरात सरकार ने एक दिन के भीतर ही उत्तराखंड आपदा में जगह-जगह फंसे 15 हजार गुजरातियों को सुरक्षित निकालकर उनके घर पहुंचा दिया था. इस काम के लिए मोदी को ‘रैंबो’ करार देते हुए एक अखबार ने दावा किया कि गुजरातियों को देहरादून के सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए 80 टोयोटा इनोवा गाड़ियां मंगाई गईं. लोगों को बचाने और सकुशल घर तक पहुंचाने के लिए चार बोइंग विमानों के साथ 25 लग्जरी बसों की भी सहायता ली गई. मोदी को महामानव बताने वाली यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई. विरोधी दल इस दावे को असंभव और हास्यास्पद ठहराते नजर आए तो मोदी समर्थक इसे उनकी काबिलियत का एक और प्रमाण बताते. गुजरात सरकार की तरफ से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई. लेकिन क्या सच में ऐसा हुआ था? सूत्रों की मानें तो 15 हजार लोगों को बचाने की खबर बड़ी हद तक कोरी अफवाह थी जो मोदी की पीआर एजेंसी एपको की तरफ से फैलाई गई थी. तहलका ने उत्तराखंड में राहत कार्य का काम देख रहे गुजरात सरकार के एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी संदीप कुमार से बात की तो उनका कहना था, '15 हजार का कोई आंकड़ा हमारे पास नहीं है. हां, हरिद्वार से अब तक लगभग 1,800 के करीब लोगों को गुजरात भेजा गया है. बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी हैं जो राज्य सरकार नहीं बल्कि खुद के इंतजाम से वापस गुजरात गए हैं.' हरिद्वार के शांति कुंज में गुजरात सरकार का सबसे बड़ा कैंप है. वहां के एक अधिकारी विष्णु पंड्या कहते हैं, '15 हजार लोगों को निकाले जाने की बात तो हमें नहीं पता है. हां, हमारे यहां से लगभग 2000 के करीब गुजराती लोगों को गुजरात सरकार ने अब तक अपनी व्यवस्था से गुजरात भेजा है.' हरिद्वार के अलावा देहरादून और ऋषिकेश में भी गुजरात सरकार के कैंप लगे हैं लेकिन ये कैंप हरिद्वार के कैंप से बेहद छोटे हैं. ऐसे में अगर हम बाकी दो अन्य कैंपों से भी 2000-2000 लोगों को जोड़ दें तो आंकड़ा छह हजार तक पहुंचता है, जो 15 हजार के आधे से भी कम है. ऐसी खबरें भी आईं कि गुजरात सरकार ने गुजरात के लोगों को सीधा वहीं से बचाया जहां वे फंसे थे. लेकिन गुजरात सरकार की वेबसाइट पर 21 और 22 जून को बचाए गए जिन लोगों का नाम दर्ज है उनकी आपबीती कुछ और ही बताती है. उन्हीं लोगों में से एक विट्ठलभाई पटेल कहते हैं, ‘मैं गौरीकुंड में फंसा हुआ था. काफी संघर्ष के बाद सेना की मदद से किसी तरह हरिद्वार पहुंचा. वहां गुजरात सरकार के राहत कैंप में संपर्क किया. फिर वहां से उन्होंने आगे अहमदाबाद जाने के लिए मेरी मदद की.’ यही कहानी मयूर शाह की भी है. वे जोशीमठ में फंसे थे. शाह बताते हैं,' वहां से हरिद्वार आने के लिए 15 हजार रुपये में प्राइवेट टैक्सी की. गुजरात सरकार के कुछ अधिकारियों से हमारी फोन पर जरूर बात हुई थी लेकिन हरिद्वार तक हम अपनी व्यवस्था से ही पहुंचे थे. बाद में सरकार के राहत शिविर की तरफ से हमें अहमदाबाद भेजने की व्यवस्था की गई.' यही व्यवस्था लगभग हर राज्य सरकार ने की है. यानी सेना लोगों को जहां वे फंसे होते हैं वहां से बचाकर हरिद्वार और देहरादून जैसे बेस कैंपों तक लाती है. फिर वहां लोग अपने-अपने राज्यों द्वारा लगाए गए राहत शिविरों में जाते हैं या फिर अन्य शिविरों में. गुजरात सरकार ने भी ऐसा ही किया. लेकिन विभिन्न माध्यमों से ऐसी खबरें आईं मानो बाढ़ में फंसे गुजरातियों को गुजरात सरकार ने चुन-चुन कर निकाला हो और फिर उन्हें उनके घर भेजा हो. अहम सवाल यह उठता है कि इस पूरे दुष्प्रचार में गुजरात सरकार की क्या भूमिका है. 15 हजार लोगों को बचाने का दावा न तो मोदी की तरफ से किया गया था और न ही गुजरात सरकार की तरफ से. वे यह कह कर अपना बचाव भी कर सकते हैं. लेकिन अगर उनकी तरफ से यह दावा नहीं था और इस दावे में उनकी सहमति नहीं थी तो जब इसको लेकर चारों तरफ चर्चा शुरू हुई तो उन्होंने इसका खंडन क्यों नहीं किया? सूत्रों की मानें तो ये सारा किया-धरा उस पीआर एजेंसी का है जिस पर गुजरात सरकार और मोदी की छवि को चमकाने की जिम्मेदारी है. कहा जा रहा है कि पीआर एजेंसी ने ही यह खबर मीडिया में प्लांट कराई जिससे गुजरात सरकार और मोदी को ‘रैंबो’ दिखाया जा सके. लेकिन आंकड़ों को लेकर गड़बड़ी हो गई इसलिए दावों का दांव उल्टा पड़ गया और स्थिति हास्यास्पद हो गई. उत्तराखंड पहुंचने के बाद मोदी के केदारनाथ मंदिर बनवाने की पेशकश की भी विभिन्न हलकों में आलोचना हुई. भाजपा नेता और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस प्रस्ताव पर मांगी गई प्रतिक्रिया के जवाब में मीडिया से कहा, 'पहले लोगों को बचाना जरूरी है. घर बनाना जरूरी है. मंदिर बाद में भी बन जाएगा.' मोदी की आलोचना इस बात के लिए भी हुई कि जो राज्य खुद के सबसे ज्यादा संपन्न होने का दम भरता है उसने उत्तराखंड की इस त्रासदी पर शुरुआत में सिर्फ दो करोड़ रुपये का सहयोग देने की घोषणा की. दूसरी तरफ देखें तो उत्तर प्रदेश ने 25 करोड़ रुपये, महाराष्ट्र, दिल्ली व हरियाणा ने 10-10 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, बिहार, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, ओडि़शा जैसे राज्यों ने पांच-पांच करोड़ रुपये की सहायता राशि भेजी. हरियाणा ने तो 25 गांवों को गोद लेने का भी एलान किया. इसके साथ ही वह पहला ऐसा राज्य भी बना जिसने इस त्रासदी में बराबर के शिकार बेजुबानों की सुध ली. हरियाणा ने आपदा से प्रभावित पशुओं के इलाज के लिए दवाओं के साथ डॉक्टरों की एक टीम भी भेजी है. उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार ने 25 करोड़ रुपये की सहायता राशि देने के साथ ही राज्य परिवहन की 300 बसें फंसे हुए यात्रियों को ले आने के लिए भेज दीं. साथ में डॉक्टरों का एक बड़ा दल भी प्रभावितों के इलाज के लिए उत्तराखंड रवाना किया. भाजपा शासित मध्य प्रदेश ने त्रासदी के कुछ समय बाद ही राज्य के संस्कृति मंत्री के साथ एक सात सदस्यीय टीम को देहरादून रवाना किया. इसके साथ ही राज्य के लोगों को वहां से लाने के लिए सरकार ने ट्रेन के साथ ही सरकारी और प्राइवेट विमानों का भी इंतजाम किया. इस तरह से उत्तराखंड में आई बाढ़ के बाद राहत को लेकर विभिन्न राज्यों की भूमिका को देखें तो बाकी के राज्य राहत पहुंचाने के मामले में गुजरात से कहीं आगे दिखाई देते हैं. हां, यह जरूर है कि उन्होंने इसका ढिंढोरा नहीं पीटा और न अपनी ‘महानता’ की खबरें फैलाईं. मातम की मार्केटिंग के लिए सिर्फ मोदी की ही आलोचना नहीं हुई बल्कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पार्टी महासचिव राहुल गांधी भी आलोचना के घेरे में आए. त्रासदी के आठ दिन बाद तक राहुल गांधी का न तो इस हृदयविदारक घटना पर कोई बयान आया और न ही वे कहीं दिखाई दिए. सोशल मीडिया से लेकर बाकी जगहों पर जब हो-हल्ला मचा तो कुछ दिन बाद वे सोनिया गांधी के साथ कांग्रेस दफ्तर के पास राहत सामग्री लेकर जाने को तैयार ट्रकों को झंडा दिखाते दिखे. लेकिन इसके बाद खबरें आईं कि ट्रक तीन दिन पहले से राहत सामग्री लेकर तैयार खड़े थे, लेकिन राहुल के देश से बाहर होने के कारण उन्हें रवाना नहीं किया गया. खैर, ट्रक जैसे-तैसे गए, लेकिन आधे रास्ते में जाकर वे फिर से खड़े हो गए. उनके ड्राइवरों के हवाले से बताया गया कि उन्हें इतना ही डीजल दिया गया था.

तिरस्कार की मार

बात सितंबर, 1893 की है. उत्तराखंड के चमोली में बहने वाली बिरही नदी में एक पहाड़ गिर गया. बिरही आगे जाकर अलकनंदा में मिलती है जिसके भागीरथी में मेल के बाद बनी धारा को गंगा कहा जाता है. बिरही में पहाड़ गिरने से एक विशाल झील बन गई. ताल के एक छोर पर गौणा गांव था और दूसरे पर दुर्मी तो कोई इसे गौणा ताल कहता और कोई दुर्मी ताल. तब के शासकों यानी अंग्रेजों ने उस ताल से पैदा हुआ खतरा भांपते हुए दुर्मी में एक तारघर खोल दिया. तारघर से एक अंग्रेज कर्मचारी हर रोज पानी के स्तर की जानकारी नीचे बसे गांवों में भेजता. आशंका गलत नहीं थी. एक साल बाद 16 अगस्त 1894 को भारी बारिश और पहाड़ धसकने से ताल का एक हिस्सा टूट गया. कुछ सालों बाद इस ताल का अध्ययन करने आए स्विस भूगर्भ वैज्ञानिकों के मुताबिक इस चार किमी लंबे, एक किमी चौड़े और 300 मीटर गहरे गौणा ताल में करीब 15 करोड़ घन मीटर पानी था. अनुमान है कि ताल टूटने के बाद भारी मात्रा में पानी बिरही की संकरी घाटी से होते हुए चमोली, कर्णप्रयाग, रुद्रप्रयाग, श्रीनगर, ऋषिकेश और हरिद्वार की ओर बढ़ा होगा. दस्तावेजों के मुताबिक उस भारी जल प्रवाह से भले ही अलकनंदा घाटी में खेती और संपत्ति को भारी नुकसान हुआ, लेकिन मौत सिर्फ एक हुई थी. वह भी उस साधु की जो लाख समझाने के बावजूद जलसमाधि लेने पर अड़ा हुआ था. यानी नुकसान इसलिए बहुत कम हुआ कि संकट को समझने और उससे बचने के लिए समय पर सटीक उपाय करने की अंतर्दृष्टि दिखाई गई थी. ताल बनते ही बचाव के उपाय शुरू हो गए थे. अंग्रेज तुरंत सूचना भेजने और लोगों को चौकन्ना करने की व्यवस्था की अहमियत समझते थे इसलिए उन्होंने तब दुर्लभ मानी जाने वाली लगभग 100 मील लंबी तार लाइन भी बना ली थी. कई दशक बाद 20 जुलाई, 1970 को ताल पूरी तरह से टूट गया. बेलाकूची नाम का एक गांव इस जल प्रलय में बह गया. उस समय भी कई यात्री गाड़ियों के बहने और कुल 70 मौतें होने की बात रिकॉर्ड में दर्ज है. यह आजाद भारत का किस्सा है. आज देश को आजाद हुए करीब 66 साल हो चुके हैं. उत्तराखंड को अलग राज्य बने भी 13 साल हो गए. लेकिन लगता है कि ऐसी आपदाओं को संभालने के मामले में हम एक मायने में 1893 से भी पीछे चले गए हैं. केदारनाथ में आए जलप्रलय का कारण बना गांधी सरोवर यानी चौरबाड़ी ताल केवल 400 मीटर लंबा और 100 मीटर चौड़ा था. इसकी गहराई अधिकतम दो मीटर थी. यानी गौणा ताल की तुलना में इसका आकार एक तलैया से अधिक नहीं था. फिर भी इससे हुई तबाही ने करीब सवा सदी पहले हुई उस तबाही को कहीं पीछे छोड़ दिया. अब तक 1000 से अधिक मौतों और कई हजार करोड़ रु के नुकसान की पुष्टि हो चुकी है. वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक डॉ मनीश मेहता के शोध पत्र के अनुसार चौरबाड़ी ताल 3000 साल पुराना था. इसके किनारे थामने वाला मौरेन (हिमनदों का चट्टानरूपी अवक्षेप) 100 मीटर मोटाई का था, लेकिन यह कुछ सालों से रिस भी रहा था. ताल के नीचे रोज हजारों यात्री आते थे फिर भी सरकार ने न तो इसके टूटने की संभावनाओं को परखा और न बचाव के उपाय किए. उत्तरकाशी में दो साल से तबाही का कारण बन रही असिगंगा का मूल स्रोत भी डोडीताल नाम का एक तालाब ही है. आज सूचना और आवागमन के साधन हर जगह मौजूद हैं. लेकिन उनका प्रयोग करके भी इस आपदा के असर को कम नहीं किया जा सका. दरअसल आपदा के पहले और बाद में जो हुआ उसे गहराई से देखें तो इसका सीधा कारण व्यवस्था थामने वालों में जिम्मेदारी की भावना और संवेदनशीलता का अभाव दिखता है. वहीं, आम जनता भी परंपरागत ज्ञान और जीवन पद्धति को याद रखती तो नुकसान इतना ज्यादा नहीं होता. आगे जो दर्ज है वह बताता है कि परंपरागत ज्ञान और आधुनिक कानून का उत्तराखंड में जो तिरस्कार हुआ है, एक समाज के रूप में उसकी कीमत चुकाने के लिए हम अभिशप्त हैं. किसी भी नेतृत्व की असली परीक्षा संकट में होती है. इस लिहाज से देखा जाए तो हाल की आपदा के दौरान जो हुआ उसने उत्तराखंड सरकार की पोल खोल दी है. सरकार का कहना है कि उसे ऐसी आपदाओं से निपटने का कोई अनुभव नहीं है. लेकिन सच यह है कि जो गंभीरता और इच्छाशक्ति उस अनुभव के लिए जरूरी है वही इस त्रासदी के दौरान उसके व्यवहार में गायब दिखी. ऐसी आपदा के लिए अलग और बड़ी व्यवस्था तो दूसरी बात है, राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व को यही पता नहीं कि जो संसाधन उसके पास उपलब्ध हैं उनका ही इस्तेमाल ऐसे संकट में अच्छी तरह से कैसे किया जाए. सरकार भले ही तर्क दे कि यह तो अचानक आई आफत थी, पर सच यह है कि यह आपदा न तो दबे पांव आई थी और न ही उत्तराखंड ने ऐसी आपदा पहली बार देखी है. यहां बादल फटने और भूस्खलन का इतिहास रहा है. फिर मौसम विभाग ने पहले ही चेतावनी के संकेत दे दिए थे. प्रकृति ने भी कई इशारे करते हुए धीरे-धीरे ही विकराल रूप धारण किया था. पर न तो समय रहते चेता गया और न ही आपदा के शुरुआती दिनों में सरकार ने पर्याप्त गंभीरता दिखाई. नतीजा सबके सामने है. केदारनाथ की घटना भले ही 16-17 जून को हुई हो लेकिन 13 जून से ही पहाड़ों में भारी बारिश से हजारों यात्रियों का जगह-जगह फंसना शुरू हो गया था. समय से 15 दिन पहले उत्तराखंड पहुंच गए मानसून की मोटी बौछारों ने माहौल में चिंता घोल दी थी. 15 जून को मौसम विभाग ने फिर अगले 48 से लेकर 72 घंटों तक भारी वर्षा की भविष्यवाणी कर दी थी. ऐसा ही हुआ भी. 15 जून की शाम तक ही नदियां उफान पर आ गई थीं और रुद्रप्रयाग जिले में फाटा, रामपुर, सीतापुर आदि जगहों पर टूट-फूट और जनहानि की घटनाएं दर्ज होने लगी थीं. लेकिन आपदा के सारे संकेतों के बावजूद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा 16 जून को दिल्ली के लिए रवाना हो गए. उसी दिन दोपहर बाद उत्तरकाशी में भागीरथी के उफनते पानी ने नदी किनारे बने चार-चार मंजिला घरों को ध्वस्त करना शुरू कर दिया. 16 जून की ही रात साढ़े आठ बजे भारी बारिश के बाद आए पानी के सैलाब ने केदारनाथ के एक हिस्से को तो बहाया ही, उससे सात किमी नीचे रामबाड़ा और 14 किमी नीचे गौरीकुंड का बड़ा हिस्सा भी साफ कर दिया. सूत्र बताते हैं कि पानी और मलबे के इस पहले वेग ने ही केदारनाथ से लेकर 20 किमी नीचे घाटी में बसे सीतापुर तक मरने वालों का आंकड़ा तीन अंकों में पहुंचा दिया था. कई पुल और मकान बह गए थे. इन सभी घटनाओं की सूचना जिला प्रशासन और प्रदेश सरकार को थी. रामबाड़ा से रात को अंतिम बार पुलिस वायरलेस से संपर्क हुआ था. यात्रियों ने भी अपने-अपने घरों में इस जलजले की सूचना पहुंचा दी थी. भागीरथी, उसकी सहायक नदियों और मंदाकिनी नदी से हो रहे विनाश की खबरों से स्थानीय लोगों, यात्रियों और उनके परिजनों की बेचैनी बढ़ रही थी. उफनाई अलकनंदा, मंदाकिनी, भागीरथी और असीगंगा नदियां खतरे के निशानों से कई मीटर ऊपर बह रही थीं. इन सबसे मिलकर बनने वाली गंगा हरिद्वार में खतरे के निशान से ऊपर बह रही थी. 16 जून तक राज्य में 123 सड़कों के टूटने की सरकारी सूचना थी. लेकिन इस सबसे निर्लिप्त मुख्यमंत्री बहुगुणा देश की राजधानी दिल्ली में बैठकर प्रदेश का हाल-चाल ले रहे थे. 17 जून को वे देहरादून वापस आए. उस दिन सुबह करीब आठ बजे तक जल प्रलय से केदारनाथ और उसके नीचे के क्षेत्र पूरी तरह से तबाह हो गए थे. लेकिन उस दिन हुई राज्य मत्रिमंडल की बैठक में मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के सहयोगी मंत्रियों से इस जल प्रलय से हुई तबाही पर कोई चर्चा नहीं की. इससे लगता है कि मुख्यमंत्री इस आपदा से या तो खुद ही निपटना चाहते थे या वे अपने सहयोगियों की राय को महत्वहीन समझते हैं. यही नहीं, प्रत्येक राज्य की सरकार हर दिन केंद्रीय गृह मंत्रालय की आपदा प्रबंधन डिवीजन को उस दिन राज्य में हुई आपदाओं और फौरी नुकसान की सूचना भेजती है. रिकॉर्ड बताते हैं कि 16 और 17 जून को उत्तराखंड सरकार ने राज्य में आपदा से जान-माल की कोई हानि नहीं दिखाई है. राज्य में 17 जून तक केदारनाथ तबाह हो गया था. फिर भी राज्य सरकार क्यों ये सूचनाएं नहीं भेज रही थी या छिपा रही थी, कोई नहीं जानता. 17 जून तक केदारनाथ पूरी तरह तबाह हो गया था लेकिन उस दिन हुई राज्य मत्रिमंडल की बैठक में मुख्यमंत्री ने इस विषय पर कोई चर्चा नहीं की 18 जून को मौसम साफ हो गया था. राज्य सरकार के एक मंत्री और कुछ अधिकारी केदारनाथ की हवाई यात्रा करके देहरादून पहुंच गए थे. उनके द्वारा दी गई तस्वीरों से केदारनाथ की तबाही की खबर सार्वजनिक हो गई थी. इतनी बड़ी तबाही देखकर कई राज्यों के अधिकारी उसी दिन शाम तक देहरादून पहुंच गए थे और किसी भी तरह अपने प्रदेश से आए यात्रियों से संपर्क बनाने की कोशिश में लगे थे. लेकिन दूसरी ओर उत्तराखंड सचिवालय में आम दिनों की तरह ही कामकाज दिख रहा था. आपदा प्रबंधन विभाग से जुडे़ शासन के एक अधिकारी अकेले बचाव, राहत और समन्वय की जिम्मेदारी तो देख ही रहे थे, अपने मोबाइल पर कई राज्यों के लोगों की आशंकाएं भी शांत कर रहे थे. यानी देश-दुनिया को परेशान करने वाली आपदा के बचाव और राहत कार्य में न तो अतिरिक्त अधिकारी ही लगाए गए थे और न ही कर्मचारी. अगले दो दिन तक राज्य आपदा प्रबंधन केंद्र का यही हाल रहा. 18 जून को ही मुख्यमंत्री ने केदारनाथ और उत्तरकाशी के आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बजाय राजधानी देहरादून में अपने प्रिय दो विधायकों के क्षेत्रों में ढहे पुश्तों का जायजा लेना उचित समझा. 19 जून को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आपदाग्रस्त इलाकों के हवाई सर्वेक्षण से पहले बहुगुणा ने पहली बार आपदा प्रभावित क्षेत्रों में से कुछ का हवाई दौरा किया. उस दिन राज्य के एक बड़े अधिकारी ने हवाई सर्वेक्षण करने के बाद बचाव कार्य और फंसे हुए लोगों को निकालने की रणनीति बताने के बजाय यह बयान दिया कि उन्होंने सारे प्रदेश का दौरा कर लिया है और केंद्र के साथ हुई बैठक में राहत और पुनर्निर्माण के लिए तीन हजार करोड़ रु का प्रस्ताव भेज दिया है. इस बयान से समझा जा सकता है कि उस दिन राज्य सरकार की प्राथमिकता क्या थी. दरअसल उत्तराखंड में आपदा राहत के लिए केंद्र से ज्यादा से ज्यादा धन मांगने और वह धन आने के बाद उसकी बंदरबांट का पुराना और हर पार्टी का इतिहास है. प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी के दौरे और अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों-मंत्रियों-अधिकारियों के देहरादून में डेरा डालने से उत्तराखंड सरकार थोड़ी हरकत में तो आई, लेकिन उसके पास बचाव और राहत कार्य संचालित करने की न तो कोई निश्चित रूपरेखा थी और न कोई प्रबंधन तंत्र. तब तक दिल्ली में केंद्र सरकार की हाई पावर कमेटी सहित कई बैठकें हो चुकी थीं. कांग्रेस पार्टी के दिग्गज भी दिल्ली में बैठक कर चुके थे. लेकिन उत्तराखंड में मुख्यमंत्री अपने दो सहयोगियों और एक बड़े अधिकारी के साथ ही आपदा से निपटने की कोशिश में लगे थे. आपदा के बाद अभी तक एक बार भी राज्य में बड़े निर्णय लेने के लिए कैबिनेट बैठक नहीं हुई. ये मंत्री और कुछ विधायक हेलीकाप्टरों में यहां-वहां उड़ कर महत्वपूर्ण समय और संसाधन बर्बाद कर रहे थे. इन्हीं दिनों दुर्गम पहाड़ों में मौत से जूझती हजारों जानें बचने की एक आस में ऊपर उड़ रहे इन हेलीकाप्टरों को टुकुर-टुकुर देख रही होंगी. 20 जून की रात मुख्यमंत्री ने कैबिनेट के कुछ सहयोगियों से अलग-अलग जिलों की कमान संभालने को कहा. वे 21 जून तक ही प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंच पाए. तब तक पांच दिन बीत चुके थे. राजनीतिक नेतृत्व की तरह प्रशासनिक नेतृत्व भी सुस्त और दिशाहीन दिखा. 18 जून को केदारनाथ की स्थिति देखने के बाद रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी बीमार होकर देहरादून स्थित अस्पताल में भर्ती हो गए थे. अगले चार दिन तक जिला बिना जिलाधिकारी के ही रहा. उनका काम देखने के लिए ऐसा कोई प्रशासनिक अधिकारी तैनात नहीं किया गया जो अनुभवी हो और प्रशासन, सेना, आईटीबीपी और केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से समन्वय की क्षमता रखता हो. नतीजतन कि सारी व्यवस्थाएं चरमरा गईं और सूचना तंत्र फेल हो गया. सेना और आईटीबीपी युद्ध-स्तर पर बचाव का काम तो कर रही थी, लेकिन कौन फंसा है, कौन आ गया, किसे अस्पताल भेजा गया है, कौन मर गया है, यह बताने के लिए कोई व्यवस्था नहीं बन पाई. केदारनाथ, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, फाटा और गुप्तकाशी में पांच दिन तक कोई डिप्टी कलेक्टर तक तैनात नहीं किया गया जो राजधानी देहरादून तक सही स्थिति बताता और उसके अनुसार आगे की योजना तय होती. देश-दुनिया में इतने शोर के बाद भी प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व और शीर्ष नौकरशाही की आंख नहीं खुल रही थी. सूत्र बताते हैं कि आपदा के पहले ही दिन से राज्य के कई युवा अधिकारी आगे बढ़कर आपदाग्रस्त क्षेत्रों में जाकर काम करने की इच्छा अपने बड़े अधिकारियों को बता चुके थे , लेकिन उनसे काम लेने को कोई तैयार ही नहीं था. उत्तरकाशी स्थित दुनिया भर में चर्चित नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में ऊंचे हिमालयी इलाकों में बचाव और राहत का विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है. जब 18 जून तक यहां कोई सरकारी आदेश नहीं पहुंचा तो संस्थान के अधिकारी खुद ही प्रशिक्षकों सहित 110 बचाव विशेषज्ञों की सूची लेकर जिलाधिकारी के पास गए और उनसे बचाव कार्य में लगने की इजाजत मांगी. इसके बाद उन्होंने जिले के अलग-अलग इलाकों से करीब 46 विदेशियों सहित करीब 6,500 लोगों को बचाया. साफ था कि सरकार अपने ही संसाधनों की अहमियत से अनजान थी. अव्यवस्था और देश भर में हो रही बदनामी के बीच केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने माना कि समन्वय में कमी है. इस बीच केंद्र ने आपदाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन की मदद के लिए कुछ युवा परिवीक्षाधीन अधिकारी भेजे. इतना सब होने के बाद 21 जून की शाम शासन ने राज्य के 12 युवा अधिकारियों को अलग-अलग आपदाग्रस्त क्षेत्रों में नोडल अधिकारियों के रूप में तैनात करने के आदेश जारी किए. ये अधिकारी 22 जून की रात या 23 जून दोपहर तक किसी तरह इन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंचे. तब तक तबाही हुए छह दिन बीत गए थे, लोगों को बचाने और उनके परिजनों को सांत्वना व सूचना देने का समय जा चुका था. आपदा कभी शोर मचा कर नहीं आती, लेकिन राजनीतिक और प्रशासनिक गंभीरता से उसकी आहट सुनी जा सकती है. उससे निपटने की तैयारी पहले से की जा सकती है. इस बार भी राज्य में ही मौजूद संसाधनों के जरिये अविलंब मदद पहुंचाकर कई जिंदगियां बचाई जा सकती थीं. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस बात का जवाब किसी के पास नहीं कि संकट की ऐसी घड़ी में उत्तराखंड की सरकार को अहम निर्णय लेने में पांच-छह दिन क्यों लगे. अब यह हाल था तो आम दिनों में वह कैसे काम करती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है.

नाम का मनरेगा!

राजधानी भोपाल के सीहोर रोड पर बन रही एक गगनचुंबी इमारत के नीचे कुछ मजदूर परिवारों ने ईंटों की अस्थायी चारदीवारी बना ली है. इन्हें अंदाजा है कि वे कुछ महीनों तक यहीं रहेंगे. ठीक से हिंदी न बोल पाने वाले ये सभी लोग धार जिले की डही जनपद पंचायत के भिलाला आदिवासी हैं और अपने घर में भूखों मरने से बचने के लिए 500 किलोमीटर का सफर तय करके यहां तक पहुंचे हैं. मार्च के बाद प्रदेश में खेतीबाड़ी के काम बंद हो जाते हैं. इसके बाद मजदूरों को काम की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है. कुछ सालों पहले तक इन दिनों में निमाड़, मालवा सहित बाकी आदिवासी अंचल के लाखों लोग पड़ोसी राज्य गुजरात और महाराष्ट्र के बड़े शहरों की ओर कूच कर जाते थे. किंतु महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गांरटी योजना आने के बाद उनका हर साल का यह क्रम टूट गया. उन्हें गांव में ही काम मिलने लगा. इसीलिए पिछले छह साल में प्रदेश से अप्रैल, मई और जून के महीनों में होने वाला पलायन रुक-सा गया था. धार जिले के डही पंचायत के ही सुगरलाल बताते हैं कि उनके लिए यह योजना मुसीबत के दिनों में घर चलाने का अच्छा जरिया बन गई थी. मगर इस साल एक अप्रैल के बाद से उनकी पंचायत में किसी को एक दिन का भी काम नसीब नहीं हुआ. इसलिए एक बार फिर आस-पास के गांव के गांव खाली हो गए हैं. दरअसल मध्य प्रदेश में सतपुड़ा और विंध्याचल की पहाड़ियों के बीच बसे लाखों लोगों के लिए काम की उम्मीद जगाने वाली मनरेगा इस वित्तीय वर्ष में अकाल मौत के मुंह में चली गई है. हालत यह है कि जिन महीनों में कई सौ करोड़ रुपये खर्च होने चाहिए थे, उनमें यह आंकड़ा अभी तक पचास करोड़ रुपये तक भी नहीं पहुंचा. नतीजा यह कि मनरेगा से बेदखल लोग जिंदा रहने के लिए सालों पुरानी परंपरा यानी पलायन पर लौट आए हैं. आधे दशक के बाद प्रदेश के लाखों मजदूर काम की तलाश में अब फिर से इधर-उधर भटक रहे हैं. मध्य प्रदेश पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं. लेकिन तहलका के पास मौजूद विभाग की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े काफी चौंकाने वाले हैं. बीते साल अप्रैल से जून तक मनरेगा में 12 सौ करोड़ रुपये खर्च हुए थे. इस साल सरकार ने इस अवधि के लिए अनुमानित राशि 16 सौ करोड़ रुपये रखी थी. पर हैरानी की बात है कि इस साल अप्रैल से अब तक मप्र के सभी 50 जिलों में 25 करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हुए. दूसरे शब्दों में मनरेगा के तहत हर साल इन तीन महीनों में खर्च की जाने वाली राशि का यह दो प्रतिशत पैसा भी नहीं है. ऐसा तब है जब बीते साल धार और बालाघाट जैसे एक-एक आदिवासी जिले में सौ-सौ करोड़ रुपये का काम हुआ था. यही वजह है कि इस बार मनरेगा का पैसा गांवों तक नहीं पहुंचने से जहां गांवों में विकास का काम ठप पड़ा है वहीं जिस संख्या में ग्रामीण गांवों से पलायन कर रहे हैं उसे भांपते हुए विभाग के होश उड़ गए हैं. लिहाजा बीती 27 मई को विभाग आयुक्त ने सभी कलेक्टरों को यह फरमान भेजा है कि वे कैसे भी राज्य के 20 लाख मजदूरों को पलायन से रोकें. सवाल उठता है कि बीते सालों तक जो योजना ठीक-ठाक चल रही थी वह यह साल शुरू होने से पहले ही ठप क्यों हो गई. दरअसल ऐसा हुआ राजधानी भोपाल में बैठे चंद अदूरदर्शी नौकरशाहों के चलते. इन्होंने मनरेगा को हाईटेक बनाने के लिए इस साल जनवरी में बिना तैयारी के सभी जिलों में ई-वित्तीय प्रबंधन लागू कर दिया. इसके लिए उन्हें लाखों मजदूरों के खातों को न केवल राष्ट्रीयकृत बैंक से जुड़वाना था बल्कि उन खातों को ‘नरेगा सॉफ्ट’ नामक सॉफ्टवेयर में डलवाते हुए सभी का ई-मस्टर (कम्प्यूटर पर मजदूर की मजदूरी का ब्योरा) बनवाना था. प्रदेश में मनरेगा के 50 लाख से ज्यादा मजदूर हैं, इस लिहाज से एक जिले के एक लाख मजदूरों के खाते बैंकों में खुलवाना इतना बड़ा काम था जिसे कुछ दिनों में कर पाना संभव नहीं था. यह सारा काम मार्च तक हो जाना था, लेकिन नहीं हुआ. इस तरह योजना का सारा काम रुक गया और इसका खामियाजा बेकसूर मजदूरों को भुगतना पड़ा. प्रदेश में इसके पहले 13वें वित्त आयोग और राज्य वित्त आयोग की राशि ग्राम पंचायतों को सौंपी जाती थी और पंचायतें ग्रामसभा के जरिए निर्माण कार्य कराती थीं. मगर अब जबकि मनरेगा सहित सभी कामों के वित्तीय अधिकार से सरपंचों को बेदखल किया जा चुका है तो उनमें असंतोष है और इसलिए उन्होंने मार्च के बाद से मनरेगा से खुद को अलग कर लिया है. इसके पहले मनरेगा के मामले में मध्य प्रदेश अव्वल राज्यों में गिना जाता था. बालाघाट, बैतूल और अनूपपुर जैसे जिलों को प्रधानमंत्री ने उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए अवॉर्ड भी दिया था. आज इन्हीं जिलों के लाचार मजदूर अधिकारियों से काम की गुहार लगा रहे हैं. इस मुद्दे पर कोई भी आला अधिकारी आधिकारिक जवाब नहीं देना चाहता. पंचायत और ग्रामीण मंत्री गोपाल भार्गव इस बारे में विभाग की अतिरिक्त प्रमुख सचिव अरुणा शर्मा से संपर्क साधने को कहते हैं. शर्मा मानती हैं कि मनरेगा के मामले में प्रदेश पिछड़ गया है. वे कहती हैं, ‘आने वाले दिनों में इसकी भरपाई कर ली जाएगी.’ सवाल है कि भरपाई होगी कैसे. आने वाले तीन महीने बारिश में निकल जाएंगे और उसके बाद का समय चुनावी सरगर्मियों में जाएगा. वहीं एक वर्ग की सोच है कि मनरेगा में मनमानी, कामचोरी और अनियमितताओं के चलते भी राज्य में यह योजना बैठ गई. दिल्ली में बहस चल रही है कि मनरेगा के चलते किसानों को खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते. जबकि राज्य में मनरेगा इतना फटेहाल है कि मजदूर मनरेगा में काम करने के बजाय शहर जाना चाहता है. बड़वानी में काम करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता माधुरी कृष्णास्वामी बताती हैं कि मनरेगा में मजदूरों को एक तो आधा-अधूरा पैसा बांटा जाता है और उस पर भी यह उन तक छह महीने के बाद तक पहुंचता है. वे कहती हैं, ‘बीते कुछ सालों में ही मनरेगा में मजदूर आदिवासियों की तेजी से घटती संख्या उनका मोहभंग दिखाती है.’ मनरेगा के चलते बीते सालों तक मप्र के 52 हजार गांवों में सालाना साढ़े तीन हजार करोड़ रुपये आते थे. इसलिए यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अहम धुरी बन गई थी. भले ही यह पैसा मजदूरों के खातों से निकलकर छोटे-छोटे दुकानदारों तक पहुंचता था, लेकिन धनराशि का यह चक्र करीब दो करोड़ आबादी के बीच चलता था. इन दिनों यदि यह पैसा दिल्ली से प्रदेश के गांवों तक पहुंचता तो न केवल मजदूर परिवारों को काम मिलता बल्कि उनके खर्च की क्षमता भी बढ़ती. और इसका असर तीज-त्योहार और हाट बाजारों पर पड़े बिना नहीं रहता. लेकिन ऐसा नहीं होने से ग्रामीण इलाके के हाट बाजारों में जहां पिछले साल के मुकाबले लाखों रुपये की कम खरीदी हुई है वहीं इन बाजारों की रौनक भी उड़ी हुई है.

नेटवर्क के जरिए नक्सलवाद से लोहा

कहने को जम्मू-कश्मीर और छत्तीसगढ़ में 2,100 किलोमीटर का फासला हो, लेकिन वे इस मायने में एक जैसे हैं कि दोनों ही लंबे समय से अलगाववादी हिंसा की मार झेल रहे हैं. जम्मू-कश्मीर ने जहां आतंकियों से निपटने में मोबाइल फोन नेटवर्क का कुशलता से इस्तेमाल किया है वहीं छत्तीसगढ़ और दूसरे नक्सल प्रभावित राज्य अभी इस मामले में काफी पीछे हैं. अब केंद्र सरकार अपनी नक्सल विरोधी रणनीति के तहत इस कमी को दूर करने की योजना बना रही है. इसके तहत नौ नक्सल प्रभावित राज्यों में करीब 2,200 मोबाइल टावर लगाने की योजना है. ये टावर उन इलाकों में लगाए जाएंगे जो अभी तक किसी भी तरह के मोबाइल नेटवर्क के कवरेज से बाहर रहे हैं. गृह मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक यह परियोजना सुरक्षा बलों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी जिन्हें घने जंगलों की मौजूदगी वाले करीब 80 नक्सल प्रभावित जिलों में नक्सलियों का पता लगाने में बहुत मुश्किल होती है. दरअसल यह जम्मू-कश्मीर में किए गए प्रयोग की सफलता दोहराने की कोशिश है. 2003 में जब केंद्र ने इस राज्य में मोबाइल फोन सेवा शुरू करने का फैसला किया था तो सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों ने इसका काफी विरोध किया था. उन्होंने चेतावनी दी थी कि मोबाइल फोन से आतंकियों को फायदा होगा जो इसका इस्तेमाल बम धमाकों और आतंकी हमलों के बेहतर समन्वय के लिए करेंगे. ऐसा हुआ भी. मोबाइल सेवा का इस्तेमाल करके आतंकियों ने कई हमले किए, लेकिन जल्द ही यह रणनीति उल्टे उन पर भारी पड़ने लगी. श्रीनगर के एक सुरक्षा विशेषज्ञ बताते हैं, 'आतंकियों के मोबाइल सिग्नल और उनकी आपसी बातचीत रिकॉर्ड करके सुरक्षा बलों ने ज्यादातर आतंकियों का सफाया कर दिया. यानी आखिरकार तकनीक ने हमें ही फायदा पहुंचाया.' आज घाटी में हाल यह है कि सक्रिय आतंकियों की संख्या 100 से भी कम रह गई है. 2003 में यह हजारों में थी. हाल की बात करें तो 2011 में मोबाइल फोन की वजह से ही सुरक्षा बलों को लश्कर-ए-तोएबा और जैश-ए-मोहम्मद के कुख्यात आतंकियों अब्दुल्ला उनी और हमाद तक पहुंचने में आसानी हुई और ये दोनों ही अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए. 2012 में मोबाइल फोन नेटवर्क की निगरानी के चलते अब्दुल राशिद शिगन नाम के पुलिसकर्मी की गिरफ्तारी मुमकिन हुई. अब्दुल ने अपने एक साथी के साथ मिलकर एक ग्रुप बनाया था और इसने सुरक्षा बलों पर 13 बार हमले किए थे. अब सरकार को उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ सहित तमाम नक्सल प्रभावित राज्यों में भी मोबाइल कवरेज बढ़ाने से कुछ ऐसे ही नतीजे आएंगे. सूत्र बताते हैं कि टावर लगाने के लिए करीब 2,200 लोकशन भी तय कर लिए गए हैं और अगर यह योजना पूरी तरह से लागू होती है तो इस पर करीब तीन हजार करोड़ रु का खर्च आएगा. छत्तीसगढ़ में ऐसे करीब 500 लोकेशन हैं. संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी राज्यमंत्री किल्ली कृपारानी ने हाल ही में संसद को जानकारी दी कि प्रस्तावित 2,200 लोकेशनों में से 363 पर भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) मोबाइल टावर लगा भी चुका है. छत्तीसगढ़ में बीएसएनएल ऐसे 351 नए टावरों को स्वीकृति दे चुका है. टावर लगाने के लिए 2000 या उससे ज्यादा आबादी वाले गांव चुने गए हैं.' गौरतलब है कि गरीब और दुर्गम नक्सल प्रभावित इलाकों में पड़ने वाले ज्यादातर गांवों में मोबाइल सेवा नहीं है. इसकी एक वजह यह भी है कि निजी ऑपरेटरों को लगता है कि ये इलाके बिक्री के लिहाज से उतने फायदेमंद नहीं हैं. लेकिन जब नवंबर, 2011 में शीर्ष माओवादी नेता किशनजी को एक मुठभेड़ में मार गिराया गया और इसमें मोबाइल फोन के जरिए हुई निगरानी ने अहम भूमिका निभाई तो सरकार को समझ में आ गया कि अगर इन इलाकों में मोबाइल सेवा का विस्तार किया जाए तो इससे नक्सलवाद से निपटने में काफी मदद मिल सकती है. इसके बाद तुरंत ही नक्सल प्रभावित राज्यों में 500 से ज्यादा नए मोबाइल टावर लगाए गए. हाल के समय में जिस तरह नक्सली मोबाइल टावरों को भी निशाना बनाते रहे हैं उससे भी साफ होता है कि उन्हें इनसे खतरा महसूस होता है. उन्हें डर है कि स्थानीय लोग उनकी गतिविधियों की सूचना देने के लिए मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर सकते हैं जिससे सुरक्षा बलों को सटीक कार्रवाई में मदद मिल सकती है. आंकड़े उनके इस डर की गवाही देते हैं. एक अनुमान के मुताबिक 2008 में नक्सलियों ने 38 टावर उड़ाए थे जबकि 2011 में यह संख्या 71 हो गई. इसीलिए गृह मंत्रालय नक्सलवाद से निपटने में मोबाइल नेटवर्क के इस्तेमाल की सोच रहा है. सूत्रों के मुताबिक पिछले कुछ समय से मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट से हो रहे संवाद पर निगरानी की एक एकीकृत व्यवस्था बनाने की दिशा में काम हो रहा है. हाल ही में 400 करोड़ रु की लागत से एक केंद्रीय निगरानी व्यवस्था बनाई गई है. इसकी मदद से केंद्रीय और राज्यों की खुफिया एजेंसियां कॉल रिकॉर्ड, संदेश और ईमेल प्राप्त कर सकेंगी और स्रोत एक ही होने की वजह से इस जानकारी में पहले से ज्यादा स्पष्टता होगी. इस व्यवस्था की मदद से मोबाइल फोनों और इंटरनेट से जुड़े कंप्यूटरों के लोकेशन का भी पता लगाया जा सकेगी. साफ है कि जितना ज्यादा नक्सल प्रभावित इलाका मोबाइल कवरेज में लाया जाएगा उतनी नक्सलियों की गतिविधियों के बारे में पुख्ता जानकारी मिलने की उतनी ही अधिक संभावना होगी. हालांकि एक वर्ग इस पहल पर चिंता जता रहा है. कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि मोबाइल फोन को बाकी देश से कटे गरीब आदिवासियों से संवाद बढ़ाने के बजाय नक्सल विरोधी रणनीति के हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है जो गलत है. दिल्ली स्थित एशियन सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स से जुड़े सुहास चकमा को लगता है कि सरकार अब तक विकास और नक्सलवाद के रिश्ते को ठीक से नहीं समझ पाई है. वे कहते हैं, 'इतने बड़े बुनियादी ढांचे को सिर्फ माओवादियों को ढूंढ़ने के लिए इस्तेमाल करना सिर्फ पैसे की बर्बादी होगी.' पूर्व पत्रकार और मोबाइल आधारित एक समाचार सेवा सीजीनेटस्वर चलाने वाले शुभ्रांशु चौधरी कहते हैं, 'आदिवासी भारत और मुख्यधारा के बीच कोई संवाद नहीं है. मोबाइल फोन इस खाई को पाटने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं. अगर वे सिर्फ नक्सल विरोधी अभियानों के लिए इस्तेमाल होंगे तो मुझे पता नहीं कि इसका कितना फायदा होगा.' छत्तीसगढ़ में सात साल बिता चुके और माओवादी समस्या को काफी नजदीक से देखने वाले चौधरी के मुताबिक छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के लिए बाकी देश को अपनी आवाज सुनाना बहुत मुश्किल है. वे कहते हैं, 'ब्यूरोक्रेटों या नेताओं के अलावा राज्य में काम कर रहे ज्यादातर पत्रकार भी उनकी भाषा यानी गोंडी नहीं समझते. इसलिए जब लोग आदिवासी इलाकों से रिपोर्टिंग की कोशिश करते हैं तो ज्यादातर मौकों पर उन्हें उन लोगों द्वारा दी गई जानकारी से काम चलाना पड़ता है जो थोड़ी हिंदी या अंग्रेजी जानते हैं. इसलिए उन रिपोर्टों में उनकी अपनी आवाज नहीं होती.' हालांकि चौधरी को उम्मीद है कि नक्सल विरोधी रणनीति के तहत ही सही, इन इलाकों में मोबाइल सेवा बढ़ेगी तो इसका फायदा सुरक्षा एजेंसियों के अलावा आम आदिवासी को भी होगा जिसकी आवाज सुने जाने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी.

गुरुवार, 14 मार्च 2013

अफसरों के आगे पंगू बने सात मंत्री

भोपाल। प्रदेश सरकार में 7 मंत्री ऐसे हैं जिन्हें पद और प्रतिष्ठा तो मिला है लेकिन उनके पास करने के लिए कोई काम नहीं हैं। ऐसा भी नहीं है कि विभाग के पास काम नहीं है। विभागों में काम की भरमार है,लेकिन अधिकारी स्व-विवेक से फाइलें निपटा देते हैं और मंत्री को पता ही नहीं चलता है। हां,मंत्रियों को विधानसभा में सवालों के उत्तर देने की आजादी तो मिलती है, लेकिन महत्वपूर्ण फैसले और फाइलों के मामलों में ऐसा नहीं होता। हाल ही में दो मंत्रियों की जिम्मेदारी भी बढ़ाई गई, लेकिन इनके पास फाइलें ही नहीं पहुंच रही हैं। पर्यटन, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री तुकोजीराव पवार के बीमार होने के कारण मुख्यमंत्री ने इनके विभागों की जिम्मेदारी राज्यमंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह को दे दी। लोक सेवा प्रबंधन विभाग का स्वतंत्र प्रभार संभाल रहे मंत्री सिंह के पास किसान कल्याण तथा कृषि विभाग की जिम्मेदारी पहले से ही है। इसी प्रकार अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण विभाग के राज्यमंत्री हरिशंकर खटीक को घुमक्कड़ एवं अर्धघुमक्कड़ विभाग की जिम्मेदारी भी दी गई है। इसके पहले इस विभाग की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री स्वयं संभाल रहे थे। इन्हें इस विभाग की जिम्मेदारी तो मिल गई, लेकिन महकमे की फाइलें इनके पास नहीं पहुंच रही हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति खेल एवं युवा कल्याण विभाग की है। यहां की महत्वपूर्ण फाइलें मुख्यमंत्री के पास ही जाती हैं। इतना जरूर है कि विधानसभा सत्र के दौरान विधायकों के सवाल देने के लिए इन्हें अधिकृत किया गया है। इनके पास भी पॉवर की कमी पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग राज्य मंत्री देवी सिंह, परिवहन, जेल एवं गृह राज्यमंत्री नारायण सिंह कुशवाह, वन एवं राज्यमंत्री जयसिंह मरावी, स्कूल शिक्षा राज्यमंत्री नानाभाऊ मोहोड़, नगरीय प्रशासन राज्यमंत्री मनोहर ऊंटवाला ऐसे राज्यमंत्रियों में शुमार हैं, जिनके पास अधिकाों की कमी है। इसमें से कुछ मंत्री तो ऐसे हैं, जिनके पास विभागों की फाइलों ही नहीं पहुंचती हैं। कैबिनेट मंत्रियों की गैर मौजूदगी में इन्हें विधानसभा मे विधायकों के सवालों का जवाब देने का मौका जरूर मिल जाता है। इनके पास कोई जिम्मेदारी नहीं लंबे समय से बीमार चल रहे कैबिनेट मंत्री तुकोजीराव के पास अब सरकार में किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी नहीं है। मुख्यमंत्री इनके विभाग खेल एवं युवा कल्याण जिम्मेदारी किसान कल्याण एवं कृषि राज्यमंत्री बृजेन्द्र प्रताप सिंह को पहले ही दे चुके हैं, अब इनके प्रभार का जिला दतिया की जिम्मेदारी भी बृजिन्द्र प्रताप सिंह को दे दी गई है। शनिवार को इस संबंध में अधिसूचना जारी कर दी गई है। इस तरह सिंह अब कैबिनेट में सबसे अधिक जिलों के प्रभारी मंत्री हो गए हैं। मालूम हो कि इसके पास होशंगाबाद औरा रायसेन जिले का प्रभर प्रहले से ही है, दतिया की जिम्मेदारी मिलने के बाद अब ये तीन जिलों के प्रभारी मंत्री हो गए हैं।

जनता को ढ़ूंढऩे निकलेंगे मंत्री

भोपाल। प्रदेश में भाजपा की सत्ता की हैट्रिक को लेकर टीम शिवराज और टीम तोमर भले ही आश्वस्त हो लेकिन आलाकमान किसी भी गफलत में नहीं रहना चाहता है। इसलिए उसने प्रदेश संगठन को निर्देश दिया है कि विधानसभा के बजट सत्र के बाद मंत्रियों को उनके विधानसभा क्षेत्र और प्रभार वाले जिलों में सघन जनसंपर्क करने की कार्ययोजना तैयार करे। संगठन से निर्देश मिलते ही मंत्री मंत्रालय छोड़ जनता को ढूंढऩे(कौन सरकार से खुश है और कौन नाखुश)निकल पड़ेंगे। महाजनसंपर्क अभियान की रिपोर्ट के बाद बनेगी कार्ययोजना 20 फरवरी को महाजनसंपर्क अभियान की समाप्ति के बाद संगठन अपने रणनीतिकारों के साथ बैठ कर कार्ययोजना तैयार करेगा। कार्ययोजना में क्षेत्र की समस्या और उसके समाधान,जनता की भाजपा से नाराजगी की वजह, कांग्रेस की क्षेत्र में स्थिति और कांग्रेस के प्रभाव को कम करने के उपायों का भी समावेश रहेगा। उल्लेखनीय है कि प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार ने भी मंत्रियों और विधायकों को फील्ड में रहने की हिदायत दी थी। शिव,तोमर और मेनन पर दारोमदार आगामी विधानसभा चुनाव में संघ और संगठन के विभिन्न सर्वे में कई मंत्रियों और विधायकों की स्थिति पतली बताई गई है। इससे भाजपा में चिन्ता की लकीरें हैं। पार्टी के माथे पर बल लगातार गहरा हो रहा है। मुख्यमंत्री भले ही कितने भी लोकप्रिय क्यों न हो किन्तु सत्ता विरोधी रुझान कम नहीं हो रहा। इसके अलावा विधायकों के प्रति नाराजगी भी बढ़ती जा रही है। पार्टी के आंतरिक सर्वे ने प्रदेश नेतृत्व को सोचने पर मजबूर कर दिया है। इस सर्वे में परम्परागत सीटें छोड़ कर बाकी जगह प्लस-मायनस का गुणा भाग सामने आया है। इन सीटों पर भाजपा को मजबुत करने का दारोमदार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान,प्रदेश अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर और संगठन मंत्री अरविंद मेनन पर है। ब्रांड शिवराज को भुनाने के लिये विशेष कार्य योजना मुख्यमंत्री के कुछ विश्वस्त अफसरों व पार्टी नेताओं ने बनाई है। परदे के पीछे कार्य करने वाले दो भाजपा पदाधिकारियों की देखरेख में जो रणनीति बनाई गई है उसके अनुसार मुख्यमंत्री निकट भविष्य में पूरे प्रदेश का दौरा करेंगे। इस दौरान सभी 230 विधानसभा क्षेत्र का जायजा लिया जायेगा। शहर से ज्यादा प्राथमिकता ग्रामीण इलाके को दी जायेगी। मुख्यमंत्री की इस यात्रा के दौरान तोमर और मेनन भी रहेंगे। मिशन 2013 के लिए टारगेट फिक्स प्रदेश में मिशन 2013 के लिए आलाकमान ने टारगेट फिक्स कर दिया है। उसने प्रदेश के नेताओं को एक लाइन की यह हिदायत दी है कि हर हाल में इस बार प्रदेश में सत्ता बरकरार रखना है। यही वजह है कि महाजनसंपर्क अभिायान के बाद उसने मंत्रियों को मैदानी मोर्चा संभालने का निर्देश दिया है। प्रदेश में उसे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर ही भरोसा है। कई मंत्रियों की विवादस्पाद कार्यशैली से वह बेहद खफा हैं। इसीलिए उसने मंत्रियों से कह दिया है कि वे अब मंत्रालयों में बैठकर अपना वक्त जाया नहीं करें बल्कि निर्वाचन क्षेत्रों में पहुंचकर जनता के दुखदर्द की फेहरिस्त बनाएं। भाजपा के मंत्रियों ने इसे टारगेट 2013 नाम दिया है। मंत्रियों को हिदायत दी गई है कि वे सरकार की उपलब्धियों से जनता को अवगत कराएं। कुछ मंत्री इस काम को आसानी से अंजाम देने में सक्षम हैं, लेकिन दिक्कत आएगी उन मंत्रियों को जो मंत्री पद मिलने के बाद से ही जनता से कट गए हैं। चुनाव के सिलसिले में अब तक हुई दर्जन से ज्यादा बैठकों में विधायकों और सांसदों ने बिजली, पानी, सड़क और भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाकर अपनी-अपनी परेशानी बताई। विवादस्पद मंत्रियों और विधायकों के टिकट काटने तक की चर्चा हुई। पार्टी ने इस पर कड़े फैसले इस अंदेशे से नहीं लिए की कहीं पार्टी में बगावत न हो जाए। आखिरकार बीच का रास्ता निकाल गया जिसके तहत यह तय किया गया कि मंत्री अब मंत्रालयों में न बैठकर निर्वाचन क्षेत्रों में जाएं, जनता के सवालों का जवाब दें, उनकी समस्याओं का समाधान करें और यह देखें की चुनाव के दौरान आने वाली चुनौतियों का सामना किस तरह किया जा सकता है। यही वजह है कि मंत्रियों ने विधानसभा सम्मेलनों में रूचि दिखाई। यद्यपि इस दौरान वे जनता पर खास असर नहीं छोड़ पाए। क्योंकि क्षेत्रीय जनता ने उनके बारे में यही टिप्पणी की कि चुनाव नजदीक आते ही अब मंत्रियों और विधायकों को वोट की चिंता सताने लगी है। यह समस्या सिर्फ भाजपा के साथ ही नहीं है, कई कांग्रेसी विधायकों से भी जनता की यही शिकायतें हैं। चूंकि भाजपा सत्ता में है इसलिए उनके विधायकों और मंत्रियों पर आक्रमण ज्यादा हो रहे हैं।

विंध्य की उपेक्षा भारी न पड़ जाए भाजपा को

भोपाल। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवाने में विंध्य क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है लेकिन इस क्षेत्र के नेताओं को जितना तव्वजों कांग्रेस ने दिया है उतना भाजपा ने नहीं। यही कारण है कि विंध्य में भाजपा के पास ऐसा कोई बड़ा नाम नहीं है जिसको आगे करके पार्टी कांग्रेस के कदावर नेताओं की घेराबंदी कर सके। बावजुद इसके इस क्षेत्र की 30 विधानसभा सीटों में से 25 पर भाजपा का कब्जा है। चेहरा बदला है, समीकरण नहीं प्रदेश में भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की ओर अग्रसर है, लेकिन विधानसभा चुनाव को लेकर चुनावी रणनीति में एक बार फिर क्षेत्रीय राजनीति में भेदभाव का शिकार हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भाजपा क्षेत्रीय संतुलन नहीं बना पाई और फिर उसने पुरानी रणनीति के तहत ही कदम बढ़ाते हुए चेहरा बदला है, समीकरण नहीं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के बहाने सूबे में क्षेत्रीय संतुलन बना सकती थी, लेकिन वह इसे दरकिनार कर गई। दूसरी रूप में कहा जाए तो भाजपा में हमेशा ही की तरह मालवा और ग्वालियर क्षेत्र से बाहर अपने दायरे को बढ़ा नहीं सकी और विंध्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए कोई करिश्मा नहीं कर सकी, जबकि पार्टी की विंध्य में तो स्थिति ठीक है। यही नहीं प्रदेश संगठन की कमान नहीं मिलने के कारण विंध्य के लोगों को संगठन के अन्य पदों में भी उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। हालांकि, यह बात अलग है कि भाजपा की वर्तमान में विंध्य में 30 में से 25 सीटों पर कब्जा है, बावजूद इसके भाजपा ने विंध्य की उपेक्षा बरकरार रखी है। हालांकि, इसके पहले के चुनाव में जरूर यहां भाजपा की स्थिति पतली थी। विंध्य में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए संगठन स्तर पर भाजपा की कोई रणनीति भी नहीं दिख रही है, ऐसे में फिर उम्मीद है कि आगामी विधानसभा चुनाव में विंध्य में भाजपा को तगड़ा झटका लगे। आंकड़ों पर गौर करें तो भाजपा में अब तक मालवा और ग्वालियर संभाग का ही दबदबा रहा है। जो अनवरत जारी है। भाजपा में अभी तक सबसे ज्यादा प्रदेश अध्यक्ष की कमान 14 प्रदेश अध्यक्षों में से 8 बार मालवा को कमान मिली है, जबकि तीन बार ग्वालियर को मौका मिला है। जनसंघ के समय था विंध्य का प्रभाव प्रदेश में भाजपा से पहले जनसंघ के समय विंध्य का काफी प्रभाव था। भाजपा के आने के बाद जहां विंध्य क्षेत्र की उपेक्षा बढ़ती गई, वहीं जनसंघ के समय विंध्य के साथ ही सभी क्षेत्रों को समान प्रतिनिधित्व का अवसर मिला था। जनसंघ के दौरान मप्र में करीब 10 प्रदेश अध्यक्ष बने, जिसमें से दो बार विंध्य को मौका मिला था, जबकि इसमें से एक बार महाकौशल, एक बार भोपाल, तीन बार मालवा, एक बार ग्वालियर और दो बार छग को मौका मिला था, लेकिन जनसंघ के विघटन और भाजपा के अस्तित्व में आते ही सबकुछ उल्टा हो गया।