मंगलवार, 21 मार्च 2017

अन्नदाताओं को मौत

भोपाल। मप्र जहां एक तरफ अनाज उत्पाद में पिछले चार साल से कृषि कर्मण सम्मान पा रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में किसान निरंतर आत्महत्या कर रहे हैं। है न चौंकाने वाली बात। दरअसल, प्रदेश में किसान सरकार के लक्ष्य को पूरा करने के लिए रिकार्ड अनाज उत्पादन तो करता है लेकिन इसके लिए उसे बड़ी राशि व्यय करनी पड़ती है। जब उत्पादित अनाज या समान का वाजिब दाम उसे नहीं मिलता है तो वह आत्महत्या करने को मजबूर होता है। अभी हाल ही में कर्ज की वजह से खरगोन जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर उमरखली गांव में एक किसान दिनेश ने अपनी जान दे दी। दिनेश ने खेत में ही कीटनाशक दवाई पीकर खुदकुशी कर ली। उस दिन दिनेश ने ही नहीं बल्कि कुछ छह किसानों ने आत्महत्या की होगी। क्योंकि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी)के अनुसार,मप्र में रोजाना 6 किसान आत्महत्या कर रहे हैं। एक तरफ सरकार पांच साल में किसानों की आय दोगुनी करने के दावों के बीच किसानों की बदहाली की एक बेहद दुखद तस्वीर सामने आई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने खुलासा किया है कि वर्ष 2015 में कुल 8007 किसानों ने आत्महत्या की, जो वर्ष 2014 में आत्महत्या करने वाले 5650 किसानों की संख्या की तुलना में 42 फीसदी अधिक है। हालांकि, इस दौरान कृषि श्रमिकों की खुदकुशी दर में 31 फीसदी से अधिक की कमी भी दर्ज की गई। वर्ष 2014 में जहां 6710 कृषि श्रमिकों ने आत्महत्या की थी, वहीं वर्ष 2015 में 4595 कृषि श्रमिकों ने जीवन त्याग दिया। दरअसल प्रदेश में खेती-किसानी की आधारभूत नीति नहीं होने के कारण ऐसा हो रहा है। प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं किसान हैं और खेती-किसानी को लेकर वे निरंतर चिंतित रहते हैं। लेकिन अधिकारियों की नाफरमानी और लापरवाही के कारण स्थिति बिगड़़ रही है। प्रदेश में आंकड़ों की खेती हो रही है। वातानुकूलित दफ्तर में बैठे अफसर खेती-किसानी का खाका तैयार कर रहे हैं। आंकड़ों में सुविधाएं खेती के लिए बिजली, पानी, खाद-बीज की जरूरत होती है। सरकार का दावा है कि वह किसानों को सारी सुविधाएं मुहैया करा रही है। जबकि हकीकत यह है कि सिर्फ कागजों पर ही किसानों को बिजली-पानी मिल रहा है। जहां तक खाद बीज का सवाल है तो वह तो किसानों की आत्महत्या के लिए सबसे बड़ा कारण है। दरअसल प्रदेश में किसानों को अमानक खाद बीज मुहैया कराया जाता है। किसान बैंकों से कर्ज लेकर खेती करता है और पूरे परिवार सहित रात दिन मेहनत करके सरकार के लक्ष्य की पूर्ति करता है। जिसका परिणाम यह हो रहा है कि पिछले चार साल में प्रदेश में रिकार्ड अनाज का उत्पादन हो रहा है। नहीं मिल रहा वाजिब मूल्य प्रदेश में किसान बैंक, महाजन या अन्य स्रोतों से कर्ज लेकर खेती करता है ताकि फसल बेचकर वह चुकता कर देगा। लेकिन किसान की उत्पादित फसल का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता है। इसका नजारा पिछले साल प्याज और अब टमाटर और आलू की फसल आने के बाद साफ दिख रहा है। आलम यह है कि किसान जब अपनी फसल लेकर मंडी पहुंच रहा है तो उसे अपनी फसल के बदले भाड़े तक की रकम नहीं मिल पा रही है। ऐसे में किसान के पास आत्महत्या करने के अलावा और कोई चारा नहीं है। अफसर बना रहे ख्याली पुलाव मध्यप्रदेश में अफसरशाही सरकार को स्वर्णिम खेती का सपना दिखा रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि किसानों पर लगातार बोझ बड़ रहा है। किसानों पर बढ़ता बोझ देख मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले साल किसानों की प्याज खरीदवा ली थी। इसके पीछे अफसरों ने तर्क दिया था कि उसे कुछ दिनों बाद अधिक दाम पर बेंच दिया जाएगा। लेकिन अफसरशाही के तिकड़म में पड़कर सरकार ने प्याज तो खरीद लिया, लेकिन वह मंडियों में पड़े-पड़े सड़ गया। अफसरशाही के साथ ही किसानों को हर कोई लूट रहा है। चाहे वह पटवारी हो, बैंक, महाजन, बीज-खाद कंपनी, पटवारी, पुलिस, झोलाछाप डॉक्टर या चिटफंड कंपनी। यानी हर एक के निशाने पर किसान है। ऐसे में किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहा है। मप्र में रोज 6 खुदकुशी लगातार हो रही धोखाधड़ी के कारण मप्र में किसानों के खुदकुशी के मामले बढ़े हैं। 2015 में रोजाना औसतन चार किसान जान दे रहे थे, जो 2016 में बढ़कर छह हो गए। एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों के अनुसार 2015 में 1290 किसान-श्रमिकों ने जान दी। एक्सिडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड इन इंडिया 2015 की रिपोर्ट के अनुसार किसानों की 87 फीसदी आत्महत्या महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र और तमिलनाडु में हुई हैं। गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने पिछले दिनों विधानसभा में जवाब दिया था कि एक फरवरी 2016 से 15 नवंबर 2016 के बीच 1685 किसानों ने जान दी। इनमें डिंडोरी में सबसे ज्यादा 68 किसानों ने अपने प्राण त्यागे। वहीं सागर में 45, झाबुआ में 33, अलीराजपुर में 32, खरगौन में 30 किसानों ने खुदकुशी की। बड़े जिलों में भोपाल में एक, जबलपुर में 12, ग्वालियर में खुदकुशी के 2 मामले सामने आए। इस बीच इंदौर में एक भी घटना नहीं हुई। एक ही उपाय, मौत आखिर किसानों की बढ़ती आत्महत्या की वजहें क्या है? मोटे तौर पर इसकी जो वजहें हैं उनमें मानसून का बदलता मिजाज प्रमुख है। तमाम आधुनिक उपकरणों की उपलब्धता के बावजूद तथ्य यह है कि ज्यादातर किसान अब भी फसलों की बुवाई और सिंचाई के मामले में बारिश पर ही निर्भर हैं। लेकिन बीते कोई डेढ़ दशक से मौसम के लगातार बदलते मिजाज और बेमौसमी बरसात ने उनकी तबाही के रास्ते खोल दिए हैं। कहीं जरूरत से ज्यादा बारिश उनकी तबाही की वजह बन जाती है तो कहीं बेमौसम बारिश फसलों की काल बन जाती है। सूखा और बाढ़ की समस्या तो लगभग हर साल सामने आती है। इसके अलावा कर्ज का लगातार बढ़ता चक्र भी एक अहम वजह है। बैकों से कर्ज की खास सुविधा नहीं होने की वजह से किसानों को बीज, खाद और सिंचाई के लिए पैसों की खातिर महाजनों और सूदखोरों पर निर्भर रहना पड़ता है। यह लोग 24 से 50 फीसदी ब्याज दर पर उनको कर्ज देते हैं। लेकिन फसलों की उपज के बाद उसकी उचित कीमत नहीं मिलने की वजह किसान पहले का कर्ज नहीं चुका पाता। वह दोबारा नया कर्ज लेता है और इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज के भंवरजाल में फंसती रहती है। आखिर में उसे इस समस्या से निजात पाने का एक ही उपाय सूझता है और वह है मौत को गले लगाना। कीमतें तय करना जरूरी विडंबना यह है कि बंपर फसल भी किसानों के लिए जानलेवा होती है और फसलों की बर्बादी भी। कपास और गन्ना जैसी नकदी फसलों के लिए ज्यादा पूंजी की जरूरत पड़ती है। लेकिन उपज से लागत भी नहीं वसूल हो पाती। यही वजह है कि आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं इन नकदी फसलों वाले राज्यों में ही होती हैं। फसल पैदा होने के बाद उनकी खरीद, कीमतें तय करने की कोई ठोस नीति और विपणन सुविधाओं का अभाव किसानों के ताबूत की आखिरी कील साबित होते हैं। तो आखिर इस समसया पर अंकुश लगाने का कारगर तरीका क्या है? विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक विपदाओं पर काबू पाना तो किसी के वश में नहीं है। लेकिन फसल पैदा होने के बाद उनकी कीमतें तय करने की एक ठोस और पारदर्शी नीति जरूरी है ताकि किसानों को उनकी फसलों की उचित कीमत मिल सके। इसके अलावा विपणन सुविधाओं की बेहतरी और खेती के मौजूदा तौर-तरीकों में आमूल-चूल बदलाव जरूरी हैं। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को विभिन्न सहकारी कृषक समितियों के साथ मिल कर इस दिशा में ठोस कदम उठाना होगा। उसी हालत में किसानों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जा सकेगा। बस आंकड़ों की बाजीगरी प्रदेश के किसानों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर एनसीआरबी ने जो रिपोर्ट दी है वह आंकड़ों की बाजीगरी लग रही है। अब तक यही माना जाता रहा है कि किसानों की आत्महत्या का कारण खेती में नुकसान, कर्ज तले दबना ही है। जबकि हकीकत इससे जुदा है। एनसीआरबी की ओर से जारी 2015 की रिपोर्ट बताती है कि बताती है कि 2015 में खेती से जुड़े 1290 लोगों ने जान दी। इनमें से असल में किसान केवल 581 लोग ही थे। शेष तो कृषि से जुड़े मजदूर थे। मप्र में कर्ज के चलते छह किसानों ने आत्महत्या की है। जो कई राज्यों की तुलना में बेहद कम है। कर्ज के चलते किसानों की आत्महत्या के सबसे ज्यादा 1237 मामले महाराष्ट्र में सामने आए हैं। कर्नाटक में 787, तेलंगाना में 384 और पंजाब में 49 किसानों ने आत्महत्या की। गरीबी के चलते आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या मप्र में तीन रही, जबकि दीवालिया घोषित किए जाने पर 13 किसानों ने आत्महत्या की है। मप्र में किसानों की आत्महत्या के मामलों में सबसे ज्यादा घरेलू विवाद वजह रहा। घरेलू विवाद के चलते 183 किसानों ने जान दी। इसके अलावा 24 ने वैवाहिक जीवन की परेशानियों के चलते खुदकुशी की। वहीं विवाहेत्तर संबंध भी चार किसानों की खुदखुशी की वजह बनी। दहेज प्रताडऩा के चलते भी छह महिला किसानों ने आत्महत्या की। 47 मामलों में किसानों की आत्महत्या की मूल वजह का पता ही नहीं चल पाया। समाज में इज्जत खोने के डर से भी दो किसानों ने मौत को गले लगाया। यही नहीं घरेलू विवाद के बाद आत्महत्या के बड़े कारणों में बीमारी भी एक वजह रही है। अपनी बीमारी से तंग आकर 300 से ज्यादा किसानों ने मौत को गले लगाया। इनमें 108 ने लंबी बीमारी से त्रस्त होकर जान दी। 42 किसानों के खुदकुशी करने का कारण उनकी मानसिक बीमारी थी। यही नहीं नशे और शराब की लत के कारण भी किसानों ने मौत को गले लगाया है। इसके कारण 74 किसानों ने आत्महत्या की है। रिपोर्ट के मुताबिक मप्र में फसल न बिकने के चलते आत्महत्या का एक भी मामला सामने नहीं आया। किसान विरोधी हैं मप्र सरकार की नीतियां मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अरुण यादव ने इस मामले में सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मप्र सरकार की नीतियां किसान विरोधी हैं। लगातार प्रकृति की मार से किसान और कर्जदार हुआ है, लेकिन सरकार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही दे रही है। परेशान किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं पर सरकार मानने को तैयार नहीं है। कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का कहना है कि 1995 से 3.18 लाख से किसान आत्महत्या कर चुके हैं। बीते दो दशक में हर साल यह आंकड़ा बढ़ता जा रहा है। नीतियां बनाने वालों के लिए ये बस आंकड़े हैं। मौत का ग्राफ बढ़ ही रहा है।

शिव 'राजÓ के अस्पताल बीमार

10 साल में 2676100.37 लाख का बंटाढ़ार
भोपाल। यह जानकर आपको आश्चर्य होगा की वर्ष 2003-04 में मप्र का कुल बजट जितना था करीब उसके बराबर यानी 2676100.37 लाख रूपए वर्तमान भाजपा सरकार ने पिछले 10 साल में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च किया है, बावजुद इसके यहां की स्वास्थ्य सुविधाएं सबसे बदहाल है। बदहाल स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण प्रदेश में रोजाना 82 बच्चों और 4 महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हो रही है। मप्र में भ्रष्टाचार के विरूद्ध जीरो टॉलरेंस ही सुशासन का मूल मंत्र है। लेकिन देखा यह जा रहा है कि अफसरशाही कागजी आंकड़े परोस कर सरकार को हवाई सपने दिखा रहे हैं। इन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए मप्र में इन 10 सालों में स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर जमकर पैसा बहाया गया है। स्वास्थ्य कार्यक्रमों, स्वास्थ्य योजनाओं और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया गया है। मप्र के सभी 51 जिलों में जिला चिकित्सालय स्थापित किए गए हैं। इन अस्पतालों में 14,150 बिस्तरों की व्यवस्था है। इनके अलावा प्रदेश में 66 सिविल अस्पताल और उनमें 4669 बिस्तर, 335 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में 10050 बिस्तर, 1170 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 7020 बिस्तर, 9192 उप स्वास्थ्य केन्द्र, 92 शहरी सिविल डिस्पेंसरी , शहरी परिवार कल्याण केन्द्र 96, अरबन हेल्थ सेंटर 83, टीबी हॉस्पिटल 08, टीबी सेनेटोरियम 01, चेस्ट सेंटर सेनेटोरियम 01, पॉली क्लीनिक 06, क्षेत्रीय नैदानिक केन्द्र 11, ट्रॉमा सेंटर 08 और ग्राम आरोग्य केन्द्र 49,489 हैं। लेकिन ये नाकाफी साबित हो रहे हैं। आलम यह है इन अस्पतालों की क्षमता से अधिक मरीज रोजाना इनमें इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। लेकिन उन्हें समुचित इलाज नहीं मिल पा रहा है। दरअसल, सरकार के सारे प्रयास भ्रष्टाचार के शिकार हो रहे हैं। निजीकरण ने बिगाड़ा खेल प्रदेश में स्वास्थ्य क्षेत्र और स्वास्थ्य सेवाओं की लचर हालत का एक बड़ा पक्ष इस क्षेत्र में काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मियों की कमी और रोगियों को ठीक वक्त पर मिलने वाले इलाज और डाक्टरों की उपलब्धता से जुड़ा हुआ है। इस नजरिए से देखें तो प्रदेश में प्रति दस हजार की जनसंख्या पर 21 डाक्टर हैं। इस आंकड़ें को देखकर ये समझा जा सकता है कि मप्र का स्वास्थ्य क्षेत्र पर्याप्त और अच्छी चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता के मामले में गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। आर्थिक, सामाजिक सूचकांकों पर आम तौर पर बेहतर और अग्रणी माने जाने वाले मप्र की यह हालत निराश करने वाली है। ऐसे में ये सवाल उठता है कि चिकित्सा सेवाओं के विस्तार और उनकी उपलब्धता को बढ़ाने के मामले में चूक कहां हो रही है। क्या ये आंकड़ें नीति-निर्माण के स्तर पर होने वाली चूक और लापरवाही के नतीजे हैं या बीते सालों में स्वास्थ्य क्षेत्र के प्रति सरकारों की बदली प्राथमिकताओं के? गौर से देखा जाए तो चिकित्सा सुविधाओं और डाक्टरों समेत स्वास्थ्य कर्मियों की बढ़ती अपर्याप्तता स्वास्थ्य क्षेत्र के बढ़ते निजीकरण का नतीजा है। आजादी के बाद के दौर में निजी अस्पताल संख्या के लिहाज से 8 फीसदी से बढ़कर 93 फीसदी हो गए हैं। निजी अस्पतालों के इस तेज गति से बढ़ती संख्या के चलते सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य कर्मियों (डाक्टर, नर्स) की संख्या में भी तेजी से गिरावट आई है। सरकारी आंकड़ें खुद बताते हैं कि इस वक्त देश भर के तमाम राज्यों में 85 फीसदी विशेषज्ञ डाक्टरों के, 75 फीसदी डाक्टरों के, 80 फीसदी लैब तकनीशियनों के 53 फीसदी नर्सों के पद खाली पड़े हैं। ऐसा नहीं है कि इन रिक्त पदों पर नियुक्त होने के लिए व्यवसायिक रूप से प्रशिक्षित डाक्टर स्वास्थ्य क्षेत्र में आ नहीं रहे। इस समय भारत में 355 मेडिकल कालेज (सरकारी और गैर सरकारी) हैं, जिनसे प्रति साल 44,000 प्रशिक्षित डाक्टर निकलते हैं, इनमें 22,000 विशेषज्ञ डाक्टर होते हैं। इसके अलावा 2400 नर्सिंग स्कूलों और 1500 कालेजों से 1.2 लाख नर्सें प्रति वर्ष स्वास्थ्य क्षेत्र में आते हैं, लेकिन अन्य सरकारी सेवाओं के मुकाबले काम की खराब परिस्थितियों, काम के बदले मिलने वाले वेतन और ऐसी ही अन्य समस्याओं के चलते वे निजी क्षेत्र में काम करने को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टर किसी न किसी निजी अस्पताल में सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में उनका ध्यान सरकारी अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर कम रहता है। यह साफ है कि स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करने के लिए सरकार को न सिर्फ नीति-निर्माण के स्तर पर बनने वाले योजनाओं में बदलाव करने होंगे बल्कि अपनी प्राथमिकताओं पर भी विचार करना होगा। बड़े अस्पतालों में भी नहीं हैं एक्सपर्ट प्रदेश के सभी अस्पतालों में डॉक्टरों का टोटा है। आलम यह है कि भोपाल के सरकारी अस्पतालों से लेकर प्रदेशभर के अस्पतालों में बिना विशेषज्ञों के ही उपचार किया जा रहा है। अस्पतालों में जरूरत के आधे चिकित्सक भी नहीं है। ऐसे में मरीजों का उपचार मेडिकल ऑफीसर्स के भरोसे ही चल रहा है। स्वास्थ्य विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक प्रदेश में 3195 विशेषज्ञों की जरूरत है। जिनमें से अस्पतालों में महज 1210 पद ही भरे हुए हैं। पर इनमें से भी 1063 विशेज्ञ अस्पतालों में पदस्थ हैं। सिर्फ विशेषज्ञ ही नहीं, प्रदेश में मेडिकल ऑफीसर की भी खासी कमी है। 3859 पदों में से 2989 पद भरे हैं, जिनमें से 2506 पद वास्तविक भरे हुए हैं। बाकी डॉक्टर्स दूसरे विभागों में पदस्थापना के तौर पर काम कर रहे हैं। मामले में प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह का कहना है कि यह बात सही है कि डॉक्टरों की कमी है लेकिन इसे दूर करने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी तरह प्रदेश में एनिस्थिसिया विशेषज्ञों के आधे पद खाली हैं। ऐसे में कई बार ऑपरेशन टालने पड़ते हैं। स्वास्थ्य विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में से सिर्फ सात में ही एनिस्थिसिया विशेषज्ञ सहित अन्य विशेषज्ञ हैं। प्रदेश में एनिस्थिसिया विशेषज्ञ के 308 पद स्वीकृत हैं लेकिन इसमें से महज 172 ही काम कर हैं, इनमें से 100 विशेषज्ञ जिला अस्पतालों में तो बाकी सिविल अस्पताल में पदस्थ हैं। एनिस्थिसिया विशेषज्ञ ना होने से सबसे ज्यादा दिक्कत सीजर डिलेवरी के दौरान होती है। नियमों के मुताबिक सीजर डीलेवरी के दौरान स्त्री रोग विशेषज्ञ, शिशु रोग विशेषज्ञ और एनिस्थिसिया विशेषज्ञ होना जरूरी है। विशेषज्ञ ना होने की दशा में महिलाओं को जिला अस्पताल रैफर कर दिया जाता है। प्रदेश में विशेषज्ञों की स्थिति विषय स्वीकृत पद भरे वास्तविक कार्यरत एनेस्थीसिया 308 172 94 गायनकोलॉजी 594 171 148 पीडियाट्रिक्स 484 199 177 नेत्र विज्ञान 112 81 69 अस्थि रोग 162 112 96 ईएनटी 81 58 55 रेडियोलॉजी 93 54 43 पैथोलॉजी 120 5 5 46 सर्जरी 528 164 148 जनरल मेडिसिन 611 170 149 टीबी 51 22 21 डेंटिंस्ट 51 18 17 कुल 3195 1210 1063 भगवान भरोसे मरीज राजधानी का हमीदिया अस्पताल हो या प्रदेश का कोई अन्य सरकारी अस्पताल हर एक में डॉक्टर से लेकर स्टॉफ तक की कमी है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि मरीजों का इलाज ठीक से नहीं हो पा रहा है। यही नहीं अस्पतालों में आपात सुविधाओं का भी अभाव है। कई अस्पतालों में बत्ती गुल होने पर इलाज के लिए कोई वैकल्पिक इंतजाम किए गए। इस कारण इलाज में देरी होने से मरीज की जान भी चली जाती है। अस्पतालों में समय पर डॉक्टर का मिलना भी भाग्य के ऊपर निर्भर है। इसकी मूल वजह है डॉक्टरों की कमी और काम का बोझ। बालाघाट जिले में प्रसूति के लिए डॉक्टरों के 11 पद स्वीकृत हैं, लेकिन सिर्फ दो ही डॉक्टरों के भरोसे पूरा विभाग चल रहा है। जिले में हर साल सात से आठ हजार डिलीवरी केस आते हैं। ज्यादातर केस में नर्स या अन्य स्टाफ को ही डिलीवरी कराना पड़ती है। यह एक अस्पताल का हाल नहीं है बल्कि प्रदेश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों की यही स्थिति है। रीवा के संजय गांधी अस्पताल में नवंबर महीने में 340 बच्चों का जन्म हुआ। अस्पताल के रिकॉर्ड के मुताबिक, इनमें से 106 बच्चों की मौत हो गई। अस्पताल के लेबर रूम में इनवर्टर की सुविधा तक नहीं है। ऐसे में कई बार बिजली जाने पर ऑपरेशन थिएटर में टॉर्च की रोशनी में डिलीवरी कराना पड़ती है। सोनोग्राफी की रिपोर्ट जब तक आती है तब तक जच्चा मां बन चुकी होती है। दतिया जिले में मेडिकल कॉलेज खोलने की तैयारियां जोरों पर चल रही है। लेकिन 30 में से 13 विशेषज्ञ डॉक्टरों के पद रिक्त हैं। हालात यह है कि मेडिसिन का एक भी डॉक्टर न होने से उल्टी-दस्त व पेटदर्द के मरीजों को भी ग्वालियर-झांसी में इलाज कराना पड़ रहा है। इसी प्रकार चर्म रोग, दंत विभाग भी पूरी तरह से खाली पड़े हुए है। जिला अस्पताल में सिर्फ डाक्टरों की ही नहीं बल्कि नर्सिंग स्टाफ की भी कमी है। आलम यह है कि 350 पलंग वाले अस्पताल में 115 स्टाफ नर्स की जरूरत है। लेकिन यहां सिर्फ 61 स्टाफ नर्स हैं। इसी प्रकार आठ ड्रेसर के स्थान पर मात्र चार ड्रेसर है। 15 लेब टेक्नीशियन और नौ लेब असिस्टेंट के विरुद्ध मात्र सात टेक्नीशियन और दो असिस्टेंट अस्पताल में हैं। दतिया जिला अस्पताल में न्यूरो, ट्रॉमा के गंभीर मरीज तो छोडि़ए, उल्टी-दस्त व पेटदर्द की बीमारी का भी इलाज नहीं मिलता। हालात यह है कि बीमारी बड़ी हो या छोटी, मरीज को ग्वालियर-झांसी के मेडिकल कॉलेज में ही इलाज कराना पड़ता है। इसकी वजह से दतिया अस्पताल में आने वाले अधिकांश मरीजों का समय व रुपया दोनों बर्बाद हो रहा है। सीएमएचओ व प्रभारी सिविल सर्जन दतिया डॉ. डीके गुप्ता बताते हैं कि जिला अस्पताल में स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की भी कमी है। उनकी पूर्ति के लिए शासन को पत्र लिखा जाएगा। हमारा प्रयास है जितने डॉक्टर है उनसे मरीजों को बेहतर इलाज दिया जा सके। डॉक्टरों को भी निर्देश दिए हैं कि मरीजों के इलाज में कोई कमी नही रहे। मंडला जिला अस्पताल को मिला तो आईएसओ सर्टिफिकेट है, पर अंदर जाओ तो नजारा कुछ और ही है। जिला चिकित्सालय का ब्लड बैंक 13 साल से बिना लाइसेंस के चल रहा है। अप्रैल 2015 में जब रिन्युअल की अर्जी पर इंस्पैक्शन हुआ, 21 कमियां मिलीं। न कमियां दूर हुईं न नया लाइसेंस मिला। ब्लड बैंक है कि चल रहा है। नीमच के लोगों को तो यह याद ही नहीं है कि जिला अस्पताल के नेत्र चिकित्सा वार्ड का ताला आखिरी बार कब खुला था। बताते हैं कि अस्पताल के इस वार्ड को स्टोर रूम बना दिया गया है। अस्पताल के कबाड़ का सामान इसी वार्ड में पटककर रखा है। भारतीय मानवाधिकार परिषद के सदस्य और मरीजों की बेहतरी के लिए काम करने वाले परमजीत सिंह फौजी बताते हैं कि अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक तो हैं, लेकिन वो कभी इलाज करते नजर नहीं आते हैं। 16 सरकारी अस्पतालों में एंबुलेंस तक नहीं प्रदेश के दूरदराज के हालात कैसे होंगे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भोपाल से सटे होशंगाबाद जिले में यूं तो 16 सरकारी अस्पताल आते हैं, लेकिन किसी भी सरकारी अस्पताल के पास अपनी एम्बुलेंस नहीं है। वैसे एम्बुलेंस का क्या रोना, जब डॉक्टरों की ही आधी जगहें खाली पड़ी हों। जिला अस्पताल के लिए क्लास-1 डॉक्टर के 33 पद स्वीकृत हैं। इसकी जगह केवल 17 डॉक्टर पदस्थ हैं। वहीं, क्लास-2 डॉक्टर के स्वीकृत 25 पदों की जगह 15 डॉक्टर ही उपलब्ध हैं। नर्सिंग स्टाफ का मामला भी इससे अलग नहीं है। नर्सिंग स्टाफ के स्वीकृत 103 पदों में से 43 पद खाली पड़े हुए हैं। प्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री व वर्तमान जलसंसाधन एवं जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा के गृह जिले दतिया में जिला अस्पताल में आइसोलेशन, बर्न यूनिट और आईसीयू नहीं है। वहीं, 141 गांव एक एंबुलेंस के भरोसे हैं। वह भी लंबे समय से खराब पड़ी है। वैसे कहने के लिए तो पांच एंबुलेंस हैं पर इनमें से केवल एक एंबुलेंस का इस्तेमाल मरीजों के लिए होता है। यहां के जिला अस्पताल को मेडिकल कॉलेज के रूप में विकसित किया जा रहा है लेकिन, मरीज जरूरी सुविधाओं के लिए मोहताज हैं। चंबल संभाग के मुख्यालय मुरैना का जिला अस्पताल केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का गृह जिला है। इस जिले के सरकारी अस्पताल में पिछले कई महीनों से डायलिसिस, सीटी स्कैन और अल्ट्रा साउंड मशीनें बंद पड़ी हुई हैं। इसके अलावा सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट आग लगने के बाद से बंद है। डायलिसिस केंद्र पिछले साल जनवरी में बंद हो गया। बताया जा रहा है कि आरओ की सुविधा और बिजली सप्लाई सही नहीं होने की वजह से डायलिसिस केंद्र को बंद कर दिया गया। जिला अस्पताल की अल्ट्रासाउंड मशीन पिछले आठ महीने से खराब है। सांसद अनूप मिश्रा की स्टाफ को फटकार को भी छठवां महीना होने को आ गया, पर मशीन न ठीक हो पाई, न बदली गई। जिला अस्पताल में रोजाना 20 से अधिक मरीज ऐसे आते हैं, जिनको अल्ट्रासाउंड के लिए ही यहां रेफर किया जाता है लेकिन यह जांच अस्पताल में न होने से यहां से ये मरीज लौटकर जा रहे हैं। डायलिसिस और अल्ट्रासाउंड मशीन ही बंद नहीं है। बल्कि, अल्ट्रा साउंड सेंटर पर भी ताले डले हुए हैं। मुरैना जिला अस्पताल में पिछले साल एसएनसीयू में आग लग गई थी। नर्सिंग स्टाफ ने अपनी जान खेलकर 35 नवजातों की जान बचाई थी। आग की वजह से एसएनसीयू को काफी नुकसान पहुंचा था। इस वजह से यह सेंटर भी बंद हो गया। एसएनसीयू को दोबारा शुरू करने के लिए काफी खर्चा आएगा। इसका प्रस्ताव बनाकर भोपाल भेजा गया है, लेकिन अब तक बजट मंजूर नहीं होने की वजह से काम शुरू नहीं हो सका है। ऐसे या इससे बदतर हालात अन्य जिलों के सरकारी अस्पतालों के हैं। मरीज खा रहे मौत की खुराक प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को नि:शुल्क दवा उपलब्ध कराने के लिए नवंबर 2012 से सरदार वल्लभ भाई पटेल नि:शुल्क औषधि वितरण योजना आरंभ की गई है। दवा एवं सामग्री खरीदने के लिये मध्यप्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कार्पोरेशन की भी स्थापना हुई। जिला अस्पतालों में 300 प्रकार की, सिविल अस्पतालों में 131, सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 107, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में 71 और उप-स्वास्थ्य केन्द्र पर 24 प्रकार की दवाएं उपलब्ध कराने का दावा किया जा रहा है। लेकिन यह दावा कागजी है। अस्पतालों में जो दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं वे मौत की खुराक साबित हो रही हैं। इसका खुलासा पूर्व में दवाओं की जांच में हो चुका है। यही नहीं सरकारी डाक्टरों द्वारा मरीजों को ऐसी दवाइयां लिखी जा रही हैं जिनको लिखे जाने की अनुमति ही नहीं दी गई है। मरीजों को ऐसी दवाइयों का सेवन अंजाने मेें करना पड़ रहा है जो अमानक हैं। यही नहीं अभी हाल ही में भोपाल का हमीदिया अस्पताल के दवा भंडार में एक्सपायरी डेट वाली दवाएं मिली हैं। कई दवाएं वर्ष 1976 में बनी हुई थीं। जो इस बात का संकेत है कि प्रदेश में मरीजों की जान से किस तरह खिलवाड़ किया जा रहा है। रोजाना 1,250 लाख की अमानक दवाओं की खपत प्रदेश के दवा बाजारों में रोजाना करीब 4,200 लाख रुपए का कारोबार होता है। इसमें करीब 1,250 लाख रुपए की अमानक दवाओं की खपत रोजाना हो रही है। मोटी कमाई के फेर में चल रही नकली दवाओं की बिक्री के खेल से मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ हो रहा है। यह खुलासा स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के पास पहुंचे एक पत्र से हुआ है। ग्वालियर से स्वास्थ्य विभाग के अफसरों के पास एक चि_ी पहुंची थी, चि_ी भेजने वाले ने लिखा था कि आगरा के रास्ते करोड़ों रुपए की अमानक दवाएं मध्यप्रदेश और राजस्थान में पहुंचाई जा रही हैं। यह दवाएं प्राइवेट टैक्सी, कार और बसों मे जरिए पहुंचाई जाती हैं और इसके बाद प्रदेश भर में सप्लाई की जाती है। ऐसी दवाएं रोग ठीक नहीं करती हैं बल्कि नक्कालों की जेब भरती हैं। नौनिहालों की कब्रगाह बना मप्र प्रदेश के जनाना अस्पतालों की बदहाली किसी से नहीं छिपी। एक बेड पर चार-पांच प्रसूताएं, प्रसव के जंग लगे उपकरणों का उपयोग आम बात हो गई है। लेकिन इससे भी डरावना सच यह है कि प्रदेश में 123 दिनों में 10 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई है। मध्य प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह ने एक लिखित जवाब में कहा, बताया था कि चार माह अर्थात 123 दिनों में 10 हजार 171 बच्चों की मौत हुई है। मौत की वजह निमोनिया, डायरिया, बुखार, मीजल्स व अन्य कारण भी है। मंत्री रुस्तम सिंह ने अपने जवाब में जुलाई से अक्टूबर तक का ब्यौरा दिया है। सरकार की ओर से दिए गए जवाब से साफ होता है कि राज्य में प्रतिदिन 82 बच्चों की मौत हो रही है। हालांकि, यह आंकड़ा कोई नया नहीं है। लेकिन यह ऐसा सामान्य मसला समझा जाता है जिस पर कभी चर्चा नहीं होती। बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था यूनिसेफ ने एक कार्यशाला में बताया था कि अकेले मध्य प्रदेश में डायरिया जैसी बीमारियों से हर साल 28 हजार बच्चों की मौत हो जाती है। प्रदेश में बच्चों की मौत के जो कारण सामने आए हैं उनमें समय पर आईसीयू का नहीं मिलना, इमरजेन्सी तथा वार्डों में भर्ती बच्चों को समय पर इलाज नहीं मिलना, सुपरस्पेशलिस्ट डॉक्टर, बच्चों के गैस्ट्रो, न्यूरो, पल्मोनरी मेडिसन, क्रिटिकल केयर, हार्ट सर्जन की कमी आदि के साथ ही अस्पतालों में सीनियर डॉक्टरों की कमी मुख्य कारण है। सुरक्षित नहीं है जननी प्रदेश में बच्चे ही नहीं जननी भी सुरक्षित नहीं है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में प्रेग्नेंसी के दौरान मरने वाली महिलाओं की संख्या 113 दर्ज की गई। जिसके बाद एमपी ऐसे टॉप फाइव स्टेट्स में शामिल हो गया है, जहां प्रेगनेंसी के दौरान सबसे ज्यादा महिलाओं की मौत होती है। इस मामले में प्रदेश दूसरे पायदान पर है। रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में टॉप रहा है महाराष्ट्र। यहां 2015 में 633 मामले ऐसे सामने आए हैं। वहीं नेशनल हेल्थ फेमिली सर्वे की 2014-15 रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल बिहार के बाद मप्र सबसे फिसड्डी रहा। गर्भवती महिलाओं का तीन माह में चेकअप के मामले में बिहार में जहां 34.6 प्रतिशत महिलाओं को यह सुविधा मिल रही है, वहीं प्रदेश में 53.1 प्रतिशत की ही जांच हो पा रही है। हैरानी है कि त्रिपुरा, नगालैंड, मिजोरम, सिक्किम, पांडीचेरी, मणीपुर जैसे राज्यों की हालत भी मप्र से बेहतर है। यही हालत संपूर्ण चेकअप को लेकर है। प्रदेश में पिछले साल 13,69,146 प्रसव हुए। इनमें से 1149 महिलाओं ने प्रसव के दौरान दम तोड़ा। यानी प्रदेश में एक लाख प्रसव के दौरान हर साल 221 महिलाएं दम तोड़ रहीं हैं। यह स्थिति तब है जब स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के नाम पर हर साल करोड़ों खर्च कर रहा है, लेकिन महिलाओं को इसका लाभ नहीं मिल पा रहा। प्रदेश में 54.6 प्रतिशत महिलाएं एनिमिया का शिकार हैं। राजधानी में भी बदतर हालत है। यहां करीब 62 प्रतिशत महिलाएं सही खान-पान और दवाइयों के अभाव में एनिमिया का शिकार हो रही हैं। यही कारण है कि प्रदेश में मातृत्व मृत्यु दर में कमी नहीं आ पा रही है। प्रदेश सरकार की ओर से इस स्थिति में सुधार के लिए आशा वर्कर्स की व्यवस्था भी की गई। हैरानी की बात यह है कि ये आशा वर्कर्स भी अनट्रेंड हैं, जो नहीं जानती कि एक प्रेगनेंट महिला की केयर कैसे की जानी चाहिए। विशेषज्ञों का मानना है कि डिलिवरी के समय ज्यादा खून बहने, बीपी हाई रहने के कारण मौत का यह आंकड़ा बढ़ा है। इन मौतों का एक कारण प्रेगनेंसी के दौरान प्रोपर डायट न मिल पाना, जरूरी सप्लीमेंट्स न मिलने के साथ ही अन्य कई फैक्ट्स हैं, जिनके कारण प्रेगनेंट महिलाओं की मौत हो जाती है। प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं को जरूरी सप्लीमेंट्स नहीं मिल पाते। इनमें आयरन सबसे जरूरी है। इसकी कमी से भी उनकी मौत हो जाती है। 2016 में ऐसे कई मामले सामने आए जिनमें समय पर एम्बुलेंस नहीं पहुंची या पहुंची भी तो प्रेगनेंट महिलाओं को समय पर अस्पताल नहीं लाया जा सका। मंत्री के दावे हवा हवाई स्वास्थ्य मंत्री रूस्तम सिंह ने पदभार संभालते ही दावा किया था कि प्रदेश की स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर की जाएंगी। सारी खामियां दूर की जाएंगी। लेकिन आज वे भी हैरान हैं कि सुविधाएं सुधरने की बजाय लगातार बिगड़ रही हैं। मंत्री कहते हैं कि सरकार ने प्रदेश वासियों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए 5611 करोड़ रूपए के सालाना बजट का प्रावधान किया है,ताकि प्रदेश वासियों को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें। प्रदेश में संचालित डायल 108 शासकीय एंबुलेंस सुविधा को 1 नवंबर से केंद्रीकृत कर दिया गया है। नई व्यवस्था के तहत जननी एक्सप्रेस,108 इमरजेंसी वाहन और एंबुलेंस को प्रदेश स्तर पर शुरू की गई है। इससे जरूरतमंद व्यक्ति को तत्काल एंबुलेंस की सुविधा मिल सकेगी। इसके अलावा सभी वाहनों को जीपीएस टेक्नोलॉजी से जोड़ा जाएगा ताकि नजदीकी वाहन का पता करके उसे तत्काल मौके पर भेजा जा सके। लेकिन मंत्री के दावे के विपरीत एंबुलेंस सेवाएं पहले से भी बदत्तर स्थिति में हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि प्रदेश में कैंसर के रोगियों की कीमोथेरेपी के लिए प्रदेश के सभी जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं शुरू की जाएगी ,इससे प्रदेश के कैंसर पीडि़त मरीजों को प्रदेश से बाहर नहीं जाना पड़ेगा। इसके लिए उज्जैन के डॉक्टरों की टीम ने बहुत अच्छा काम किया है। साथ ही उन्होंने कहा कि आउट सोर्स के माध्यम से डायलासिस की सुविधा भी प्रदेश के सभी जिलों में शुरू की जाएगी। मंत्री रूस्तम सिंह ने बताया कि सीटी स्कैन जैसी महंगी जांच के लिए भी जिला चिकित्सालयों में पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) मोड पर जांच सुविधा शुरू की जाएगी ताकि मेनेज होने जैसी शिकायतें नहीं मिले। उन्होंने कहा कि टेक्निशियन अपने कमीशन के लिए मशीन को खराब कर देते हैं, लेकिन जब पीपीपी मोड् पर मशीन का संचालन होगा तो इसकी संभावना समाप्त हो जाएगी। प्रदेश में डॉक्टरों की कमी को देखते हुए मंत्री रूस्तम सिंह ने कहा कि बीएमएस,बीडीएस और एमडीएस के डॉक्टरों की भर्ती पीएससी के जरिए की जाएगी। साथ ही उन्होंने कहा कि बीएमएस के डॉक्टरों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में प्रशिक्षण देकर उनकी सेवाएं भी लिए जाने की योजना तैयार की जा रही है। लेकिन अभी तक सरकार इस दिशा में एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा पाई है। देश के नामी डॉक्टर करेंगे इलाज उधर, केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री फग्गनसिंह कुलस्ते का कहना है कि सरकार स्वास्थ्य सेवा को पटरी पर लाने मेगा हेल्थ कैंप के रूप में पहली मर्तबा प्रयोग कर रही है। इससे सफल बनाने के साथ ही दुरुस्त ग्रामीण क्षेत्रों में डॉक्टरों की कमी को दूर करने भी सरकार प्रयास कर रही है। मेडिकल कॉलेज बढऩे के साथ ही डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ रही है। जल्द ही मध्यप्रदेश के हर जिले जरुरत के हिसाब से डॉक्टरों की पदस्थापना होगी। डॉक्टरों की कमी से कोई भी मरीज इलाज के लिए नहीं तरसेगा और असमय उसकी मौत नहीं होगी। कुलस्ते का कहना है कि मेगा हेल्थ कैंप जनवरी माह के अंतिम सप्ताह से शुरू होंगे जो प्रदेश के सभी जिलों में लगाए जाएंगे। देश भर के 100 से अधिक डॉक्टरों टीम बनाई गई है, जो हेल्थ कैंप में मरीजों का स्वास्थ्य परीक्षण कर उन्हें बीमारी का इलाज देंगे। एम्स सबसे अधिक बीमार भोपाल में जब एम्स शुरू हुआ तो लोगों को आशा थी कि अब बेहतर इलाज मिल सकेगा। लेकिन एम्स को भी नजर लग गई है। एम्स 13 साल से आश्वासनों के हार ही पहन रहा है। यही कारण है कि अस्पताल में वो सुविधाएं नहीं मिल सकीं जो नाम के अनुरूप इस अस्पताल को शुरुआती वर्षों में ही मिल जानी थी। इन 13 सालों में चार केंद्रीय मंत्री एम्स का दौरा कर चुके हैं। इन सभी ने 6 महीने में बेहतर सुविधाओं का वादा किया। लेकिन गए तो पलट कर नहीं देखा। नतीजा एम्स में बेहतर इलाज का अब तक इंतजार है। एम्स में अभी तक मेडिसिन, गायनेकोलॉजी, पीडियोट्रिक्स, ऑर्थोडिक्स, प्लास्टिक सर्जरी, जनरल सर्जरी, न्यूरोलोजी, न्यूरोसर्जरी, डेंटिस्ट्री, फिजियोथेरेपी विभागों की ओपीडी चल रही है। कॉर्डियोलोजी, कार्डियक सर्जरी, नेफ्रोलोजी, गेस्ट्रोसर्जरी, गेस्ट्रोमेडिसिन और रेडियोथेरेपी विभाग शुरू नहीं हो पाए हैं। अस्पताल भी 100 बिस्तरों का है। जबकि 900 बिस्तर होने चाहिए। एम्स में 13 साल के भीतर अब तक सिर्फ 11 विभाग ही शुरू हो पाए हैं। 31 विभाग अभी भी ऐसे हैं जिसके ताले तक नहीं खुले हैं। न ही एक्सपर्ट डॉक्टरों की नियुक्ति हो पाई है। 2003 में केंद्रीय मंत्री रही सुषमा स्वराज ने एम्स का भूमिपूजन किया। 2014 में डॉ. हर्षवर्धन यहां पर आए। जुलाई 2016 में केंद्रीय राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते और फिर केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा आए। लेकिन हालात जस के तस हैं। दागी कंपनी के हाथ 108 की कमान प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री और अधिकारी यह कहते फुले नहीं समा रहे हैं कि 108 एंबुलेंस सहित तीन अहम चिकित्सा सेवाओं का ठेका एक ही कंपनी को देखकर एकीकृत प्रणाली से जोड़ दिया गया है। लेकिन जिस कंपनी को इनके संचालन का ठेका दिया गया है वह दागी कंपनी है। दूसरे राज्यों की भाजपा सरकार के लिए जो जिगित्सा हेल्थ केयर लिमिटेड (जेडएचएल) भ्रष्टाचारी थी, उसे अफसरों ने बेस्ट परफॉरमर कंपनी बताकर 108 एंबुलेंस सहित तीन अहम चिकित्सा सेवाओं का ठेका दे दिया है। इस कंपनी के खिलाफ राजस्थान की भाजपा सरकार सीबीआई जांच करवा रही है। स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार की यूं तो अनेक नजीरें हैं लेकिन नया खेल इस आपात सेवाओं को लेकर है। योजना में बजट समूचा सरकार का और काम दक्षिण की निजी फर्म को। वह भी बिना किसी प्रतिस्पर्धा के। कहा जाता है कि इस संस्था के कर्ताधर्ता भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के करीबी हैं। इन्हीं के दबाव में भाजपा शासित अन्य राज्यों की तरह प्रदेश सरकार ने भी इस फर्म को उपकृत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा सड़क निर्माण के ठेके देने में भी फर्म के प्रति काफी उदारता बरती गई। प्रदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत उपलब्ध कराई जा रही चलित स्वास्थ्य सेवाओं (मोबाइल हैल्थ सर्विस) के लिए जेडएचएल को दिया गया ठेका विवादों में फंस गया है। दरअसल, जेडएचएल ने कई राज्यों में फर्जीवाड़ा किया है, लेकिन इस कंपनी का कनेक्शन इतना मजबूत है कि दागदार होने के बाद भी राज्यों में इस कंपनी को स्वास्थ्य सेवाओं की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। बताया जाता है कि कंपनी के दागदार हाने की खबर सरकार को भी थी, लेकिन वह अफसरों की रिपोर्ट पर विश्वास करते हुए उसे पूरे प्रदेश में एकीकृत प्रणाली के तहत 108 एम्बुलेंस, जननी एक्सप्रेस और मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) के संचालन जा जिम्मा दे दिया है। साथ ही कंपनी इन तीनों सेवाओं से संबंधित केन्द्रीयकृत कॉल सेंटर (104) को भी चलाएगी। जेडएचल की वेबसाइट के मुताबिक, यह कंपनी मध्य प्रदेश से पहले तक 10 राज्यों में स्वास्थ्य सेवाएं संचालित कर रही थी। इनमें से कई राज्यों में इस कंपनी पर अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। जांच की मांग हुई है। कहीं-कहीं तो सीबीआई जांच तक चल रही है। इसीलिए कुछ राज्यों में इसकी सेवाओं का या तो दायरा सीमित कर दिया गया है, या फिर इसे सेवा उपलब्ध कराने लायक ही नहीं समझा गया। लेकिन मप्र में इस कंपनी को साढ़े सात करोड़ लोगों के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी सौंप दी है। यहां बताते चलें कि 108 एम्बुलेंस सड़क दुर्घटनाओं में घायल हुए लोगों को अस्पताल पहुंचाने का काम करती है। जननी एक्सप्रेस गर्भवती महिलाओं और पांच साल तक के बच्चों को आपातकाल की स्थिति में उनके घरों से लेकर अस्पताल पहुंचाती है और ठीक होने पर उन्हें अस्पताल से घर छोड़ती है। तमाम सुविधाओं वाली एमएमयू के जरिए दूरदराज के उन इलाकों में शिविर लगाकर लोगों को स्वास्थ्य सुविधा दी जाती है जहां प्राथमिक अस्पताल भी नहीं हैं। स्थानीय वेंडरों का भी काम छिना अब तक हैदराबाद के कारोबारी गणपति वेंकट कृष्णा (जीवीके) रेड्डी की कम्पनी मप्र में केवल 108 एम्बुलेंस संचालित करती थी जबकि बाकी दो सेवाएं जिला और ब्लॉक स्तरों पर स्थानीय वेंडर चलाते थे। लेकिन स्थानीय वेंडरों के रोजगार के इस साधन को उनसे छिनकर अब, एकीकृत प्रणाली के तहत तीनों सेवाएं जेडएचएल को संचालित करने को दे दिया गया है। एक ऐसी कंपनी जिसका दामन दागदार है जीवीके यानि गणपति वेंकट कृष्णा रेड्डी की कंपनी हैै जो आंध्रप्रदेश के उद्यमी। बड़े उद्योग के क्षेत्र में इन्होंने पहले पॉवर संयंत्र की स्थापना 1997 में की। तब देश में एनडीए की सरकार थी और भाजपा के वरिष्ठ नेता अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री। यहां यह बताना इसलिए जरूरी है कि इस अल्पावधि में इस फर्म ने दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की और आज यह ऊर्जा के अलावा रिर्सोसेज, एवीएशन, ट्रांसपोर्टेशन, हॉस्पिटीलिटी व लाइफ साइंस समेत विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रही है। हास्पिटीलिटी यानि घायलों को तुरंत चिकित्सा सेवा मुहैया करवाने उन्हें अस्पताल पहुंचाना। यह कार्य भी इस समूह द्वारा किया जा रहा है। इसे इएमआरआई अर्थात इमरजेंसी मैनेजमेंट एंड रिसर्च सेंटर नाम दिया गया है। जीवीके फाउंडेशन के बैनर तले दी जा रही इस आपात सेवा के लिए टोल फ्री नंबर 108 है और आम बोलचाल की भाषा में इसे इसी नाम से जाना जाता है। जीवेके इएमआरआई वर्तमान में मध्यप्रदेश के अलावा छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, आंध्रप्रदेश, उत्तराखंड, गोआ, तमिलनाडू, कर्नाटक, असम, मेघालय, उत्तरप्रदेश, दादर नगर हवेली व दमन दीव में अपनी सेवाएं दे रहा है। खास बात यह है कि जीवीके ईएमआरआई फाउंडेशन की सेवाओं वाले इन अधिकांश राज्यों में भाजपा या एनडीए के घटक दलों की सरकार है। जो यह बताने के लिए काफी है कि भाजपा या उससे संबंद्ध घटक दल जीवीके पर खासे मेहरबान रहे हैं। लगा चुकी है करोड़ों की चपत एनआरएचएम के अधिकारियों का दावा है कि अपने शुरूआती दिनों में ही जीवीके ईएमआरआई 108 एंबुलेंस सेवा ने शासन को करोड़ों रुपए की चपत लगा चुकी है। स्वास्थ्य विभाग के उच्चाधिकारियों की मिलीभगत से एनआरएचएम का वह पैसा जो मप्र सरकार ने गरीब लोगों की जान बचाने दिया गया, जीवीके के अफसरों द्वारा आलीशान होटलों और महंगी हवाई व रल यात्राओं पर खर्च कर दिया गया है। अब तक करोड़ों की राशि अनावश्यक खर्चों में उड़ाई जा चुकी है। इतना ही नहीं, सरकार और जीवीके के बीच हुए अनुबंध की धज्जियां उडाकर मनमाने तरीके से सरकारी पैसे पर हाथ साफ किया गया है। जानकारों का कहना है कि सारे मामले की सही तरह से जांच से स्वास्थ्य विभाग के कई आला अफसरों पर भी गाज गिर सकती है। बताया जाता है कि ईएमआरआई द्वारा किए गए भ्रष्टाचार को लेकर तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री ने टिप्पणी कर नोटशीट स्वास्थ्य विभाग को भेजी थी। उस पर विभाग के तत्कालीन उप संचालक एनआरएचएम डॉ. एलबी अस्थाना ने 29 अप्रैल 2010 को इस कंपनी को आरोप पत्र के जवाब मांगें थे। जिसमें पूछा गया था कि जीवीक ईएमआरआई द्वारा अधिकारियों और कर्मचारियों पर कितनी राशि व्यय की जा रही है? क्या मप्र शासन द्वारा प्रारंभ में 100 एंबुलेंस खरीदी करने की राशि एवं अनमति दी गई थी? 108 एंबुलेंस सेवा के लिए विज्ञापन पर खर्च 30 लाख रुपए की अनुमति किससे ली गई? गेस्ट हाउस पर कितनी राशि खर्च की गई? हैदराबाद से विभिन्न कायक्रमों में कितने लोगों क बुलाकर उन पर कितनी राशि शासन की खर्च की गई? क्या इसकी अनुमति थी? वर्ष 2007-08 से वर्ष 2009- 10 में क्रय किए गए वाहन और उपकरणों पर कितना खर्च किया? एंबुलेंस उपकरण खरीदी, ईदगाह हिल्स भोपाल के भवन पर कितना खर्च किया गया? ईएमआरआई प्रमुख द्वारा शासकीय खर्च पर गोवा-हैदराबाद की हवाई और रेल यात्राओं पर कितना खर्च किया गया है। लेकिन कंपनी ने जवाब देना उचित नहीं समझा।

नर्मदा के नाम पर कारोबार, सेवा में दरकिनार...

कहां हैं 17,84,57,02,196 रूपए लेकर मौज करने वाले एजनीओ?
भोपाल। मप्र की जीवन रेखा नर्मदा को अवैध खनन से बचाने, प्रदूषण मुक्त करने प्रदेश सरकार नमामि देवी नर्मदे यात्रा निकाल रही है। इस यात्रा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, मंत्रीगण, सांसद, विधायक, नेता, अधिकारी-कर्मचारी, साधु-संत, पर्यावरणविद, प्रकृति प्रेमी और आमजन शामिल हो रहे हैं। लेकिन पर्यावरण, नदी और प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के नाम पर सेवा का कारोबार कर पिछले 5 साल में 17,84,57,02,196 रूपए कमाने वाले गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ)गायब हैं। कुछ एनजीओ शामिल हो भी रहे हैं तो वे महज औपचारिकता निभा रहे हैं। जबकि नर्मदा नदी सफेदपोश, माफिया और अफसरों के साथ ही उनके नाम पर समाज सेवा करने वालों के लिए भी कमाई का सबसे आसान जरिया बनी हुई हैं। यहां तक की यात्रा के दौरान नर्मदा के संरक्षण के तथाकथित सबसे बड़े पैरोकार नर्मदा बचाओ आंदोलन के लोग तो गायब हैं। दरअसल, नमामि देवी नर्मदे यात्रा पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में हो रही है। इस यात्रा में लोग स्व प्रेरणा से शामिल हो रहे हैं। ऐसे में किसी आयोजन-प्रयोजन की जरूरत नहीं पड़ रही है, जिससे एनजीओ की कमाई हो सके। इसलिए पूरे आयोजन से एनजीओ दूर हैं। हद तो यह है कि शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में जिस जन अभियान परिषद की सक्रिय भूमिका रहती है, उसकी सहभागिता भी कम नजर आ रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि साल भर नर्मदा के संरक्षण की बात करने वाले एनजीओ आखिर कहां हैं? जबकि नदी संरक्षण, पर्यावरण रक्षण और प्रदूषण निवारण के नाम पर प्रदेश के एनजीओ पिछले 5 सालों में 17,84,57,02,196 रूपए लेकर मौज कर रहे हैं। इस रकम में से 5,34,57,02,196 रूपए उन एनजीओ के हैं जिन्होंने विदेशों से यह राशि प्राप्त की है। 50 हजार एनजीओ किस काम के नमामि देवी नर्मदे यात्रा सरकारी आयोजन है इसलिए जन अभियान परिषद यात्रा की तैयारियों में जुटा हुआ है। क्योंकि मुख्यमंत्री इसके अध्यक्ष हैं और यात्रा भी उन्हीं की मंशा से निकाली जा रही है। लेकिन जन अभियान परिषद से रजिस्टर्ड तकरीबन 50 हजार से ज्यादा एनजीओ इस अभियान से गायब है। साल भर सरकारी फंड से सेवा के नाम पर मेवा खाने वाले इन एनजीओ की कोई पड़ताल भी नहीं कर रहा है। जबकि इन 50 हजार एनजीओ को पिछले पांच साल में 12500000000 रूपए जन अभियान परिषद द्वारा दिए गए हैं। लेकिन नदी संरक्षण को लेकर काम करने वाले कुछ चुनिंदा एनजीओ को छोड़कर सामाजिक चेतना की अलख जगाने का दावा करने वाले तमाम संगठनों के सदस्य सिर्फ इक्का-दुक्का पौधे रोपकर ही अपने कर्तव्य से इतिश्री कर रहे हैं। नर्मदा तटों पर रोजाना सुबह से रात तक हजारों श्रद्धालु गंदगी फैलाकर चले जाते हैं। लेकिन इन्हें जागरूक करने वाले सैकड़ों एनजीओ कभी, कहीं नजर नहीं आते। ज्ञातव्य है कि समाज के समग्र विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपने व्यवस्थागत ढांचे का अतिक्रमण कर शासन ने स्वैच्छिक संगठनों के अस्तित्व को मान्यता दी है। जनता और सरकार के बीच सेतु के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं और सामुदायिक संगठनों को विकास की सशक्त इकाई के रूप में विकसित करने के उद्देश्य हेतु मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद का गठन किया गया है। यह परिषद शासन को सलाह देने, सामुदायिक भागीदारी प्रोत्साहित करने, स्वयंसेवी संस्थाओं से संबंधित प्रक्रियाओं की जानकारी समेकित कर नीतियों के क्रियान्वयन के लिये एक समन्वयक अभिकरण के रूप में कार्य करती है। इसके तहत जन अभियान परिषद में 50 हजार से अधिक एनजीओ रजिस्टर्ड हैं। संस्थाएं पर्यावरण संरक्षण, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा, जल संरक्षण और कुपोषण उन्मूलन के क्षेत्र में कार्य करती हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में देखा गया है कि अधिकांश एनजीओ केवल फंड लेने तक ही सीमित हैं। अधिकांश एनजीओ रसूखदारों के होने के कारण जन अभियान परिषद कोई कार्रवाई भी नहीं कर पा रहा है। इसलिए अभी हाल ही में अभियान ने स्वयंसेवी संस्थाओं को सीधी फंडिंग बंद कर दी है। पहले जन अभियान परिषद इन संस्थाओं को 50 हजार रुपए सालाना देता था। नए नियम में अब परिषद केवल इनके सदस्यों को ट्रेनिंग देगी और इनकी सहायता का बजट भोपाल पर निर्भर करेगा। अपनी फंडिंग बंद होने से एनजीओ ने नमामि देवी नर्मदे यात्रा से भी मुंह मोड़ लिया है। सेवा यात्रा से नहीं जुड़े एनजीओ जन अभियान परिषद के माध्यम से एनजीओ को बकायदा उनके काम के हिसाब से बजट आवंटित किया जाता है। लेकिन प्रदेश स्तर पर चल रही नर्मदा सेवा यात्रा में जागरुकता फैलाने के लिए एक भी एनजीओ को इससे नहीं जोड़ा जा सका। नर्मदा सेवा यात्रा में सिर्फ जनअभियान परिषद के कर्मचारी, सदस्य, नगर पंचायत, ग्राम पंचायत, निकाय व जिलास्तर पर काम रहे सरकारी कर्मचारी-अधिकारी ही काम कर रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जन अभियान परिषद से जुड़े एनजीओ आम दिनों में नर्मदा को निर्मल बनाने के लिए क्या काम कर रहे होंगे। जबकि शासन स्तर से स्पष्ट आदेश जारी हुए थे कि सभी सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाओं को इस यात्रा से जुडऩा है। हैरानी की बात यह है कि नमामि देवि नर्मदा सेवा यात्रा को सफल बनाने के लिए भरसक कोशिश करने का दावा करने वाले जनअभियान परिषद कार्यालय ने भी अपनी सेवा देने के लिए किसी भी एनजीओ से संपर्क नहीं साधा। यदि एनजीओ सदस्यों को साथ लिया जाता तो नर्मदा किनारे वाले गांवों में जागरुकता अभियान चलाने, स्वच्छता फैलाने में सरकारी अमले को मदद मिलती। जन अभियान परिषद के भीमसेन डामोर कहते हैं कि नदियों के संरक्षण पर काम करने वाली एनजीओ नर्मदा सेवा यात्रा में शामिल नहीं हैं। अभी कितनी एनजीओ इस विषय पर काम कर रही है, ये ब्योरा देखना होगा। डॉलर से बंधे सरोकार दरअसल, स्वयंसेवी संगठन का गठन कर देश, प्रदेश में विदेश पूंजी कमाना एक बड़ा धंधा बन गया है। आईबी की रिपोर्ट को छोड़ भी दें तो हम पाते हैं कि पिछले 10 सालों में विदेशी पैसे पर चलने वाली एनजीओ की पूरी कार्यप्रणाली देश की विकास परियोजनाओं में रोड़ा अटकाने वाली रही है। मानवाधिकार, पर्यावरण सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता, असमानता आदि के नाम पर देश की बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को रोका गया है, चाहे वह नर्मदा नदी पर बनने वाली सरदार सरोवर परियोजना हो या कोई अन्य परियोजना। लेकिन आज जब नर्मदा को बचाने के लिए सरकार मैदान में उतरी है तो एनजीओ मैदान से गायब हैं। नर्मदा को बचाने के नाम पर सरदार सरोवर परियोजना का विरोध करने वाली नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेत्री मेधा पाटकर आज कहां हैं। सरदार सरोवर परियोजना का उद्देश्य गुजरात के सूखाग्रस्त इलाकों में पानी पहुंचाना और मध्य प्रदेश के लिए बिजली पैदा करना है। लेकिन डॉलर के लिए विरोध किया जा रहा है। विदेशी चंदा लेने वालों की दुकान बंद समाज सेवा के नाम पर विदेशों से चंदा लेकर विकास कार्यों को बाधित करने वाले गैर-सरकारी संगठनों की दुकान पर सरकारी ताला डलने लगा है। हाल ही में केंद्र सरकार ने देश में चल रहे तैंतीस हजार गैर-सरकारी संगठनों में से करीब बीस हजार संगठनों के लाइसेंस रद््द कर दिए हैं। सरकार ने यह कार्रवाई तब की, जब पाया गया कि ये एनजीओ विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन कर रहे हैं। यानी जिन एनजीओ का एफसीआरए लाइसेंस रद््द किया गया है, वे अब विदेशी चंदा नहीं ले सकेंगे। इस कार्रवाई के बाद अब देश में सिर्फतेरह हजार एनजीओ कानूनी तौर पर मान्य हैं। गौरतलब है कि एनजीओ के कामकाज की समीक्षा की कवायद करीब एक साल पहले शुरू हुई थी। इसी प्रक्रिया के तहत यह कदम उठाया गया है और सरकार द्वारा विदेशी चंदा नियमन कानून का पालन नहीं करने के कारण कुछ एनजीओ पर ये बंदिशें लगाई हैं। सरकार ही नहीं, आमजन के मन में भी गैरसरकारी संगठनों के कामकाज और उनके पास आ रहे धन के इस्तेमाल को लेकर हमेशा से ही सवाल रहे हैं। विदेशी योगदान के आंकड़ों पर गौर करें तो ताजा आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2013-14 की तुलना में वर्ष 2014-15 में गैर सरकारी संगठनों को विदेशी धन दोगुना मिला है। लेकिन संगठनों ने इस फंड का क्या किया इसका हिसाब नहीं है। इसलिए केंद्र सरकार ने 10,000 एनजीओ पर विदेशों से फंड न लेने का प्रतिबंध लगाया है। प्रदेश में विदेशों से फंड लेकर काम करने वाले जिन एनजीओ पर बैन किया गया है उनमें समरीतन सेवा सदन, सहयोगिनी ट्रस्ट, साहस वॉलेंट्री सोसायटी, सागर महिला एवं बाल समिति, साधना विनय मंदिर, रिसोर्सेस डेव्लपमेंट इन्सिट्यूट, रिहैबीलिएशन कम वर्क सेंटर फॉर फिजिकली हैंडिकैप्ड, रिच कम्यूनिटी डेव्लपमेंट प्रोजेक्ट, रामा महिला मंडल, राहोद एजुकेशन सोसायटी, रफी अहमद किदवई एजुकेशन सोसायटी, पुष्पांजलि छात्र समिति, पुष्पा कान्वेंट, एजुकेशन सोसायटी, प्रखर प्रज्ञा शिक्षा प्रसार एवं समाज कल्याण समिति सागर, पिपुल्स फॉर एनिमल, न्यू शिवम व्यावसायिक युवती मंडल, नेशनल लॉ इन्सिट्यूट युनिवर्सिटी, नर-नारायण सेवा आश्रम, एमपी ब्रांच ऑफ नेशनल एसोसिएशन फॉर दा बलाइंड, शोसित सेवा संस्थान, श्रीकृष्ण ग्रामोत्थान समिति, श्रीकांत विकलांग सेवा ट्रस्ट, श्री चित्रगुप्त शिक्षा प्रसार समिति, श्री शिव विद्या पीठ, श्रम निकेतन संस्थान, शिवपुरी जिला सेवा संघ, शिव कल्याण एवं शिक्षा समिति, शिक्षा एवं ग्रामीण विकास केंद्र, शांति महिला ग्रह उद्योग कूप सोसायटी, शांति बाल मंदिर, श्री स्वामी के.विवेकानंद कुस्ता मुक्ता आश्रम, सेठ मन्नुलाल दास ट्रस्ट हॉस्पिटल, सतपुड़ा आदिवासी विकास समिति, सार्वजनिक सेवा समाज, सार्वजनिक परिवार कल्याण एवं सेवा समिति, शंकर,संजीवन आश्रम, संगम नगर शिक्षा समिति, समदर्शी सेवा केंद्र, अंजुमन इस्लामिया, अदिम जाति जाग्रति मंच, आर्दश लोक कल्याण (आलोक) संस्थान, आचार्य विद्यासागर गाऊ संवर्धन केंद्र, अभिव्यक्ति, असरारिया अल्पसं यक एजुकेशन चिकित्सा एवं वेलफेयर सोसायटी, आरोही-डेव्लपमेंट एवं रिसर्च सेंटर, अर्ध आदिवासी विकास संघ, मिशन हॉस्पिटल, मिशन हायर सेकण्ड्री स्कूल, मिशन हायर सेकण्ड्री स्कूल, मिशन गल्र्स प्राइमरी स्कूल, मिशन फॉर वेलफेयर एवं ट्रिबल चाइल्ड एंड वुमन, मेथोडिस्ट वुमन वर्क , मेथोडिस्ट वुमन प्रोजेक्ट, मिनू क्रिश्चन एजुकेशन सोसायटी, मेडीकेयर एंड रिसर्च फाउण्डेशन, मसीही प्राथमिक विद्यालय, मसीही माध्यमिक विद्यालय, मसीही कन्या विद्यालय हॉस्टल, मसीही हायर सेकण्ड्री स्कूल, मसीही हायर सेकण्ड्री स्कूल, मंजू महिला समिति, मंदसौर जिला समग्र सेवा संघ, मालवांचल विकास परिषद, मैत्री एजुकेशनल एंड कल्चरल एसोसिएशन, महिला परिषद, महिला एजुकेशन सोसायटी, महिला अध्ययन केंद्र, मध्यप्रदेश ग्रामीण विकास मंडल, मध्यप्रदेश हैरीटेज डेव्लपमेंट ट्रस्ट, माधवी महिला कल्याण समिति, मातृ सेवा संघ, लुथेरन मिशन हॉस्टल, लॉयन चैरीटेबल ट्रस्ट, कोठारी एजुकेशनल फाउण्डेशन, किसान खादी ग्रामद्योग संस्थान, खंडवा डिस्ट्रिक्ट वुमन वर्क, कर्मपा मल्टीपरपस कूप सोसायटी, कानपुर मिशन प्राइमरी स्कूल, कला जाग्रति परिवार, जोहरी क्रिएशन स्टूडेंट हॉस्टल, जन-कल्याण आश्रम समिति, जाग्रति सेवा संस्था, जगत गुरू राम भद्रचर्या विकलांग सेवा संघ, जबलपुर मिशन हॉस्पिटल प्रोजेक्ट-1641, जे.डी. सोशल डेव्लपमेंट आर्गनाइजेशन, इंदौर स्कूल ऑफ सोशल वर्क, इंदिरा गांधी एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, इंडिया चर्च काउंसिल डिसीप्स ऑफ क्रिस्ट, हेवेंली पाइंट ऑफ एजुकेशन सोसायटी, हरित, एच.सी. मिशन हायर सेकण्ड्री स्कूल, ग्वालियर फॉरेस्टर सोसायटी, गुरू तेज बहादुर चैरीटेबल हॉस्पिटल ट्रस्ट, गुरू राजेंद्र सूरी चिकित्सालय एंड नेत्र अनुसंधान केंद्र, गायत्री शक्ति शिक्षा कल्याण समिति, ग्रासिम जन कल्याण ट्रस्ट, ग्रामोदय चेतना मंडल, गर्वमेंट पॉलिटेक्निक, गौवंश रक्षा समिति (अक्षय पशु-पक्षी सेवा सदन), गोंडवाना फाउण्डेशन, गरीबनवाज फाउण्डेशन फॉर एजुकेशन, जी.सी. मनोनित मिशन, गैस पीडि़त राहत समिति, गंगापुर युवा क्लब, गगन बाल मंदिर, फ्रेंड्स रूरल सेंटर, इकोनॉमी लाइफ कमेटी, ई.बी.ए. मिशन को-एजुकेशनल स्कूल, ईएलसी वेलफेयर एसोसिएशन, डॉ. पाठक चाईल्ड एंड मदर वेलफेयर सोसायटी,डिस्ट्रीक्ट वुमन वर्क, दिशा सामाजिक एंड विकास युवा मंडल, ड्यिोसेस ऑफ जबलपुर, धनवंतरी शिक्षा समिति, धनंतरी क्रिश्चन हॉस्पिटल, डेवलपमेंट फंड बोर्ड ऑफ सेकण्ड्री एजुकेशन, दारूल अलूम, कार्पोरेशन बास्केटबॉल ट्रस्ट, कनज्यूमर एंड राईट एसोसिएशन, काफ्रेंस ऑफ एसएस पीटर एंड पॉल (सोसायटी ऑफ सेंट. विनसेट डी पॉल), कम्यूनिटी हेल्थ सेंटर, क्रिश्चया बंधूरकूलम फैमली हेल्पर प्रोजेक्ट, क्रिश्चन हॉस्पिटल वेस्ट निमार, क्रिश्चन हॉस्पिटल दमोह, क्रिश्चन हॉस्पिटल, क्रिश्चन हिंदी मिडिल स्कूल, क्रिश्चन बॉयज एंड गल्र्स हॉस्टल, क्रिश्चन एसोसिएशन फॉर रेडिया एंड विजिवल सर्विस, क्रिश्चन एसोसिएशन फॉर रेडियो एंड ऑडियो विजिवल, चिनमय सेवा ट्रस्ट, चिल्ड्रन होम, छत्तीसगढ़ विकास परिषद, चांदबाद विद्या भारती समिति, चंबल बाल एवं महिला कल्याण समिति, सेंट्रल एमप्लाई स्पोंसर्स रिलीफ ट्रस्ट, सीएएसए पतपरा मंडला डेवलपमेंट प्रोजेक्ट, बरगेस इंग्लिश हायर सेकेण्ड्री स्कूल, बुंदेलखंड क्रिश्चन सोशल सर्विस, ब्रिलियंट स्टार एजुकेशन सोसायटी, ब्राइट स्टार सोशल सोसायटी, भोपाल टेक्निकल एंड ट्रेनिंग सेंटर, भोपाल स्कूल ऑफ साईंस, भोपाल सेल्सस सोसायटी, बाल प्रगति एवं महिला शिक्षा संस्थान, अविनाश, ऑडियो विजिवल प्रोजेक्ट, सचिदानंद हॉस्पिटल, आसरा सामाजिक कल्याण समिति, एरिया एजुकेशन कमेटी, अद्र्ध आदिवासी विकास संघ, नागरथ चेरिटेबल पुष्पकुंज हॉस्पिटल, पार्टीसिपेट्री रिसर्च एंड इन्वेंसन इन, संवाद, सदर मिशन प्राइमरी स्कूल, साइकोन शिक्षा एंव ग्रामीण विकास समिति, भोपाल एसडीए इंग्लिश स्कूल, श्री अरबिंदो एंड मदर वनिता एमपॉवरमेंट ट्र्स्ट, चेतना मंडल, सोशल इकोनोमिक विलेजर्स एडवांसमेंट, तुलसी मानव कल्याण सेवा संस्थान, क्रिश्चन एनडेवर हॉस्टल, लोक कल्याण समिति, बीसीएम इंटरनेशनल, शांतिपुर लेप्रोसी हॉस्पिटल, सानिध्य, पी. नाथूराम चौबे महिला समिति, आधार सेवा केंद्र, दा गोस्पल सेंट्रल चर्च, राजीव गांधी प्राथमिक शिक्षा मिशन, खरूना चिल्ड्रन हॉस्टल, डब्ल्यूएमई ऑफ डग्लस मेमोरियल चिल्ड्रन होम, मासी उच्चतर विद्यालय, चंबल पर्यावरण सोसायटी, अमरजेंसी रिलीफ कमेटी, भारत सेवक समाज, क्रिश्चन बॉयज हॉस्टल, नव सर्वोदय विकास समिति, खुरई टेक्निकल एजुकेशन सोसायटी, केंसर केयर ट्रस्ट एंड रिसर्च फाउण्डेशन, तोलाबी चैरीटेबल ट्रस्ट, महर्षि महेश योगी वेदिक विश्व विद्यालय, वॉकेशनल ट्रेनिंग इंसिट्यूट स्कूल, सदाशिव शांति शिक्षा समिति, अनुसूचित जाति/ जनजाति कल्याण संघ, मोमिन वेलफेयर एजुकेशन सोसायटी, जनसेवा शिक्षा समिति, शिव शिक्षा समिति चुरहट, मध्यप्रदेश आदिवासी बाल महिला कल्याण समिति, खादी ग्रामोद्योग सेवा आश्रम, हेल्थ एजुकेशन एंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट, महिला जागरण समिति, सतपुड़ा इंटीग्रेटेड रूरल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट, नव क्रांति शिक्षा समिति, मसीही माध्यमिक विद्यालय, कृषक महिला समाज पानधुक्रा, एसोशिएशन फार कंप्रेसिंव रूरल असिसटेंस, कैथोलिक संस्थान जसपुर अग्रिकोण परीक्षेत्र, लुथरन होस्टल, आदिवास विकास एवं प्रशिक्षण संस्थान,सरस्वती महिला कल्याण, कांग्रेगेशन ऑफ सिस्टर ऑफ द एडोरेशन ऑफ द ब्लेस्ड सिस्टर्स, गजेंद्र शिक्षा प्रसार समिति, सैन्ट जॉर्ज कांवेंट इंग्लिस स्कूल, महाकोशल महिला शिक्षा समिति, महिला कौशल शिक्षा समिति, जयशक्ति ट्रस्ट सागर, किशन सेवा समिति, संजय बाल सेवा, उद्योग मंडल गोहारा, आश्रय सर्विस फार रूरल पूर, द नागपुर, लतहारन मिशन ऑफ सोल्यूशन, शर सयैद एजूकेशनल एण्ड शोसल वेलफेयर सोसायटी, योगा रिसर्च इंन्सट्यूट, नेशनल भोपाल डास्टर रिलाफ आर्गनाइजेशनशन, सृजन वेलफेयर सोसायटी, पर्यावरण सुधार समिति, सेंटर फॉर एंटरप्रीनरशिप डवलपमेंट एम. पी. झरनेश्वर महिला विकास एण्ड शिक्षण समिति, ग्रामीण विकास परिषद, फेडरेशन ऑफ एम.पी. वूमेन एण्ड चाइल्ड वेलफेयर एजेंसीज, महारनी लक्ष्मी बाई भोपाल जन कल्याण समिति, मीडिया सेंटर इंटर नेशनल हाउस, नव आदर्श शिक्षा एण्ड ग्रामीण विकास समिति, एम.पी. सिस्टर सोसायटी, संदेश मिशन हॉस्पिटिल,बंजा बामिया डबलपमेंट प्रोजेक्ट, जनहित सेवा केंद्र, कस्तूरबा वनवासी कन्या आश्रम, एम.पी. पस्तोरस कॉर्नफ्रेंस, श्री शांति शिशु मंदिर समिति, स्कॉट मेमोरियल वूमेन होस्टल, सरस्वती सेंट्रल अकादमी एजूकेशनल सोसायटी, वोल्यूनटरी एण्ड डवलपमेंट सोसायटी, भोपाल डॉयोसेेस भ्लेज डवलपमेंट प्रोग्राम, केनेडियन प्रेसवाइटेरियन, मिशनरी कमेटी, मानव विकास विज्ञान केंद्र, हॉयर एजूकेशन लायब्रेरी प्रोजेक्ट, विश्वास कल्याण समिति, आदर्श शिशु बिहार, प्यारे लाल गुपता समिति ल्यूपिन मानव कल्याण एवं शोध संस्थान, नई किरन महिला परिषद आदि। केवल कमाई के लिए गठन देश में एनजीओ का गठन केवल कमाई के लिए होता है। मध्य प्रदेश के संदर्भ में बात करें तो यहां के करीब 500 एनजीओ ने पिछले 5 साल में करीब 5,34,57,02,196 रूपए की विदेशी सहायता पाई है। जिनमें आधे से अधिक की कार्य प्रणाली संदेह के घेरे में है। संदेहास्पद एनजीओ की जांच चल रही है। अभी तक आईबी की जांच में जिन एनजीओ की गतिविधियां संदेहास्पद मिली है उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है। वर्ष 2012 में ऐसे ही 92 एनजीओ के फॉरेन कंट्रीब्यूशन रजिस्ट्रेशन एक्ट (एफसीआरए) लाइसेंस को रद्द कर दिया था। वहीं वर्ष 2014 में 1 एनजीओ पर बैन लगा था। जबकि 2016 में सरकार ने 250 एनजीओ पर बैन लगाया है। सरकार द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के अनुसार, 2010-2011 में मप्र के 468 एनजीओ को 1456495900.11 रूपए विदेशी सहायता के रूप में मिली थी। इसी प्रकार वर्ष 2011-2012 में 474 एनजीओ को 1547493703.80 रूपए, वर्ष 2012-2013 में 363 एनजीओ को 1660899947.66, वर्ष 2013-2014 में 54 एनजीओ को 249535061.58 रूपए, वर्ष 2014-2015 में 78 एनजीओ को 4687550425.25 रूपए मिले हैं। इन रूपयों का कहां और किस उद्देय से खर्च किया गया है उसमें कई विसंगतियां सामने आई हैं। जिससे एनजीओ संदेह के घेरे में हैं। दरअसल, एनजीओ कमाई का सबसे बड़ा जरिया बन गया है। यही कारण है कि पिछले दो दशक में हमारे देश में एनजीओ की संख्या तेजी से बढ़ी है। एक आंकड़े के अनुसार, देश में बीस लाख से अधिक एनजीओ सोसायटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, ट्रस्ट एक्ट आदि में पंजीकृत हैं। इनमें सक्रिय रूप से काम करने वाले संगठनों की संख्या, पंजीकृत संख्या के मुकाबले काफी कम है। जबकि समाज सेवा के लिए दिए जा रहे पैसों का गलत इस्तेमाल करने वाले गैर-सरकारी संगठन बड़ी संख्या में हैं। अब तक कई बड़े और जाने-माने गैर-सरकारी संगठनों द्वारा विदेशी चंदे के दुरुपयोग के मामले सामने भी आ चुके हैं। इनमें से एक है नर्मदा बचाओ आंदोलन। रेवा सेवा भक्त मंडल के अध्यक्ष बलराम पटेल कहते हैं कि नर्मदा के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है। नर्मदा स्वच्छता पर काम पर करने वाले एनजीओ की मॉनीटरिंग होनी चाहिए। नर्मदा बचाओ आंदोलन कहां है तथाकथित तौर पर नर्मदा बचाओ आंदोलन नर्मदा के संरक्षण के लिए काम करने वाला सबसे बड़ा हितैषी है। अब जब नर्मदा और उसके आसपास के पर्यावरण को बचाने के लिए सरकार खुद मैदान में उतरी है तो आंदोलन कहां है? दरअसल, नर्मदा बचाओ आंदोलन का यह 30 साल से अधिक समय से चल रहा आंदोलन विकास में बाधक के रूप में देखा जा रहा है। दरअसल, नर्मदा बचाओ आंदोलन तब उभरा जब नर्मदा घाटी विकास परियोजना के तहत नर्मदा और उस की सहायक नदियों पर 30 बड़े, 135 मध्यम और 3,000 छोटे बांधों के निर्माण की योजना तैयार हुई। उस समय, कई प्रदर्शनकारी समूह, छात्र गुट, गैर सरकारी संगठन और अंतर्राष्ट्रीय तंत्र पहले से ही तीन बांध प्रभावित राज्यों, मध्यप्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र में सक्रिय थे। उनमें से ही एक गुजरात का युवा समूह था, छात्र युवा संघर्ष वाहिनी, जिसने पीडि़तों को अच्छा पुनर्वास पैकेज दिलाने के लिए सरकार को बाध्य किया, साथ ही वे इस बात को भी सुनिश्चित करते रहे कि सरकार अपने वादे पर बरकरार रहे। वहीं मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ ऐसे समूह दिखाई दिए जो पहले अच्छे मुआवजे की मांग कर रहे थे, लेकिन बाद में इस तरह की परियोजनाओं को पूरी तरह बंद करने की बात करने लगे। यह समूह थे, नर्मदा घाटी नवनिर्माण समिति (मध्य प्रदेश) और नर्मदा घाटी धरनग्रस्ठा समिति (महाराष्ट्र)। बाद में इनका आपस में विलय हो गया और वर्ष 1989 में इसने नर्मदा बचाओ आंदोलन का रूप ले लिया। जब बांध के निर्माण पर रोक लगाने की बात कही जा रही थी, तब इस समूह ने कृषि, बिजली और पीने के पानी की समस्या से निपटने के लिए कुछ विकासात्मक विकल्प भी प्रस्तावित किए। पर यह विरोध सिर्फ बांध का नहीं अपितु उस प्रणाली का भी था जो जवाबदेही से कतराती थी। जवाबदेही विश्व बैंक की परियोजना के दावों पर और जवाबदेही सरकार की उसके प्रभावों पर। मेधा पाटेकर के नेतृत्व में आंदोलन सबसे पहले सरदार सरोवर बांध के विरोध के साथ शुरू हुआ लेकिन जल्दी ही महेश्वर, इंदिरा सागर, ओंकारेश्वर, मान, बेड़ा, गोई और जोबट जैसे छोटे-छोटे बांधों का भी विरोध होने लगा। इन लोगों ने संघर्ष और पुनर्निर्माण या संघर्ष और नवनिर्माण के सिद्धांत को अपनाया। और इस विचारधारा ने इस आंदोलन की रुपरेखा तैयार कर इसकी नींव खड़ी की। लेकिन आंदोलन को लेकर लोगों की जो अवधारणा थी वह वास्तविकता के बिल्कुल विपरीत थी। आंदोलन में जानी-मानी हस्तियों का आना घट गया, बड़ी संख्या में एकजुट लोग आंदोलन से अलग होने लगे और देखते ही देखते वह अडिग सा प्रतीत होने वाला आंदोलन कमजोर पडऩे लगा। दरअसल, आंदोलन द्वारा विदेशों से फंड लेकर परियोजनाओं के विरोध की बात सामने आने लगी। इससे आंदोलन से प्रतिष्ठित लोग दूर होने लगे। अब जब सरकार ने नर्मदा नदी की सुध लेनी शुरू की है तो आंदोलन सहित अन्य एनजीओ को लगने लगा है कि अब उनकी दुकान छिनने वाली है। इसलिए वे सरकार के इस कार्यक्रम में शामिल नहीं हो रहे हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन की अमूल्य निधि के अनुसार नर्मदा के पानी को सबसे अधिक सरकार ने प्रदूषित किया है। नर्मदा को बर्बाद करने के लिए जिम्मेदार सरकार अब कौन सा मेवा पाने की चाहत रखती है? नर्मदा को 165 बांधों से बांधकर तालाबों में परिवर्तित करने वाली सरकार नदी रूप को समाप्त करने पर अमादा है। नमामि देवी नर्मदे यात्रा मात्र दिखावा है। वहीं नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर ने नर्मदा सेवा यात्रा पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि यह यात्रा नर्मदा को बचाने के लिए नहीं, बल्कि अपने खास उद्योगपति मित्रों को पर्यटन का ठेका और सभी संसाधनों का मेवा सौंपने के लिए निकाली जा रही है। ज्ञात हो कि राज्य सरकार ने अमरकंटक से 11 दिसंबर को 144 दिन की सेवा यात्रा शुरू की है। यह यात्रा लगभग 1100 गांव से होकर गुजरेगी और 3,350 किलोमीटर का रास्ता तय करेगी। इस यात्रा का समापन 11 मई 2017 को अमरकंटक में ही होगा। इस यात्रा के दौरान जगह-जगह गोष्ठी, जनसंवाद, परिचर्चाएं आयोजित की जा रही हैं। मुख्य यात्रा में गांवों से निकलने वाली उप यात्राएं इसमें शामिल हो रही हैं। नर्मदा के घाटों पर आरती हो रही है। सरकारी तौर पर इस बात के दावे किए जा रहे हैं कि नर्मदा सेवा यात्रा को भारी जन समर्थन मिल रहा है। यही कारण है कि इस यात्रा के दौरान अब तक पांच हजार से ज्यादा किसान अपने खेतों में पौधरोपण की सहमति दे चुके हैं, वहीं लगभग सात हजार पौधे लगाए भी जा चुके हैं। नर्मदा नदी के आसपास के जंगलों की वीरानी और नदी का थमा प्रवाह हर नर्मदा प्रेमी को विचलित कर देता है, अगर वास्तव में यह वीरान जंगलों में हरियाली लौटी और नर्मदा का प्रवाह पूर्ववत हुआ तो उसे यात्रा की सफलता के तौर पर गिना जाएगा। नर्मदा के सेवक संत भैया जी सरकार कहते हैं कि नर्मदा की सफाई करने, नर्मदा सेवा समितियां बनाने, अवैध उत्खनन रोकने के लिए मैंने अभियान शुरू किया था। इसके लिए मैंने जगह-जगह सभाएं की और सरकारी को उनकी कमियां बताईं। प्रदेश सरकार ने मेरे अभियान को गंभीरता से लिया और अब नर्मदा सेवा यात्रा शुरू की है। मैं सीएम शिवराज सिंह चौहान द्वारा शुरू की गई सेवा यात्रा के साथ हूं और हमेशा रहूंगा। विकास में रोड़े बने एनजीओ आईबी की रिपोर्ट के अनुसार विदेशों से करोड़ों रुपए का फंड लेकर कुछ एनजीओ भारत की खराब तस्वीर विदेशों में प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी गई आईबी रिपोर्ट में विदेशी अनुदान प्राप्त करने वाले स्वयंसेवी संगठनों को देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरनाक करार देते हुए यहां तक कहा गया है कि जीडीपी में दो से तीन फीसदी की कमी के लिए यह एनजीओ जिम्मेदार हैं। केंद्र में मोदी सरकार का गठन होने के बाद से ही जिस तरह यह रिपोर्ट सामने आई उससे यह स्पष्ट है कि उसे पहले ही तैयार कर लिया गया होगा। आश्चर्य नहीं कि उसे जानबूझ कर दबाए रखा गया हो। एनजीओ को विदेशी सहायता लेने के लिए विदेशी सहायता नियामक कानून (एफसीआरए) के तहत गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी होती है। इसके लिए एनजीओ को बताना पड़ता है कि विदेशी मदद का उपयोग सामाजिक कार्यों के लिए किया जाएगा। आईबी की रिपोर्ट से साफ है कि कुछ एनजीओ विदेशी सहायता का उपयोग सामाजिक कामों के लिए न कर देश आईबी की रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को तीन जून 2014 को सौंपी गई। हकीकत यह है कि अपने देश में गैर-सरकारी संगठन बनाना एक कारोबार बन गया है। अधिकांश संगठन ऐसे हैं जो बनाए किसी और काम के लिए जाते हैं लेकिन वह करते कु छ और हैं। शायद उनकी ऐसी ही गतिविधियों को देखते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने कुछ समय पहले यह कहा था कि 90 फीसदी एनजीओ फर्जी हैं और उनका एकमात्र उद्देश्य पैसा कमाना है। पुलिसकर्मियों से अधिक एनजीओ ! एनजीओ का धंधा कितना चोखा है इसका अंदाजा इसी से लगाया जाता सकता है कि देश मेें पुलिसकर्मियों की संख्या से अधिक तो एनजीओ हैं। केंद्र सरकार की ऐसे स्वयं सेवी संगठनों यानि एनजीओ पर तीखी नजर है, जो कागजों पर जन सेवा करके सरकारी कोष का दुरुपयोग करती आ रही है। हालांकि सरकार समय-समय पर ऐसी संस्थाओं को जांच के बाद काली सूची में डालने की सतत कार्यवाही करती आर रही है। केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए एनजीओ का सहारा भी लिया जाता है। जो अवैध कमाई का जरिया-सा बन गया है। दिलचस्प पहलू यह भी है कि कैग भी एनजीओ के पंजीकरण पर अपनी रिपोर्ट में सवाल खड़ा कर चुकी है। वहीं केंद्रीय जांच एजेंसी ने हाल ही में देश के भीतर एनजीओ की भारी संख्या को लेकर सवाल सुप्रीम कोर्ट को एक रिपोर्ट सौंपी है। सीबीआई की इस रिपोर्ट में 20 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों का ब्योरा जुटाने की बात कही गई है, जहां 22 लाख 45 हजार 655 एनजीओ काम कर रहे हैं। यह भी संभावना जताई गई है कि एनजीओ की वास्तविक संख्या इससे भी काफी अधिक हो सकती है, क्योंकि इस रिपोर्ट में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, ओडिशा, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों के एनजीओ शामिल नहीं हैं। रिपोर्ट में शािमल एनजीओ में से 2 लाख 23 हजार 478 ने सोसायटी रजिस्ट्रार के पास अपना रिटर्न दाखिल किया है, जो करीब दस प्रतिशत आंका जा सकता है। यानि ऐसी संस्थाएं 10 प्रतिशत से भी कम अनुदान और खर्चे को लेकर बैलेंस शीट का ब्योरा जमा करवाते हैं। एक अनुमान के अनुसार 1.25 अरब की आबादी वाले भारत में औसतन 535 लोगों पर एक एनजीओ है, जबकि गृह मंत्रालय के आंकड़ों की माने तो देशभर में एक पुलिसकर्मी के हिस्से में 940 लोग आ रहे हैं। संसद के पिछले सत्र के दौरान एनजीओ को लेकर उठे सवालों में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थांवर चंद गहलोत ने भी स्वीकार किया था एनजीओ सरकारी फंड में हेरफेर कर अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने की गतिविधियों में लिप्त हैं जिन पर नकेल कसने के लिए सरकार ने कवायद शुरू कर दी है। उनके अनुसार सरकारी धन का दुरुपयोग करने वाली एनजीओ के 26 मामले सामने आए थे, जिनमें से जांच के बाद चार एनजीओ को काली सूची मेें डाल दिये गए हैं और सरकार ऐसे एनजीओ को दंडित करने की तैयारी भी कर रही है। असली परिक्रमा तब होगी जब बड़े गुनहगारों पर गाज गिरेगी एक तरफ नमामि देवी नर्मदे यात्रा से एनजीओ गायब हैं और दूसरी तरफ विपक्ष और नर्मदा बचाओ आंदोलन इसे राजनीतिक यात्रा मान रहा है। नर्मदा बचाओ आंदोलन और आप के नेता आलोक अग्रवाल कहते हैं कि सरकार नर्मदा के नाम पर राजनीति कर रही है। अमरकंटक से शुरू हुई नमामि देवी नर्मदे यात्रा मई 2017 तक नर्मदा के किनारे स्थित जिन 1100 गांवों से होकर गुजरेगी वे सभी अवैध खनन की चपेट में हैं। रसूखदारों ने इन गांवों को एक तरह से अपने कब्जे में ले रखा है। आलम यह है कि खनन से गांवों की आबोहवा खराब हो रही है। पर्यावरण दुषित हो रहा है। अगर कभी गांव वाले अवैध खनन का विरोध करते हैं तो उन्हें इसका खामियाजा भी उठाना पड़ता है। इस काम में स्थानीय प्रशासन भी माफिया के साथ देता है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि मिलीभगत से हर साल हजारों करोड़ रूपए की अवैध रेत नर्मदा की गोद से निकाली जा रही है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर नर्मदा नदी के प्रति दोहरा मापदंड रखने का आरोप लगाया है। यादव ने कहा है कि एक ओर 'नर्मदा सेवा यात्राÓ के नाम पर स्वच्छता की बात की जा रही है, वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कई रसूखदार लोग नर्मदा के अवैध खनन से लाभान्वित हो रहे हैं। नर्मदा पर आस्था रखने वाले चीख चीखकर कहते रहे कि नर्मदा के कई घाटों पर मशीनों से रेत का खुलेआम अवैध उत्खनन किया जा रहा है। पूरा गोरखधंधा रसूखदारों के इशारे पर चल रहा है। लेकिन प्रशासन मौन होकर देख रहा है। खनिज माफिया ने हाइवा और डंपरों की आवाजाही के लिए नर्मदा नदी के बीच में सड़क बना ली है। इससे नर्मदा का प्रवाह रुक गया है। घाटों का अस्तित्व खतरे में यात्रा जिन क्षेत्रों से गुजर रही है उन क्षेत्रों में अवैध खनन के कारण कई घाटों का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिम्मेदारों को इसकी खबर नहीं है। अधिकारी गहरी नींद में सो रहे हैं। रेत माफिया अवैध खनन कर मनमाने दाम पर रेत बेचकर चांदी काट रहे हैं। सूत्रों की मानें तो विभागीय अधिकारियों को एक बड़ा हिस्सा खनन माफिया पहुंचा रहे हैं। जिसके चलते उन पर कार्रवाई करना तो दूर अधिकारी नजर तक नहीं डालते। माइनिंग विभाग के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो यहां अवैध खनन के मामले कम ही दर्ज होते हैं। टारगेट पूरा करने के लिए केवल अवैध परिवहन के मामले दर्ज किए जाते हैं। इस संबंध में विभागीय अधिकारियों का कहना है कि अदालत में अवैध खनन साबित करने में परेशानी होती है। इसलिए अवैध परिवहन के मामले ही बनाए गए हैं। एनजीटी के नियमों के मुताबिक नदी के अंदर से रेत खनन पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसके तहत कोई भी खननकर्ता नदी के पानी से रेत नहीं निकाल सकता। चूंकि नर्मदा राष्ट्रीयकृत नदी है इसलिए इसकी संरचना से कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकता। इसके बाद भी खनन माफिया ने बीच नदी तक रे प बना लिए हैं। पिपरिया घाट में रेत माफिया ने नदी की बीच धार में रेम्प बना लिया है। इससे रे प से वाहन बीच नदी तक पहुंच जाते हैं। जहां पानी में खड़ी पोकलेन मशीन नदी से रेत निकालकर वाहनों में भर देते है। दिन दहाड़ चल रहे इस अवैध खनन पर अधिकारी चुप्पी साधे बैठे हैं। बेलखेड़ा के पास सुनाचर घाट में रेत खदान स्वीकृत नहीं है। इसके बाद भी खनन माफिया यहां रेत खनन करने में जुटे हुए हैं। नदी के बीच से नाव में भरकर रेत निकाली जाती है। जिसके लिए स्थानीय मजदूरों का प्रयोग किया जाता है। पकड़े जाने पर सारी जिम्मेदारी मजदूरों पर छोड़ दी जाती है। नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर ने एनजीटी कोर्ट में यह हलफनामा दे कर धार जिला खनिज अधिकारी को कटघरे में खड़ा कर दिया कि वे अमीरों को गरीब बताकर कम जुर्माने पर उनकी गाडिय़ा छोड़ रहे हैं। इधर अधिकारी यह सफाई देते नजर आए कि उन्होंने न्यायालय के आदेशानुसार ही कार्रवाई की है।

5 रूपए में आज-कल क्या मिलता है जनाब

नई दिल्ली, भोपाल। 2014 की गर्मियों में जब नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद अपने आपको प्रधानसेवक और जनता को मालिक कहा था तो ऐसा लगा था जैसे अब सही मायने में इस देश में जनता का राज आएगा। आज भी मोदी प्रधानसेवक की भूमिका में नजर आते हैं लेकिन अन्य सेवक(कारिंदे) मालिकों(जनता) का हक मार रहे हैं। तभी तो केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत मजदूरी 1 रूपए से लेकर 18 रूपए तक की बढ़ोत्तरी की है। मप्र के लिए 5 रूपए की बढ़ोत्तरी की गई है। अब इन अफसरों से यह कौन पूछे की आज-कल 1 या 5 रूपए में मिलता ही क्या है। बजट देख अफसर बनाने लगे ख्याली पुलाव 2 फरवरी 2006 को जब मनरेगा देश के 200 जिलों में शुरू की गई तो ऐसा लगा जैसे मजदूरों का भाग्य उदय हो जाएगा, लेकिन यह योजना पूरी तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। योजना में मजदूर केवल नीमित मात्र हैं। मशीनों से काम कराकर उनकी मजदूरी हड़पी जा रही है। सरकारें हर साल इस योजना के लिए अरबो-खरबो रूपए का बजट जारी करती हैं। वित्तीय वर्ष 2017-18 में केंद्र सरकार ने मनरेगा के लिए 48,500 करोड़ रुपए के बजटीय प्रावधान किया है जो वर्ष 2016-17 से लगभग 10 हजार करोड़ रुपए की वृद्धि की गई है। वहीं मप्र सरकार ने मनरेगा के लिए वित्तीय वर्ष 2017-18 में 30 करोड़ मानव दिवस का लक्ष्य निर्धारित कर 2000 करोड़ का प्रावधान किया है। इस बजट को देखकर अधिकारी अभी से ख्याली पुलाव बनाने लगे हैं, जबकि इस बार भी मजदूरों की झोली खाली रहेगी। 11 साल में सबसे कम मजदूरी बढ़ोत्तरी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की गारंटी देने वाली मनरेगा योजना की दैनिक मजदूरी में सालाना बढ़ोतरी हैरान करने वाली है। केंद्र सरकार ने इस बार मनरेगा के तहत कई राज्यों में दैनिक मजदूरी महज एक रूपए ही बढ़ाई है। यह मनरेगा के तहत बीते 11 साल की सबसे कम बढ़ोतरी है जो एक अप्रैल से लागू हो जाएगी। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार मनरेगा के तहत असम, बिहार, झारखंड, उत्तरखंड और उत्तर प्रदेश में दैनिक मजदूरी एक रुपये, ओडिशा में दो रुपये,पश्चिम बंगाल में चार रुपये और मप्र में पांच रूपए बढ़ाई गई है। अन्य राज्यों की तुलना में केरल और हरियाणा में सबसे ज्यादा 18 रुपये की बढ़ोतरी की गई है। इसके तहत मनरेगा मजदूरों को अब असम में 183, बिहार और झारखंड में 168, ओडिशा में 176, उत्तराखंड में 175, पश्चिम बंगाल में 180 और मप्र में 172 रुपए मिलेंगे। न्यूनतम दर से भी कम मजदूरी अर्थशास्त्री एस महेंद्र देव की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने सुझाव के अनुसार मनरेगा के तहत मजदूरी, राज्यों में न्यूनतम मजदूरी के बराबर या उससे अधिक होनी चाहिए, लेकिन विसंगति यह देखिए की मनरेगा के तहत दैनिक मजदूरी राज्यों द्वारा तय की जाने वाली न्यूनतम मजदूरी से भी कम है। उदाहरण के लिए असम में न्यूनतम मजदूरी 240 रुपये है, जबकि मनरेगा की नई मजदूरी 183 रुपये ही पहुंच पाई है। इसी तरह बिहार में न्यूनतम मजदूरी 181 रुपये है, जबकि मनरेगा की दैनिक मजदूरी 168 रुपये पर अटकी है। मध्यप्रदेश में भी राज्य सरकार द्वारा मजदूरी की न्यूनतम दर 267 रूपए तय की गई है, लेकिन यहां मनरेगा के तहत 172 रूपए मजदूरी तय की गई है। कारिंदों के वेतन में 20 फीसदी वृद्धि एक तरफ सरकार ने अपने कर्मचारियों का सातवां वेतनमान दे रही है वहीं मरनेगा मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने में तरह-तरह के बहाने कर रही है। समिति की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था, क्योंकि वित्त मंत्रालय ने मनरेगा मजदूरी को न्यूनतम मजदूरी के बराबर लाने की सिफारिश पर सवाल उठाया था। इसके लागू होने पर पहले ही साल राजकोष पर कम से कम 3,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ आता। सरकार अपने कर्मचारियों के मामले में इस दलील को नहीं मानती जिसने सातवें वेतन आयोग की सिफारिश के आधार पर महंगाई भत्ते के रूप में अपने कर्मचारियों का वेतन 20 फीसदी बढ़ाया है। मप्र में मनरेगा मजदूरों का नहीं मिला पूरा काम प्रदेश में मरनेगा मजदूरों की मजदूरी ही कम नहीं है बल्कि उन्हें पर्याप्त काम भी नहीं मिल पा रहा है। इसका खुलासा केंद्र सरकार की रिपोर्ट में हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार रोजगार न दिलवा पाने के चलते मप्र उन राज्यों में शुमार हो गया है जो मनरेगा में पिछड़ रहे हैं। ग्रामीण विकास मंत्रालय की यह रिपोर्ट संसद में रखी गई है। हालांकि सरकार का कहना है कि वे मनरेगा में काम व समय पर भुगतान की नई व्यवस्था लागू करेगी। रिपोर्ट में वर्ष 2014 से जनवरी 2017 तक मनरेगा के तहत मांगे गए रोजगार व सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए गए रोजगार की जानकारी दी गई है। इसके अनुसार इस दौरान मध्यप्रदेश में एक करोड़ 79 लाख मजदूरों ने मनरेगा में काम मांगा लेकिन सरकार एक करोड़ 48 लाख मजदूरों को ही काम दिलवा पाई। यानि 30 लाख मजदूरों को योजना के होते हुए भी काम नहीं मिला। लगातार घट रही लाभाविंतों की संख्या एक तरफ सरकारें साल दर साल बजट में बढ़ोत्तरी कर रही हैं वहीं दूसरी तरफ मप्र उन राज्यों में है, जहां यह पिछले तीन सालों से लगातार कम हो रही है। रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2014-15 में जहां 58.26 लाख मजदूरों को मनरेगा के तहत काम दिया गया तो, वर्ष 2016-17 तक यह 38 लाख 84 हजार तक पहुंच गया। यानी करीब 33 प्रतिशत की गिरावट आई। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव कहते है कि यह स्थिति इसलिए है क्योंकि केंद्र से मनरेगा का पैसा मिलने में दो से तीन महीने लग जाते हैं। हम समय पर डिमांड भेज देते हैं। कई बार राज्य मद से मनरेगा मजदूरों को भुगतान किया जाता है। पैसा समय पर नहीं मिलने से काम की अनवरतता टूट जाती है। हमने भी समीक्षा है और इस बार अलग से फंड बनाया जा रहा है कि जिससे काम भी मिले तो भुगतान में देरी ना हो। उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के सभी 51 जिलों में मनरेगा का क्रियान्वयन हो रहा है। इस योजना में करीब 62 लाख 89 हजार जॉब कार्डधारी श्रमिक पंजीकृत हैं। मौजूदा वित्तीय वर्ष 2016-17 में अब तक 936.85 लाख मानव दिवस का रोजगार सृजन हुआ है। इसमें से 150.42 लाख मानव दिवस का रोजगार अनुसूचित-जाति तथा 329.36 लाख मानव दिवस का रोजगार अनुसूचित-जनजाति के श्रमिकों को दिया गया है। चालू माली साल में मनरेगा में श्रम कार्य करने वालों में 41.76 फीसदी महिला श्रमिक शामिल हैं। इन्हें 391.31 लाख मानव दिवस का रोजगार मुहैया करवाया गया है। लेकिन सवाल उठता है कि केंद्र सरकार ने मनरेगा की जो मजदूरी बढ़ाई है वह मजदूरों की खुशहाली के लिए पर्याप्त है?