गुरुवार, 22 दिसंबर 2016
सरकारी दावे की खुली पोल
कागजों में अटका 53,000 करोड़ का निवेश
भोपाल। मप्र में सरकार और अफसरशाही मिलकर विकास की आंकड़ेबाजी किस तरह कर रही है इसका खुलासा हाल ही में एक सर्वे में हुआ है। देश ही नहीं विदेशों में भी औद्योगिक विकास और निवेश का ढोल पीट रही सरकार के दावों की पोल खुलते ही उद्योग विभाग के अफसर सर्वे को ही गलत साबित करने में जुट गए हैं। हालांकि दूसरे विभागों के अफसर इस बात को मान रहे हैं कि प्रदेश में औद्योगिक विकास की जो तस्वीर दिखाई जा रही है वह हकीकत से परे है। सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तमाम विदेश यात्राओं के बावजूद मप्र में निवेश बढ़ा नहीं बल्कि 14 प्रतिशत घट गया है। इतना ही नहीं देश में मप्र का औद्योगिक योगदान भी घट गया, मतलब जो उद्योग चल रहे थे वो भी बंद हो रहे हैं। भले ही कृषि क्षेत्र में सरकार को कृषि कर्मण अवार्ड मिला है लेकिन धरातल पर कोई तरक्की नहीं हो पाई है। 87 प्रतिशत निवेश पिछले 57 महीनों से अफसरशाही के जाल में फंसा हुआ है जबकि 44 हजार करोड़ रुपए की निवेश घोषणाएं ऐसी हैं जो केवल घोषणाएं ही थीं।
यह स्थिति तब है जब मप्र को औद्योगिक हब बनाने प्रदेश सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जहां अरबों रूपए अभी तक के 9 इंवेस्टर्स समिट में फूंका है, वहीं खरबों रूपए का लैंड बैंक तैयार कर रखा है। इन सब के बावजुद प्रदेश में करीब 53,000 करोड़ का औद्योगिक निवेश कागजों में अटका है। आलम यह है कि निवेशक दफ्तरों का चक्कर लगाकर थक गए हैं, ऐसे में नौकरशाही के निकम्मेपन के कारण वे अब कई निवेशक दूसरे प्रदेशों का रूख कर चुके हैं। प्रदेश में वर्ष 2008 से लेकर अब तक कुल 9 इंवेस्टर्स समिट हुई हैं। इनमें कुल 327 एमओयू हुए हैं, जिनमें करीब 20 करोड़ 5 लाख 20 हजार रुपए से अधिक की राशि खर्च हुई है।
उल्लेखनीय है कि किसी भी राज्य में इंडस्ट्री लगाने के लिए जमीन की उपलब्धता और जरूरी मंजूरियां मिलना पहली जरूरत होती है। हाल ही में जारी वल्र्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार इन दोनों मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर है। मध्य प्रदेश में मौजूद लैंड बैंक, जमीन की ऑनलाइन इंफॉर्मेशन और अलॉटमेंट की निश्चित टाइम लाइन होने के चलते राज्य को 72.73 फीसदी अंकों के साथ देश का बेहतरीन राज्य माना है। मध्य प्रदेश के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्र प्रदेश को भी इस सूची में पहले पांच पायदानों पर जगह दी गई है। फिर भी निवेशकों को मप्र से मोहभंग होना किसी सदमें से कम नहीं है।
दरअसल, हाल ही में एसोसिएटेड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्टीज ऑफ इंडिया (एसोचैम) ने मध्य प्रदेश में इकोनॉमी, इंफ्रास्ट्रक्चर और इंवेस्टमेंट को लेकर एक सर्वे किया। इस सर्वे के रिपोर्ट के आधार पर मार्च 2016 तक मध्य प्रदेश में करीब 14 फीसदी इंवेस्टमेंट ऐसे हैं जिन पर किसी भी तरह का विचार नहीं किया गया। इसके अलावा 53 हजार करोड़ के 86 फीसदी प्रस्ताव कागजी दस्तावेजों के बीच अटके हुए हैं। मध्य प्रदेश इंडिस्ट्रयल सेक्टर के लिए यह प्रस्ताव चौंकाने वाले हो सकते हैं। 2015-2016 के आंकड़ो पर नजर डालें तो एसौचेम की रिपोर्ट के मुताबिक 53,000 में 44,000 करोड़ रुपए के इंवेस्टमेंट ऐसे हैं जो सिर्फ कागजों पर ही पास हुए हैं। रिपोर्ट में यह बात भी निकलकर सामने आई है कि 2015-16 फाइनेंशियल ईयर में इकोनॉमी, इंफ्रास्ट्रक्चर और इंवेस्टमेंट से संबंधित अप्रुवल पर कुछ अनाउंसमेंट किए थे। जिन पर आज तक कोई काम नहीं किया गया है।
एनालिसिस के मुताबिक 2013-2014 के इंडिस्ट्रयल आंकड़ों में रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि मध्य प्रदेश में 2013-2017 में जहां 60 फीसदी इंवेस्टमेंट प्रस्ताव खारिज किए गए। हालांकि रिपोर्ट के आधार पर 2015-2016 में राज्य में करीब 700 से अधिक इंवेस्टर्स ने वहां के इंडस्ट्रीयल सेक्टर में इंटररेस्ट जताया है। 2015-2016 में 5 लाख करोड़ रुपए इंवेसटमेंट के तौर पर प्रस्तावित किए गए जिन्हें कई प्रोजेक्ट के अंतर्गत लाया गया।
निवेश में 14 प्रतिशत गिरावट आई
मध्य प्रदेश में निवेश को बढ़ावा देने के लिए चल रही कोशिशों के बीच एसोचैम द्वारा कराए गए अध्ययन से सरकार के लिए निराशाजनक खबर आई है। यह अध्ययन बताता है कि बीते वित्त वर्ष 2015-16 में नए निवेश में 14 प्रतिशत गिरावट आई है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान राज्य में निर्माण क्षेत्र में सर्वाधिक लगभग 68 प्रतिशत नया निवेश आया। इसके अलावा बिजली (19 प्रतिशत), सेवा (11.5 प्रतिशत) और निर्माण (01 प्रतिशत), गैर-वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में 12 प्रतिशत, सिंचाई क्षेत्र में छह प्रतिशत, खनन में चार प्रतिशत, निर्माण एवं रियल एस्टेट में तीन प्रतिशत नया निवेश आया। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2015-16 तक कुल 5.75 लाख करोड़ रुपये का लाइव (सक्रिय) निवेश हासिल हुआ था। इस तरह एक साल में 4.5 प्रतिशत की वृद्धि दर प्राप्त हुई, जबकि एक साल (2014-15) पहले तक राज्य में 5.50 लाख करोड़ रुपये का लाइव निवेश आया था। इस निवेश के प्रस्तावों में से लगभग तीन लाख करोड़ की परियोजनाएं विभिन्न कारणों से अटकी पड़ी हैं।
राज्य में कुल सक्रिय निवेश का सर्वाधिक करीब 55 प्रतिशत हिस्सा बिजली क्षेत्र में है। वहीं विनिर्माण क्षेत्र में 20 प्रतिशत, गैर-वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में 12 प्रतिशत, सिंचाई क्षेत्र में छह प्रतिशत, खनन में चार प्रतिशत, निर्माण एवं रियल एस्टेट में तीन प्रतिशत ऐसा निवेश आकर्षित हुआ है। अध्ययन के अनुसार, राज्य में करीब 87 प्रतिशत निवेश परियोजनाएं ऐसी हैं, जो औसतन 57 महीने विलम्ब से चल रही हैं। देरी के कारण 57 निवेश परियोजनाओं की लागत 35 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई, जिससे करीब 67 हजार करोड़ रुपये तक की लागत बढ़ चुकी है। रपट के अनुसार, इन परियोजनाओं की वास्तविक लागत लगभग दो लाख करोड़ रुपये ही थी। जो बढ़कर दो लाख 67 हजार करोड़ रुपये हो गई है। पूर्ण होने में विलम्ब के कारण परियोजनाओं की बढ़ी कुल लागत में बिजली क्षेत्र की सर्वाधिक 60.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। वहीं सिंचाई (27 प्रतिशत), गैर-वित्तीय सेवाओं (सात प्रतिशत) और विनिर्माण (06 प्रतिशत) की हिस्सेदारी है।
एसोचैम के अध्ययन के अनुसार, भौतिक तथा सामाजिक ढांचे के अव्यवस्थित विकास की वजह से भागीदारी के मामले में निजी क्षेत्र की दिलचस्पी घटी है। इसकी वजह से मध्य प्रदेश में निवेश परिदृष्य की चमक फीकी हुई है। रपट के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था में मध्य प्रदेश का योगदान वर्ष 2005-06 के चार प्रतिशत के स्तर के मुकाबले 2013-14 में 3.9 प्रतिशत रहा। यानी इसमें मात्र 0.1 प्रतिशत की गिरावट आई है। अध्ययन के अनुसार, राज्य के करीब 70 प्रतिशत कामगार अपनी रोजी-रोटी के लिए कृषि पर निर्भर हैं, फिर भी राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में इस क्षेत्र का योगदान आशा के अनुरूप नहीं है। वर्ष 2004-05 में जहां मध्य प्रदेश के जीएसडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 27.7 प्रतिशत था, वहीं वर्ष 2014-15 में यह 28.1 प्रतिशत तक ही पहुंच सका। चिंताजनक पहलू यह भी है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान वर्ष 2010-11 में सर्वाधिक 26 प्रतिशत के मुकाबले 2014-15 में 22 प्रतिशत के स्तर तक जा गिरा। इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्र में कामगारों की निर्भरता भी वर्ष 2001 में चार प्रतिशत के मुकाबले 2011 में घटकर तीन प्रतिशत हो गई।
औद्योगिक योगदान 4 प्रतिशत गिर गया
चिंताजनक पहलू यह भी है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान वर्ष 2010-11 में सर्वाधिक 26 प्रतिशत के मुकाबले 2014-15 में 22 प्रतिशत के स्तर तक जा गिरा। इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्र में कामगारों की निर्भरता भी वर्ष 2001 में चार प्रतिशत के मुकाबले 2011 में घटकर तीन प्रतिशत हो गर्ई। भौतिक तथा सामाजिक ढांचे के अव्यवस्थित विकास की वजह से भागीदारी के मामले में निजी क्षेत्र की दिलचस्पी घटी है। इसकी वजह से मध्य प्रदेश में निवेश परिदृष्य की चमक फीकी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था में मध्य प्रदेश का योगदान वर्ष 2005-06 के 4 प्रतिशत के स्तर के मुकाबले 2013-14 में 3.9 प्रतिशत रहा। यानी इसमें भी 0.1 प्रतिशत की गिरावट आई है।
नहीं लगे उद्योग, वीरान पड़ी जमीन
क्षेत्रफल के आधार पर देश के बड़े राज्यों में शामिल मध्य प्रदेश में राज्य सरकार की ओर से लैंड बैंक तैयार किया गया है। जिसकी जानकारी सरकार की ओर से ऑनलाइन उपलब्ध कराई गई है। वल्र्ड बैंक ने खास तौर पर इस सिस्टम का उल्लेख करते हुए बताया कि मध्य प्रदेश ने लैंड बैंक को इंडस्ट्री के हिसाब से बांटा है। जिससे निवेशकों को अपनी जरूरत के हिसाब से जमीन हासिल करने में आसानी होती है। इसके साथ ही यहां लैंड अलॉटमेंट के लिए निश्चित समय सीमा भी निर्धारित है। जिससे निवेशकों को समय पर जमीन उपलब्ध कराने से लेकर प्लांट स्थापित करने की प्रक्रिया को आसान बनाता है। फिर भी ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में गुजरात टॉप पर है। वहीं मप्र को 5वीं पोजिशन हासिल हुई है। वहीं गुजरात लैंड अलॉटमेंट के मामले में भी मप्र के लगभग बराबर खड़ा है। वल्र्ड बैंक रिपोर्ट के अनुसार लैंड अलॉटमेंट के लिए लैंड बैंक मौजूद होने के बावजूद मप्र में जीआईएस आधारित जानकारियों का अभाव है। गुजरात सहित बहुत से छोटे और नए राज्यों में यह सुविधा प्राप्त है। इससे इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े प्रोजेक्ट के लिए जगह की सही पड़ताल करना निवेशकों के लिए मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा मप्र के पास कोई जोनल प्लान भी नहीं है। जिसके चलते मप्र में रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन गतिविधियां दूसरे राज्यों के मुकाबले काफी पीछे हैं।
यानी मप्र सरकार के तमाम दावों के बाद भी यहां की व्यवस्था में खोट है जिसके कारण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मप्र को औद्योगिक हब बनाने की मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। आलम यह है की सरकार ने आज से करीब 10 साल पहले प्रदेशभर में उद्योग लगाने के लिए जो लैंड बैंक तैयार किए थे और जिन्हें आवंटित कर दिया गया था वे आज भी वीरान पड़े हुए हैं।
उल्लेखनीय है कि एक दशक पहले मप्र शासन ने प्रदेश में कई नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित करने की कार्य योजना बनाई थी। इसमें छतरपुर, जबलपुर, कटनी, सतना, इंदौर, भोपाल आदि जिलों औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए गए थे। इसमें छतरपुर जिले का चंद्रपुरा क्षेत्र भी शामिल किया गया था। यहां पर 125 एकड़ जमीन पर 204 प्लाटों पर उद्योग के लिए जमीन का आवंटन किया गया। लेकिन निश्चित समय सीमा दो साल बीतने के बाद भी इस जमीन पर कोई उद्योग स्थापित नहीं किया गया। जबकि नियम के अनुसार उद्योग के लिए आवंटित जमीन पर दो साल में उद्योग नहीं लगाने पर कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में विभाग ने इन पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की। शासन ने शहर के लगे चंद्रपुरा गांव के पास खाली पड़ी सरकारी जमीन पर 2006 में नए औद्योगिक क्षेत्र की संरचना करना का प्रस्ताव तैयार किया। इसमें ऐसे उद्योगों को स्थापित करना था जिसे जिले के व्यापारी परंपरागत ढंग से करते आ रहे थे। इसमें बैलगाड़ी उद्योग, फर्नीचर उद्योग सहित लघु वनोपज व अन्य उद्योग स्थापित होना है। जिनके कारीगर यहां पर हैं और अब उन्हें रोजगार मुहैया नहीं हो पा रहा है। चंद्रपुरा औद्योगिक क्षेत्र के लिए शासन ने 125 एकड़ जमीन भी आवंटित की गई थी। यह जमीन जिला उद्योग एवं व्यापार केंद्र के माध्यम से व्यापारियों को देनी थी। इसमें जिला उद्योग व्यापार केंद्र के अधिकारियों ने न तो व्यापारियों को प्लाट दिए और न ही कारीगरों को प्लाट दिए।
अधिकांश प्लाट उद्योग विभाग के अधिकारियों ने अपने चहेतों और एप्रोच वाले लोगों को दिए। ऐसे में जिला उद्योग एवं व्यापार केंद्र द्वारा जिन व्यापारियों को चंद्रपुरा औद्योगिक क्षेत्र में प्लाट आवंटित किए हैं उनकी सूची उजागर नहीं कर रहा है। उधर दो साल से अधिक समय होने के बाद भी यहां पर औद्योगिक स्थापना की शुरुआत भी नहीं हो सकी है। जबकि चंद्रपुरा औद्योगिक क्षेत्र के विकास के नाम पर करोड़ों रुपए भी शासन खर्च कर चुका है। शहर के आर्थिक विकास में मील का पत्थर समझे जा रहे प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र के विकास में विभागीय अधिकरियों की लापरवाही के साथ ही आवंटियों की मनमानी बाधा बन गई है। सवा सौ एकड़ जमीन अभी भी वीरान पड़ी है। जबकि यहां 204 लोगों को उद्योग स्थापित करने के लिए जमीन का आवंटन किया जा चुका है। बावजूद इसके दस साल का समय गुजर जाने के बाद भी आज तक चंद्रपुरा औद्योगिक क्षेत्र में एक भी उद्योग स्थापित नहीं हो सकता है। जमीन आवंटन के बाद दो साल का समय निकलने पर भी उद्योग स्थापित न करने पर विभागीय अधिकारियों ने जब कुछ आवंटियों उद्योग स्थापित करने का दवाब बनाया तो संयुक्त संचालक परिक्षेत्रीय कार्यालय उद्योग सागर के यहां अपील दायर की। इस दौरान अपीलकर्ताओं ने छह माह के अंदर उद्योग स्थापित करने की बात कही। तब विभागीय अधिकारी ने छह माह के अंदर काम शुरू कराने की मोहलत दी है।
प्रोजेक्ट का पता नहीं!
इधर राजधानी में तमाम प्रोजेक्ट जमीन न मिलने की वजह से अटके हुए हैं। दूसरी ओर कुछ विभागों ने जमीन सालों से आवंटित करा रखीं हैं लेकिन उनका उपयोग नहीं हो रहा है। ऐसी दो हजार एकड़ से अधिक जमीन है जो प्राइम लोकेशन पर है लेकिन इस पर अभी तक कोई निर्माण शुरू नहीं हुआ है। कई विभागों से जमीन वापिस लेने की कार्रवाई भी शुरू हुई लेकिन बेकार रही। आलम यह है कि अब उन जमीनों पर अतिक्रमण हो रहा है। शासन ने 1991-92 में नगर निगम को गोवर्धन परियोजना के लिए मालीखेड़ी में 46 एकड़ जमीन आवंटित की थी। ननि के अधिकारियों ने ही ठेके पर अतिक्रमण कराना शुरू कर दिया। जिला प्रशासन ने दो बार में डेढ़ सौ झुग्गियों को यहां से हटाया। उद्योग विभाग को गोविंदपुरा औद्योगिक क्षेत्र के लिए लगभग 600 एकड़ जमीन आवंटित की गई थी। यहां खाली पड़ी जमीन पर लगातार अतिक्रमण होते रहे। जिला प्रशासन ने वर्ष 2011 में 141 एकड़ जमीन मुक्त कराई थी। इस पर फिर से अतिक्रमण हो गया है। धीरूभाई अंबानी एजुकेशन हब के लिए वर्ष 2009 में लगभग 50 एकड़ जमीन शासन ने अचारपुरा में आवंटित की थी। लेकिन, वहां अभी तक कोई निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ। शासन ने वर्ष 2011 में पीपलनेर और बैरागढ़ कलां गांवों को मिलाकर 100 एकड़ जमीन उद्योग विभाग को आवंटित की थी। यहां एयर कार्गो हब बनाया जाना था। कुछ नहीं हुआ। हाउसिंग बोर्ड को शासन ने अयोध्या नगर में सैकड़ों एकड़ जमीन आवंटित की थी। लेकिन इसके आधे पर भी विकास कार्य नहीं हो पाया है। जिला प्रशासन के सर्वे में पाया गया कि भेल से करीब 894 एकड़ जमीन वापिस ली जा सकती है। भेल को 6 हजार 45 एकड़ जमीन अर्जित कर दी गई थी। इसमें से 866 एकड़ जमीन खाली पड़ी हुई है। जबकि 256 एकड़ पर अतिक्रमण हो चुके हैं।
900 एकड़ जमीन,नहीं आ रहे उद्यमी
जबलपुर में तो निवेशकों के इंतजार में लगभग 9 सौ एकड़ जमीन खाली पड़ी है। यहां औद्योगिक वातावरण और सुविधाएं कम नहीं है, लेकिन इन जमीनों पर उद्योगों को लगवाने की पहल करने वालों का अभाव है। बड़े औद्योगिक घरानों को आमंत्रित करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की यहां भारी कमी बनी हुई है। इसलिए जमीन जैसे के तैसे पड़ी हुई हैं। ऐसा भी नहीं है कि जिन औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन खाली हैं, वहां पर उद्योगों के लायक माहौल या सुविधाएं नहीं हैं लेकिन उद्यमियों को लाकर यहां की खूबियां बताने वाला कोई नहीं है। इसमें राजनीतिक इच्छाशक्ति का बहुत अभाव है। जबकि ग्वालियर, इंदौर और भोपाल में स्थिति बिल्कुल विपरीत है। उद्योगों को आकर्षित करने के लिए एकेवीएन ने इस साल अपने किसी भी औद्योगिक केंद्र में प्रीमियम चार्जेस में इजाफा नहीं किया। इसमें हर साल 10 प्रतिशत का इजाफा होता है। बढ़ी हुई दरें एक अप्रैल से लागू होती हैं। हालांकि इन औद्योगिक क्षेत्रों की दरें कुछ महीने पहले ही निर्धारित हुई हैं। इसलिए भी इनमें इजाफा नहीं किया गया। जबलपुर में डिफेंस क्लस्टर का प्रस्ताव था, लेकिन वह भी हाथ से निकल गया। अब इसकी स्थापना इंदौर में होने जा रही है। यदि समय रहते इस पर गंभीरता से काम होता तो शायद स्थिति दूसरी होती। यहां न केवल जमीन बल्कि रक्षा उद्योगों के लिए प्रशिक्षित मजदूर भी आसानी से मिल सकते थे। करीब दो साल पहले दक्षिण अफ्रीका के अप्रवासी भारतीय के द्वारा उमरिया-डुंगरिया क्षेत्र में बांस उद्योग की स्थापना का इरादा जाहिर किया गया था। इसमें 1500 लोगों को रोजगार की संभावना जताई गई थी। बताया जाता है कि किसी भी संगठन या राजनीति से जुड़े लोगों ने इसमें रुचि नहीं दिखाई। सिहोरा के हरगढ़ और उमरिया डुंगरिया में स्पेशल इकॉनामिक जोन (एसईजेड) की स्थापना के लिए जमीन चिन्हित की गई। विकास भी किया गया, लेकिन आज तक कोई निर्यातक इकाइयां यहां नहीं आ सकी। इस मामले में भी कोई बड़ी पहल नहीं की जा सकी है। जबकि छिंदवाड़ा में निजी एसईजेड स्थापित होने जा रहा है।
स्पेशल इकोनॉमिक जोन के लिए नहीं मिले इन्वेस्टर्स
प्रदेश सरकार की हीलाहवाली के चलते जबलपुर जिले के हरगढ़ और उमरिया-डुंगरिया से स्पेशल इकोनॉमिक जोन (सेज) छिन गया है। सरकार इन क्षेत्रों में 8 साल में भी विकास कार्य नहीं करा पाई। नतीजतन दोनोंÓसेजÓमें एक भी एक्सपोर्ट यूनिट नहीं आई। ऐसे में केंद्र सरकार ने सेज को डीनोटिफाइड कर दिया। अब इसे औद्योगिक क्षेत्र में बदला जाएगा। इसके बाद यहां सभी तरह के उद्योगों की स्थापना हो सकेगी। केंद्र ने जिले में दो सेज की सौगात दी थी। सिहोरा तहसील के हरगढ़ में 101 हेक्टेयर क्षेत्रफल में खनिज एवं खनिज आधारित उत्पादों के लिए 24 जुलाई 2008 मेंÓसेजÓका नोटिफिकेशन हुआ था। चरगवां के पास भी उमरिया-डुंगरिया में 101 हेक्टेयर क्षेत्रफल में कृषि एवं कृषि आधारित उत्पादों केÓसेजÓकी स्थापना 25 अगस्त 2009 को गई थी। दोनों औद्योगिक क्षेत्रों में आठ साल में एक भी इकाई की स्थापना नहीं हो सकी, जबकि यहां पर अधोसंरचना के निर्माण पर लाखों रुपए खर्च कर दिए गए थे। मप्र औद्योगिक केंद्र विकास निगम जबलपुर ने दोनों सेज को डिनोटिफाइड (विमुक्त) करने का प्रस्ताव केन्द्र को भेजा था। लंबे समय बाद वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की बैठक में इस पर निर्णय लिया गया।
धरातल पर नहीं उतर पाए सीमेंट उद्योग के सपने
2010 में खजुराहो समिट में 18 औद्योगिक घरानों ने 25,726 करोड़ के सीमेंट प्रोजेक्ट के लिए सहमति व्यक्त की थी। इसके तहत 9 जिलों में 21 सीमेंट प्लांट लगाए जाने थे। 80 फीसदी उद्योग विंध्य के सतना, रीवा सहित पन्ना जिले में लगाए जाने थे। जिसमें रिलायंस, आदित्य बिड़ला ग्रुप, अंबुजा, डालमिया, इमामी, एस्सार जैसे घराने शामिल थे। अफसोस, छह साल बाद भी अधिकतर प्रोजेक्ट पाइप लाइन में हैं। ये हकीकत की जमीन पर नहीं उतर सके। केवल रिलायंस व केजेएस ही व्यावहारिक रूप से शुरू हो सके, जिनका उत्पादन जारी है।
उद्योग विभाग से मिली जानकारी के अनुसार,आदित्य बिड़ला ग्रुप के अल्ट्राटेक ने सतना व धार जिले में 6 हजार करोड़ इंवेस्ट करने का एमओयू साइन किया था। इसमें से 4400 करोड़ में सतना में तीन यूनिट लगनी थी। अभी भी प्रोजेक्ट प्रक्रिया में है। जेपी एसोसिएट ने एक हजार करोड़ में एक-एक यूनिट सतना और सागर में लगाने का एमओयू साइन किया था। सूर्या ग्लोबल ने सतना में 2690 करोड़ रुपए इंवेस्ट करने के लिए एमओयू साइन किया था। एस्सार सीमेंट लिमिटेड ने 2100 करोड़ रुपए से दो यूनिट लगाने का एमओयू साइन किया था। डलमिया सीमेंट ने 2 हजार करोड़ का इंवेस्ट सतना में करने का एमओयू साइन किया था। इमामी सीमेंट ने 1750 करोड़ का इंवेस्ट सतना में करने का एमओयू साइन किया था। एवी माइंस ने 301 करोड़ व साई नाथ वेंचर ने 300 करोड़ इंवेस्ट करने का एमओयू साइन किया था। वीआईएसए सीमेंट और बुदेलखंड रिसोर्स प्रालि ने एक-एक सीमेंट प्लांट रीवा में लगाने का एमओयू साइन किया था। वहीं चार कंपनियों ने पन्ना में सीमेंट प्लांट स्थापित करने का एमओयू साइन किया था। सनफ्लेग इफ्रास्ट्रेक्चर ने 833 करोड़, खजुराहो सीमेंट ने 430 करोड़, रिस्पांस मर्चेंट प्राइवेट लिमिटेड व एमबी इस्पात ने 400-400 करोड़ के सीमेंट प्लांट लागने का एमओयू साइन किया था।
बताया जाता है कि अधिकतर घरानों को सीमेंट इंडस्ट्री का अनुभव नहीं था। लिहाजा, इंडस्ट्रीज को समझने में ज्यादा समय गुजर गया। कई घराने अन्य ग्रुप को टेकओवर करने में लगे रहे। पर सफल नहीं हो सके। आदित्य ग्रुप को कुछ हद तक सफलता मिली, लेकिन वह भी मामला कोर्ट पहुंच गया। जमीन अधिग्रहण सहित कई कानूनी पेंच भी भारी पड़ रहे। रेवती सीमेंट का प्रोजेक्ट तक रुक गया है।
खाली पड़े हैं 7 हजार औद्योगिक भूखंड
केंद्रीय एमएसएमई मंत्रालय के अनुसार, मध्यप्रदेश में औद्योगिक पार्क, इंडस्ट्रियल एरिया और स्पेशल इकॉनोमिक जोन में करीब 7,000 और देश भर में 40,000 से अधिक औद्योगिक भूखंड खाली पड़े हैं। औद्योगिक जमीनों सबसे बड़ी समस्या स्पेशल इकॉनोमिक जोन में है। देश भर में खाली पड़े प्लॉट में से 50 फीसदी प्लॉट विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) में खाली पड़े हैं। यदि राज्य सरकारें उचित योजना बनाकर इन खाली भूखंडों को जरूरतमंद उद्योगों को उपलब्ध कराते हैं तो देश भर में लाखों नए उद्योग सफलतापूर्वक शुरू हो सकते हैं। इसे देखते हुए सबसे पहले मप्र से इसकी शुरूआत होने जा रही है। उधर,प्रदेश सरकार बीमार उद्योगों के पास पड़ी 27 हजार हैक्टेयर जमीन भी अधिग्रहित करने की तैयारी कर रही है। इसके लिए नोटिस भेजना शुरू कर दिया गया है।
उद्योग न शुरू करने पर वापस हो सकती जमीनें
छोटे उद्योगों को जमीन उपलब्ध कराने के लिए मध्य प्रदेश सरकार औद्योगिक क्षेत्रों का सर्वे भी करवा रही हैं। इसके तहत उन उद्योगों की जांच की जा रही है जिन्होंने औद्योगिक क्षेत्रों में जमीन तो ले रखी है। लेकिन लंबे समय से वहां पर औद्योगिक गतिविधि शुरू नहीं की है। ऐसे उद्योगों की जमीनें वापस ली जा सकती हैं। इसके साथ ही जरूरत से ज्यादा जमीन अपने नाम पर आवंटन करवाने वाले उद्योगों की जमीनें वापस लेने की तैयारी भी की जा रही हैं। विंध्य व महाकौशल के लिए जबलपुर-कटनी-सतना-सिंगरौली इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर बहुप्रतिक्षित योजना है। इस योजना के मूर्त रूप लेने से सतना, रीवा, सीधी व सिंगरौली में विकास के अवसर पर उपलब्ध होंगे, वहीं जबलपुर व कटनी का भी औद्योगिक विकास होगा। इसके लिए मप्र शासन ने 6 जिलों में करीब 6.5 हजार वर्ग हेक्टेयर जमीन चिह्नित की है। लगभग 370 किमी दायरे में चिह्नित जमीनों पर औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जाएगा। इन पर बड़े उद्योग तो लगेंगे ही साथ ही लघु और सूक्ष्म उद्योग भी लगाए जाएंगे। इतने बड़े पैमाने पर उद्योग स्थापित होने से रोजगार व संसाधन दोनों का विकास होगा। कॉरीडोर को अमलीजामा पहनाने की जिम्मेदारी एकेवीएन को दी गई है। विभाग ने कलेक्टरों के माध्यम से जमीन की तलाश शुरू कर चुकी है। विंध्य व महाकौशल के 6 जिलों में 6541.842 वर्ग हेक्टेयर लैंड बैंक सुरक्षित की गई है।
प्रस्तावित इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर के लिए सतना, रीवा, सीधी, सिंगरौली, जबलपुर व कटनी में जमीन तलाशी गई है। सबसे ज्यादा जमीन कटनी में 4350.581 वर्ग हेक्टेयर है, जबकि सबसे कम सीधी में 91.156 वर्ग हेक्टेयर है। सतना में 892.495, रीवा में 244.186, सिंगरौली में 232.620 और जबलपुर में 724.794 वर्ग हेक्टेयर जमीन चिह्नित की गई है।
इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर के लिए जमीन चिह्नित करने में इस बात का ध्यान रखा गया है कि जमीन नेशनल हाइवे से ज्यादा दूर न हो। सतना के उचेहरा में 86.219, इचौल में 29.974, बगहा में 40.134, नयागांव-बिरसिंहपुर में 100.170, रहिकवार में 64. 096, सुरदहा कला में 96.035, खिरिया कोठार में 14.824, सोनौरा में 86.752, उमरी-रामपुर बाघेलान में 67.57 व बाबूपुर अतरहरा-उचेहरा में 180.364 वर्ग हेक्टेयर जमीन चिह्नित है। रीवा में मऊगंज के घुरहेटा कला में 175. 059 व गुढ़ के हरदी में 69.137 वर्ग हेक्टेयर चिह्नित जमीन है। सिंगरौली में 52.560, पिडस्ताली में 63.122, फुलवारी में 60.630, बाघाडीह में 29.980 व गनियारी में 32.328 वर्ग हेक्टेयर, सीधी के चोरबा में 9.940, रामपुर सिहावल में 72.136 व बरहाई चुरहट में 9.080 वर्ग हेक्टेयर जमीन चिह्नित है।
जमीन लेने तक सिमटे निवेशक
प्रदेश सरकार मप्र में औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने की रणनीति फिलहाल निवेशकों को रास नहीं आ रही है। सरकार की देश-विदेश की यात्राओं और रोड शो के मद्देनजर हाईटेक बुलाव और ब्रांडिंग पर निवेशक मप्र में होने वाले इंवेस्टर्स समिट में मेहमान बनकर आने में तो जरूर रुचि दिखा रहे हैं, लेकिन वह सरकार और सूबे की जनता के भरोसे पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। यही कारण है कि इंवेस्टर्स समिट में दिल खोलकर एमओयू साइन करने और निवेशक घोषणा करने वाले यह उद्योगपति जमीन पर अपने उद्योगों को नहीं उतार पा रहे हैं। इसके चलते न तो प्रदेश में उद्योगों का जाल बिछ पा रहा है और न ही सूबे के बेरोजगार शिक्षित और अशिक्षित युवाओं को रोजगार मिल पा रहा है। हालांकि, यह बात और है कि इसके उलट प्रदेश सरकार मेहमान बनकर आने वाले निवेशकों और देश-विदेशी उपद्योगपतियों पर जमकर मेहरबान है और उनकी अगवानी और स्वागत में खर्च करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। यही कारण है कि अब तक करीब इंवेस्टर्स समिट में अरबों रुपए से अधिक की राशि खर्च हो चुकी है, लेकिन प्रदेश में इसके एवज में आया निवेश कुछ खास नहीं कर पाया है। आंकड़ों पर गौर करें तो प्रदेश सरकार देशी-विदेशी उद्योगपतियों को रिझाने और मप्र में औद्योगिक निवेश को बढ़ाने के लिए अब तक इंवेस्टर्स समिट में करीब 120 करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च कर चुकी है, लेकिन इसके नजीते में अब तक मात्र एक दर्जन से अधिक उद्योग ही धरातल पर उतर सके हैं।
कर्मचारियों का 2,200 करोड़ हजम कर गई कंपनियां
10 हजार कंपनियां खा गईं पीएफ के पैसे
भोपाल। एक तरफ कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने देश के सभी कर्मचारियों को वर्ष 2030 तक भविष्य निधि, पेंशन और जीवन बीमा के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा है, वहीं दूसरी तरफ 10,932 कंपनियां अपने कर्मचारियों का प्रॉविडेंट फंड काट तो रहीं हैं, लेकिन इसे ईपीएफओ के पास जमा नहीं करा रही हैं। इनमें से 1,195 कंपनियां सरकारी हैं। करीब 2200 ऐसी कंपनियां है, जिन पर ईपीएफओ का करीब 2200 करोड़ रुपए बकाया है। जहां तक मप्र का सवाल है तो यहां की 47 कंपनियों ने अपने कर्मचारियों का 2847.77 लाख हड़प कर बैठी हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रॉविडेंट फंड वेतन पाने वाले कर्मचारियों को वित्तीय सुरक्षा मुहैया कराने के लिए होता है। कर्मचारी अपने मासिक वेतन का 12 फीसदी पीएफ फंड में अंशदान देते हैं। कर्मचारी के पीएफ फंड में नियोक्ता को भी अंशदान करना होता है। कर्मचारी के रिटायर होने के बाद या नौकरी से इस्तीफा देने के दो माह बाद पीएफ फंड में जमा पूरी रकम निकाल सकते हैं। इसके अलावा नौकरी में रहते हुए घर, एजुकेशन, बच्चों की शादी या मेडिकल रीजन के लिए पीएफ फंड जमा रकम का एक हिस्सा निकाल सकते हैं। लेकिन इन दिनों ईपीएफओ कर्मचारियों की बचत के कस्टोडियन का रोल नहीं निभा रहा है। ईपीएफओ कर्मचारियों को तब तक नहीं बताया जाता है कि उनकी कंपनी डिफाल्ट कर रही है, जब तक कि कर्मचारी क्लेम सेटलमेंट के लिए उसके पास नहीं आता है। ऐसे में क्लेम सेटेलमेंट के लिए इंतजार रहे कर्मचारियों की सं या बढ़ रही है।
हर कंपनी अपने कर्मचारियों की सैलरी से पीएफ का कुछ पैसा काटती है, लेकिन क्या आपकी कंपनी उस पैसे को आपके अकाउंट में जमा कर रही है। यह सवाल इसलिाए पूछा जा रहा है कि लगभग 10,932 ऐसी कंपनियां हैं जो पीएफ डिफॉल्टर की लिस्ट में हैं। ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि आपकी सैलरी से पीएफ के पैसे काटकर उन्हें आपके पीएफ खाते में जमा करने के बजाय ये कंपनियां उन पैसों से अपनी जेबें भर रही हैं। इस बारे में आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस सक्रेटरी और ईपीएफओ ट्रस्टी डीएल सचदेवा का कहना है कि हमको वर्कर्स से बड़े पैमाने पर शिकायतें मिल रही हैं कि उनको पीएफ से वंचित रखा जा रहा है। इसके अलावा क पनियों और ईपीएफओ अधिकारियों के बीच सांठगांठ को लेकर भी शिकायतें मिल रहीं हैं।
10 हजार से अधिक कंपनियां हैं डिफॉल्टर
2014-15 के आंकड़ों के अनुसार 10,091 ऐसी कंपनियां थीं, जो पीएफ की डिफॉल्टर की लिस्ट में थीं। इस लिस्ट में अब और बढ़ोत्तरी हो चुकी है। दिसंबर 2015 तक डिफॉल्टर कंपनियों की सं या बढ़कर 10,932 हो गई है। ऑनलाइन उपभोक्ता फोरम में कंपनी की तरफ से पीएफ न मिलने की हजारों शिकायतें पड़ी हुई हैं। आलम यह है कि केवल प्राइवेट ही नहीं बल्कि कई सरकारी कंपनियां और संस्थान भी कर्मचारियों का पीएफ जमा नहीं कर रहे हैं। एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया गड़बड़ी करने वाली संस्थाओं में टॉप पर है। उसके पास ईपीएफओ का 192 करोड़ रूपए का बकाया है। फिर नंबर आता है मुंबई के एचबीएल ग्लोबल, दिल्ली के अहलुवालिया कॉन्ट्रैक्ट्स इंडिया लि. का जिन पर क्रमश: 64.5 करोड़ और 54.5 करोड़ रुपए बकाया है। मप्र में एमपीआरवीवीएन खंडवा ने सर्वाधिक 301.64 लाख रूपए कर्मचारियों का हजम किया है। मप्र में कर्मचारियों का वेतन काट कर जमा नहीं करने वालों में कई नगर निगम भी हैं।
वहीं पीएफ डिफॉल्टर कंपनियों में तमिलनाडु टॉप पर है, जिसमें पुडुचेरी की कंपनियों को भी शामिल कर लिया जाए तो यह सं या 2644 है। इसके बाद नंबर आता है महाराष्ट्र का जहां की 1692 कंपनियों ने कर्मचारियों के पीएफ के पैसे गटक लिए हैं। वहीं केरल में यह सं या 1118 है, जिसमें लक्षद्वीप की कंपनियां भी शामिल हैं। शहरों के हिसाब से अगर पीएफ डिफॉल्टर कंपनियों को देखा जाए तो इसमें सबसे ऊपर तिरुवनंतपुरम का नाम आता है, जहां पर कुल 247 कंपनियां डिफॉल्टर हैं। इसके बाद नंबर आता है कोलकाता का, जहां पर 173 कंपनियां डिफॉल्टर हैं और फिर बारी आती है भुवनेश्वर की जहां पर 115 कंपनियां पीएफ डिफॉल्टर हैं।
पांच साल में 2,823 कंपनियों के खिलाफ केस दायर
देश में कर्मचारियों के भविष्य निधि का पैसा हड़पने वाली कंपनियों के खिलाफ कर्मचारी भविष्य निधि संगठन लगातार स ती बरत रहा है, लेकिन कंपनियां बाज नहीं आ रही हैं। आलम यह है कि पिछले पांच साल में देशभर में ऐसी 2,825 कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज किया जा चुका है। जानकारी के अनुसार, वर्ष 2012-13 में जहां 317 कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, वहीं 2013-14 में 414 कंपनियों के खिलाफ कर्मचारियों के पीएफ में गड़बड़ी की शिकायत दर्ज की गई थी। वहीं वर्ष 2014-15 में 1491 और वर्ष 2015-16 में 1601 कंपनियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।
ऐसे बढ़ी घपलेबाजी
पीएफ सैलरी क्लास लोगों को भविष्य के लिए फाइनेंशियल सिक्योरिटी देने के लिए काटा जाता है। इसमें 12 प्रतिशत कर्मचारी को देना होता है, जबकि 13.6 प्रतिशत कंपनी को देना होता है। 19 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को पीएफ सिस्टम लागू करना जरूरी होता है। इसके माध्यम से जमा राशि पर सरकार ब्याज (वर्तमान दर 8.8 फीसदी) भी देती है। सरकार यह राशि सिक्योरिटीज और कॉर्पोरेट बॉन्ड्स में निवेश करती है। 2015-16 में ईपीएफ के लंबित मामलों में 23 फीसदी इजाफा हुआ है। इस संबंध में 228 पुलिस केस भी दर्ज हुए हैं। ईपीएफओ द्वारा डिफाल्टर कंपनियों के खिलाफ दर्ज कराए गए मुकदमों में भी करीब चार गुना बढ़ोतरी हुई है। 2012-13 में यह सं या 317 थी, जो 2015 में बढ़कर 1491 हो गई। वहीं 2002 से 2015 के बीच ईपीएफओ अधिकारियों के खिलाफ 322 भ्रष्टाचार के मामले दर्ज हुए हैं। डिफाल्टर कंपनियों को बकाया राशि पर अवधि के हिसाब से 17 से 37 प्रतिशत के बीच पेनल्टी देनी होगी।
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस के सचिव और ईपीएफओ ट्रस्टी डीएल सचदेव कहते हैं, हमें कई कर्मचारियों से शिकायतें प्राप्त हुई हैं जिन्हें भविष्य निधि नहीं दिया गया है और साथ ही ईपीएफओ के अधिकारियों और नियोक्ताओं के बीच मिलीभगत की शिकायत भी मिली है।
ईपीएफओ की भूमिका पर सवाल
ईपीएफ को लेकर आए दिन शिकायतें बढ़ती ही जा रही हैं। 2015-16 में इस शिकायतों की सं या 2014-15 की तुलना में 23 फीसदी बढ़ गईं। पीएफ को लेकर 228 पुलिस केस दर्ज किए गए हैं। डिफॉल्टर कंपनियों के खिलाफ 14000 जांचें शुरू हो चुकी हैं। 2014-15 में डिफॉल्टर कंपनियों से 3240 करोड़ रुपयों की वसूली की जा चुकी है। ईपीएफओ की तरफ से नियोक्ता के खिलाफ भी पिछले चार सालों में कई केस दर्ज कराए जा चुके हैं। 2012-13 में यह सं या 317 थी, जो 2014-15 तक बढ़कर 1491 हो गई। आरटीआई डॉट कॉम के को-फाउंडर विनोद आर कहते हैं कि पिछले डेढ़ साल के अंदर उन्हें पीएफ के बारे में जानकारी मांगे जाने के बहुत से आवेदन मिले हैं। डेढ़ साल में करीब 2000 ऐसी आरटीआई आई हैं, जिनमें लोगों ने अपने पीएफ के रिफंड मिलने या उसे मिलने में देरी होने के कारणों के बारे में पूछा है।
बताया जाता है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन कर्मचारियों को तब तक कंपनी के चूककर्ता होने के बारे में नहीं बताता जब तक कि कर्मचारी इसे निपटाने नहीं आते हैं ; निपटान के लिए इंतजार कर रहे मामलों में वृद्धि हो रही है और कर्मचारी भ्रष्टाचार के शिकार हो रहे हैं। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के अधिकारियों का कहना है कि कर्मचारियों की कमी के कारण विभाग सही से निगरानी नहीं कर पा रहा है। 31 मार्च 2015 को ईपीएफओ को 6,000 कर्मचारियों की कमी थी। ईपीएफओ ट्रस्टी सचदेव कहते हैं शिकायतों को निपटाने की संस्था की बहुत ही धीमी गति है। जब कोई कर्मचारी ईपीएफओ के साथ उसका खाता निपटाने जाता है तब ही उसे पता चलता है कि कंपनी ने राशि जमा नहीं कराई है। पूर्व विजिलेंस निदेशक ईपीएफओ विवेक कुमार कहते हैं, अब डिफॉल्टरों को नोटिस प्रधान कार्यालय से भेजा जाता है और यदि कंपनी भुगतान में चूक करती है तो वहां इसके लिए जि मेदार ठहराने के लिए कोई अधिकारी नहीं होता है। ईपीएफओ श्रम मंत्रालय द्वारा चलाया जाता है जो तीन सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को संभालती है-भविष्य निधि, पेंशन और बीमा कर्मचारी। यह योजनाएं कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 (ईपीएफ), कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएस), 1995, और कर्मचारी जमा बीमा योजना , 1976 (ईडीएलआई ) के माध्यम से प्रशासित होता है जिसके तहत यदि कार्यकर्ता की मृत्यु इसके सदस्य रहते होती है तो उसका परिवार लाभ नकद प्राप्त कर सकते हैं।
42,000 करोड़ पर सरकार की गिद्ध दृष्टि
एक तरफ हजारों कर्मचारी डिफॉल्टर कंपनियों द्वारा हड़प लिए गए पीएफ के लिए संघर्षरत हैं वहीं दूसरी तरफ सरकार की नजर बंद पीएफ खातों में पड़े 42,000 करोड़ रूपए पर लगी है। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सूत्रों का कहना है कि फंड का इस्तेमाल केंद्र सरकार अब सीनियर सिटिजन वेलफेयर स्कीम के लिए करने की योजना बना रही है। हालांकि, ट्रेड यूनियन इसका विरोध कर रही हैं। विगत माह केंद्रीय न्यासी बोर्ड की बैठक में ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों के सामने जब यह मुद्दा उठाया गया तो इसका जमकर विरोध हुआ। केंद्रीय न्यासी बोर्ड की बैठक की अध्यक्षता कर रहे श्रममंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने इस मामले को संबंधित मंत्रियों और यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक भी ले जानेे की बात कही है। उल्लेखनीय है कि सीबीटी ईपीएफओ की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च समिति है। न्यासियों के बीच वरिष्ठ कल्याण कोष से जुड़ी अधिसूचना पर पूरक एजेंडा बांटे जाने के तुरंत बाद श्रम संगठनों के सदस्यों ने सरकार के फैसले के विरोध में बैठक से बहिर्गमन किया। अधिसूचना के मुताबिक, खातों को निष्क्रिय घोषित करने की तिथि से सात साल तक की अवधि में कोई दावे दारी नहीं आने पर ऐसे खातों में पड़ी राशि के आधार पर एक कोष (वरिष्ठ नागरिक कल्या कोष) स्थापित किया जाएगा। बोर्ड के ट्रस्टी प्रभाकर बनासुरे का कहना है कि 27 हजार करोड़ रुपए सीनियर सिटिजन संबंधित वेलफेयर स्कीम में ट्रांसफर किए जा सकते हैं।
मप्र के खातों में 980 करोड़ जमा
कर्मचारी भविष्य निधि मध्यप्रदेश में निष्क्रिय खातों (इनऑपरेटिव अकाउंट) में कर्मचारियों के 980 करोड़ रुपए जमा हैं। अगर कुछ महिनों में इस रकम के दावेदार नहीं मिले तो सरकार इसे जब्त कर सकती है। हालांकि ईपीएफओ का कहना है कि वह निष्क्रिय खातेधारों की तलाश कर रही है। एसआरओ जबलपुर आरआर वर्मा का कहना है कि इन जमा रकम में जिसका हिस्सा है, दस्तावेजों की पड़ताल के बाद कर्मचारी भविष्य निधि मध्यप्रदेश यह रकम को देने को तैयार है। बताया जाता है कि कर्मचारी भविष्य निधि के निष्क्रिय खातों पर ब्याज मिलेगा। केंद्र सरकार की इस घोषणा के बाद कर्मचारी भविष्य निधि संगठन मध्यप्रदेश में रिकॉर्ड खंगाला, तो पता चला कि प्रदेश के तकरीबन 20 लाख खाते ऐसे हैं। जो निष्क्रिय हैं और इनमें नियोक्ता और कर्मचारी के 980 करोड़ रुपए जमा हैं।
अधिकारियों का कहना है, बीते 36 माह में भविष्य निधि के जिन खातों में अंशदान नहीं डाला गया है। वे पीएफ के निष्क्रिय खाते हैं। जिन पीएफधारकों के निष्क्रिय खाते हैं। वे पीएफ ऑफिस में जाकर फार्म नंबर 19 और 10-सी अपने पहचान पत्रों के साथ भरकर दे दें। अधिकतम 10 दिन में राशि दे दी जाएगी।
पीएफ कमिश्नर अजय कुमार मेहरा ने बताया कि बकाया राशि और दावों के प्रकरणों के निपटाने पर जोर दिया जा रहा है। सालभर में दो हजार से ज्यादा डिफॉल्टर संस्थानों के खातों को सीज किया गया है। वहीं एक दर्जन से अधिक नियोक्ताओं को गिर तार कर बकाया राशि जमा करवाई गई है। वह कहते हैं कि सालभर में अंशदाताओं की सं या 15 फीसदी बढ़ गई है। साथ ही डेढ़ लाख नए कर्मचारी व श्रमिक समेत चार हजार संस्थान पीएफ दायरे में आए हैं।
वेयर हाउसिंग कॉर्पोरेशन में सालों से पीएफ जमा नहीं
वर्तमान समय में मप्र में करीब 47 बड़ी कंंपनियां या सरकारी उपक्रम ऐसे हैं जो कर्मचारियों का पीएफ जमा नहीं कर रहे हैं। इसमें मप्र वेयर हाउसिंग एंड लॉजिस्टिक कॉर्पोरेशन भी एक है। कॉर्पोरेशन ने अधिकारी और कर्मचारियों का पैसा काटकर खुद के ट्रस्ट में जमा कर रखा है। इस ट्रस्ट में एमडी (पदेन), सचिव (पदेन), अकाउंट ऑफिसर (पदेन) व दो कर्मचारी शामिल हैं। उनकी देखरेख में पैसा जमा किया जाता है, फिर विकास कार्यों आदि में कर्मचारियों का पैसा लगा दिया जाता है। कॉर्पोरेशन वर्ष 1958 से चल रहा है। यहां काम करने वाले अधिकारी, कर्मचारी, दैनिक वेतन भोगी और 89 दिवस के कर्मचारियों का ईपीएफ कटता तो है, लेकिन भविष्य निधि संगठन में जमा नहीं होता है। कलेक्टर रेट पर जब कभी मजदूर काम करते हैं, तो उनका ईपीएफ नहीं काटा जाता है। स्थायी कर्मचारियों ने जब ईपीएफ संबंधी जानकारी हासिल की, तो पता चला कि उनका ईपीएफ में कोई पेंशन फंड नहीं है। इस वजह से जब भी वे सेवानिवृत्त होंगे, तब पेंशन नहीं मिलेगी। यह मामला सामने आने के बाद स्टाफ घबरा गया। उन्होंने इस मुद्दे को मु यालय तक पहुंचा दिया है। कॉर्पोरेशन का एक दल भविष्य निधि कर्मचारी संगठन ऑफिस में अफसर से मुलाकात कर आया है, लेकिन कोई संतोषजनक कार्रवाई नहीं होने के कारण कॉर्पोरेशन के कर्मचारी अब विभागीय लड़ाई करने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि वे जब भी सेवानिवृत्त हों, उन्हें ईपीएफ के साथ ही पेंशन भी मिले। इससे वे भविष्य में अपने परिजनों के साथ गुजर-बसर कर सकेंगे।
कॉर्पोरेशन के फील्ड स्टाफ एसोसिएशन के अध्यक्ष संजीव बिसारिया कहते हैं कि वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन कर्मचारियों का पीएफ का पैसा काट रहा है, लेकिन ईपीएफ ऑफिस में जमा नहीं करा रहा। इससे भविष्य में अधिकारी और कर्मचारियों को पेंशन नहीं मिलेगी। कॉर्पोरेशन ने केंद्र सरकार के नियमों को नजरअंदाज कर फ्रॉड किया है। उसे हम सबका ईपीएफ काटकर भविष्य निधि कार्यालय में जमा करना चाहिए। उधर, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन ने मप्र वेयर हाउसिंग एंड लॉजिस्टिक कॉर्पोरेशन के अफसर व कर्मचारियों का पीएफ न काटने के मामले में जांच शुरू कर दी है। संगठन के ग्वालियर क्षेत्र के आयुक्त रिजवानुद्दीन कहते हैं कि मप्र वेयर हाउसिंग कॉरपोरेशन में पीएफ जमा नहीं करने वाले मामले को रीजनल कार्यालय इंदौर पहुंचा दिया है। वहां से मामले की जांच की जाएगी। यदि कुछ गलत पाया जाता है, तो आगे की कार्रवाई होगी। मध्यप्रदेश वेयर हाउसिंग एंड लॉजिस्टिक कॉर्पोरेशन के 1500 अधिकारी और कर्मचारियों का पीएफ काट तो रहा था, लेकिन पैसा भविष्य निधि कार्यालय में जमा नहीं हो रहा था। कॉर्पोरेशन ने इसके लिए खुद ही एक ट्रस्ट बना रखा है, जिसमें कर्मचारियों के हक का पैसा जमा कराया जा रहा है। यह मामला सामने आने के बाद कॉरपोरेशन में भी हड़कंप मचा हुआ है।
मप्र के 3 लाख सरकारी कर्मचारियों का नहीं कटता पीएफ
मप्र सरकार अपने अधिकारियों-कर्मचारियों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर कितना संवेदनशील है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां सरकारी वेतन पाने वाले करीब 3 लाख कर्मचारियों का पीएफ ही नहीं काटा जाता। इनमें आंनगवाड़ी कार्यकर्ता, होमगार्ड के सैनिक, ग्राम सहायक, रोगी कल्याण समिति के कर्मचारी एवं तमाम संविदा कर्मचारी शामिल हैं। जबकि स त नियम है कि प्रत्येक कर्मचारी का पीएफ काटा जाना चाहिए। प्रदेश के सरकारी महकमों में वर्षों से काम कर रहे लाखों कर्मचारियों का प्रोविडेंट फंड नहीं काटे जाने की लगातार शिकायतें मिलने के बाद ईपीएफओ ने इसे गंभीरता से लिया है। राज्य सरकार के आधा दर्जन से ज्यादा विभागों में संविदा, पार्ट टाइम जॉब, मानदेय और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के रूप में काम कर रहे तीन लाख से अधिक कर्मचारियों का प्रोविडेंट फंड नहीं काटने वाले विभाग के मुखिया की सैलरी अब अटैच करने की तैयारी है। केन्द्रीय भविष्य निधि संगठन के प्रदेश कमिश्नर अश्विनी गुप्ता ने अधिकांश विभागों के अफसरों को नोटिस जारी करते हुए कर्मचारियों का पीएफ नहीं काटने वाले अफसरों को चेताया है। केन्द्र सरकार के श्रम नियमों के तहत किसी भी सरकारी तथा गैर सरकारी संस्था में पार्ट टाइम अथवा फुल टाइम नौकरी करने वाले कर्मचारी का प्रोविडेंट फंड काटा जाना अनिवार्य है, मगर प्रदेश के सरकारी विभागों में ही इस नियम का उल्लंघन धड़ल्ले से हो रहा है। जिन कर्मियों का पीएफ नहीं काटा जाता उनमें महिला एवं बाल विकास 40 हजार आंगनबाड़ी कार्यकर्ता तथा 40 हजार सहायिका, स्कूल शिक्षा विभाग में ऐसे ढाई लाख से अधिक संविदा शाला शिक्षक, प्राध्यापक, गुरूजी, प्रौढ़ शिक्षा अध्यापक शामिल हैं। स्वास्थ्य विभाग में एनआरएचएम के तहत परियोजना अधिकारी, संविदा कर्मचारी, आशा कार्यकर्ता, एनएम सहित आयुष में भी लगभग 50 हजार कर्मचारी रखे गए हैं, जबकि पंचायत एवं ग्रामीण में पंचायत स्तर पर 50 हजार मेट एवं 23 हजार ग्राम पंचायत सचिव तथा मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए लगभग 76 हजार कर्मचारियों को मानदेय पर लगाया है। इसी तरह पुलिस का सहयोगी संगठन होमगार्ड के 16 हजार 305 सैनिकों सहित 350 महिला नगर सैनिक, 20 हजार ग्राम सहायकों के प्रोविडेंट फंड नहीं काटने जा रहे हैं।
21 लाख मजदूरों के हितों की चिंता नहीं
यही नहीं मध्य प्रदेश में सरकारी योजनाओं-परियोजनाओं में लगे मजदूरों का भी पीएफ नहीं काटा जा रहा है। प्रदेश में भवन, सड़क और पुल-पुलियाओं सहित अन्य सरकारी निर्माण कार्यों में करीब 24 लाख मजदूर काम करते हैं, लेकिन इनमें से 21 लाख सामाजिक सुरक्षा के लाभ से वंचित हैं। इनका पीएफ भी नहीं कट रहा। इस मामले में सरकारी महकमे भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अनदेखी कर रहे हैं। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के सर्वे के अनुसार प्रदेश में करीब 24 लाख मजदूर अलग-अलग शासकीय निर्माण कार्यों में लगे हैं। इनमें से केवल 3 लाख मजदूरों का ही पीएफ महकमे में पंजीयन है। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग, भोपाल विकास प्राधिकरण, आरआरडीए, प्रदेश के सभी 16 नगर निगम, सीपीए, एनएचएआई, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग, रेलवे, हाउसिंग बोर्ड, जल संसाधन एवं पीडब्ल्यूडी सहित अन्य शासकीय विभागों के ठेकेदारों की सूची ईपीएफ ने तलब कर ली है। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि सरकारी विभागों में भी नियमों का पालन नहीं हो रहा। मजदूरों से काम लेने वाले ठेकेदारों की रुचि उनके पीएफ पंजीयन कराने में नहीं है। विभाग को छानबीन के दौरान ऐसे उदाहरण भी मिले जिनसे साबित हुआ कि ठेकेदारों ने मजदूरों का पैसा ही दबा लिया।
कतिपय मामलों में यह भी पाया गया कि नगर निगम और हाउसिंग बोर्ड ने अपनी ओर से प्रमुख नियोक्ता की भूमिका भी ठीक से नहीं निभाई। ईपीएफ द्वारा नगर निगम एवं हाउसिंग बोर्ड को नोटिस भी भेजे गए हैं। केंद्र एवं राज्य सरकार के विभिन्न महकमों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों से अवगत कराया गया है जिसमें कहा गया है कि निर्माण कार्यों से जुड़े मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा एवं श्रम कानूनों का पालन कराया जाए। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने दो साल पहले निर्देश जारी किए थे। भोपाल के रीजनल पीएफ कमिश्नर अश्विनी कुमार गुप्ता का कहना है कि इस संबंध में उन्होंने प्रदेश के कई शासकीय विभागों को पत्र भेजे हैं। कुछ महकमों को नोटिस भी जारी किए गए। विभाग द्वारा इस संबंध में विशेष मुहिम चलाई गई है जिसके तहत सभी मजदूरों का पंजीयन एवं उन्हें सामाजिक सुरक्षा से जुड़े लाभ दिलाना सुनिश्चित कराया जा रहा है।
मप्र की डिफॉल्टर कंपनियां
कंपनी रकम(लाख में)
धीरज पॉलीपैक 10.03
कॉस्ट गार्ड सिक्योरिटी 11.08
मैकाल फाइब्र्स 11.16
फेंटल ड्रग इंडिया 11.76
गेस्टल इंजी एंड टेक्ट पीवीटी 12.08
अरविंदों इंस्टीट्यूट 12.08
फ्रिगोस केडिया 12.36
मिशाननिवा केयर 12.84
डेली कॉलेज इंदौर 12.85
खालसा ओवरसीज 15.20
इंदौर स्टील आर्यन 18.29
यूनिसिपल कार्पोरेशन देवास 20.38
वरूण सीमेंट 23.87
नवभारत प्रेस 21.88
अंबिका अलू 24.43
श्री अरविंदों इंस्टीट्यूट 24.99
कोशर इंफ्रास्ट्रक्चर 25.28
नवलसिंह सहकारी 25.82
यूनिसिपल कार्पोरेशन खंडवा 29.66
मापा स्पिनिंग 30.85
को-ऑप स्पिनिंग मिल्स 32.84
कल्याणमल मिल्स 33.80
ईश्वर अलाव 34.88
साक्र्स फार्मोसिटी 36.42
अवंति टैक्सटाइल मिल्स 38.87
स्वदेशी मिल्स 45.58
झाबुआ धार ग्रामीण बैंक 46.53
एमपी आरटीसी खंडवा 46.53
आईआई एम इंदौर 51.09
लखानी फुट केयर 54.47
धार टेक्सटाइल 54.50
गजरा बेवेल देवास 65.43
गिरनार फाइबर लि. 88.31
डिजाईन ऑटो सिस्टम 92.45
परसरामपुरिया इटानेशनल 96.30
इंदौर मालवा मिल्स 107.05
हुकुमचंद मिल्स 124.23
यूनिसिपल कार्पोरेशन इंदौर 133.17
राजकुमार मिल्स 174.61
आईडीए इंदौर 212.73
एमपीआरटीसी इंदौर 267.80
यूनिसिपल कार्पोरेशन झाबुआ 295.12
एमपीआरवीवीएन खंडवा 301.64
देश की टॉप टेन डिफाल्टर कंपनियां
मेसर्स एयरपोर्ट ऑथरिटी, दिल्ली 19,206
एचबीएल ग्लोबल, बांद्रा मुंबई 6,448
मेसर्स ऑलुवलिया कांट्रेक्ट्स
इंडिया, लि दिल्ली 5,457
एमएचएडीए, बांद्रा मुंबई 4,857
मेसर्स जी4एस सिक्योर सोल्यूसन
इंडिया प्रालि, बैगलुरू 3,870
मेसर्स नुद्दा मिल
कंपनी लि, कोलकाता 3,292
मेसर्स मसोर्स इंडिया प्रालि, बैगलुरू 3,103
1912 अर्नाकुलम डीसीबी
लि, त्रिवंतपुरम 3,098
1900 अलाप्पुझा डीसीबी
लि, त्रिवंतपुरम 2,909
16159 मुथूट कंस्लटेंसी
टीअीएम 2,494
कालाबाजारियों के चंगुल में 28,21,50,00,000 का हीरा भंडार
पन्ना के तस्करी के हीरे से दमकर रहे देश के बड़े घराने
भोपाल। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि मप्र के पन्ना जिले की खदानों से निकलने वाले अवैध हीरे से कई बड़े औद्योगिक घराने दमक रहे हैं। इसका खुलासा हाल ही में डायरेक्टोरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलीजेंस (डीआरआई) की एक जांच में सामने आई है। पन्ना जिले में तकरीबन 10,45,000 कैरट हीरे का भंडार है जिसकी अनुमानित कीमत कम से कम 28,21,50,00,000 रूपए है, जिस पर कालाबाजारियों की नजर है। आलम यह है कि पन्ना में वैध खदानों के साथ ही अवैध खदानों की भरमार है। सफेदपोश, माफिया, पुलिस की मिलीभगत से हीरे की अवैध खदाने चल रही हैं। मध्यप्रदेश विधानसभा में मानसून सत्र में कांग्रेस के विधायकों ने पन्ना की खदानों में हीरों का अवैध रूप से खनन किए जाने का मामला भी उठाया था। यही नहीं शून्यकाल के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ विधायक रामनिवास रावत ने यह आरोप लगाते हुए कहा था कि इस मामले की शिकायत राज्य की एक मंत्री ने स्वयं नोटशीट लिखकर मुख्यमंत्री से की है। दरअसल, पन्ना की खदानों से निकलकर हीरा तस्करों के माध्यम से विदेश में पहुंच रहा है और इसकी भनक किसी को नहीं लग रही है। या यूं कह सकते हैं कि मप्र सरकार की निष्क्रियता के कारण हीरे की तस्करी जोरों पर है जिससे सरकार को अरबो रूपए की राजस्व हानि हो रही है।
उल्लेखनीय है कि तीन साल पहले, जुलाई 2013 में अंडरगारमेंट में सिंगापुर से तस्करी के हीरे लाते एयरपोर्ट पर 4,000 करोड़ रूपए वाले सियाराम ग्रुप की बहू विहारी सेठ (विहारी सेठ सिल्क के बड़े व्यवसाई सियाराम पोद्दार शूटिंग ग्रुप की बहू और अभिषेक पोद्दार की पत्नी हैं। विहारी पोद्दार का परिवार सिंगापुर में रहता है। वहां उनका डायमंड व गोल्ड ज्वेलरी का भी व्यवसाय है। ) पकड़ी गई थीं। विहारी की जब्त लाल डायरी में दर्ज खरीदारों के नाम का दो साल बाद अब जाकर खुलासा हुआ है। डीआरआई ने कार्रवाई कर डायरी कोर्ट को सौंपी थी। जिसके डिटेल अब छनकर बाहर आए हैं। विहारी सेठ ने कुल 16.41 करोड़ रुपए के हीरे और सोने के जेवरात मुंबई के बड़े रसूखदार बिजनेसमैन को बेचे। काफी सस्ते में मंहगे जेवरात खरीदने में इन अमीरों ने यह नहीं सोचा कि इस माल का सोर्स क्या है। कहीं यह तस्करी का माल तो नहीं। उस समय विहारी के पास से बरामद लाल रंग की डायरी की डीआरआई ने छानबीन की तो माल खरीदने वाले मुंबई के नौ बड़े लोगों के नाम का खुलासा हो गया। डीआरआई की पूछताछ में सभी नौ लोगों ने अवैध खरीदारी की बात स्वीकार की तो उन पर जुर्माना लगा है। हालांकि यह भी सफाई दी कि उन्हें नहीं पता था कि यह माल तस्करी का है। चार हजार करोड़ रुपए वाले सियाराम ग्रुप की बहू के पैसा कमाने के लिए तस्करी पर उतरना हर किसी को हैरान करता है।
हीरे की तस्करी बड़े ही सुनियोजित तरीके से
इस मामले में डीआरआई और मुंबई एटीएस को जो सुराग मिले हैं वह बेहद चौकाने वाले हैं। दरअसल, देश में हीरे की तस्करी बड़े ही सुनियोजित तरीके से की जा रही है और पन्ना के छोटे-छोटे तस्करों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। मप्र के पन्ना में अवैध रूप से खनन करके निकलने वाला कच्चा हीरा तस्करों के माध्यम से हीरा व्यवसायियों तक पहुंचाया जाता है। हीरा व्यवसायी उस कच्चे हीरे को विदेशों में भेजते हैं। जहां उस हीरे को तराशा जाता है और उसके गहने बनते हैं। वहां से बने गहने विहारी सेठ जैसी कैरियर के माध्यम से भारत लाया जाता है। अभी हाल ही में मुंबई एटीएस के हाथ ऐसे सुराग मिले हैं जिसके अनुसार अंडरवल्र्ड सोने के बदले हीरे ले रहा हैं। इसमें से कुछ हीरा हवाला से पार हो रहा है तो कुछ दुबई के रास्ते पहुंच रहा है। यानी पूरे विश्व के तस्करों और माफिया की नजर पन्ना के हीरों पर है।
उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के उत्तर-पूर्वी हिस्से में स्थित पन्ना जिला हीरे की खदानों के लिए दुनियाभर में मशहूर है। एशिया की इकलौती डायमंड सिटी होने के कारण यहां नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएमडीसी)के अलावा निजी कंपनियां भी हीरा निकालने का काम करती हैं। यहां 17 वीं शताब्दी से हीरे की खुदाई हो रही है। लेकिन इस जिले के लोगों की आर्थिक स्थिति आज भी बदहाल है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस जिले को देश के 250 सबसे पिछड़े जिलों में शामिल किया। जो इस बात का संकेत है की यहां के हीरे की खान से निकलने वाले हीरे की कालाबाजारी जारों पर है। उथली हीरा खदानों से निकलने वाले बेशकीमती हीरों का काला कारोबार बेखौफ जारी है। जिले में संचालित होने वाली उथली खदानों से हर साल 100 करोड़ रूपए से भी अधिक कीमत के हीरे निकलते हैं, लेकिन हीरा कार्यालय में ये हीरे जमा नहीं हो पाते। अधिकांश हीरों की चोरी-छिपे बिक्री हो जाती है, जिससे शासन को हर साल करोड़ों रूपए. के राजस्व की क्षति होती है। उल्लेखनीय है कि पन्ना में देश का इकलौता हीरा कार्यालय है, जहां पर हीरा अधिकारी से लेकर हीरा पारखी, हवलदार व अन्य कर्मचारी पदस्थ हैं। हीरा कार्यालय से हर साल हीरों की खोज के लिए पट्टे जारी किए जाते हैं, जहां संबंधित व्यक्तियों द्वारा खुदाई कराई जाकर हीरों की तलाश की जाती है। राजस्व भूमि के अलावा हीरा कार्यालय द्वारा निजी पट्टे की भूमि में भी खदान संचालित करने की अनुमति दी जाती है, इसके अलावा हीरा धारित वन क्षेत्र में भी अवैध रूप से बड़ी संख्या में खदानें चलती हैं।
नियमानुसार किसी भी व्यक्ति को हीरा मिलने पर उसे हीरा कार्यालय में जमा कराना आवश्यक है। शासन इसकी नीलामी करता है। बोलीदार पांच हजार रुपए की अमानत राशि जमा कर नीलामी में भाग ले सकता है। सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को कीमत का 20 प्रतिशत तुरंत जमा कर शेष राशि 30 दिनों में जमा करानी होती है। नीलामी से प्राप्त राशि में से कुछ हिस्सा शासन के खजाने में जमा होता है। कई हीरा खदान संचालक हीरा मिलने पर उसे चोरी छिपे गुजरात और मुंबई के व्यापारियों को बेच देते हैं।
तराशने में नहीं होता वेस्ट
पन्ना में हीरे की खुदाई के लिए 1968 में नेशनल मिनरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन(एनएमडीसी) की स्थापना की गई थी। एनएमडीसी पन्ना जिले के मझगांव में हीरे की खदान का संचालन करती है, जो अब तक कई नायाब हीरे दे चुकी है। कहा जाता है कि यहां से निकला हीरा साउध अफ्रीका की खदानों से भी अच्छा होता है। ये चमकदार होता है और काटने में कम वेस्ट होता है। एनएमडीसी की मानें तो ये खदान साल भर में करीब 80 हजार कैरेट हीरा उत्पादन कर सकती है। सर्वाधिक हीरा खदानें इटवां सर्किल में चलती हैं तथा इस क्षेत्र में सबसे अधिक हीरा भी निकलते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि सर्वाधिक हीरा खदानों वाले इस इलाके में निकलने वाले हीरे नियमानुसार हीरा कार्यालय में जमा नहीं होते। इटवां सर्किल में बगीचा, किटहा, हजारा, मडफा, हरका हजारा मुढ्ढा, रमखिरिया तथा सिरसा द्वारा आदि क्षेत्रों में हीरा खदान के पट्टे दिए जाते हैं। यहां खदानों से निकलने वाले हीरे यदा कदा जमा होते हैं। अधिकांश खदानें बड़े कारोबारियों की होती हैं, इसलिए ये लोग हीरा मिलने पर उसे जमा करने के बजाय सीधे व्यापारियों को बिक्री कर देते हैं। इस काले कारोबार पर हीरा कार्यालय का सीधे तौर पर कोई अकुश नहीं है, फलस्वरूप बेशकीमती हीरों की तस्करी का धंधा यहां खूब फलफुल रहा है। पन्ना में आगेन नदी द्वारा बनाए गए ढेर में रामखेरिया नामक स्थान पर 12 से 18 मीटर की गहराई से हीरे प्राप्त होते है इनका वार्षिक उत्पादन 11,000 केरेट है इसमें 50-60 प्रतिशत जवाहरात किस्म का हीरा होता है! राम खेरिया में हीरा में अनुमानित भंडार 11,5 000 केरेट के है पन्ना की ही खानों से नागों एवं ओद्योगिक कार्यों के उपयुक्त पत्थर प्राप्त होता है!
जानकारों के मुताबिक इटवां सर्किल में ही सौ से भी अधिक लोग ऐसे हैं जो सीधे तौर पर हीरा कारोबार से जुड़े हैं तथा हर साल तकरीबन 10 लाख रूपए से भी अधिक राशि हीरा खदानों में व्यय करते हैं। हीरा खदानों में खुदाई का काम करने वाली जेसीबी मशीने एक सीजन में दो से ढाई करोड़ रूपए का धंधा करती हैं। इतनी भारी भरकम राशि हीरा खदानों में व्यय की जाती है, फिर भी इस क्षेत्र से एक भी हीरे जमा नहीं होते। यदि हीरा नहीं मिलते तो फिर हर साल लोग हीरों की तलाश में लाखों रूपए क्यों खर्च करते हैं तथा यह पैसा कहां से आता है, क्या कभी इस बात की गहराई से छानबीन की गई है।
क्यों होती है तस्करी
पन्ना जिले की उथली हीरा खदानों से प्राप्त होने वाले बेशकीमती हीरों की तस्करी क्यों होती है, इसकी तहकीकात किए जाने पर यह तथ्य सामने आया है कि हीरा कारोबार करने पर तुआदार (हीरा धारक) को तुरन्त पैसा नहीं मिलता। हीरा जमा होने पर जब नीलामी होती है और हीरा बिकता है तब पैसा मिलता है। इस प्रक्रिया में कई महीने लग जाते हंै, जबकि हीरा कारोबारियों को सीधे बेंचने से तुआदार को तुरन्त पैसा मिल जाता है। व्यवस्था में इस खामी के कारण ही अधिकांश हीरों की चोरी-छिपे बिक्री कर दी जाती है। पन्ना में भले ही कीमती पत्थरों की खुदाई होती है लेकिन कहीं भी हीरे की दुकानें नहीं दिखाई देती। कारण पन्ना में कीमती पत्थरों की तस्करी करने वाले स्मगलर। पन्ना में 6,000 साल पहले कच्चे हीरे मिले थे। आज भी यहां कीमती पत्थर निकाले जाते हैं। लेकिन यहां काम करने वाले मजदूरों की हालत खराब है। और अगर ये अवैध तरीके से काम कर रहे हों तो पूछना ही क्या। यूसुफ बेग खदानों में काम करने वाले मजदूरों के हक के लिए लड़़ते हैं। ये दिल्ली के संगठन एनवाइरोनिक ट्रस्ट के लिए काम करते हैं। यूसुफ अक्सर हीरे के खदानों का दौरा करते हैं। खदानों में अकसर किसान और दिहाड़ी मजदूर काम करते हैं।
कैसे होता है काम
गर्मी के मौसम में काम कम ही होता है क्योंकि नदियां भी सूख जाती हैं और नदी की रेत में हीरे ढूंढने के लिए काफी पानी की जरूरत होती है। यूसुफ बेग बताते हैं, पहले खदान से खोद कर इसे निकाल लेते हैं। इसके बाद इसे यहां खड्डे में डाला जाता है। फिर इसे पानी से भर दिया जाता है। फिर दो लोग इसे पांव से कुचलते हैं ताकि मिट्टी कंकड़ से अलग हो जाए। कंकड़ और हीरे भारी होने के कारण नीचे बैठ जाते हैं। फिर मिट्टी को पानी के साथ बाहर फेंक दिया जाता है। कंकर और हीरे को बाहर निकाल लिया जाता है। अगर पत्थरों में हीरा है तो उसे ज्यादा ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती, वो सूरज की रोशनी में चमकने लगते हैं। भरी गर्मी में हीरे खोजना आसान नहीं। 40 डिग्री में पत्थर तोडऩा बहुत मुश्किल है। बेग बताते हैं, जो मजदूर धूल में यहां काम करते हैं उन्हें सिलिकोसिस की बीमारी होती है। यानी पत्थर की धूल उनके फेंफड़ों में बैठ जाती है क्योंकि मजदूर यहां असुरक्षित तरीके से काम करते हैं, कोई मास्क नहीं लगाते। यहां सुरक्षा के कोई प्रबंध नहीं हैं। लाख कोशिशों के बावजूद काम का माहौल बेहतर बनाने की मुहिम में कोई सफलता नहीं मिली है। अब भारत के मानवाधिकार आयोग ने भी खान मजदूरों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर सुरक्षा की मांग की है। यूसुफ बेग का कहना है कि पन्ना में 70 फीसदी हीरों का गैरकानूनी खनन होता है और यह भी बच्चों से करवाया जाता है। सरकार ने योजनाएं तो बहुत अच्छी अच्छी बनाई हैं। लेकिन उनका पूरा लाभ इन मजदूरों को नहीं मिल रहा है। इसके लिए सरकार को बड़ा प्लान बनाने की जरूरत है जिससे इनके बच्चे पढ़ लिख सकें। आगे निकल सकें। इन खदानों से बाहर जाएं। वो भी किसी लायक बन सकें। उन्हें नौकरियां मिलें और बड़े उद्योग धंधों में वो लग सकें। इलाके में कोई स्कूल नहीं है। यूसुफ का कहना है कि बच्चों को खदान में भेजने के अलावा परिवारों के पास कोई और चारा नहीं है। कम से कम इससे उनका पेट तो भरता है।
मजबूत चक्रव्यूह है हीरा कालाबाजारी का
हीरा मिलना वाकई भाग्य की बात है। हीरे की खदान लगाकर जहां कई लोग करोड़पति हो गए हैं, वहीं कई लोग घर की जमा पूंजी दांव पर लगाकर कंगाल हो गए हैं। हीरे के खदान से निकलने से लेकर महानगरों तक पहुंचने के बीच करोड़ों का खेल हो जाता है। हीरा कालाबाजारी के इस कारोबार से जुड़े लोग बहुत मजबूत और पहुंच वाले हैं। यही कारण है कि हीरा विभाग और खनिज अमला हीरे से जुड़े मामलों में जल्दी हाथ नहीं डालते हैं। सूत्र बताते हैं कि जिले की वैध हीरा खदानों से निकलने वाले हीरे का 80 फीसदी से भी अधिक भाग कालाबाजारी की भेंट चढ़ जाता है, जबकि अवैध खदानों से निकलने वाले शत-प्रतिशत हीरे की कालाबाजारी हो जाती है। कालाबाजारी होने वाला अधिकांश हीरा स्थानीय हीरा कारोबारियों और बड़े लोगों से होकर गुजरता है। इसकी जानकारी पुलिस के साथ खनिज और जिला प्रशासन के अधिकारियों को भी होती है। हर माह करोड़ों के हीरे के अवैध कारोबार पर पुलिस प्रशासन भी हस्ताक्षेप नहीं करती है। पिछले दिन हुए एक हीरा व्यापारी की हत्या के मामले में हीरा के अवैध विक्रय और अवैध रूप से क्रय करने की बात सामने आई थी, इसके बाद भी पुलिस ने मामले में कोई कार्रवाई करना इसलिए जरूरी नहीं समझा, क्योंकि किसी ने शिकायत नहीं की। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि हीरे से जुड़े अपराधों के मामलों में पुलिस किस हद तक नरमी बरत रही है।
हाट-बाजारों में लाखों की कैश डिलीवरी
पन्ना में मिलने वाले हीरे की अवैध बिक्री का आलम यह है कि ग्राम पंचायतों में लगने वाली हाट बाजारों में भी 8 से 10 लाख का कैश भुगतान हो जाता है। ग्राम पंचायत जमुनहाई की हाट बाजार में हीरे बिकवाने का काम करने वाले बिचौलिए ने बताया कि जिन्हें हीरा मिला होता है उसकी जानकारी उन लोगों तक पहुंच जाती है। इसके बाद इन्हें खरीदने के लिए पन्ना और बृजपुर सहित आसपास के व्यापारी संपर्क करते हैं। यहां चाय-पान की दुकानों में बैठकर लोग 8 से 10 लाख का कैश भुगतान कर देते हैं।
हीरे के लिए हत्या, छल और टोटके
दुनियाभर में चमक बिखेरने वाले पन्ना के हीरे की चमक से हीरा नगरी ही दूर है। करोड़ों के हीरे के अवैध कारोबार ने यहां पूरा एक रैकेट खड़ा कर दिया है। इससे यहां अपराधिक वारदातें तक होने लगी हैं। यहां हीरे के लिए हत्या, लूटपाट, छल-कपट और टोने-टोटके जैसी चीजें आम हो गई हैं। जिले के हीराधारित पट्टी क्षेत्र में होने वाली अपराधिक वारदातों के इर्द-गिर्द हीरे की अहम भूमिका होती है। हीरे की खदानें लगाने वाले लोग भाग्य आजमाने के साथ टोटके भी करते रहते हैं, ताकि खदानों को किसी की नजर न लगे। जिन खदानों में हीरे ज्यादा मिलने लगते हैं वहां को लेकर लोग तरह-तरह की चर्चा करने लगते हैं। खदान लगाने वालों ने बताया कि खदानों को किसी की बुरी नजर न लगे इसलिए मवेशियों की हड्डियों को खदान के ऊपरी हिस्से में लगा दिया जाता है या रख दिया जाता है। हीरा मिलने को लेकर भी अन्य कइ तरह के टोटके आजमाए जाते हैं। कुछ लोग साधू-संतों को जमीन दिखाने के बाद खदान के लिए स्थान का चयन करते हैं।
हीरे को लेकर जमीनों में कब्जे हिस्सेदारों को उनका हिस्सा नहीं देने सहित कई प्रकार के विवाद सामने आते रहे हैं। यहां हीरा है तो हीरे को लेकर विवाद भी है। गौरतलब है कि हीरा खदान लगाने में बड़ी लागत लगती है। यही कारण है कि कुछ लोग छोटी खदानें ही लगाते हैं और चार-छह मजदूरों को लगाकर काम कराते हैं, जबकि 20 फीट या उससे भी गहरी खदान लगाने में अच्छी खासी लागत लगती है। यही कारण है कि दो-चार लोग मिलकर पार्टनरशिप में हीरा खदान की खुदाई का काम कराते हैं। पार्टनरशिप में काम करने के कारण कई बार पार्टनरों द्वारा ही धोखा देने की बात सामने आती है। पन्ना जिले के ग्राम तिलगुवां नवासी एक महिला ने बताया कि उसके सह खातेदार देवर शंकर पिता प्यारेलाल ने बिना सहमति के हीरा खदान का पट्टा बनवा लिया है। उनकी जमीन में चार हीरा खदानें गली हैं, जिनमें से अभी तक करीब 1 करोड़ रुपए के हीरा निकाल लिए गए होंगे। इसमें उन्हें 20 फीसदी का हिस्सा मिलना चाहिए, लेकिन खदानों से मिलने वाली पूरी राशि देवर रख रहे हैं। महिला ने जन सुनवाई में कलेक्टर को आवेदन देकर खदानें बंद कराने और खदानों से निकली चाल को उठवाकर जमीन समतल करवाने की मांग की है।
गौरतलब है कि जिले की उथली हीरा खदानों से जैम क्वाटिली का उच्च गुणवत्ता वाला हीरा निकलता है। यही कारण है कि यहां हीरे के लिए लूट मची है। हीरा विभाग के अनुसार जिले में 10 से 15 किमी के क्षेत्रफल की लंबी पट्टी में हीरा पाया जाता है। इसे हीराधारित पट्टी भी कहते हैं। जिले में करीब 350 हीरा खदानों के पट्टे दिए गए हैं। एक हीरा खदान के लिए 200 रुपए में एक साल के लिए 8 बाई 8 मीटर का क्षेत्रफल आवंटित किया जाता है। हीरा विभाग के रिकॉर्ड से कई गुना ज्यादा खदानें पन्ना, बृजपुर, पहाड़ीखेड़ा सहित आसपास के क्षेत्र में चल रही हैं। इनमें से अधिकांश अवैध होती हैं। इन खदानों में न सिर्फ अवैध रूप से विस्फोट किए जाते हैं, बल्कि शत प्रतिशत हीरे का कालाबाजारी भी हो रहा है। अवैध हीरा खदानों पर खनिज विभाग और जिला प्रशासन लगाम नहीं लगा पा रहा है।
हीरा कारोबार से जुड़े लोग एक दूसरे से छल कपट करते रहते हैं। जो लोग हीरा खदान लगाकर इस काम को छोड़ चुके हैं उनके पूछने पर उत्तर मिलता है कि उनके पार्टनर ने धोखा दे दिया। इसके बाद उन्होंने खदान लगाना बंद कर दिया। पवई क्षेत्र के एक कारोबारी ने बताया कि उसने अपने रिश्ते के बड़े भाई के साथ मिलकर खदान लगाई थी। जब हीरे की चाल बीनने का समय आया तब उसे कहीं चाय लेने भेज दिया जाता था तो कहीं किसी काम से। पार्टनर चूंकि परिवार के ही लोग थे, इसलिए विश्वास में वह चला जाता था। जिस खदान में शत-प्रतिशत हीरा मिलने की उम्मीद थी, वहां उन्हें एक रुपए के भी हीरे नहीं मिले। बाद में मजदूरों से उन्हें पता चला कि उनके ही रिश्तेदारों ने धोखा दे दिया। हीरे के कारण न सिर्फ रिश्ते बिगड़ रहे हैं, बल्कि रिश्तेदार हत्या तक की वारदातों को अंजाम दे चुके हैं।
निरंतर होता रहता है निरीक्षण
पन्ना कलेक्टर शिवनारायण सिंह चौहान कहते हैं कि हीरा उत्खनन क्षेत्र का निरीक्षण निरंतर किया जाता है। कलेक्टर ने बताया की हाल ही में सिरस्वाहा बांध के अंदर चल रही खुदाई का निरीक्षण किया। निरीक्षण में कई स्थानों पर हीरायुक्त मिट्टी तथा ग्रेबल के भंडार पाए गए। बांध के अंदर कई स्थानों पर हीरे की खुदाई के स्पष्ट प्रमाण मिले। उन्होंने बताया कि हीरा अधिकारी रत्नेश दीक्षित को सिरस्वाहा बांध क्षेत्र के अंदर हीरा के लिए की गई खुदाई तथा भंडारित ग्रेबल की फाटोग्राफी तथा वीडियोग्राफी कराने के निर्देश दिए। कलेक्टर ने कहा कि सिरस्वाहा बांध के लिए भूअर्जन किया जा चुका है। पूरी भूमि शासकीय होने के बाद बिना किसी तरह की अनुमति के हीरे के लिए उत्खनन अवैध है। इसमें लिप्त व्यक्तियों, ठेकेदार तथा जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज करें। उत्खनन में संलग्न मशीनों को जब्ती करने की भी कार्रवाई करें। सिरस्वाहा बांध में निरीक्षण के दौरान कई ग्रामवासियों ने बताया कि बांध के अंदर कई खदानें संचालित हैं। इनमें खुदाई के लिए मशीनें बांध निर्माण करने वाले ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराई जाती है।
50 करोड़ का हीरा गायब!
पिछले साल पन्ना से विधायक कुसुम मेहदले ने मुख्यमंत्री को शिकायत की थी कि जून 2015 में खदान से 80 कैरेट का हीरा निकला था, जिसकी कीमत 50 करोड़ रुपए थी। वह हीरा खदान संचालकों और पुलिस अफसरों ने मिलीभगत कर बेच दिया है। इसके पहले एनएमडीसी ने 2010 में दावा किया था कि खदान से 37.68 कैरेट का हीरा निकला था, जिसकी कीमत करीब 1 करोड़ रुपए थी। एनएमडीसी का यह भी दावा था कि वह खदान से निकला अब तक का सबसे बड़ा हीरा था। पन्ना में ज्यादातर हीरे ऐसी खदानों से निकले हैं जो ज्यादा गहरी नहीं है। जमीन से दो से तीन फीट नीचे ही काफी बड़े हीरे निकले हैं। 1961 में 44.55 कैरेट का हीरा महुआ टोला की खदान से निकला था। इसके बाद 2015 में 80 कैरेट का हीरा निकला, जिसे लेकर खदान संचालक भाग गया।
नई हीरा नीति बनाने की कवायद
पन्ना में हीरा खदानें होने के बाद भी सरकार का न के बराबर लाभ हो रहा है। ऐसे में सरकार नई हीरा नीति बनाने की तैयारी कर रही है। पिछले माह पन्ना जिले में हीरे से जुडे खनन कर्ताओं तथा हीरा व्यापारियों की कठिनाईयों के निराकरण के लिए बृजपुर में जगदीश स्वामी मंदिर परिसर में बैठक का आयोजन किया गया। बैठक में सबसे सुझाव प्राप्त करके नई हीरा नीति का प्रस्ताव तैयार करने का निर्णय लिया गया। बैठक में शामिल मंत्री कुसुम मेहदेलेकहती हैं कि पत्थर तथा हीरा उत्खनन पन्ना जिले का प्रमुख उद्योग है। इनमें हजारों लोगों को रोजगार मिल रहा है। हीरा उत्खनन की कठिनाईयों को दूर करने के लिए शीघ्र ही नई हीरा नीति बनाई जा रही है। इससे सभी कठिनाईयां दूर होंगी। उन्होंने कहा कि उत्खनन से जुडे व्यक्तियों, मजदूरों तथा हीरा व्यापारियों के हितों को ध्यान में रखकर नई नीति बनाई जाएगी। इसके लिए मौखिक तथा लिखित सुझाव प्रस्तुत करने को कहा गया है। नई नीति बनने पर गर्व से सर उठाकर हीरा उत्खनन और विपणन का कार्य होगा। बैठक में शामिल कलेक्टर शिवनारायण सिंह चौहान ने बताया कि प्रस्तावित हीरा नीति में गहरी खदानों की तरह उथली खदानों में भी मशीनों के उपयोग तथा निर्धारित राशि देकर 5 साल तक के लिए एक से 5 एकड़ क्षेत्र में पट्टे जारी करने का प्रावधान रखा जा रहा है। हीरे की नीलामी तथा समय पर उत्खनन पट्टे जारी करने का भी प्रावधान रखा जा रहा है। शासन द्वारा मान्यता लिए जाने के बाद प्रस्तावित कार्ययोजना को लागू किया जाएगा।
रिओ टिंटो का माइनिंग प्रोजेक्ट हुआ बंद
खनन की जानी मानी कंपनी रिओ टिंटो नें, मध्य प्रदेश में 2200 करोड़ रूपए के हीरों की खान के एक प्रोजेक्ट को बंद कर दिया है। दरअसल, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा केन-बेतवा नदियों को जोडऩे का प्रोजेक्ट पूरा होने तक जमीन के नीचे खनन की संभावनाएं तलाशने के लिए कहे जाने के बाद, कंपनी ने 19 अगस्त को इस प्रोजेक्ट को बंद करने का निर्णय लिया। रिओ टिंटो एक्सप्लोरेशन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के अनुसार, शेयरधारकों की निधि (वैल्यू) को बढ़ाने के लिए लागत घटाने और अन्य प्रयास किए जाने के बाद, रिओ टिंटो ने भारत में बुंदर प्रोजेक्ट को बंद करने का निर्णय लिया है। 2016 के अंत तक इसे पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा।
मध्य प्रदेश सरकार के लिए कंपनी का यह निर्णय एक निराशाजनक कदम है, क्योंकि खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस प्रोजेक्ट के लिए जरुरी कानूनी मंजूरी के लिए प्रयासरत थे। इस हीरे की खान में खनन शुरू होने के बाद से करीब 2058 करोड़ रूपए की आमदनी का अनुमान लगाया गया था और रोयल्टी और टैक्स के रूप में राज्य सरकार को 208 करोड़ रुपए मिलने थे।
कंपनी के अनुसार इस प्रोजेक्ट पर करीब 400 करोड़ रूपए लगाए जा चुके थे और प्रोजेक्ट साईट पर काम करने के लिए करीब 300 लोगों को लिया गया था। देश में पहली बार किसी निजी कंपनी द्वारा चलाए जा रहे हीरों की खान के इस प्रोजेक्ट में, पन्ना टाइगर रिज़र्व और नवरदेहि वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के बीच के वाइल्डलाइफ कोरिडोर में पर्यावरण के नियमों को अनदेखा करने की बात सामने आई थी। नेशनल टाइगर कंजरवेशन अथॉरिटी की जुलाई में आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पन्ना क्षेत्र में बाघों की जनसंख्या और उनका फलना-फूलना, इस प्रोजेक्ट से प्रभावित होने की प्रबल संभावनाएं हैं।
पर्यावरण मंत्रालय ने भी इस प्रोजेक्ट के लिए प्रस्तावित 971 हेक्टेयर क्षेत्र में से केवल 76.43 हेक्टेयर के लिए ही स्वीकृति दी थी। राज्य सरकार को भेजे गए एक पत्र में पर्यावरण मंत्रालय ने जमीन के ऊपर खनन से बहुमूल्य वन सम्पदा के हमेशा के लिए नष्ट हो जाने की बात कही, और भूमिगत खनन की संभावनाएं तलाशने का सुझाव दिया। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 34.2 मिलियन कैरट हीरों का भण्डार होने की संभावना है। शिवराज सरकार ने 2010 में रिओ टिंटो कंपनी के साथ पहला करार किया था, और 2012 में 30 सालों के लिए कंपनी को यह क्षेत्र लीज़ पर देने के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 2013 में यह प्रोजेक्ट ब्यूरो ऑफ़ माइंस से पास होने के बाद 2014 से वन विभाग से मंजूरी मिलने की प्रतीक्षा में था।
8,55,544 करोड़ स्वाहा, फिर भी मप्र कंगाल-बेहाल
एमडीजी, एसआरएस, एसोचैम की रिपोर्ट्स ने खोली 'शिव-राजÓ की कलई
भोपाल। मध्य प्रदेश के मु यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने हर भाषण में यह बात कहना नहीं भूलते कि उन्होनें मध्यप्रदेश को बीमारु से तेजी से दौड़ते हुए राज्य के रुप में खड़ा कर दिया है। लेकिन हकीकत इससे परे है। भाषणों में मध्यप्रदेश जरुर तेजी से दौड़ रहा है जमीनी धरातल में आज भी बीमारु राज्य की श्रेणी में खड़ा हुआ है। यह खुलासा एमडीजी(सहस्राब्दि विकास लक्ष्य या एमडीजी), एसआरएस(सै पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम), एसोचैम(एसोसिएटेड चै बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्टीज ऑफ इंडिया), यूनीसेफ (यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स फंड), रंगराजन समिति की रिपोर्ट्स में हुआ है। पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़ दें तो मध्य प्रदेश में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के किसी भी देश से ज्यादा आबादी रहती है। इसी आधार पर इन देशों से भी राज्य की तुलना की गई है। और बताया गया है कि मानव विकास के 18 सूचकांकों के औसत के हिसाब से सार्क देशों में श्रीलंका सबसे बेहतर है। जबकि मध्य प्रदेश नीचे से दूसरे पायदान पर। उससे नीचे सिर्फ अफगानिस्तान है।
मध्य प्रदेश को बीमारू राज्य के दाग से मुक्त करने के लिए पिछले 10 साल में करीब 8,55,544 करोड़ का बजट खर्च किया गया है। सरकार का दावा है कि प्रदेश आज बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर आ गया है, लेकिन हाल ही में आई कई रिपोट्र्स ने सरकार के दावों की कलई खोल कर रख दी है। रिपोट्स के अनुसार, प्रदेश में योजनाओं-परियोजनाओं की भरमार के बाद भी सामाजिक प्रगति की कसौटी पर मध्य प्रदेश अन्य राज्यों से ही नहीं हमारे पड़ोसी छोटे-छोटे देशों से भी काफी पीछे है। औद्योगिक विकास, सर्विस सेक्टर , घरेलु उत्पादन आदि श्रेणियों में मध्यप्रदेश बिहार से पिछड़ा हुआ है। यही नहीं वित्तीय वर्ष 2015-16 में झारखंड की विकास दर सबसे ऊपर है। विकास दर के आंकड़ों में झारखंड ने बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे बीमारू राज्यों को तो पछाड़ा ही है इसके अलावा कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों को भी वह पीछे छोड़ा है।
सामाजिक प्रगति की कसौटी पर मप्र फेल
मिलेनियम डेवलपमेंट गोल(एमडीजी) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सामाजिक प्रगति (सामाजिक ढांचे का आशय शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण आदि )की कसौटी पर मध्य प्रदेश अन्य राज्यों से ही नहीं हमारे पड़ोसी छोटे-छोटे देशों से भी काफी पीछे है। मप्र सरकार गरीबी, अशिक्षा, खराब स्वास्थ्य की स्थिति, महिलाओं के लिए प्रतिकूल वातावरण को दूर करने के अपने वादे से चूक गई है। साफ है कि प्रदेश को बीमारू राज्यों की श्रेणी से निकालकर विकसित राज्यों की कतार में खड़ा करने का राज्य सरकार का दावा हकीकत से कोसों दूर है। रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकार की प्रमुख नीतियां अपना लक्ष्य पाने में सफल नहीं हो पाईं। गरीबों की कुल आबादी के मामले में मध्य प्रदेश निचले क्रम पर ही पाकिस्तान की बराबरी पर नजर आता है। यानी मध्य प्रदेश में पाकिस्तान के बराबर लोग गरीबी रेखा से नीचे रह रहे हैं।
सबको प्राथमिक शिक्षा दिलाने के लक्ष्य के हिसाब से मध्य प्रदेश का दर्जा श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल और भूटान से भी नीचे है। मातृ एवं शिशु मृत्यु दर के मामले में भी ये चारों देश मध्य प्रदेश से बेहतर हैं। जबकि शिक्षा व रोजगार में लैंगिक भेदभाव (महिलाओं और पुरुषों के बीच) पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बाद सबसे ज्यादा मध्य प्रदेश में पाया गया है।
एमडीजी की रिपोर्ट के अनुसार, सामाजिक क्षेत्र में की जा रही अनदेखी को इसकी प्रमुख वजह माना गया है। राज्य सरकार ने स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और अन्य महत्वपूर्ण सेक्टरों पर भी कम खर्च किया है। सोशल सेक्टर पर मध्यप्रदेश अपने बजट का 39 प्रतिशत हिस्सा की खर्च करता है, जबकि छत्तीसगढ़ 46 प्रतिशत, बिहार 45 प्रतिशत , ओडिशा 42 प्रतिशत और उत्तरप्रदेश 41 प्रतिशत राशि खर्च करता है। इस पर राष्ट्रीय औसत 42 प्रतिशत है। इस मामले में देश के 17 बड़े राज्यों में मध्य प्रदेश से नीचे सिर्फ गोवा (36.30 प्रतिशत), पंजाब (35 प्रतिशत) और केरल (34.89 प्रतिशत) जैसे तीन राज्य ही हैं जिनका सामाजिक ढांचा मध्य प्रदेश की तुलना में पहले से ही बेहतर है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, देश के आठ राज्यों को ए पावर्ड एक्शन ग्रुप (ईएजी) के तहत रखा गया है। यानी ऐसे राज्य जहां मानव विकास के सूचकांकों पर काफी करने की जरूरत है। इन राज्यों में बिहार, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश शामिल हैं। देश के आठ ए पॉवर्ड एक्शन ग्रुप में भी प्रदेश की स्थिति बेहतर नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार को जल्द ही इसपर कुछ करना चाहिए, जिससे सोशल सेक्टर में कुछ बदलाव आ सके।
मध्य प्रदेश में गरीबी 31.65 फीसदी
एमडीजी रिपोर्ट (2014-15) के मुताबिक गरीबी का अनुपात पूरे देश का 21.92 फीसदी है तो मध्य प्रदेश का 31.65 फीसदी। पिछले एक दशक में देश में गरीबों की सं या में 23.4 फीसदी कमी आई है, लेकिन मध्यप्रदेश में यह कमी मात्र 11.1 प्रतिशत ही है। प्रदेश में 2.28 करोड़ लोग गरीब हैं, जो पाकिस्तान में रह रहे गरीबों की सं या के बराबर हैं। रंगराजन समिति की रिपोर्ट की मानें तो देश में गरीबों की तादाद में करीब 10 करोड़ की बढ़ोतरी हुई है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के आखिरी वक्त में गठित रंगराजन समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में गरीबी को लेकर तेंदुलकर समिति के आंकड़ों को खारिज करते हुए देश में गरीबों की सं या का नया आंकड़ा पेश किया था। इसके मुताबिक, मध्य प्रदेश में दो करोड़ 34 लाख गरीब हैं। यानी मप सरकार ने जो अंत्योदय के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाई हैं वह बेअसर साबित हो रही हैं।
10 साल में 11 लाख गरीब बढ़ें
अगर प्रदेश सरकार के आंकड़ों को माने तो आश्चर्यजनक पहलू तो यह है कि सरकार के तमाम दावों के बाद भी प्रदेश में 10 साल में 11 लाख गरीब बढ़े हैं। यह जानकारी मध्यप्रदेश के ग्रामीण विकास व पंचायत मंत्री गोपाल भार्गव ने जुलाई में विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान एक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जवाब में दी थी। विधानसभा में कांग्रेस विधायक कमलेश्वर पटेल के एक सवाल के जवाब में भार्गव ने बताया कि वर्ष 2002-03 हुए सर्वेक्षण के आधार पर प्रदेश में बीपीएल कार्डधारियों की सं या 54 लाख 68 हजार थी, जो अप्रैल 2016 में बढ़कर 61 लाख 82 हजार हो गई थी। उसके बाद ग्रामोदय से भारत उदय अभियान के दौरान और भी नाम जुड़े। इससे बीपीएल कार्डधारियों की सं या बढ़कर 65 लाख आठ हजार हो गई। इस तरह बीते 10 वर्षों में 11 लाख बीपीएल कार्डधारी बढ़े हैं।
मप्र का स्वास्थ्य दिन पर दिन बदतर
क्या आप विश्वास करेंगे कि जिस राज्य में चिकित्सा और पेयजल के लिए इस वित्तीय वर्ष में 11,950 करोड़ का बजट दिया गया हो वहां पिछले दो महिने में करीब 543 लोगों की मौत डायरिया से हो गई है। लेकिन यह हकीकत है। ऐसा मध्य प्रदेश में हुआ है। मध्य प्रदेश का गिरता स्वास्थ्य कोई नई बात नहीं है लेकिन स्वास्थ्य विभाग अब अपने आंकड़ों को दुरूस्त करने में लगा है। सरकार का दावा है कि अस्पतालों में डायरिया के मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त इंतजाम है, जबकि इनमें से अधिकांश की मौत इलाज के दौरान ही हुई है। यह प्रदेश में बेहाल, बेलगाम, बेकाबू होती जा रही स्वास्थ्य सेवाओं का परिणाम है। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि प्रदेश में डायरिया बाढ़ के कारण फैल रहा है। जबकि यूनिसेफ का दावा है कि समाज में व्याप्त भ्रांतियों और गलत धारणाओं के कारण राज्य में हर साल पांच वर्ष की आयु तक के 28 हजार बच्चे डायरिया जैसी बीमारियों के चलते मौत का शिकार हो रहे हैं। और इसका मूल कारण है दुषित पानी और उचित इलाज का अभाव। यानी प्रदेश में सरकार के तमाम दावों और प्रयासों के बाद भी लोगों को न तो पीने का शुद्ध पानी मिल रहा है और न ही उचित इलाज।
8,526 करोड़ किसके लिए
प्रदेश की साढ़े सात करोड़ आबादी के स्वास्थ्य लाभ के लिए वित्तीय वर्ष 2016-17 में सरकार ने 8,526 करोड़ रूपया दिया है। इसमें से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन हेतु 2038 करोड़, स्वास्थ्य विभाग के अंतर्गत 5,643 करोड़ और चिकित्सा शिक्षा के लिए 845 करोड़ है। लेकिन इतना बड़ा बजट किसके लिए? क्योंकि प्रदेश में जरूरतमंदों को स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसी का परिणाम है कि जबलपुर, सतना, रीवा, छतरपुर, डिंडौरी, छिंदवाड़ा, बालाघाट, सिवनी, सिंगरौली, मंडला, छतरपुर, बैतूल आदि जिलों में डायरिया कोप बन कर टूटा है। आलम यह है कि कई जिलों में अस्पतालों में मरीजों को भर्ती करने का की जगह नहीं है। मरीजों के लेटने के लिए बेड तक की व्यवस्था नहीं है। अस्पतालों में मरीजों का जमीन पर इलाज किया जा रहा है। अस्पतालों में दवाओं की कमी है।
कुपोषित बच्चों की तादाद 57.9 फीसदी
मप्र में कुपोषण रोकने के लिए जितनी योजनाएं और फंड है उतना किसी अन्य राज्य में नहीं है। इसके बावजुद तीन साल से कम उम्र के कुपोषित बच्चों की तादाद पूरे देश में जहां 40.4 फीसदी है तो मध्य प्रदेश में 57.9 फीसदी। यूनीसेफ के साथ मिलकर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी ने इस रिपोर्ट को तैयार किया है। इसके मुताबिक, मानव विकास के अधिकांश सूचकांकों पर मध्य प्रदेश का प्रदर्शन बेहद खराब है। बच्चों को जन्म देते वक्त महिलाओं की मौत के मामले में मधयप्रदेश देश का पांचवां सबसे खराब राज्य है। यहां हर एक लाख गर्भवती महिलाओं में से 221 को प्रसव के वक्त जान से हाथ धोना पड़ता है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह आंकड़ा 167 है। इसी तरह, मध्यप्रदेश देश का दूसरा ऐसा राज्य है, जहां जन्म के वक्त सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है। प्रति हजार में यहां 54 नवजात दम तोड़ देते हैं, जबकि इस मामले में पूरे देश का औसत 40 है। मध्य प्रदेश देश का दूसरा ऐसा राज्य है, जहां जन्म के वक्त सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है। प्रति हजार में यहां 54 नवजात दम तोड़ देते हैं, जबकि इस मामले में पूरे देश का औसत 40 है।
भारत सरकार के हेल्थ मैनेजमेंट इंफोर्मेशन सिस्टम 2013-14 के मुताबिक मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत की सबसे बड़ी वजह सेप्सिस, एसपेक्सिया और जन्म के समय उनका कम वजन होना है। पूरे देश में यही तीन कारण शिशुओं की मौत की सबसे बड़ी वजह बने हुए हैं। 20 प्रतिशत बच्चों की मौत जन्म के 24 घंटे से लेकर एक सप्ताह की अवधि में कम वजन होने की वजह से हो जाती है। 1 माह से लेकर 11 महीने तक की अवस्था में 19 प्रतिशत बच्चों की मौत का कारण निमोनिया, डायरिया, मीजल्स से संबंधित बुखार बनता है। यह पूरा मसला समाज के पोषण से भी जुड़ा है, जिस देश में लोगों की खाद्य सुरक्षा ही इतनी अनिश्चित और असंतुलित हो, वहां ऐसे कलंक तो होना ही है। इन कारणों का ही विश्लेषण कर लीजिए, साफ समझ आता है कि शिशुओं की इतनी बड़ी मौत के गुनाहगार तो सभी हैं।
यह कलंक इस राज्य का पीछा नहीं छोड़ रहा। बीते 12 बरस से मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा शिशु मृत्यु दर वाला राज्य बना हुआ है, जो कि सब-सहारन अफ्रीका के कुछ हिस्सों से भी बदतर स्थिति है। ऐसा लगता है कि इस सूबे ने इस कलंक के साथ ही जीना स्वीकार कर लिया है। तभी मध्य प्रदेश की सरकार इस दिशा में कोई काम नहीं कर रही। किसी समुदाय के स्वास्थ्य का सूचक आइएमआर (शिशु मृत्यु दर) भी इस राज्य के समूचे सामाजिक-आर्थिक हालात की सूचना देता है। मध्य प्रदेश का खराब आइएमआर जीडीपी वृद्धि के 10 फीसदी से ज्यादा के आंकड़े और 21 फीसदी से ज्यादा की सकल कृषि वृद्धि दर को मुंह चिढ़ाता नजर आता है। 2014-15 के आंकड़ों के आधार पर नमूना पंजीकरण प्रणाली 2016 के अनुसार मध्यप्रदेश का आइएमआर 54 है। यह भारत में सबसे ज्यादा है। असम और ओडिशा इसके बाद 49 अंकों के साथ आते हैं, जबकि उत्तर प्रदेश 48 अंकों के साथ तीसरे स्थान पर है।
यूनिसेफ, मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. वंदना भाटिया कहती हैं, मध्य प्रदेश को सुरक्षित प्रसव समेत जच्चा-बच्चा की देखभाल की गुणवत्ता, घर से लेकर अस्पताल तक फीडिंग के तरीके, टीकाकारण, निमोनिया और हैजा नियंत्रण आदि पर ध्यान केंद्रित करना होगा। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री रुस्तम सिंह डॉक्टरों, खासकर विशेषज्ञों की कमी की बात को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं, हमें समस्या का अंदाजा है और हम समाधान निकालने का प्रयास कर रहे हैं। राज्य सरकार ने एक प्रस्ताव दिया है कि महाराष्ट्र के एक संस्थान से स्नातक चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिया जाए ताकि वे विशेषज्ञों के स्तर पर आ सकें।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 का कहना है कि मध्य प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए जाने वाले एक शहरी निवासी को 1,746 और गांव के निवासी को 1,259 रुपए अलग से खर्च करने पड़ते हैं। यह पैसा वार्ड ब्वॉय से लेकर दूसरे कर्मचारियों को दी जाने वाली रिश्वत के काम आता है। विभाग में भ्रष्टाचार पर एक पूर्व आइपीएस अधिकारी कहते हैं कि यह समस्या थी, लेकिन अब इसे नियंत्रित कर लिया गया है।
सबसे अधिक भ्रूण हत्या मप्र में
एमडीजी और एसआरएस के आए साल 2014 के आंकड़े हमारी व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। इनमें सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि इसके टॉप पर देश का हृदय स्थल कहे जाने वाला मध्य प्रदेश है। टॉप पांच राज्यों में उत्तरप्रदेश, राजस्थान, ओडिशा, छत्तीसगढ़ शामिल हैं। केवल एक राज्य असम ही है, जिसे हम हाशिए का प्रदेश कहते हैं। सै पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के आंकड़ों ने एक बार फिर बच्चों से संबंधित योजनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सर्वेक्षण खुद भारत सरकार का रजिस्ट्रार कार्यालय वर्ष 1969-70 से करवाता है। हर साल जारी होने वाल इसके आंकड़े मु यत: भारत में जन्म और मृत्यु की स्थितियों को दर्शाते हैं।
उधर, 5 अगस्त को लोकसभा में दिए गए एक जवाब के अनुसार, 2014 में, सबसे अधिक कन्या भ्रूण हत्या के मामले मध्यप्रदेश (15) में दर्ज हुए हैं, जबकि राजस्थान में 11, पंजाब में 7 , उत्तर प्रदेश में और हरियाणा में 4-4 मामले दर्ज हए हैं। सरकार ने संसद को बताया कि मार्च 2016 तक, भारत भर में अवैध लिंग-निर्धारण परीक्षण के लिए कम से कम 2,296 मामले दर्ज हुए हैं। 2015 में, देश भर में दर्ज की गई 107 भ्रूण हत्याओं में से मध्य प्रदेश में सबसे अधिक (30), राजस्थान (24), उत्तर प्रदेश (11), पंजाब (10) और इसके बाद महाराष्ट्र (7) में दर्ज की गई है। 2014 में लड़कियों से अधिक लड़कों के भ्रूण हत्या के मामले दर्ज हुए हैं। राष्ट्रीय अपराध डेटा के यह नवीनतम उपलब्ध आंकड़े इस संबंध में कम मामले दर्ज होने के संकेत देते हैं। 2014 में कम से कम 53 लड़कों के भ्रूण हत्या के मामले दर्ज हुए हैं जबकि लड़कियों के 50 भ्रूण हत्या के मामले सामने आए हैं। यह जानकारी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में सामने आई है। चार भ्रूण के लिंग अज्ञात पाए गए हैं। 2015 के लिए अस्थायी आंकड़ों के अनुसार कन्या भ्रूण हत्या के 52 मामले दर्ज हुए हैं और इनमें मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के लिए आंकड़े सबसे अधिक है, प्रत्येक राज्य में 12।
ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं नगण्य
आंकड़ों का विश्लेषण अपने आप में एक कहानी बयान करता है। वह यह कि मध्य प्रदेश के भीतरी इलाकों में अब भी स्वास्थ्य सुविधाओं का पहुंचना बाकी है। राज्य का स्वास्थ्य विभाग, खासकर ज्यादा आइएमआर वाले ग्रामीण इलाकों में (जो शहरी 35 अंक के आइएमआर के मुकाबले गांवों में 57 है) स्टाफ और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है। राज्य में 51 जिला अस्पताल, 66 उपजिला अस्पताल, 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), 1,171 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और 9,192 उपकेंद्र हैं, जबकि यहां की अनुमानित आबादी 7.64 करोड़ है। ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे का हाल बहुत बुरा है। सरकारी स्वास्थ्य केंद्र द्वारा कवर की गई औसत आबादी मध्य प्रदेश में अन्य राज्यों के मुकाबले काफी ज्यादा है। यहां एक उपकेंद्र 5,000 से 7,000, एक पीएचसी 40,000 से एक लाख और एक सीएचसी एक से तीन लाख लोगों को कवर करता है।
भारत में 30 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के पीएचसी जितनी औसत आबादी को सेवाएं दे रहे हैं, वह मध्य प्रदेश से कम है। 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में उपकेंद्रों के मामले में यह औसत बेहतर है, जबकि 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीएचसी द्वारा कवर की गई औसत आबादी बेहतर है। जाहिर है, मध्य प्रदेश इन सबसे बहुत नीचे है। लक्षद्वीप में एक सीएचसी औसतन 4,714 लोगों को सेवाएं देता है, जबकि मध्य प्रदेश में एक सीएचसी 1,57,357 की औसत आबादी को सेवा देता है। अरुणाचल प्रदेश में एक पीएचसी यदि 9,114 की औसत आबादी को सेवाएं देता है तो मध्य प्रदेश में यह संक्चया 44,882 है। राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में भी एक उपकेंद्र 3,574 लोगों को सेवाएं देता है जबकि मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 5,718 का है। यह अंतर बहुत ज्यादा है। इससे भी बुरी बात यह है कि राज्य के सीएचसी, पीएचसी और उपकेंद्रों में कर्मचारियों का जबरदस्त अकाल है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार ग्रामीण मध्य प्रदेश में कुल 3,436 पुरुष स्वास्थ्यकर्मियों के पद रिक्त पड़े हुए हैं, जबकि पीएचसी और उपकेंद्रों में महिलाओं के 207 पद रिक्त हैं। इसके अलावा प्रसूति रोग, बाल रोग और महिला रोग विशेषज्ञों की भारी कमी है।
स्वास्थ्य विभाग भ्रष्टाचार का गढ़
मप्र के स्वास्थ्य विभाग को भ्रष्टाचार का गढ़ माना जाता है। राज्य के स्वास्थ्य विभाग को आइएमआर कम करने की जि मेदारी सौंपी गई है। यहां अक्षमताओं और भयंकर भ्रष्टाचार का बोलबाला है। इस विभाग में पिछले एक दशक में करीब 6 अरब रूपए का भ्रष्टाचार हुआ है। विभाग के तीन पूर्व निदेशकों डॉ.योगीराज शर्मा, डॉ. अशोक शर्मा और डॉ. एएन मित्तल के यहां पड़े छापों में विभाग के भ्रष्टाचार की हकीकत सामने आ चुकी है। डॉ. योगीराज और डॉ. अशोक पर आयकर के छापे 2007 और 2008 में पड़े थे, जबकि तत्कालीन स्वास्थ्य निदेशक एएन मित्तल पर लोकायुक्त का छापा मई, 2012 में पड़ा था, जिसमें 38 लाख रुपए नकद के अलावा 72 लाख रुपए. के गहने, जमीन मालिकाने के कागजात और विदेशी मुद्रा पाई गई थी। इस विभाग में रिश्वतखोरी का मु य स्रोत माल की खरीद है।
योजनाओं की भरमार, फिर भी बेहाल
मध्य प्रदेश की यह स्थिति तब है, जब शिवराज सरकार की लाड़ली लक्ष्मी योजना, कन्यादान योजना, अन्नपूर्णा योजना, मजदूर सुरक्षा योजना जैसी करीब दर्जन भर सामाजिक योजनाएं खासी सुर्खियां बटोर चुकी हैं। शिवराज सिंह चौहान की दिनों-दिन बढ़ती लोकप्रियता का श्रेय भी उनकी ऐसी ही योजनाओं को दिया जाता है। इस लोकप्रियता का आलम यह है कि शिवराज को प्रदेश के बच्चों का 'मामाÓ तक कहा जाने लगा है। लेकिन एमडीजी रिपोर्ट को देखकर तो लगता है कि 'मामाÓ शिवराज नहीं, असल में प्रदेश की जनता बनी है। क्योंकि राज्य में 10 साल के 'शिव-राजÓ के बाद भी विकास के दावों की सड़क पर गड्ढे अब तक बरकरार हैं।
14 प्रतिशत घटा निवेश
शिवराज सरकार ने प्रदेश में निवेश को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह के दावे किए हैं। शिवराज सरकार गुणगान कर रही है कि पिछले 12 सालों में दुनियाभर के निवेशक मध्यप्रदेश में निवेश के लिए आकर्षित हुए हैं। सरकार का दावा है कि प्रदेश में निवेश बढऩे से बेरोजगारों को काम मिला है। खासकर सीएम शिवराज सिंह के प्रयासों से ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट ने प्रदेश में निवेश की संभावनाएं बढ़ा दी है। इन दावों के विपरीत हकीकत कुछ और है और एसोसिएटेड चै बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्टीज ऑफ इंडिया (एसोचेम)की माने तो न प्रदेश में निवेश बढ़ा है, न ही बेरोजगारों को नौकरियां हासिल हुई हैं और न ही औद्योगिक उत्पादन बढ़ा है। 87 प्रतिशत निवेश पिछले 57 महीनों से अफसरशाही के जाल में फंसा हुआ है जबकि 44 हजार करोड़ रुपए की निवेश घोषणाएं ऐसी हैं जो केवल घोषणाएं ही थीं। यह स्थिति तब है जब मप्र को औद्योगिक हब बनाने प्रदेश सरकार ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए जहां अरबों रूपए अभी तक के 9 इंवेस्टर्स समिट में फूंका है, वहीं खरबों रूपए का लैंड बैंक तैयार कर रखा है। इन सब के बावजुद प्रदेश में करीब 53,000 करोड़ का औद्योगिक निवेश कागजों में अटका है। आलम यह है कि निवेशक द तरों का चक्कर लगाकर थक गए हैं, ऐसे में नौकरशाही के निक मेपन के कारण वे अब कई निवेशक दूसरे प्रदेशों का रूख कर चुके हैं। प्रदेश में वर्ष 2008 से लेकर अब तक कुल 9 इंवेस्टर्स समिट हुई हैं। इनमें कुल 327 एमओयू हुए हैं, जिनमें करीब 20 करोड़ 5 लाख 20 हजार रुपए से अधिक की राशि खर्च हुई है।
उद्योगों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभाव
एसौचेम के मुताबित प्रदेश में उद्योगों के लिए मूलभूत सुविधाओं का अभी भी अभाव है। बिजली, पानी की समस्या ने प्रदेश के जाने-माने औद्योगिक क्षेत्रों में भी निवेशकों को परेशान करके रखा है इसके अलावा पर्यावरण और प्रदूषण के नाम पर प्रदेश में निवेशकों को होने वाली परेशानियों के कारण भी निवेशक कतरा रहे हैं। एसोचैम ने 2014-2015 में देश के बीमारु राज्यों की श्रेणी में शामिल मध्यप्रदेश, बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के विकास पर भी रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में भी मध्यप्रदेश सरकार कई बीमारू राज्यों से अभी भी पिछड़ा हुआ है। औद्योगिक विकास, सर्विस सेक्टर, घरेलू उत्पादन जैसे मामलों में मध्यप्रदेश की स्थिति बिहार से भी खराब है। साल 2004-05 से 2012-1013 के समयकाल में तैयार की गयी रिपोर्ट में मध्यप्रदेश की औद्योगिक विकास दर 9 फीसदी रही तो बिहार में ये दर 14 फीसदी देखने को मिली। इन दस सालों में मध्यप्रदेश के विकास में उद्योगों का योगदान सिर्फ 28 फीसदी रहा। 2014 में तो साल 2012-2013 की तुलना में निवेश में 83 प्रतिशत की गिरावट आई है।
बड़े-बड़े करार और दावे फेल
प्रदेश में निवेश को बढ़ाने के लिए शिवराज सरकार ने कई प्रयास किए लेकिन ये प्रयास धरातल पर लागू नहीं हो सके। सीएम शिवराज सिंह ने अपने आप को मध्यप्रदेश का सीईओ कहकर चीन, जापान और अमेरिका जैसे देशों को रिझाने में लगे हैं, लेकिन निवेशक इनवेस्टर्स समिट में हिस्सा लेकर बड़े-बड़े करार तो करते हैं, लेकिन समिट के बाद सब करार सरकार के दावे और वादों में नजर आते हैं। धरातल पर नजर नहीं आते।
उल्लेखनीय है कि किसी भी राज्य में इंडस्ट्री लगाने के लिए जमीन की उपलब्धता और जरूरी मंजूरियां मिलना पहली जरूरत होती है। हाल ही में जारी वल्र्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार इन दोनों मामलों में मध्य प्रदेश देश में पहले नंबर पर है। मध्य प्रदेश में मौजूद लैंड बैंक, जमीन की ऑनलाइन इंफॉर्मेशन और अलॉटमेंट की निश्चित टाइम लाइन होने के चलते राज्य को 72.73 फीसदी अंकों के साथ देश का बेहतरीन राज्य माना है। मध्य प्रदेश के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्र प्रदेश को भी इस सूची में पहले पांच पायदानों पर जगह दी गई है। फिर भी निवेशकों को मप्र से मोहभंग होना किसी सदमें से कम नहीं है।
एनालिसिस के मुताबिक 2013-2014 के इंडिस्ट्रयल आंकड़ों में रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि मध्य प्रदेश में 2013-2017 में जहां 60 फीसदी इंवेस्टमेंट प्रस्ताव खारिज किए गए। हालांकि रिपोर्ट के आधार पर 2015-2016 में राज्य में करीब 700 से अधिक इंवेस्टर्स ने वहां के इंडस्ट्रीयल सेक्टर में इंटररेस्ट जताया है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान राज्य में निर्माण क्षेत्र में सर्वाधिक लगभग 68 प्रतिशत नया निवेश आया। इसके अलावा बिजली (19 प्रतिशत), सेवा (11.5 प्रतिशत) और निर्माण (01 प्रतिशत), गैर-वित्तीय सेवाओं के क्षेत्र में 12 प्रतिशत, सिंचाई क्षेत्र में छह प्रतिशत, खनन में चार प्रतिशत, निर्माण एवं रियल एस्टेट में तीन प्रतिशत नया निवेश आया। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 2015-16 तक कुल 5.75 लाख करोड़ रुपये का लाइव (सक्रिय) निवेश हासिल हुआ था। इस तरह एक साल में 4.5 प्रतिशत की वृद्धि दर प्राप्त हुई, जबकि एक साल (2014-15) पहले तक राज्य में 5.50 लाख करोड़ रुपए का लाइव निवेश आया था। इस निवेश के प्रस्तावों में से लगभग तीन लाख करोड़ की परियोजनाएं विभिन्न कारणों से अटकी पड़ी हैं।
अध्ययन के अनुसार, राज्य में करीब 87 प्रतिशत निवेश परियोजनाएं ऐसी हैं, जो औसतन 57 महीने विल ब से चल रही हैं। देरी के कारण 57 निवेश परियोजनाओं की लागत 35 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गई, जिससे करीब 67 हजार करोड़ रुपए तक की लागत बढ़ चुकी है। रपट के अनुसार, इन परियोजनाओं की वास्तविक लागत लगभग दो लाख करोड़ रुपए ही थी। जो बढ़कर दो लाख 67 हजार करोड़ रुपए हो गई है। पूर्ण होने में विल ब के कारण परियोजनाओं की बढ़ी कुल लागत में बिजली क्षेत्र की सर्वाधिक 60.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। वहीं सिंचाई (27 प्रतिशत), गैर-वित्तीय सेवाओं (सात प्रतिशत) और विनिर्माण (06 प्रतिशत) की हिस्सेदारी है।
70 फीसदी कामगार कृषि पर निर्भर
एसोचैम के अध्ययन के अनुसार, भौतिक तथा सामाजिक ढांचे के अव्यवस्थित विकास की वजह से भागीदारी के मामले में निजी क्षेत्र की दिलचस्पी घटी है। इसकी वजह से मध्य प्रदेश में निवेश परिदृश्य की चमक फीकी हुई है। रपट के अनुसार, देश की अर्थव्यवस्था में मध्य प्रदेश का योगदान वर्ष 2005-06 के चार प्रतिशत के स्तर के मुकाबले 2013-14 में 3.9 प्रतिशत रहा। यानी इसमें मात्र 0.1 प्रतिशत की गिरावट आई है। अध्ययन के अनुसार, राज्य के करीब 70 प्रतिशत कामगार अपनी रोजी-रोटी के लिए कृषि पर निर्भर हैं, फिर भी राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) में इस क्षेत्र का योगदान आशा के अनुरूप नहीं है। वर्ष 2004-05 में जहां मध्य प्रदेश के जीएसडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान 27.7 प्रतिशत था, वहीं वर्ष 2014-15 में यह 28.1 प्रतिशत तक ही पहुंच सका। चिंताजनक पहलू यह भी है कि राज्य की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक क्षेत्र का योगदान वर्ष 2010-11 में सर्वाधिक 26 प्रतिशत के मुकाबले 2014-15 में 22 प्रतिशत के स्तर तक जा गिरा। इसके अलावा औद्योगिक क्षेत्र में कामगारों की निर्भरता भी वर्ष 2001 में चार प्रतिशत के मुकाबले 2011 में घटकर तीन प्रतिशत हो गई। यानी मप्र सरकार पिछले एक दशक से प्रदेश के विकास के जो दावे कर रही है वह कागजी साबित हुए हैं।
शिवराज की लोकप्रियता भी घटी
तीन साल पहले तक गुजरात के तत्कालिन मु यमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद सबसे लोकप्रिय मु यमंत्री रहे मप्र के मु यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता भी घटी है। विभिन्न न्यूज एजेंसियों, वेब साईट्स के सर्वे में यह तथ्य सामने आया है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने से मु यमंत्रियों की आपसी प्रतिस्पर्धा कई तरह से बदल गई। इसका नतीजा यह हुआ कि भाजपा शासित प्रदेशों के जिन मु यमंत्रियों का नाम कभी प्रमुखता से लिया जाता था, वे आज एक तरह से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व यानी नरेंद्र मोदी पर निर्भर हो गए हैं। उदाहरण के तौर पर कभी मध्य प्रदेश के मु यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर पर भी देखा जाता था। वे आज ताकतवर तो हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि अब दोनों की कोई तुलना ही नहीं है। अगर कभी कोई ऐसा मोड़ आता है जब भाजपा को नरेंद्र मोदी के विकल्प की जरूरत हो तो जो लोग प्रमुखता से दिखते हैं, उनमें शिवराज अहम हैं। लेकिन लोकप्रियता के मामले में वे बिहार के मु यमंत्री नीतीश कुमार, दिल्ली के मु यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आंध्र प्रदेश के मु यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के बाद चौथे स्थान पर हैं। हालांकि देश में भाजपा के जितने भी मु यमंत्री हैं, उनमें अभी सबसे ताकतवर मध्य प्रदेश के मु यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ही हैं। इसके साथ-साथ इस बात से भी इनकार करने वाले लोगों की सं या न के बराबर होगी कि शिवराज उतने ताकतवर अभी नहीं हैं जितने कि वे सितंबर, 2013 तक थे। 2013 के सितंबर महीने का जिक्र इसलिए क्योंकि इसी महीने में गुजरात के मु यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी को भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री का उ मीदवार घोषित किया था। इस घोषणा से पहले केंद्र की जि मेदारी को लेकर नरेंद्र मोदी का जब भी जिक्र होता था तो साथ में शिवराज सिंह चौहान का नाम भी इसमें जुड़ जाता था। लेकिन उस घोषणा से यह तय हो गया कि भाजपा की आगे की राष्ट्रीय राजनीति नरेंद्र मोदी को आगे करके चलेगी।
सर्वेक्षण में माना गया है कि एक मु यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान अपने तीनों कार्यकाल में प्रभावी दिखे हैं। विकास के मामले में उन्होंने मध्य प्रदेश में काफी अच्छा काम किया है। कृषि के साथ-साथ उद्योग की तरफ भी उन्होंने जरूरी ध्यान दिया है। उनके कार्यकाल में मध्य प्रदेश कई फसलों के उत्पादन के मामले में देश का शीर्ष राज्य बना। कुपोषण के लिए बदनाम मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कई प्रयोग शिवराज सिंह चौहान ने किए हैं। गवर्नेंस के पैमाने पर भी वे प्रभावी दिखते हैं। राज्य में उन्होंने अपनी पहचान जनता के मु यमंत्री के तौर पर बनाई है। यही वजह है कि वे पार्टी में भले ही कमजोर हुए हों लेकिन न सिर्फ अपने राज्य में बल्कि मध्य प्रदेश के बाहर भी उनके प्रति लोग अच्छी राय रखते हैं।
हालांकि, व्यापमं शिवराज सिंह चौहान की साफ छवि पर एक दाग जैसा है और इसकी चर्चा पूरे देश में हुई है। फिर भी अगर देखा जाए तो कुल मिलाकर उनकी पहचान एक साफ-सुथरी छवि वाले नेता की है। यह एक ऐसी छवि है जो आम आदमी को पसंद आती है। यही बात उनके पक्ष में तब जाती दिखती है जब गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता के पैमाने पर उन्हें देखा जाए। अभी भाजपा के पास नरेंद्र मोदी हैं लेकिन अगर कभी कोई ऐसा मोड़ आता है जब पार्टी को उनके विकल्प की जरूरत हो तो जो लोग प्रमुखता से दिखते हैं, उनमें शिवराज अहम हैं। यही अहमियत उन्हें पार्टी के अंदर थोड़ा कमजोर होने के बावजूद भाजपा के दूसरे मु यमंत्रियों के मुकाबले ताकतवर बनाए हुए है। उनकी ताकत उस वक्त और बड़ी लगती है जब यह पता चलता है कि उन्होंने अपने राज्य में विपक्ष को तकरीबन तहस-नहस कर दिया है। कुछ उसी अंदाज में जिस अंदाज में नरेंद्र मोदी ने गुजरात का मु यमंत्री रहते हुए वहां किया था।
अफसरों, इंजीनियरों और ठेकेदारों की चारागाह बना जल संसाधन विभाग
10 साल में सरकार को 12,000 करोड़ की चपत
भोपाल। 3,000 से अधिक इंजीनियरों वाले मप्र जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार इस कदर समाया हुआ है कि पिछले एक दशक में अफसरों, इंजीनियरों और ठेकेदारों ने मिलकर सरकार को करीब 12,000 करोड़ की चपत लगाई है। इसका खुलासा कैग की रिपोर्ट, विभागीय जांच और इस बार की बारिश और बाढ़ में सामने आया है। हद तो यह देखिए की कई परियोजनाएं पूरी होने के बाद भी उन परियोजनाओं के निर्माण की खरीदी के नाम पर रकम मांगी जा रही है। हालांकि मामला सामने आने के बाद अब जांच की बात की जा रही है। उधर, विभागीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा को अभी इससे अवगत नहीं कराया गया है।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्षों में बरगी, राजघाट और इंदिरा सागर परियोजनाओं में 800 करोड़ से ज्यादा के भ्रष्टाचार का मामला सामने आया था। अफसरों, इंजीनियरों और ठेकेदारों ने मिलकर इन योजनाओं में जमकर अनियमितता की है। कुछ मामलों में जहां कुछ इंजीनियरों के खिलाफ कार्रवाई की गई है वहीं ठेकेदारों के खिलाफ भी कदम उठाए गए हैं। लेकिन उसके बाद भी भ्रष्टाचार थमा नहीं और कैग ने पिछले दस साल में 9,772 करोड़ की वित्तीय अनिमियता का खुलासा करके सनसनी फैला दी है। विभाग के सूत्रों का कहना है कि पिछले पांच साल में विभाग में राधेश्याम जुलानिया जैसा सख्त मुखिया(प्रमुख सचिव और बाद में कुछ समय के लिए अपर मुख्य सचिव के तौर पर)के होने के बाद भी भ्रष्टाचार निर्बाध चलता रहा। आलम यह रहा की सालों पहले निर्मित नहरों के निर्माण और उनकी सफाई के नाम पर करीब 400 करोड़ रूपए का घपला कर दिया गया। ये मामले सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मच गया है। प्रदेश में भ्रष्टाचार के लिए सबसे चर्चित मामलों में आईएएस अरविंद जोशी इसी जल संसाधन विभाग के लंबे समय तक पीएस रह चुके हैं। जोशी आयकर छापे के बाद सुर्खियों में आए थे। उनके यहां मिली काली कमाई जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार की कहानी कहते हैं।
नहरों के निर्माण में सबसे अधिक घपले
जल संसाधन विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रदेश में नहर निर्माण से संबंधित 897 छोटी-बड़ी परियोजनाएं शुरू की गई हैं। जिनमें से अभी तक 350 योजनाएं पूरी हो चुकी हैं, जबकि 547 परियोजनाओं के निर्माण का कार्य जारी है। लेकिन जल संसाधन विभाग के अफसरों से मिलीभगत कर निर्मित नहरों के निर्माण के नाम पर इंजीनियर और ठेकेदार सरकार को करोड़ों रूपए की चपत लगा रहे हैं। बताया जाता है कि जन संसाधन विभाग की निर्मित 350 नहर योजनाओं में जमकर भ्रष्टाचार हुआ है। वर्षों पहले निर्मित हो चुकी कई परियोजनाओं का काम चालू दिखाकर लगातार भ्रष्टाचार किया जा रहा है। लेकिन जैसे ही इस भ्रष्टाचार की पोल खिली है विभाग ने इससे अनभिज्ञता जाहिर करते हुए जांच शुरू कर दी है। जांच में यह बात सामने आई हैं कि अनेक परियोजना में काम पूरा हो जाने के वर्षों बाद भी खरीदी की मंजूरियां मांगी गई है। विभाग के सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में करीब 227 नहर निर्माण परियोजनाएं ऐसी हैं, जो बीते सालों में पूरी हुई हैं। इनमें से कई परियोजनाओं के नाम पर फिर से खरीदी और कई कामों पर बिना काम हुए मंजूरियां मांगी गई हैं। वहीं 123 नहरों के निर्माण में विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार हुआ है, इसको लेकर कैग ने भी आपत्ति उठाई है।
जल संसाधन विभाग ने खुद भ्रष्टाचार की आशंका जताकर सभी जिलों के मुख्य अभियंताओं को चेतावनी-पत्र जारी कर दिया है। मामले की गंभीरता इतनी है कि विभाग ने दोषियों को बर्खास्त तक करने की चेतावनी दी है। विभाग अब निर्माण कार्यो की आकस्मिक जांच करेगा। विभाग ने चेतावनी-पत्र में लिखा है कि ठेकेदारों को गलत तरीके से आर्थिक फायदा दिलाने के लिए बिना काम हुए और पूर्व में पूर्ण हो चुके कामों के नाम पर भुगतान कराया जा रहा है। जल संसाधन विभाग के प्रमुख अभियंता एमजी चौबे के मुताबिक कार्य पूर्ण होने के बाद मंजूरी प्रकरण आना शंकाओं को जन्म देता है। इसलिए अधिकारियों को सचेत किया जाता है कि प्रकरणों का परीक्षण कर लें। इसमें रीवा, सीधी व सतना नहर की कैनाल बनने के बाद सामग्री खरीदी के लिए मंजूरी मांगी गई थी। इसमें लाखों के हेर-फेर की आशंका है। इसमें पहले दो इंजीनियरों पर कार्रवाई की गई है। सिवनी-छिंदवाड़ा नहरों के निर्माण कार्य में 69 लाख की गड़बड़ सामने आई थी। इसमें ठेकेदार ने निर्घारित मात्रा में सामग्री का उपयोग नहीं करके केवल बिल लगा दिए गए थे। हर नहर में करोड़ों के काम होते हैं। अभी गड़बड़ी की राशि का पूरा आकलन नहीं है, लेकिन 300 करोड़ से ज्यादा की मंजूरियां इस दायरे में आने का अनुमान है। जानकारों का कहना है कि नहर निर्माण तकनीकी काम होने के कारण जनता और दूसरे लोग हस्तक्षेप नहीं करते। जनप्रतिनिधि भी तकनीकी समझ के अभाव में उदासीन रहते हैं। काम पूरा होने के लंबे समय बाद खरीदी संबंधित मंजूरियां मांगना गड़बड़ी की आशंका तो पैदा करता ही है। कई बार ऐसा भी होता है कि लापरवाही के कारण इंजीनियर तय समय पर मंजूरी नहीं ले पाते और बाद में अनुमोदन मांगते हैं।
टीकमगढ़ में बुंदेलखंड पैकेज के तहत हुए कार्यों में जमकर भ्रष्टाचार हुआ है। हाल ही में करोड़ों रुपए की लागत से बनकर तैयार हुई नहर पहली ही बारिश की मार भी नहीं झेल सकी और नहर टूटने से किसानों की सैकड़ों एकड़ जमीन पर लगी फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गईं। बुंदेलखंड पैकेज के तहत टीकमगढ़ में एक नहर बनाने के लिए स्वीकृत हुए करीब 38 करोड़ रुपए पानी में बहा दिए गए। भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े पैकेज में इस तरह भ्रष्टाचार हुआ है कि, हाल ही में हरपुरा से लेकर मडिया गांव तक बनी नहर कई जगह से फूट गई है। जामनी नदी पर बनी 45 किलोमीटर लंबी इस नहर का काम साल 2011 के आखिरी में शुरु हुआ था। निर्माण लगभग पूरा हो चुका है। लेकिन घटिया निर्माण के चलते पहली ही बारिश में कई जगह से नगर टूट गई। नहर टूटने से कई किसानों की फसलें बर्बाद हो गईं हैं। साल 2011 में इस नहर का ठेका ग्वालियर की सारथी कंस्ट्रक्शन कंपनी को मिला था। 15 जून 2016 तक नहर का काम पूरा होना था। 35 गांवों से होकर गुजरी इस नहर से 10 तालाबों को भरा जाना था। लेकिन घटिया निर्माण के चलते नहर कई जगह से टूट गई। अंदाजा लगाया जा सकता है कि नहर का काम कितना गुणवत्ताहीन हुआ। मामले को लेकर जब बंसल न्यूज ने जि मेदार अधिकारियों से बात की तो उन्होंने हमेशा की तरह रटा-रटाया जबाव दिया।
बुंदेलखंड पैकेज में हुए अरबों रुपए के भ्रष्टाचार की गूंज सड़क से लेकर संसद तक सुनाई देती है। लेकिन जिन अधिकारियों के संरक्षण में ये सब होता हैं उन्हें सरकार प्रमोशन से नवाजती है। निर्माण कार्य में लापरवाही और समय सीमा के अंदर काम पूरा न होने पर भी कंस्ट्रक्शन कंपनी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होना सिस्टम और कंस्ट्रक्शन कंपनी के बीच मिलीभगत को उजागर करता है।
नहरों की सफाई के नाम पर भ्रष्टाचार
प्रदेश में जेसीबी से नहरों की सफाई कर लाखों के बिल भुगतान किए जा रहे है तो नहरों को क्षतिग्रस्त कर मेंटेनेंस के नाम शासन से मिलने वाली राशि का बंदरबांट किया जा रहा हैं। अभी हाल ही में दतिया के सेंवढ़ा में मामला सामने आने के बाद विभाग में हड़कंप मचा है। आरोप है कि अधिकारियों की मिलीभगत से जल उपभोक्ता संस्थाओं द्वारा पक्की नहर पर उगी गाजर घास को काटने के नाम पर जेसीबी मशीन चलावाई जा रही है। जिस गाजर घास को काटने के लिए मशीन चलवाई जा रही है उसे केवल मजदूर से ही सही करवाया जा सकता है। पर जेसीबी मशीन चलवाकर अधिकारी न तो नहर की सफाई करवा पा रहे है। बल्कि नहर के किनारे की आरसीसी को भी तोड़ रहे हैं। इस प्रकार तोड़ी गई आरसीसी नहरों के लिए मेंनटनेंस की जरूरत पैदा कर रही है। बताया जाता है कि संस्थाओं के अध्यक्षों ने अधिकारियों के साथ मिलकर गर्मियों में गूलों का घटिया निर्माण करवाया। नतीजा यह हुआ कि अस्सी फीसदी गूलें अपना अस्तित्व खो चुकी हैं। अब आनन फानन में नहरों की सफाई के नाम पर पैसे कमाने की जल्दी है।
बिना टेंडर करा डाले 50 करोड के काम
लोक निर्माण विभाग में अधिकारी और इंजीनियर कितने निरंकुश और भ्रष्ट हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तो वे बिना टेंडर के भी काम करवाने लगे हैं। पिछले दो माह से रीवा से भोपाल तक एक ऐसा ही मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। विभाग से मिली जानकारी के अनुसार, पिपरवार वितरक नहर घोटाला कार्यपालन यंत्री आरडी अहिरवार की गले की फांस बन गया है। दरअसल इस मामले मे जलसंसाधन विभाग के कार्यपालन यंत्री अहिरवार ने तत्कालीन अपर प्रमुख सचिव राधेश्याम जुलानिया के मौखिक आदेश पर स्वीकृति की प्रत्याशा मे भारी भरकम बजट खर्च कर डाला लेकिन उन्हें स्वीकृति नहीं मिली और तो और अब जुलानिया को जलसंसाधन से हटा भी दिया गया ऐसी स्थिति मे गुणवत्ता विहीन कराया गया कार्य अब आरडीअहिरवार के गले की फांस बन चुका है।
बताया जाता है कि इस मामले की शिकायत अधिवक्ता सुरेन्द्र पाण्डेय द्वारा कलेक्टर और कमिश्नर रीवा से की गई थी जिस पर जांच कराई गई। जांच में पाया गया कि पिपरवार माइनर नहर निर्माण मे संबंधित ऐजेंसी द्वारा भारी गड़बड़ी की गई है। इस जांच रिपोर्ट पर वरिष्ठ अधिकारी कार्यवाही करने से कांप रहे हैं क्यों कि मामला सीधे मप्र के तेज तर्राट आईएएस राधेश्याम जुलानिया से जुड़ा हुआ है। एएसीएस स्तर के अधिकारी जुलानिया विगत 5 वर्ष तक एक छत्र जल संसाधन विभाग के प्रमुख सचिव पदस्थ रहे जहां उनकी तूती बोलती रही। जुलानिया मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के विश्वास पात्र अधिकारियों मे गिने जाते रहे जिसका फायदा उठाकर उन्होंने अपनी चहेती कंपनी से बगैर टेंडर 50 करोड का काम करवा डाला। बताया जाता है कि क्योंटी केनाल अनुबंध क्रमांक 3 का 2012-13 दिनांक 27.06.2012 में अतिरिक्त कार्य पिपरवार वितरक नहर क्योटी कैनाल रीवा 0.0 से 1593 का जॉच प्रतिवेदन दिनांक 22.08.2016 पृष्ठ क्रमांक 393/तक/ग्रायॉसे/2016 द्वारा प्रस्तुत जॉच प्रतिवेदन नहर की लाईनिंग की मोटाई 05 सेमी, 03 सेमी, 2.50 सेमी, 4 सेमी पाई गई, जबकि शासन के नियामानुसार 7.50 सेमी होना चाहिए तथा अमानक एवं गुणवत्ता विहीन भी पाई गई। यही नहीं पूरक निर्माण कार्य शासन स्तर पर स्वीकृत हेतु अपेक्षित पाया गया है। इन सब के बावजुद जांच अधिकारी द्वारा आरोपियों को खूब बचाने का प्रयास किया गया। इसके बावजूद कार्य अमानक एवं गुणवत्ता विहीन बिना टेंडर के पाया गया। आरोपीगण मेसर्स एएनएस कांस्ट्रक्शन नई दिल्ली, आरडी अहिरवार कार्यपालन यंत्री क्योटी केनाल जल संसाधन विभाग रीवा, आनन्द स्वरूप तिवारी एसडीओ क्योटी कैनाल रीवा, संदीप कुमार द्विवेदी एसडीओ क्योटी कैनाल रीवा, जीसीएम उपयंत्री क्योटी कैनाल रीवा एवं संबंधित वरिष्ठ एवं कनिष्ठ यंत्रीगण इत्यादि दोषी अधिकारियों के द्वारा किए गए भ्रष्टाचार के खिलाफ एफआईआर और वसूली की कार्यवाही किए जाने की मांग की गई है। पांडेय ने बताया कि ढाल सिंह चौधरी कार्यपालन यंत्री ग्रामीण यांत्रिकी सेवा सम्भाग-1 रीवा के द्वारा जिलाध्यक्ष के यहां दिनांक 22.08.2016 क्रमांक 393 प्रस्तुत किया गया एवं अधीक्षण यंत्री ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के द्वारा आयुक्त रीवा को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करना था परन्तु आरोपी को बचाते हुए आयुक्त के निर्देश थे कि बारीकी से जांच कर तत्काल जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करें। इसके बावजूद भी जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि जांच अधिकारी ढाल सिंह चौधरी ग्रामीण यांत्रिकी सेवा सम्भाग-1 रीवा के द्वारा 11.08.2016 पिपरवार वितरक नहर की लाइनिंग की जांच 0.0 से 1593 की गई। जिसमें बिन्दु क्रमांक 5 में लिखा गया कि शिकायतकर्ता द्वारा लाइनिंग की मोटाई के सम्बन्ध में शिकायत की गई है। कार्यस्थल का स्थल निरीक्षण किया। एट रेन्डम कुछ कंकरीट पैनल अलग-अलग स्थानों की मोटाई समान्य तौर पर जहां सम्भव हो सका देखी एवं प्रथम दृष्टया मापी गई जो (1)-7.50 सेमी, (2)-7.50 सेमी, (3)-5.00 सेमी, (4)-3.00 सेमी, (5)-2.50 सेमी, (6)-4.00 सेमी पाई गई एवं जांच अधिकारी के द्वारा लिखा गया कि कुछ कंकरीट पैनल में क्रैक (हेयर क्रैक्स एवं कुछ चौड़े) पाए गए एवं एक स्थान पर लाइनिंग कार्य टूटी पाई गई। एक स्थान के कंक्रीट पैनल में सेटेलमेन्ट पाया गया एवं कुछ लाइनिंग कंकरीट पैनल में लगभग पांच-छ: जगह में ऊपरी सतह पर रफ कार्य कंकरीट पाई गई। जिससे स्पष्ट हो गया कि अमानक एवं गुणवत्ता विहीन कार्य कराया गया है। इसके बावजूद भी जांच अधिकारी ढाल सिंह चौधरी द्वारा आरोपीगण मेसर्स एएन कास्ट्रक्शन कम्पनी लिमिटेड नई दिल्ली एवं आरडी अहिरवार कार्यपालन यन्त्री क्योटी कैनाल रीवा एसडीओ उपयन्त्री को बचाने का प्रयास किया गया। बताया जाता है कि बाण सागर परियोजना क्योटी मुख्य नहर के 41.41 से 90.00 किलोमीटर तक कंकरीट लाइनिंग का कार्य पिपरवार वितरक नहर का कार्य अतिरिक्त से जोड़ कर बिना निविदा आमंत्रित किए मेसर्स एएनएस कन्सट्रक्शन कम्पनी नई दिल्ली से नियम विरूद्ध कार्य सम्पादित किया गया है जो नियमानुसार गलत है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि यह तो महज एक उदाहरण भर है। लोक निर्माण विभाग में लगभग सभी कार्य में ऐसे भ्रष्टाचार किए जाते हैं।
भ्रष्टाचार के गवाह बांध
इस बार मानसून की पहली बारिश में ही पन्ना के बिलखुरा, सिरस्वाहा तथा नचनौरा बांध फूटने के बाद जल संसाधन विभाग का भ्रष्टाचार प्रकाश में आया। अजयगढ़ तहसील अन्तर्गत बहादुर गंज बांध के फूटने की आशंका के चलते रातो-रात संबंधित ठेकेदार एवं विभाग के नुुमाइंदो द्वारा जेसीबी से दोनों नहरे खोलकर बांध का पानी निकालकर भ्रष्टाचार को छुपाते हुए मरम्मत कराई गई। बुंदेलखंड पैकेज अन्तर्गत अजयगढ़ में करोड़ों की लागत से बनाया जा रहा बहादुरगंज बांध लगभग 90 पूर्ण होने की स्थिति में है बांध से निकलने वाली नहर का कार्य अभी बाकी ही था कि पहली ही बारिश में बांध में जल भराव के कारण फूटने की स्थिति में पहुंच चुका था। बहादुरगंज बांध मे गुणवत्ता की इतनी तकनीकि खामियां अभी भी साफ नजर आ रही है। बांध की पार जगह जगह धस गई और दरारें भी आ चुकी है।
वहीं सतना के रामनगर में सात महीने पहले करोड़ों की लागत से बने अंधियारी सागर बांध का एक हिस्सा टूटकर बह गया है। बांध का टूटा हुआ हिस्सा और उससे बहता पानी भ्रष्टाचार की कहानी बयान कर रहे हैं। 7-8 पहले ही यह बांध 32 करोड़ 32 लाख की लागत से बनकर तैयार हुआ था, लेकिन पहली ही बारिश में इस बांध की मजबूती की पोल खुल गई। श्योपुर जिले का बारदा बांध सहित कई बांधों के निर्माण में हुए भ्रष्टाचार का खुलासा हो चुका है। जो इस बात का संकेत है कि जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार अथाह गहराई तक समाया है। सिंचाई का रकबा बढाने के नाम पर गुणवत्ता विहीन और अनुपयोगी जल संरचनाओं का निर्माण कार्य कराकर सरकारी धन का जमकर बंदरबांट किया गया है। राजनैतिक और प्रशासनिक संरक्षण में कई वर्षों तक चली इस लूट से जुड़े चंद हैरान करने वाले खुलासे जल संसाधन संभाग पन्ना पवई के मुख्य अभियंता ने अपनी एक रिपोर्ट में किया है। रिपोर्ट के अनुसार कमीशन के चक्कर में तकनीकी अधिकारियों ने धृतराष्ट्र बनकर पदीय दायित्वों एवं कर्तव्यों के विपरीत सिंचाई तालाबों का गुणवत्ता विहीन कार्य कराकर शासन के करोड़ों रूपए डकार लिए। करीब दो तीन वर्ष पूर्व हुई सघन जांच की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट के आने के बाद विभाग के अंदरखाने में हडक़म्प मचा है।
शासन ने जांच रिपोर्ट के तथ्यों को अत्यंत ही गंभीरता से लेते हुए इसके आधार पर दोषी तकनीकी अधिकारियों की गर्दन पर अब जाकर विभागीय जांच का शिकंजा करा दिया है। इस सिलसिले में मप्र के राज्यपाल के नाम से तथा आदेशानुसार व्हीएस टेकाम उप सचिव मप्र शासन जल संसाधन विभाग ने कुछ माह पूर्व संभाग पन्ना एवं पवई के 11 तकनीकी अधिकारियों को आरोप पत्र जारी कर उनसे जबाव मांगा उसके आगे क्या कार्यवाही हुई कोई जानकारी देने तैयार नहीं है। जिन तकनीकी अधिकारियों आरोप पत्र जारी हुए थे उनमें से कुछ फिलहाल पन्ना में पदस्थ हैं जबकि कुछ का जिले से बाहर स्थानांतरण हो चुका है। जल संसाधन संभाग पवई में पदस्थ संलग्न अधिकारियों रघुराज सिंह ठाकुर इन्हीं में से एक हैं।
वर्ष 2013 में करीब छ: माह तक जल संसाधन उप संभाग पवई के अनुविभागीय अधिकारी के अतिरिक्त प्रभार में रहे ठाकुर साहब ने अपने कार्यकाल में दोनों हाथों से सरकारी धन को लूटने के चक्कर में इमलिया तालाब, चकरभाटा तालाब और उमेही नाला तालाब निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार किया। करोड़ों रूपए की लागत वाले इन तालाबों के निर्माण में गुणवत्ता के मापदण्डों के हांशिए पर रखकर करीब पांच करोड से अधिक का भ्रष्टाचार किया गया है।
कैग रिपोर्ट में भी उठ चुकी है आपत्ति
प्रदेश की नहरों में करोड़ों की हेर-फेर को लेकर कैग रिपोर्ट में भी आपत्ति उठ चुकी है। रिपोर्ट के मुताबिक बरगी, राजघाट और इंदिरा सागर परियोजनाओं में 800 करोड़ से ज्यादा की गड़बड़ी हुई है। इसमें ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए फर्जी बिल लगाकर भुगतान कराया गया। घटिया गुणवत्ता के निर्माण कार्यो पर बिना परीक्षण भुगतान कर दिया गया। उधर, आम आदमी पार्टी की मध्यप्रदेश यूनिट का आरोप है की प्रदेश में पिछले 10 सालो में जल संसाधन विभाग में 9772 करोड़ की वित्तीय अनिमियताएं सामने आई हैं जो एक गंभीर विषय हैं। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और प्रदेश संयोजक आलोक अग्रवाल ने आरोप लगाते हुए कहा है कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक के अनुसार 2004-05 से लेकर 2015 तक प्रदेश के 15 अलग-अलग विभाग में 36 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की ऐसी वित्तीय अनिमियताएं हुई हैं। पिछले दस सालों में वित्तीय अनिमियताओं के लगभग 5613 ऐसे मामले सामने आए हैं जिन का सरकार के पास कोई जवाब नही है। इन 5613 मामलो में से 1543 (लगभग 2100 करोड़ के) मामलों को लंबित हुए 10 साल से ज्यादा हो गए हैं।
13,000 करोड़ की योजनाओं पर पेंच
एक तरफ जहां सिंचाई परियोजनाएं भ्रष्टाचार का शिकार हो रही है वहीं दूसरी तरफ करीब 13 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट फॉरेस्ट क्लीयरेंस के फेर में अटके हैं। केन-बेतवा लिंक परियोजना सहित दो दर्जन परियोजनाओं के लिए प्रदेश और केन्द्र से फॉरेस्ट का रास्ता साफ करने के लिए प्रमुख सचिव पंकज अग्रवाल ने दिल्ली दौरा किया है। उधर, विभागीय मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने सिंचार्इं परियोजनाओं का काम आगे बढ़ाने के लिए आला अफसरों पर दबाव बनाया है। प्रदेश में सिंचाई का रकबा बढ़ाने के लिए जल संसाधन विभाग ने 20 हजार करोड़ की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। फॉरेस्ट इलाके में आने वाली सिंचाई परियोजनाओं को समय पर अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिलने से सिंचाई अफसरों की मुश्किलें बढ़ गर्इं हैं। प्रमुख सचिव पंकज अग्रवाल ने करीब दो दर्जन योजनाओं को शार्टआउट किया है जिन्हें फॉरेस्ट क्लीयरेंस का इंतजार है। उन्होंने बड़ी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए अंतिम समय सीमा वर्ष 2017 के अंत तक तय की है। प्रमुख अभियंता एमजी चौबे को ताकीद किया गया है कि वे फॉरेस्ट क्लीयरेंस के लिए काम करेंगे।
गंगा बेसिन रीवा प्रोजेक्ट के तहत टनल का कार्य वित्तीय वर्ष 2016-17 में पूरा करने के निर्देश हैं। त्यौंथर नहर प्रोजेक्ट को 31 मई 2017 तक पूरा करने का प्लान है। माही एक्सटेंशन प्रोजेक्ट को 2017 तक पूरा किया जाना है। बहुती नहर परियोजना और पेंच नगर परियोजना का भी काम चल रहा है। एक अनुमान के अनुसार करीब 8 हजार हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई का रकबा बढ़ाने के लिए परियोजनाओं को प्रभावी बनाया जा रहा है। प्रमुख सचिव जल संसाधन विभाग पंकज अग्रवाल कहते हैं कि सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने के लिए विभाग अपना काम कर रहा है। विभाग के मंत्री ने लगातार समीक्षायें की हैं। फॉरेस्ट की अनुमति के लिए सभी शर्तों और औपचारिकताओं की पूर्ति की जा रही हैं। प्रदेश में करीब 20 हजार करोड़ के प्रोजेक्ट पर काम चल रहा है। उम्मीद है कि निर्धारित समय में पूरी कर ली जायेंगी।
इन परियोजनाओं पर फोकस
जल संसाधन विभाग ने जिन महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर फोकस किया है उनमें एक लोअरगोई परियोजना है। 2400 करोड़ लागत की इस परियोजना को वन, पर्यावरण और प्रशासकीय मंजूरी का इंतजार है। हरसी उच्च बांध परियोजना के लिए भी फॉरेस्ट की पेंच होने से विभाग की मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। फॉरेस्ट की क्लीयरेंस मिलने की इंतजार में चुनार बांध धार, मोरवा माइनर बैतूल, बसुधा नाला प्रोजेक्ट, झरकली बांध अलीराजपुर, बंसकर बांध सतना, भावसा मीडियम सिंचाई बांध, नर्मदा-मालवा-गंभीर लिंक परियोजना, मझगवां बांध पन्ना, पतपरा नाला पन्ना आदि परियोजनायें हैं।
वहीं प्रदेश का सिंचाई रकबा बढ़ाने के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए फॉरेस्ट की अनुमति पाने सरकार प्रयासरत है लेकिन मामला केन्द्र में अटका है। इस परियोजना से 6 हजार हेक्टेयर से अधिक रकबे में सिंचाई होगी। परियोजना की लागत 9 सौ करोड़ से अधिक की है। साथ ही तिकतोली ग्वालियर लघु सिंचाई योजना में एसक्टेंशन का कार्य होना है। इसके लिए पांच हजार हेक्टेयर जमीन की आवश्यकता है। चीफ इंजीनियर ने प्रोपजल की जांच की है। मैदानी अफसर की रिपोर्ट पर डीपीआर बनाने को कहा गया है।
दागियों को बनाया जा रहा दमदार
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भले ही भ्रष्टाचारियों पर लगाम कसने की बात कहते हो, लेकिन कई विभाग भ्रष्टाचारी अफसरों पर पूरी तरह से मेहरबान हैं। इसमें जल संसाधन विभाग सबसे आगे है। आलम यह है कि विभिन्न भ्रष्टाचार के आरोपों में निलंबित किए गए अधिकारियों-कर्मचारियों का ताबड़तोड़ बहाल किया जा रहा है। इसके पीछे वजह यह बताई जा रही है कि विभागीय जांच पूरी होने के बाद ऐसा किया जा रहा है।
दरअसल, जल संसाधन विभाग अधिकारियों और इंजीनियरों के लिए दुधारू गाय है। इस विभाग में चल रहे छोटे-बड़े कार्यों में भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन गया है। इसका असर यह हो रहा है की कई योजनाएं-परियोजनाएं अधर में लटकी हुई हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सख्त निर्देशों के बाद भी अफसर उनके निर्देशों को ठेंगा दिखाते हुए अपने मंसूबों को अंजाम देने में लगे हुए हैं। इस विभाग में भ्रष्टाचार का कितना बोलबाला हैं इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विभाग के पूर्व अपर मुख्य सचिव राधेश्याम जुलानिया को करीब साढ़े तीन साल में 166 उपयंत्रियों, सहायक यंत्रियों, अनुविभागीय अधिकारियों के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई करनी पड़ी। लेकिन विभाग से उनका तबादला होते ही एक बार फिर से भर्राशाही चालू हो गई है। वैसे तो मप्र में भ्रष्टाचार के गंभीर मामले लोक निर्माण विभाग, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, विद्युत यांत्रिकी विभाग में भी आते रहते हैं लेकिन जल संसाधन में सुनियोजित तरीके से भ्रष्टाचार होता है। जुलानिया ने विभाग के इस सुनियोजित नेटवर्क को तोड़ दिया था। लेकिन जुलानिया के जाते ही जल संसाधन विभाग में राहत का माहौल है। क्योंकि भ्रष्टों को फिर बहाल किया जाने लगा है।
संविदा से चल रहा विभाग
बताया जा रहा है कि जल संसाधन विभाग में जिन दागी अफसरों के आरोपों की जांच हो चुकी है और वे बेदाग साबित हुए हैं, उनकी सेवा बहाली की जा रही है। जबकि विभाग के सूत्रों का कहना है कि पूर्व अपर मुख्य सचिव राधेश्याम जुलानिया के जाते ही दागदार कमाऊ अधिकारियों और इंजीनियरों के अच्छे दिन आ गए हैं। विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि छोटी-छोटी शिकायतों पर अधिकारियों और इंजीनियरों को निलंबित किए जाने की परंपरा से विभाग में इंजीनियरों का टोटा हो गया है। वहीं प्राइवेट सेक्टरों के बढ़ते प्रभाव और नियमित इंजीनियरों के नौकरी छोडऩे के कारण जल संसाधन विभाग सेवानिवृत्त कर्मचारी और अधिकारियों को संविदा पर पदस्थ कर रहा है। अकेले जल संसाधन विभाग में पिछले चार साल में दो सौ के करीब सेवानिवृत्त अधिकारियों (काफी सं या में इंजीनियर शामिल) को संविदा पर पदस्थ किया गया है। ऐसे में विभाग के अनुभवी लोगों की सेवा बहाली में अनुचित क्या है? ज्ञातव्य है कि प्रदेश सरकार द्वारा जल संसाधन विभाग में 5 सालों से ईएनसी का पद पदोन्नति से नहीं भरे जाने से वहां भी संविदा नियुक्ति से काम चलाया जा रहा है। नए ईएनसी की तैनाती में सरकार की रुचि नहीं है। भ्रष्टाचारियों का चारागाह बने जनसंसाधन विभाग में भ्रष्टाचार का आलम क्या था। यह इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि जहां वर्ष 2013 में विभिन्न अनियमितताओं के कारण चौहत्तर उपयंत्रियों, सहायक यंत्रियों और अनुविभागीय अधिकारियों को निलंबित किया गया था वहीं 2014 में 51 को और 2015 में 25 को तथा 2016 में अभी तक 16 को निलंबित किया जा चुका है। ये आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि विभाग में भ्रष्टाचार चरम पर था लेकिन जब से जुलानिया इस विभाग में आए उन्होंने भ्रष्टों के खिलाफ कठोर कदम उठाकर उन्हें निलंबित करने का जो सिलसिला शुरू किया उससे भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक लगाम लगी थी। लेकिन एक बार फिर से विभाग ने भ्रष्ट अफसरों को सारे आरोपों से मुक्त कर पुन: सेवा में लिया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सभी दागियों को बेदाग किया जाएगा।
चौबे की पांचवी संविदा ने रोकी पदोन्नति
जल संसाधन विभाग में भर्राशाही का आलम यह है कि विभाग में 3,000 से अधिक इंजीनियरों की भरमार के बाद भी विभागाध्यक्ष यानी इंजीनियर-इन-चीफ के पद पर पिछले पांच साल से सेवानिवृत अफसर मदन गोपाल चौबे की सेवाएं ली जा रही हैं। चौबे की संविदा नियुक्ति से पदोन्नति की बाट जोह रहे इंजीनियरों के शीर्ष पद पर पहुंचने से पहले रिटायर होने वालों की कतार में और इजाफा हो रहा है। विभाग के डेढ़ दर्जन से ज्यादा चीफ इंजीनियर बाट जोह रहे हैं कि उनमें से किसी को ईएनसी बनने का अवसर मिलेगा। लेकिन हर बार सरकार चौबे को ईएनसी बना देती है। यही नहीं चौबे के लिए नियमों को भी ताक पर रखा जा रहा है। इसी सरकार ने नियम बनाए थे कि किसी अफसर को रिटायरमेंट के बाद दो बार से ज्यादा संविदा पर नहीं रखा जाएगा। इसके बाद भी संविदा देनी है तो उसके बारे में छानबीन समिति की रिपोर्ट को माना जाएगा। ये और बात है कि चौबे का मामला छानबीन समिति में गया ही नहीं। चौबे को बार-बार संविदा पर रखने से ऐसा लग रहा है जैसे जलसंसाधन विभाग के 3000 इंजीनियरों में से किसी के पास भी वो तकनीकी योग्यता और नेतृत्व क्षमता नहीं है, जो चौबे जी के पास है। प्रदेश मे पड़ा सूखा और विभाग में चल रहे बड़े (वृहद) बांधों के काम चौबे की पांचवी संविदा नियुक्ति की भूमिका रचने में सहायक सिद्ध हुए तो और भूमिगत पाइपलाइन के जरिए खेत तक उच्च दाब से पानी पहुंचाने की विशेषज्ञता भी उनके अलावा किसी और इंजीनियर के पास नहीं होने की बात भी घुमा-फिरा कर साबित करने की कोशिश की गई।
अब सवाल ये उठता है कि जिस विभाग के अफसरों को उस काम का अनुभव नहीं है जिसके लिए उन्हें नौकरी दी गई है तो उन्हें बीस-पच्चीस साल से वेतन देकर क्यों झेला जा रहा है? वे इतने अयोग्य हैं कि अभी तक वह योग्यता हासिल नहीं कर पाए, जिसकी जरूरत उनके काम में होती है तो ऐसे इंजीनियरों को भर्ती ही क्यों किया गया? उनकी क्षमता विकास के काम क्यों नहीं किए गए? उन्हें सहायक यंत्री से मुख्य अभियंता के पद तक पदोन्नत क्यों किया गया? क्या चौबे के ईएनसी बनने से पहले जलसंसाधन विभाग बड़े बांध नहीं बना रहा था? या फिर बाणसागर परियोजना जैसे बड़े बांध क्या अयोग्य इंजीनियरों ने बना डाले थे? या फिर चौबे सर्वगुणसंपन्न होने के साथ ही सर्वव्यापी भी हैं। जो वे हरेक बांध, प्रत्येक नहर, सभी भूमिगत पाइपलाइन के मुहाने पर एक साथ मौजूद रह कर अपनी देखरेख में जलसंसाधन विभाग के काम करा रहे हैं।
दूसरे नजरिये से देखें तो चौबे ने कम से कम पैतीस-चालीस साल पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की होगी। उनके इंजीनियर बनने के बाद क्या प्रदेश और देश के तकनीकी कॉलेजों ने कुशल इंजीनियर तैयार करना ही छोड़ दिया है? जो विभाग में योग्यता, तकनीकी क्षमता और नेतृत्व की काबिलियत का अकाल पड़ा हुआ है। ऐसे तमाम सवालों की फेहरिस्त तो किसी नहर की तरह लंबी हो सकती है, लेकिन जवाब कोई देगा नहीं। सरकार के एक इस फैसले ने विभाग के इंजीनियरों के अरमानों पर पानी जरूर फेर दिया है। विभागीय ट्री फार्मेशन का टॉप तो किसी और के लिए रिजर्व है तो नीचे के अफसरों के अवसर प्रभावित होगें ही। इसीलिए बीते चार साल में कई इंजीनियर प्रमोशन के इंतजार में रिटायर हो गए तो अब फिर कुछ और अधिवार्षिकी आयु पूरी कर घर बैठ जाएंगे।
7200 करोड़ का हिसाब नहीं
जल संसाधन विभाग में सामने आए भ्रष्टाचार पर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरूण यादव का कहना है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चहेते अफसर सबसे अधिक भ्रष्टाचार कर रहे हैं। वह कहते हैं कि केंद्र की पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने बुंदेलखंड के विकास हेतु करीब 7200 करोड़ रुपयों की बड़ी धनराशि प्रदेश सरकार को आवंटित की थी, जिसे वह भ्रष्टाचार के रूप में निगल गई है। आलम यह है कि सरकार के पास उसका हिसाब ही नहीं है। प्रदेश में नहरों, बांधों, तालाबों के निर्माण में धांधली हुई है और जलसंसाधन विभाग के पूर्व एसीएस राधेश्याम जुलानिया भी इसमें शामिल रहे हैं। यादव कहते हैं कि भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंसÓ की बात करने वाले शिवराजसिंह चौहान में यदि नैतिकता है तो उन्हें अपने ''नौ-रत्न नौकरशाहोंÓÓ में से एक जुलानिया के विरूद्ध सख्त कार्रवाही करते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कराना चाहिए। वह कहते हैं कि बुंदेलखंड के लिए 7200 करोड़ का विशेष पैकेज पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की पहल पर जारी हुआ था। वास्तव में इस राशि का कितना और किस तरह से इस्तेमाल हुआ है, यह सरकार को बताना चाहिए और इसके लिए 'श्वेतपत्रÓ जारी किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य में सिर्फ भ्रष्टाचार हुआ है, बांध, स्टॉपडैम और चेकडैम के नाम पर सिर्फ ढांचे खड़े किए गए, जो जान लेवा हैं।
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