गुरुवार, 26 सितंबर 2013
नए मतदाताओं ने बिगाड़ा माननीयों का गणित
कम वोट से जीत वाले विधानसभा सीटों पर मिल सकती है कड़ी चुनौती
भोपाल। विधानसभा चुनाव के लिए वोटरों की नई लिस्ट जारी होते ही माननीयों (विधायकों)के होश उड़ गए हैं। पिछले एक साल से मतदातों का हिसाब-किताब लगा रहे नेताओं का इस लिस्ट के आने से गणित गड़बड़ा गया है। नई वोटर लिस्ट आने के बाद पाक्षिक मालव समाचार ने इंदौर की विधानसभा सीटों का आंकलन किया,तो पाया कि जिन इलाकों में जीत का अंतर पांच हजार वोटों के आसपास रहा, वहां मौजूदा विधायक के लिए नए वोटर बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। जहां जीत का फर्क बड़ा है, वहां भी राह आसान नहीं। प्रदेश भाजपा संगठन ने आसन्न विधानसभा चुनावों के लिए प्रत्याशी चयन और 'टिकटÓ के दावेदारों के नाम काटने की कवायद शुरू कर दी है.
वोटर लिस्ट के अंतिम प्रकाशन के मुताबिक, जिले में 21.76 लाख वोटर हैं। यह संख्या 2008 विधानसभा चुनाव से 6.50 लाख अधिक है। बढ़ोतरी को क्षेत्र के हिसाब से देखें तो मौजूदा विधायक अश्विन जोशी, महेंद्र हार्डिया, जीतू जिराती और तुलसी सिलावट की राह मुश्किल दिखती है। वहीं सुदर्शन, रमेश मेंदोला, मालिनी गौड़, कैलाश विजयवर्गीय और सत्यनारायण के इलाकों में विपक्षी मेहनत कर चुनाव को रोमांचक बना सकते हैं।
विधानसभावार यह है समीकरण
इंदौर एक--------
विधायक : सुदर्शन गुप्ता, भाजपा
8183 जीत का अंतर (कांग्रेस के संजय शुक्ला को हराया)
6.86 प्रतिशत वोटों का अंतर
100133 वोट बढ़े
वर्तमान हालात-इस विधानसभा क्षेत्र विधायक सुदर्शन गुप्ता से भाजपा की ही पूर्व विधायक उषा ठाकुर समर्थक अब हिसाब बराबर करने के मूड में है। उनका विधायक सुदर्शन गुप्ता के खिलाफ हल्लाबोल आयोजन जारी है। पहले आपसी बैठक, फिर क्षेत्र के नेताओं के साथ बातचीत के बाद मामला पार्टी कार्यालय भी पहुंच गया। विधानसभा क्षेत्र क्रमांक-1 में पार्टी विधायक सुदर्शन गुप्ता के अलावा पूर्व विधायक उषा ठाकुर और महापौर परिषद सदस्य सपना निरंजन चौहान टिकट के दावेदारों की दौड़ में हैं। उमाशशि शर्मा और सत्यनारायण सत्तन के समर्थक भी सक्रिय हैं।
इंदौर दो
विधायक : रमेश मेंदोला, भाजपा
39937 जीत का अंतर (कांग्रेस के सुरेश सेठ को हराया)
33.47 प्रतिशत वोटों का अंतर
95318 वोट बढ़े
वर्तमान हालात- भले ही विधानसभा चुनाव अभी दूर हों, लेकिन ऐसा लगता है दावेदारों ने अभी से मैदान पकडऩा शुरू कर दिया है। यहां के विधायक मेंदोला नजर क्षेत्र क्रमांक-3 पर लगी हुई है। यहां के सभी वार्डों में हर गली-मोहल्ले में अपने पक्के समर्थकों की सूची बनाकर उनके अनुसार कार्यक्रमों को अंजाम देना शुरू कर दिया है। इसकी भनक लगते ही तीन अन्य दावेदार ललित पोरवाल, गोपी नेमा, गोविंद मालू में हड़कंप मच गया है और वे भी अपने-अपने समर्थकों की सूची बनाने में लग गए हैं। ऐसी चर्चाएं सरगर्म हैं कि क्षेत्र क्रमांक-2 की सीट विधायक रमेश मेंदोला, मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के पुत्र आकाश विजयवर्गीय के लिए खाली करने जा रहे हैं और 3 नंबर से इस बार वे हाथ आजमाने की इच्छा रखते हैं।
इंदौर तीन
विधायक : अश्विन जोशी, कांग्रेस
402 जीत का अंतर (भाजपा के गोपीकृष्ण नेमा को हराया)
0.42 प्रतिशत वोटों का अंतर
45791 वोट बढ़े
वर्तमान हालात- पार्टी प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया के खिलाफ दिल्ली में आवाज उठाकर जोशी ने संगठन गाइड लाइन का उल्लंघन किया है। लेकिन अभी तक यहां उनके खिलाफ कांग्रेस की तरफ से कोई नाम सामने नहीं आया है।
इंदौर चार
विधायक : मालिनी गौड़, भाजपा
28043 जीत का अंतर (कांग्रेस के गोविंद मंगानी को हराया)
27.28 प्रतिशत वोटों का अंतर
72179 वोट बढ़े
वर्तमान हालात- मौजूदा जिला अध्यक्ष शंकर लालवानी क्षेत्र-4 से टिकट हासिल करने के लिए लंबे अर्से से जमावट कर रहे हैं। इस क्षेत्र के अलावा विकल्प के रूप में क्षेत्र-3 पर भी खास निगाह है। समर्थकों को लगता है कि दोबारा अध्यक्ष बनने के बाद क्षेत्र-4 से टिकट नहीं मिलता है तो हारी हुई क्षेत्र-3 की सीट से पार्टी उम्मीदवार जरूर बना सकती है। मधु वर्मा वर्मा क्षेत्र-4 के पुराने दावेदार रहे हैं। वहीं महापौर मोघे के समर्थकों की निगाह इस सीट पर भी बनी हुई है।
इंदौर पांच
विधायक : महेंद्र हार्डिया, भाजपा
5264 जीत का अंतर (कांग्रेस की शोभा ओझा को हराया)
4.16 प्रतिशत वोटों का अंतर
105943 वोट बढ़े
वर्तमान हालात-विधायक व स्वास्थ्य राज्यमंत्री महेंद्र हार्डिया को उम्मीद है कि पार्टी उन्हें फिर से चुनाव लड़वाएगी। फिर भी यहां के लिए 26 लोगों की सूची बनी है। अंजू माखीजा और अजयसिंह नरूका की भी दावेदारी मानी जा रही है।
राऊ
विधायक : जीतू जिराती, भाजपा
3821 जीत का अंतर (कांग्रेस के जीतू पटवारी को हराया)
3.80 प्रतिशत वोटों का अंतर
83709 वोट बढ़े
वर्तमान हालात-यहां से विधायक जीतू जिराती के अलावा मधु वर्मा, दिनेश मल्हार के नाम भी दावेदारों में शामिल हैं। यहां के लिए जो सूची बनी है, उसमें अन्य क्षेत्रों की तुलना में सबसे कम नेता-कार्यकर्ता शामिल किए गए हैं।
देपालपुर
विधायक : सत्यनारायण पटेल, कांग्रेस
9491 जीत का अंतर (भाजपा के मनोज पटेल को हराया)
7.62 प्रतिशत वोटों का अंतर
46543 वोट बढ़े
वर्तमान हालात-देपालपुर से सत्यनारायण पटेल वर्तमान विधायक हैं। क्षेत्र में मजबूत पकड़ के कारण विधानसभा और कांग्रेस की ओर से लोकसभा के उम्मीदवार। विडम्बना है कि शहरी राजनीति से पराए हो चुके इस विधायक को देहाती मतदाता भी अपनाने से कतरा रहे है। उधर भाजपा के मनोज पटेल ने भी इनके खिलाफ अपनी तैयार पूरी कर ली है।
महू
विधायक : कैलाश विजयवर्गीय, भाजपा
9791 जीत का अंतर (कांग्रेस के अंतरसिंह दरबार को हराया)
7.51 प्रतिशत वोटों का अंतर
54368 वोट बढ़े
वर्तमान हालात-महू विधानसभा को लेकर केवल औपचारिकता निभाई जाएगी, क्योंकि प्रदेश अध्यक्ष मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के नाम का ऐलान कर चुके हैं। उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का कहना है कि वे इस बार महू क्षेत्र से ही चुनाव लड़ेंगे लेकिन अगर पार्टी कहीं और से लडऩे के लिए निर्देश देती है तो मैं वहां से भी चुनाव लड़ूंगा और जीत कर ही आऊंगा।
सांवेर
विधायक : तुलसी सिलावट, कांग्रेस
3417 जीत का अंतर (भाजपा की निशा सोनकर को हराया)
2.84 प्रतिशत वोटों का अंतर
46843 वोट बढ़े
वर्तमान हालात-सांवेर से तुलसी सिलावट वर्तमान विधायक हैं और बेहतर छवि व ज्योतिरादित्य सिंधिया की भक्ति में लीन हैं, लेकिन अजीत बोरासी (प्रेमचंद गुड्डू पुत्र) ने वहां से दावेदारी प्रस्तुत कर एक नया पेंच फंसा दिया है, क्योंकि गुड्डू भी सिलावट के परंपरागत प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं।
1 रूपए में दे दी अरबों की जमीन!
10 साल में रसूखदारों को सरकार ने बांटी बेशकीमती जमीनें
भोपाल। मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाने के नाम पर राज्य में पिछले 10 साल में जमीनों की जमकर बंदरबाट की गई है। सरकार ने अपनों के साथ-साथ उद्योगपतियों को प्रदेश की बेशकीमती जमीनों को कौडिय़ों के भाव बांट दिया है। यही नहीं प्रदेश के मंत्रियोंं, प्रभावशाली आईएएस अधिकारियों और सत्ता साकेत के रसूखदारों को उनकी निजी संस्था के लिए सरकार ने अरबों की जमीन एक रूपए में दे दी है।
मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की रसूखदारों और उद्योगपतियों के प्रति प्रेम इस बात से भी झलकता है कि प्रदेश में बनने वाले बांधों से विस्थापित हुए लोग दो गज जमीन के लिए जल समाधि लेने को मजबुर हैं और सरकार उनकी सुध लेने की बजाय सरकारी जमीन चहेतों को बांट रही है। प्रदेश में जमीनों की बंदरबांट में नियम-कायदे और मर्यादाएं कैसे तार-तार किए गए, इसका नमूना है-भोपाल का महावीर इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एण्ड रिसर्च। कैबिनेट मंत्री जयंत मलैया, वरिष्ठ आईएएस अफसर देवेंद्र सिंघई, अनुराग जैन, आईपीएस आरके दिवाकर, पवन जैन और रसूखदार डॉक्टर राजेश कुमार जैन समेत कुछ अन्य द्वारा श्री दिगंबर जैन सर्वोदय विद्या ज्ञानपीठ नाम से गठित निजी समिति को 100 करोड़ रूपए से अधिक कीमत की 25 एकड़ जमीन कई अफसरों के विरोध के बावजूद महज एक रूपए में दे दी गई।
निजी मेडिकल कॉलेज गठित करने के नाम पर रचे गए ताने-बाने में समाज का चोला ओढ़ा गया। जमीन हासिल करने व चंदे के लिए आचार्य विद्यासागर जी जैसे पूज्य संत तक के नाम का इस्तेमाल किया गया। भोपाल में राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विवि के नजदीक ग्राम बड़वई स्थित 373/1/1 खसरे की 25 एकड़ भूमि मिलने के बाद संत का नाम हटा दिया गया। सात साल में मेडिकल कॉलेज के नाम पर कुछ पिल्लर और एक अधूरा ढांचा ही खड़ा है, लेकिन सरकार इन रसूखदारों पर हाथ नहीं डाल रही।
वार्ड तक नहीं बना तो क्यों नहीं छीन रहे भूमि
वर्ष 2005 में भोपाल की श्री दिगंबर जैन सर्वोदय विद्या ज्ञानपीठ समिति को निजी मेडिकल कॉलेज बनाने के लिए सरकार ने 25 एकड़ जमीन देने की घोषणा की। उस वक्त इस समिति के उपाध्यक्ष पद पर वरिष्ठ आईएएस सिंघई और तत्कालीन डीजी जेल दिवाकर काबिज थे। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के सचिव पद पर तैनात आईएएस अनुराग जैन और आईजी पवन जैन इसके सदस्य थे।
सरकार ने पहले चरण में इस समिति को तीन एकड़ जमीन वर्ष 2006 में इस शर्त के साथ दी कि वह दो साल में पहले 300 बिस्तर का अस्पताल बनाकर व एक साल में इसे संचालित कर दिखाए, तब बाकी भूमि पर कब्जा मिलेेगा। शर्त थी कि इस अवधि में अस्पताल नहीं खुला तो सरकार यह जमीन वापस ले लेगी। लेकिन एक साल तो दूर की बात है, तीन वर्ष तक कुछ नहीं हुआ तो भी सरकार ने जमीन वापस नहीं ली। उलटे वर्ष 2009 में संस्था को फिर इसी शर्त के साथ छूट दी गई कि तीन साल में वह अस्पताल बना ले। यह अवधि भी बीत गई है। कुछ अफसरों के विरोध के बावजूद हर बार रियायत का नया प्रस्ताव सीधे कैबिनेट से मंजूर करा लिया जाता है।
रिटायर्ड आईएएस अधिकारी डीएस राय व विधि विशेषज्ञों के मुताबिक कोई अफसर या मंत्री अपनी निजी संस्था के मसले पर अपने दस्तखत से प्रस्ताव आगे कैसे बढ़ा सकता है। यह हितों के टकराव (कान्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट) का मामला भी है। इस समिति को जमीन देने के लिए कैबिनेट प्रस्ताव देवेंद्र सिंघई के दस्तखत से तैयार हुआ। सिंघई तब प्रमुख सचिव (राजस्व) थे और समिति के उपाध्यक्ष भी। वर्ष 2010 में कैबिनेट मंत्री जयंत मलैया ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा कि इस निजी मेडिकल कॉलेज को जमीन बंधक रखकर कर्ज लेने की छूट दी जाए, इसके लिए कैबिनेट से प्रस्ताव पास कराया जाए। उस वक्त मलैया इस निजी समिति के अध्यक्ष हो गए थे। सरकार ने यह छूट भी उन्हें दे दी। समिति के सचिव डॉ. राजेश कुमार जैन कहते हैं कि आवंटन नियमों के अनुसार ही हुआ है, टीएनसीपी और अन्य विभागों की मंजूरी में देरी के कारण अस्पताल निर्माण नहीं हो सका। समिति उपाध्यक्ष देवेंद्र सिंघई कहते हैं कि संस्था में उपाध्यक्ष पद पर हूं, लेकिन अब ग्वालियर में पदस्थ हूं इसलिए जानकारी नहीं है। आर्थिक अनियमितताओं की जानकारी मुझे नहीं हैं, सचिव से बात करें। समिति के पूर्व सदस्य, पुुलिस महानिदेशक प्लानिंग, भोपाल पवन जैन कहते हैं कि मैं कुछ समय समिति सदस्य रहा, लेकिन वर्तमान में जुड़ा नहीं हूं। बाकी बातें सचिव ही बता सकते हैं।
उद्योगपतियों को 71 हजार एकड़ जमीन बांटी
यही नहीं प्रदेश की वर्तमान भाजपा सरकार ने प्रदेश में उद्योगों को स्थापित करने के नाम पर 40 उद्योगपतियों को 71 हजार एकड़ से ज्यादा सरकारी जमीन बांटकर उपकृत कर चुकी है। यह जमीन औद्योगीकरण के साथ-साथ गैर वन पड़त भूमि के विकास के बहाने भी दी गई है। अद्योसंरचना विकास और औद्योगिकीकरण के नाम पर हुए इस जमीन आवंटन से सरकार के खजाने में चंद रुपयों से ज्यादा कुछ जमा नहीं हो पाया है। लंबी अवधि की लीज पर सिर्फ एक रुपए के न्यूनतम लीजरेंट पर जमीनों का आवंटन भी हुआ है। यह जमीनें पिछले सालों के दौरान बांटी गर्इं हैं। पिछले तीन चार सालों में सबसे ज्यादा जमीनें आवंटित हुई हैं।
प्रदेश में उद्योग लगाने के नाम पर बीते साल नवंबर तक देश भर के और कुछ विदेशों के 3096 निवेशकों ने सरकार के सामने जमीन आवंटित के आवेदन प्रस्तुत किए थे। इनमें निजी निवेश के लिए भूमि आवंटन के लिए 1594 आवेदन आए जिसमें से चुनिंदा 40 उद्योगतियों को 71 हजार 385.98 एकड़ (28889 हेक्टेयर) गैर वन पड़ भूमि आवंटित की है। दो हेक्टेयर की सीमा में कृषि परिवर्तनीय भूमि के आवंटन के लिए सरकार को 1502 आवेदन मिले, जिसमें से 22 आवंटितियों को 1667.95 एकड़ (675 हेक्टेयर) जमीन दी गई। प्रदेश में 4 लाख 74 हजार 78 हेक्टेयर गैर वन पड़त भूमि चिन्हित की गई है जिमसें से 92 हजार 465 भूमि परिवर्तनीय रूप में वर्गीकृत की गई है।
राजस्व विभाग के अनुसार मध्यप्रदेश को स्वर्णिम बनाने की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की परिकल्पना में औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए भूमि उपलब्ध कराना प्रमुख है। इस दृष्टि से विभाग ने प्रदेश में स्थापित होने वाले लगभग सभी वृहद, मध्यम एवं लघु उद्योगों को भूमि उपलब्ध कराई है। विभाग का कहना है कि इस काम को विभाग ने उच्च प्राथमिकता और विशेष तत्परता से किया है। अद्योसंरचना निर्माण में लोक प्रयोजन के लिए भूमि उपलब्ध कराना उसका लक्ष्य रहा है। भू-अर्जन समिति की बैठकों के माध्यम से विभाग द्वारा जमीन आवंटन करके औद्योगीकरण को गति प्रदान की गई है।जमीन बांटने के मामले में राज्य सरकार हिंडाल्को और रिलायंस समूह के अलावा जयप्रकाश एसोसिएट्स पर जमकर मेहरबान है। इन तीनों औद्योगिक समूहों को ही सरकार साढ़े तीन हजार एकड़ से ज्यादा जमीन बांट चुकी है।
राज्य सरकार ने हिंडाल्को कंपनी के विभिन्न प्रोजेक्ट के नाम पर कुल 1847.64 एकड़, रिलायंस इण्डस्ट्रीज को 1344.615 एकड़ और जयप्रकाश एसोसिएट्स को 333.34 एकड़ जमीन आवंटित कर चुकी है। हिंडाल्को ने प्रदेश में छह परियोजनाओं के नाम पर इतनी जमीन ली है तो रिलायंस इण्डस्ट्रीज के सासन पॉवर प्रोजेक्ट के लिए आठ बार अलग-अलग जमीन आवंटित की गई हैं। इसके अलावा रिलायंस कंपनी ने प्रदेश में अपना निजी हवाई अड्डा बनाने के लिए भी सरकार से जमीन ली है। जयप्रकाश एसोसिएट्स (जेपी ग्रुप) भी ने पॉवर, सीमेंट, मिनरल्स सहित अन्य आठ प्रोजेक्ट के नाम पर जमीन हथियाई है।
अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्री रहते ही प्रदेश कांग्रेस कार्यालय के लिए राजधानी में 1.18 एकड़ जमीन केवल एक रुपए के लीज रेंट पर दी गई थी। इसके बाद भाजपा ने अपने कार्यालय के लिए जमीन मांगी तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा के समय पार्टी से एक लाख रुपए जमा करने को कहा गया। वोरा के बाद सीएम बने अर्जुन ने यह कहते हुए भाजपा को भी एक रुपए किराए पर 1.50 एकड़ जमीन अलाट की कि कांग्रेस को मिल सकती है तो भाजपा को क्यों नहीं। उनके कहने पर भाजपा ने पचास साल के लिए एकमुश्त 50 रुपए किराया जमा कर जमीन हासिल की। बाद में पटवा ने भाजपा कार्यालय की भूमि का स्थान बदला।
किसे कितनी भूमि
अधोसंरचना निर्माण के लिए
कंपनी आवंटित भूमि (हेक्टेयर)
हिंडाल्को कंपनी 23.77
सासन पॉवर लिमिटेड 28.43
महेश्वर हाईड्रल पॉवर कार्पो. 0.462
न्यू जोन इंडिया लिमि. 476.788
एसजेके पॉवरजोन 30.960
सासन पॉवर लिमिटेड 44.48
मप्र पॉवर ट्रांसमिशन कंपनी 0.539
महेश्वर हायड्रल पॉवर कार्पो. 4.67
जय प्रकाश एसोसिएट्स 34.231
हिण्डाल्को कंपनी 25.96
ग्रासिम इंडस्ट्रीज लिमि. 7.681
पॉवर ग्रिड कार्पो. 25.50
आर्यन कोल एमपी लिमिटेड 12.800
महेश्वर हायड्रल पॉवर कार्पो. 136.954
औद्योगिकीकरण के लिए
सासन पॉवर लिमिटेड 128
हिंडाल्को 547
महेश्वर हाईड्रल पॉवर परि. 12.2
ईरा इन्फ्रा लिमिटेड उमरिया 126
सासन पॉवर सिंगरौली 198
झाबुआ पॉवर सिवनी 19.4
जेपी मिनरल्स, सिंगरौली 36.7
महान कोल 5.4
जेपी सीमेंट 1.96
मोजरबेयर अनूपपुर 70.2
झाबुआ पॉवर 69.2
सांघी इंडस्ट्रीज 230
एस्सार पॉवर 186
आर्यन कोल 10.92
महेश्वर हायड्रल पॉवर 12.204
जेपी पॉवर वेंचर्स 0.720
महान कोल लिमिटेड 2.68
सासन पॉवर लिमिटेड 9.749
हिंडाल्को कंपनी 74.96
छिंदवाड़ा प्लस 242.019
एसईसीएल 14.450
सांघी एनर्जी 133.981
आर्यन कोल लिमिटेड 45.13
न्यू जोन इंडिया लिमिटेड 39.776
जयप्रकाश पॉवर वेंचर्स 25.500
जयप्रकाश पॉवर वेंचर्स 28.303
रिलायंस हवाई अड्डा हेतु 63.951
हिंडाल्को कंपनी 62.86
सासन पॉवर लिमिटेड 3.65
मप्र सैनिक कोल माइंस लिमि. 31.48
सासन पॉवर लिमिटेड 11.290
जय प्रकाश पॉवर वेंचर्स 4.047
एस्सार पावर लिमिटेड 1.09
रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड 3.529
सासन पॉवर लिमिटेड 53.070
हिंडाल्को लिमिटेड 13.17
एसकेएम लिमिटेड 101.076
एक रुपए में बंटी करोड़ों की जमीनें
इन्हें मिला बंटरबांट का लाभ
मिशनरी आफ चेरिटी भिलाई, कांग्रेस कमेटी भोपाल, मिशनरी ऑफ चेरिटी रायपुर, जन विकास न्यास ग्वालियर, मिशनरी ऑफ चेरिटी इंदौर, ओम श्री श्री माता आनंदमयी आश्रम इंदौर, भृगु समाज भोपाल, महावीर चेरिटेबल मेडिकल एण्ड आर्गनाइजेशन दमोह, अंजुमन इस्लामिया मुस्लिम ट्रस्ट अंबिकापुर, झरनेश्वर महादेव मंदिर बाणगंगा भोपाल, अंध बालिका विद्यालय देवास, एसओएस चिल्ड्रन विलेज भोपाल, महावीर ट्रस्ट इंदौर, ताजुल मसाजिद भोपाल, श्री रामकृष्ण सदिच्छा भजन मंडल भोपाल, श्री रामकृष्ण आश्रम जबलपुर, आनंदमयी तपोभूमि आश्रम खंडवा, श्री रामकृष्ण आश्रम भोपाल, रामकृष्ण आश्रम ग्वालियर, भारतीय जनता पार्टी, बाल निकेतन संघ इंदौर, सत्यानंद योग आश्रम बैतूल, उज्जैन चेरिटेबल ट्रस्ट हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर, गहोई समाज भोपाल, मप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन भोपाल, परमानंद पब्लिक ट्रस्ट अंबिकापुर, वर्किंग वूमेन एसोसिएशन भोपाल, पीतांबरा पीठ दतिया, झरनेश्वर मंदिर बाणगंगा भोपाल,संत आशाराम आश्रम इंदौर, आचार्य श्री विद्यासागर गौ संवर्धन केंद्र सागर, क्षेत्रीय माली सैनी समाज भोपाल, नाना साहेब स्मृति धर्मार्थ चिकित्सालय रायपुर, मिशनरी ऑफ चेरिटी भोपाल, मिशनरी ऑफ चेरिटी रायपुर, राजपूत समाज ट्रस्ट इंदौर, दाताबंदी छोड़ गुरुद्वारा समिति ग्वालियर, श्री दिंगबर जैन पुष्पदंत श्रवण संस्कृति न्यास इंदौर, कबीर स्मारक लुनियाखेड़ा उज्जैन, रामकृष्ण आश्रम जशपुर, हबीब तनवीर नया थियेटर भोपाल, श्री दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र सोनागिरी दतिया, अध्यक्ष भोपाल किरार क्षत्रिय समाज, अध्यक्ष बघेलखण्ड समाज विकास समिति, पुरुषोत्तम सूरदास रामायणी मानस मंडल, मंदसौर इंस्टीट्यूट टेक्नॉलाजी मंदसौर,अखिल भारतीय पाल महासभा भोपाल, मीना समाज सेवा संगठन भोपाल।
5,000,000,000,000 की जमीन पर रसूखदारों का अवैध कब्जा
भोपाल। मध्य प्रदेश में रसूखदारों ने पचास खरब रुपए (5,000,000,000,000)की सरकारी जमीन पर अवैध रूप से हड़प ली है। कहीं-कही तो हजारों एकड़ जमीन एक ही व्यक्ति के कब्जे में है। इस बात का खुलासा सरकार की जांच में सामने आया है। सरकारी अधिकारियों की सांठ-गांठ से कबजाई गई इन जमीनों को रसूखदारों के कब्जे से निकालने के लिए सरकार हाथ-पांव तो मार रही है,लेकिन उसे सफलता मिलती नजर नहीं आ रही है।
उल्लेखनीय है कि जब सरकार को इन भूमि घोटालों की खबर लगी तो,मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 2009 में वरिष्ठ आइएएस अधिकारी मनोज श्रीवास्तव (वर्तमान में मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव)के नेतृत्व में समिति बनाकर प्रदेश में चल रहे भूमि घोटालों को उजागर करने का जिम्मा दिया था। समिति ने बड़े भूमि घोटालों की 14 रिपोर्टें राज्य सरकार को सौंपीं।
इन रिपोर्टों से खुलासा हुआ कि भोपाल, ग्वालियर, धार, होशंगाबाद, हरदा और अशोक नगर जिलों में खरबों रुपए की जमीन कानून को धता बनाकर निजी हाथों में सौंप दी गई।
नदी और कब्रिस्तान पर पूर्व विधायक के परिवार का कब्जा
प्रदेश के धार जिले के सरदारपुर कस्बे में मध्य प्रदेश के जमीन गोरखधंधे का सबसे दिलचस्प मामला सामने आया। मनोज श्रीवास्तव समिति की रिपोर्ट कहती है, यह अद्भुत प्रकरण है जिसमें एक नगर की लगभग संपूर्ण भूमि एक ही परिवार के हाथों आ गई। यह वह प्रकरण है जिसमें एक परिवार एक नदी (माही), कब्रिस्तान, श्मशान, डाक बंगला, जेलखाना, शासकीय कन्याशाला, विजय-स्तंभ, टीआइ बंगला, कलेक्टर कोठी सहित कई सार्वजनिक जमीन पर पुराने पट्टों के आधार पर हक जमाता है और कलेक्टर पट्टों की प्रामाणिकता पर संदेह करने की बजाए दावेदार को जमीन का अधित्यजन (दान) करने का मौका देता है और कुछ जगह अधित्यजन कराकर खुश होता है। असल में, 1995 में कलेक्टर के एक गलत आदेश के जरिए 1,471 बीघा जमीन नगरपालिका और प्रदेश शासन से लेकर निजी पक्षकार के हक में कर दी गई। बाद में एक दूसरे कलेक्टर ने यह आदेश गलत पाया और जमीन को सरकार के कब्जे में लाने के लिए राजस्व मंडल (रेवेन्यू बोर्ड) से मामले पर दोबारा गौर करने की इजाजत मांगी। मंडल ने जमीन को सरकार के कब्जे में लाने का आदेश खुद ही दे दिया, जो कि हाइकोर्ट से खारिज हो गया। कोर्ट ने छानबीन की इजाजत दी।
रिपोर्ट बताती है कि तमाम कानूनी प्रक्रिया के बाद 5 जून, 2007 को कलेक्टर के आदेश के जरिए कुछ जमीन लेकर बाकी निजी पक्षकार को दे दी गई। मजे की बात यह है कि नदी, पहाड़ और कब्रिस्तान जैसी जमीन छोडऩे के लिए भी कलेक्टर ने निजी पक्षकार को पुचकारा। रिपोर्ट में कलेक्टर के आदेश को गैरकानूनी बताया गया पर कार्रवाई की सिफारिश किसी के खिलाफ न हुई।
यह मामला सरदारपुर के प्रतिष्ठित शंकरलाल गर्ग परिवार से जुड़ा है। गर्ग 1952 में यहां के विधायक रहे। मामले की पैरवी कर रहे उनके पुत्र 78 वर्षीय लक्ष्मी नारायण कहते हैं, पालिका का दावा निराधार है। आजादी से पहले पालिका के दावे के खिलाफ ग्वालियर स्टेट कोर्ट में भी हम जीते थे।
दो गांवों की जमीन बेचकर गायब
भोपाल से सटे दो गांवों चांचेड़ और गनियारी में एस.के. भगत के नाम पर तहसीलदार ने करीब 450 एकड़ जमीन कर दी। यह भी न सोचा कि सीलिंग आदेश के बाद किसी के पास इतनी जमीन कैसे हो सकती है। मामला आजादी के बाद पाकिस्तान चले गए लोगों की भारत में जमीन से जुड़ा है। भगत नाम के व्यक्ति ने दोनों गांवों में 1962 और 1963 में यह जमीन दिए जाने का दावा किया है। पर समिति के मुताबिक, कब्जे के कागजात 1994 में तैयार किए गए और उन्हें 1962/1963 की तारीखों में दिखाया गया। रिपोर्ट में मजेदार टिप्पणी है, राजस्व आज्ञापत्र पर कुछ मार्किंग्स जिस तरह के पेन से हैं, वे 1963 में चलन में भी नहीं आए थे। पूरे मामले में गैरकानूनी, धोखाधड़ी और शरारतपूर्ण कार्रवाई को देखते हुए इसमें म.प्र. भू राजस्व संहिता की धारा 115 के तहत कार्रवाई की जाए। पर भगत परिवार तो तकरीबन सारी जमीन बेच एक दशक पहले ही यहां से जा चुका है। भगत के पुराने मकान में रह रहे फूल सिंह बताते हैं, वे तो 10-12 साल पहले ही जमीन बेचकर जा चुके हैं।
भेल की 200 एकड़ जमीन पर माफिया का कब्जा
मध्य प्रदेश सरकार ने 27 नवंबर, 1957 को भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लि. (बीएचईएल) को भोपाल 6,000 एकड़ से अधिक जमीन दी। इसमें से 200 एकड़ जमीन पर माफियाओं का कब्जा है। श्रीवास्तव समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, यह जमीन भेल को एक कंपनी के तौर पर दी गई। इसमें कोई औपचारिक ट्रांसफर डीड नहीं हुई। लिहाजा भेल प्रशासन या केंद्र सरकार को इस जमीन पर मालिकाना हक जताने का कोई अधिकार नहीं। अधिग्रहण के बाद से करीब 2,000 एकड़ जमीन भेल के पास फालतू पड़ी है। रिपोर्ट में 1998 के प्रदेश के राजस्व मंत्रालय के एक सर्कलर का हवाला दिया गया है। सर्कलर कहता है राज्य शासन ने फैसला किया है कि प्रदेश में लगे केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों को दी गई जमीन में से जो जमीन उनके तय मकसद के लिए काम में नहीं ली जा रही, उसे फौरन वापस लिया जाए। इसी आधार पर भेल की खाली पड़ी 2,000 एकड़ जमीन वापस लेने की सिफारिश की गई।
रिपोर्ट तो कहती है कि भेल अपनी ही जमीन की देखभाल नहीं कर पा रहा और अब तक 200 एकड़ जमीन पर भूमाफिया ने कब्जा जमा लिया है। इस 200 एकड़ का ज्यादातर हिस्सा अब रियल एस्टेट के लिहाज से खासा अहम हो गया है। भोपाल में बन रहे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सामने की भेल की जमीन पर भी अवैध कब्जा हो चुका है और वहां मकान बन रहे हैं। एम्स के यहां आने की वजह से जमीन की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं।
भेल के वरिष्ठ प्रबंधक (प्रचार और जनसंपर्क) विनोदानंद झा इस संस्था का पक्ष रखते हैं, भेल को जमीन दिए जाने के मामले में सारी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया है। हां, भेल की 150 एकड़ जमीन पर अवैध बस्तियां बनी हैं। इन्हें हटाने के लिए राज्य सरकार से लगातार चि_ी-पत्री हो रही है। एम्स के पास हो रहे नए अवैध निर्माण पर भेल प्रशासन नजर रखता है और इसे समय-समय पर तोड़ा जाता है।
ग्वालियर में 200 करोड़ की जमीन पर अवैध कब्जा
ग्वालियर शहर में पूर्व ग्वालियर राजघराने द्वारा स्थापित ग्वालियर डेयरी लिमिटेड को फायदा पहुंचाने के लिए 47 हेक्टेयर जमीन दे दी गई,जबकि कायदे से यह जमीन राज्य शासन के पास होनी चाहिए। इस मामले में निजी पक्षकार को 2008 में राजस्व मंडल के एक ऐसे आदेश के चलते जमीन हासिल हो गई, जिसमें 1991 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश तक की अनदेखी कर दी गई थी। मौजूदा बाजार भाव पर इस जमीन की कीमत करीब 200 करोड़ रु. है। इस बारे में कंपनी के मालिक के.सी. जैन कहते हैं कि ग्वालियर डेयरी लिमिटेड को शहरी क्षेत्र में 1516.96 एकड़ जमीन पूर्व ग्वालियर रियासत की ओर से 4 जून, 1942 को 25 साल के पट्टे पर दी गई थी। तत्कालीन महाराज जीवाजीराव सिंधिया ने इस कंपनी को बनाया और उसमें उनके सरदार माधवराव फालके और सरदार देवराज कृष्ण जाधव (डी.के. जाधव) के अलावा रियासत के प्रभावशाली लोग कंपनी में शेयर होल्डर थे। 25 साल के पट्टे की मियाद खत्म होने के बाद अप्रैल, 1979 में अपर जिलाध्यक्ष के आदेश के जरिए जमीन सरकार ने वापस ले ली। इसके बाद कंपनी की जमीन का बड़ा हिस्सा सरकारी विभागों ने कब्जे में ले लिया। 20 मार्च, 2008 को राजस्व बोर्ड ने चौंकाने वाला आदेश देते हुए जमीन पर कंपनी का अधिकार मान लिया।
बोर्ड के आदेश पर गंभीर सवाल उठाते हुए रिपोर्ट साफ कहती है, राजस्व बोर्ड ने 1981 के हाइकोर्ट के जिस आदेश को आधार बनाया है, उस आदेश को 1991 में ही सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका था। दूसरे, बोर्ड में सुनवाई के दौरान शासन के वकील खड़े होकर पूरी तरह शासन के खिलाफ और आवेदक के पक्ष में बोल रहे हैं। ग्वालियर डेयरी को फायदा पहुंचाने के लिए पूरा प्रशासनिक पक्ष लामबंद था। सरकार को जो जमीन मिली भी है, वह कुछ इस तरह जैसे कि कंपनी उसे दान में दे रही हो। हालांकि इसमें एक खतरा है। कंपनी कल को चुनौती दे सकती है कि जब सरकार इस जमीन को कंपनी की नहीं मानती तो दान किस आधार पर करा रही है।
जंगल की 7,987 एकड़ जमीन पर आश्रम
हरदा जिले के टिमरनी के पास जंगल की 7987.80 एकड़ जमीन राधास्वामी सत्संग सभा के पास है। यहां राजाबरारी एस्टेट की इस जमीन पर विवाद है, जो पूरी की पूरी संरक्षित वन क्षेत्र में आती है। इस मामले में राधास्वामी सत्संग सभा का दावा है कि मध्य प्रदेश भूराजस्व अधिनियम के तहत उसके पास लीज के सभी अधिकार और सुविधाएं हैं। सभा के मुताबिक सरकार के साथ उसका मूल करारनामा 1953 में और फिर 1956 में पूरक करारनामा हुआ। सभा यहां राधास्वामी ट्रेनिंग, एम्पलायमेंट और आदिवासी उत्थान संस्थान भी चलाती है। रिपोर्ट के मुताबिक,लीज का 1953 और 1956 में पंजीयन होना था। हुआ नहीं। लीज 1953 और 1956 में स्टांपित ही नहीं थी। सभा को जिस तरह की लीज मिली थी उसके तहत, जमीन के गैरवानिकी मकसद से प्रयोग की इजाजत नहीं थी। रिपोर्ट कहती है कि ऐसे में वन भूमि घोषित होने के बाद लीज मान्य नहीं होगी। लीज रद्द की जाए। लेकिन सभा के सचिव गुरमीत सिंह कहते हैं, सारे आरोप झूठे और बेबुनियाद हैं। सभा के काम की तारीफ उच्च अधिकारी और कैबिनेट स्तर के मंत्री तक कर चुके हैं। मामला राजस्व बोर्ड में विचाराधीन है। वैसे भी राज्य सरकार का अधिकारी सरकार के शीर्ष स्तर के फैसले को चुनौती नहीं दे सकता।
नजूल की जमीन की धड़ाधड़ रजिस्ट्रियां
होशंगाबाद जिले के इटारसी शहर में ऐसे 114 मामलों का खुलासा हुआ है जहां 1985 से अक्तूबर, 2010 के बीच नजूल की जमीन रजिस्ट्री कर बेची गई। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, इटारसी शहर में नजूल शीट नंबर 6 और 3 के प्लॉट नंबर 3/1 रकबा 1,41,935 वर्ग फुट जमीन एच.ए. राजा और ए.ए. सैफी के नाम दर्ज है। राजा की मौत वर्षों पहले हो चुकी है लेकिन नजूल रिकॉर्ड में उनके वारिसों के नाम दर्ज नहीं हैं। हातिम अली के बेटे जमीन पर नाम चढ़ाए बगैर फर्जी तरीके से जमीन की रजिस्ट्री कर शासन की कीमती जमीन बगैर हस्तांतरण के बेच रहे हैं, जबकि पट्टा निरस्त हो चुका है।
इटारसी में इस अवैध जमीन को खरीदने वालों में भोपाल के कुछ राजनीतिक परिवार शामिल हैं। नजूल प्रकरण पर वे कहते हैं, पूरे प्रदेश में नजूल की जमीन को अवैध तरीके से बेचने के मामले सामने आ रहे हैं। इसके लिए पूरे प्रदेश में व्यापक गाइडलाइन तैयार करनी होगी।
जालसाज और अफसरों पर कार्रवाई नहीं
प्रदेश में चल रहे जमीन के गोरखधंधे की परतें सामने आने के बाद भी सरकार दोषी अफसरों और जालसाजों पर कार्रवाई नहीं कर रही है। हालांकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रते हैं कि समिति की रिपोर्ट मिलने के बाद से 1,5000 एकड़ जमीन वापस ली जा चुकी है। सीहोर में हाल ही 5,000 एकड़ वापस ली। हालांकि प्रतिवादी अब कोर्ट में चला गया है। वह कहते हैं कि भेल की 2,000 एकड़ खाली पड़ी जमीन भी वापस करने की मांग मैंने खुद प्रधानमंत्री के सामने रखी है। फिर से केंद्र के सामने इसे उठाऊंगा।
5 करोड़ की जमीन के लिए चौधरी ने छोड़ी थी कांग्रेस
भोपाल। जब भिंड विधायक चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी ने 5 करोड़ की जमीन के लिए कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा था। इस बात का खुलासा इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा चौधरी को भूखंड आवंटन से हुआ है। जब चौधरी ने कांग्रेस के अविश्वास प्रस्ताव को भंड किया था तब ही कांग्रेसियों ने उन पर भाजपा के हाथों करोड़ों रुपए में बिक जाने के आरोप लगाए थे।
अब चौधरी की कांग्रेस से बगावत का राज खुल गया है। भाजपा शासन ने इंदौर विकास प्राधिकरण द्वारा एबी रोड पर आवंटित और पांच साल पहले निरस्त हुए चौधरी राकेश सिंह के भूखंड को दोबारा उनके नाम पर आवंटित कर दिया है। 14 लाख 88 हजार रु. के इस भूखंड की कीमत आज 5 करोड़ रु. से ज्यादा हो चुकी है।
दरअसल, सांसद-विधायकों को प्राधिकरण की योजनाओं में भूखंड आरक्षित कर आवंटित किए जाते हैं। लिहाजा प्राधिकरण की एबी रोड से लगी पटेल मोटर के पास की योजना 114 भाग (2) में भूखंड क्रमांक 90 विधायक कोटे से सितंबर 2003 में राकेश सिंह चौधरी को आवंटित किया गया था। 372 वर्ग मीटर यानी 4000 स्क्वेयर फीट के इस भूखंड की दर उस वक्त मात्र 4000 रु. प्रति वर्ग मीटर यानी 400 रु. स्क्वेयर फीट की थी, इस हिसाब से यह भूखंड मात्र 14 लाख 88 हजार में आवंटित किया गया। मगर भिंड के ही तत्कालीन विधायक रहे नरेंद्र सिंह कुशवाह ने प्राधिकरण में शिकायत की कि चौधरी राकेश सिंह ने गलत शपथ पत्र देकर प्राधिकरण से भूखंड आवंटित करवाया है, जबकि वे पूर्व से ही विधायक कोटे के अंतर्गत एमआरएस इनक्लेव ग्वालियर में एचआईजी भवन अगस्त 2003 में और भोपाल में रीवेरा टाउनशिप में डुप्लेक्स भवन क्रमांक 47 आवंटित करवा चुके हैं। यानी चौधरी राकेशसिंह के पास दो-दो भवन विधायक कोटे के अंतर्गत पूर्व से ही आवंटित हंै और उन्होंने इंदौर विकास प्राधिकरण से भूखंड असत्य शपथ पत्र देकर आवंटित करवा लिया। जबकि आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय की गाइड लाइन स्पष्ट है कि सांसद-विधायक या आरक्षण कोटे के भूखंडों को वे ही व्यक्ति ले सकते हैं, जिनके अपने या पत्नी, अव्यस्क संतान के नाम पर पूरे मध्यप्रदेश में कहीं पर भी कोई भूखंड अथवा भवन न हो। इस आशय का शपथ पत्र प्राधिकरण द्वारा भी निर्धारित प्रारूप में मांगा जाता है, लिहाजा इस शिकायत के बाद इंदौर विकास प्राधिकरण के बोर्ड ने संकल्प क्रमांक 348, दिनांक 29.09.2008 के जरिए भूखंड के आवंटन की प्रक्रिया को रोकते हुए राकेश सिंह को कारण बताओ सूचना पत्र जारी किया और उनसे जानकारी मांगी गई। मगर महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पांच साल पहले प्राधिकरण ने नोटिस दिया, जिसका कोई जवाब चौधरी राकेश सिंह ने नहीं दिया?
अलबत्ता, प्राधिकरण की ओर से इसके पश्चात 20 सितंबर 2008, 15 दिसंबर 2008, 24.12.2008, 9 जनवरी 2009, 23 जनवरी 2009 और 16 अगस्त 2010 को आधा दर्जन से अधिक कारण बताओ नोटिस भिजवाए जाते रहे। हालांकि, प्राधिकरण ने जो भूखंड चौधरी राकेश सिंह को आवंटित किया था, उसकी रजिस्ट्री उन्होंने 19 सितंबर 2006 को ही करवा ली थी, चूंकि शिकायत बाद में मिली, लिहाजा नोटिस देने और जवाब मांगने का सिलसिला चलता रहा। मगर पिछले दिनों चौधरी राकेश सिंह भाजपा में शामिल हो गए, लिहाजा उनसे संबंधित फाइल का मूवमेंट तेजी से भोपाल में भी शुरू हो गया। आवास एवं पर्यावरण मंत्रालय ने ताबड़तोड़ 22 जुलाई 2013 को इंदौर विकास प्राधिकरण के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को पत्र लिखा, जिसमें चौधरी राकेश सिंह के संबंध में की गई शिकायत और मार्गदर्शन का हवाला देते हुए विधि विभाग का अभिमत संलग्न किया गया। इतना ही नहीं चौधरी राकेश सिंह के लिए प्रमुख सचिव विधि द्वारा अनुमोदित अपर सचिव विधि राजीव आप्टे ने 4.7.2013 को अपनी राय दी और यह कहा कि चूंकि इंदौर विकास प्राधिकरण का भूखंड लेने व उसकी रजिस्ट्री करवाने तक चौधरी राकेशसिंह ने मध्यप्रदेश गृह निर्माण मंडल से भूखंड का आवंटन नहीं करवाया था, सिर्फ आरक्षण ही हुआ था, लिहाजा वे इंदौर विकास प्राधिकरण को दिए गए शपथ पत्र की अधिरोपित शर्त को आवंटन दिनांक को पूरा करते थे। यानी इसका मतलब यह हुआ कि प्राधिकरण अपना कारण बताओ नोटिस निरस्त कर दे। लिहाजा, आज होने वाली बोर्ड बैठक में शासन का पत्र और विधि विभाग की राय को रखा गया है, जिससे पांच साल पहले और बाद में प्राधिकरण द्वारा दिए गए आधा दर्जन से अधिक कारण बताओ नोटिसों को नस्तीबद्ध किया जा सके। इतना ही नहीं, चौधरी राकेश सिंह ने पांच साल तक तो प्राधिकरण के आधा दर्जन नोटिसों का कोई जवाब नहीं दिया और जब भोपाल से उनका प्रकरण क्लीयर होने आया, तब उन्होंने पिछली 12 जून 2013 को प्राधिकरण में अपना 4 पेज का जवाब भिजवाया। इसमें उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि ग्वालियर में सुपरडीलक्स एचआईजी आवास का पंजीयन उनके द्वारा करवाया गया, जो 17 नवंबर 2006 को निष्पादित हुआ। इसी तरह भोपाल के रिवेरा टाउनशिप में भवन का आधिपत्य उन्हें 17.10.2011 को मिला, जबकि इंदौर विकास प्राधिकरण का भूखंड वे 19 सितंबर 2006 को ही रजिस्ट्री के जरिए ले चुके थे। लिहाजा, उस दिनांक तक उनके पास मध्यप्रदेश की किसी भी नगर पालिक सीमा के अंतर्गत कोई आवासीय भूखंड या भवन नहीं था।
भोपाल-ग्वालियर में पहले से हैं संपत्तियां
चौधरी राकेश सिंह ने 12.6.2013 को इंदौर विकास प्राधिकरण को दिए गए नोटिसों के जवाब में स्वीकार किया है कि उनके पास दर्पण एनक्लेव, खातीपुर, ग्वालियर में एचआईजी सुपर डीलक्स आवास गृह हंै, जो उन्होंने स्ववित्त योजना के अंतर्गत विधायक अंश के आवेदन पर पंजीयन करवाया और हाउसिंग बोर्ड ने इसका पट्टा 17 नवंबर 2006 को निष्पादित किया। साथ ही भोपाल की रिवेरा टाउनशिप में भी सांसद और विधायकों को आवास देने की योजना के तहत उनके द्वारा आवंटन करवाया गया और 9.4.2007 को हाउसिंग बोर्ड ने उक्त आवासीय भूखंड की लीज डीड उनके पक्ष में निष्पादित की और भवन का आधिपत्य 15.10.2011 को सौंपा। चौधरी राकेश सिंह का तर्क यह है कि इंदौर विकास प्राधिकरण का भूखंड लेने और उसकी रजिस्ट्री करवाते वक्त उनके पास भोपाल-ग्वालियर के भूखंड या भवन नहीं थे, तब उन्होंने इनका सिर्फ आरक्षण करवाया था।
बाहरी ने कबाड़े इंदौर में भूखंड
प्रदेश में चूंकि सबसे महंगी जमीन इंदौर में ही है, लिहाजा प्रदेशभर के सांसद-विधायकों ने इंदौर विकास प्राधिकरण के करोड़ों-अरबों के 50 भूखंड आवंटित करवा लिए हैं। योजना 134, 140 और ,एबी रोड से लगी योजना 114 पार्ट (2) में बाहरी विधायकों, सांसदों ने बड़ी संख्या में भूखंड लिए हैं, जिनमें भीकनगांव, हाट पीपल्या, पेटलावद, सरदारपुर, अलीराजपुर, चाचौड़ा, खातेगांव, बैतूल, जोबट, शाहपुर, छिंदवाड़ा, उज्जैन, धार से लेकर तमाम गांवड़ों के जनप्रतिनिधि भी शामिल हैं, क्योंकि उन्हें वहां पर तो सस्ता भूखंड मिलता, लिहाजा उन्होंने इंदौर में करोड़ों रुपए के भूखंड हासिल कर लिए।
मात्र 20 रु. ज्यादा पर विधायक को भूखंड
अभी थोड़े दिन पहले ही सोनकच्छ के भाजपा विधायक राजेंद्र वर्मा ने भी प्राधिकरण की चर्चित और महंगी योजना 140 में भूखंड कबाड़ लिया। मजे की बात यह है कि प्राधिकरण ने जहां सामान्य वर्ग के 4000 रु. मूल्य से अधिक के टेंडरों को निरस्त कर दिया और अनुमान लगाया कि इससे अधिर दर मिलेंगी, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं टेंडरों के साथ आए सोनकच्छ विधायक राजेंद्र वर्मा के भूखंड को मात्र निर्धारित गाइड लाइन से 20 रु. अधिक के टेंडर पर मंजूर कर दिया। प्राधिकरण ने भूखंड क्रमांक 33 के लिए न्यूनतम दर 35251 रु. वर्गमीटर निर्धारित की थी और इससे 20 रु. ज्यादा 35271 स्क्वेयर फीट की दर वर्मा ने भरी, जिसे बोर्ड ने मंजूर भी कर भूखंड का आवंटन कर डाला।
दिग्विजय ने मांगे दस्तावेज
कांग्रेस से बगावत करने का इनाम प्राधिकरण के पांच करोड़ी भूखंड के रूप में मिलने के खुलासे पर कांग्रेस के महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने इस मामले के पूरे दस्तावेज मंगवाए हैं, ताकि कांग्रेस की ओर से हमला बोला जा सके।ं नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने भी चुटकी ली कि अब यह राज खुल रहा है कि चौधरी राकेश सिंह को भाजपा ने इस तरह खरीदा।
उम्र 65 पार, फिर भी कुर्सी से प्यार
भोपाल। भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, पर इसकी बागडोर विश्व के सबसे बुजुर्ग नेताओं के हाथों में है। यही नहीं, हमारी जनसंख्या की उम्र घटी है और हमारे नेताओं की उम्र बढ़ रही है। देश के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश में भी ऐसे बुजुर्ग नेताओं की कमी नहीं हैं जिनकी उम्र बढऩे के साथ इनकी राजनीतिक हसरतें भी बढ़ रही हैं। प्रदेश में मतदाताओं और नेताओं के बीच बढ़ते जनरेशन गैप, उसके अंजाम और सुधार के सुझावों पर प्रस्तुत है पाक्षिक मालव समाचार की रिपोर्ट।
मध्य प्रदेश में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में युवा मतदाताओं की अहम भूमिका रहने वाली है,क्योंकि कुल मतदाताओं में 35 फीसदी युवा हैं। लेकिन प्रदेश के चुनावी समर में बुजुर्ग नेता एक बार फिर युवाओं से विधानसभा टिकट पाने को कदमताल कर रहे हैं। न भाजपा के बुजुर्ग दावेदार पीछे हैं और न कांग्रेस के। युवाओं से आगे की पंक्ति में दोनों दलों के बुजुर्ग नेता हैं। इनमें से 5 दर्जन से ज्यादा वे नेता हैं जो वर्तमान में विधायक हैं और जिनकी उम्र 65 से 84 वर्ष के बीच है। यानी सरकार चाहे जिस पार्टी की बने, स्थितियां मौजूदा विधानसभा से अलग नहीं होंगी। क्योंकि दोनों ही दलों में दावेदारी करने वाले एक तिहाई कद्दावर बुजुर्ग नेता हैं, जिनके टिकट पार्टी चाहकर भी नहीं काट पाएगी।
मंत्रिमंडल की औसतन उम्र 60 वर्ष
मौजूदा शिवराज सिंह चौहान मंत्रिमंडल में 35 मंत्री शामिल हैं। मंत्रिमंडल में शामिल नेताओं की औसतन उम्र लगभग 60 वर्ष है। इनमें से 8 मंत्री ऐसे हैं जिनकी उम्र 65 के पार पहुंच गई है। युवा नेताओं में इसे लेकर रोष भी है। हालांकि दोनों पार्टियां गाहे-बगाहे कहती रही हैं कि चुनाव में 65 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति को टिकट नहीं दिया जाएगा। लेकिन हर बार युवाओं को दरकिनार कर दिया जाता है। इस बार भी उम्रदराज नेताओं की सक्रियता और राजनीतिक पकड़ के कारण युवाओं को टिकट मिलना मुश्किल लग रहा है।
नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के एक अध्ययन के मुताबिक साल 2020 में देश की औसत उम्र 29 साल होगी। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की आबादी में 65 साल से ज्यादा के सिर्फ 5.5 फीसदी लोग हैं। लेकिन आबादी के आंकड़ों से ठीक उलट, भारत के कैबिनेट मंत्रियों की औसत उम्र 65 साल, मुख्यमंत्रियों की 62 साल और अलग-अलग राज्यों में तैनात राज्यपालों की औसत उम्र 74 साल है।
साफ है, नौजवान देश की दिशा तय करने वाला नेतृत्व बूढ़ा होता जा रहा है। सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के प्रोफेसर आशीष नंदी का कहना है, 'सभी दलों के बुजुर्ग नेता, नए चेहरों को जगह देने के लिए तैयार नहीं हैं। नतीजतन, 70 पार के नेताओं का दबदबा कायम है। ऐसे हालात में युवाओं के उन सवालों को अहमियत नहीं मिल पाएगी, जो रोजगार, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े हैं।Ó प्रो. नंदी की बात से इत्तेफाक रखने वालों की कमी नहीं। चार्टर्ड एकाउंटेंट अर्पित जैन कहते हैं, 'अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के दूसरे देशों की तरह हमारे यहां भी यंग लीडर देश की कमान क्यों नहीं संभालते? मैं तो चाहता हूं कि देश में ऐसे युवा चेहरे नेतृत्व संभालें, जो यंगिस्तान से जुड़े मसलों को हल करने की पहल का माद्दा रखते हों।Ó
राजनीतिक दल मानने को तैयार नहीं
दरअसल, बहुमत की ताकत के बूते नेतृत्व कर रहे बुजुर्गवार नेता राजनीति की चौसर के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। राजनीतिक पटल पर इनके खिलाफ कोई कुछ नहीं बोल पाता, जो स्वाभाविक भी है। मध्य प्रदेश की मंदसौर लोकसभा सीट से कांग्रेस की 40 वर्षीय युवा सांसद मीनाक्षी नटराजन कहती हैं, 'देश के नौजवानों के सपने सिर्फ युवा नेतृत्व से ही पूरे नहीं हो सकते। अनुभव की अनदेखी नहीं की जा सकती।Ó कुछ इसी तरह की बात भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष अमरदीप मौर्य भी कहते हैं। उनके मुताबिक, 'जो लोग समाजसेवा के जरिए राजनीति में आते हैं, जमीनी स्तर पर काम करते हैं, संघर्ष करके आते हैं, उनकी उम्र हो जाती है।Ó यवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कुणाल चौधरी भी नटराजन और मौर्य से अलग नहीं है। चौधरी कहते हैं, 'यह जरूरी तो नहीं है कि सिर्फ युवा ही देश हित के बारे में बेहतर तरीके से सोच सकते हैं। हम अपने बुजुर्ग और अनुभवी नेताओं का लाभ लेते रहेंगे। हमारी पार्टी में युवाओं को भी सरकार और संगठन में पर्याप्त अवसर मिलते हैं।Ó जाहिर है, उम्रदराज नेताओं के अनुयायी या पार्टी के जूनियर उनकी प्रासंगिकता के मुद्दे पर अपने हाथ नहीं जलाना चाहते।
तमाम राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सभी पार्टियां अपने बुजुर्ग नेताओं के स्थान पर नए और ज्यादा ऊर्जावान नेताओं को अहमियत नहीं दे पातीं। पूर्व मुख्यमंत्री और गोविंदपुरा विधानसभा क्षेत्र से रिकार्ड 9 बार जीत दर्ज करने वाले बाबूलाल गौर करीब 84 बरस के होने के बावजूद सियासत का मैदान छोडऩे के लिए तैयार नहीं हैं। ऐसे ही पूर्व विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी किसी समारोह में जाकर ऊंघने लगते हैं, पर रिटायर नहीं होना चाहते।
सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च के प्रेसिडेंट प्रताप भानू मेहता कहते हैं, 'इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता कि हमारे यहां तेजतर्रार नेताओं को पार्टी संगठन और सरकार में अहम पद मिलें। लेकिन, मैं अपने मौजूदा युवा नेताओं के प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं हूं। उनके पास देश के विभिन्न मसलों को लेकर विजन का अभाव ही दिखता है।Ó समाजशास्त्री और काउंसिल फॉर सोशल स्टडीज के फेलो मनोरंजन मोहंती कहते हैं, 'हमारे सियासी दलों के खाने के और दिखाने के दांत अलग होते हैं। ये सभी नौजवानों को आगे लाने का वादा तो करते हैं, पर अपने बेटे, बेटी, बहू वगैरह को ही युवा मानते हैं।Ó
वयोवृद्ध होना कुशल नेतृत्व की शर्त नहीं है। फिर भी युवा नेतृत्व की एकतरफा वकालत बेमानी है। भारतीय राजनीति में तन से बुजुर्ग, लेकिन मन से जवान कई मिल जाएंगे, जिनके काम में उम्र कभी आड़े नहीं आई।
भाजपा के उम्रदराज विधायक
नाम विधानसभा सीट
माखनलाल राठौर - शिवपुरी
रामकृष्ण कुसमारिया- पथरिया
जयंत मलैया-दमोह
नागेन्द्र सिंह-गुढ़
सुंदर सिंह- जयसिंह नगर
मोती कश्यप-बड़वारा
भैयाराम पटेल-तेंदूखेड़ा
राघवजी भाई-विदिशा
कन्हैयालाल अग्रवाल-बामोरी
ईश्वरदास रोहाणी-जबलपुर केंट
गिरिजाशंकर शर्मा-होशंगाबाद
सरताज सिंह-सिवनी मालवा
बाबूलाल गौर-गोविंदपुरा
रामदयाल अहिरवार-चंदला
मानवेंद्र सिंह-महाराजपुर
शांतिलाल धबाई-बडऩगर
शिवनारायण जागीरदार-उज्जैन दक्षिण
बृजमोहन धूत-खातेगांव
रंजीत सिंह गुणवान-आष्टा
चेतराम मानेकर-अमला
जगन्नाथ सिंह-चितरंगी
श्री रामचरित-देवसर
नागेन्द्र सिंह-नागौद
जुगुल किशोर बागरी-रैगांव
कांग्रेस के उम्रदराज विधायक
नाम विधानसभा सीट
प्रभुदयाल गेहलोत-सैलाना
महेन्द्रसिंह कालूखेड़ा-जावरा
मूल सिंह-राघोगढ़
मेर सिंह चौधरी-चौरई
गंगाबाई उरैती-शहपुरा
मध्य प्रदेश में 35 फीसदी मतदाता युवा
मध्य प्रदेश में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में युवा मतदाताओं की अहम भूमिका रहने वाली है, चूंकि कुल मतदाताओं में 35 फीसदी युवा हैं। आधिकारिक तौर पर मिली जानकारी के अनुसार, प्रदेश में युवा मतदाताओं की संख्या में तेजी से बढ़ी है। प्रदेश के कुल चार करोड़ 64 लाख 42 हजार 852 मतदाताओं में लगभग 35.06 प्रतिशत संख्या 18 से 29 साल के युवाओं की है। इनकी संख्या एक करोड़ 62 लाख से अधिक है। राज्य के मतदाताओं में 20 से 29 साल के बीच मतदाताओं की संख्या एक करोड़ 40 लाख 25 हजार 514 है। इनका प्रतिशत 30.20 है। वहीं 18-19 वर्ष के 22 लाख 59 हजार 243 मतदाता हैं। आयु के हिसाब से युवा मतदाताओं को देखें तो 18-19 वर्ष के मतदाताओं की सर्वाधिक संख्या एक लाख 10 हजार 707 धार जिले में है। इसी तरह शिवपुरी जिले में 87 हजार, बड़वानी जिले में 77 हजार, सागर जिले में 76 हजार, खरगौन जिले में 72 हजार , रीवा जिले में 63 हजार और छिन्दवाड़ा जिले में 63 हजार से अधिक मतदाता हैं। इसी तरह 20 से 29 आयु वर्ग के सबसे अधिक मतदाता इंदौर जिले में हैं। यहां इनकी संख्या 6 लाख 43 हजार है। इसी तरह जबलपुर में पांच लाख 24 हजार, भोपाल में पांच लाख 18 हजार, धार में पांच लाख 2 हजार, सागर में चार लाख 72 हजार, सतना में चार लाख 41 हजार, रीवा में चार लाख 27 हजार, छिन्दवाड़ा में चार लाख 25 हजार और मुरैना में चार लाख 21 हजार से अधिक मतदाता 20 से 29 वर्ष की आयु के हैं।
भाजपा के लिए मुसीबत बनते रहे हैं उम्रदराज नेता
संघ की पाठशाला में उम्र भर त्याग, तपस्या, बलिदान, समर्पण और राष्ट्रवाद के पाठ पढऩे वाले भाजपा के नेता आखिरकार उम्र के एक खास मुकाम पर पहुंचते ही इनसे ठीक उलटी मिसाल क्यों पेश करने लगते हैं? खुद को व्यक्ति पूजा से दूर, सिद्धांत आधारित संगठन बताने वाली इस पार्टी के अंदर कोई भी सत्ता परिवर्तन इसके नेता क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाते? लालकृष्ण आडवाणी के ताजा कदम के बाद अब तो यह सवाल भी उठने लगा है कि कहीं पार्टी संगठन के डीएनए में ही तो कोई गड़बड़ी नहीं।
भाजपा में मदन लाल खुराना से लेकर सुंदर सिंह भंडारी, किशन लाल शर्मा, कल्याण सिंह, केशुभाई पटेल और येदियुरप्पा जैसे तमाम ऐसे उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने-अपने स्तर पर पार्टी को खास ऊंचाई दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन, एक उम्र पर पहुंचने और सत्ता का स्वाद चखने के बाद इनको बदलते भी देर नहीं लगी और ये नेता खुद ही पार्टी के लिए बड़ी मुश्किल बने। इसी तरह राज्यों में हर सत्ता परिवर्तन भाजपा के लिए बेहद कष्टप्रद साबित हुए हैं। कर्नाटक में पांच साल के कार्यकाल में भाजपा ने तीन मुख्यमंत्री बदले। मध्य प्रदेश में उमा भारती हों, उत्तराखंड में बीसी खंडूड़ी या रमेश पोखरियाल निशंक और उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह व रामप्रकाश गुप्त, हर बार नेतृत्व परिवर्तन ने भाजपा को चोट पहुंचाई है।
230 में से 45 विधायक निकले काम के
विधानसभा सत्र के दौरान विधायको की परफार्मेंस रिपोर्ट में हुआ खुलासा
महिला नेत्रियों का रिपोर्ट कार्ड सबसे पुअर
भोपाल। मध्यप्रदेश में अघोषित तौर पर चुनावी बिगुल बज गया है। सभी पार्टियां चुनावी जीत की रणनीति बनाने में जुटी हुई हैं। उधर वर्तमान विधायक फिर से चुनाव लडऩे के लिए दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में पाक्षिक मालव समाचार ने एक रिपोर्ट तैयार कर इस बात की पड़ताल की है कि अब तक के करीब पांच वर्ष में हमारे मंत्री, विधायक जनता की उम्मीदों पर कितने खरे उतर पाए हैं? इस सर्वे रिपोर्ट में यह बात सामने आई की 230 विधायकों में से मात्र 45 विधायक ही ऐसे रहे जिन्होंने विधानसभा की कार्रवाही में अच्छा परफार्मेंस किया। सदन की पूरी कार्यवाही इन्हीं के इर्दगिर्द घुमती रही। सबसे हैरानी की बात यह रही की इस दौरान महिला विधायकों की रिपोर्ट सबसे खराब रही।
रिपोर्ट में विभिन्न सत्रों के दौरान विधायकों के विधायी कामकाज का आकलन कर उन्हें तय सूचकांक के आधार पर अंक दिए गए।
यहां हम सामान्य, 60 से 79 एवं 80 से अधिक नम्बर लाने वाले विधायकों का रिपोर्ट कार्ड बता रहे हैं, देखिए आपके विधायक इस श्रेणी में कहां खड़े हैं। इसके अलावा शेष विधायकों का परफार्मेंस कैसा रहा यह भी जान सकेंगे। सबसे पहले बात करते हैं विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी की। इन्होंने ने सभी के साथ समन्वय बनाकर सदन को सुचारू ढंग से चलाया। हालांकि कई बार इनपर भाजपा का पक्ष लेने का आरोप लगा,लेकिन इसे महत्व नहीं दिया गया।
विधायक जिनकों मिले 80 से अधिक नम्बर
सत्ता पक्ष- शिवराज सिंह चौहान, बाबूलाल गौर, शिवराज सिंह चौहान, नरोत्तम मिश्रा,कैलाश विजयवर्गीय, गोपाल भार्गव,राजेन्द्र शुक्ला,महेन्द्र हार्डिया,लक्ष्मीकांत शर्मा,उमाशंकर गुप्ता,अरविंद भदौरिया ,शंकरलाल तिवारी, विश्वास सारंग,ध्रुवनारायण सिंह।
विपक्ष- अजय सिंह,आरिफ अकील,महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा, रामनिवास रावत,चौधरी राकेश सिंह (अब भाजपा), लहार गोविंद सिंह, संजय पाठक,
स्व.हरिवंश सिंह कांग्रेस,पुरुषोतम दांगी कांग्रेस,हेमराज कल्पानी कांग्रेस,पारस सखलेचा निर्दलीय,
विधायक जिनको मिले 60-79 नम्बर
प्रद्युमन सिंह तोमर कांग्रेस,केपी सिंह कांग्रेस, देशराज सिंह भाजपा,गोविंद सिंह राजपूत कांग्रेस,प्रदीप लारिया भाजपा,नारायण प्रजापती कांग्रेस,सुरेन्द्र गहरवार भाजपा,रामलखन पटेल बसपा, गिरीश गौतम भाजपा,बिसाहू लाल सिंह कांग्रेस,निशीत पटेल कांग्रेस,प्रताप ग्रेवाल कांग्रेस,प्राचीलाल मेड़ा कांग्रेस, लखन घंघोरिया कांग्रेस,प्रदीप जायसवाल कांग्रेस,एनपी प्रजापति कांग्रेस,दीपक सक्सेना कांग्रेस,कल्पना परूलेकर।
सामान्य प्रदर्शन
बृजराज सिंह चौहान कांग्रेस,सुरेश चौधरी कांग्रेस, मणिराम धाकड़ बसपा, ऐदल सिंह कंसाना कांग्रेस, मुरैना परसुराम मुदगल (अब भाजपा),शिवमंगल सिंह भाजपा,कमलेश सुमन भाजपा, राकेश शुक्ला भाजपा, माखनलाल जाटव कांग्रेस, मदन कुशवाह बसपा,नारायण सिंह कुशवाह भाजपा,लाखन सिंह यादव कांग्रेस,इमरतीदेवी सुमन कांग्रेस, राधेश्याम बघेल बसपा,आशाराम जाटव भाजपा,रमेश खटीक भाजपा,प्रहलाद भारती भाजपा, माखनलाल राठौर भाजपा,
देवेन्द्र जैन भाजपा, राजेंद्र सलूजा भाजपा, शिव नारायण मीणा कांग्रेस ,मूल सिंह कांग्रेस,लट्टूलाल कोरी भाजपा, राव राजकुमार सिंह भाजपा,श्रीमती विनोद पंथी भाजपा,अरुणोदय चौबे कांग्रेस, भानू राणा भाजपा, शैलेंद्र जैन भाजपा, यादवेन्द्र सिंह कांग्रेस, बृजेन्द्र सिंह राठौर कांग्रेस,मीरा यादव सपा,अजय यादव भाजपा,भँवर राज मानवेंद्र सिंह निर्दलीय,रामदयाल अहिरवार भाजपा,विक्रम सिंह नातीराजा कांग्रेस,ललिता यादव भाजपा,आशारानी सिंह भाजपा,रेखा यादव भाजपा, दशरथ सिंह लोधी भाजपा,उमा देवी खटीक भाजपा,राजेश वर्मा भाजपा, जुगल किशोर बागरी भाजपा, मोतीलाल तिवारी भाजपा,रामखिलावन पटेल भाजपा, राजकुमार उरमलिया बसपा, अभय मिश्रा भाजपा,रामगरीब कौल बसपा, लक्ष्मण तिवारी भाजपा,पन्नाबाई प्रजापति भाजपा,नगेन्द्र सिंह भाजपा,केदारनाथ शुक्ला भाजपा,विश्वामित्र पाठक भाजपा, रामलल्लू वैश्य भाजपा,देवी सिंह भाजपा, बाला बच्चन कांग्रेस,प्रेम सिंह भाजपा,नागरसिंह चौहान भाजपा,सुलोचना रावत, जेवियर मेड़ा कांग्रेस,वीर सिह भूरिया कांग्रेस,निर्मला भूरिया कांग्रेस ,उमंग सिंघार,नीना वर्मा भाजपा,राजवर्धन दत्तीगांव कांग्रेस,सत्यनारायण पटेल कांग्रेस,कांग्रेस,सुदर्शन गुप्ता भाजपा ,रमेश मेंदोला भाजपा, अश्विन जोशी कांग्रेस,मालिनी गौड़ भाजपा,जीतू जिराती भाजपा,रामचरित्र भाजपा, कुँवर सिंह भाजपा,बलिसिंह मरावी भाजपा,सुंदर सिंह परस्ते भाजपा ,जयराम मरावी भाजपा,दिलीप जायसवाल भाजपा, सुदामा सिंह भाजपा,ज्ञान सिंह भाजपा,मीना सिंह भाजपा, मोतीलाल कश्यप भाजपा,गिरीराज किशोर भाजपा, प्रतिभा सिंह भाजपा, शरद जैन भाजपा भाजपा, हरजिन्दर सिंह बब्बू भाजपा,नरेन्द्र त्रिपाठी भाजपा,नन्दिनी मरावी भाजपा,गंगाबाई उरेती कांग्रेस,ओमकार सिंह मरकाम ,नारायण पट्टा कांग्रेस,रामप्यारे कुलस्ते,भाजपा, भगत सिंह नेताम भाजपा,रमेश भटेरे भाजपा,रामकिशोर काँवरे भाजपा,विश्वेश्वर भगत कांग्रेस,कमल मस्कुले भाजपा,नीता पटेरिया भाजपा, शशि ठाकुर भाजपा,सुनील जायसवाल कांग्रेस,उदयप्रताप सिंह कांग्रेस ,साधना स्थापक कांग्रेस, तेजीलाल सरेयाम कांग्रेस,प्रेम नारायण ठाकुर भाजपा ,मेहर सिंह चौधरी कांग्रेस,ताराचंद बावरिया भाजपा,रामराव कवरेती भाजपा,चन्द्रशेखर देखमुख कांग्रेस,)चेतराम मानेकर भाजपा,अल्केश आर्य भाजपा, गीता रामजीलाल उइके भाजपा,धरमू सिंह, संजय शाह निर्दलीय,कमल पटेल भाजपा, गिरजा शंकर शर्मा भाजपा, विजय पाल सिंह भाजपा,ठाकुरदास नागवंशी भाजपा, भगवान सिंह राजपूत कांग्रेस,सुरेन्द्र पटवा भाजपा,प्रभुराम चौधरी कांग्रेस,देवेंद्र पटेल भाजपा, राघवजी भाई भाजपा, हरी सिंह रघुवंशी भाजपा,हरी सप्रे भाजपा,सूरज प्रकाश मीणा,ब्रह्मानंद रत्नाकर भाजपा,जितेन्द्र डागा भाजपा,रणजीत सिंह गुणवान भाजपा,करण सिंह वर्मा भाजपा,रमेश सक्सेना भाजपा,मोहन शर्मा भाजपा, प्रियव्रत सिंह कांग्रेस,गौतम टेटवाल भाजपा,संतोष जोशी भाजपा,लालजी राम भाजपा, हुकुम सिंह कराड़ा,जसवंत सिंह हाड़ा भाजपा, बाबूलाल वर्मा भाजपा,दीपक जोशी भाजपा,बृजमोहन धूत भाजपा,चम्पालाल देवड़ा भाजपा,लोकेन्द्र सिंह तोमर भाजपा, देवेन्द्र वर्मा,अनारसिंह बास्कले,राजेन्द्र दादू भाजपा, भाजपा,धूल सिंह भाजपा, हितेन्द्र सोलंकी ,राजकुमार मेव भाजपा,आत्माराम पटेल भाजपा,बालकृष्ण पाटीदार भाजपा,जमुना सिंह सोलंकी भाजपा, तुलसी सिलावट कांग्रेस,दिलीप गुर्जर कांग्रेस,रोड़मल राठौर भाजपा,रामलाल मालवीय कांग्रेस,शिवनारायण जागीरदार भाजपा,शांतिलाल घवई भाजपा,लक्ष्मीदेवी खराड़ी कांग्रेस,प्रभुदयाल गहलोत कांग्रेस,यशपाल सिसोदिया भाजपा, ,राधेश्याम पाटीदार भाजपा,सुभाष सोजतिया कांग्रेस,विजेन्द्र सिंह मालाखेड़ा कांग्रेस, खुमान सिंह शिवाजी भाजपा,ओमप्रकाश सखलेचा भाजपा।
कौन मंत्री रहे सक्रिय, निष्क्रिय
विधायकों के साथ ही अलग से राज्य सरकार के मंत्रियों का भी आकलन किया गया। कुछ मंत्रियों को छोड़कर अधिकतर मंत्री विशेष छाप नहीं छोड़ पाए। मंत्रियों को प्रश्नकाल में सबसे ज्यादा तैयारी कर के आने की जरूरत होती है लेकिन तीन-चार वरिष्ठ मंत्रियों को छोड़ दें तो अधिकतर मंत्री सवाल पूछने वालों को संतुष्ट ही नहीं कर पाए।
सक्रिय-शिवराज सिंह चौहान, बाबूलाल गौर,नरोत्तम मिश्रा,कैलाश विजयवर्गीय, गोपाल भार्गव,लक्ष्मीकांत शर्मा,उमाशंकर गुप्ता,अजय विश्नोई,राजेन्द्र शुक्ला,महेन्द्र हार्डिया।
निष्क्रिय- अनूप मिश्रा,जयंत मलैया,केएल अग्रवाल,हरिशंकर खटीक,रामकृष्ण कुसमारिया,बृजेन्द्र प्रताप सिंह,नागेंद्र सिंह,जगन्नाथ सिंह,गौरीशंकर बिसेन,सरताज सिंह,जगदीश देवड़ा,रंजना बघेल, करण सिंह वर्मा,तुकोजीराव पवार,विजय शाह,पारस जैन,अर्चना चिटनीस,नारायण सिंह कुशवाह,मनोहर उटवाल,देवीसिंह सैयाम,जयसिंह मरावी,नानभाऊ मोहोड़,अंतरसिंह आर्य,
रामदयाल अहिरवार,दशरथ लोधी।
रेटिंग का तरीका
संसदीय विषयों से संबंधित शोध और विभिन्न विश्लेषणों के आधार पर विधायिका और विधायकों के परफॉर्मेन्स रेटिंग के सूचकांकों की फेहरिस्त तैयार की गई। इसके बाद अनुभवी राजनेताओं, विशेषज्ञों, कार्यपालिका के अधिकारियों और सदन की नियमित कवरेज से जुड़े पत्रकारों से व्यापक चर्चा के बाद 10 सूचकांक निश्चित किए गए। प्रत्येक सूचकांक के लिए दस अंक तय किए।
इन सूचकांक के आधार पर सदन की हर बैठक के बाद विधायकों का आकलन कर सदन के सितारे तय किए गए। हर सत्र के बाद सदन में उपस्थित रहने वाले वरिष्ठ पत्रकारों ने विधायकों को सत्र के दौरान प्रदर्शन के लिए निर्घारित सूचकांक के आधार पर अंक दिए। पिछले साढ़े चार वर्षो तक विधानसभा के हर सत्र के दौरान यह प्रक्रिया अपनाई गई। इस तरह से सुव्यवस्थित प्रणाली से विधायकों की परफॉर्मेस पर नजर रखी गई। साढ़े चार वर्ष के इन्हीं आंकड़ों के आधार पर विधायकों का यह रिपोर्ट कार्ड तैयार किया गया है।
सूचकांक
सदन में अनुशासन का आकलन। भाषा, धैर्य, संयम और शालीनता का स्तर।
सकारात्मक सोच एवं रचनात्मक योगदान से शिष्टता व व्यवहार।
सदन के नियम, कार्यप्रणाली की जानकारी का स्तर एवं उनका प्रभावी उपयोग।
विधायी कार्यों में भूमिका, विधायी विषयों की तैयारी एवं सदन में प्रस्तुतिकरण।
बहस और सवाल-जवाब एवं शून्यकाल में सदस्य की भूमिका का स्तर।
राज्य एवं विधानसभा क्षेत्र सम्बन्धी जनहित के मुद्दों पर प्रश्न, ध्यानाकर्षण, स्थगन द्वारा दखल।
राज्य के लिए महत्वपूर्ण और राष्ट्रीय मुद्दों की पकड़ एवं समझ का स्तर।
विषय विशेष की अच्छी पकड़ एवं समझ और सदन में उसका प्रस्तुतिकरण।
अन्य प्रतिनिधियों से शिष्टता व अन्य व्यवहार का स्तर।
सदन में शैली, मुद्दों पर बहस तथा ठोस तर्को एवं आंकड़ों के आधार पर बात रखने की क्षमता।
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दिग्गजों की सीटों पर पानी की तरह बहेगा पैसा
चुनाव आयोग ने निगरानी के लिए 60 सीटों को किया चिहिंत
भोपाल। आगामी विधानसभा चुनाव में दिग्गज नेताओं की कब्जे वाली वर्तमान सीटों को जीतने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जाएगा। चुनाव आयोग ने ऐसी 60 सीटें छांटी हैं, जो चुनावी खर्च को लेकर संवेदनशील हैं। अंदेशा है कि इन क्षेत्रों में चुनावी व्यय की सीमा से ज्यादा खर्च हो सकता है। इन सीटों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बुधनी सहित मंत्रिपरिषद के 25 सदस्यों की सीटें शामिल हैं। इनके अलावा विधानसभा अध्यक्ष ईश्वरदास रोहाणी की सीट जबलपुर केन्ट, नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की चुरहट सहित कांग्रेस के कब्जे वाली 11 सीटें भी रखी गई हैं।
जानकारी के मुताबिक चुनाव आयोग के निर्देश पर कलेक्टरों ने इस सूची को तैयार किया है। इसमें क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति के कद और उद्योग सहित रकम के आने के जरिए को आधार बनाया गया है। चुनावी खर्च के मद्देनजर संवेदनशील की श्रेणी में रखी 60 सीटों में से 47 भाजपा (मुख्यमंत्री सहित मंत्रिमंडल के 25 सदस्य और 22 भाजपा विधायक) के प्रतिनिधित्व वाली हैं। दुराचरण के मामले में भाजपा से बाहर हुए राघवजी की सीट विदिशा को भी चुनावी व्यय के मद्देजनर फोकस पर रखा गया है। इसी श्रेणी में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह की चुरहट सहित 11 सीटें रखी गई हैं। इनमें भिण्ड से कांग्रेस विधायक चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी की सीट भी शामिल हैं। चौधरी इस वक्त भाजपा में हैं। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय के अधिकारियों का कहना हैं कि इन क्षेत्रों में चुनाव के दौरान विशेष नजर रखी जाएगी। इसके लिए आयोग जो केन्द्रीय व्यय पर्यवेक्षक भेजेगा उसके अलावा निगरानी के इंतजाम किए जाएंगे। इसमें तीन-तीन फ्लाइंग स्क्वॉड के साथ हर छोटे-बड़े आयोजन की वीडियोग्राफी कराई जाएगी।
संवेदनशील सीट विधायक
भोपाल उत्तर आरिफ अकील
नरेला विश्वास सारंग
भोपाल दक्षिण-पश्चिम उमाशंकर गुप्ता
भोपाल मध्य ध्रुवनारायण सिंह
गोविंदपुरा बाबूलाल गौर
हुजूर जितेन्द्र डागा
बुधनी शिवराज सिंह चौहान
सीहोर रमेश सक्सेना
देवास तुकोजीराव पवार
हाटपिपल्या दीपक जोशी
हरसूद विजय शाह
बुरहानपुर अर्चना चिटनिस
महेश्वर राजकुमार मेव
पानसेमल बाला बच्चन
मनावर रंजना बघेल
धार नीना वर्मा
इंदौर 2 रमेश मेंदोला
इंदौर 3 अश्विन जोशी
इंदौर 4 मालिनी गौड़
इंदौर 5 महेन्द्र हार्डिया
महू कैलाश विजयवर्गीय
महिदपुर डॉ.कल्पना परूलेकर
उज्जैन उत्तर पारस जैन
जावरा महेन्द्रसिंह कालूखेड़ा
मंदसौर यशपाल सिसोदिया
मल्हारगढ़ जगदीश देवड़ा
जावद ओमप्रकाश सखलेचा
भिंड चौधरी राकेश चतुर्वेदी
लहार डॉ.गोविंद सिंह
ग्वालियर पूर्व अनूप मिश्रा
दतिया डॉ.नरोत्तम मिश्रा
पिछोर केपी सिंह
बीना डॉ.विनोद पंथी
रेहली गोपाल भार्गव
जतारा हरिशंकर खटीक
बिजावर आशा रानी
पथरिया डॉ.रामकृष्ण कुसमरिया
दमोह जयंत मलैया
पवई बृजेन्द्र प्रताप सिंह
सतना शंकरलाल तिवारी
नागौद नागेन्द्र सिंह
मनगवां पन्नाबाई प्रजापति
रीवा राजेन्द्र शुक्ल
चुरहट अजय सिंह
चितरंगी जगन्नाथ सिंह
सिंगरौली रामलल्लू वैश्य
बड़वारा मोतीलाल कश्यप
संवेदनशील सीट विधायक
मुड़वारा गिरिराज किशोर
पाटन अजय विश्नोई
जबलपुर केन्ट ईश्वरदास रोहाणी
बालाघाट गौरीशंकर बिसेन
गोटेगांव नर्मदा प्रसाद प्रजापति
छिंदवाड़ा दीपक सक्सेना
हरदा कमल पटेल
सिवनी मालवा सरताज सिंह
सोहागपुर विजयपाल सिंह
भोजपुर सुरेन्द्र पटवा
सिलवानी देवेन्द्र पटेल
विदिशा राघवजी
सिरोंज लक्ष्मीकांत शर्मा
मप्र के जलसंसाधन विभाग में 5000 करोड़ रुपये का घोटाला
भोपाल। प्रदेश में भ्रष्टाचार और घोटालों से घिरी के भाजपा सरकार की किरकिरी बने भाजपा नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा पर सीबीआई का फंदा कसता जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में जलसंसाधन विभाग में 5000 करोड़ रुपये का घोटाला सामने आया है। ऐन चुनावी वक्त पर भाजपा सरकार को ये मामले परेशानी में डाल सकते है। कांग्रेस भाजपा को घेरने के लिए पूरी तरह कमर कस चुकी है।
नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने शिवराज सरकार पर जल संसाधन विभाग में पांच हजार करोड़ रूपये के घोटाले का आरोप लगाया है। श्री सिंह ने कहा कि चुनाव के लिए पैसा एकत्रित कर मतदाता प्रभावित करने के लिए शिवराज सिंह चौहान ने सभी निर्माण विभागों को ताबड़तोड़ टेंडर जारी करने के निर्देश दिए हैं, जिसमें सभी नियम-कानूनों को ताक में रख दिया गया है।
प्रतिपक्ष श्री सिंह ने कहा कि अपने आप को ईमानदार कहने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान , उनके चहेते प्रमुख सचिव जल संसाधन आर.एस. जुलानिया पांच हजार करोड़ के टेंडर अपने-अपने ठेकेदारों के उपक्रत करने के अभियान में लगे हैं। जिसके एवज में करोड़ों रूपये का लेन-देन हो गया है। बगैर किसी तकनीकी सलाह और प्रक्रिया को पूरी किए बिना लगभग 3000 करोड़ की स्वीकृति आदेश भी जारी कर दिए गए हैं।
नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि जल संसाधन विभाग की योजनाओं का निर्माण एक अत्यंत तकनीकी विषय है। योजना प्रारंभ करने के लिए एक लंबी नेता तकनीकी प्रक्रिया से किसी भी प्रोजेक्ट से गुजरना पड़ता है। इसके अंतर्गत परियोजनाओं का विस्तृत यांत्रिकी तथा जियो टेक्नीकल सर्वेक्षण तथा अन्वेषण करना होता है। इस सर्वेक्षण के आधार पर ही जल संसाधन विभाग की बड़ी योजनाओं की उपयोगिता और उनका क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सकता है जबकि वर्तमान में ताबड़तोड़ ठेके देने के लिए योजनाओं को मात्र जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया के नक्शों पर संभावनाओं के आधार पर बांध तथा नहरों की लाइन अंकित कर प्रस्ताव तैयार किए गए है जिनका कोई तकनीकी आधार नहीं है। इसमें सबसे गंभीर मुद्दा यह है कि ये सभी अधिकांश प्रस्ताव मूल रूप ये अंकित विभाग के तकनीकी अधिकारियों के द्वारा तैयार न करते हुए प्रदेश के बाहर के बड़े ठेकेदारों की सलाह एवं परामर्श पर तैयार किए गए है। विभाग के अधिकारियों ने झूठे आंकड़ों के आधार पर तैयार किए गए प्रस्तावों पर हस्ताक्षर किए हैं।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि नियमानुसार किसी भी प्रोजेक्ट के लिए विभागीय स्तर पर दस्तावेजीकरण एवं लागत निकालकर टेंडर आमंत्रित किए जाते थे, लेकिन इसमें ठीक इसके उलट निविदा की टर्न की प्रक्रिया अपनाई गई जिसमें विभाग को पूरी तरह मुक्त कर ठेकेदारों की मर्जी के मुताबिक निविदाएं जारी की गई। जिसमें टेंडर मंजूर होने के बाद प्रोजेक्ट की डीपीआर स्वयं ठेकेदार द्वारा बनाई जाएगी। जिसके आधार पर वह मनमर्जी से काम करेगा। श्री सिंह ने बताया कि जल संसाधन विभाग ने न केवल तकनीकि प्रक्रिया को अनदेखा किया बल्कि प्रोजेक्ट के पूर्व न तो भूअर्जन की कार्यवाही की और न ही सेक्शन 4-6 के अंतर्गत नोटिस जारी किए गए। यहां तक की निर्माण कार्य का नक्शा तक तैयार नहीं किया गया। नहरों और बांधो को बनाने की योजना नक्शे पर तो बना ली लेकिन जमीन कहां और कौन-सी है इसका पता न तो विभाग को है न ही ठेकेदार को। नेता प्रतिपक्ष श्री अजय सिंह ने कहा कि कांग्रेस शासन में टर्न की प्रक्रिया के प्रकरण प्रस्तुत किए गए थे जिसे तत्कालीन सरकार ने अमान्य कर दिया था, क्योंकि इस प्रक्रिया से योजना की उपयोगिता और व्यवहारिकता अनिश्चित होती है, भ्रष्टाचार पनपता है और प्रदेश को गंभीर आर्थिक क्षति होती है।
नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि विभाग से प्राप्त की गई जानकारी के अनुसार प्रदेश के बाहर हैदराबाद की एक कंपनी प्रमुख भूमिका निभा रही है। वह मंत्रालय में बैठकर प्रस्ताव तैयार कर अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर रही है। अभी तक इस कंपनी को टर्न की प्रक्रिया के तहत जल संसाधन विभाग और एनव्हीडीए ने एक हजार करोड़ से अधिक के कार्य आवंटित कर दिए गए तथा इतनी ही राशि के कार्य उसे देने की तैयारी है।
इन सभी प्रकरणों में अत्यंत महत्वपूर्ण विषय यह है कि भारत सरकार के द्वारा जो दिशा निर्देश सिंचाई योजनाओं को प्रारंभ करने के पूर्व अपनाए जाना चाहिए उसकी पूर्ण रूप से अवेहलना की जा रहीं है। जैसे-
1. केन्द्रीय जल आयोग भारत सरकार ने योजनाओं की निविदा आमंत्रित करने से पूर्व प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया निर्धारित की है जिसका पालन शून्य है।
2. निविदा जारी होने से पूर्व प्रभावित तथा लाभान्वित जनता की सुनवाई आवश्यक है। जिसके लिए भारत सरकार के स्पष्ट दिशा निर्देश है। इसका कोई पालन नहीं किया गया।
3. जल संसाधन विभाग की बड़ी योजनाओं में आवश्यक है कि निर्माण प्रारंभ करने से पूर्व पर्यावरण तथा प्रभावित वन के प्रस्ताव तैयार कर स्वीकृति प्राप्त करें। चूंकि परियोजनाओं का वास्तवविक सर्वेक्षण किया ही नहीं किया गया है अत: पर्यावरण के नियमों के उल्लंघन तथा वास्तविक रूप से प्रभावित न भूमि का आकलन नहीं हो सका। इस प्रकार इन सभी प्रकरणों में वन संरक्षण अधिनियम 1980 का स्पष्ट उल्लंघन किया गया है। जिसमें दोषी अधिकारियों के जेल जाने तक का प्रावधान है।
4. भारत सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का गठन इस कारण किया है कि विकास से जुड़ी योजनाओं में वन एवं पर्यावरण के कारण विलंब न हो जबकि मध्यप्रदेश सरकार नियमों का उल्लंघन कर योजनाओं के निर्माण में बाधा पहुंचाने की कर रहीं है, क्योंकि उसे योजनाओं से अधिक कमीशन की चिंता हंै। नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा कि इस पूरे मामले में भ्रष्टाचार की बू जो पूरे विभाग में फैल गई है कि नहर एवं बांध निर्माण के बड़े-बड़े टेंडर निकाले जा रहे हैं। इसके कारण प्रदेश के ठेकेदार बाहर हो गए है। ऐसा जानबूझकर इसलिए किया गया ताकि बाहर के ठेकेदार ही इन ठेकों को लें। ये ठेकेदार जो गुजरात, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु राज्यों के है। इनसे बड़ी रकम वसूलने की सांठगांठ हुई है।
खनिज घोटाले ने सरकार के सारे रिकार्ड तोड़े
प्रकरण क्रमांक एफ-2-57-13 की सुनवाई के लिए 31 अगस्त को नोटिस जारी किया गया और तीन सितम्बर को सुनवाई रख दी। मामला सतना जिले का है। तीन सितम्बर को सुनवाई की गई जिसमें तीन में से मात्र एक कंपनी उपस्थित हुई और मंत्री राजेंद्र षुक्ला ने रिलायंस के पक्ष में फैसला भी दे दिया। जिसे सचिव खनिज साधन ने मानने से इंकार कर दिया । मंत्री जी ने बहुत प्रयास किया और सचिव जब नहीं माने तो 19 सितम्बर को फिर सुनवाई लगा दी लेकिन जिस कंपनी को दिया था उसका इतना दबाव था कि सुनवाई स्थगित कर दी गई ।सरकार खनिज लीज आंवटन का अधिकार मई 2012 में कलेक्टरों को दिया लेकिन चुनाव आते ही 29 मार्च, 2013 में कलेक्टरों से अधिकार वापस ले लिया इसका मतलब साफ है कि खनिज मंत्री ने भ्रष्टाचार के लिए यह किया है।
तीन दिन में निपटाई 128 खनन स्थलों की फाइलें
प्रदेश के खनिज विभाग की कार्यप्रणाली में अचानक चौंकाने वाली तेजी दिखाई दी है। खदानों के लीज, सर्वे और नवीनीकरण आवेदन निपटाने का काम रफ्तार से चल रहा है। खुद खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल रात-रात तक प्रकरणों की सीधी सुनवाई कर रहे हैं। सामान्य तौर पर एक माह में अधिकतम 10-15 सुनवाई करने वाले महकमे ने महज तीन दिन में ही 128 खनन स्थलों की फाइलें निपटा दीं। चुनाव आचार संहिता प्रभावी होने से पहले काम निपटाने की इस तत्परता पर सवाल उठ रहे हैं। उल्लेखनीय है कि मप्र में खदान लीज और इसके प्रोसेसिंग लाइसेंस को जारी करने की प्रक्रिया कैग भी सवाल उठा चुका है। कैग रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2011 के दरम्यान विभाग की अनियमितताओं के कारण प्रदेश को 2350 करोड़ रूपए के राजस्व का नुकसान हुआ है। इस नुकसान का कारणों में कैग ने बताया कि विभाग द्वारा खनिज नियमों का सही तरीके से पालन न होना, रायल्टी का कम आकलन और वसूली में लापरवाही है। 3 सितंबर को 33 खनन स्थलों पर खदान आवंटन के लिए कुल 226 आवेदक वल्लभ भवन की लिस्ट में थे। अनुमानत: 4 से 5 मिनट भी एक आवेदक को सुना गया हो तो सभी आवेदकों को निपटाने में 15 से 18 घंटे सुनवाई लाजमी है। इसी प्रकार 20 अगस्त को यदि 400 में से आधे आवेदकों को ही लगातार सुना गया हो तो भी 13-15 घंटे लगे होंगे। ऐसी ही तमाम व्यावहारिक विसंगतियों ने शंकाओं को जन्म दिया है। प्रदेश के 135 से अधिक खनन स्थलों के लिए लीज और नवीनीकरण के औसतन 10 आवेदन आते हैं। हर आवेदन को देखना, ड्राफ्ट बनाना, प्रोसेस में लगाना और फिर आवेदनों को छांटना कठिन काम है। लीज और सर्वे संबंधित दस्तावेजों को क्रॉस चेक करना और लीज देने की शर्तो सहित डीड तैयार करने की प्रक्रिया 20 से अधिक पेजों की हैै। ऐसे एक आवेदन के दस्तावेज तैयार करने में 3-4 दिन लगते हैं।
व्यापमं द्वारा पीएमटी घोटाले को दबाया जा रहा है
पीएमटी घोटाले में बड़े लोगों के नाम आने के बाद मामले की जॉच धीमी कर दी गई है। मुख्यमंत्री ने आला अफसरों से जांच बहुत गहराई से न करने का कहा हैं।
मेरी जानकारी है की दो दिन पूर्व इंदौर हाईकोर्ट ने परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी को आरोपी न बनाए जाने पर पुलिस को फटकार लगाई है। पीमएटी द्वारा पिछले पांच साल में एडमीषन लेने वाले छात्रों की जानकारी नही दी जा रही है । इसमें अधिकतर प्रदेश के बाहर के छात्र है जिनके जाति प्रमाण पत्र भी फर्जी बने है। इसमें प्रदेश के छात्रों के साथ छलावा हुआ है।
रियो-टिंटो घोटाला
रियो-टिंटो को प्रास्पैक्टिव लायसेंस के तहत कौन सी भूमि से कितना हीरा है इसकी जांच करने हेतु अनुमति प्रदान की गई थी। जब उत्खनन हेतु भूमि दी जाती है तो किस खसरे की कितनी भूमि है यह स्पष्ट उल्लेखित होता है। परंतु रियो-टिंटो को जो भूमि दी गई उसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई और रियो-टिंटो पूरे क्षेत्र में जांच करने की आड़ में अनधिकृत रूप से माइनिंग कर रहा है।
रियो-टिंटो को जो अनुमति दी गई थी उसमें स्पष्ट रूप से उल्लेखित था कि किसी भी स्थिति में पेड़ों को नहीं काटा जाएगा परंतु रियो-टिंटो द्वारा अवैधानिक रूप से बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई है। जिसके संबंध में माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष पहल एनजीओ द्वारा याचिका प्रस्तुत की गई थी जिस पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेष 20.08.2013 को दिया गया।
रियो-टिंटो द्वारा जो प्रोसेसिंग प्लांट लगाया गया है वह आदिवासी की भूमि पर लगाया गया है। यह भूमि आदिवासी को कृषि हेतु शासन ने पट्टे पर दी है। परंतु रियो-टिंटो ने उस भूमि के किराए पर लेकर प्रोसेसिंग प्लांट लगवा दिया। इसके अतिरिक्त रियो-टिंटो ने कई आदिवासियों पर दबाव डालकर उन्हें धोखे में रखकर जमीन खरीद ली और उस पर भी अवैधानिक रूप से प्रास्पैक्टिव लायसेंस की आड़ में अवैध उत्खनन किया जा रहा है और बड़े पैमाने पर हीरे निकाले जा रहे है। शिकायत बहुत की गई परंतु उस पर अधिकांष अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की गई परंतु उमाकांत उमराव एवं राजेश बहुगुणा ने कार्यवाही की तो उन्हें हटा दिया गया।
और ऐसे बन गया एक टीचर 3000 करोड़ का मालिक!
3000 करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने वाले कभी शिक्षक रहे खनिज कारोबारी सुधीर के खिलाफ कालेधन के मामले में चल रही सीबीआई की जांच-पड़ताल में नये खुलासे हुए हैं। सीबीआई को पुख्ता सबूत मिले हैं कि सुधीर की कंपनी एसआर ने खनिज विभाग के अफसरों को घूस दी थी। इसके अलावा वर्ष, 2008 में मप्र भाजपा के चुनावी अभियान आपरेशन विजय को भी फंडिंग की गई थी। इस खुलासे के बाद मप्र की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है।
प्रदेश की भाजपा सरकार की किरकिरी बने भाजपा नेता और खनिज कारोबारी सुधीर शर्मा पर सीबीआई का फंदा कसता जा रहा है। सीबीआई को पुख्ता सबूत मिले हैं कि सुधीर की कंपनी एसआर फेरो ने आईबीएम(इंडियन ब्यूरो आफ माइंस) के अफसर को रिश्वत दी थी। यह अफसर नागपुर में पदस्थ था। इस मामले में भोपाल सीबीआई यूनिट ने प्राथमिकी दर्ज की है। आयकर विभाग की रिपोर्ट में सीबीआई को बताया गया है कि आईबीएम के अधिकारियों को सुधीर की कंपनी से पैसा दिया गया था।
सीबीआई ने इन तथ्यों को गहरी पड़ताल के बाद एसआर फेरो के खिलाफ बुधवार को प्राथमिकी दर्ज की है। बताया जाता है कि सीबीआई मुख्यालय दिल्ली के कुछ अफसर पिछले दिनों भोपाल आए थे। यहां उन्होंने आयकर विभाग की अन्वेषण विंग के अफसरों के साथ इस मामले में लंबी बातचीत की थी। जानकारी के मुताबिक, नागपुर में पदस्थ आईबीएम के अफसरों को सुधीर की कंपनी ने घूस दी थी। इन अफसरों ने सुधीर की खदानों की सेटेलाइट मैपिंग की थी।
भाजपा की चुनावी अभियान को भी की थी फंडिंग
सुधीर शर्मा की जो 42 पेज की एप्रेजल रिपोर्ट आयकर विभाग को मिली थी, उसके 32 नंबर पेज पर प्रदेश भाजपा के वर्ष, 2008 के चुनावी अभियान आपरेशन विजय को भी फंडिंग करने का खुलासा हुआ है। सुधीर शर्मा की कंपनी एसआर ने चुनाव के लिए पैसा दिया था। इस मामले के खुलासे के बाद एक बार फिर मध्यप्रदेश की राजनीति में भूचाल की स्थिति बन गई है।
दो मंत्रियों पर भी लग चुका है रिश्वत का आरोप
प्रदेश के खनिज मंत्री राजेंद्र शुक्ल और उच्च शिक्षा मंत्री लक्ष्मीकांत शर्मा द्वारा इन दो बड़े कारोबारियों से घूस लिए जाने के आरोपों के बाद मप्र में सियासी बवाल मच गया था । जुलाई में एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया था कि कारोबारियों दिलीप सूर्यवंशी और सुधीर शर्मा के यहां एक साल पहले आयकर विभाग ने छापा मारा था।
इस छापे में एक डायरी बरामद हुई है, जिसमें घूस लिए जाने का जिक्र है। ये दस्तावेज आयकर विभाग ने सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को पहले ही दे दिए हैं। इसको लेकर कांग्रेस ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और दोनों मंत्रियों से इस्तीफा मांगा था। वहीं दोनों मंत्रियों ने इन आरोपों को झूठा बताते हुए इसे कांग्रेस की राजनीतिक साजिश करार दिया था। नेता प्रतिपक्ष ने एक बयान में कहा कि छापों के तत्काल बाद कांग्रेस विधायक दल ने इस संबंध में 11 सवाल मुख्यमंत्री से पूछे थे, लेकिन एक का भी जवाब नहीं दिया गया।
सुधीर का दबदबा
आयकर छापों के बाद सुधीर शर्मा को शासकीय उपक्रम 'क्रिस्पÓ का अध्यक्ष बना दिया गया था। नेता प्रतिपक्ष ने मीडिया को विधानसभा का 28 जनवरी 2011 का कार्यवाही विवरणदिया था, जिसमें छापों से जुड़े दोनों कारोबारियों का जिक्र था।
गुरुवार, 1 अगस्त 2013
मध्यप्रदेश में भाजपा का बंटाढार तय
प्रदेश में मिलेगी भाजपा को 95 व कांग्रेस को 110 सीटें !
जन सर्वेक्षण में सामने आया आंकड़ा
दलवार संभावित सीटें
भाजपा-95, कांग्रेस-110, बसपा-10, सपा-7, गोंगपा-2, जदयू-1 व अन्य-5। कुल सीट संख्या- 230
भोपाल। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की अघोषित बिगुल बज गया है.....कांग्रेस के दिग्गजों ने उत्साहपूर्वक मोर्चा संभाल लिया है.....लेकिन भाजपा में खलबली है.....। खलबली की वजह है वे सर्वे रिपोट्र्स जो निजी एजेंसियों और प्रदेश के खुफिया विभाग ने सरकार को दिया है। इन सर्वे रिपोट्र्स में भाजपा की हार और कांग्रेस की बढ़त का दावा किया गया है। भाजपा संगठन और सरकार में मची खलबली के बाद बिच्छू डॉट कॉम ने एक बार फिर प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर जन सर्वेक्षण कराया। इस जन सर्वेक्षण में जो आंकड़ा निकलकर आया है वह चौकाने वाला है। हमारे आंकलन के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल अभी की स्थिति में सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत जुटाने में सफल नहीं होगा। क्षेत्रवार विश्लेषण के अनुसार भाजपा को 95, कांग्रेस को 110, बसपा को 10, सपा को 7, गोंगपा को 2 तो जदयू को 1 और अन्य को 5 सीटें मिलती दिख रही हैं।
चुनावी आंकलन: मध्यप्रदेश में किसी को बहुमत मिलने के आसार नहीं
मध्यप्रदेश में चुनाव नवंबर में होने है। इसलिए राजनीति में रूचि रखने वाले पाठकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, ब्लॉगरों समेत विभिन्न पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं में चुनाव पूर्व यह जिज्ञासा काफी तीव्र है कि जनता का फैसला क्या होगा? किसे मिलेगा सत्ता का ताज और कौन होगा बेताज? बिच्छू डॉट कॉम एडिटोरियल डेस्क, भोपाल द्वारा इस जिज्ञासा पर ठोस विश्लेषण के लिए वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों, लेखकों व पत्रकारों से विश्लेण मंगवाये गये। इसके तहत प्रदेश के लगभग 200 से अधिक पत्रकारों और सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बातचीत के आधार पर विस्तार से चुनावी आंकलन किया है। इस चुनावी आंकलन में कितना दम है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश के प्रशासनिक अमले के एक सर्वे और इसी राज्य के खुफिया तंत्रों के आंकलन से प्राप्त नतीजे भी बिच्छू डॉट कॉम के चुनावी आंकलन के लगभग आसपास हैं।
जनता को अब शिवराज पर तो भरोसा नहीं
लोकतंत्र के यज्ञ में आहुति देने के लिए अभी 4 माह का वक्त है। लेकिन परिणाम को लेकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में संशय की स्थिति बनी हुई है। ऊपरी तौर पर भले ही कुछ भी दावें किए जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत से सब वाकिफ हैं। भाजपा की बात हम करें, तो उनके सभी बड़े महारथी मैदानी इलाकों में जाने से कतरा रहे हैं। दरअसल, प्रदेश की जनता को शिवराज पर से अब भरोसा उठ गया है। उनसे न सिर्फ जनता नाराज है, बल्कि उसकी नजर में ये विश्वासघाती भी हैं। यही वजह है कि अंकों का गणित सत्तासीन भाजपा के गणितज्ञों को उलझन में डाले हुए है। इन सब के बावजुद यहां सभी शिवगण अब मोदी स्टाइल में शिवराज के भरोसे हैं। वहीं शिवराज भी 'मैं हूं नÓ का भरोसा दिलाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के लिए भले यह अच्छी बात हो सकती है कि इस बार जनता सबक सिखाने के लिए तैयार है।
महानगरों में नहीं गलेगी दाल
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश के चारों महानगरों(भोपाल,इंदौर,जबलपुर और ग्वालियर जिला )में से भोपाल,इंदौर और जबलपुर में अच्छा प्रदर्शन किया था,जबकि ग्वालियर में उसकी भद्द पिटी थी। 2008 में भाजपा ने इंदौर जिले की 9 में 6 सीट जीती थी लेकिन इस बार यहां उसे मात्र 3 सीट ही मिलने के आसार हैं। इसी प्रकार भोपाल में भाजपा 7में से 4 सीटों पर कमजोर है वहीं जबलपुर में भी 6 सीटें भाजपा से छिनने के संकेत है। जबकि ग्वालियर जिले में 6 में से इस बार भाजपा को मात्र एक सीट मिलने की संभावना है। इसके पीछे मुख्य वजह बताई जा रही है कि महानगरों में सरकार के वादों की पोल खुल गई है। प्रदेश के नव मतदाताओं ने जब सरकार के 9 साल के कार्यकाल का आंकलन किया तो पाया की आम आदमी को सरकार ने वादों के अलावा विशेष कुछ नहीं दिया है।
महाकौशल और विंध्य में हालत पतली
भाजपा महाकौशल और विंध्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए कोई करिश्मा नहीं कर सकी। महाकौशल में तो पार्टी की हालत पहले से ही पतली है और अब और पतली हो गई है। वर्तमान में यहां 38 सीटों में से मात्र 23 पर ही भाजपा का कब्जा है, जबकि 15 सीटों पर कांग्रेस बरकरार है। लेकिन क्षेत्र में विकास नहीं होने के कारण जनता आक्रोशित है। बिच्छू डॉट कॉम के ताजा सर्वे में यहां इस बार भाजपा को करीब 13 सीटों को नुकसान होता दिख रहा है। यानी महाकौशल में इस बार भाजपा को मात्र 10 सीट से ही संतोष करना पड़ेगा। महाकौशल क्षेत्र में आने वाले जिले जबलपुर,कटनी,डिंडौरी,मंडला,बालाघाट नरसिंहपुर और छिंदवाड़ा में भाजपा को जनता पूरी तरह नकारने को तैयार बैठी है।
उधर, पिछले चनाव में विंध्य में 30 सीटों में से 25 कब्जे में लेकर इतरा रही भाजपा को जोरदार झटका लगा है। विंध्य में कभी कांग्रेस की तूती बोलती थी। यहां से भाजपा को दहाई के अंक तक की सीटें नसीब नहीं होती थी, लेकिन आज जब जनता ने भाजपा को मौका दिया है, तब भाजपा विंध्य को दरकिनार कर गई। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। विंध्य में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए संगठन स्तर पर भाजपा की कोई रणनीति भी नहीं दिख रही है। बिच्छू डॉट कॉम के ताजा सर्वे में इस बार यहां भाजपा को 11-12 सीटों तक ही सिमटना पड़ सकता है।
बुंदेलखंड में की 26 सीटों में से 14 सीटें भाजपा हैंं, उनमें इस बार 8-10 सीटें ही भाजपा की झोली में आ सकती हैं। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि दो विपरीत दिशाओं के आदिवासी जिले मंडला और झाबुआ में भाजपा की पकड़ बेहद मजबूत है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा 34 में से 17 सीटों पर फिलहाल काबिज है, पर यह संख्या इस बार घटकर 10-12 होने के आसार हैं। मालवा क्षेत्र में भाजपा अभी भी मजबूत स्थिति में दिख रही है, लेकिन नर्मदा के दोनों किनारों की जनता भाजपा से दूर होती नजर आ रही है।
शिवराज-तोमर को सता रहा भीतरघात का डर
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार एक तिहाई विधायकों से जनता खुश नहीं है। इसको देखते हुए भाजपा कर स्थिति सांप-छुछंदर जैसी हो गई है। क्योंकि अगर टिकट नहीं बदला तो भी खतरा है और बदलता तो भीतरघात का डर। कांग्रेस विधायक चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी और बसपा विधायक परसराम मुदगल को भाजपा में लाकर नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह चौहान ने अपने असंतुष्ट विधायकों के लिए राह दिखा दी है।
जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान 107 सीटों पर रहेगी विशेष नजर
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान कमजोर सीटों पर अधिक वक्त देंगे। पार्टी ने करीब 107 ऐसी सीटों का चयन किया है जहां मुख्यमंत्री को अधिक समय देना है। संगठन की ओर से कोशिश की जा रही है कि कमजोर क्षेत्रों में जन आशीर्वाद यात्रा को ज्यादा समय मिल सके। इसके लिए कमजोर क्षेत्रों की सूची तैयार की जा रही है। भाजपा के पास जन आशीर्वाद यात्रा के जरिए कमजोरी दूर करने का आखिरी मौका है। पार्टी की कोशिश है कि कम से कम समय में मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का लाभ लिया जाए। शहरी क्षेत्र में मुख्यमंत्री ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच जाने का प्रयास करेंगे। इसके लिए भीड़भाड़ वाले क्षेत्र देखे जा रहे हैं।
61 विधायक रेड जोन में
एक तरफ कांग्रेस इसी माह अपने 100 उम्मीदवारों की घोषणा करने की तैयारी कर रही है, वहीं भाजपा अगस्त के अंत तक उन 61 विधायकों के भविष्य पर फैसला करेगी, जो रेड जोन में हैं। इन 61 विधायकों की सूची भाजपा के प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार के पास पहुंचा दी गई है। इसमें भोपाल के भी 3 विधायक हैं। भाजपा के जो विधायक रेड जोन में आ चुके हैं, उन्हें अगस्त में एक मौका आखिरी बार अपनी बात कहने के लिए दिया जाएगा। जिस विधायक को बुलाया जाएगा, उसके बारे में पूरा चिट्ठा कमेटी अपने पास रखेगी। ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि इसमें अनिल माधव दवे, अरविंद मेनन जैसे तेजतर्रार नेता रहेंगे। पिछले दिनों भोपाल आए प्रदेश प्रभारी इस तरह की स्क्रीनिंग को हरी झंडी दे गए हंै। जो विधायक इस कमेटी के सामने फेल होगा, उसे तत्काल टिकट काटने का फार्म पकड़ा दिया जाएगा। भाजपा संसदीय बोर्ड जो सुपर पॉवर है, एक उप समिति मप्र के लिए बनाएगा। इसमें सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी जैसे नेताओं को शामिल किया जाएगा। ये नेता विधायकों के परफार्मेंस की पड़ताल करेंगे, उसके बाद तय होगा कि किसे टिकट देना है, किसे नहीं।
9 मंत्री भी रेड जोन में
भाजपा की रेड जोन सूची में 9 मंत्री भी शामिल हैं। फिलहाल केन्द्रीय नेतृत्व ने अभी किसी भी विधायक की टिकट रोकने को हरी झंडी नहीं दिखाई है। प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार जरूर रेड जोन लिस्ट को अपने साथ ले गए हैं। वे नई दिल्ली से कोई निर्देश भेजेंगे। वहीं रेड जोन में सर्वे के लिए पर्यवेक्षक भी इस माह अपने-अपने जिले में सक्रिय हो जाएंगे। उन्हें यह रिपोर्ट 31 जुलाई तक देनी है।
20 लाख दिखाओ और टिकट ले जाओ
दस साल तक प्रदेश में राज करने के बाद भी भाजपा का खजाना खाली है। पार्टी ने कुछ अपवाद छोड़कर हर विधानसभा में 20 लाख का चंदा इक_ा करने का प्रोग्राम बनाया है। बहुत जल्द इस बारे में विधिवत नीति जारी कर दी जाएगी। सूत्रों का इस संबंध में कहना है कि इस योजना को घुमा फिरा कर पार्टी वालों के सामने रखा जाएगा। पार्टी कार्यकर्ता को भावनात्मक रूप से उत्तेजित करने के लिए आव्हान किया जाएगा कि भाजपा लक्ष्मी पुत्रों की पार्टी नहीं है। यह जनता की पार्टी है और जनता से ही चंदा लेकर चुनाव लड़ा जाए। कमजोर आर्थिक स्थिति वाले व पिछड़ी विधानसभा सीट को छोड़ कर सभी विधानसभा में 20-20 लाख का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए विधानसभा वार प्रभारी बनाए जायेंगे। जो मंडल स्तर पर अपने खजांची नियुक्त करेंगे। अब जिसे भी अपनी दावेदारी मजबूत करनी होगी वह पकड़-पकड़ कर चन्दा इक_ा करवाएगा। वर्तमान विधायक के भी सामने नाक का सवाल आ जाएगा और उन्हें भी इतने कम समय में ज्यादा से ज्यादा रसीद फाडऩी पड़ेगी। चूंकि पार्टी यहां सिर से लेकर पांव तक हावी है इसलिए 20 लाख इक_ा होना मुश्किल नहीं रहेगा। किन्तु इसके लिए पार्टी नेता आपस में ही उलझेंगे। बिल्डर, ठेकेदार, सप्लायर , शराब लॉबी, प्रापर्टी दलाल सहित अन्य वैध-अवैध काम करने वाले यहां भाजपा के सबसे बड़े डोनर हैं। यहां के कुछ नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे मुर्दे की जेब से भी पैसा निकलवा लेते हैं।
मोदी भक्त देंगे दगा
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में हैट्रिक लगवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गुजरात के पूर्णकालिक विजयव्रतियों की मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की हैट्रिक में रूचि नहीं है। प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए गुजरात से 70, उत्तरप्रदेश से 30, महाराष्ट से 40 और बिहार से 15 पूर्णकालिक विजयव्रतियों को बुलाया था। ताकि उन्हें सीमावर्ती जिलों में पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जा सके। लेकिन सिर्फ 55 पूर्णकालिक विजयव्रती ही आए। जो उनमें से 41उन विधानसभा क्षेत्रों में नहीं गए जहां उन्हें भेजा गया था।
भोपाल। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव की अघोषित बिगुल बज गया है.....कांग्रेस के दिग्गजों ने उत्साहपूर्वक मोर्चा संभाल लिया है.....लेकिन भाजपा में खलबली है.....। खलबली की वजह है वे सर्वे रिपोट्र्स जो निजी एजेंसियों और प्रदेश के खुफिया विभाग ने सरकार को दिया है। इन सर्वे रिपोट्र्स में भाजपा की हार और कांग्रेस की बढ़त का दावा किया गया है। भाजपा संगठन और सरकार में मची खलबली के बाद बिच्छू डॉट कॉम ने एक बार फिर प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर जन सर्वेक्षण कराया। इस जन सर्वेक्षण में जो आंकड़ा निकलकर आया है वह चौकाने वाला है। हमारे आंकलन के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल अभी की स्थिति में सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत जुटाने में सफल नहीं होगा। क्षेत्रवार विश्लेषण के अनुसार भाजपा को 95, कांग्रेस को 110, बसपा को 10, सपा को 7, गोंगपा को 2 तो जदयू को 1 और अन्य को 5 सीटें मिलती दिख रही हैं।
चुनावी आंकलन: मध्यप्रदेश में किसी को बहुमत मिलने के आसार नहीं
मध्यप्रदेश में चुनाव नवंबर में होने है। इसलिए राजनीति में रूचि रखने वाले पाठकों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, ब्लॉगरों समेत विभिन्न पार्टियों के नेताओं व कार्यकर्ताओं में चुनाव पूर्व यह जिज्ञासा काफी तीव्र है कि जनता का फैसला क्या होगा? किसे मिलेगा सत्ता का ताज और कौन होगा बेताज? बिच्छू डॉट कॉम एडिटोरियल डेस्क, भोपाल द्वारा इस जिज्ञासा पर ठोस विश्लेषण के लिए वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों, लेखकों व पत्रकारों से विश्लेण मंगवाये गये। इसके तहत प्रदेश के लगभग 200 से अधिक पत्रकारों और सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ताओं से बातचीत के आधार पर विस्तार से चुनावी आंकलन किया है। इस चुनावी आंकलन में कितना दम है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश के प्रशासनिक अमले के एक सर्वे और इसी राज्य के खुफिया तंत्रों के आंकलन से प्राप्त नतीजे भी बिच्छू डॉट कॉम के चुनावी आंकलन के लगभग आसपास हैं।
जनता को अब शिवराज पर तो भरोसा नहीं
लोकतंत्र के यज्ञ में आहुति देने के लिए अभी 4 माह का वक्त है। लेकिन परिणाम को लेकर सभी प्रमुख राजनीतिक दलों में संशय की स्थिति बनी हुई है। ऊपरी तौर पर भले ही कुछ भी दावें किए जा रहे हों, लेकिन जमीनी हकीकत से सब वाकिफ हैं। भाजपा की बात हम करें, तो उनके सभी बड़े महारथी मैदानी इलाकों में जाने से कतरा रहे हैं। दरअसल, प्रदेश की जनता को शिवराज पर से अब भरोसा उठ गया है। उनसे न सिर्फ जनता नाराज है, बल्कि उसकी नजर में ये विश्वासघाती भी हैं। यही वजह है कि अंकों का गणित सत्तासीन भाजपा के गणितज्ञों को उलझन में डाले हुए है। इन सब के बावजुद यहां सभी शिवगण अब मोदी स्टाइल में शिवराज के भरोसे हैं। वहीं शिवराज भी 'मैं हूं नÓ का भरोसा दिलाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के लिए भले यह अच्छी बात हो सकती है कि इस बार जनता सबक सिखाने के लिए तैयार है।
महानगरों में नहीं गलेगी दाल
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रदेश के चारों महानगरों(भोपाल,इंदौर,जबलपुर और ग्वालियर जिला )में से भोपाल,इंदौर और जबलपुर में अच्छा प्रदर्शन किया था,जबकि ग्वालियर में उसकी भद्द पिटी थी। 2008 में भाजपा ने इंदौर जिले की 9 में 6 सीट जीती थी लेकिन इस बार यहां उसे मात्र 3 सीट ही मिलने के आसार हैं। इसी प्रकार भोपाल में भाजपा 7में से 4 सीटों पर कमजोर है वहीं जबलपुर में भी 6 सीटें भाजपा से छिनने के संकेत है। जबकि ग्वालियर जिले में 6 में से इस बार भाजपा को मात्र एक सीट मिलने की संभावना है। इसके पीछे मुख्य वजह बताई जा रही है कि महानगरों में सरकार के वादों की पोल खुल गई है। प्रदेश के नव मतदाताओं ने जब सरकार के 9 साल के कार्यकाल का आंकलन किया तो पाया की आम आदमी को सरकार ने वादों के अलावा विशेष कुछ नहीं दिया है।
महाकौशल और विंध्य में हालत पतली
भाजपा महाकौशल और विंध्य में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए कोई करिश्मा नहीं कर सकी। महाकौशल में तो पार्टी की हालत पहले से ही पतली है और अब और पतली हो गई है। वर्तमान में यहां 38 सीटों में से मात्र 23 पर ही भाजपा का कब्जा है, जबकि 15 सीटों पर कांग्रेस बरकरार है। लेकिन क्षेत्र में विकास नहीं होने के कारण जनता आक्रोशित है। बिच्छू डॉट कॉम के ताजा सर्वे में यहां इस बार भाजपा को करीब 13 सीटों को नुकसान होता दिख रहा है। यानी महाकौशल में इस बार भाजपा को मात्र 10 सीट से ही संतोष करना पड़ेगा। महाकौशल क्षेत्र में आने वाले जिले जबलपुर,कटनी,डिंडौरी,मंडला,बालाघाट नरसिंहपुर और छिंदवाड़ा में भाजपा को जनता पूरी तरह नकारने को तैयार बैठी है।
उधर, पिछले चनाव में विंध्य में 30 सीटों में से 25 कब्जे में लेकर इतरा रही भाजपा को जोरदार झटका लगा है। विंध्य में कभी कांग्रेस की तूती बोलती थी। यहां से भाजपा को दहाई के अंक तक की सीटें नसीब नहीं होती थी, लेकिन आज जब जनता ने भाजपा को मौका दिया है, तब भाजपा विंध्य को दरकिनार कर गई। आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। विंध्य में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए संगठन स्तर पर भाजपा की कोई रणनीति भी नहीं दिख रही है। बिच्छू डॉट कॉम के ताजा सर्वे में इस बार यहां भाजपा को 11-12 सीटों तक ही सिमटना पड़ सकता है।
बुंदेलखंड में की 26 सीटों में से 14 सीटें भाजपा हैंं, उनमें इस बार 8-10 सीटें ही भाजपा की झोली में आ सकती हैं। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि दो विपरीत दिशाओं के आदिवासी जिले मंडला और झाबुआ में भाजपा की पकड़ बेहद मजबूत है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में भाजपा 34 में से 17 सीटों पर फिलहाल काबिज है, पर यह संख्या इस बार घटकर 10-12 होने के आसार हैं। मालवा क्षेत्र में भाजपा अभी भी मजबूत स्थिति में दिख रही है, लेकिन नर्मदा के दोनों किनारों की जनता भाजपा से दूर होती नजर आ रही है।
शिवराज-तोमर को सता रहा भीतरघात का डर
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार एक तिहाई विधायकों से जनता खुश नहीं है। इसको देखते हुए भाजपा कर स्थिति सांप-छुछंदर जैसी हो गई है। क्योंकि अगर टिकट नहीं बदला तो भी खतरा है और बदलता तो भीतरघात का डर। कांग्रेस विधायक चौधरी राकेश सिंह चतुर्वेदी और बसपा विधायक परसराम मुदगल को भाजपा में लाकर नरेंद्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह चौहान ने अपने असंतुष्ट विधायकों के लिए राह दिखा दी है।
जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान 107 सीटों पर रहेगी विशेष नजर
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान कमजोर सीटों पर अधिक वक्त देंगे। पार्टी ने करीब 107 ऐसी सीटों का चयन किया है जहां मुख्यमंत्री को अधिक समय देना है। संगठन की ओर से कोशिश की जा रही है कि कमजोर क्षेत्रों में जन आशीर्वाद यात्रा को ज्यादा समय मिल सके। इसके लिए कमजोर क्षेत्रों की सूची तैयार की जा रही है। भाजपा के पास जन आशीर्वाद यात्रा के जरिए कमजोरी दूर करने का आखिरी मौका है। पार्टी की कोशिश है कि कम से कम समय में मुख्यमंत्री की लोकप्रियता का लाभ लिया जाए। शहरी क्षेत्र में मुख्यमंत्री ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच जाने का प्रयास करेंगे। इसके लिए भीड़भाड़ वाले क्षेत्र देखे जा रहे हैं।
61 विधायक रेड जोन में
एक तरफ कांग्रेस इसी माह अपने 100 उम्मीदवारों की घोषणा करने की तैयारी कर रही है, वहीं भाजपा अगस्त के अंत तक उन 61 विधायकों के भविष्य पर फैसला करेगी, जो रेड जोन में हैं। इन 61 विधायकों की सूची भाजपा के प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार के पास पहुंचा दी गई है। इसमें भोपाल के भी 3 विधायक हैं। भाजपा के जो विधायक रेड जोन में आ चुके हैं, उन्हें अगस्त में एक मौका आखिरी बार अपनी बात कहने के लिए दिया जाएगा। जिस विधायक को बुलाया जाएगा, उसके बारे में पूरा चिट्ठा कमेटी अपने पास रखेगी। ऐसा भी सुनने में आ रहा है कि इसमें अनिल माधव दवे, अरविंद मेनन जैसे तेजतर्रार नेता रहेंगे। पिछले दिनों भोपाल आए प्रदेश प्रभारी इस तरह की स्क्रीनिंग को हरी झंडी दे गए हंै। जो विधायक इस कमेटी के सामने फेल होगा, उसे तत्काल टिकट काटने का फार्म पकड़ा दिया जाएगा। भाजपा संसदीय बोर्ड जो सुपर पॉवर है, एक उप समिति मप्र के लिए बनाएगा। इसमें सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर, सुंदरलाल पटवा, कैलाश जोशी जैसे नेताओं को शामिल किया जाएगा। ये नेता विधायकों के परफार्मेंस की पड़ताल करेंगे, उसके बाद तय होगा कि किसे टिकट देना है, किसे नहीं।
9 मंत्री भी रेड जोन में
भाजपा की रेड जोन सूची में 9 मंत्री भी शामिल हैं। फिलहाल केन्द्रीय नेतृत्व ने अभी किसी भी विधायक की टिकट रोकने को हरी झंडी नहीं दिखाई है। प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार जरूर रेड जोन लिस्ट को अपने साथ ले गए हैं। वे नई दिल्ली से कोई निर्देश भेजेंगे। वहीं रेड जोन में सर्वे के लिए पर्यवेक्षक भी इस माह अपने-अपने जिले में सक्रिय हो जाएंगे। उन्हें यह रिपोर्ट 31 जुलाई तक देनी है।
20 लाख दिखाओ और टिकट ले जाओ
दस साल तक प्रदेश में राज करने के बाद भी भाजपा का खजाना खाली है। पार्टी ने कुछ अपवाद छोड़कर हर विधानसभा में 20 लाख का चंदा इक_ा करने का प्रोग्राम बनाया है। बहुत जल्द इस बारे में विधिवत नीति जारी कर दी जाएगी। सूत्रों का इस संबंध में कहना है कि इस योजना को घुमा फिरा कर पार्टी वालों के सामने रखा जाएगा। पार्टी कार्यकर्ता को भावनात्मक रूप से उत्तेजित करने के लिए आव्हान किया जाएगा कि भाजपा लक्ष्मी पुत्रों की पार्टी नहीं है। यह जनता की पार्टी है और जनता से ही चंदा लेकर चुनाव लड़ा जाए। कमजोर आर्थिक स्थिति वाले व पिछड़ी विधानसभा सीट को छोड़ कर सभी विधानसभा में 20-20 लाख का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए विधानसभा वार प्रभारी बनाए जायेंगे। जो मंडल स्तर पर अपने खजांची नियुक्त करेंगे। अब जिसे भी अपनी दावेदारी मजबूत करनी होगी वह पकड़-पकड़ कर चन्दा इक_ा करवाएगा। वर्तमान विधायक के भी सामने नाक का सवाल आ जाएगा और उन्हें भी इतने कम समय में ज्यादा से ज्यादा रसीद फाडऩी पड़ेगी। चूंकि पार्टी यहां सिर से लेकर पांव तक हावी है इसलिए 20 लाख इक_ा होना मुश्किल नहीं रहेगा। किन्तु इसके लिए पार्टी नेता आपस में ही उलझेंगे। बिल्डर, ठेकेदार, सप्लायर , शराब लॉबी, प्रापर्टी दलाल सहित अन्य वैध-अवैध काम करने वाले यहां भाजपा के सबसे बड़े डोनर हैं। यहां के कुछ नेताओं के बारे में कहा जाता है कि वे मुर्दे की जेब से भी पैसा निकलवा लेते हैं।
मोदी भक्त देंगे दगा
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता में हैट्रिक लगवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले गुजरात के पूर्णकालिक विजयव्रतियों की मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की हैट्रिक में रूचि नहीं है। प्रदेश में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने के लिए गुजरात से 70, उत्तरप्रदेश से 30, महाराष्ट से 40 और बिहार से 15 पूर्णकालिक विजयव्रतियों को बुलाया था। ताकि उन्हें सीमावर्ती जिलों में पार्टी के प्रचार के लिए भेजा जा सके। लेकिन सिर्फ 55 पूर्णकालिक विजयव्रती ही आए। जो उनमें से 41उन विधानसभा क्षेत्रों में नहीं गए जहां उन्हें भेजा गया था।
सोमवार, 1 जुलाई 2013
मोदी और राजगणित
भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपनी चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया है. यानी वे 2014 में होने वाले 16वें आम चुनाव में भारत की मुख्य विपक्षी पार्टी की कमान संभालेंगे. अक्टूबर, 2001 में मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री बनने से पहले शायद ही किसी ने सोचा होगा कि मोदी एक दिन इतने बड़े हो जाएंगे कि उन्हें देश की सबसे बड़ी गद्दी के दावेदार के तौर पर देखा जाएगा. तब तक वे भाजपा के उन नेताओं में हुआ करते थे जो परदे के पीछे रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं.
इसमें कोई शक नहीं कि यह एक दुर्लभ विशेषाधिकार है जो पार्टी के 33 साल के इतिहास में सिर्फ दो लोगों को मिला है. पहले अटल बिहारी वाजपेयी जो इस दावेदारी के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने में सफल भी हुए और दूसरे लाल कृष्ण आडवाणी, जो उपप्रधानमंत्री रहे और 2009 के आम चुनावों में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने. 33 साल की इस अवधि में भाजपा के कई अध्यक्ष हुए, लेकिन इनमें सिर्फ वाजपेयी और आडवाणी थे जिन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य समझा गया. मोदी इस सूची में तीसरा नाम बन गए हैं. आम चुनाव में अब एक साल से भी कम का वक्त बचा है. इस लिहाज से देखें तो जीत के लिए टीम और रणनीति बनाने या 2002 के गुजरात दंगों के चलते बनी विभाजनकारी नेता की अपनी छवि बदलने के लिए उनके पास ज्यादा समय नहीं है.
पिछले आम चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व के साथ मैदान में उतरी भाजपा को पराजय मिली थी. सवाल उठता है कि क्या मोदी पार्टी को विजय दिला पाएंगे. क्या वे उन मोर्चों पर सफल हो पाएंगे जहां आडवाणी नाकामयाब रहे थे? क्या 2009 के आडवाणी के मुकाबले वोटरों में मोदी का ज्यादा आकर्षण है? क्या भाजपा के मौजूदा या संभावित सहयोगी प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी को स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के समर्थकों और विरोधियों, दोनों में उनकी मुस्लिमविरोधी छवि है. इसके चलते गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के साथ भाजपा की तनातनी हुई. मोदी उन कुछ राजनेताओं में से हैं जिन्हें भारत की बहुलतावादी राजनीति के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता है. क्या उनकी मुस्लिम विरोधी छवि भारत की 80 फीसदी हिंदू जनसंख्या में भाजपा के समर्थन का तूफान पैदा कर सकेगी? या फिर इसके चलते भाजपा को एक बार फिर पराजय का सामना करना पड़ेगा?
मोदी की एक दूसरी छवि भी है. एक ऐसे नेता की छवि जिसने तेज आर्थिक विकास के बूते अपने राज्य में खुशहाली पैदी की. वे अपनी इस उपलब्धि का जिक्र जमकर करते भी हैं. सवाल उठता है कि गुजरात में सुशासन का मोदी का दावा क्या भारत के 80 करोड़ वोटरों का उतना हिस्सा अपनी तरफ खींच पाएगा जिसके बल पर उनकी पार्टी की सरकार बन सके. 2004 में भाजपा ने भारत उदय और इंडिया शाइनिंग के नारों के साथ ऐसा ही दावा किया था जिसका लोगों पर इतना असर नहीं हो पाया कि भाजपा सत्ता में वापसी कर पाती. और आखिरी सवाल यह है कि विधानसभा चुनाव में लगातार तीन बार जीत क्या संसदीय चुनाव में पहली बार विजय पताका फहराने की उनकी कोशिश में उनके काम आएगी.
राज्यों में भाजपा का हाल
2009 के मुकाबले इस वक्त भाजपा की हालत पतली है. इसका मतलब यह हुआ कि मोदी की राह 2009 के आडवाणी से कहीं ज्यादा मुश्किल है. आडवाणी उस समय तुलनात्मक रूप से फायदे की स्थिति में थे. पांच साल पहले भाजपा के पास सात राज्यों की सत्ता थी. आज उसके पास सिर्फ चार राज्य हैं- मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़ और गोवा. इसमें राजनीतिक प्रासंगिकता के हिसाब से गोवा न के बराबर है. बिहार में वह जदयू के साथ गठबंधन के सहारे सत्ता में है. 2005 से यह गठबंधन वहां अटूट रहा है. 2009 में बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से भाजपा ने 12 जीती थीं और 1999 में अपने सबसे बढ़िया प्रदर्शन की बराबरी की थी. 2010 के विधानसभा चुनाव में भी इसने बढ़िया प्रदर्शन किया. लेकिन आज भाजपा-जदयू गठबंधन टूट के कगार पर है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चिंता है कि मोदी के साथ दिखने से बिहार के 17 फीसदी मुस्लिम मतदाता उनसे दूर जा सकते हैं. पड़ोसी राज्य झारखंड में अवसरवादी राजनीति के चलते इस साल जनवरी में ही भाजपा ने सरकार गंवाई है. राज्य में अब राष्ट्रपति शासन है. पिछले साल उत्तराखंड और हिमाचल में हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी सत्ता से बाहर हुई है.
जनसंख्या और राजनीतिक असर के हिसाब से देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में भी पार्टी का हाल बुरा है. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी 403 में से सिर्फ 48 सीटें जीत पाई थी और तीसरे स्थान पर रही थी. उसका यह प्रदर्शन 2007 के मुकाबले तो खराब ही था जब उसने 51 सीटें जीती थीं 2002 की तुलना में तो यह कोसों दूर था जब उसने 88 सीटों पर विजय हासिल की थी. यह दिखाता है कि भाजपा 2002 से राज्य की सत्ता में रही सपा और बसपा सरकारों की असफलताओं का फायदा उठाने में नाकामयाब रही है. उसके लिए चिंता की बात यह भी है कि 2007 के मुकाबले 2012 में जहां सपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत बढ़ा वहीं भाजपा का वोट प्रतिशत 17 फीसदी के मुकाबले 15 फीसदी रह गया. वैसे देखा जाए तो उत्तर प्रदेश में पिछले एक दशक से भी ज्यादा समय से पार्टी का लगातार पतन हुआ है. 1996 से अब तक हुए चार विधानसभा चुनावों में उसकी सीटों की संख्या और वोट प्रतिशत दोनों में गिरावट आई है. 1996 में पार्टी ने 32.5 फीसदी वोटों के साथ 425 में से 174 सीटें जीती थीं.
केंद्र की सत्ता का रास्ता जिस उत्तर प्रदेश से होकर जाता है वहां भाजपा इस वक्त अपने सबसे बुरे दौर में चल रही है
महाराष्ट्र का हाल भी कुछ ऐसा ही है. 1999 से अब तक हुए तीन विधानसभा चुनावों में वहां भाजपा-शिवसेना गठबंधन हर बार हारा है. सीट संख्या और वोट प्रतिशत दोनों लिहाज से भाजपा का प्रदर्शन लगातार गिरा है. यानी जनसंख्या के मामले में इस दूसरे सबसे बड़े राज्य में भी वह अपने सबसे बुरे दौर में है. उड़ीसा में जब बीजू जनता दल नेता और राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने 2009 में इससे गठबंधन तोड़ा तो इसकी नैया ही डूब गई थी. भाजपा को कुछ राहत पिछले साल पंजाब में मिली जहां शिरोमणि अकाली दल के साथ इसके गठबंधन ने विधानसभा चुनाव में अपनी सत्ता कायम रखी थी. बड़े लाभ की उम्मीद भाजपा को सिर्फ राजस्थान में है जहां वह नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी लहर के सहारे सत्तासीन कांग्रेस को हराने के सपने देख रही है.
मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी ने 2003 से लगातार दो बार सरकार बनाई है. यहां भी विधानसभा चुनाव छह महीने दूर हैं. हालांकि वहां की भाजपा सरकारें खुद को लोकप्रिय बता रही हैं, लेकिन कांग्रेस को उम्मीद है कि दस साल से सत्ता में बैठी इन सरकारों के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर बनेगी और वहां वह वापसी करेगी. अगर भाजपा ने इन दो में से एक भी राज्य गंवा दिया तो वोटरों और पार्टी दोनों में मोदी की अपील बुरी तरह घट सकती है.
लोकसभा में भाजपा
केंद्र में भाजपा की पहली सरकार सिर्फ 13 दिन चली थी. 1996 में तब उसे बहुमत के आंकड़े यानी 272 सीटों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त दलों का समर्थन नहीं मिल पाया था. 1998 में बनी पार्टी की दूसरी सरकार 13 महीने चली. 1999 में बनी इसकी तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया. 1998 में भाजपा ने 182 सीटें जीती थीं. 1999 में यह आंकड़ा 183 हुआ. दोनों बार दूसरे दलों के समर्थन से उसकी सरकार बनी.
माना जा सकता है कि अगर भाजपा अगले आम चुनाव में 185 सीटों के आस-पास पहुंच जाती है तो वह केंद्र में सरकार बनाने की दावेदार होगी. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी के रास्ते में जो अड़चनें हैं वे उन अड़चनों से कहीं बड़ी हैं जो 2009 में आडवाणी के सामने थीं. 2009 में जब भाजपा आडवाणी के नेतृत्व में मैदान में उतरी थी तो उसके खाते में 2004 के आम चुनावों में मिली 137 लोकसभा सीटों की पूंजी थी. यानी पार्टी को करीब 45 सीटों की खाई पाटनी थी. अभी भाजपा के पास 116 लोकसभा सीटें हैं. यानी मोदी को दूसरी पार्टियों से 70 के करीब सीटें छीननी होंगी. जिस तरह से 2009 के बाद हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन गिरा है, उसे देखते हुए उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती है. खासकर तब तो बहुत ही बड़ी अगर पिछली बार की तरह इस बार भी भाजपा 543 में से 365 लोकसभा सीटों पर लड़ी और बाकी सीटें उसे गठबंधन सहयोगियों के लिए छोड़नी पड़ीं.
उत्तर प्रदेश
अपनी पार्टी को सत्ता में लाने और खुद प्रधानमंत्री बनने का जो सपना मोदी देख रहे हैं वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक वे उत्तर प्रदेश में पार्टी की किस्मत नहीं बदल देते. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं जो किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा हैं. इनमें से सिर्फ नौ ही आज भाजपा के पास हैं. 1996, 1998 और 1999 के तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई थी. इन चुनावों में उसने क्रमश: 52, 59 और 29 सीटें जीती थीं. 2004 में जब वाजपेयी सरकार सत्ता से बाहर हुई तब भाजपा सिर्फ 10सीटें जीत पाई थी.
यह रिकॉर्ड इशारा करता है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी करने के लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश में कम से कम 25 सीटें तो जीतनी ही होंगी. यानी मौजूदा सीटों से 16 सीट ज्यादा. अगले साल 25 सीटें जीतना भाजपा के लिए 1999 की स्थिति की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है. 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 30 प्रतिशत वोट हासिल करके 25 सीटें जीती थीं. दरअसल 1991 से 1999 का दौर उत्तर प्रदेश में भाजपा का स्वर्णिम दौर रहा था. इस दौरान हुए चारों लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए. 1998 में तो यह आंकड़ा 37.5 प्रतिशत तक भी पहुंचा. लेकिन 2004 में यह घटकर 22 प्रतिशत पर आ गया और 2009 में तो पार्टी को कुल 17.5 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए. कोढ़ में खाज यह कि 14 साल में सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल उत्तर प्रदेश में मजबूत ही हुए हैं. 90 के दशक में हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत या तो सबसे ज्यादा होता था या फिर वह इस मामले में दूसरे स्थान पर रहती थी. लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है. अपवाद के रूप में 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें जब कांग्रेस ने बसपा से एक ज्यादा यानी 21 सीटें हासिल की थीं, तो वोट प्रतिशत का सबसे बड़ा हिस्सा अब सपा और बसपा में बंटता है.
सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का यह हाल क्यों हुआ. इसकी प्रमुख वजह यह रही कि सवर्ण वोटों पर उसकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई. प्रदेश में सवर्ण वोट लगभग 18 प्रतिशत हैं. पहले यह वोट कांग्रेस को जाता था, लेकिन 1989 के बाद से ही भाजपा लगातार इसे अपने पक्ष में करने में कामयाब हो रही थी. 1999 तक प्रदेश के सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) वोट का एक बड़ा हिस्सा पार्टी को मिल रहा था. लेकिन पिछले दस साल में सपा और बसपा ने अपना प्रभाव बढ़ाकर और सवर्ण प्रत्याशियों को मैदान में उतार कर ऊंची जातियों के वोट का अच्छा-खासा हिस्सा अपनी तरफ खींच लिया.
1996 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने प्रदेश के कुल सवर्ण वोटों का 74 प्रतिशत हासिल किया था. यानी तीन-चौथाई सवर्ण वोट भाजपा के पास थे. लेकिन 2002 में यह घटकर मात्र 47 प्रतिशत रह गए. इसके ठीक उलट बसपा के पास जहां 1996 में सिर्फ चार प्रतिशत ब्राह्मण वोट थे, वे 2002 में बढ़कर 14 प्रतिशत हो गए. बसपा को मिलने वाले अन्य सवर्ण जातियों के वोट भी इस दौर में लगभग दोगुने हो गए. पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सपा को लगभग 19 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले. सपा और बसपा दोनों ही एक दौर में जाति आधारित पार्टियां मानी जाती थीं. लेकिन सवर्ण वोटों को अपने पक्ष में करने के बाद इन पार्टियों की राजनीति लगातार समावेशी हुई है. पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में सपा और बसपा ने ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर प्रत्याशियों को रिकॉर्ड संख्या में टिकट दिए. इस कारण सवर्ण वोट का एक बड़ा हिस्सा उनके खाते में गया जिसने पिछड़े और दलित वोट के साथ मिलकर भाजपा की नैया डुबो दी. 2009 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा का हर पांच में से एक प्रत्याशी ब्राह्मण था. बसपा में ब्राह्मण प्रत्याशियों की संख्या दलित प्रत्याशियों से भी ज्यादा थी, जबकि दलित ही बसपा के अस्तित्व का मुख्य कारण रहे हैं. ऐतिहासिक तौर पर उत्तर प्रदेश में हमेशा ठाकुर और ब्राह्मण की चुनावी लड़ाई रही है. भाजपा के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ब्राह्मण विरोधी छवि वाले ठाकुर हैं. मोदी के लिए राजनाथ सिंह के साथ मिलकर राज्य के ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करना आसान नहीं होगा.
फिर भी भाजपा किसी तरह से उत्तर प्रदेश में 25 सीटें जीत भी जाती है तो भी मोदी को दौड़ में बने रहने के लिए पूरे देश से 160 सीटें और जोड़नी होंगी. ये सीटें वे कहां से लाएंगे? ला भी पाएंगे या नहीं? जानने के लिए दूसरे राज्यों की स्थितियों पर गौर करते हैं.
महाराष्ट्र
महाराष्ट्र में भाजपा क्षेत्रीय दल शिव सेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है. यहां 48 लोकसभा सीटें हैं. इनमें सबसे ज्यादा 18 भाजपा ने 1996 में जीती थीं. 1999 में भी पार्टी का प्रदर्शन यहां ठीक रहा और उसे 14 सीटें हासिल हुईं. 2004 में भाजपा के खाते में 13 सीटें आईं, लेकिन 2009 में ये घटकर सिर्फ नौ रह गईं . जबकि 2009 में भाजपा को अपनी बड़ी जीत की उम्मीद थी. चुनाव से छह महीने पहले ही मुंबई पर आतंकी हमला हुआ था जिसमें 150 लोगों की जान चली गई थी. प्रदेश और केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और भाजपा ने इस हमले को सुरक्षा के मामले पर सरकार की नाकामयाबी बताते हुए मुद्दा बनाया था .
लेकिन पार्टी मुंबई की ही छह लोकसभा सीटों में से एक भी नहीं जीत सकी. 2009 में भाजपा को अपने बेजोड़ नेता प्रमोद महाजन की कमी भी काफी खली जिनकी 2006 में उन्हीं के भाई द्वारा हत्या कर दी गई थी . पिछले साल शिव सेना ने भी अपने संस्थापक बाल ठाकरे को खो दिया. उनके बेटे और राजनीतिक वारिस उद्धव ठाकरे की क्षमताओं पर ज्यादातर लोगों को संदेह है. इसके अलावा उद्धव के चचेरे भाई राज ठाकरे द्वारा 2006 में बनाई गई अलग पार्टी मनसे भी लगातार कांग्रेस विरोधी वोटों को बांटने में कामयाब रही है. इस लिहाज से यहां 2014 का पूर्वानुमान भाजपा के लिए बहुत उजले नहीं दिखाई पड़ते .
पश्चिम बंगाल
पश्चिम बंगाल में भाजपा का अस्तित्व लगभग शून्य ही रहा है. 2009 में पार्टी यहां की कुल 42 में से 40 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. इनमें से सिर्फ पार्टी के दिग्गज जसवंत सिंह ही दार्जीलिंग से जीत पाए. (संयोग से जसवंत सिंह मोदी के कट्टर विरोधी हैं) बंगाल में भाजपा का सबसे अच्छा प्रदर्शन 1999 में रहा था जब उसे दो सीटें हासिल हुई थीं. वाजपेयी ने तुरंत ही दोनों जीते हुए प्रत्याशियों को अपनी सरकार में मंत्री बना दिया था. दोनों 2004 और 2009 के आम चुनाव में खेत रहे.
भाजपा को 1999 में मिली दो सीटों की जीत भी सिर्फ तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन के कारण ही संभव हो पाई थी. तृणमूल कांग्रेस ही राज्य में मुख्य विपक्षी दल थी जिसने 2011 के विधानसभा चुनाव में 34 साल पुराने साम्यवादी गठबंधन को ध्वस्त किया. भाजपा के लिए 2009 का चुनाव और भी ज्यादा दुखद रहा होगा जब उसके बंगाल के दोनों पूर्व सांसद तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों से चुनाव हार गए. तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक बार फिर से भाजपा से हाथ मिला सकती हैं. खास तौर से तब जब उन्होंने कांग्रेस से अपना सात साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया है. लेकिन क्या वे मोदी का नेतृत्व स्वीकार करेंगी? यह काफी मुश्किल है. पश्चिम बंगाल के लगभग एक चौथाई मतदाता मुस्लिम हैं और तृणमूल के 19 में से दो सांसद भी. ऐसे में ममता बनर्जी मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए समर्थन देने से बचना ही चाहेंगी.
आंध्र प्रदेश
जहां तक आंध्र प्रदेश में भाजपा की संभावनाओं की बात है तो इस बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा. 2009 के आम चुनाव में पार्टी ने प्रदेश की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 37 पर उम्मीदवार खड़े किए थे लेकिन किसी को संसद में जाने का मौका नहीं मिला. हालांकि इससे पहले भाजपा यहां उम्मीद जगाने वाला प्रदर्शन कर चुकी थी. तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के साथ मिलकर जब उसने 1999 के आम चुनाव में भागीदारी की थी तब उसे सात सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन पिछले दो आम चुनावों से उसका एक भी उम्मीदवार संसद नहीं पहुंच पा रहा है. विधानसभा चुनावों में भी उसका प्रदर्शन इतना ही बुरा रहा है. 2009 के चुनावों में प्रदेश की 294 सीटों में से 271 पर भाजपा के उम्मीदवार थे. इनमें से दो के अलावा सभी को हार का मुंह देखना पड़ा. 1998-99 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनवाने में टीडीपी की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी. 2004 में यह रिश्ता टूट गया. अब अगर यह जुड़ता भी है तो इससे किसी चमत्कार के होने की खास संभावना नहीं है क्योंकि टीडीपी खुद अपनी चमक खो चुकी है. 2004 के विधानसभा चुनाव में जनता ने पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया था. 1999 के आम चुनाव में जहां उसके पास राज्य की 42 में से 29 सीटें थीं वहीं 2004 और 2009 के आम चुनावों में इनकी संख्या छह से आगे नहीं बढ़ पाई. इस बार प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वाईएसआर रेड्डी के बेटे जगनमोहन अपनी नई पार्टी के साथ कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले हैं. इन जटिल समीकरणों के बीच टीडीपी 2009 के आम चुनावों में 31 सीटें जीतने वाली कांग्रेस के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने की कोशिश करेगी.
बिहार
2009 में भाजपा को 12 सीटों पर जीत मिली थी. पार्टी के इस प्रदर्शन की 2004 के आम चुनाव, जब उसकी झोली में सिर्फ चार सीटें आई थीं, से तुलना करें तो साफ होता है कि जदयू से गठबंधन उसके लिए फायदेमंद साबित हुआ. इससे पहले 1998 के आम चुनावों में जब भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी तब भी आज के बिहार में उसके पास महज आठ सीटें थीं (शेष 12 सीटें झारखंड वाले हिस्से में थीं). इस समय भाजपा के बड़े नेता दावा कर रहे हैं कि यदि जदयू अगले साल आम चुनाव से पहले गठबंधन से अलग होता है तो उसे बिहार में काफी नुकसान उठाना पड़ेगा, पर सच्चाई उलट हो सकती है. जदयू की वजह से भाजपा को पिछड़े और मुस्लिम दोनों वर्गों के वोट मिले हैं. 1996 में जब वह पहली बार लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी तब उसे बिहार में सिर्फ छह सीटें हासिल हुई थीं. 1991 में राम मंदिर अभियान के समय जब उसने पहली बार लोकसभा सांसदों के मामले में तीन अंकों का आंकड़ा पार किया था तब तो बिहार में उसका खाता शून्य पर पहुंच गया था. इससे पहले 1989 में वर्तमान बिहार में भाजपा को 40 में से महज चार सीटों पर जीत मिली थी (इनमें झारखंड की सीटें शामिल नहीं हैं).
तमिलनाडु
यहां लोकसभा की 39 सीटें हैं. अतीत में भाजपा के पास एक ऐसा मौका आया है जब उसने इस राज्य से बड़ी उम्मीदें बांध ली थीं. 1998 के आम चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियों को चौंकाते हुए उसने न सिर्फ यहां खाता खोला बल्कि 1999 में हुए आम चुनाव में उसने अपनी सीटें बढ़ाकर पांच कर ली थीं. लेकिन खुशहाली का यह किस्सा यहीं खत्म हो गया और इसके बाद वह राज्य में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीती. आज के हालात में राज्य की दोनों क्षेत्रीय पार्टियां द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम (एआईएडीएमके) के बीच भाजपा के लिए गुंजाइश बहुत कम है. इन दोनों पार्टियों का अतीत बताता है कि वे खांटी अवसरवादी हैं. दोनों ही मोदी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में शामिल होने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर सकती हैं. लेकिन यहां लोकसभा चुनावों में ऐसा दुर्लभता से ही होता है कि एक पार्टी दूसरी का पूरी तरह से सफाया कर दे. यानी इनमें से कोई भी मोदी को समर्थन देती है तो संभावना कम ही है कि वह सीटों के आंकड़े में बहुत बड़ी संख्या जोड़ पाए.
मध्य प्रदेश
मोदी यह बिल्कुल अपेक्षा नहीं कर सकते कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा के बड़े नेता उनका लाल कालीन बिछाकर स्वागत करेंगे. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तो सीधे उनके प्रतिस्पर्धी हैं. वे 13 साल की उम्र से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य हैं. एक हिसाब से तो भाजपा का वर्तमान संकट उसी समय से शुरू हुआ था जब कार्यक्रम में लालकृष्ण आडवाणी ने चौहान की तारीफ करते हुए उन्हें बधाई दी कि उन्होंने गुजरात में मोदी द्वारा किए गए काम की तुलना में मध्य प्रदेश में बेहतर काम करके दिखाया है. यह भी दिलचस्प है कि 2009 के आम चुनाव में चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश से भाजपा के 16 (29 सीटों में से) उम्मीदवार जीते थे, तो वहीं नरेंद्र मोदी के गुजरात में इससे कम 15 (26 सीटों में से). हालांकि पिछले दिनों दो सीटों पर हुए लोकसभा के उपचुनावों में जीत के बाद यह संख्या 17 हो चुकी है. सौम्य स्वभाव के चौहान पार्टी में दिग्गज नेता नहीं हैं लेकिन वे हमेशा से राष्ट्रीय नेताओं के प्रिय रहे हैं. इनमें भाजपा की दूसरी पांत के नेता अरुण जेतली, अनंत कुमार से लेकर सुषमा स्वराज तक शामिल हैं. संघ परिवार भी उनका समर्थन करता है. इस साल नवंबर में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं और मोदी के लिए मुश्किल होगा कि उम्मीदवारों के चयन में वे चौहान की पसंद को नजरअंदाज करें. राज्य में यदि तीसरी बार फिर भाजपा की सरकार बनती है तो लोकसभा चुनावों में भी वे अपने करीबियों को टिकट दिलवाएंगे.
मोदी को याद रखना होगा कि वे चौहान को हल्के में नहीं ले सकते. 2003 में भारी बहुमत के साथ भाजपा को सत्ता दिलाने वाली उमा भारती लाख कोशिशों के बाद भी न चौहान को उनके पद से हटने के लिए मजबूर कर पाईं और न ही भाजपा में वापसी के बाद मध्य प्रदेश में उनका राजनीतिक पुनर्वास हो पाया.
राजस्थान
राजस्थान में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं. इसकी पूरी संभावना है कि राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इनमें मोदी की सक्रियता पर उत्साहित न दिखें. दरअसल राजे अभी से मानकर चल रही हैं कि राज्य में भाजपा को स्पष्ट बढ़त मिली हुई है और वे कांग्रेसनीत सरकार को आसानी से हरा देंगी. उन्हीं के नेतृत्व में भाजपा 2003 के विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता में आई थी. हालांकि यह प्रदर्शन 2008 में वे दोहरा नहीं पाईं और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई. चौहान की तरह ही यदि वे राजस्थान में भाजपा को जिता पाईं तो अगले साल होने वाले आम चुनाव में राज्य की लोकसभा सीटों पर उम्मीदवारों के चयन में मोदी एकतरफा फैसला नहीं ले पाएंगे. राजस्थान भाजपा के लिहाज से इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि यहां की कुल 25 लोकसभा सीटों में से फिलहाल उसके पास मात्र चार सीटें हैं. यानी अगले आम चुनाव में उसके पास बड़ा मौका होगा.
कर्नाटक
आगामी आम चुनाव में बहुत कम वक्त बचा है और उसे देखते हुए अगर मोदी कर्नाटक से दूरी बनाए रखने का फैसला करते हैं तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं होनी चाहिए. 2009 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य की 28 में से 18 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. यह आंकड़ा गुजरात में उसे हासिल सीटों से बेहतर था. लेकिन तीन माह पहले कर्नाटक की सत्ता गंवाने के बाद से वहां पार्टी जनता दल (सेक्युलर) से भी पिछड़ते हुए तीसरे स्थान पर खिसक गई. पार्टी को राज्य के मुख्यमंत्री रहे कद्दावर नेता बीएस येदियुरप्पा ने भी अपूरणीय क्षति पहुंचाई. भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद भाजपा से इस्तीफा देने वाले येदियुरप्पा ने नई पार्टी बना ली और पुरानी पार्टी के महत्वपूर्ण वोट काट लिए.
उड़ीसा
उड़ीसा में मोदी के सफल होने की गुंजाइश कम ही है. राज्य के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने कहा है कि भाजपा के इस नए नायक के पास देश की समस्याओं को हल करने के लिए कम ही सुझाव हैं. वर्तमान में उड़ीसा से भाजपा का एक भी सांसद नहीं है. 1999 में बीजू जनता दल (बीजद) की लहर पर सवार भाजपा को 21 में से नौ सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी. वर्ष 2004 में पार्टी को सात सीटों पर जीत हासिल हुई और उसने 1998 के अपने प्रदर्शन की बराबरी कर ली. लेकिन संघ से जुड़े लोगों की ईसाई विरोधी हिंसा से नाराज पटनायक ने 2009 के आम चुनाव से एक महीने पहले गठबंधन तोड़ दिया. भाजपा का वहां से सफाया हो गया. जाहिर है कि मोदी वहां कोई करामात नहीं कर पाएंगे.
झारखंड
20 से कम लोकसभा सीटों वाले राज्यों में झारखंड शामिल है. भाजपा एक समय यहां सत्ता पर काबिज रह चुकी है. 14 लोकसभा सीट वाले इस प्रदेश में उसे सन 1996 और 1998 के चुनावों में 12 सीटें जीतने में कामयाबी मिली थी. लेकिन 2004 में यहां उसका सफाया हो गया. हालांकि 2009 में उसने कुछ हद तक वापसी की और सात सीटों पर जीत हासिल की. लेकिन आज राज्य के बिखरे राजनीतिक हालात को देखते हुए लगता नहीं कि मोदी और भाजपा 1996 और 1998 वाली कामयाबी दोहरा पाएंगे.
दिल्ली
भाजपा शिद्दत से चाह रही होगी कि मोदी राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पार्टी की हालत सुधार दें. यहां सात लोकसभा सीटें हैं. 1999 में भाजपा ने यहां सभी सीटों पर जीत हासिल की थी. इससे पहले 1989 में उसे चार, 1996 में पांच और 1998 में छह सीटों पर जीत मिली थी. लेकिन 2004 में उसे बड़ा झटका लगा और पार्टी एक को छोड़कर सभी सीटों पर हार गई. 2009 में तो वह इकलौती सीट भी चली गई और पार्टी का सफाया हो गया.
अन्य राज्य
बहरहाल भाजपा को छत्तीसगढ़ में अच्छी-खासी सीटें मिल सकती हैं जहां अभी उसके 11 में से 10 सांसद हैं. पिछले महीने हुए नक्सली हमले में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के मारे जाने के बाद प्रदेश में पार्टी और अधिक कमजोर हुई है. लेकिन असम में जहां भाजपा के 14 में से चार सांसद हैं वहां मोदी के लिए यह संख्या बढ़ाना आसान नहीं होगा क्योंकि यह अब तक का पार्टी का सबसे अच्छा प्रदर्शन है. हरियाणा में जहां भाजपा 1999 में 10 में से पांच सीटें जीतने में सफल रही थी वहां भी 2009 में उसका सफाया हो गया. राज्य में उसके पूर्व सहयोगी दलों की हालत और भी खस्ता है. केरल में वामपंथी गठबंधन और कांग्रेस गठबंधन हावी हैं और दोनों ही भाजपा के खिलाफ हैं.
फिर क्या होगा?
तो फिर मोदी कहां पहुंचेंगे? अगर 1984 से लेकर अब तक भाजपा के राज्यवार सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन की एक सूची बनाई जाए तो भी आंकड़ा कुल 251 सीटों तक पहुंचता है जो सामान्य बहुमत से 21 कम है. अगर मोदी चमत्कारिक रूप से यहां तक भी पहुंच जाते हैं तो भी उनके लिए महाराष्ट्र में शिवसेना, पंजाब में अकाली दल और तमिलनाडु में द्रमुक या अन्नाद्रमुक के अलावा अपना कोई अन्य हिमायती तलाश पाना मुश्किल होगा.
कहा जा सकता है कि ये तो अतीत के आंकड़े हैं और इनसे भविष्य की तस्वीर ऐसी ही होगी, यह बात निश्चितता के साथ नहीं कही जा सकती. लेकिन इन आंकड़ों से यह अंदाजा तो लग ही जाता है कि अगले आम चुनाव में भाजपा और मोदी की राह कितनी कठिन है. विश्लेषक मानते हैं कि मोदी के लिए हो रहे इस मौजूदा शोर में उतनी ऊर्जा नहीं है जितनी उन अभियानों में देखने को मिली थी जिन्होंने भाजपा को अतीत में दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाया. 1980 में बनी भाजपा को 1984 के लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें मिली थीं.
उस चुनाव में कांग्रेस ने इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उठी शोकलहर पर सवार होकर भारी जीत हासिल की थी. यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज चुनाव हार गए थे. लेकिन पांच साल बाद भाजपा ने 89 सीटों के साथ वापसी की. 1991 में वह 121 सीटों तक जा पहुंची. इन दोनों विजयों में अयोध्या राममंदिर निर्माण के लिए छेड़े गए देशव्यापी अभियान की अहम भूमिका थी. उस अभियान की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ 16 साल और चार आम चुनावों का सामना करने के बाद भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी बन गई. इतने कम वक्त में ही उसने आजादी की लड़ाई लड़ने वाली एक सदी पुरानी कांग्रेस को पछाड़ दिया.
राम मंदिर लहर के दौरान 1991 में जब पहली बार पार्टी के 100 से ज्यादा सांसद जीते तो बिहार में उसका खाता शून्य पर पहुंच गया था1998 और 1999 में भाजपा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में चुनाव लड़ी थी. संजीदा, समझदार और अनुभवी राजनेता की छवि रखने वाले वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर उसे दोनों बार केंद्र की सत्ता हासिल हुई. लेकिन जब उनकी सरकार भी पुरानी सरकारों जैसी ही निकली तो 2004 में जनता ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया. क्या मोदी के पास वाजपेयी जैसी अपील है?
कम से कम इस वक्त तो ऐसा नहीं लगता. 2002 में गुजरात दंगों के बाद मोदी की एक कट्टर नेता की छवि बनी थी जिसके सहारे वे गुजरात की सत्ता में लौटे. लेकिन यह भी अब 11 साल पुरानी बात हो चुकी है और अब इसके सहारे उतने वोट नहीं बटोरे जा सकते जितने वोटों की मोदी उम्मीद कर रहे होंगे. भाजपा ने 2004 और 2009 के चुनावों में उनकी इस छवि का इस्तेमाल किया भी था, लेकिन नतीजे बहुत उत्साहजनक नहीं रहे. 2009 में मुंबई में मोदी ने जमकर प्रचार किया फिर भी पार्टी वहां की सभी छह सीटों पर हार गई. यह 26/11 के हमले के बाद की बात है. तुलनात्मक रूप से देखें तो 1990 के दशक में अयोध्या आंदोलन के चलते आम मानस में भाजपा की कट्टर हिंदूवादी छवि कहीं अधिक प्रभावी थी जिसका फायदा उसे 1996, 1998 और 1999 के चुनावों में मिला भी.
मोदी का दूसरा दांव है अच्छे प्रशासन और 11 साल मुख्यमंत्री रहते हुए गुजरात में किए गए विकास का दावा. लेकिन इसमें भी उतना दम नहीं लगता कि उनके लिए पूरे देश में वोटों का तूफान खड़ा हो जाए. पिछले दिनों जब आडवाणी ने कहा कि गुजरात पहले से ही विकसित था और मोदी ने सिर्फ उसकी हालत सुधारी है तो वे तो निश्चित रूप से राजनीति कर रहे थे, लेकिन अगर यह बात पूरी तरह गलत होती तो आडवाणी ऐसा कहते ही नहीं. अब जब आम चुनाव करीब हैं तो स्वाभाविक ही है कि गुजरात में अच्छे प्रशासन और आर्थिक विकास के मोदी के दावों की पहले के मुकाबले कहीं सघन समीक्षा की जाएगी.
तो सवाल यह उठता है कि भाजपा के भीतर और बाहर मोदी समर्थक उनके पार्टी की चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनने पर इतने अधिक उत्साहित क्यों हैं. इसका जवाब आसान है. कई बार व्यक्ति के उठान में उसकी खूबियों से ज्यादा परिस्थितियों का भी हाथ होता है. दरअसल भाजपा में विश्वसनीय नेतृत्व का पूर्णतया अभाव है. भले ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली मनमोहन सिंह सरकार की छवि पर कई बट्टे लग चुके हों फिर भी भाजपा के मन में संशय है कि शायद सिर्फ सरकार के खिलाफ पड़ा वोट उसे दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त न हो.
भाजपा की प्रचार मशीनरी ढोल पीट रही है कि पार्टी के कार्यकर्ता आगामी चुनाव में एकमत से मोदी का नेतृत्व चाहते हैं. अगर यह सच भी है तो इसे तभी सही माना जा सकता है जब कस्बों और शहरों में पार्टी कार्यकर्ता ऐसी मांग के साथ नजर आने लगें. जानकारों के मुताबिक जो बात सच है वह यह है कि भाजपा में दूसरी, तीसरी और चौथी पांत के नेताओं और उनके खेमों को लग रहा है कि अगले साल का आम चुनाव उनके लिए केंद्र की सत्ता और उससे जुड़े फायदों तक पहुंचने का आखिरी मौका है. उनका मानना है कि 2009 में फेल हुए आडवाणी उन्हें यह मौका नहीं दे सकते इसलिए उन्होंने मोदी पर दांव लगाया है.
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