गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014
भूमाफिया के चंगुल में फंसा सहकारिता विभाग
भोपाल।जमीन की जंग को अब असली जंग लग चुकी है और जितने भी भूमिगत भूमाफिया थे वे फिर सीना ठोंककर गृह निर्माण संस्थाओं की जमीन के खेल में जुट गए हैं, जिस सहकारिता विभाग की मिलीभगत के चलते मुख्यमंत्री ने इंदौर सहित प्रदेशभर में संस्थाओं की जमीनों के महाघोटालों को पुलिस प्रशासन की सहायता से उजागर करवाया था, अब वही सहकारिता विभाग एक बार फिर भूमाफिया के चंगुल में फंस गया है। धड़ाधड़ एनओसी के साथ नगर तथा ग्राम निवेश से अभिन्यास मंजूर होने लगे। बिजलपुर मेें इंदौर क्लॉथ मार्केट गृह निर्माण की साढ़े 8 एकड़ जमीन तैय्यबी रियल एस्टेट के हवाले हो गई। संस्था के 185 भूखंडों की इस डाकेजनी में 100 करोड़ की हेराफेरी की गई।
तीन साल पहले जोर-शोर से गृह निर्माण संस्थाओं के फर्जीवाड़े की जांच पड़ताल पुुलिस प्रशासन ने शुरू की थी और कई चर्चित भूमाफिया जेल भी गए, क्योंकि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का लगातार दबाव बना हुआ था। मगर जैसे ही यह दबाव समाप्त हुआ और प्रशासन के साथ-साथ पुलिस पर मिलीभगत के आरोप लगे, इस अभियान ने दम तोडऩा शुरू कर दिया। पिछले एक साल से तमाम भूमिगत हुए भूमाफिया फिर सक्रिय हो गए और तमाम गृह निर्माण संस्थाओं की जमीनों की अफरा-तफरी पहले की तरह शुरू हो गई और हजारों भूखंड पीडि़त अब फिर अपनी शिकायतों को लेकर चप्पलें घिस रहे हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण इंदौर क्लॉथ मार्केट का है, जिसकी ग्राम बिजलपुर में साढ़े 8 एकड़ जमीन थी। खसरा नंबर 13/1, 13/6, 12/2, 13/5, 13/7 की ये जमीनें संस्था के सदस्यों की आवास समस्या हल करने के लिए मूल जमीन मालिक जगजीतसिंह व हरजिंदरसिंह से 1996 में खरीदी। बाद में यही जमीन नाकोड़ा और नवभारत गृह निर्माण को भी बेच दी गई। कुछ समय पूर्व नवभारत संस्था के कर्ताधर्ताओं ने यह जमीन तैय्यबी रियल एस्टेट प्रायवेट लिमिटेड के मोहम्मद पिता अब्दुल खम्बाती को बेच डाली, जबकि इंदौर क्लॉथ मार्केट संस्था के 185 सदस्यों को 1500 स्क्वेयर फीट के भूखंड इस साढ़े 8 एकड़ जमीन में से प्राप्त होना थे। 3 हजार रुपए स्क्वेयर फीट से अधिक वर्तमान में इस जमीन का मूल्य है और 185 भूखंडों पर सीधे-सीधे डाका डालते हुए 100 करोड़ रुपए की हेराफेरी कर दी गई। मजे की बात यह रही कि इंदौर क्लॉथ मार्केट गृह निर्माण संस्था के अध्यक्ष सीताराम पिता देवकिशन व्यास ने स्थायी लोक अदालत के माध्यम से मूल जमीन मालिक हरजिंदरसिंह, जगजीतसिंह से लेकर सत्यनारायण बजाज, पॉवर अटॉर्नी लेने वाले मदनलाल पिता छोगालाल जैन के अलावा नाकोड़ा गृह निर्माण और नवभारत गृह निर्माण के साथ तैय्यब अली रियल एस्टेट के मामले में समझौता करते हुए 31-8-2013 को अवॉर्ड पारित करवा लिया। इसकी भनक इंदौर क्लॉथ मार्के ट गृह निर्माण के मूल 185 सदस्यों को लगी ही नहीं और फर्जी बनाए गए सदस्यों के माध्यम से बुलाई गई साधारण सभा में लिए गए निर्णय और ठहराव-प्रस्ताव को प्रस्तुत कर स्थायी लोक अदालत जिला न्यायालय में राजीनामा कर लिया गया। इस राजीनामे में यह कहा गया कि सदस्यों द्वारा जमा की गई राशि 12 प्रतिशत ब्याज के साथ तैय्यबी रियल एस्टेट द्वारा लौटाई जाएगी और इस संबंध में जमीन पर विकास कार्य करने, भूखंडों को विक्रय करने और अपनी इच्छानुसार उपभोग, उपयोग व्ययन के अधिकार भी तैय्यबी रियल एस्टेट को रहेंगे। इतना ही नहीं इसके पूर्व एक अनुबंध लेख भी तैय्यबी रियल एस्टेट और नाकोड़ा गृह निर्माण संस्था के अध्यक्ष निलेश पिता जसवंतलाल शाह और क्लॉथ मार्केट संस्था के संरक्षक अमित पिता ब्रजमोहन के बीच हुआ, जिसमें 7.44 एकड़ जमीन के सौदे के फलस्वरूप प्रतिफल राशि 13 करोड़ रुपए तय की गई और बतौर बयाने के 1 लाख रुपए लेना बताए गए और शेष 12 करोड़ 99 लाख की राशि भूखंडों के विक्रय पश्चात तैय्यबी रियल एस्टेट द्वारा प्रदान की जाएगी। इतना ही नहीं 50 लाख रुपए की राशि अमित पिता ब्रजमोहन को पूर्व में अदा करना बताई गई। इस लोक अदालत में मंजूर अवॉर्ड और अनुबंध के आधार पर तैय्यबी रियल एस्टेट ने सहकारिता विभाग से एनओसी भी प्राप्त कर ली।
उपायुक्त सहकारिता जगदीश कनोजे द्वारा इस तरह की एनओसी कई संस्थाओं को दे दी गई, जबकि पूर्व के उपायुक्त ने ऐसी तमाम एनओसी पर न सिर्फ रोक लगाई थी, बल्कि पुलिस प्रशासन की जांच में यह तमाम एनओसी अवैध पाई गई, जिसके चलते सहकातिा विभाग के कई अफसरों और निरीक्षकों के खिलाफ विभागीय जांच शासन ने शुरू करवाई, मगर इंदौर क्लॉथ मार्केट गृह निर्माण की बिजलपुर स्थित साढ़े 8 एकड़ जमीन अब पूरी तरह तैय्यबी रियल एस्टेट के हवाले हो गई, जिस पर नगर तथा ग्राम निवेश से पिछले दिनों नक्शा मंजूर करवा लिया गया। अब संस्था के मूल 185 सदस्य संघर्ष समिति के माध्यम से अपने हितों की लड़ाई लड़ रहे हैं और कलेक्टर से लेकर अदालत और सहकारिता विभाग के संयुक्त पंजीयक न्यायिक के समक्ष भी याचिका प्रस्तुत की है। 185 भूखंडों की इस डाकेजनी में सीधे-सीधे 100 करोड़ रुपए की हेराफेरी की गई और इसमें भी शहर के तमाम चर्चित भूमाफिया शामिल हैं।
जमीन सीलिंग प्रभावित, संस्था के नाम से हटी तो सरकार की....
बिजलपुर में इंदौर क्लॉथ मार्केट ने 1995 में जो साढ़े 8 एकड़ जमीन खरीदी वह सीलिंग प्रभावित थी और उसे सीलिंग से मुक्ति के लिये ही नाकोड़ा गृह निर्माण ने नवभारत गृह निर्माण से समझौता किया था, क्योंकि नाकोड़ा गृह निर्माण संस्था नई होने के कारण उसे सीलिंग मुक्ति की पात्रता नहीं थी। संस्था के नाम किए जाने पर उसे सरकार ने धारा 20 से विमुक्ति आदेश यानी सीलिंग मुक्त किया। अब यदि जमीन किसी निजी व्यक्ति के नाम पर होती है तो वह फिर सीलिंग प्रभावित होकर सरकार की हो जाएगी। लेकिन इस जानकारी के अभाव में उक्त जमीन का नामंतरण निजी नाम से हो गया है। जांच अधिकारी अब इस मामले की जांच कर उक्त भूमि पर शासन का नाम चढ़ा सकते हैं।
नगर तथा ग्राम निवेश से नक्शा भी मंजूर
पहले इंदौर क्लॉथ मार्केट के कर्ताधर्ताओं ने तैय्यबी रियल एस्टेट को जमीन बेची और फिर नाकोड़ा तथा नवभारत के साथ अनुबंध भी कर लिया। इसके आधार पर स्थायी लोक अदालत से अभी पिछले दिनों 31-8-2013 को अवॉर्ड पारित करवा लिया गया और इसमें जो राजीनामा मंजूर हुआ उसके आधार पर सहकारिता उपायुक्त जगदीश कनोजे ने एनओसी तैय्यबी रियल एस्टेट के पक्ष में हांसिल कर ली गई और नगर तथा ग्राम निवेश से इसी एनओसी के आधार पर अभिन्यास पिछले ही दिनों मंजूर करवा लिया गया। संयुक्त संचालक नगर तथा ग्राम निवेश संजय मिश्र ने बिजलपुर की इस संस्था की जमीन पर मंजूर किए गए। अभिन्यास की पुष्टि करते हुए बताया कि चूंकि लोक अदालत का राजीनामा और उसके आधार पर सहकारिता विभाग की एनओसी मिली जिस पर अभिन्यास मंजूर करना पड़ा।
कलेक्टर ने बनाई जांच कमेटी
संघर्ष समिति की ओर से इंदौर कलेक्टर आकाश त्रिपाठी को भी मयप्रमाण शिकायत सौंपी गई, जिसमें भूमाफियाओं के हाथों सदस्यों की जमीनों के विक्रय के प्रमाण भी दिए गए। नतीजतन कलेक्टर ने एक कमेटी बनाकर इसकी जांच शुरू करवाई, जिसमें अपर कलेक्टर रवीन्द ्रसिंह और सहकारिता विभाग के संयुक्त पंजीयक न्यायिक अनिल कुमार वर्मा शामिल हैं।
संस्था पर व्यास परिवार का कब्जा
इंदौर क्लॉथ मार्केट संस्था पर शुरु से ही व्यास परिवार का कब्जा रहा है। संघर्ष समिति के विशाल शर्मा का आरोप है कि पूर्व अध्यक्ष सीताराम व्यास ने अपने सगे साले अश्विन कुमार हीरालाल को अध्यक्ष बनाया और अपनी बेटी श्रीमती करुणा पति रामकुमार शर्मा को उपाध्यक्ष। अपने सगे भाई गोपाल देवकिशन व्यास को संचालक, अपने साले देवकीनंदन रामचंद्र तिवारी को भी संचालक और एक अन्य सगे भतीजे अमित राधेश्याम व्यास को भी संचालक और बहन पुष्पा को भी इसी तरह निर्वाचित करवाया और वर्तमान अध्यक्ष अश्विन कुमार बरमोटा भी पूर्व अध्यक्ष व्यास के ही साले हंै।
सदस्यों के हित डेढ़ करोड़ में बेचे
इंदौर क्लॉथ मार्केट के कर्ताधर्ताओं ने 185 मूल सदस्यों को अंधेरे में रखकर फर्जी सदस्यों की बोगस आमसभा 21-7-2013 को आयोजित की और उसमें यह प्रस्ताव भी पारित कर दिया कि संस्था यह स्वीकार करती है कि सदस्यों की अमानत राशि 87 लाख 2 हजार 950 रुपए तथा 1-4-1998 से 31-12-2009 तक 4 प्रतिशत ब्याज और फिर 1-1-2010 से 31-3-2012 तक 12 प्रतिशत की ब्याज राशि 64 लाख 40 हजार 184 रुपए होती है। इस तरह कुल 1 करोड़ 51 लाख 43 हजार 134 रुपए तैय्यबी रियल एस्टेट द्वारा दिए जाएंगे, ताकि यह राशि सदस्यों को लौटाई जा सके। यानी 185 सदस्यों के 100 करोड़ रुपए कीमत के भूखंडों के हितों को बोगस आमसभा के जरिए मात्र डेढ़ करोड़ रुपए में बेच डाला।
नाकोड़ा और नवभारत भी
इस फर्जीवाड़े में शामिल
बिजलपुर में साढ़े 8 एक ड़ जमीन इंदौर क्लॉथ मार्केट संस्था द्वारा खरीदी गई और 8 हिस्सों में इसकी रजिस्ट्री करवाई गई, लेकिन 8 महीने बाद ही संस्था के तत्कालीन अध्यक्ष ओमप्रकाश व्यास ने यह जमीन नाकोड़ा गृह निर्माण को बेच डाली। वहीं नाकोड़ा के चेक तक बाउंस हो गए। बावजूद इसके संचालकों ने कोई कार्रवाई नहीं की और मदनलाल जैन ने आम मुख्त्यार बनकर यही जमीन नवभारत गृह निर्माण संस्था को बेच डाली और फिर त्रिपक्षीय अनुबंध 8 दिसम्बर 1999 को इंदौर क्लॉथ मार्केट, नाकोड़ा और नवभारत के बीच किया गया, जिसमें नवभारत को क्लॉथ मार्केट के सदस्यों को भूखंड उपलब्ध कराना तय किया गया। इस पूरे घोटाले में इंदौर क्लॉथ मार्केट के नाकोड़ा और नवभारत का फर्जीवाड़ा भी शामिल रहा।
संघर्ष समिति की याचिका पर
अब जारी हुए नोटिस
इंदौर क्लॉथ मार्केट संस्था के मूल 185 सदस्यों ने संघर्ष समिति गठित की और सहकारिता उप पंजीयक न्यायिक के समक्ष याचिका भी दायर की।
आप इफेक्ट के चक्कर में फंसी मप्र सरकार
5 माह में 500 करोड़ का करंट लगेगा कंपनियों को
1 करोड़ उपभोक्ता बिजली के झटके से बचे
भोपाल। 15,000 करोड़ रूपए के घाटे में चल रही बिजली कंपनियों को आगामी पांच में 500 करोड़ रूपए का फटका लगने वाला है। दरअसल,दिल्ली की आप सरकार ने बिजली की दरें जिस प्रकार से कम की है उसको लेकर अब हर प्रदेश में ऐसी ही मांग उठ रही है। कहीं बिजली की दरों को लेकर प्रदेश में बवाल न मच जाए और लोकसभा चुनाव के गणित कहीं उल्टे न पड़ जाए इसलिए प्रदेश सरकार ने अपने लिए गए निर्णय से चार कदम पीछे हटकर विद्युत नियामक आयोग के सामने यह कहा कि बिजली की दरे यथावत रखी जाए। इससे जून तक तीनों बिजली कंपनियों को करीब 500 करोड़ रूपए का घाटे का करंट लगने वाला है। हालांकि इससे प्रदेश के 1 करोड़ उपभोक्ताओं को कुछ महिनों के लिए राहत जरूर मिल गई है।
इस साल नहीं बढ़ेंगी बिजली की दरें
सरकार ने वित्तीय वर्ष 2014-15 में बिजली दरें न बढ़ाने का निर्णय लिया है। यही वजह है कि 21 जनवरी को नियामक आयोग को जो टैरिफ भेजा गया है उसमें बिजली दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया। इसके पीछे बिजली कंपनी जो कारण बता रही हैं उसके अनुसार सासन पॉवर प्लांट से उन्हें सस्ती दर में 235 मेगावॉट बिजली मिल रही है। इसके अलावा आगामी कुछ महीनों में यहा 235 मेगावॉट के चार नए प्लांट शुरू होने जा रहे हैं। वहीं बिजली कंपनियों का कहना है कि उन्होंने लाइन लॉस काफी मात्रा में कम कर लिया और अन्य प्रदेशों को महंगी दरों पर बिजली बेचकर भी फायदा कमाया है। कंपनियों का कहना है कि वर्ष 2013-14 में उन्हें करीब 2000 हजार रुपए का घाटा हुआ है जो आगामी वित्तीय वर्ष में कम कर लिया जाएगा। इसी वजह से इस साल घरेलू या व्यवसायिक बिजली में बढ़ोत्तरी का प्रावधान नहीं किया गया। जबकि हकीकत यह है कि अगले कुछ माह में लोकसभा चुनाव होना है। यदि बिजली कंपनी बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी करतीं तो यह चुनावी मुद्दा बन सकता था इस वजह से भी टैरिफ में कोई बदलाव नहीं किया गया।
हर यूनिट पर 1.34 रुपए मुनाफा फिर भी 2000 करोड़ का घाटा
प्रदेश में बिजली बनाने के लिए हर यूनिट पर 3.56 रुपए खर्च होते हैं। उत्पादन में 2.56 रुपए और डिस्ट्रीब्यूशन व ट्रांसमिशन पर एक रुपए। लेकिन उपभोक्ताओं को ((100 यूनिट महीने की खपत)) पर एक यूनिट बिजली के लिए कंपनी को 4.90 रुपए चुकाने होते हैं। यानी हर यूनिट पर बिजली कंपनी हमसे 1.34 रुपए मुनाफा कमा रही है। इसके लिए उपभोक्ताओं से कई तरह के चार्ज भी वसूले जाते हैं। बावजुद इसके पिछले वित्तीय वर्ष में बिजली कंपनियों को करीब 2000 करोड़ का घाटा उठाना पड़ा। ऊर्जा सलाहकार डी. राधेकृष्णा कहते हैं कि तीनों ही कंपनियां शुरू से घाटे में हैं। कंपनियों के लगातार घाटे में बने रहने की मुख्य वजह इनकी वितरण हानियां और बिलिंग की समस्या है। तीनों कंपनियों के लिए मध्य प्रदेश नियामक आयोग ने, जो हानियों की दर तय की है, वे पूर्व क्षेत्र के लिए 24 फीसदी, पश्चिम क्षेत्र के लिए 22 फीसदी और मध्य क्षेत्र के लिए 26 फीसदी है। इन तीनों कंपनियों की वितरण हानियां इन दरों से तीन-चार फीसदी अधिक है। इसके अलावा बिल संकलन भी तीनों कंपनियों का 70-80 फीसदी के बीच में होता है। इसी के चलते कंपनियों का घाटा लगातार बना हुआ है। हालांकि नियामक आयोग लगातार टैरिफ में बढ़ोतरी कर रहा है। इसके अलावा ईधन के दामों में हुई बढ़ोतरी को हर तिमाही टैरिफ में शामिल करने की अनुमति भी कंपनियों को दी गई है। इसके बावजूद कंपनियों की स्थिति में जल्द ही कोई बड़ा बदलाव देखने नहीं मिलने वाला है। मध्य प्रदेश की वितरण कंपनियों की हानियों में सुधार बहुत धीमी गति से हो रहा है। इसके अलावा बिल संकलन के मामले में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। यही वजह है कि घाटा लगातार बना हुआ है। तीनों कंपनियों की वितरण हानियां निर्धारित लक्ष्य के मुकाबले तीन-चार फीसदी ज्यादा है। देश में अन्य राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों के समान ही मध्य प्रदेश की बिजली वितरण कंपनियों की भी वित्तीय हालात बेहद खराब है। वित्त वर्ष 2010-11 में तीनों कंपनियों का कुल घाटा 2157 करोड़ रुपए था। वित्त वर्ष 2011-12 में घाटा 2141 करोड़ रहा,जबकि 2012-13 यह घाटा 2096 करोड़ था। इसके अलावा तीनों कंपनियों पर कुल कर्ज करीब 15,000 करोड़ रुपए का है, जिसमें बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश सरकार से मिले लोन का है।
15 फीसदी तक कम की जा सकती हैं बिजली की दरें
मप्र विद्युत मंडल के पूर्व चेयरमैन पीएल नैने कहते हैं कि बिजली कंपनियां बिजली की दरें 15 फीसदी तक कम कर सकती हैं। घाटे की दुहाई व तरह-तरह के शुल्क लगाकर हर साल बोझ बढ़ाया जाता है। ब्याज की अवधि कम करके भी बिजली की दरें कम की जा सकती है। उधर,प्रदेश के पूर्व ऊर्जा मंत्री एनपी प्रजापति का कहना है कि प्रदेश में मप्र पावर जनरेटिंग कंपनी लिमिटेड के सतपुड़ा ताप विद्युत गृह, सारणी एवं संजय गांधी ताप विद्युत गृह बीरसिंहपुर में पर्याप्त रखरखाव नहीं होने से कम विद्युत का उत्पादन हुआ, जिससे कंपनी को पिछले तीन सालों में सात हजार करोड़ का नुकसान हुआ।
सबसे महंगी बिजली मध्यप्रदेश में ही मिल रही
भाजपा के तमाम राज्यों की तुलना में सबसे अधिक महंगी बिजली मध्यप्रदेश में ही दी जा रही है, जबकि 10 साल पहले सरकार बनाते वक्त जितनी बिजली उतने दाम का नारा दिया था, लेकिन हर साल बिजली कंपनियां नियमाक आयोग के साथ सांठगांठ कर दरें बढ़वाती रही हैं। मध्यप्रदेश में 500 यूनिट से अधिक की खपत पर 5 रुपए 55 पैसे से अधिक की दर है, जो कि छत्तीसगढ़, गुजरात और राजस्थान की तुलना में अधिक तो है ही वहीं अन्य मदों में भी अधिक राशि वसूल की जाती रही है। प्रदेश में फ्यूल चार्ज के नाम पर बिजली की दरों में चाहे जब इजाफा किया जा रहा है। एक जनवरी से एफएसी (फ्यूल एडस्टमेंट कास्ट) के नाम पर 8 पैसे प्रति यूनिट की बढ़ोतरी कर दी गई। इतना ही नहीं हर तीन माह बाद एफएसी के नाम पर बिजली की दरों में बढ़ोतरी की जा रही है। जुलाई से सितंबर 2013 की तिमाही में 16 पैसे प्रति यूनिट दाम बढ़ाए गए थे। इसी तरह पावर मैनेजमेंट कंपनी (पीएमसी ) ने अक्टूबर से दिसम्बर 2013 की तिमाही में 5 पैसे प्रति यूनिट एफएसी के नाम पर बढ़़ाए जाना प्रस्तावित किया था, लेकिन विधानसभा चुनाव के चलते राज्य सरकार ने उक्त फ्यूल चार्ज को बिल में नहीं बढ़ाया। पीएमसी ने विद्युत नियामक आयोग को जनवरी से मार्च तक के लिए 8 पैसे और विधानसभा चुनाव के दौरान प्रस्तावित 5 पैसे प्रति यूनिट की बढ़़ोतरी का प्रस्ताव भेजा था। जिस पर आयोग ने केवल 8 पैसे बढ़ोतरी की अनुमति दी। अक्टूबर से दिसंबर तक का एफएएसी 5 पैसे बढ़ाने के प्रस्ताव पर याचिका के देने को कहा। मप्र के बिजली अधिकारियों का कहना है कि थर्मल पावर में उपयोग होने वाले कोयले एवं तेल आदि फ्यूल की दामों में बढ़ोतरी होने की वजह से दाम बढ़़ाए जाते हैं। जबकि हकीकत यह है कि प्रदेश में जनरेशन पावर कंपनी (जेनको) के 2932 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट हैं। वहीं गुजरात में 3270 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट हैं।
सबसे बड़ी बात यह है कि गुजरात को कोयले का परिवहन अधिक लगने से उसे अन्य राज्यों की तुलना में कोयला अधिक दामों पर पड़ता है। इसी तरह राजस्थान में 4420 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट होने से उनके यहां कोयले की खपत मप्र से कहीं ज्यादा है। उसके बावजूद वहां पर मप्र से सस्ती बिजली दी जा रही है। उल्लेखनीय है कि अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी के आदेश पर सभी राज्यों में बिजली कंपनियां फ्यूल एडजस्टमेंट कॉस्ट बिजली बिलों में जोड़ रही हैं।
23 प्रतिशत दर बढ़ाने का लिया था प्रस्ताव
जनवरी माह में प्रदेश की तीनों बिजली कंपनियों द्वारा नियामक आयोग के समक्ष हर साल याचिकाएं दायर की जाती हैं जिन पर उपभोक्ताओं से सुझाव तथा आपत्तियां लेते हैं और सुनवाई का ढोंग भी किया जाता है, मगर घाटे का हवाला देकर हर साल बिजली की कीमतें बढ़ाने की अनुमति आयोग देता रहा। इस साल भी बिजली कंपनियों ने 23 प्रतिशत दरों में बढोतरी के प्रस्ताव तैयार किए थे, मगर लोकसभा चुनाव और दिल्ली सरकार के निर्णय के कारण निर्णय लिया गया कि 23 प्रतिशत की बढोतरी के प्रस्ताव को बदलवाया जाए और घरेलू तथा व्यावसायिक दरों में कोई वृद्धि न करने का निर्णय लिया गया।
बिजली की दरें नहीं बढ़ाने के पीछे की कहानी
हर साल ये बिजली कंपनियां नियामक आयोग के समक्ष घाटे का हवाला देकर बिजली की दरें बढ़वा लेती हंै। प्रदेश की मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी,पश्चिमी क्षेत्र विद्युत वितरण और पूर्वी क्षेत्र वितरण कंपनी लगभग 15 हजार करोड़ रुपए के घाटे में चल रही हंै, क्योंकि बिजली चोरी और पारेषण क्षति के कारण घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए ये कंपनियां हर साल नियामक आयोग के माध्यम से बिजली की दरेंं बढ़वा लेती हैं और प्रदेश के ईमानदार बिजली उपभोक्ताओं को अधिक कीमत चुकाना पड़ती रही। यहां तक कि आयोग के अध्यक्ष का पद भी शासन ने बड़ी होशियारी से बदल दिया। पहले जहां सेवानिवृत्त हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति अध्यक्ष हुआ करते थे उसकी जगह शासन ने सेवानिवृत्त नौकरशाहों खासकर मुख्य सचिव को बैठाना शुरू कर दिया, जो शासन की कठपुतली के रूप में काम करते रहे और आम उपभोक्ताओं को राहत देने की बजाय बिजली कंपनियों और शासन का ही पक्ष लेते रहे। मगर नई दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी ने बिजली के मुद्दे को ही जोरदार तरीके से भुनाया और सरकार बनाने के बाद बिजली के दामों में कमी तो कर दी, वहीं पहली बार तमाम बिजली वितरण कंपनियों का ऑडिट कराने का भी निर्णय लिया। अब लाख कांग्रेस, भाजपा आप पार्टी की आलोचना करे, मगर उसके इफेक्ट के चलते तमाम राज्य सरकारों को कई जनहित के फैसले लेना पड़ रहे हैं, उसी कड़ी में शिवराज सरकार ने भी बिजली के दाम नहीं बढ़ाने का फैसला किया और जब से इन कंपनियों का गठन हुआ है उसके बाद यह पहला मौका है जब दरों में कोई इजाफा नहीं किया जा रहा है।
दरअसल अभी लोकसभा चुनाव है और कांग्रेस जोर-शोर से दिल्ली की तर्ज पर इस मुद्दे को यहां भी उठाने की तैयारी में थी और आप पार्टी ने भी इस मुद्दे को हथियार बनाना तय किया था। लिहाजा घबराई शिवराज सरकार ने कंपनियों को निर्देश दिए कि वह इस बार दरों में बढोतरी का प्रस्ताव नियामक आयोग को नहीं सौंपें। इस संबंध में मध्यप्रदेश बिजली प्रबंधन कंपनी की सफाई यह है कि चूंकि अच्छी बारिश के कारण बिजली का उत्पादन बढ़ गया, वहीं शासन सहित अन्य निजी बिजली उत्पादन संयंत्र चालू हो गए हैं, जिसके चलते एक हजार मेगावाट से अधिक सस्ती बिजली प्रदेश को मिलने लगी है। यह बात अलग है कि अभी भी ये सारी बिजली कंपनियां करोड़ों रुपए के घाटे में है और दिल्ली की तर्ज पर इन कंपनियों का भी ऑडिट करवाने की बात जोर पकडऩे लगी है, क्योंकि साल में एक बार नियामक आयोग से दरें बढ़वाने के अलावा एक प्रावधान और कर रखा है कि सिविल कास्ट में बढोतरी के चलते हर तीन-तीन माह में ये कंपनियां बिजली की दर खुदबखुद बढ़ा सकेंगी, इसके चलते पिछले ही दिनों प्रति यूनिट बिजली की दर में कुछ इजाफा हो गया। मगर फिलहाल तो इस साल उपभोक्ताओं को महंगी बिजली के झटके से राहत मिल गई है।
कहीं शुरू होने के पहले ही न उड़ जाए मालवा पॉवर प्रोजेक्ट का फ्यूज
मध्यप्रदेश में बढ़ती हुई बिजली की खपत के लिए लगाए जाने वाले श्री सिंगाजी थर्मल पावर प्रोजेक्ट के द्वितीय चरण की महत्वाकांक्षी परियोजना के प्रारंभ होने से पहले ही प्रदेश सरकार की परेशानी बढ़ गई है। मालवा में प्रथम चरण की परियोजना में 2&600 मेगावॉट की यूनिटें स्थापित करने के बाद मप्र जनरेटिंग कंपनी को द्वितीय चरण में 2&660 मेगावॉट की यूनिटें लगाने की जिम्मेवारी सौंपी गई थी। मप्र पावर जनरेटिंग कंपनी ने इस काम के लिये अगस्त के पहले हफ्ते में टेन्डर भी खोले थे। भारत सरकार के ऊर्जा विभाग ने किसी भी ऐसी विद्युत परियोजना को प्रारंभ करने के जो नियम बनाये हैं उसमें अनेक विभागों की स्वीकृति लेनी पड़ती है। वन एवं पर्यावरण विभाग की अनापत्ति एवं कोल लिन्केज के लिये पूर्व स्वीकृति होना अनिवार्य होता है। परन्तु उपर्युक्त परियोजना हेतु इन दोनों ही स्वीकृति के पहले ही टेन्डर आमंत्रित कर लिये गये । सितंबर माह में विधानसभा चुनाव के पूर्व इस परियोजना के विधिवत उद्घाटन की तैयारी थी। सियायत इस तरह गर्माई कि कांग्रेस द्वारा केन्द्र में ऊर्जा विभाग की कमान थामे राज्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश में चुनाव अभियान की कमान सौंप दी गई। चुनाव उद्घाटन की घोषणा कहीं मुद्दा न बन जाए इसलिये आनन-फानन मप्र शासन के वित्त विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा लगाई गई आपत्ति के कारण न तो मप्र पावर जनरेटिंग कम्पनी और न ही मध्य प्रदेश शासन का ऊर्जा विभाग इस पर कोई निर्णय ले सका। अब भोपाल में लगभग 5000 करोड़ रु. के इस प्रोजेक्ट में शीघ्र आदेश देने के लिये लॉबिंग चल रही है। एलएंडटी कंपनी इस ऑडिट को शीघ्र लेना चाहती है। प्रदेश सरकार में ही अधिकारियों की दो लॉबी काम कर रही हैं। एक तरफ ऊर्जा विभाग के कुछ अधिकारी इस परियोजना को केन्द्रीय पर्यावरण एवं वन विभाग की स्वीकृति एवं बिना कोल लिंकेज के चालू करने पर जोर दे रहे हैं, वहीं कुछ अन्य अधिकारी जिसमें वित्त विभाग के महत्वपूर्ण अफसर भी हैं, चाहते हैं कि परियोजना का आर्डर देने से पहले सभी विभागों से आवश्यक स्वीकृति ले ली जाए, ताकि यह योजना निर्बाध गति से चल सके। इन अधिकारियों का मानना है कि यदि वन एवं पर्यावरण विभाग ने स्वीकृति नहीं दी और कोयले का लिंकेज नहीं मिला तो प्रदेश सरकार की बड़ी रकम फंस जाएगी और प्रदेश सरकार पर अक्षमता और भ्रष्टाचार के आरोप लगेंगे।
दक्षिण के राज्यों को बिजली बेचने की प्लानिंग
बिजली दूसरे राज्यों में बेचने का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा है। प्रदेश सरकार दक्षिण के राज्यों को सबसे बड़ा ग्राहक मान रहा है। जहां बिजली की डिमांड अधिक है। जल्द ही उप्र और आंध्र के बाद कर्नाटक में बिजली बेचने का टेंडर भरा जाएगा। बिजली कंपनी अकेले इन्हीं स्टेट से करीब 500 करोड़ का मुनाफा एक साल के अंदर कमाएगी। प्रदेश में बिजली का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। सरकार अब जरूरत से अधिक बिजली को दूसरे राज्यों में बेचने में जुट गई है। ताकि मुनाफा कमाया जा सके। शुरूआत उत्तरप्रदेश से हुई। जहां अगस्त में 450 मेगावाट और जुलाई में लगभग 750 मेगावाट सप्लाई देना है।
आंध्रप्रदेश में मई 2014 से मई 2015 तक 200 मेगावाट बिजली आपूर्ति करना है। यदि सबकुछ ठीक हुआ तो 500 करोड़ को बिजली बेचकर कंपनी को मुनाफा होगा। पॉवर मैनेजमेंट कंपनी प्रबंध संचालक मनु श्रीवास्तव के मुताबिक फरवरी माह में कर्नाटक में भी टेंडर डाला जाएगा। हमारे पास फिलहाल बिजली पर्याप्त है। उनके मुताबिक आय बढ़ाने के लिए साउथ की स्टेट में अधिक संभावना है। उन्होंने बताया कि ग्रिड की कनेक्टिविटी होने के कारण आसानी से बिजली की सप्लाई हो सकती है।
बिजली टैरिफ पर सरकार का फोकस
लोकसभा चुनाव में कहीं महंगी बिजली झटका न दे दे...इसको लेकर प्रदेश सरकार चिंतित है। बिजली टैरिफ को लेकर बिजली कंपनियों द्वारा नियामक आयोग को भेजे जाने वाले प्रस्ताव सिर्फ इसलिए फाइनल नहीं हो पा रहे, क्योंकि उनमें काट-छांट कर जनता को राहत देने का फॉर्मूला तय नहीं हो पा रहा। पूरी एक्सरसाइज करने के लिए कंपनियों को एक्स्ट्रा समय की जरूरत है।
ऊर्जा मंत्री ने अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार किया कि खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी बिजली टैरिफ को लेकर गंभीर हैं। पूरा फोकस इस बात पर है कि उत्पादन और वितरण के खर्च को कम किया जा सके ताकि जनता को सस्ती बिजली उपलब्ध कराना संभव हो। उन्होंने कहा कि सरकार सब्सिडी बढ़ाकर राहत देने के पक्ष में नहीं क्योंकि यह उपाय अर्थव्यवस्था की सेहत के लिए ठीक नहीं। वैसे भी प्रदेश सरकार बिजली पर 3 हजार करोड़ की सब्सिडी पहले से ही दे रही है।
टाइगर के बाद अब पैंथर भी गायब
वन्य प्राणियों की गणना में सामने आया तथ्य
भोपाल। प्रदेश में 20 से 27 जनवरी तक चली वन्य प्राणियों की गणना में प्रारंभिक तौर पर जो तथ्य सामने आए हैं वह चौकाने वाले हैं। अभी तक जो जानकारी आई है उसके मुताबिक अभयारण्यों में बाघ(टाइगर) के होने के तो बहुत सबुत मिल रहे हैं,लेकिन तेंदुए(पैंथर) के पगमार्क बहुत कम मिल रहे हैं। इससे वन अधिकारियों के होश उड़े हुए हैं। अब तक मिले संकेतों के आधार तेंदुए के अलावा अन्य कई मांसाहारी प्राणियों की संख्या घटने का अंदेशा है,जबकि शाकाहारियों की संख्या में ईजाफा देखने को मिल रहा है। गिनती के बाद सारी जानकारी और डाटा देहरादून स्थित वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया को भेजा जाएगा। वहां से आधिकारिक तौर पर प्रदेश में के वन्य प्राणियों की संख्या की जानकारी जारी होगी।
मांसाहारी वन्य प्राणियों की गणना के अंतिम दिन तक जो आंकड़े सामने आए हैं, उसने वन विभाग की नींद उड़ाकर रख दी है। अभी तक की गणना में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे प्रदेश के जंगलों से तेंदुओं की बादशाहत खत्म होने की संभावना बलवती हो गई है। वन विभाग के तीन दशक पूर्व के आंकड़ों पर यदि नजर दौड़ाई जाए तो वर्ष 1990 तक प्रदेश में बाघ का राज्य कायम रहा। बाघ की बादशाहत खत्म होने के बाद तेंदुओं की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ और बाघ के बाद तेंदुओं ने जंगल की कमान सम्हाल ली। वर्ष 2008- 2009 में की गई वन्य प्राणियों की गणना में 912 तेंदुए पाए गए थे। 2011 के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश 1,010 तेंदुए थे। मध्यप्रदेश छहों टाइगर पार्क कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान, बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान, सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, पेंच राष्ट्रीय उद्यान, पन्ना राष्ट्रीय उद्यान एवं संजय राष्ट्रीय उद्यान के अलावा प्रदेश के अन्य वन क्षेत्रों में बाघ, तेंदुआ, चीतल, सांभर, गौर, जंगली सुअर, भालू, काला हिरण, उडऩ गिलहरी, मूषक मृग, नील गाय, चिंकारा, जंगली कुत्ता इत्यादि बहुतायत में पाए जाते थे। लेकिन 20 से 27 जनवरी तक वन्य प्राणियों की गणना में तेंदुओं के पगमार्क, मल आदि ऐसे कम चिन्ह नहीं मिले हैं जो तेंदुओं की मौजूदगी का अहसास करा रहे हों। संचालक बांधवगढ़ क्षेत्र सुधीर कुमार कहते हैं कि तेंदुओं की असली संख्या वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के बाद ही बताया जा सकता है।
इस बार 20 जनवरी से शुरू हुई वन्य प्राणियों की गणना में अभी तक इंदौर में 6,देवास में 27,रतलाम में 2,मंदसौर में 10,भोपाल में 4 तेंदुए के होने के संकेत मिले हैं। वहीं झाबुआ,नीमच,उज्जैन,शाजापुर,चित्रकूट, मझगवां सतना, नागौद, उचेहरा,सिंहपुर और बरौंधा में तेंदुए के पगमार्क नहीं मिले हैं लेकिन ग्रामीणों ने देखने की पुष्टि की है। हालांकि वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि हो सकता है कि बारिश की वजह से पगमार्क और अन्य चिन्ह मिट गए हों। तेंदुओं की संख्या में कमी हो सकती है लेकिन मौजूदगी होने के पूरे चान्स हैं।
वन्य प्राणियों की गणना से जो रुझान अब तक प्राप्त हुए हैं, उसके मुताबिक मांसाहारी वन्य प्राणियों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है तो वहीं शाकाहारी जीव जन्तु प्रदेश के जंगलों में बहुतायत मात्रा में दिखाई दे रहे हैं। सतना, मैहर,नागौद और सिंहपुर, नागौद,बरौंधा,चित्रकूट में बंदर,जंगली सुअर,सांभर,नीलगाय,खरगोश,हिरण,चिंकारा,भेड़की आदि शाकाहारी के मौजूद होने की जानकारी गणना कार्य में लगे कर्मचारी दे रहे हैं। बताया जाता है कि इस क्षेत्र में भालू को स्पष्ट रूप से तो नहीं देखा गया है लेकिन पेड़ों और जमीन पर खुरचने के निशान मिले हैं जिससे संभावना जताई जा रही है कि यहां पर भालू मौजूद है।
गणना के मापदंड
पंजे के निशान। पेड़ पर खरोंच के निशान। जंगल कितना घना है, जहां बाघ या तेंदुए रह सकते हैं। हिरण या मवेशियों की संख्या, जिनको खाकर वह जीवित रहता हो। गाय या भैंस के मारने के प्रकरण, आदि जानकारी देहरादून भेजी जाती है। वैज्ञानिक तरीके से पता लगाया जाता है कि क्षेत्र में कितने बाघ या तेंदुए हो सकते हंै। इस तरह की गणना 2005, 2008 में और अब 2014 में हुई है।
हर माह दो तेंदुओं की मौत
मध्यप्रदेश के वनों से बाघ की घटती संख्या से चिंतित सरकार को अब तेंदुए की कम होती संख्या ने परेशानी में डाल दिया है। प्रदेश में हर माह औसत दो तेंदुओं की मौत हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष-2002 से लेकर 2012 तक के दस सालों में मध्यप्रदेश में 155 तेंदुओं की मृत्यु रिकॉर्ड की गई, जिनमें से 98 अवैध शिकार के खाते में गए। केवल 2011 में 43 तेंदुए मरे, जिनमें से 21 तस्कर-शिकार के घाट उतर गए।
वन्यजीव विज्ञानी विद्या आत्रेय कहती हैं, अंतरराष्टीय स्तर पर तेंदुओं की खाल और हड्डियों की भारी मांग है। चीन में बाघ की हड्डियों का इस्तेमाल पारंपरिक दवाइयों में किया जाता है। इस समय बाघ संरक्षित जीव है, इसलिए इसकी हड्डियों को पाना काफी मुश्किल है। दूसरी तरफ, तेंदुआ आसानी से उपलब्ध हो जाता है। तेंदुए और बाघ की हड्डियों में अंतर बता पाना काफी मुश्किल होता है। अंतर सिर्फ इतना है कि तेंदुए की हड्डियां छोटी होती हैं, इसलिए अवैध शिकारी इन्हें बाघ के शावक की हड्डियां कहकर बेचते हैं।
डब्ल्यूपीएसआई के मुताबिक वर्ष 2010 में अवैध शिकार के चलते देश में 180 तेंदुओं की मौत हुई थी। डब्ल्यूपीएसआई के मुख्य परिचालन अधिकारी टीटो जोसफ कहते हैं कि इंसान के साथ हुए संघर्ष के बाद हुई मौतों के आंकड़े को भी जोड़ लें तो यह संख्या 328 तक पहुंच जाती है। इस साल के पहले 6 महीनों में अभी तक अवैध शिकार के चलते 79 मौत हो चुकी हैं, जबकि आबादी में घुसने के कारण 90 तेंदुओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा।
सरकार की उदासीनता
दुर्भाग्य से सरकार को इनकी कोई फिक्र नहीं है। वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 के तहत तेंदुआ एक संरक्षित प्राणी है। इसके बावजूद बाघों की तुलना में सरकार ने तेंदुओं के संरक्षण के लिए कोई कार्यक्रम तैयार नहीं किया है। डीएसपी मेरिल लिंच के पूर्व चेयरमैन और अब वाइल्डलाइफ कंजरवेशन ट्रस्ट चला रहे हेमेंद्र कोठारी कहते हैं, हम पहले से ही बाघ परियोजना चला रहे हैं। तेंदुओं की सुरक्षा के लिए भी यही सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए। एक अलग परियोजना के बजाय हमें जंगलों को संरक्षित करने की जरूरत है।
तेंदुओं का लगातार मारा जाना चिंता का विषय है लेकिन सरकार के पास देश में कुल तेंदुओं से संबंधित कोई आंकड़ा नहीं है। बाघों की गणना के लिए राष्ट्रीय स्तर पर हर 4 साल में अभियान चलाया जाता है, लेकिन तेंदुओं की गणना के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जाता है। डब्ल्यूपीएसआई के मुताबिक बीते 10 साल में 1 बाघ की तुलना में 6 तेंदुओं का अवैध शिकार हो रहा है। इसके बावजूद तेंदुओं की अनदेखी हो रही है।
तेंदुए के शिकार के 160 मामले लंबित
मप्र की विभिन्न अदालतों में बाघ के शिकार के 53 मामले और तेंदुए के शिकार के 160 मामले करीब चार दशकों से लंबित हैं। फैसले के लिए लंबित इन मामलों में 20 प्रकरण मप्र के विभिन्न टाइगर रिजर्व में बाघों के अवैध शिकार के हैं।
इन मामलों में अब तक फैसला नहीं
तेंदुए के शिकार का सबसे पुराना प्रकरण 40 वर्ष पूर्व नौ जुलाई 1973 को प्रदेश के शिवपुरी जिले में दर्ज किया गया था, जो अब तक निर्णय के लिए अदालत में लंबित है। प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 39 वर्ष पूर्व 14 फरवरी 1975 से एक और तेंदुए के शिकार का मामला अदालत में अब तक चल रहा है।
बाघों के लिए अच्छी खबर
पन्ना में बाघों की पुनर्बसाहट के अच्छे परिणामों के बाद मध्यप्रदेश को 'टाइगर स्टेटÓ का खोया राष्ट्रीय दर्जा लौटाने की मुश्किल चुनौती का सामना कर रहे वन विभाग के लिए ये ताजा संकेत बेहद अहम हैं। महकमे को प्रदेश के पश्चिमी हिस्से के जंगलों में वन्य प्राणियों की गिनती के दौरान कम से कम चार बाघों की मौजूदगी के निशान मिले हैं। इंदौर रेंज के मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) आर ओखंडियार ने बताया, जंगली जानवरों की गिनती के दौरान हमें रेंज में कम से कम एक बाघ की उपस्थिति के संकेत मिले हैं। उन्होंने बताया कि वन विभाग कोशिश कर रहा है कि बाघ की मौजूदगी के ज्यादा से ज्यादा सबूत जमा किए जाएं, ताकि रेंज के जंगलों में इस प्राणी की बसाहट की तसदीक करने में आसानी हो।
उज्जैन रेंज के सीसीएफ पीसी दुबे ने बताया कि वन्य प्राणियों की गणना के वक्त नजदीकी देवास जिले के उदय नगर क्षेत्र के जंगलों में कम से कम तीन बाघों की मौजूदगी के पुख्ता सबूत मिले हैं। दुबे ने कहा, इनमें से दो बाघों को तो वन विभाग के कर्मचारियों ने अपनी आंखों से देखा है, जबकि एक अन्य बाघ के पदचिन्ह पाए गए हैं। उन्होंने बताया कि उदय नगर क्षेत्र में बाघ की मौजूदगी के बारे में वन विभाग को ग्रामीणों से सूचनाएं प्राप्त होती रही हैं। क्षेत्र में बाघ द्वारा ग्रामीणों के मवेशियों के शिकार के सबूत भी मिले हैं। सीसीएफ ने बताया कि उज्जैन रेंज में बाघों की मौजूदगी के नये संकेतों के मद्देनजऱ वन विभाग इस प्राणी के संरक्षण के लिये नये सिरे से योजना बना रहा है। भारतीय वन्य जीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) की एक रिपोर्ट में मध्यप्रदेश के इंदौर और देवास वन क्षेत्रों में करीब सात बाघों की मौजूदगी का अनुमान पहले ही लगाया जा चुका है। डब्ल्यूआईआई की रिपोर्ट 'स्टेटस ऑफ टाइगर्स, को प्रेडटर्स एंड प्रे इन इंडिया-2010Ó के शीर्षक से जारी की गयी थी।
मास्टर से मास्टरमाइंड बन बैठे त्रिवेदी बंधु
एसटीएफ के बाद लोकायुक्त ने भी कसा शिकंजा
भोपाल। कुछ साल पहले तक कॉलेजों में पढ़ाने वाले पंकज और पीयूष त्रिवेदी देखते ही देखते मप्र की शिक्षण व्यवस्था के नीति निर्धारक बन बैठे। इन दोनों भाईयों के रसूख का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है की बिना उचित योग्यता के ही पंकज त्रिवेदी व्यावसायिक परीक्षा मंडल के सर्वेसर्वा बन बैठे,वहीं उनके भाई पीयूष त्रिवेदी राजीव गांधी प्रद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति बन बैठे। दोनों भाईयों ने अपने-अपने संस्थान को भ्रष्टाचारियों का चारागाह बना दिया। एसटीएफ ने व्यापमं में हुए फर्जीवाड़े का खुलाशा करके पंकज त्रिवेदी की हकीकत सामने ला दिया है। वहीं अब लोकायुक्त के छापे के बाद पीयूष त्रिवेदी की किताब भी खुलेगी,क्योंकि अब आयकर विभाग ने भी तहकीकात में जुटा हुआ है।
लेक्चरर से करोड़पति तक का सफर
पंकज त्रिवेदी ऐसे अफसर निकले हैं, जो दूसरों की तुलना में पैसे कमाने में सबसे आगे थे। लोकायुक्त की टीम ने जब जांच की, तो यह बात सामने आई कि त्रिवेदी का सफर आट्र्स एंड कॉमर्स कॉलेज में बतौर लेक्चरर के रूप में हुआ था। पंकज जो कभी शिक्षक थे बच्चों को नैतिक गुण सिखाया करते थे आज अनैतिकता की सारी सीमा लांघी। राजनीतिक पहुंच और तिकड़म से व्यापमं के डायरेक्टर बने। नियमों को बदलकर इनको परीक्षा नियंत्रक के साथ-साथ डायरेक्टर भी बनाया गया और करोड़ों में खेलने लगे। अपने कार्यकाल के दौरान 60 से अधिक प्रवेश एवं भर्ती परीक्षाओं में जमकर घोटाला किया। उनके खिलाफ नियुक्तियों और पीएमटी घोटाले के मामले में छह प्रकरण भी दर्ज हुए हैं। आज वे जेल में हैं और बाहर रोजाना उनकी करतूतों का एक न एक खुलासा हो रहा है।
अभी तक एसटीएफ ने पंकज त्रिवेदी की कमाई का खलासा किया था उससे सब हैरान थे कि इन्होंने इतनी कमाई किस तरह कर ली। अब लोकायुक्त के छापे में कई खुलासे हुए हैं और कई सामने आने वाले हैं। छापे में लोकायुक्त पुलिस को पंकज त्रिवेदी के इंदौर स्थित मकान से 53 हजार रुपए नकद, 2.25 लाख रुपए के गहने, 1 प्लॉट और दो मकान, एलआईसी की 55 हजार रुपए की पॉलिसी और 3 लाख रुपए के एफडी के कागजात मिले हैं। यह संपत्ति करीब 3 करोड़ रुपए की बताई जा रही है।भोपाल के शाहपुर में बैंक ऑफ बड़ौदा की शाहपुर ब्रांच में एक लॉकर में सोने और चांदी की चीजें मिलीं हैं। इन सब के अलावा कई बेनामी संपतियों के दस्तावे मिले हैं।
फाइलों में फर्जीवाड़े की कहानी
लोकायुक्त के छापे में पंकज और पीयूष त्रिवेदी के ठिकानों से कई फाइलें मिली हैं जिनमें व्यापमं फर्जीवाड़े की कहानियां छिपी हैं। प्रारंभिक जांच में यह तथ्य सामने आया है कि मेडिकल घोटाले के लिए गड़बडिय़ों दो स्तरों पर हुईं। एक तो व्यापमं के स्तर पर और दूसरी पीएमटी के परीक्षा नियम बनाने के लिए जिम्मेदार मध्यप्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग के स्तर पर। नियम यह था कि निजी मेडिकल कॉलेजों में 50 प्रतिशत सीटें राज्य सरकार के कोटे से भरी जाएंगी, लेकिन निजी कॉलेजों को सारी सीटें चाहिए थी, इसके लिए उन्होंने डॉ. जगदीश सागर, संजीव शिल्पकार, सुधीर रॉय और आईएएस अधिकारी के रिश्तेदार तरंग शर्मा जैसे दलालों का हाथ थामा और दलाल अपने मनचाहे छात्रों को पास करवाने के लिए यूपी, बिहार, राजस्थान से जिन 'स्कोररÓ को लेकर आते थे, उनका उपयोग करना शुरू किया। ये 'स्कोररÓ जिन मुन्ना भाइयों को नकल करवाते थे वे तो सरकारी कॉलेजों में प्रवेश ले लेते थे और स्कोरर अच्छे नंबर आने के बावजूद सिर्फ और सिर्फ निजी कॉलेजों में सीटें ब्लाक कर लेते थे तथा प्रवेश की अंतिम तारीख को अपना नाम वापस ले लेते थे। खाली हुई सीटों पर निजी मेडिकल कॉलेज संचालक तगड़ा डोनेशन लेकर मनचाहे छात्रों को प्रवेश दे देते थे पर यहां समस्या यह खड़ी हुई कि कई स्कोरर ऐसे थे जिनकी उम्र 25 वर्ष से ज्यादा थी। देशभर की सारी परीक्षाओं में मेडिकल के लिए अधिकतम प्रवेश सीमा 25 वर्ष है। यहां पर काम आए चिकित्सा शिक्षा विभाग के जिम्मेदार नेता, अधिकारी जिन्होंने पीएमटी के जरिए प्रवेश के लिए न्यूनतम उम्र सीमा 17 वर्ष तो रखी लेकिन अधिकतम उम्र सीमा 25 वर्ष करने का नियम नहीं बनने दिया। नतीजा यह हुआ कि निजी मेडिकल कॉलेज सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50 प्रतिशत सीटों की सीमा के बजाए वास्तविक रूप से 80 प्रतिशत सीटों तक पर कब्जा करने लगे।
54 परीक्षाएं संदेह के घेरे में
व्यावसायिक परीक्षा मंडल के पूर्व परीक्षा नियंत्रक डॉ. पंकज त्रिवेदी के कार्यकाल में हुई करीब 79 चयन व भर्ती परीक्षाओं में से 54 संदेह के घेरे में आ गई हैं। इनमें ज्यादातर अलग-अलग विभागों के लिए हुई भर्ती परीक्षाएं शामिल हैं। पीएमटी के साथ ही पांच अन्य परीक्षाओं में गड़बड़ी का खुलासा करने के बाद स्पेशल टास्क फोर्स बाकी परीक्षाओं की भी जांच शुरू करने जा रही है। जानकारी के अनुसार प्री-पीजी, फूड इंस्पेक्टर, दुग्ध संघ, सूबेदार-उप निरीक्षक, प्लाटून कमांडर व पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा के अभी तक मिले 143 आरोपियों के अलावा एसटीएफ ने इन्हीं परीक्षाओं में शामिल बाकी परीक्षार्थियों की भी ओएमआर शीट जब्त करने की तैयारी कर ली है। जांच में एसटीएफ को गलत तरीके से परीक्षा पास करने वाले और भी परीक्षार्थियों के सामने आने की उम्मीद है। इन पांच परीक्षाओं में शामिल कुल परीक्षार्थियों की संख्या 4 लाख 91 हजार 323 है। अभी तक दस परीक्षाएं संदेह के घेरे में आ चुकी हैं। जिनमें से सात का खुलासा एसटीएफ ने कर दिया है। बाकी तीन परीक्षाओं के रिकॉर्ड व्यापमं से मांगे गए हैं। एआईजी एसटीएफ आशीष खरे के अनुसार रिमांड पर चल रहे आरोपियों से पूछताछ में अभी और भी परीक्षाओं में गड़बड़ी की बात सामने आ सकती है।
त्रिवेदी के कार्यकाल में हुईं महत्वपूर्ण भर्ती परीक्षाएं
वनरक्षक भर्ती परीक्षा, एमपी स्टेट टूरिज्म डायरेक्ट बैकलाग, पुलिस कांस्टेबल, जेल डिपार्टमेंट भर्ती परीक्षा, सब इंजीनियर (सिविल) भर्ती परीक्षा, स्टॉफ नर्स भर्ती परीक्षा, पैरामेडिकल स्टॉफ के लिए आयुष डिपार्टमेंट भर्ती परीक्षा, कंबाइंड असिस्टेंट ग्रेड तीन, एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर, खेल विभाग असिस्टेंट ग्रेड तीन भर्ती परीक्षा, फॉरेस्ट गार्ड भर्ती परीक्षा, कंबाइंड सब इंजीनियर भर्ती परीक्षा, आबकारी आरक्षक भर्ती परीक्षा। ट्रांसपोर्ट भर्ती परीक्षा, मत्स्य विभाग के लिए भर्ती परीक्षा, पब्लिक वर्क डिपार्टमेंट के लिए भर्ती परीक्षा तथा पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के लिए भर्ती परीक्षा।
व्यापमं द्वारा आयोजित पीएमटी परीक्षा में सनसनीखेज फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद आयकर विभाग ने उन अभिभावकों पर शिकंजा कसना शुरु कर दिया है, जिन्होंने अपने बेटे-बेटियों के दाखिले के लिए 75 से 80 लाख रुपए बतौर घूस खर्च किए थे। साथ ही व्यापमं के अधिकारियों की संपत्ति की भी पड़ताल की जा रही है।
पीयूष त्रिवेदी की शैक्षणिक योग्यता से लेकर कार्यप्रणाली तक पर सवाल
राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति पद पर लंबे समय से पंकज त्रिवेदी के भाई पीयूष त्रिवेदी विराजमान हैं। इनकी शैक्षणिक योग्यता से लेकर कार्यप्रणाली तक पर सवाल उठे पर जब सत्ता और सत्ता के दलालों का वरदहस्त हो तो फिर क्या।
बात 1978 की है जब लेफ्टिनेंट जनरल (अवकाश प्राप्त) केटी सतारावला को जबलपुर विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्ति किया गया था तब उन्होंने कहा था कि मध्यप्रदेश के किसी विश्वविद्यालय में कुलपति बनने से बेहतर है किसी होटल का मैनेजर बनना। सतारावला ने यह बात किस नजरिए से कही थी यह तो वही जाने लेकिन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में स्थित राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति पीयूष त्रिवेदी एवं वहां के अन्य प्रशासनिक पदों पर आसिन लोगों की योग्यता कुछ यही दर्शा रही है। विश्वविद्यालय के कुलपति, कुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक, अधिष्ठाता छात्रा कल्याण, उप कुलसचिव शैक्षणिक और उपकुलसचिव प्रशासन एवं अन्य पदाधिकारी अपात्र होते हुए भी इन पदों पर आसीन है। ऐसे में यहां सरकारी कायदे- कानून को ताक पर रखकर शैक्षणिक गतिविधियों की जगह मनमानी की पाठशाला चलाई जा रही है। कुलपति प्रो.पीयूष त्रिवेदी राजभवन और राज्य सरकार से बिना अनुमति लिए ही पदों का सृजन कर उन पर अपने चहेतों को बिठा रहे हैं। ऐसा भी नहीं की विश्वविद्यालय में व्याप्त इस भर्राशाही की खबर राजभवन और तकनीकी शिक्षा विभाग को नहीं है लेकिन शासन मौन तो देखे कौन की तर्ज पर यहां सब कुछ चल रहा है।
उल्लेखनीय है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में सूचना एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सशक्त भारत का सपना देखा था। पूर्व प्रधानमंत्री ने जो सपना देखा था उसे साकार करते हुए प्रदेश में तकनीकी शिक्षा युक्त मानव संसाधन की बदलती आवश्यकताओं को देखते हुए राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की स्थापना मध्यप्रदेश विधानसभा एक्ट 13 के तहत 1998 में भोपाल में की गई। विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे मुख्य उद्देश्य था कि शिक्षा एवं शिक्षा संसाधन की गुणवत्ता में वृद्धि हो, कंसलटेंसी, सतत शिक्षा, शोध एवं विकास गतिविधियों के अनुकूल वातावरण तैयार किया जाए,इंडस्ट्री के साथ परस्पर लाभ हेतु मजबूत संबंध बने, छात्रों में स्वरोजगार की भावना का विकास किया जाए और भूतपूर्व छात्रों में सतत् संपर्क एवं उनके प्रायोजित विकास प्रोग्राम बनाया जाए लेकिन विश्वविद्यालय में छात्रों का भविष्य तय करने वाले ही जब अपात्र हैं तो राजीव गांधी का सपना कैसे सकार होगा यह शोध का विषय है।
बात करते हैं विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.पीयूष त्रिवेदी की। विश्वविद्यालय अधिनियम के अनुसार कुलपति की नियुक्ति कुलाधिपति (गवर्नर) द्वारा राज्य सरकार के बिना हस्तक्षेप के की जाती है। धारा 12 (1) विश्वविद्यालय की उपधारा (2) या (6) के अंतर्गत गठित समिति द्वारा तैयार तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में विख्यात कम से कम तीन व्यक्तियों के पैनल में से किसी एक व्यक्ति की नियुक्ति कुलपति के रूप में कुुलाधिपति द्वारा की जाती है लेकिन तात्कालिक गवर्नर बलराम जाखड़ से अपने नजदीकी संबंधों और गवर्नर हाउस के कुछ अधिकारियों की मेहरबानी से प्रोफेसर त्रिवेदी कुलपति बनने में सफल रहे। अधिनियम के अनुसार विश्वविद्यालय का कुलपति बनने के लिए प्रौद्योगिकी या तकनीकी क्षेत्र का प्रोफेसर होना चाहिए जबकि प्रो. त्रिवेदी फार्मेसी के प्राध्यापक है। अत: नियमों के तहत देखा जाए तो इनकी नियुक्ति पूर्णत: गलत है।
नियुक्तियों में फर्जीवाड़ा
राजीव गांधी प्रोद्यौगिकी विश्वविद्यालय के प्रशासनिक ढांचे को देखा जाए तो हम पात हैं कि यह विश्वविद्यालय प्रभारी अधिकारियों के हवाले है। आरजीपीव्ही में कुल सचिव- रजिस्ट्रार, अधिष्ठाता छात्र कल्याण, उप कुलसचिव शैक्षणिक, उप कुलसचिव प्रशासनिक सभी अधिकारी प्रभारी हैं। कोई लगभग चार वर्ष से तो कोई दस वर्षों से इन पदों पर प्रभारी के रूप में नियुक्त है। आरजीपीव्ही एक तकनीकी विश्वविद्यालय है किंतु कुलपति सहित इसके शीर्ष पदों कुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक, अधिष्ठाता छात्र कल्याण आदि पदों पर गैर तकनीकी अधिकारी पदस्थ हैं। जबकि विश्वविद्यालय अधिनियम में भी तकनीकी योग्यता प्राप्त अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है।
कुलपति पीयूष त्रिवेदी की पत्नी श्रीमती वंदना त्रिवेदी टीच फार इंडिया सोसाइटी की सदस्य सचिव हैं। जिसके 5 विभिन्न कॉलेज आरजीपीव्ही के अंतर्गत हैं।
अब लोकायुक्त के छापे के बार सरकार
लोकायुक्त बिल में बदलाव करें शिवराज: नावलेकर
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भ्रष्टाचार पर जीरो टालेरेंस की बात करते आए हैं। लेकिन राज्य के लोकायुक्त पी पी नावलेकर का कहना है कि लोकायुक्तों के पास भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के भरपूर अधिकार नहीं हैं। जिससे मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार पर पूरी तरह से लगाम नहीं लग सकती है। उन्होंने कहा कि शिवराज को केंद्र सरकार के लोकपाल बिल की तरह राज्य के लोकायुक्त कानून में बदलाव लाने चाहिए।
लोकायुक्त पी पी नावलेकर ने कहा कि मध्य प्रदेश का एक्ट स्टेट के हिसाब से काफी पावरफूल है क्योंकि हमने उस एक्ट से चार साल काम करके दिखाया है। लेकिन जो कांग्रेस सरकार का लोकपाल बिल आया है, उसका अध्ययन करने के बाद हमने पाया कि लोकायुक्त को कुछ पावर दी जा सकती हैं। अगर लोकायुक्त को वो पावर दी जाती हैं तो भ्रष्टाचार निवारण में लोकायुक्त ज्यादा कारगर होगा।
पीपी नावलेकर ने कहा कि एमपी के लोकायुक्त एक्ट में अभी एमएलए, राज्यसभा सदस्य शामिल नहीं है। जबकि लोकपाल में एमएलए, राज्यसभा सदस्य को शामिल किया गया हैं। जिससे लोकपाल भ्रष्टाचार संबंधी कोई शिकायत मिलने पर उनकी जांच कर सकेगा। वैसे ही एमपी के लोकायुकत एक्ट में एमएलए को शामिल होना चाहिए क्योंकि सरकार विधायकों को लोगों के हित में कार्य करने के लिए फंड देती है।
अजिता पर इतनी मेहरबानी क्यों...?
अफसर भ्रष्ट हैं तो क्यों बचा रही है शिवराज सरकार?
भोपाल। इनदिनों देश में मजबूत लोकपाल और लोकायुक्त को लोकपाल के दायरे में लाने के लिए अभियान चल रहा है ताकि लोकायुक्त बड़े भ्रष्टाचारी अफसरों को सलाखों के पीछे पहुंचा सके। वहीं मध्य प्रदेश में पारदर्शिता का दावा करने वाले मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लोकायुक्त को कई आईएएस अफसरों के खिलाफ अदालत में चालान पेश करने की इजाजत नहीं दे रहे हैं। इससे करोड़ों रूपए घोटाले के दागी अधिकारी अपने रसूख के कारण जमकर मलाई खा रहे हैं और छोटी-छोटी गलतियां करने वाले अधिकारी-कर्मचारी व्यवस्था की शूली चढ़ रहे हैं। ऐसे रसूखदार अधिकारियों की तो लंबी सूची है,लेकिन इनदिनों चर्चा में हैं अजिता वाजपेयी पांडे। हालांकि केंद्र सरकार से अनुमति मिलने के बाद लोकायुक्त ने अजिता के खिलाफ 8 जनवरी को लोकायुक्त कोर्ट में पूरक चालान पेश कर दिया गया है। विशेष न्यायाधीश लोकायुक्त वीपी शुक्ल की अदालत ने सुनवाई आगे बढ़ा दी है।
18 साल बाद मामला फिर सुर्खियों में
अजिता पांडे वाजपेयी को अपर मुख्य सचिव (तकनीकी शिक्षा एवं कौशल)विभाग से हटा कर उन्हें अब योजना आयोग का सदस्य बनाया गया है। लेकिन उनका रसूख हमेशा ही कायम रहा है।
उनके रसूख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन पर तथा पांच और अधिकारियों पर कांग्रेस के शासनकाल में 1998 और 2003 में बिजली के मीटर को ऊंची दर पर खरीदी कर विद्युत मंडल को लगभग साढ़े छह करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाने का आरोप था। अधिकारियों पर आरोप था कि उन्होंने बिना निविदा के मीटर की खरीदी का प्रस्ताव तैयार किया, इससे मंडल को नुकसान हुआ। शिकायत लोकायुक्त के पास पहुंची। 2004 में प्रारंभिक जांच में लोकायुक्त ने अनियमितता पाई और प्रकरण दर्ज करने के बाद न्यायालय में चालान पेश किया। 16 जून, 2007 को इस मामले में एक और आरोप पत्र पूर्व राज्य बिजली बोर्ड के अध्यक्ष एसके दासगुप्ता, वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अजिता वाजपेयी पांडे और चार अन्य लोगों के खिलाफ लोकायुक्त पुलिस द्वारा प्रस्तुत किया गया है। उसके बाद दिसंबर 2011 में मामले की सुनवाई के बाद न्यायाधीश प्रद्युम्न सिंह ने फैसले में पांच पूर्व अधिकारियों को दोषी बताया गया है। फैसले में कहा गया कि मंडल के नियमानुसार एक करोड़ से ज्यादा की खरीदी निविदा से होनी चाहिए, इसके बाद अधिकारियों को खरीदी के विशेष अधिकार दिए गए थे, लेकिन अधिकारियों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है। न्यायाधीश ने पूर्व अध्यक्ष दासगुप्ता और अन्य एनपी श्रीवास्तव, प्रकाशचंद्र मंडलोई, बसंत कुमार मेहता व मोहन चंद को तीन-तीन वर्ष की सजा सुनाई है। साथ ही पांचों पर एक लाख एक हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया। लेकिन केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ होने के कारण केंद्र सरकार से अनुमति नहीं मिलने के कारण अजिता वाजपेयी पांडे का कहीं नाम नहीं आया।
अजिता वाजपेयी पांडे पर भ्रष्टाचार का आरोप भले की कांग्रेस सरकार में लगे लेकिन उन्हें बचाने के लिए भाजपा सरकार ने भी उनकी खुब मदद की है। राज्य सरकार ने श्रीमती पांडे को बचाने के लिए दो बार केंद्र सरकार को पत्र लिखे थे, लेकिन केंद्र ने इसे कंसीडर नहीं किया। अब केंद्र ने राज्य सरकार को लोकायुक्त में प्रकरण दर्ज करने की अनुमति प्रदान कर दी है। लेकिन विडंबना यह देखिए की केंद्र से मंजूरी मिलने के बावजूद राज्य सरकार ने निर्णय पर पुनर्विचार की मांग करने के लिए लिखा है।
6 करोड़ का चूना लगाया था विद्युत मंडल को
आईएएस अफसर श्रीमती पांडे पर ऊर्जा विभाग में रहते हुए मीटर खरीदी घोटाले का आरोप लगा था। उस समय वे विभाग में बतौर सदस्य वित्त के रूप में कार्यरत थीं। मामला वर्ष 1998 और 2003 का है, इस दौरान 70 हजार मीटर बिना टेंडर किए खरीदे गए थे। उस दौरान एक मीटर की कीमत 714 रुपए बताई गई थी, जबकि मीटर की वास्तविक कीमत 302 रुपए थी। इस मामले की शिकायत 2003 में लोकायुक्त में की गई थी, जिस पर कार्रवाई करते हुए तत्कालीन चेयरमैन एसके दास गुप्ता पर मामला दर्ज किया गया था, लेकिन केंद्र सरकार की स्वीकृति नहीं मिलने के कारण मामला लंबित था।
राज्य सरकार ने श्रीमती पांडे को बचाने के लिए दो बार केंद्र सरकार को पत्र लिखे थे, लेकिन केंद्र ने इसे कंसीडर नहीं किया। अब केंद्र ने राज्य सरकार को लोकायुक्त में प्रकरण दर्ज करने की अनुमति प्रदान कर दी है। लोकायुक्त पुलिस श्रीमती पांडे सहित छह लोगों पर प्रकरण दर्ज करेगी।
चार आरोपियों को हो चुकी है सजा-
मामला मध्यप्रदेश राज्य विद्युत मंडल में वित्त सदस्य रहने के दौरान बहुचर्चित इलेक्ट्रॉनिक मीटर खरीदी घोटाले में गड़बड़ी के आरोप से संबंधित है। अभियोजन के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक मीटर खरीदी घोटाले के जरिए सरकार को लगभग 6 करोड़ रुपये का चूना लगाया गया था। इस मामले में 2011 में चार आरोपियों को लोकायुक्त कोर्ट से सजा हो चुकी है।
आपत्ति के कारण नहीं लिया संज्ञान
सीनियर आईएएस अजिता बाजपेयी पाण्डेय के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति देर से मिलने के कारण 8 जनवरी को पूरक चालान पेश किया गया। हालांकि कोर्ट ने आपत्ति के मद्देनजर पूरक चालान पर संज्ञान नहीं लिया था। आपत्ति में कहा गया था कि लोकायुक्त ने नोटिस दिए बगैर एकपक्षीय तरीके से कार्रवाई को अंजाम दिया है।
विधिवत अभियोजन मंजूरी ली
इधर दूसरी ओर लोकायुक्त का कहना है कि इस मामले में कार्मिक विभाग नई दिल्ली से विधिवत अभियोजन स्वीकृति हासिल करने के बाद ही पूरक चालान पेश करने की प्रक्रिया पूरी की गई है। आरोपी अजिता वाजपेयी पांडे इन दिनों अपर मुख्य सचिव के पद पर कार्यरत हैं।
दागी-दागी भाई-भाई
प्रशासन तंत्र में बैठे आला दागीअफसर कैसे एक-दूसरे को नवाजते हैं। इसका खुलासा राज्य विधानसभा में दी गई एक जानकारी से हुआ। कांग्रेस विधायक आरिफ अकील के लिखित प्रश्न के उत्तर में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि जांच एजेंसी ईओडब्ल्यु व लोकायुक्त ने जिन अफसरों के खिलाफ चालान की अनुमति मांगी थी उन्हें चालान पेश होने से पहले ही पदोन्नत कर दिया गया। इनमें अपर मुख्य सचिव अजीता वाजपेयी पांडे भी शामिल हैं। श्रीमती पांडे पर मप्र राज्य विद्युत मंडल पर पदस्थापना के दौरान इलेक्ट्रानिक मीटर खरीदी में गोलमाल किए जाने का आरोप है। श्रीमती पांडे को पिछले साल सरकार ने पदोन्नत कर अपर मुख्यसचिव बना दिया। मुख्यमंत्री ने बताया कि लोकायुक्त की ओर से चालान पेश करने संबंधी अनुमति मांगे जाने का प्रस्ताव 28 जुलाई 2011 को राज्य शासन को मिला था। इसे 15 दिसंबर 2011 को केंद्र सरकार को भेजा गया। राज्य सरकार अजिता वाजपेयी पांडे को बचाने के लिए किसी भी कसर नहीं छोड़ नहीं है। आम तौर पर, सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को जैसे ही लोकायुक्त उन के खिलाफ आरोपपत्र प्रस्तुत करता है उन्हें निलंबित कर दिया जाता है, लेकिन पांडे अपवाद बन कर सामने आई हैं।
56 के खिलाफ चल रही जांच
लोकायुक्त दफ्तर से मिली जानकारी के मुताबिक प्रदेश के 34 आईएएस, 15 आईएफएस और 6 आईपीएस अफसरों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में जांच चल रही है। यहीं नहीं भ्रष्टाचार में मामलों में घिरे करीब 35 अफसर अब तक सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिनके खिलाफ प्रकरण दर्ज हुए थे । सरकार कह रही है कि अब इन अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। बताया जाता है कि आरोपों की जांच पड़ताल के बाद लोकायुक्त ने इनके खिलाफ कार्रवाई के लिए सरकार को पत्र भी लिखा है लेकिन कार्रवाई तो दूर राज्य सरकार इनके खिलाफ लिखे गए पत्रों को पढऩे का वक्त तक नहीं निकाल पाई है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार की चुप्पी देख विपक्ष ने उसकी नीयत पर सवाल उठाए हैं।
10 फीसदी में ही प्रकरण दर्ज हो पाते
लोकायुक्त संगठन में पहुंचने वाली शिकायतों में से जांच के बाद 10 फीसदी मामलों में ही आपराधिक प्रकरण दर्ज हो पाते हैं। फिर यह मामला नौकरशाहों का हो तब तो प्रकरण दर्ज होना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है। लोकायुक्त संगठन के शिकायतों में तीन तरह की कार्यवाही होती है। जांच के लिए प्रकरण दर्ज किए जाते हैं, शिकायत विशेष स्थापना पुलिस को प्राथमिक जांच के लिए सौंपी जाती है या छापा मारने के बाद एफआईआर दर्ज की जाती है। जांच प्रकरणों में से जिन मामलों को केस दर्ज करने योग्य समझते हैं,उनमें एफआईआर दर्ज की जाती है।
आईएएस के सुरेश भी घेरे में
भ्रष्टाचार के मामले में वर्ष 1982 बैच के आईएएस के सुरेश के खिलाफ भी केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय द्वारा सीबीआई को अभियोजन की अनुमतिदिए जाने के संकेत हैं। इससे सुरेश की मुश्किलें बढ गई हैं। मध्यप्रदेश कॉडर के अधिकारी श्री सुरेश वर्तमान में यहां सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव हैं। उन पर भ्रष्टाचार का मामला उनके चैन्नई पोर्ट टस्ट के अध्यक्ष व सेतु समुद्रम परियोजना का मुख्य कार्यपालन अधिकारी रहते हुए दर्ज किया गया था। मामला वर्ष 2004 से 2009 के बीच का है। उक्त परियोजना में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलने पर केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने सुरेश के आवास व कार्यालय में छापा डाला था। सीबीआई ने छापे के दौरान जो दस्तावेज बरामद किए उनमें बडे पैमाने पर आर्थिक गड़बड़ी सामने आई थी। इस पर सुरेश को प्रथम दृष्टया दोषी मानते हुए उनके विरुद्ध अपराधिक प्रकरण क्रमांक 18 ए /2011 दर्ज किया गया था। जांच के बाद सीबीआई ने केंद्र सरकार से इस मामले में करीब छह माह पूर्व अभियोजन की अनुमति चाही थी। बताया जाता है,कि हाल ही में केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय ने सीबीआई को अभियोजन की स्वीकृति दे दी है। इस मामले में राज्य शासन पहले ही अपनी ओर से अनुमति दे चुकी है। उनके खिलाफ चालान पेश होने पर उनका निलंबन तय माना जा रहा है।
सुरेश को छग सरकार ने भी बचाया
उक्त मामला उजागर होने के बाद मध्यप्रदेश वापस लौटे सुरेश को मप्र सरकार ने ही नहीं नवाजा बल्कि छत्तीसगढ सरकार भी उन्हें भ्रष्टाचार के एक मामले में अभयदान दे चुकी है। यह मामला वर्ष 1997 का है तब सुरेश अविभाजित मप्र के बिलासपुर जिले में पदस्थ थे और अपनी पदस्थापना के दौरान उन पर साक्षरता अभियान की पुस्तकें छपवाने में गोयनका प्रिंटर्स इंदौर को नियमों के विरुद्ध करीब ढाई लाख रुपए का भुगतान कर उपकृत किए जाने का आरोप लगा था। यह मामला आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो में दर्ज किया गया। ब्यूरो ने वर्ष 2010 में इस प्रकरण में खात्मा लगा दिया। बाद में राज्य सरकार ने साक्ष्य नहीं मिलने का तर्क देकर सुरेश के साथ ही आईएएस अधिकारी आईएन एस दाणी, एमके राउत समेत चार अधिकारियों के खिलाफ प्रकरण वापस ले लिया था। इस पर वहां विपक्ष के नेता रवीन्द्र चौबे ने सवाल उठाया था,कि जब आरोपी अधिकारी ही अपने मामलों की जांच करेंगे तो साक्ष्य कैसे मिलेंगे।
ब्यूरोक्रेट की करतूतें परेशानी का सबब
प्रदेश में ब्यूरोक्रेट की करतूतें न सिर्फ सरकार के लिए परेशानी का सबब बनीं, बल्कि इस सर्वोच्च सेवा की मान-सम्मान मर्यादा और गौरव की धज्जियां भी उड़ा दीं। यहां तक कि मप्र कैडर के कारण भारतीय प्रशासनिक सेवा की पूरे देश में हो थू-थू को देखते हुए पूर्व कैबिनेट सचिव केएम चंद्रशेखर तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। उन्होंने तीन मार्च 2010 को प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव अवनि वैश्य को पत्र लिखकर मप्र कैडर की करतूतों पर दु:ख जताया। वे इतने आहत थे कि उन्होंने प्रदेश के नौकरशाहों को फिर से न सिर्फ उनकी ड्यूटी याद दिलाई, बल्कि सेवा में आने के समय ली जाने वाली कसमें-वादे भी याद दिलाए।
शुक्रवार, 24 जनवरी 2014
सरकारी धन व हथियारों से फैल रहा लाल आतंक
रायपुर। दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के पूर्व प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने एक सप्ताह में अभनपुर, भानुप्रतापपुर और रायपुर से आठ लोगों को धरदबोचा। अभनपुर और भानुप्रतापपुर से गिरफ्तार किए गए माओवादी समर्थकों से भारी मात्रा में एके-47 की गोलियां, जिलेटिन छड़ें, डेटोनेटर और इलेक्ट्रॉनिक सामान जब्त किया। बरामद गोलियां सरकारी हैं, क्योंकि ये गोलियां पुलिस और सशस्त्रबलों को ही मिलती हैं।
वहीं, रायपुर से गिरफ्तार किए गए दो बिचौलियों ने यह खुलासा किया कि किस तरह खनन ठेकेदारों और सरकारी काम करने वाले ठेकेदारों से सुविधा शुल्क लेकर लाल आतंक मजबूत हो रहा है। मतलब साफ है कि माओवादी सरकारी पैसे और सरकारी हथियारों का इस्तेमाल ही खून-खराबे के लिए कर रहे हैं।
अधिकतर हथियार सरकारी : सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार नक्सलबाड़ी आंदोलन के शुरूआती दिनों से ही संगठन हथियारों के लिए लूट पर निर्भर रहा है। पहले जमींदारों से लूटे हथियार। फिर सुरक्षाबलों से हथियार लूटकर पार्टी ने अपनी आर्मरी को मजबूत किया। वर्ष 2007 में तत्कालीन पुलिस प्रमुख विश्वरंजन ने स्वीकार किया था कि माओवादियों की सबसे प्रचलित राइफल एके-47 पुलिस से लूटी हुई है। यही नहीं, एलएमजी और रॉकेट लॉन्चर जैसे हथियार भी लूट के जरिए उन तक पहुंचे हैं।
गोलियां बड़ी चुनौती : खुफिया सूत्रों का कहना है कि माओवादियों ने उन्नत किस्म के हथियार तो खूब इकट्ठे कर लिए हैं, लेकिन उनके सामने असल चुनौती गोलियों की है। भारत में विभिन्न राइफलों और मशीनगनों में इस्तेमाल होने वाली गोलियां सरकारी हथियार फैक्ट्रियों में ही बनती हैं, उनको देसी तरीके से नहीं बनाया जा सकता। इसी कारण वे लूटकर, सेंध लगाकर या अन्य तरीके से गोलियां एकत्र करते हैं।
खुद का रिसर्च एंड डेवलपमेंट विंग : हथियारों की कमी पूरी करने और आत्मनिर्भर बनने के लिए माओवादियों खुद की रिसर्च एंड डेवलपमेंट विंग खड़ी कर ली है। 6-7 साल पहले इस विंग ने भोपाल और ओडिसा के राउरकेला में रॉकेट लॉन्चर और रॉकेट बनाने का कारखाना डालने की योजना बनाई थी, लेकिन योजना लीक हो गई। अब वे लॉजिस्टीक कमांड के जरिए हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं। बस्तर में इसकी कमान प्रभाकर नाम के माओवादी कमांडर के हाथ है।
अन्य प्रदेशों में पकड़ा जा चुका है नेटवर्क : वर्ष 2011 उत्तरप्रदेश एसटीएफ ने 26वीं वाहिनी पीएसी (प्रोविंसियल आम्र्स कांस्टेबुलरी) के एक आर्मरर (शस्त्रागार प्रभारी) को गोरखपुर से और प्रदेश पुलिस के एक आर्मरर को बस्ती पुलिसलाइन से गिरफ्तार कर सरकारी गोलियों को माओवादियों तक पहुंचाने वाले गिरोह का खुलासा किया था। ये लोग गोलियों के रिकॉर्ड में हेरफेर कर उन्हें बेच देते थे। बिहार और झारखंड से भी ऎसे मामले सामने आ चुके हैं।
झीरम घाटी हमले में भी इस्तेमाल हुई थीं सरकारी गोलियां
झीरम घाटी में गत वर्ष 25 मई को हुए सबसे बड़े माओवादी हमले में भी सरकारी गोलियों का इस्तेमाल हुआ था। कॉर्टेज के खोखे पर मिले मार्क के आधार पर सीआरपीएफ के डिप्टी कमांडेंट अश्विन झा ने स्वीकार किया था कि यह आयुध फैक्ट्री वरणगांव (भुसावल, महाराष्ट्र) में बनी थीं। इनकी आपूर्ति केवल अर्द्धसैनिक बलों और प्रदेश पुलिस इकाइयों को ही की जाती हैं।
स्वीकार चुकी एनआईए
अगस्त 2012 में एनआईए ने कोलकाता की अदालत में माना था कि माओवादियों ने अबुझमाड़ में हथियार फैक्ट्री लगा ली है और तीन साल में वे लगभग पांच करोड़ के रॉकेट लॉन्चर व अन्य हथियार बना चुके हैं।
जंगल के भरोसे, "सुपरहीरो" का परिवार
जगदलपुर। छत्तीसगढ के जंगलों में प्रचलित कहानियों में सुपर हीरो जैसी ख्याति पाने वाले भूमकाल आंदोलन के नायक गुंडा धूर फिर एक बार चर्चा में आ गए हैं।
गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में होने वाली परेड में गुंडा धूर की गाथाओं को झांकी के जरिए प्रदर्शित किया जाएगा। लेकिन कहानी का मर्म यह है कि एक ओर जहां इस जंगल की रक्षा करने वाले इस नायक की गाथा राष्ट्रीय राजधानी में गूंजेगी , तब उनका परिवार गांव में रोजी-रोटी की जुगत में ही लगा रहेगा।
जिला मुख्यालय से करीब 35 किमी दूर नेतानार गांव में गुंडाधूर की तीसरी पीढ़ी आज भी निवासरत है। पत्रिका की टीम ने गहन पड़ताल के बाद गंुडाधूर के वंशजों को ढूंढ निकाला और उनकी व्यथा को जाना। गुंडाधूर का नाती जोगी धूर (85) अब इस परिवार का मुखिया है।
नेतानार गांव में जब हमारी टीम पहुंची तो पूरा परिवार लांदा (आदिवासी पेय) की कुटाई में व्यस्त था। पास ही जोगी धूर गांव के कुछ लोगों के साथ चौपाल लगाए बैठे थे। दुभाषिए की मदद से हमने उनसे बात की तो वे अपने दादा की वीर गाथाएं सुनाने लगे। उनका परिवार पहले गेहूंपदर में रहता था। बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने उन पर दबाव बनाना शुरू किया तो उनके पिता आयता परिवार सहित पलायन कर गए। बाद में उनका परिवार चांयकुर मेें बस गया।
जंगल का ही सहारा
जोगी धूर ने बताया कि उन्हें शासन-प्रशासन से आज तक कोई सुविधा नहीं मिली है न कभी किसी सरकारी नुमाइंदें ने उनकी पूछ परख की। उनके परिवार सहित सभी गांव वाले अपनी आजीविका के लिए जंगल पर आश्रित हैं। जंगलों में शिकार से उनका पेट भरता है। वहीं जंगल से बांस लाकर वे टोकनियां और कड़गी बनाते हैं, जिन्हें बाजार में बेचकर अन्य सुविधाएं जुटाई जाती हंै। धान, कोसरा, मंडिया की फसल भी उगाते हैं।
जोगी अब बने गुंडाधूर देव
नेतानार इलाके में गुण्डाधूर व उनके परिवार को देव का दर्जा हासिल है। जोगी धुर को वर्तमान में गुण्डाधूर देव के नाम से जाना जाता है, इनकी पूजा भी की जाती है। उनके चाचा के पुत्र मंगडु ही उनके पुजारी हैं, जो उनकी नियमित पूजा करते हैं।
नहीं है प्रमाणित फोटोग्राफ
यह जानकर आpर्य होगा कि जिस गुंडाधूर की तस्वीर को भूमकाल आंदोलन के हीरो की तहर देश के सामने रखने की तैयारी है, उसके प्रमाणित फोटोग्राफ आज तक किसी के पास नहीं है। बस्तर के कलाकारों,रचनाकारों और इतिहासकारों ने जिस तरह से गुण्डाधूर की भूमिका और उनकी आकृति को पेश किया। इससे गुण्डाधूर एक वेताली कल्पना की तरह स्थापित हो चुके हैं।
इस तरह नायक बने गंुडाधूर
इतिहासकार डॉ केके झा का कहना है कि गुंडाधूर गेहूंपदर के पुजारी परिवार से संबंधित थे। ऎसा बताया जाता है कि वह तंत्र-मंत्र के भी जानकार थे। वह तत्कालीन राजा रूद्रप्रतापदेव के चाचा कालेन्द्र सिंह के दांहिने हाथ माने जाते थे। सन 1910 में अंग्रेजों ने जंगल काटने पर रोक लगा दी थी और जंगल पर आदिवासियों के अधिकार सीमित कर दिए थे।
इससे आदिवासियों में आक्रोश था। कालेन्द्र सिंह ने अंगे्रजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया और गुंडाधूर आंदोलन के नायक के तौर पर उभरे। तोकापाल से आंदोलन की शुरूआत हुई और मध्य बस्तर में यह आंदोलन तेजी से फैला। लेकिन अंग्रेजों ने आंदोलन को दबा दिया। गुण्डाधूर के साथी डेबरीधूर को फंासी दे दी गई, लेकिन गुण्डाूधर का आज तक पता नहीं चला।
जंगल का ही सहारा
जोगी धूर ने बताया कि उन्हें शासन-प्रशासन से आज तक कोई सुविधा नहीं मिली है न कभी किसी सरकारी नुमाइंदें ने उनकी पूछ परख की। उनके परिवार सहित सभी गांव वाले अपनी आजीविका के लिए जंगल पर आश्रित हैं। जंगलों में शिकार से उनका पेट भरता है। वहीं जंगल से बांस लाकर वे टोकनियां और कड़गी बनाते हैं, जिन्हें बाजार में बेचकर अन्य सुविधाएं जुटाई जाती हंै। धान, कोसरा, मंडिया की फसल भी उगाते हैं।
जोगी अब बने गुंडाधूर देव
नेतानार इलाके में गुण्डाधूर व उनके परिवार को देव का दर्जा हासिल है। जोगी धुर को वर्तमान में गुण्डाधूर देव के नाम से जाना जाता है, इनकी पूजा भी की जाती है। उनके चाचा के पुत्र मंगडु ही उनके पुजारी हैं, जो उनकी नियमित पूजा करते हैं।
नहीं है प्रमाणित फोटोग्राफ
यह जानकर आpर्य होगा कि जिस गुंडाधूर की तस्वीर को भूमकाल आंदोलन के हीरो की तहर देश के सामने रखने की तैयारी है, उसके प्रमाणित फोटोग्राफ आज तक किसी के पास नहीं है। बस्तर के कलाकारों,रचनाकारों और इतिहासकारों ने जिस तरह से गुण्डाधूर की भूमिका और उनकी आकृति को पेश किया। इससे गुण्डाधूर एक वेताली कल्पना की तरह स्थापित हो चुके हैं।
इस तरह नायक बने गंुडाधूर
इतिहासकार डॉ केके झा का कहना है कि गुंडाधूर गेहूंपदर के पुजारी परिवार से संबंधित थे। ऎसा बताया जाता है कि वह तंत्र-मंत्र के भी जानकार थे। वह तत्कालीन राजा रूद्रप्रतापदेव के चाचा कालेन्द्र सिंह के दांहिने हाथ माने जाते थे। सन 1910 में अंग्रेजों ने जंगल काटने पर रोक लगा दी थी और जंगल पर आदिवासियों के अधिकार सीमित कर दिए थे।
इससे आदिवासियों में आक्रोश था। कालेन्द्र सिंह ने अंगे्रजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया और गुंडाधूर आंदोलन के नायक के तौर पर उभरे। तोकापाल से आंदोलन की शुरूआत हुई और मध्य बस्तर में यह आंदोलन तेजी से फैला। लेकिन अंग्रेजों ने आंदोलन को दबा दिया। गुण्डाधूर के साथी डेबरीधूर को फंासी दे दी गई, लेकिन गुण्डाूधर का आज तक पता नहीं चला।
मैं भोपाल - मर चुका हूं
मैं भोपाल - मर चुका हूं - मेरी अर्थी तीन दशक पहले उठी थी। 2 और 3 दिसंबर की रात उस सर्द रात जैसे ही शहर के घड़ियाल ने 12 बजाए। गहरे अंधेरे के बीच अपनी गोद में सोए लाखों लोगों को देखकर अचानक सिहरन दौड़ गई। पांच मिनट बाद ही मुझे चीरते हुए आई सायरन की तीखी आवाज। ये मेरी मौत का ऐलान था क्योंकि अब जो कुछ होने जा रहा था वो मैंने कभी नहीं देखा था, न कभी सुना था। वो वक्त जैसे थम गया - आज भी मेरी घड़ी जैसे रात 12 बजकर 05 मिनट से आगे बढ़ी ही नहीं क्योंकि सुबह की पहली किरण तक शहर की हर गली में, हर चौराहे पर, अस्पताल में, स्टेशन पर, ठेले पर, घर में मेरी लाश पड़ी थी।
रात के 12 बजकर पांच मिनट पर जागा शैतान
1984 के 2-3 दिसंबर की वो दरमियानी रात थी। धुंध भरे अंधेरे में शहर भोपाल के साथ-साथ यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री भी सोई पड़ी थी। तकनीकी वजहों से पिछले कई दिनों से फैक्ट्री में प्रोडक्शन ठप था लेकिन फैक्ट्री के 610 टैंक में एक शैतान सांस ले रहा था। जी हां, इस टैंक में भरी थी बेहद खतरनाक, जानलेवा, जहरीली मिथाइल आइसोसायनाइड। मौके पर तैनात फैक्ट्री के सुपरवाइजर्स को रात 11 बजे ही इस टैंक में मची खलबली का अहसास होने लगा था लेकिन ये खलबली आगे कितनी खतरनाक होने जा रही थी किसी को इसका अहसास नहीं था। टैंक का बढ़ता तापमान सबकी पेशानी पर लकीरें खींच रहा था। हालात पर काबू पाने की मशक्कत जारी थी लेकिन जल्द ही कर्मचारियों को अहसास हो गया कि अब हालात उनके हाथ से निकल चुके हैं।
घबराए टेक्नीशियंस ने आखिरी कोशिश की और इस टैंक से जुड़ने वाली तमाम पाइप लाइंस काट दीं। अंदाजा था कि शायद इसी तरह टैंक में हो रही रिएक्शन थम जाए। लिक्विड का गैस बनना रुक जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और धमाके के साथ टैंक का सेफ्टी वाल्व उड़ गया। अब अलार्म बजाने के सिवा कोई चारा नहीं था और आधी रात को ठीक बारह बज कर पांच मिनट पर यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से खतरे का सायरन बजा लेकिन जब तक सायरन की आवाज नींद में डूबे लोगों के कान तक पहुंचती शैतान जाग चुका था। उस मौके पर फैक्ट्री में तैनात रहे लोग भी मानते हैं कि इस शैतान को यूनियन कार्बाइड ने ही पाला था। वो तमाम सुरक्षा इंतजामात का उल्लंघन कर रही थी।
सर्द हवा पर सवार जहरीली मिथाइल आईसोसायनाइड गैस शहर के भीतर घुस चुकी थी। इस गैस का असर नींद में दुबके हुए लोगों पर हुआ। उनका दम घुटने लगा। बेचैनी सी महसूस हुई और आंख खोलते ही मिर्ची का धुआं सा लगा। नींद उचटने के बाद जो बाहर निकले वो सीधे गैस की चपेट में थे। हर सेकेंड के साथ एक नया आदमी गैस का शिकार हो रहा था और घंटे भर के भीतर पुराने भोपाल शहर में मौत सड़कों पर नाच रही थी। बदहवास लोग इस जहर के असर से बचने के लिए जितना भाग रहे थे, मौत उन्हें चुन-चुन कर मार रही थी। किसी को पता नहीं था कि हुआ क्या है। किसी को ये भी पता नहीं था कि मौत सिर्फ अकेले उसी का पीछा कर रही है या और भी लोग इसके शिकार हैं।
जहर का पता नहीं था, कैसे होता इलाज
रात के तकरीबन डेढ़ बजे जहर के शैतान ने भोपाल के मशहूर हमीदिया अस्पताल की इमरजेंसी पर दस्तक दी। बीमार घबराए और दहशत में डूबे लोगों के अस्पताल पहुंचने का सिलसिला शुरू हुआ। जब तक एक-दो लोग आए इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों की समझ में कुछ नहीं आया लेकिन जल्द ही ये तादाद दर्जनों में तब्दील हो गई और तब सरकारी अमले को गैस कांड की गंभीरता का अहसास हुआ। उस वक्त भोपाल के पुलिस कप्तान थे आईपीएस स्वराज पुरी। रात की गश्त पर निकले पुरी को सड़कों की हलचल से अहसास हो गया कि कुछ गड़बड़ जरूर है। उन्होंने उस ओर बढ़ने की कोशिश की जिधर से लोग भागे आ रहे थे लेकिन जल्द ही खुली जीप के भीतर उनका गला सूखने लगा। ये हवा के झोंके के साथ आ रही गैस का असर था। उस जहरीली रात स्वराज पुरी पूरे वक्त हालात से लड़ते रहे। कभी सड़कों पर तो कभी कंट्रोल रूम में।
सरकारी अमले के दिमाग में अब तक तस्वीर साफ हो चुकी थी। जहर की शक्ल में ये कहर यूनियन कार्बाइड की चिमनियों से बरसा था। लेकिन इस जहर का असर कहां तक था और कितना था इसका अंदाजा मुश्किल था। दहशत में डालने वाली शुरुआती खबरें हमीदिया अस्पताल से आनी शुरू हुईं। जहां लाशों की तादाद हर क्षण बढ़ती जा रही थी। जब तक प्रशासन अस्पताल का मोर्चा संभालने की रणनीति बनाता कप्तान स्वराजपुरी को पुराने शहर की पुलिस चौकियों से बिगड़ते हालात की खबरें मिलने लगीं। आखिरकार उन्होंने खुद मोर्चा संभाला। जहां से भी खबर मिलती वहां पर अधिकारियों को हालात संभालने के निर्देश दिए जाते लेकिन ये सारी कोशिशें बेमानी थीं। यूनियन कार्बाइड का शैतान लगातार जहरीली गैस उगल रहा था। रिटायर्ड आईपीएस स्वराज पुरी उन हालात को बयान करते हुए कहते हैं-वो मेरे पास आए। मैंने पूछा, कौन सी गैस है? उन्होंने कहा-पता नहीं। मैंने पूछा, इसके एंटीडोट्स क्या हैं? उन्होंने कहा-पता नहीं। मैंने कहा, तो फिर आप यहां आए क्यों हैं। गेट लॉस्ट।
सरकारी अमले को ये तो पता चल गया कि गैस की लीकेज यूनियन कार्बाइड से हुई है। लेकिन अब सामने खड़े थे दो बड़े सवाल। गैस का रिसाव बंद हो तो कैसे और जो गैस रिसी है वो क्या है ये जाने बगैर मरते लोगों की जान बचाना मुश्किल था लेकिन ये बताने वाला कोई नहीं था क्योंकि खुद यूनियन कार्बाइड ने तमाम सच छुपा रखे थे।
हमीदिया अस्पताल में बीमारों की तादाद बढ़ती जा रही थी। हालात का मुकाबला करने के लिए डॉक्टरों को इमरजेंसी कॉल भेजी गई। जूनियर डॉक्टरों को जगा कर ड्यूटी पर लगाया गया। लेकिन डॉक्टरों का सारा अमला लाचार था। उन्हें ये तो पता लग रहा था कि लाशों पर जहरीले केमिकल का असर है। बीमारों के लक्षण भी उन्हें जहर का शिकार बता रहे थे। मगर ये जहर है क्या ये जाने बगैर इलाज मुश्किल था। तब अचानक और पहली बार एक सीनियर फोरेंसिक एक्सपर्ट की जुबान पर आया मिथाइल आईसोसायनाइड का नाम।
सायनाइड एक ऐसा जहर जिसे ईजाद करने वाला ही उसका स्वाद बताने के लिए जिंदा नहीं बचा लेकिन उस रात भोपाल में एक पूरी आबादी सायनाइड की सांस ले रही थी। मगर रात के अंधेरे में कौन, कहां किन हालात में था इसका अंदाजा ही नहीं लग रहा था। प्रशासन को केवल उनकी खबर मिल रही थी जो अस्पतालों तक आ रहे थे या सड़कों पर निकल रहे थे लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजर रहा था हालात बिगड़ते जा रहे थे।
हमीदिया अस्पताल के कंपाउंड में लाशों की कतार लगी थी और सवाल था कि इतनी लाशों का किया क्या जाए। इन लाशों की फिक्र थी तो एक ऐसे शख्स को जिसे 3 दिसंबर 1984 के बाद सारा भोपाल डॉक्टर डेथ के नाम से जानता है। इस शख्स ने गैस की शिकार लगभग तीन हजार लाशों का पोस्टमॉर्टम किया। तमाम लावारिस लाशों की तस्वीरें खिंचवाईं और उनका रिकॉर्ड तैयार करके रखवाया ताकि आगे जाकर उनकी पहचान की जा सके।
लाशों का पोस्टमॉर्टम ही ये तय करने वाला था कि मौत की वजह क्या है। इन लाशों का गुनहगार कौन है। जो जहर इतनी जिंदगियों को लाश बना गया वो आखिर आया कहां से। लेकिन इसी भोपाल शहर में एक शख्स ऐसा भी था जिसे यूनियन कार्बाइड में सोए शैतान की खबर थी। उसे अहसास था कि ये शैतान कभी भी जाग सकता है। इस शख्स का नाम है राजकुमार केसवानी।
उसे अफसोस है अपनी खबर के सच होने का
भोपाल के एक स्थानीय दैनिक में पत्रकार राजकुमार केसवानी ने यूनियन कार्बाइड में खौलते जहर की तमाम खबरें दीं। मगर इन खबरों पर कान देने वाला कोई नहीं था। बेखबर सरकार चैन की नींद सोती रही। राजकुमार केसवानी लगातार खबरें लिखते रहे। उन्होंने राष्ट्रीय अखबारों में भी कार्बाइड के कारनामे का खुलासा किया मगर भोपाल में बैठी सरकार ही कंपनी की निगहबान बनी बैठी थीं। खबरनवीस को अपनी लिखी खबर के सच होने का गुरूर होता है मगर राजकुमार केसवानी को गहरा अफसोस है। उन्होंने इस सीरीज में आखिरी खबर 8 अक्टूबर 1984 को बेहद गुस्से में लिखी थी। हेडिंग थी-अब भी सुधर जाओ वर्ना मिट जाओगे।
एक सतर्क पत्रकार की चेतावनी को नजर अंदाज करने का नतीजा पूरा भोपाल भुगत रहा था। लेकिन हालात कितने भयावह हो चुके थे इसका अंदाजा तब हुआ जब भोपाल में 3 दिसंबर की सुबह सूरज निकला। भोपाल के रेलवे स्टेशन ने सारी रात जहर का असर झेला था। कंट्रोल रूम को स्टेशन के खराब हालात की खबर मिल रही थी। सुबह-सुबह भोपाल के आला अफसरों का अमला रेलवे स्टेशन पहुंचा। तकरीबन पांच बज रहे थे। बहैसियत कप्तान स्वराज पुरी भी रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां का जो वाकया वो बयान करते हैं वो रोंगटे खड़े कर देता है। लोग स्टेशन पर ऐसे पड़े थे जैसे सोए पड़े हों। हर तरफ लाशें ही नजर आ रही थीं।
तीन दिसंबर की सुबह सूरज चढ़ता गया और चढ़ते सूरज के साथ भोपाल के आसमान में चीलें और गिद्ध मंडराने लगे। इनका मंडराना ही गवाही दे रहा था कि भोपाल की सड़कों पर कितनी लाशें बिछी हैं। इन लाशों में लोग तो थे ही, बड़ी तादाद में बेजुबान जानवर और मवेशी भी थे लेकिन जब इंसानों की लाशें उठाने वाला ही कोई नहीं था तो जानवरों की फिक्र कौन करता। भोपाल के कलेक्टर रहे मोती सिंह शहर और सड़कों के जो हालात बयान करते हैं वो दोजख से भी बुरा है। इंसान ही इंसानी लाशों को जानवरों की तरह उठा रहे थे। गाड़ियों में भर रहे थे। हर तरफ लाशों से उठ रही बदबू भरी थी। लेकिन वहां तो जिंदा इंसान भी लाशों में तब्दील हो गया था। जो बच गए थे उनके सारे अहसास ही जैसे मर गए थे।
एक डॉक्टर जिसे नया नाम मिला डॉक्टर डेथ
यूं तो सरकारी आंकड़ा साढ़े तीन हजार लाशों तक पहुंचा लेकिन गैरसरकारी आंकड़ा कहता है कि मरने वाले दस हजार से ज्यादा थे। जहर के असर से लोग आज तक मर रहे हैं और आगे भी मरेंगे लेकिन यूनियन कार्बाइड का शैतान टैंक नंबर 610 आज भी वहीं खड़ा है। इस टैंक का ढक्कन BHEL के इंजीनियरों ने बंद तो कर दिया लेकिन मिथायल आईसोसायनाइड का शैतान अब भी आजाद है और भोपाल की रगों में दौड़ रहा है। कहते हैं इसने अब तक 40 हजार जानें ली हैं। आगे और कितनी जानें लेगा कोई नहीं जानता। जो बेमौत मारे गए, जिनके अपने उनसे जुदा हो गए उन्हें आखिरी इंसाफ कभी मिलेगा भी या नहीं कोई नहीं जानता लेकिन तारीख के काले पन्नों में भोपाल की वो जहरीली रात हमेशा के लिए दर्ज रहेगी। शहर की सरजमीं पर बिछी थीं 4000 से ज्यादा लाशें। उन खौफनाक पलों के सबसे बड़े गवाह हैं डॉक्टर डेथ। भोपाल के लोग उनको इसी नाम से जानते हैं।
उनके लिए भी उन दर्द के लम्हों को दोबारा जीना आसान नहीं, कलेजा चाहिए। वो बताते हैं कि कैसे पहले मानवता पर टूटा था एक गैस का कहर। उस रोज एक ही दिन में उन्होंने किया था सात सौ अस्सी लाशों का पोस्टमॉर्टम। एक हफ्ते में 3 हजार लाशों के साथ चीरफाड़ करने के बाद मौत नाचती थी उनकी आंखों के सामने। विभाग में तीन चार लोग थे। सरकार से परमीशन ली कि सबका पोस्टमॉर्टम नहीं करेंगे।
वे ही वो शख्स हैं जिन्होंने पहली बार दुनिया को बताया था यूनियन कार्बाइड के किलर टैंक नंबर 610 का सच क्योंकि किलर टैंक नंबर 610 से निकली गैस का एनालिसिस किया गया तो उसमें से वो पदार्थ मिले जो लाशों पर भी पाये गये। मतलब गैस कहीं और से नहीं उसी टैंक से आई थी। आज भी दर्द का वो मंजर यादकर उनका कलेजा फट जाता है। इतना बड़ा हादसा था। एक मां एक छोटे बच्चे को गोद में लेकर पड़ी हुई है और मर गई है। एक बाप दो बच्चों को लेकर पड़ा है।
1984 के 2-3 दिसंबर की वो दरमियानी रात थी। धुंध भरे अंधेरे में शहर भोपाल के साथ-साथ यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री भी सोई पड़ी थी। तकनीकी वजहों से पिछले कई दिनों से फैक्ट्री में प्रोडक्शन ठप था लेकिन फैक्ट्री के 610 टैंक में एक शैतान सांस ले रहा था। जी हां, इस टैंक में भरी थी बेहद खतरनाक, जानलेवा, जहरीली मिथाइल आइसोसायनाइड। मौके पर तैनात फैक्ट्री के सुपरवाइजर्स को रात 11 बजे ही इस टैंक में मची खलबली का अहसास होने लगा था लेकिन ये खलबली आगे कितनी खतरनाक होने जा रही थी किसी को इसका अहसास नहीं था। टैंक का बढ़ता तापमान सबकी पेशानी पर लकीरें खींच रहा था। हालात पर काबू पाने की मशक्कत जारी थी लेकिन जल्द ही कर्मचारियों को अहसास हो गया कि अब हालात उनके हाथ से निकल चुके हैं।
घबराए टेक्नीशियंस ने आखिरी कोशिश की और इस टैंक से जुड़ने वाली तमाम पाइप लाइंस काट दीं। अंदाजा था कि शायद इसी तरह टैंक में हो रही रिएक्शन थम जाए। लिक्विड का गैस बनना रुक जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और धमाके के साथ टैंक का सेफ्टी वाल्व उड़ गया। अब अलार्म बजाने के सिवा कोई चारा नहीं था और आधी रात को ठीक बारह बज कर पांच मिनट पर यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री से खतरे का सायरन बजा लेकिन जब तक सायरन की आवाज नींद में डूबे लोगों के कान तक पहुंचती शैतान जाग चुका था। उस मौके पर फैक्ट्री में तैनात रहे लोग भी मानते हैं कि इस शैतान को यूनियन कार्बाइड ने ही पाला था। वो तमाम सुरक्षा इंतजामात का उल्लंघन कर रही थी।
सर्द हवा पर सवार जहरीली मिथाइल आईसोसायनाइड गैस शहर के भीतर घुस चुकी थी। इस गैस का असर नींद में दुबके हुए लोगों पर हुआ। उनका दम घुटने लगा। बेचैनी सी महसूस हुई और आंख खोलते ही मिर्ची का धुआं सा लगा। नींद उचटने के बाद जो बाहर निकले वो सीधे गैस की चपेट में थे। हर सेकेंड के साथ एक नया आदमी गैस का शिकार हो रहा था और घंटे भर के भीतर पुराने भोपाल शहर में मौत सड़कों पर नाच रही थी। बदहवास लोग इस जहर के असर से बचने के लिए जितना भाग रहे थे, मौत उन्हें चुन-चुन कर मार रही थी। किसी को पता नहीं था कि हुआ क्या है। किसी को ये भी पता नहीं था कि मौत सिर्फ अकेले उसी का पीछा कर रही है या और भी लोग इसके शिकार हैं।
जहर का पता नहीं था, कैसे होता इलाज
रात के तकरीबन डेढ़ बजे जहर के शैतान ने भोपाल के मशहूर हमीदिया अस्पताल की इमरजेंसी पर दस्तक दी। बीमार घबराए और दहशत में डूबे लोगों के अस्पताल पहुंचने का सिलसिला शुरू हुआ। जब तक एक-दो लोग आए इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों की समझ में कुछ नहीं आया लेकिन जल्द ही ये तादाद दर्जनों में तब्दील हो गई और तब सरकारी अमले को गैस कांड की गंभीरता का अहसास हुआ। उस वक्त भोपाल के पुलिस कप्तान थे आईपीएस स्वराज पुरी। रात की गश्त पर निकले पुरी को सड़कों की हलचल से अहसास हो गया कि कुछ गड़बड़ जरूर है। उन्होंने उस ओर बढ़ने की कोशिश की जिधर से लोग भागे आ रहे थे लेकिन जल्द ही खुली जीप के भीतर उनका गला सूखने लगा। ये हवा के झोंके के साथ आ रही गैस का असर था। उस जहरीली रात स्वराज पुरी पूरे वक्त हालात से लड़ते रहे। कभी सड़कों पर तो कभी कंट्रोल रूम में।
सरकारी अमले के दिमाग में अब तक तस्वीर साफ हो चुकी थी। जहर की शक्ल में ये कहर यूनियन कार्बाइड की चिमनियों से बरसा था। लेकिन इस जहर का असर कहां तक था और कितना था इसका अंदाजा मुश्किल था। दहशत में डालने वाली शुरुआती खबरें हमीदिया अस्पताल से आनी शुरू हुईं। जहां लाशों की तादाद हर क्षण बढ़ती जा रही थी। जब तक प्रशासन अस्पताल का मोर्चा संभालने की रणनीति बनाता कप्तान स्वराजपुरी को पुराने शहर की पुलिस चौकियों से बिगड़ते हालात की खबरें मिलने लगीं। आखिरकार उन्होंने खुद मोर्चा संभाला। जहां से भी खबर मिलती वहां पर अधिकारियों को हालात संभालने के निर्देश दिए जाते लेकिन ये सारी कोशिशें बेमानी थीं। यूनियन कार्बाइड का शैतान लगातार जहरीली गैस उगल रहा था। रिटायर्ड आईपीएस स्वराज पुरी उन हालात को बयान करते हुए कहते हैं-वो मेरे पास आए। मैंने पूछा, कौन सी गैस है? उन्होंने कहा-पता नहीं। मैंने पूछा, इसके एंटीडोट्स क्या हैं? उन्होंने कहा-पता नहीं। मैंने कहा, तो फिर आप यहां आए क्यों हैं। गेट लॉस्ट।
सरकारी अमले को ये तो पता चल गया कि गैस की लीकेज यूनियन कार्बाइड से हुई है। लेकिन अब सामने खड़े थे दो बड़े सवाल। गैस का रिसाव बंद हो तो कैसे और जो गैस रिसी है वो क्या है ये जाने बगैर मरते लोगों की जान बचाना मुश्किल था लेकिन ये बताने वाला कोई नहीं था क्योंकि खुद यूनियन कार्बाइड ने तमाम सच छुपा रखे थे।
हमीदिया अस्पताल में बीमारों की तादाद बढ़ती जा रही थी। हालात का मुकाबला करने के लिए डॉक्टरों को इमरजेंसी कॉल भेजी गई। जूनियर डॉक्टरों को जगा कर ड्यूटी पर लगाया गया। लेकिन डॉक्टरों का सारा अमला लाचार था। उन्हें ये तो पता लग रहा था कि लाशों पर जहरीले केमिकल का असर है। बीमारों के लक्षण भी उन्हें जहर का शिकार बता रहे थे। मगर ये जहर है क्या ये जाने बगैर इलाज मुश्किल था। तब अचानक और पहली बार एक सीनियर फोरेंसिक एक्सपर्ट की जुबान पर आया मिथाइल आईसोसायनाइड का नाम।
सायनाइड एक ऐसा जहर जिसे ईजाद करने वाला ही उसका स्वाद बताने के लिए जिंदा नहीं बचा लेकिन उस रात भोपाल में एक पूरी आबादी सायनाइड की सांस ले रही थी। मगर रात के अंधेरे में कौन, कहां किन हालात में था इसका अंदाजा ही नहीं लग रहा था। प्रशासन को केवल उनकी खबर मिल रही थी जो अस्पतालों तक आ रहे थे या सड़कों पर निकल रहे थे लेकिन जैसे-जैसे वक्त गुजर रहा था हालात बिगड़ते जा रहे थे।
हमीदिया अस्पताल के कंपाउंड में लाशों की कतार लगी थी और सवाल था कि इतनी लाशों का किया क्या जाए। इन लाशों की फिक्र थी तो एक ऐसे शख्स को जिसे 3 दिसंबर 1984 के बाद सारा भोपाल डॉक्टर डेथ के नाम से जानता है। इस शख्स ने गैस की शिकार लगभग तीन हजार लाशों का पोस्टमॉर्टम किया। तमाम लावारिस लाशों की तस्वीरें खिंचवाईं और उनका रिकॉर्ड तैयार करके रखवाया ताकि आगे जाकर उनकी पहचान की जा सके।
लाशों का पोस्टमॉर्टम ही ये तय करने वाला था कि मौत की वजह क्या है। इन लाशों का गुनहगार कौन है। जो जहर इतनी जिंदगियों को लाश बना गया वो आखिर आया कहां से। लेकिन इसी भोपाल शहर में एक शख्स ऐसा भी था जिसे यूनियन कार्बाइड में सोए शैतान की खबर थी। उसे अहसास था कि ये शैतान कभी भी जाग सकता है। इस शख्स का नाम है राजकुमार केसवानी।
उसे अफसोस है अपनी खबर के सच होने का
भोपाल के एक स्थानीय दैनिक में पत्रकार राजकुमार केसवानी ने यूनियन कार्बाइड में खौलते जहर की तमाम खबरें दीं। मगर इन खबरों पर कान देने वाला कोई नहीं था। बेखबर सरकार चैन की नींद सोती रही। राजकुमार केसवानी लगातार खबरें लिखते रहे। उन्होंने राष्ट्रीय अखबारों में भी कार्बाइड के कारनामे का खुलासा किया मगर भोपाल में बैठी सरकार ही कंपनी की निगहबान बनी बैठी थीं। खबरनवीस को अपनी लिखी खबर के सच होने का गुरूर होता है मगर राजकुमार केसवानी को गहरा अफसोस है। उन्होंने इस सीरीज में आखिरी खबर 8 अक्टूबर 1984 को बेहद गुस्से में लिखी थी। हेडिंग थी-अब भी सुधर जाओ वर्ना मिट जाओगे।
एक सतर्क पत्रकार की चेतावनी को नजर अंदाज करने का नतीजा पूरा भोपाल भुगत रहा था। लेकिन हालात कितने भयावह हो चुके थे इसका अंदाजा तब हुआ जब भोपाल में 3 दिसंबर की सुबह सूरज निकला। भोपाल के रेलवे स्टेशन ने सारी रात जहर का असर झेला था। कंट्रोल रूम को स्टेशन के खराब हालात की खबर मिल रही थी। सुबह-सुबह भोपाल के आला अफसरों का अमला रेलवे स्टेशन पहुंचा। तकरीबन पांच बज रहे थे। बहैसियत कप्तान स्वराज पुरी भी रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां का जो वाकया वो बयान करते हैं वो रोंगटे खड़े कर देता है। लोग स्टेशन पर ऐसे पड़े थे जैसे सोए पड़े हों। हर तरफ लाशें ही नजर आ रही थीं।
तीन दिसंबर की सुबह सूरज चढ़ता गया और चढ़ते सूरज के साथ भोपाल के आसमान में चीलें और गिद्ध मंडराने लगे। इनका मंडराना ही गवाही दे रहा था कि भोपाल की सड़कों पर कितनी लाशें बिछी हैं। इन लाशों में लोग तो थे ही, बड़ी तादाद में बेजुबान जानवर और मवेशी भी थे लेकिन जब इंसानों की लाशें उठाने वाला ही कोई नहीं था तो जानवरों की फिक्र कौन करता। भोपाल के कलेक्टर रहे मोती सिंह शहर और सड़कों के जो हालात बयान करते हैं वो दोजख से भी बुरा है। इंसान ही इंसानी लाशों को जानवरों की तरह उठा रहे थे। गाड़ियों में भर रहे थे। हर तरफ लाशों से उठ रही बदबू भरी थी। लेकिन वहां तो जिंदा इंसान भी लाशों में तब्दील हो गया था। जो बच गए थे उनके सारे अहसास ही जैसे मर गए थे।
एक डॉक्टर जिसे नया नाम मिला डॉक्टर डेथ
यूं तो सरकारी आंकड़ा साढ़े तीन हजार लाशों तक पहुंचा लेकिन गैरसरकारी आंकड़ा कहता है कि मरने वाले दस हजार से ज्यादा थे। जहर के असर से लोग आज तक मर रहे हैं और आगे भी मरेंगे लेकिन यूनियन कार्बाइड का शैतान टैंक नंबर 610 आज भी वहीं खड़ा है। इस टैंक का ढक्कन BHEL के इंजीनियरों ने बंद तो कर दिया लेकिन मिथायल आईसोसायनाइड का शैतान अब भी आजाद है और भोपाल की रगों में दौड़ रहा है। कहते हैं इसने अब तक 40 हजार जानें ली हैं। आगे और कितनी जानें लेगा कोई नहीं जानता। जो बेमौत मारे गए, जिनके अपने उनसे जुदा हो गए उन्हें आखिरी इंसाफ कभी मिलेगा भी या नहीं कोई नहीं जानता लेकिन तारीख के काले पन्नों में भोपाल की वो जहरीली रात हमेशा के लिए दर्ज रहेगी। शहर की सरजमीं पर बिछी थीं 4000 से ज्यादा लाशें। उन खौफनाक पलों के सबसे बड़े गवाह हैं डॉक्टर डेथ। भोपाल के लोग उनको इसी नाम से जानते हैं।
उनके लिए भी उन दर्द के लम्हों को दोबारा जीना आसान नहीं, कलेजा चाहिए। वो बताते हैं कि कैसे पहले मानवता पर टूटा था एक गैस का कहर। उस रोज एक ही दिन में उन्होंने किया था सात सौ अस्सी लाशों का पोस्टमॉर्टम। एक हफ्ते में 3 हजार लाशों के साथ चीरफाड़ करने के बाद मौत नाचती थी उनकी आंखों के सामने। विभाग में तीन चार लोग थे। सरकार से परमीशन ली कि सबका पोस्टमॉर्टम नहीं करेंगे।
वे ही वो शख्स हैं जिन्होंने पहली बार दुनिया को बताया था यूनियन कार्बाइड के किलर टैंक नंबर 610 का सच क्योंकि किलर टैंक नंबर 610 से निकली गैस का एनालिसिस किया गया तो उसमें से वो पदार्थ मिले जो लाशों पर भी पाये गये। मतलब गैस कहीं और से नहीं उसी टैंक से आई थी। आज भी दर्द का वो मंजर यादकर उनका कलेजा फट जाता है। इतना बड़ा हादसा था। एक मां एक छोटे बच्चे को गोद में लेकर पड़ी हुई है और मर गई है। एक बाप दो बच्चों को लेकर पड़ा है।
रविवार, 15 दिसंबर 2013
9 साल में बेरोजगारों से 1000 करोड़ की ठगी
भोपाल। परीक्षा और नौकरी के नाम पर व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापमं )और उसमें सक्रिय दलालों ने पिछले 9 साल में सवा करोड़ बेरोजगारों को करीब 1000 करोड़ का चूना लगाया है। हालांकि अब धीरे-धीरे इस फर्जीवाड़े की परते खुलने लगी हैं,लेकिन जो ठगे गए हैं उन्हें न्याय मिलना दूर की कड़ी है। यही नहीं व्यापमं ने पिछले सालों में डेढ़ सौ से अधिक परीक्षाएं ली अरबों रूपए परीक्षा शुल्क के नाम पर बेरोजगारों से वसूले और उनके साथ धोखा भी किया।
उल्लेखनीय है कि पीएमटी फर्जीवाड़े की तहकीकात में लगी एसटीएफ को व्यापमं में हुए अन्य घोटालों की जानकारी हाथ लग रही है। जिसमें एक ऐसे नेटवर्क का पता चला है जिसने व्यापमं के माध्यम से होने वाली प्रवेश,प्रतियोगी और भर्ती परीक्षाओं को अपने कब्जे में ले लिया था। दलालों में मनमाफिक रकम लेकर नौकरियां बांटी,प्रवेश दिलवाया और शासन-प्रशासन को लॉलीपप चटाया। अब जब परते खुलने लगी हैं तो कांग्रेस ने व्यापमं द्वारा कराई गई सभी परीक्षाओं की सीबीआई जांच कराने की मांग की है।
घोटालों की लंबी लिस्ट
प्रारंभिक पड़ताल में व्यापमं में हुए 17 घोटालों का पता चला है। इस बात का जिक्र कांग्रेस ने करते हुए महाघोटाले पर ब्लैक पेपर भी जारी किया था। पिछले 9 साल में व्यापमं द्वारा जो भी प्रवेश या भर्ती परीक्षाएं आयोजित की गई हैं उनमें पीएमटी घोटाले में दलालों और भाजपा नेताओं पर तीन अरब कमाने का आरोप लगाया गया है। डीमेट घोटाला, बीडीएस घोटाला, डीएड घोटाला, मेडिकल कालेज में पीजी में प्रवेश दिलाने का घोटाला, पांच लाख लेकर इंजीनियर बनाने का घोटाला, माध्यमिक शिक्षा मण्डल में घोटाला, राज्य ओपन परीक्षा घोटाला, डिग्री घोटाला, संविदा शिक्षकों की भर्ती में युवाओं से 175 करोड़ रूपए का धोखा, व्यापमं में कम्प्यूटर खरीदी में डेढ़ करोड़ का घोटाला, पुलिस भर्ती में घोटाला, टाइपिंग परीक्षा घोटाला, युवाओं के साथ धोखा, शिक्षा में घोटाले ही घोटाले, वन रक्षक पदों पर भर्ती घोटाला, पटवारी परीक्षा घोटाला शामिल हैं।
शिक्षा में फर्जीवाड़े का आभास विंध्य से
व्यावसायिक परीक्षा मंडल में हुए तमाम फर्जीवाड़े को उजागर करने वाली स्पेशल टॉस्क फोर्स (एसटीएफ) के मुखिया को शिक्षा में फर्जीवाड़े का आभास विंध्य से हुआ। एसटीएफ एडीजी सुधीर कुमार शाही 1988 बैच के आईपीएस हैं। वह दिल्ली विवि से बीए एलएलबी हैं। आईपीएस ट्रेनिंग के बाद वर्ष 1990 में उनकी पहली प्रोविजनल पदस्थापना सतना जिले के अमरपाटन थाना में हुई। यहीं उन्होंने शिक्षा में फर्जीवाड़ा का खुला खेल देखा। मन में शिक्षा शुद्धीकरण का संकल्प लिया। 22 वर्षो के लंबे कैरियर में उन्हें शिक्षा शुद्धीकरण का पूरा मौका नहीं मिल सका। वर्ष 2011 में पुलिस मुख्यालय ने उन्हें एसटीएफ के एडीजी का प्रभार सौंपा। कुछ दिनों बाद उनको व्यापमं में हो रहे फर्जीवाड़े की भनक लगी और उन्होंने व्यापमं में हो रहे फर्जीवाड़े पर नजर रखना शुरू किया। इसके कुछ ही दिनों बाद एसटीएफ चीफ ने व्यापमं में सिलेसिलेवार एक से बड़े एक घोटालों का पर्दाफाश कर सैकड़ों को हवालात पहुंचा दिया।
सत्ता और शिक्षा जगत की तमाम हस्तियों की रातों की नींद और दिन का चैन छीन लेने वाले शाही ही हैं जिन्होंने व्यापमं में पीएमटी, प्रीपीजी, खाद्य निरीक्षक एवं नापतौल परीक्षा, दुग्ध संघ भर्ती परीक्षा, उप निरीक्षक भर्ती, पुलिस आरक्षक भर्ती, बीडीएस, टायपिंग बोर्ड, ओपन स्कूल फर्जीवाड़ा पर पर्दा उठा सैकड़ों रसूखदारों को हवालात पहुंचाया।
अब नौकरी पर संकट
व्यापमं के माध्यम से फर्जीवाड़ा करके डॉक्टर बनने वालों का जेल जाने का सिलसिला तो शुरू हो ही गया है,अब अन्य विभागों में नौकरी करने वाले सैकड़ों लोगों की नौकरी पर भी खतरा मंडराने लगा है। व्यापमं फर्जीवाड़े में पुलिस की सब इंस्पेक्टर और कांस्टेबल भर्ती परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों में से भी कई लोगों की नौकरी पर खतरा मंडरा रहा है। हालांकि अभी तक पुलिस को ऐसे लोगों की सूची व्यापमं से मिलने का इंतजार है। वहीं शिक्षा विभाग की संविदा शिक्षकों और वन विभाग की वनरक्षकों की भर्ती परीक्षा को लेकर अभी एसटीएफ को साक्ष्य नहीं मिले हैं जिससे इन भर्तियों पर फिलहाल कोई संकट नहीं दिखाई दे रहा है।
2012 की भर्ती में हुआ खेल
एसटीएफ को सब इंस्पेक्टर और कांस्टेबल की वर्ष 2012 में हुई भर्ती में फर्जीवाड़ा मिला है। उपनिरीक्षक भर्ती घोटाले में एसटीएफ ने आईपीएस अधिकारी आरके शिवहरे सहित 25 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। आरोप है कि व्यापमं के अफसरों ने शिवहरे सहित अन्य आरोपियों से सांठगांठ कर अधिकतर परीक्षार्थियों का चयन गलत तरीके से कर दिया।
एसटीएफ ने इसके लिए हुए लाखों रुपए के लेन-देन का हिसाब भी जब्त किया है। एसटीएफ ने आरोपियों पर धारा 420, 467, 468, 471 और आईटी एक्ट की धाराओं में मामला दर्ज किया है। शिवहरे पर आरोप है कि उन्होंने गौरव श्रीवास्तव, सेम श्रीवास्तव, प्रलेख तिवारी के चयन में 15 लाख प्रति परीक्षार्थी के हिसाब से 45 लाख रुपए व्यापमं के सीनियर सिस्टम एनालिस्ट नितिन महिंद्रा को दिए।
जिसके चलते अब पुलिस भी सख्त तेवर अपनाने लगी है। डीजीपी नंदन दुबे ने बताया है कि सब इंस्पेक्टर की भर्ती तो बहुत पहले से ही व्यापमं के माध्यम से हो रही थी, लेकिन कांस्टेबल की भर्ती पहली बार व्यापमं से कराई गई है। एसटीएफ द्वारा इन परीक्षाओं में पाई गई गड़बडिय़ों से जिन लोगों की भर्ती रुपए देकर हुई है, उन्हें तत्काल बर्खास्त किया जाएगा। साथ ही उनकी गिरफ्तारी भी की जाएगी। इसी के मद्देनजर सब इंस्पेक्टर और कांस्टेबल परीक्षा-2012 की जांच एसटीएफ ने तेज कर दी है। वहीं व्यापम ने भी ऐसी लोगों को चिह्न्ति करने में जुटा है जो पैसे देकर पुलिस विभाग में भर्ती हो गए। सूत्रों की मानें तो प्रारंभिक जांच में करीब 15 से अधिक पुलिसकर्मी ट्रेस हुए हैं, इसमें आठ सब इंस्पेक्टर शामिल हैं। सभी फर्जी पुलिसकर्मी नौकरी में तैनात है। अब व्यापमं इनको चिह्न्ति करने के बाद पुलिस को इनकी सूची सौंपगी। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सबसे पहले तो इनको बर्खास्त किया जाएगा। वहीं एसटीएफ आरोपियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करेगी। वहीं इस फर्जीवाडे में शामिल अधिकारियों पर एसटीएफ ने पहले ही शिकंजा कस दिया है। मामले में लिप्त अधिकारियों की गिरफ्तारी के प्रयास भी तेज हो गए हैं।
125 करोड़ वसूला फीस
तमाम फजीवाड़ों के साथ 9 सालों में व्यापम ने बेरोजगारों से 125 करोड़ रूपए फीस के रूप में वसूला है। जबकि गिनती के बेरोजगारों को ही नौकरी मिली है। व्यापमं ने अकेले एक साल (वर्ष 2011 से फरवरी 2012 तक) में ही परीक्षा शुल्क के माध्यम से 83 करोड़ रुपए की राशि अर्जित की है। व्यापमं को इससे पहले 2009 में 24 करोड़ 86 लाख रुपए और 2010 में 24 करोड़ 68 लाख रुपए शुल्क के रूप में प्राप्त हुए थे। शासन द्वारा शासकीय नौकरियों के लिए बेरोजगारों से विभागों और व्यापम के माध्यम से भारी शुल्क वसूला जा रहा है। अनेक विज्ञापनों में भृत्य जैसे चतुर्थ श्रेणी पद के लिए सामान्य श्रेणी के बेरोजगार आवेदकों से 600 रुपए और अनुसूचित जाति जनजाति के बेरोगारों से 300 रुपए वसूल किए जाते हैं।
बाजार में नौकरी की रेट लिस्ट
कांग्रेस नेता अजय सिंह का आरोप है कि व्यापमं के माध्यम से मिलने वाली नौकरियों के लिए दलालों ने बकायदा रेट लिस्ट भी तैयार कर रखी थी। जिसकी बाजारों में भी चर्चा थी। जिसमें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के लिए 50 हजार रुपए, तृतीय श्रेणी के लिए सवा लाख रुपए, द्वितीय श्रेणी के लिए 4 से 10 लाख रुपए, वेटनरी के लिए 3 लाख रुपए तथा पीएमटी के लिए 10 से 15 लाख रुपए तक लिए जाने की चर्चा है।
फर्जीवाड़ा में सुधीर शर्मा भी शामिल
व्यापमं द्वारा आयोजित परीक्षाओं के फर्जीवाड़े में खनिज माफिया सुधीर शर्मा भी शामिल है। पीएमटी में हुए फर्जीवाड़े के खुलासे ने शिक्षा माफिया और सरकारी तंत्र की जुगलबंदी को सामने ला दिया है। इंदौर के मास्टरमाइंड जगदीश सागर के पकड़े जाने के बाद कडिय़ां एक-दूसरे से जुड़ती गई परिणामस्वरूप कई नाम सामने आए और गिरफ्तारियां हुईं। अब तक पीएमटी परीक्षा आयेाजित करने वाले व्यावसायिक परीक्षा मंडल के तत्कालीन परीक्षा नियंत्रक पंकज त्रिवेदी के अलावा प्रिंसिपल सिस्टम एनालिस्ट नितिन महेंद्रा व सीनियर सिस्टम एनालिस्ट अजय सेन और एक अन्य अधिकारी पहले ही गिरफ्तार हो चुके हैं। इसके अलावा भी कई अन्य मध्यस्थ इस समय जेल में हैं। वहीं एसटीएफ के हाथ इस बात के पुख्ता प्रमाण लगे हैं कि मुन्ना भाईयों की भर्ती आपसी मिली भगत से ही संभव हुई है। एसटीएफ ने अपनी जांच में व्यापमं के अधिकारियों के अलावा कई मुन्ना भाइयों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। एसटीएफ ने 345 छात्रों के चयन को भी निरस्त करने की सिफारिश की थी। जांच आगे बढ़ी तो भाजपा शिक्षा प्रकोष्ठ के प्रदेश संयोजक सुधीर शर्मा भी इसमें फंस गए हैं। फर्जीवाड़ा में नाम सामने आने के बाद व्यवसायी एवं भाजपा नेता सुधीर शर्मा भूमिगत हो गए हैं। नोटिस जारी होने के बाद एसटीएफ अफसरों को बयान देने नहीं आने के बाद अब उनकी तलाश शुरू हो गई है। इसके अलावा एसटीएफ ने व्यापमं द्वारा आयोजित कराई गई वर्ष-2012 की प्री-पीजी परीक्षा में 17 व्यक्तियों के विरुद्ध, फूड इस्ंपेक्टर परीक्षा-2012 में 29 व्यक्तियों के विरुद्ध, दुग्ध संघ भर्ती परीक्षा-2012 में 19 व्यक्तियों के विरुद्ध, सूबेदार-उप निरीक्षक-प्लाटून कमांडर भर्ती परीक्षा-2012 में 25 व्यक्तियों के विरुद्ध तथा पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा-2012 में हुये फजीवाड़ा के संबंध में 53 व्यक्तियों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की है। प्रीपीजी परीक्षा 2012 में व्यापमं के तत्कालीन नियंत्रक डॉ. पंकज त्रिवेदी एवं सीनियर सिस्टम एनालिस्ट नितिन मोहिन्द्रा ने योजना तैयार करके परीक्षा में आने वाले प्रश्नों की माडल आंसर की परीक्षा की पूर्व रात्रि को निकालकर उसकी फोटोकॉपी कर छात्रों को उपलब्ध कराई। ये छात्र परीक्षा की पूर्व रात्रि को भोपाल आकर पूर्व निर्धारित स्थानों पर रुके जहां इन्होंने परीक्षा की तैयारी नितिन मोहिन्द्रा द्वारा उपलब्ध कराई गई माडल आन्सर-की के आधार पर की। इन छात्रों ने दूसरे दिन प्रीपीजी परीक्षा का प्रश्नपत्र हल कर प्रीपीजी परीक्षा में सफलता प्राप्त की। उक्त छात्र वर्तमान में प्रदेश के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों में पीजी कर रहे हैं। एसटीएफ के अनुसार फूड इंस्पेक्टर परीक्षा-2012, दुग्ध संघ भर्ती परीक्षा-2012, सूबेदार-उप निरीक्षक-प्लाटून कमांडर भर्ती परीक्षा-2012 तथा पुलिस आरक्षक भर्ती परीक्षा-2012 में नितिन मोहिन्द्रा एवं चन्द्रकांत मिश्रा द्वारा डॉ. पंकज त्रिवेदी के कहे अनुसार अभ्यर्थियों की ओएमआर शीट के स्कैंड डाटा में कम्प्यूटर पर सही उत्तर दर्ज करने के बाद सूचना के अधिकार अधिनियम की आड़ में ओएमआर शीट स्ट्रांग रूम से निकलवाकर गोले भरकर पास कराया है। जिसमें से कई अभ्यर्थी सम्बन्धित विभागों में नौकरी कर रहे हैं।
सोमवार, 30 सितंबर 2013
विधानसभा चुनाव में न मोदी फैक्टर न ही राहुल फैक्टर
जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होनेवाले हैं, उनमें खास कर चार बड़े राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली की स्थितियां अलग-अलग हैं. मुद्दे अलग हैं, लेकिन एक साझी बात यह है कि इन राज्यों में मुकाबला दो प्रमुख दलों के बीच है. इन चुनावों में न तो मोदी फैक्टर काम करता हुआ दिखेगा और न ही राहुल फैक्टर. मोदी की सभाएं जरूर बड़ी होंगी, भीड़ भी जुटेगी, लेकिन इससे विधानसभा चुनावों में भाजपा को कितनी ताकत मिलेगी, यह संशय का विषय है.
भारत में चुनावों की प्रकृति बदल रही है. विधानसभा के चुनाव भी राष्ट्रपति प्रणाली की तरह अपना मुख्यमंत्री चुनने के लिए हो रहे हैं. राज्यों के चुनाव अब मुख्यमंत्री पद के दावेदारों के चेहरों के इर्द-गिर्द लड़े जा रहे हैं. वर्ष 2012 में हुआ गुजरात और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तो इसका हाल का उदाहरण है. और भी कई ऐसे उदाहरण हैं, जिनके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है.
थोड़ा पीछे पलट कर देखें, तो 1971 से एक दो अपवादों (आंध्र प्रदेश) को छोड़ कर अब तक धीरे-धीरे एक पैटर्न-सा बन गया है. 1971 में पहली बार इंदिरा गांधी ने सिर्फ लोकसभा का चुनाव अलग से कराया. 1967 तक सभी राज्यों की विधानसभाओं और आम चुनाव साथ-साथ होते रहे थे. 1972 के बाद से लोकसभा चुनाव और राज्यों के विधानसभा चुनाव साथ-साथ नहीं होते.
अब चुनाव के तौर-तरीके बदल गये हैं. दृष्टि बदली है, राजनीति बदली है. इस बदली हुई राजनीति का विश्लेषण करें, तो कह सकते हैं कि विधानसभा का चुनाव अलग धरातल पर, अलग नेतृत्व में आयोजित किया जाता रहा है. देश की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियां, इन चुनावों में कई बार शोभा की वस्तु मात्र नजर आती हैं. विधानसभा चुनाव दो स्तरों पर लड़े जाते हैं. यह राज्य आधारित विशेष मुद्दों पर और स्थानीय माहौल पर आधारित होता है. राज्य स्तर पर मतदाताओं की निगाहें मुख्यमंत्री और इस पद के दावेदारों पर होती है. विधानसभा क्षेत्र के स्तर पर वह प्रत्याशी विशेष को प्राथमिकता देता है. मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवारों को देखते हुए मतदाता अपने प्रतिनिधियों को चुनता है. जिन पांच राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं, उनमें खास कर चार बड़े राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, दिल्ली की स्थितियां अलग-अलग हैं. मुद्दे अलग हैं, लेकिन एक साझी बात यह है कि इन राज्यों में मुकाबला दो प्रमुख दलों के बीच है.
अगर मध्यप्रदेश को देखें, तो वर्ष 2003 से पहले कांग्रेस की लगातार 10 वर्षो तक सरकार थी. 1993 में बाबरी मसजिद गिराये जाने के बाद मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश की सरकार बर्खास्त कर दी गयी. 1993 के नवंबर में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में दिग्विजय सिंह जीते और उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया. 1993-98 तक चली सरकार में कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व का दखल रहा. प्रत्याशियों के चयन में उसका हस्तक्षेप रहा. लेकिन, 1998 के चुनाव में दिग्विजय सिंह दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास लिस्ट लेकर आये और उनसे यह कहते हुए इस सूची पर सहमति ली कि आप इजाजत दें, हम जीत हासिल करेंगे और सरकार बनायेंगे. अर्थात, उन्होंने चुनाव जीतने का आश्वासन देकर प्रत्याशियों की अपनी सूची पर सोनिया की रजामंदी ले ली. इस तरह प्रत्याशियों का चयन आलाकमान ने नहीं, मुख्यमंत्री ने किया. आज ज्यादातर राज्यों में यही हो रहा है. पिछले वर्ष गुजरात में चुनाव हुआ. गुजरात के उदाहरण को लें, तो वहां के मुख्यमंत्री सूची लेकर आये और संसदीय बोर्ड ने इस पर अंतिम मुहर लगा दी. इस लिहाज से यह भारतीय राजनीति का एक नया पैटर्न है.
लेकिन पांच राज्यों के आगामी चुनाव में कांग्रेस ने एक नया प्रयोग किया है. यह संभवत: राहुल गांधी की राय पर या उनके दिशा-निर्देश में किया गया हो सकता है. मध्य प्रदेश में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में दिल्ली से सुरेश पचौरी को मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में भेजा गया. इस बार राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश कांग्रेस की मांग पर ज्योतिरादित्य सिंधिया को वहां का चुनाव प्रभारी बना कर भेजा है. भाजपा ने वर्ष 2003 में उमा भारती को मध्य प्रदेश चुनाव का प्रभारी बना कर भेजा था. वही रास्ता इस बार कांग्रेस ने अपनाया है. कांग्रेस को ज्योतिरादित्य में सबको एकजुट करने का माद्दा दिखता है.
वर्तमान मध्य प्रदेश तीन हिस्सों में बंटा हुआ है. ग्वालियर जबलपुर, और सागर. सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से प्रमुख इन तीन क्षेत्रों की राजनीति अलग-अलग है. ग्वालियर राजघराने से जुड़े होने के कारण ग्वालियर क्षेत्र में सिंधिया का प्रभाव पहले से है. वे भाजपा को जबरदस्त टक्कर देंगे. भाजपा के मुकाबले कांग्रेस जो कल तक बिखरी हुई नजर आ रही थी, उसे नया चेहरा मिला है. दिग्विजय हाशिये पर डाल दिये गये हैं. ऐसी खबरें आ रही हैं कि सिंधिया की प्रेसवार्ता में दिग्विजय को प्रवेश नहीं करने दिया गया. उनके मंच पर दिग्विजय को आने की इजाजत नहीं है. इससे उनके समर्थकों में निश्चित रूप से निराशा होगी, लेकिन इस निराशा का फायदा भाजपा को कितना मिल पाता है, यह बाद में ही पता चलेगा.
मध्य प्रदेश के संदर्भ में उल्लेखनीय बात यह है कि यह पहला राज्य है जहां शुरू से ही गांव-गांव में जनसंघ और कांग्रेस दोनों का ही प्रभाव रहा है. शुरू के दिनों से ही मध्य प्रदेश में दोनों दलों के बीच कमोबेश बराबर की लड़ाई रहती है. उम्मीदवारों का चयन, सरकार का प्रदर्शन, मुख्यमंत्री का प्रत्याशी मायने रखता है. शिवराज सिंह चौहान अब तक अपने स्वभाव, व्यवहार और नीतियों से लोकप्रिय नेता प्रतीत होते हैं. आंकड़ों में राज्य सरकार का प्रदर्शन भी बेहतर दिखता है. लेकिन, जिस तरह से 2003 में दिग्विजय के खिलाफ बिजली, सड़क, पानी का मुद्दा उभरा और भाजपा जीत गयी, उसी तरह अगर इस बार कोई नया मुद्दा आता है, तो हिसाब-किताब बिगड़ भी सकता है. मध्य प्रदेश को खेती के क्षेत्र में देश में शीर्ष स्थान प्राप्त है. कृषि में 14 फीसदी की वृद्धि उसकी बड़ी उपलब्धि रही है. यह वोट में कन्वर्ट होता है या नहीं, यह देखने वाली बात होगी.
अगर राजस्थान की स्थिति देखें, तो कई लोगों का मानना है कि यहां वसुंधरा राजे का पलड़ा भारी है. लेकिन, अशोक गहलोत के कामकाज को कमोबेश संतोषजनक माना जाता रहा है. हालांकि, हाल के दिनों में कांग्रेस के मंत्रियों पर जिस तरह से गंभीर आरोप लगे हैं और उन्हें जेल जाना पड़ा है, उससे जनता में सरकार की छवि खराब हुई है.
वसुंधरा राजे ने 2003 में जब अशोक गहलोत को पराजित किया था, उस समय उनकी सरकार काफी अलोकप्रिय थी. प्रदेश सरकार ने किसानों, आदिवासियों पर गोलियां चलवायी थीं. जाट व गुज्जर समुदाय के लोग गहलोत के खिलाफ खड़े हो गये थे. उस वक्त की तुलना में 2013 में होनेवाले विधानसभा चुनाव के बारे में यह तो कहा ही जा सकता है लोगों में इस वक्त उतना गुस्सा नहीं दिखता. सरकार का कामकाज भी ठीक ही रहा है. लेकिन, आम धारणा है कि वसुंधरा के नेतृत्व में भाजपा प्रदेश में बेहतर करेगी.
अगर छत्तीसगढ़ की बात करें, तो यहां कांग्रेस पूरी तरह से नेतृत्वविहीन है. अजीत जोगी प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता हैं, लेकिन कांग्रेस में ही जोगी की स्वीकार्यता को लेकर समस्या है. कांग्रेस नेतृत्व इस समस्या का समाधान नहीं कर पा रहा है. इसका प्रभाव आनेवाले विधानसभा चुनाव में दिख सकता है. वहीं छत्तीसगढ़ में भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह अपने कामकाज से लोकप्रिय हैं. केंद्र सरकार जो खाद्य सुरक्षा कानून लेकर आयी है, उसे रमन सिंह छत्तीसगढ़ में पहले से ही सफलतापूर्वक चला रहे हैं. वहां जनता को ज्यादा मात्र में व सस्ता अनाज मुहैया कराया जा रहा है. खाद्य सुरक्षा कानून को अब राष्ट्रीय स्तर पर पास किया गया है, लेकिन इससे कांग्रेस का जनाधार कितना बढ़ेगा, कांग्रेस के पक्ष में कितनी हवा बनेगी, इसका अंदाजा लगाना कठिन है.
जहां तक दिल्ली का सवाल है, तो यहां भाजपा शीला दीक्षित के मुकाबले में काफी कमजोर दिख रही है. राजनाथ सिंह जब दोबारा भाजपा अध्यक्ष बने थे, उसी दिन लोगों ने अंदाजा लगा लिया था कि प्रदेश में भाजपा अध्यक्ष किसे बनाया जायेगा. विजय गोयल अध्यक्ष बनाये गये. उनका राजनीतिक कौशल बड़ा है. वे मुद्दे खड़े कर सकते हैं, अभियान छेड़ सकते हैं. वे विभिन्न तरह के मुद्दों को उठा भी रहे हैं. लेकिन, गोयल शीला के मुकाबले अपनी पार्टी में कमजोर हैं. उनकी छवि विवादास्पद है और वे दिल्ली भाजपा के सर्वमान्य नेता नहीं हैं. डॉ हर्षवर्धन की छवि सर्वमान्य नेता की है. जनता उन्हें शीला दीक्षित के मुकाबले देखना भी चाहेगी, लेकिन भाजपा नेतृत्व हर्षवर्धन के मामले में साहस नहीं दिखा पा रहा है. हालांकि, भाजपा ने नितिन गडकरी को दिल्ली का प्रभारी बनाया है. दो सह-प्रभारी भी नियुक्त किये गये हैं. उनके प्रभारी बनने से कार्यकर्ताओं में काफी उम्मीद जगी थी. इसके बावजूद विजय गोयल हटाये नहीं गये. न हर्षवर्धन प्रभारी बनाये गये. हर्षवर्धन को चुनाव अभियान का प्रभारी बनाया जाता, तो भाजपा के संभलने की उम्मीद की जा सकती थी. इस कमजोरी के बीच भाजपा महंगाई को लेकर जनता की नाराजगी का कितना फायदा कितना उठा पायेगी, कहना मुश्किल है.
दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) के कार्यकर्ता काफी सक्रिय हैं. वे जनता से जुड़े मुद्दे, उनको प्रभावित करनेवाले बुनियादी सवालों को उठा कर अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं. कहा जा रहा है कि ‘आप’ इस चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करेगी. लेकिन, ‘आप’ कांग्रेस का खेल बिगाड़ती है या भाजपा का, देखना दिलचस्प होगा.
इन चुनावों के मद्देनजर कराये गये सर्वेक्षणों और उनके नतीजों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े किये जा रहे हैं. सर्वेक्षणों की साख कम हुई है. सवाल वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता का है. एक अंगरेजी अखबार द्वारा कराये गये सर्वे को लेकर दावा किया गया है कि यह जाति के आधार पर कराया गया है. उक्त अखबार को खुद भी अपने सर्वे पर भरोसा नहीं है. उसमें जिस दल की बढ़त दिखायी गयी है, उस दल के नेता भी दबे स्वर में सर्वे के निष्कर्षो पर शंका जता रहे हैं. दरअसल, हमारे देश में सर्वे के लिए अभी बहुत लोक-प्रशिक्षण नहीं हो पाया है. मतदाता इस लिहाज से उतने जागरूक नहीं हैं. वैसे भी हमारे देश में गुप्त मतदान की व्यवस्था है और इसके तहत सर्वे की थीसिस को ही खारिज किया जाता रहा है. खिचड़ी तो पक नहीं रही है कि एक चावल को देख कर पूरी हांडी का पता चल जाये. अगर सर्वे के जरिये यह पता लगाने की कोशिश होती कि मतदाताओं के समक्ष इस चुनाव में कौन से प्रमुख मुद्दे हैं, वे इस चुनाव में किस मुद्दे को प्राथमिकता देंगे, तो सही सूचना निकल कर आती. आमतौर पर ऐसा नहीं किया जाता है.
जहां तक राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रभाव का सवाल है, विधानसभा चुनावों पर इसके असर को बहुत ज्यादा करके नहीं आंका जा सकता. राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से मनमोहन सिंह के नेतृत्व में चल रही यूपीए सरकार के कामकाज का मूल्यांकन नहीं होगा. हालांकि, मंहगाई केंद्र सरकार की नीतियों की देन है, इसलिए यह संभव है कि यह चुनाव में प्रमुख मुद्दा बने. इसका प्रभाव अगली सरकार पर पड़ सकता है. इस चुनाव में न तो मोदी फैक्टर काम करता हुआ दिखेगा और न ही राहुल फैक्टर. मोदी की सभाएं जरूर बड़ी होंगी, भीड़ भी जुटेगी, लेकिन इससे विधानसभा चुनाव में भाजपा को कितनी ताकत मिलेगी, यह संशय का विषय है. राज्यों के विधानसभा चुनाव मुख्य तौर पर स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व से ही प्रभावित होते रहे हैं, और इस बार इससे अलग कुछ होगा, मुङो ऐसा नहीं लगता.
गुरुवार, 26 सितंबर 2013
6 साल...2000 करोड़ स्वाहा... कुपोषण जस का तस
मप्र में 68,000 से ज्यादा बच्चे अति कुपोषित
भोपाल। प्रदेश में कुपोषण दूर करने के लिए मप्र सरकार ने 6 साल में 2000 करोड़ रूपए खर्च कर दिए हैं,लेकिन कुपोषण जस का तस है। हालात यह है कि सरकार कुपोषण दूर करने का जितना प्रयास कर रही है कुपोषण उतना ही फैल रहा है। वर्तमान में प्रदेश में कम वजन वाले बच्चों की तादाद दोगुनी हो गई है। वहीं 68 हजार से ज्यादा बच्चे अति कुपोषित हो गए हैं।
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले कुछ समय से राज्य भर में जन आशीर्वाद यात्रा जैसे अभियानों के जरिए अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाने में लगे हैं। लेकिन दूसरी ओर उनकी सरकार को खुद यह स्वीकार करना पड़ा है कि राज्य में हजारों बच्चे कुपोषण और दूसरी वैसी बीमारियों की जद में आकर जान गंवा रहे हैं, जिनसे उन्हें आसानी से बचाया जा सकता है। ये चौंकाने वाले आंकड़े वर्ष 2007 से 2013 तक केंद्र और राज्य एकीकृत बाल विकास परियोजना के पूरक पोषण आहार कार्यक्रम की हकीकत बयां करते हैं। कार्यक्रम के छह साल के आंकड़ों की पड़ताल में सामने आया कि प्रदेश में 15 लाख बच्चे कुपोषित हैं। करीब सवा लाख मासूम मौत के मुहाने पर हैं। ताजा स्थिति ने प्रदेश के माथे पर लगा कुपोषण का कलंक और गहरा दिया है। जमीनी हकीकत बताती है कि कुपोषण इसलिए बढ़ा, क्योंकि यहां पोषण आहार बनाने से लेकर बांटने तक की पूरी प्रक्रिया भ्रष्ट तंत्र और माफिया के कब्जे में है।
सालाना 400 करोड़ होता है खर्च
केंद्र और राज्य एकीकृत बाल विकास परियोजना के पूरक पोषण आहार कार्यक्रम में 6 माह से 3 साल के बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए सालाना लगभग 400 करोड़ रूपए खर्च किया जाता है, लेकिन वजनदार कोई दूसरा हो रहा है। प्रदेश में अभी 1.19 लाख बच्चे अति कुपोषित हैं। वर्ष 2007 में 6.79 लाख वजन किया गया था। इनमें से करीब 50 हजार बच्चे अति कुपोषित मिले थे। जबकि 2013 में 6.98 लाख बच्चों का वजन किया गया। इनमें अति कुपोषित 1.19 लाख मिले। यानी 68 हजार से ज्यादा बच्चे अति कुपोषित निकले। श्योपुर में बीते साल अगस्त-सितम्बर में 23 मासूमों ने कुपोषण से दम तोडा था। घटना से आहत एशियाई मानवाधिकार आयोग ने आपत्ति जताते हुए प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को कड़ा पत्र लिखा था। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने दौरा भी किया था, लेकिन नौनिहालों की सेहत के लिए सरकार प्रभावी कदम नहीं उठा पाई।
व्यवस्था पर ठेकेदार हावी
सरकार के उपक्रम एमपी स्टेट एग्रो के पास पोषण आहार की जिम्मेदारी थी। इसके बाद वर्ष 2005-06 में एग्रो कॉर्पोरेशन ने संयुक्त उपक्रम से दो कंपनियों (ठेकेदार) को ठेका दे दिया, जो आहार सप्लाई करती हैं। यह उस प्रदेश की हालत है, जहां कुपोषित बच्चों के संरक्षण के लिए केंद्रीय योजनाओं के अलावा, मध्यप्रदेश में भी बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य की दृष्टि से 30 योजनाएं चल रही हैं। जिनका मकसद मां और बच्चे की जीवन-रक्षा के लिए उत्तम सेवाएं देना है। लेकिन ये दावे कितने कागजी हैं, इसकी तसदीक खुद स्वास्थ्य मंत्री ने कर दी है। गरीब के लाचार व मासूम नौनिहाल उपचार की आधुनिक सुविधाओं व बेहतर तकनीकी तरीकों के बावजूद स्वास्थ्य केंद्रों की देहरी पर दम तोड़ रहे हैं।
एक साल में 21000 बच्चों की मौत
जनवरी 2012 से 31 दिसंबर 2012 तक मरने वाले बच्चों की यह संख्या 21,418 है। इन मौतों में 6 साल से कम के 20,086 और 6 से 12 आयु वर्ग के 1332 बच्चे शामिल हैं। कुपोषण और उसके प्रभाव से शरीर में अनायास पैदा हो जाने वाली बीमारियों से प्रदेश में औसतन 58 बच्चे रोजाना प्राण गंवा रहे हैं। कुपोषण की सहायक बीमारियों में निमोनिया, हैजा, बुखार, खसरा, तपेदिक,डायरिया, रक्तअल्पता और चेचक शामिल हैं। ये हालात पिछले पांच साल से बद् से बद्तर होते जा रहे हैं। प्रदेश में सबसे बद्तर स्थिति सतना जिले में है। जबकि यहां यूनिसेफ द्वारा चलाए जा रहे सीक न्यूबोर्न केयर यूनिट में ही 2010 में केवल चार माह के भीतर 117 नवजात शिशु मौत की गोद में समा गए थे। पिछले साल इस जिले में कुपोषण से 2001 बच्चों के मरने का सरकारी आंकड़ा आया है। जाहिर है, हालात सुधरने की बजाय विकराल हुए हैं। सतना के बाद दूसरे नंबर पर बैतूल जिला है, जहां इसी अवधि में 1071 बच्चे मरे। इसके बाद तीसरे नंबर पर छतरपुर जिला आता है, जहां 1012 बच्चों की मौतें हुईं।
60 फीसदी बच्चे कम वजन के
मध्यप्रदेश, कुपोषण से मरने वाले बच्चों की संख्या में ही अव्वल नहीं है, औसत से कम वजन के बच्चे भी यहां सबसे ज्यादा हैं। यहां पांच साल से कम उम्र के 60 फीसदी बच्चे सामान्य से कम वजन के हैं। जबकि ऐसे बच्चों का राष्टीय औसत 425 फ़ीसदी है। प्रदेश के अनुसूचित जाति के बच्चों का तो और भी बुरा हाल है। ऐसे 71 फीसदी बच्चे सामान्य से कम वजन के हैं, जबकि ऐसे बच्चों का राष्टीय औसत 545 प्रतिशत है। प्रदेश के शहरी इलाकों में ऐसे बच्चों की संख्या 513 प्रतिशत है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में 627 प्रतिशत है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ की ओर से लोकसभा के इसी बजट-सत्र में पेश किए गए ये आंकड़े प्रदेश के नौनिहालों का हाल बयान करने के लिए काफी हैं। यह जमीनी हकीकत, राष्टीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-तृतीय की रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों से सामने आई है। ये हालात तब हैं, जब प्रदेश में ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय विकास विभाग के सहयोग से, उसी की मर्जी के मुताबिक करीब ढाई सौ पोषण पुनर्वास केंद्र चल रहे हैं। इसके अलावा नवजात शिशुओं को कुपोषण मुक्ति के लिहाज से प्रदेश के छह जिला चिकित्सालयों में यूनिसेफ की मदद से एसएनसीयू चलाए जा रहे हैं। जल्दी ही यह सुविधा प्रदेश के आो जिलों में विस्तार पाने जा रही है। गैर सरकारी संगठन भोजन का अधिकार अभियान और स्पंदन के सर्वे भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मध्यप्रदेश में कुपोषण के हालात दिन-प्रतिदिन खतरनाक होते जा रहे हैं। कुपोषित बच्चों की यादा संख्या उन जिलों में है, जो आदिवासी बहुल हैं और जो आसानी से शोषण का शिकार हो जाते हैं। आधुनिकता व शहरीकरण का दबाव, बड़े बांध और वन्य-प्राणी अभयारण्यों के संरक्षण की दृष्टि से बड़ी संख्या में विस्थापन का दंश झेल रही ये जनजातियां कुपोषण व भूख की गिरफ्त में हैं। इस कारण इनकी आबादी घटने के भी आंकड़े 2011 की जनगणना में सामने आए हैं। सरकार अकसर हकीकत पर पर्दा डालने की दृष्टि से बहाना बनाती है कि ये मौतें कुपोषण से नहीं बल्कि खसरा, डायरिया अथवा तपेदिक से हुई हैं। लेकिन ये बेतुकी दलीलें हैं। कुपोषण और कुपोषणजन्य बीमारियां अल्पपोषण से ही शिशु-शरीर में उपजती हैं। यहां गौरतलब यह भी है कि राय में आज भी करीब 4225 आदिवासी बस्तियों में लोग समेकित बाल विकास योजना के लाभ से वंचित हैं। इस पर भी हैरानी यह है कि यादातर आदिवासी बस्तियों में मौजूद प्राथमिक स्वास्थ्य व आंगनबाड़ी पोषण-आहार केंद्र महीनों खुलते ही नहीं हैं। यही हाल प्राथमिक और मायमिक विद्यालयों में बांटे जाने वाले मयान्ह भोजन का है। इस पर भी विसंगति है कि स्वास्थ्य के मद में सरकार एक व्यक्ति पर साल भर के लिए महज 125 रुपए खर्च करती है।
इन जिलों की हालत खराब
जिला गंभीर बच्चे कम वजन वाले बच्चे
भोपाल 21.0 55.80 प्रतिशत
सतना 26.40 67.10 प्रतिशत
बड़वानी 35.50 65.10 प्रतिशत
उमरिया 25.60 66.60 प्रतिशत
अलीराजपुर 29.50 60.80 प्रतिशत
डिंडोरी 24.20 61.70 प्रतिशत
मंत्री का अलग राग
कुपोषण सामान्य बच्चों में 60 से घटकर 52, कुपोषित में 21 से 19.4 और अति कुपोषित बच्चों में 16.6 से घटकर 8.3 प्रतिशत हुआ है। मैं अभी प्रगति से असंतुष्ट हूं। लगातार प्रयास जारी हैं। पूरक पोषण आहार के वितरण की व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत है। -
रंजना बघेल, महिला एवं बाल विकास मंत्री
घोटालों की भेंट चढी 24 घंटे बिजली सप्लाई योजना
एक तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान कहते िफर रहे हैं कि प्रदेश में विगत 60 वर्षो में कांग्रेस जो विकास कार्य नही कर पायी उसे प्रदेश की भाजपा सरकार ने मात्र 8 वर्षो में कर दिखाया है। उनका दावा है कि कांग्रेस के शासनकाल में बिजली व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। आज 24 घंटे बिजली दी जा रही है। जबकि हकीकत यह है कि बिजली संकट झेल रहे मध्यप्रदेश में बिजली केवल राजनैतिक लाभ का मुद्दा है। भाजपा शासन की स्थापना ही बिजली संकट के कारण हुई थी, लेकिन 10 साल बीत गये राज्य में बिजली संकट कम नहीं हुआ है, बल्कि पहले से ज्यादा गंभीर हुआ है। एक ओर तो बिजली संकट है, तो दूसरी ओर बिजली संकट दूर करने के नाम पर बिजली खरीद और आपूर्ति में भारी घोटाले हो रहे हैं। भाजपा सरकार ने प्रदेश में अब तक का सबसे बड़ा घोटाला बिजली खरीदी का किया है। 6 साल में 20 हजार करोड़ रुपए की बिजली खरीदी गई लेकिन यह कहां गई, कोई बताने वाला नहीं है।
लैंको ने लगाया 83.63 करोड़ की चपत
निजी बिजली कंपनी लैंको पावर ट्रेडिंग लिमिटेड गुडग़ांव ने प्रदेश की पावर ट्रेडिंग कंपनी को 83.63 करोड़ की चपत लगा दी। तीन साल पहले हुए गड़बड़झाले का खुलासा ऑडिट रिपोर्ट में हुआ है। ऑडिट आपत्ति के बाद पावर ट्रेडिंग कंपनी ने लैंको पावर की 5 करोड़ रूपए की सुरक्षा निधि जब्त की। इसके बाद कंपनी विद्युत नियामक आयोग में प्रकरण दायर किया।
ये है मामला
लैंको पावर ट्रेडिंग लिमिटेड ने मई 2010 में मध्यप्रदेश पावर ट्रेडिंग कंपनी से 100 मेगावाट बिजली खरीदने का करार किया। अनुबंध में ये शर्त थी कि यदि लैंको पावर बिजली खरीदने में असफल होती है तो वह पावर ट्रेडिंग कंपनी को क्षतिपूर्ति राशि
अदा करेगी। लैंको पावर ने जुलाई 2010 से मार्च 2011 तक बिजली नहीं खरीदी। इसके एवज में मध्यप्रदेश पावर ट्रेडिंग कंपनी ने 83.63 करोड़ रूपए की क्षतिपूर्ति की मांग की, लेकिन लैंको पावर ने क्षतिपूर्ति देने से इनकार कर दिया।
ऐसे हुई लापरवाही
अनुबंध के अनुसार पावर ट्रेडिंग कंपनी को लैंको से एक माह की बिजली बिल के बराबर यानी 65.51 करोड़ रूपए की सुरक्षा निधि जमा करानी थी। मप्र पावर ट्रेडिंग कंपनी के अधिकारियों ने केवल 5 करोड़ रूपए बतौर सुरक्षा निधि जमा कराए। इसकी वजह से कंपनी क्षतिपूर्ति राशि वसूल नहीं कर पाई।
पावर मैनेजमेंट कंपनी के कमर्शियल डायरेक्टर केसी बड़कुल कहते हैं कि लैंको पावर से क्षतिपूर्ति वसूली के लिए विद्युत नियामक आयोग में प्रकरण दायर किया गया है। वर्तमान में प्रकरण नियामक आयोग में विचाराधीन है।
पहले ब्लैकलिस्टेड, फिर बिजली खरीदी
लैंको पावर ने वर्ष 2007 में पावर ट्रेडिंग कार्पोरेशन के जरिए मध्यप्रदेश पावर ट्रेडिंग कंपनी को 2.19 रूपए प्रति यूनिट की दर से 300 मेगावाट बिजली देने का करार किया था। वर्ष 2009 में लैंको पावर ने बिजली देने से इनकार दिया। इस मामले में मध्यप्रदेश पावर ट्रेडिंग कंपनी अदालत में भी गई, लेकिन राहत नहीं मिली। इसके बाद राज्य शासन ने लैंको पावर को ब्लैकलिस्ट कर दिया। वर्ष 2012 में राज्य सरकार ने लैंको पावर को ब्लैकलिस्ट की सूची से बाहर करते हुए फिर से बिजली खरीदी करने का करार कर लिया।
उल्लेखनीय है कि लैंको इन्फ्रा टेक लिमिटेड की सहायक कंपनी लैंको अमरकंटक पावर लिमिटेड (एलएपीएल) को समझौते के अनुसार बिजली की आपूर्ति न करने पर मध्य प्रदेश में ब्लैक लिस्ट किया गया था। मध्य प्रदेश पॉवर ट्रेडिंग कंपनी नें एलएपीएल से वर्ष 2006 में मध्य प्रदेश को 2.28 रुपये प्रति यूनिट पर 300 मेगावाट बिजली की बिक्री करने का पॉवर पर्चेज एग्रीमेंट किया था। लेकिन बाद में कंपनी ने इसको नकारते हुए केवल 150 मेगावाट बिजली ही सप्लाई करने पर सहमति जताई। जिसे राज्य सरकार ने अस्वीकार कर दिया। खरीद समझौते की अवधि समाप्त हो गई है। राज्य सरकार अवधि समाप्त होने के बाद 150 मेगावाट लेने को तैयार हो गई थी लेकिन कंपनी इतनी भी सप्लाई देने से मना कर दिया है।उसके बाद ही राज्य सरकार ने इस मामले पर विचार करने के लिए राधवजी की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया था। कमेटी ने सिफारिश की थी कि यदि कंपनी समझौते के अनुसार बिजली की आपूर्ति नहीं करती है तो कंपनी को ब्लैक लिस्ट कर दिया जाए और उसके बाद कंपनी को ब्लैक लिस्टेड कर दिया गया था।
कांग्रेस ने गिनाए भ्रष्टाचार
नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का कहना है कि मध्यप्रदेश में भाजपा ने अपने इस कार्यकाल में प्रदेश की संपदा को जिस बेरहमी से लूटा है, उसकी ऐसी मिसाल पहले कभी भी देखने को नहीं मिली। जिन क्षेत्रों में और जिन कार्यों में भाजपा के सत्ताधारियों ने घोटाले करते हुए प्रदेश को चूना लगाया है, उनमें से कुछ की बानगी देखते ही बनती है। इन घोटालों में सत्ता प्रमुख भी किसी मंत्री, अफसर या कार्यकर्ता से पीछे नहीं रहे। घोटालों की सूची पर एक नजऱ :-
1. डम्पर घोटाला, 2. सिंहस्थ घोटाला 3. पेंशन घोटाला, 4. भूमि घोटाला, 5. भाजपा पार्षदों का घोटाला, 6. दवा खरीदी घोटाला, 7. डी-मेट घोटाला, 8. नर्सिंग घोटाला, 9. स्वास्थ्य विभाग में घोटाला, 10. पोषण आहार घोटाला, 11. रिलायंस फ्रेश को मुख्यमंत्री ने मंजूरी क्यों दी। 12. सर्वशिक्षा अभियान घोटाला, 13.इंदौर नगर निगम घोटाला, 14. नगर सुधार न्यास रतलाम घोटाला, 15, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला भाजपा सरकार का काला कानून, 16.लोकायुक्त को कमजोर करने की साजिश, 17. भ्रष्टाचार के सवालों का जवाब नहीं, 18. विदेश यात्रा घोटाला, 19. भ्रष्टाचार को संरक्षण का एफीडेविट घोटाला, 20.ब्लड बैंक घोटाला, 21. आते-जाते पकड़ाये रुपये 22.बाढ़ राहत घोटाला, 23.चंदा न देने पर ट्रांसफर, 24.भाजपा नेताओं के अधिकारियों के फोन, 25. बिजली खरीदा और वितरण में घोटाला, 26. माइनिंग घोटाला, 27. रोजगार गारन्टी योजना में घोटाला, 28, यूनिफार्म घोटाला, 29, गाय बैल खरीदी घोटाला, 30, भर्ती घोटाला, 31, हरियाली और तालाब घोटाला, 32, पुस्तक खरीदी घोटाला,33, ऋण वितरण घोटाला, 34,मधयान्ह भोजन घोटाला, 35,प्रधानमंत्री सड़क घोटाला, 36.सिंचाई घोटाला, 37.तबादलों में घोटाला, 38.इन्श्योरेन्स घोटाला, 39, सड़क निर्माण में घोटाला, 40,चंदा घोटाला,41, सार्वजनिक वितरण प्रणाली घोटाला, 42,परिवहन घोटाला, 43,आंगनबाड़ी भर्ती घोटाला, 44 पुरस्कार घोटाला, 45. बी.टी. कॉटन घोटाला, 46,यूरिया घोटाला, 47. ड्रिप स्प्रिकलर अनुदान घोटाला, 48. दूधा घोटाला, 49,श्रेय घोटाला, 50. पदोन्नति घोटाला, 51.परीक्षा घोटाला, 52.मंदिर में घोटाला, 53.रेत घोटाला, 54.गौ-शाला अनुदान घोटाला, 55,टेक्स घोटाला, 56.तकनीकी घोटाला, 57. वृक्षारोपण घोटाला, 58. नर्मदा घाटी में घोटाला, 59, माईनिंग घोटाला, 60. शस्त्र घोटाला, 61. यौनशिक्षा घोटाला, 62.पुरानी विधानसभा परिसर जमीन घोटाला, 62, तौल कांटा घोटाला, 64, मंदिर कमाली ट्रस्ट घोटाला, 65. कम्प्यूटर खरीदी घोटाला, 66. विज्ञापन घोटाला, 67. सड़क घोटाला, 68, कम्प्यूटर खरीदी घोटाला, 66. विज्ञापन घोटाला, 67. सड़क घोटाला, 68, टोल टेक्स घोटाला, 69, स्वास्थ्य विभाग में भर्ती नियुक्ति घोटाला, 70. यंत्र खरीदी घोटाला, 71.अभियोजन की स्वीकृति नहीं दिये जाने का घोटाला, 72.नलकूप खनन घोटाला, 73.बच्चों की खरीदी बिक्री में घोटाला,74. एनकाउन्टर घोटाला, 75. आदिवासी क्षेत्रों में क्ल्स्टर योजना घोटाला, 76.साईकिल घोटाला, 77. तकिया, गद्दा घोटाला, 78. फर्नीचर घोटाला, 79, पत्रकारों के नाम पर अफसरों द्वारा सत्कार एवं टैक्सी घोटाला।
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