भारतीय जनता पार्टी में वही होता है जो आडवाणी चाहें। अगर आडवाणी जिसे नहीं चाहे वह गडकरी होता है। यह कहां तक सही है यह तो राम भक्त लालकृष्ण आडवाणी ही बता सकते हैं लेकिन भाजपा का इतिहास और अध्यक्ष नितिन गडकरी की वर्तमान स्थिति तो यही बयां करती है।
संघ ने भाजपा का अध्यक्ष नितिन गडकरी को बनवा तो दिया, लेकिन अब उसके सामने साफ़ हो गया है कि दिल्ली में बैठे अनंत कुमार, सुषमा स्वराज, वेंकैय्या नायडू, जेटली, राजनाथ सिंह और आखिऱ में आडवाणी उन्हें सफल नहीं होने देंगे. इन सब में गडकरी की उम्र राजनीति में छोटी है, लेकिन संघ गडकरी को सफल होते देखना चाहता है. गडकरी ने संघ को बताया है कि जब भी वह कुछ नया करना चाहते हैं तो ये लोग उनका विरोध करते हैं. संघ और गडकरी के सामने सवाल है कि वे इस स्थिति से कैसे निकलें.संघ की शाखाओं में स्वयंसेवकों को नेतृत्व क्षमता के बारे में सिखाया जाता है, नेतृत्व वही, जिसके पास निर्णय क्षमता हो. लेकिन फिलहाल तो स्वयंसेवक गडकरी में इसका अभाव दिखता है. गडकरी की बड़े नेताओं के बीच संतुलन साधने और पार्टी के सभी गुटों को खुश रखने की रणनीति संगठन पर भारी पड़ रही है. कड़े फैसले लेकर पार्टी को सही दिशा देने की बजाए गडकरी नेताओं के महत्वाकांक्षाओं के खेल में मोहरा बन रहे हैं.
आडवाणी एंड कंपनी ने गडकरी को पूरी तरह से अपने दबाव में ले लिया है और गडकरी बेबस हो उनके फैसलों को मानने भी लगे हैं. संसद सत्र शुरु होने से पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भोजन के आमंत्रण पर भाजपा का कोई नेता नहीं जाएगा, यह फैसला लेते वक्त लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से कोई राय मशवरा नहीं लिया. अरुण जेटली और सुषमा स्वराज से गुफ्तगू के बाद लालकृष्ण आडवाणी ने यह अहम फैसला लिया. भाजपा संसद में जातिगत जनगणना का विरोध नहीं करेगी, यह फैसला लेते हुए भी आडवाणी ने बातचीत तो दूर गडकरी को इसकी जानकारी तक नहीं दी. जब कि न ही आरएसएस और न ही गडकरी इसके पक्ष में थे. जाहिर है ये फैसले पार्टी अध्यक्ष की सहमति से नहीं हुए. पार्टी के संविधान और नियमों के मुताबिक अध्यक्ष का ही निर्णय अंतिम होता है. जबकि संघ चाहता था कि उमा भारती की पार्टी में वापसी हो और संजय जोशी को संगठन में महत्वपूर्ण पद दिया जाए, लेकिन आडवाणी कैंप के विरोध के कारण नितिन गडकरी ऐसा नहीं कर पाए. इसी तरह से संघ जिन्ना के समर्थक जसवंत सिंह की पार्टी में कतई वापसी नहीं चाहता था, लेकिन आडवाणी के दबाव में गडकरी को जसवंत सिंह को पार्टी में वापस लाना पड़ा. यह तो वर्तमान स्थिति है जबकि पूर्व में भी पार्टी में वही हुआ है जो आडवाणी ने चाहा है।
जब भाजपा ने एनडीए का निर्माण किया और लगा कि सरकार बन सकती है, तो सवाल आया कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा. जार्ज फर्नांडिस जैसे लोगों का मूड भांप आडवाणी जी ने बयान दिया कि अटल जी ही प्रधानमंत्री बनेंगे. आडवाणी भी चाहते थे और पार्टी के नेता भी चाहते थे कि आडवाणी प्रधानमंत्री बनें, पर उनका चेहरा कट्टरपंथी का चेहरा था, जिसे भाजपा के अलावा एनडीए में शामिल दूसरे दल किसी क़ीमत पर स्वीकार नहीं करने वाले थे. आडवाणी के हाथ से प्रधानमंत्री पद फिसल कर अटल जी के पास चला गया, क्योंकि वह चेहरा न केवल सार्वजनिक था, बल्कि लोकप्रिय भी था. अटल जी के प्रधानमंत्री बनने के साथ उन्हें ब्रजेश मिश्र, प्रमोद महाजन और रंजन भट्टाचार्य ने घेर लिया. शायद यह आडवाणी जी को अच्छा नहीं लगा. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बहुत से विश्वसनीय कार्यकर्ता मानते हैं कि यही वह समय था, जब आडवाणी जी ने अटल जी और पार्टी के साथ संघ से भी बदला लेने की जाने या अनजाने कोशिश शुरू कर दी. अटल जी यदि सरकार आडवाणी जी को चलाने देते तो शायद यह न होता, पर सरकार तो ब्रजेश मिश्र, प्रमोद महाजन और रंजन भट्टाचार्य के क़ब्ज़े में चली गई थी.
संघ के समर्पित नेताओं का कहना है कि आडवाणी जी ने गृहमंत्री रहते हुए एनडीए के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम को स्वीकार किया और पार्टी का प्रोग्राम छोड़ दिया. सालों से राम मंदिर बनाने की घोषणा करने वाली पार्टी का आडवाणी जैसा नेता कहने लगा कि जब भाजपा का बहुमत अकेले दम पर होगा, तभी मंदिर बनाया जा सकता है. संघ के लोगों का कहना है कि आडवाणी घुट रहे थे, उन्हें लगता था कि सब बनाया उन्होंने है और उन्हें ही मौक़ा नहीं मिला. इसीलिए किसी दूसरे दल ने अपने दल का एजेंडा नहीं छोड़ा, लेकिन भाजपा ने छोड़ दिया, जिसके पीछे केवल आडवाणी का दिमाग़ था. इसमें उन्हें प्रमोद महाजन का साथ मिला. संघ के लोगों का कहना है कि आडवाणी चाहते तो अटल जी लालकिले से घोषणा कर सकते थे कि मैं गठबंधन का प्रधानमंत्री हूं, पर पार्टी अलग है. इससे पार्टी पर लोगों का विश्वास नहीं टूटता और न कार्यकर्ता नाराज़ होता कि भाजपा ने मंदिर मुद्दा तो छोड़ ही दिया है.
आडवाणी जी ने अपनी नई टीम बनाई, जिसके लेफ्टिनेंट अरुण जेटली, अनंत कुमार, वेंकैय्या नायडू, सुषमा स्वराज, यशवंत सिन्हा और नरेंद्र मोदी थे. अरुण जेटली और नरेंद्र मोदी रणनीति बनाने लगे और पार्टी के भीतर का सत्ता और वैचारिक समीकरण बदलने लगा. आज संघ के लोग कहते हैं कि पार्टी की दुर्दशा का मुख्य कारण अरुण जेटली हैं, जो विचार को जीवन से अलग मानते हैं. संघ के लोगों को अफसोस है कि एक ओर दीनदयाल उपाध्याय जैसा व्यक्ति उनकी पार्टी बना रहा था, जिसका आचार, विचार और व्यवहार एक था, आज अरुण जेटली पार्टी बना रहे हैं, जिनके आचार, विचार और व्यवहार में कोई समानता नहीं है.
संघ में अपना जीवन देने वाले स्वयं सेवकों का कहना है कि अरुण जेटली की रणनीति के परिणामस्वरूप विचारवान और संघ के प्रति निष्ठावान लोग पार्टी में हाशिये पर चले गए या पार्टी से बाहर जाने के लिए मजबूर हो गए. वहीं पार्टी में जनाधार विहीन, एरिस्ट्रोकेट व पश्चिमी शैली में जीवन जीने वाले नेता स्थापित हो गए. ये ऐसे लोग हैं, जो ऐशोआराम में पल रहे हैं और विचारधारा से दूर हैं. आडवाणी, नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली की वजह से जो लोग भाजपा के दृश्य से ग़ायब हो गए, उनमें पहला नाम हिमाचल के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का है, जिन्हें भारत के सर्वाधिक ईमानदार मुख्यमंत्रियों में माना जाता है. जम्मू कश्मीर में चमन लाल गुप्त हाशिये पर चले गए हैं. उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह को पार्टी छोडऩी पड़ी और लालजी टंडन ख़ामोश हो गए हैं. झारखंड में बाबूलाल मरांडी ने पार्टी छोड़ दी और करिया मुंडा ने पार्टी मामलों में रुचि लेनी बंद कर दी है. मध्य प्रदेश में पहले उमा भारती के ज़रिए सुंदरलाल पटवा को किनारे कराया, फिर उमा भारती को ही पार्टी से निकाल दिया. अब शिवराज सिंह चौहान उनके अपने आदमी हैं. महाराष्ट्र में तो सारे ग्रासरूट नेता प्रमोद महाजन के लिए हाशिये पर फेंक दिए गए, केवल गोपीनाथ मुंडे बच गए, क्योंकि वह प्रमोद महाजन के रिश्तेदार थे. गुजरात में पहले शंकर सिंह बाघेला को निकालने के लिए स्थितियां बनाईं. बाद में हीरेन पंड्या का नंबर आया. राजस्थान में भैरो सिंह शेखावत को दिल्ली लाकर वसुंधरा राजे के लिए मैदान खुला छोड़ दिया गया. आंध्र प्रदेश में वेंकैय्या नायडू के लिए पूरी पार्टी की बलि चढ़ा दी गई. आज वसुंधरा राजे, राजनाथ सिंह, वेंकैय्या नायडू, अनंत कुमार इन तीनों के मुख्य हथियार बने हुए हैं.
भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी, नरेंद्र मोदी और अरुण जेटली का डेडली काम्बीनेशन है. लालकृष्ण आडवाणी का मानना था कि यदि उन्हें प्रधानमंत्री घोषित कर चुनाव लड़ा जाएगा तो देश भाजपा को वोट देगा. इस विचार को अरुण जेटली ने अपने तर्कों से पुष्ट कर आडवाणी के मन की आखिऱी हिच दूर कर दी. लेकिन जनता ने आडवाणी के चेहरे को अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे से बेहतर नहीं माना.
नब्बे में जब आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी की जगह लेने के लिए अपने लोगों की टीम बनाई थी, तब इनका दर्जा लेफ्टिनेंट का था. आज जब आडवाणी बूढ़े हो गए हैं तो उनके सारे लेफ्टिनेंट जनरल हो गए हैं और आडवाणी उनकी बात कहने वाले नेता मात्र रह गए हैं. इस तिकड़ी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और बीजेपी के रिश्ते की कडिय़ों को भी प्रभावित किया है.
संघ के लोगों का कहना है कि भाजपा की असली ताक़त वे हैं तथा चुनाव के समय बूथ तक का मैनेजमेंट वे करते हैं. इसीलिए भाजपा की संरचना में संगठन मंत्री का बड़ा महत्व है, जो संघ द्वारा भेजा व्यक्ति होता है. इस पद पर सुंदर सिंह भंडारी, गोविंदाचार्य, नरेंद्र मोदी, संजय जोशी जैसे व्यक्ति रह चुके हैं और आज रामलाल संगठन मंत्री हैं. इस पद की हैसियत को बर्बाद करने की कहानी भी दिलचस्प है. आज तो संगठन मंत्री डरा हुआ है, क्योंकि वह अपने पहले के दो संगठन मंत्रियों का हश्र देख चुका है. भाजपा के केंद्रीय कार्यालय में ढाई करोड़ रुपये की चोरी हुई. इसकी जांच की मांग न भाजपा में किसी ने की और न भाजपा के संगठन मंत्री रामलाल ने, जो बुनियादी तौर पर संघ के प्रतिनिधि हैं. ऐसा लगता है मानों पूरा तंत्र सडऩे लगा है.गोविंदाचार्य को संघ ने अपना प्रतिनिधि बना भाजपा में संगठन मंत्री के तौर पर भेजा. गोविंदाचार्य के ऊपर संघ को पूरा भरोसा था कि वह भाजपा को भटकने नहीं देंगे. गोविंदाचार्य भाजपा को हमेशा संघ की विचारधारा पर चलने के लिए प्रेरित भी करते थे और दबाव भी डालते थे. मज़बूत होती तिकड़ी को गोविंदाचार्य का तरीक़ा पसंद नहीं आया और उन्होंने अटल जी का वैसे ही इस्तेमाल किया, जैसे बाद में उमा भारती का किया था. गोविंदाचार्य संघ के व्यक्ति थे, लेकिन भाजपा में रहते उनका चेहरा सार्वजनिक हो गया और वह कार्यकर्ताओं में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हो गए. गोविंदाचार्य को हटाने की रणनीति बनी और उन पर एक महिला राजनेता से नज़दीकी का आरोप लगाया गया. अचानक अख़बारों में गोविंदाचार्य और उस महिला राजनेता के संबंधों की खबरों की बाढ़ आ गई. गोविंदाचार्य इस घटिया राजनैतिक हमले से इतने आहत हो गए कि उन्होंने भाजपा से अपने को दूर कर लिया. यह घटना 1999 में हुई.
संघ ने संजय जोशी को 2001 में भाजपा का राष्ट्रीय संगठन मंत्री बना दिया गया.संजय जोशी लो प्रोफाइल, साधारण रहन-सहन में विश्वास करने वाले, जैसा प्रचारक करते हैं या समाजवादी और साम्यवादी रहते हैं, साध्य के साथ साधन को भी उतना ही महत्व देते हैं, प्रचार से दूर रहने वाले, सबसे मिलने वाले और सबकी सुनने वाले, लॉबी बनाने के खि़लाफ़ तथा ग्रासरूट काम में विश्वास करने वाले व्यक्तिहैं. उन्होंने संगठन मंत्री रहते हुए भाजपा पर संघ के विचारों पर चलने के लिए हमेशा दबाव बनाए रखा. भाजपा कार्यकर्ता अध्यक्ष के यहां कम, संजय जोशी के यहां ज़्यादा जाता था. इसी बीच आडवाणी पाकिस्तान गए और उन्होंने लाहौर में जिन्ना को लेकर मशहूर लाइन लिखी. संघ ने जोशी से कहा कि वह आडवाणी से इस्तीफ़ा ले लें. संजय जोशी ने बिना हिचक आडवाणी से अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा ले लिया. संजय जोशी ने संघ की बात मान अपने लिए राजनैतिक क़ब्र खोद ली. अचानक भाजपा के मुंबई अधिवेशन में एक सीडी बंटी. इस सीडी में एक व्यक्ति एक महिला के साथ था तथा अफवाह फैली कि यह व्यक्ति भाजपा का संगठन मंत्री संजय जोशी है. संजय जोशी ने भी गोविंदाचार्य की तरह तत्काल अपना त्यागपत्र दे दिया. अब जाकर तथ्य सामने आ रहे हैं और सीडी की सच्चाई भी सामने आ रही है.संघ ने भाजपा का अध्यक्ष नितिन गडकरी को बनवा तो दिया, लेकिन अब उसके सामने साफ हो गया है कि दिल्ली में बैठे अनंत कुमार, सुषमा स्वराज, वेंकैय्या नायडू, जेटली, राजनाथ सिंह और आखिऱ में आडवाणी उन्हें सफल नहीं होने देंगे.
शनिवार, 14 अगस्त 2010
शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
खेल नहीं बस हो रहा खिलवाड़
महिला हॉकी खिलाड़ी रंजीता द्वारा टीम के कोच एमके कौशिक पर लगाए यौन शोषण के आरोपों को हॉकी इंडिया ने सही मानते हुए उन पर कार्रवाई करने का निर्णय लिया है। देश में हॉकी के सबसे बड़े निकाय ने सेक्स स्कैंडल पर रिपोर्ट जारी कर दी है। इसके साथ ही हॉकी इंडिया ने फैसला लिया है कि भविष्य में वो कभी कौशिक को अनुबंधित नहीं करेगी ना ही उनकी सेवाएं लेगी। अभी यह मामला चल ही रहा है कि इसी बीच मैच फिक्सिंग के आरोप में आजीवन प्रतिबंध का सामना कर रहे टीम इंडिया के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन और बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा के प्रेम का मामला उछल गया। जिससे अब तो यह भ्रम भी चरमरा कर अपनी अंतिम सांसें ले रहा है कि खेल सिर्फ खेल नहीं एक तरह का खिलवाड़ भी है। चाहे यह खेल क्रिकेट हो या हॉकी, इंडियन प्रीमियर लीग की चौंधियाहट हो या फीफा की जगमगाहट। देश हो या विदेश - जहां खेल है, पैसा है, वहां परोसा जाता है सेक्स।
देश की पहले से चरमराई महिला हॉकी टीम की एक सदस्या ने जब कोच पर यौन शोषण का आरोप लगाया, तब खेल मंत्रालय जैसे सोते से जाग गया। इसके तुरंत बाद यह खबर आई कि जब भारतीय महिला हॉकी टीम चीन और कनाडा के दौरे पर थी, तब टीम का एक अधिकारी अपने कमरे में कार्ल गल्र्स लाता था। हमारे देश में हॉकी के साथ कोई ग्लैमर नहीं जुडा, लेकिन यहां भी खेल की आड़ में देह व्यापार झांकने लगा है।
इस घटना का गौरतलब पहलू यह है कि टी रंजीता के इन आरापों के बाद कई महिला खिलाडिय़ों ने अपने साथ या अन्य महिला खिलाडिय़ों के साथ हुए द्रव्र्यवहार पर खुलकर बोलना शुरू कर दिया है। टीम की पूर्व गोलकीपर और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित हेलन मेरी की प्रतिक्रिया कुछ यों रही- टीम में यह खेल बहुत पहले से चल रहा है। फेडरेशन और मंत्रालय में शिकायत करने पर भी पीडि़तों की ज्यादा सुनवाई नहीं होती। हाकी खिलाड़ी नवनीत भी दो महीने बाद दिल्ली में होने वाले कामनवेल्थ गेम्स में देश का प्रतिनिधित्व कर रही होतीं, अगर उन्होंने दो साल पहले लखनऊ में जूनियर नेशनल कैंप के दौरान राष्ट्रीय गोलकीपिंग कोच ई एडवर्ड्स के कथित दुर्व्यवहार को चुपचाप सहन कर लिया होता। नवनीत का कहना था कि उन्होंने इस मामले की शिकायत राष्ट्रीय जूनियर हाकी के तत्कालीन कोच जीएस भंग्गू से की थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। नवनीत की मानें तो उन्हें विकल्प दिया गया था कि समझौता कर लो या फिर हाकी छोड़ दो। नवनीत ने हाकी छोडऩे वाला विकल्प चुना। इसी तरह जून 2009 में आंध्र क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव पर यौन शोषण का आरोप लगा था और इस साल फरवरी में सुमन रावत ने आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर और कोच जगत सिंह बेलाल ने उनके साथ बलात्कार की कोशिश की। बाद में सुमन रावत को टीम से निकाल दिया गया।
यहा टेनिस की उभरती खिलाड़ी रुचिका गिरोत्रा का जिक्र करना जरूरी हो जाता है, जिसका यौन उत्पीडऩ हरियाणा के तत्कालीन डीजीपी राठौर ने किया था। उस समय राठौर हरियाणा टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। रुचिका ने यौन उत्पीडऩ और अपने परिवार को राठौर द्वारा दी जाने वाली मानसिक यातनाओं से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। महिला खिलाडिय़ों द्वारा अपने प्रशिक्षकों के खिलाफ यौन उत्पीडऩ के आरोपों वाले मामलों की सूची बहुत लंबी है, जो इस बात की ओर इशारा करती है कि कहीं दाल में कुछ काला है।
दाल में कुछ काला नहीं रहता तो भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) से कांग्रेस सांसद मोहम्मद अजहरुद्दीन का दिल अपने से आधी उम्र की एक बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा पर क्यो आ गया है। ज्वाला की वजह से अजहर और संगीता बिजलानी की 14 साल पुरानी शादी खतरे में बताई जा रही है। खबर यहां तक है कि एक हफ्ते के भीतर अजहर तलाक के लिए अर्जी देने वाले हैं। ज्वाला गुट्टा भी शादीशुदा हैं। उनकी शादी विजेता चेतन आनंद से हुई है। ज्वाला 26 की है जबकि अजहर 47 के। शादीशुदा अजहर हाल ही में एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप के दौरान दिल्ली में शादीशुदा ज्वाला के साथ कई मैचों के दौरान क्यों घुम रहे थे। इस पूरे मामले पर पुलेला गोपीचंद ने भी कुछ कहने से इनकार कर दिया है। अजहर की पहली शादी नौरीन से हुई थी। शादी के करीब 8 साल बाद अजहर-नौरीन के रिश्ते में खटास आ गई थी जब अजहर संगीता के करीब आ रहे थे। नौरीन से अजहर के दो बेटे हैं-असादुद्दीन और अबासुद्दीन। हालांकि, तलाक के पांच साल बाद नौरीन ने एक कनाडाई बिजनेसमैन से शादी कर ली थी। इस मामले पर जब ज्वाला गुट्टा से पूछा गया तो उन्होंने न तो ख़बर से इनकार ही किया और न ही उसे सही बताया। वहीं, उनके पति चेतन आनंद ने कहा कि मीडिया को किसी की निजी जि़ंदगी में झांकने का हक नहीं है। संगीता बिजलानी की ओर से भी इस मामले पर कोई बयान नहीं आया है।
बैडमिंटन से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि ज्वाला से नजदीकियों के कारण ही अजहर बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) में अध्यक्ष का चुनाव लडऩा चाहते थे। उल्लेखनीय है कि अजहर ने अध्यक्ष पद के चुनाव में वीके वर्मा को चुनौती देने का एलान करते हुए सभी को चौंका दिया था। सूत्रों के अनुसार अजहर ने ज्वाला को बीएमडब्ल्यू कार तोहफे में दी है और बैडमिंटन स्टार हैदराबाद की सड़कों पर इसे दौड़ाते हुए सबकी नजरों में आ चुकी हैं। आंध्रप्रदेश बैडमिंटन संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि अजहर जब भी हैदराबाद में होते हैं, तो गोपीचंद एकेडमी के काफी चक्कर लगाते हैं। ज्वाला यहीं प्रैक्टिस करती हैं और उन्हें कई बार अजहर के साथ जाते हुए देखा गया है।
एक सवाल यह भी है कि विभिन्न खेल संघों ने अपने-अपने यहा यौन उत्पीडऩ शिकायत सेल और जाच समितियों का गठन भी किया हुआ है या नहीं? कई महिला खिलाडिय़ों के बयानों से यही गंध मिलती है कि यौन उत्पीडऩ की शिकायत करने पर आला अधिकारियों का रवैया मामले को दबाने का ही होता है। कई मर्तबा महिला खिलाड़ी ऐसे मुद्दों पर खामोश ही रहती हैं। विरोध न करने की कई वजहें हो सकती हैं।
जब छोटे-छोटे कस्बों की लड़कियां प्रतिकूल माहौल से जद्दोजहद करते हुए खेल के मैदान तक पहुंचने का जज्बा दिखा रही हैं तो ऐसे में सरकार उन्हें भयमुक्त सुरक्षित महौल मुहैया कराने की जवाबदेही से कैसे बच सकती है।
खेल के साथ सेक्स को आईपीएल के मैचों में भी खूब भुनाया गया। वैसे भी आईपीएल खेलों में देश-विदेश की छरहरी बालाएं, जो चियर लीडर्स का काम करती हैं, अपनी आकर्षक मुद्राओं से दर्शकों को भी स्टेडियम आने का आमंत्रण देती हैं। आईपीएल की आलीशान पार्टियां, टीम के मालिकों का रईसाना अंदाज और उनका साथ देने के लिए मौजूद बालाएं। हॉकी के एक अधिकारी की रंगीन रातों के खुलासे के बाद आईपीएल के उन अधिकारियों पर उंगली उठने लगी है, जो ऐसी पार्टियों के कर्ताधर्ता थे। अनुमान के मुताबिक एक माह तक जारी इन खेलों में लगभग ढाई सौ चियर लीडर्स थीं और हजार से ज्यादा यौनकर्मी विभिन्न शहरों में खास मेहमानों का मनोरंजन करने के लिए आमंत्रित की जाती थीं।
ताजा प्रकरण ने एक साथ कई सवालों को जन्म दिया है, जिनके हल उच्च पदों पर आसीन संबंधित अधिकारियों को तलाश करने होंगे। कौशिक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन क्या उनका इस्तीफा देना ही इस मसले का हल है? क्या इस के सामने आने के बाद हम अपने परिवार की किसी लड़की को खेलों की ओर प्रोत्साहित करने का विचार करेंगे? क्या आप मानते हैं कि इस तरह की घटनाएं खेल की दुनिया में आम बात हैं? क्या विदेश दौरों के दौरान पुरुष अधिकारियों के साथ पत्नी का जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए? क्या हॉकी की दुर्दशा के लिए यही सब कारण जिम्मेदार हैं? क्या सिर्फ कोच का बदला जाना इस समस्या का हल है?
देश की पहले से चरमराई महिला हॉकी टीम की एक सदस्या ने जब कोच पर यौन शोषण का आरोप लगाया, तब खेल मंत्रालय जैसे सोते से जाग गया। इसके तुरंत बाद यह खबर आई कि जब भारतीय महिला हॉकी टीम चीन और कनाडा के दौरे पर थी, तब टीम का एक अधिकारी अपने कमरे में कार्ल गल्र्स लाता था। हमारे देश में हॉकी के साथ कोई ग्लैमर नहीं जुडा, लेकिन यहां भी खेल की आड़ में देह व्यापार झांकने लगा है।
इस घटना का गौरतलब पहलू यह है कि टी रंजीता के इन आरापों के बाद कई महिला खिलाडिय़ों ने अपने साथ या अन्य महिला खिलाडिय़ों के साथ हुए द्रव्र्यवहार पर खुलकर बोलना शुरू कर दिया है। टीम की पूर्व गोलकीपर और अर्जुन अवार्ड से सम्मानित हेलन मेरी की प्रतिक्रिया कुछ यों रही- टीम में यह खेल बहुत पहले से चल रहा है। फेडरेशन और मंत्रालय में शिकायत करने पर भी पीडि़तों की ज्यादा सुनवाई नहीं होती। हाकी खिलाड़ी नवनीत भी दो महीने बाद दिल्ली में होने वाले कामनवेल्थ गेम्स में देश का प्रतिनिधित्व कर रही होतीं, अगर उन्होंने दो साल पहले लखनऊ में जूनियर नेशनल कैंप के दौरान राष्ट्रीय गोलकीपिंग कोच ई एडवर्ड्स के कथित दुर्व्यवहार को चुपचाप सहन कर लिया होता। नवनीत का कहना था कि उन्होंने इस मामले की शिकायत राष्ट्रीय जूनियर हाकी के तत्कालीन कोच जीएस भंग्गू से की थी, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। नवनीत की मानें तो उन्हें विकल्प दिया गया था कि समझौता कर लो या फिर हाकी छोड़ दो। नवनीत ने हाकी छोडऩे वाला विकल्प चुना। इसी तरह जून 2009 में आंध्र क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव पर यौन शोषण का आरोप लगा था और इस साल फरवरी में सुमन रावत ने आरोप लगाया कि अंतरराष्ट्रीय बॉक्सर और कोच जगत सिंह बेलाल ने उनके साथ बलात्कार की कोशिश की। बाद में सुमन रावत को टीम से निकाल दिया गया।
यहा टेनिस की उभरती खिलाड़ी रुचिका गिरोत्रा का जिक्र करना जरूरी हो जाता है, जिसका यौन उत्पीडऩ हरियाणा के तत्कालीन डीजीपी राठौर ने किया था। उस समय राठौर हरियाणा टेनिस एसोसिएशन के अध्यक्ष थे। रुचिका ने यौन उत्पीडऩ और अपने परिवार को राठौर द्वारा दी जाने वाली मानसिक यातनाओं से तंग आकर आत्महत्या कर ली थी। महिला खिलाडिय़ों द्वारा अपने प्रशिक्षकों के खिलाफ यौन उत्पीडऩ के आरोपों वाले मामलों की सूची बहुत लंबी है, जो इस बात की ओर इशारा करती है कि कहीं दाल में कुछ काला है।
दाल में कुछ काला नहीं रहता तो भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान और मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) से कांग्रेस सांसद मोहम्मद अजहरुद्दीन का दिल अपने से आधी उम्र की एक बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा पर क्यो आ गया है। ज्वाला की वजह से अजहर और संगीता बिजलानी की 14 साल पुरानी शादी खतरे में बताई जा रही है। खबर यहां तक है कि एक हफ्ते के भीतर अजहर तलाक के लिए अर्जी देने वाले हैं। ज्वाला गुट्टा भी शादीशुदा हैं। उनकी शादी विजेता चेतन आनंद से हुई है। ज्वाला 26 की है जबकि अजहर 47 के। शादीशुदा अजहर हाल ही में एशियन बैडमिंटन चैंपियनशिप के दौरान दिल्ली में शादीशुदा ज्वाला के साथ कई मैचों के दौरान क्यों घुम रहे थे। इस पूरे मामले पर पुलेला गोपीचंद ने भी कुछ कहने से इनकार कर दिया है। अजहर की पहली शादी नौरीन से हुई थी। शादी के करीब 8 साल बाद अजहर-नौरीन के रिश्ते में खटास आ गई थी जब अजहर संगीता के करीब आ रहे थे। नौरीन से अजहर के दो बेटे हैं-असादुद्दीन और अबासुद्दीन। हालांकि, तलाक के पांच साल बाद नौरीन ने एक कनाडाई बिजनेसमैन से शादी कर ली थी। इस मामले पर जब ज्वाला गुट्टा से पूछा गया तो उन्होंने न तो ख़बर से इनकार ही किया और न ही उसे सही बताया। वहीं, उनके पति चेतन आनंद ने कहा कि मीडिया को किसी की निजी जि़ंदगी में झांकने का हक नहीं है। संगीता बिजलानी की ओर से भी इस मामले पर कोई बयान नहीं आया है।
बैडमिंटन से जुड़े पदाधिकारियों का कहना है कि ज्वाला से नजदीकियों के कारण ही अजहर बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (बीएआई) में अध्यक्ष का चुनाव लडऩा चाहते थे। उल्लेखनीय है कि अजहर ने अध्यक्ष पद के चुनाव में वीके वर्मा को चुनौती देने का एलान करते हुए सभी को चौंका दिया था। सूत्रों के अनुसार अजहर ने ज्वाला को बीएमडब्ल्यू कार तोहफे में दी है और बैडमिंटन स्टार हैदराबाद की सड़कों पर इसे दौड़ाते हुए सबकी नजरों में आ चुकी हैं। आंध्रप्रदेश बैडमिंटन संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने बताया कि अजहर जब भी हैदराबाद में होते हैं, तो गोपीचंद एकेडमी के काफी चक्कर लगाते हैं। ज्वाला यहीं प्रैक्टिस करती हैं और उन्हें कई बार अजहर के साथ जाते हुए देखा गया है।
एक सवाल यह भी है कि विभिन्न खेल संघों ने अपने-अपने यहा यौन उत्पीडऩ शिकायत सेल और जाच समितियों का गठन भी किया हुआ है या नहीं? कई महिला खिलाडिय़ों के बयानों से यही गंध मिलती है कि यौन उत्पीडऩ की शिकायत करने पर आला अधिकारियों का रवैया मामले को दबाने का ही होता है। कई मर्तबा महिला खिलाड़ी ऐसे मुद्दों पर खामोश ही रहती हैं। विरोध न करने की कई वजहें हो सकती हैं।
जब छोटे-छोटे कस्बों की लड़कियां प्रतिकूल माहौल से जद्दोजहद करते हुए खेल के मैदान तक पहुंचने का जज्बा दिखा रही हैं तो ऐसे में सरकार उन्हें भयमुक्त सुरक्षित महौल मुहैया कराने की जवाबदेही से कैसे बच सकती है।
खेल के साथ सेक्स को आईपीएल के मैचों में भी खूब भुनाया गया। वैसे भी आईपीएल खेलों में देश-विदेश की छरहरी बालाएं, जो चियर लीडर्स का काम करती हैं, अपनी आकर्षक मुद्राओं से दर्शकों को भी स्टेडियम आने का आमंत्रण देती हैं। आईपीएल की आलीशान पार्टियां, टीम के मालिकों का रईसाना अंदाज और उनका साथ देने के लिए मौजूद बालाएं। हॉकी के एक अधिकारी की रंगीन रातों के खुलासे के बाद आईपीएल के उन अधिकारियों पर उंगली उठने लगी है, जो ऐसी पार्टियों के कर्ताधर्ता थे। अनुमान के मुताबिक एक माह तक जारी इन खेलों में लगभग ढाई सौ चियर लीडर्स थीं और हजार से ज्यादा यौनकर्मी विभिन्न शहरों में खास मेहमानों का मनोरंजन करने के लिए आमंत्रित की जाती थीं।
ताजा प्रकरण ने एक साथ कई सवालों को जन्म दिया है, जिनके हल उच्च पदों पर आसीन संबंधित अधिकारियों को तलाश करने होंगे। कौशिक ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। लेकिन क्या उनका इस्तीफा देना ही इस मसले का हल है? क्या इस के सामने आने के बाद हम अपने परिवार की किसी लड़की को खेलों की ओर प्रोत्साहित करने का विचार करेंगे? क्या आप मानते हैं कि इस तरह की घटनाएं खेल की दुनिया में आम बात हैं? क्या विदेश दौरों के दौरान पुरुष अधिकारियों के साथ पत्नी का जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए? क्या हॉकी की दुर्दशा के लिए यही सब कारण जिम्मेदार हैं? क्या सिर्फ कोच का बदला जाना इस समस्या का हल है?
भगवान बने हैवान
मध्यप्रदेश में कुछ स्वार्थ लोलुप डॉक्टरों द्वारा क्लीनिकल ट्रायल के नाम पर 30 दिन के बच्चे से लेकर 55 साल के प्रौढ़ पर देशी और विदेशी दवाओं का अवैधानिक तरीके से परीक्षण धड़ल्ले से किया जा रहा है। पिछले 15 वर्षों में डॉक्टरों ने इस गोरख धंधे से करोड़ों रुपए की संपत्ति अर्जित कर ली और बड़े-बड़े अस्पताल खोल लिए। यह सभी डॉक्टर प्रदेश के नामी गिरामी डॉक्टरों में गिने जाते हैं। मप्र की औद्योगिक राजधानी इंदौर में यह काम धड़ल्ले से चल रहा है। यहां के डॉक्टरों ने भी स्थानीय समाचार पत्रों में दिए अपने वक्तव्य में कहा है कि इस कार्य से उन्होंने करोड़ों रुपए कमाए हैं, पर मामले का खुलासा होने पर ऐसा पता चला है कि कई छोटे बच्चे और उम्रदराज लोगों की जाने इस क्लीनिकल ट्रायल के दौरान जा चुकी है। जब इन डॉक्टरों से इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि हम मरीजों से लिखित अनुमति लेने के साथ ही उनका बीमा भी कराते हैं। पर जब बीमा कंपनियों से इस संदर्भ में बात की गई तो उन्होंने कहा कि इस तरीके का बीमा आज तक हमारी कंपनियों में नहीं हुआ। क्लीनिकल ट्रायल के लिए डॉक्टरों द्वारा अनपढ़ या कम पढ़े मरीजों को अंग्रेजी का फार्म देकर उनसे अंगूठा या हस्ताक्षर कराकर (सहमति पत्र) की औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। जबकि कायदा यह है कि उस सहमति पत्र की एक कॉपी मरीज के पास भी होनी चाहिए। इस पूरे मामले में जहां केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने जांच के आदेश दे दिए हैं वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच करने को कहा है। वहीं प्रदेश के स्वास्थ्य राज्यमंत्री महेंद्र हार्डिया ने कहा है कि एमसीआई के कानून के अनुसार यह ट्रायल चल रहा है तो हमें कोई आपत्ति नहीं। इस वक्तव्य से पता चलता है कि श्री हार्डिया को क्लीनिकल ट्रायल और उससे जुड़ी कानूनी जटिलता के बारे में कोई जानकारी नहीं है। सच्चाई यह है कि एमसीआई को देश और प्रदेश में जारी इस तरह की दवा परीक्षण गतिविधियों से कोई लेना-देना नहीं है।
वैसे तो देश के हर राज्य में क्लीनिकल ट्रायल के नाम पर आदिवासी और गरीब लोगों पर विदेशी दवाओं का परीक्षण धड़ल्ले से चल रहा है, लेकिन मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में उजागर हुआ है। वह भी उस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में जो मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर रहा है। शिवराज सिंह चौहान ने जब से मुख्यमंत्री का पदभार संभाला है तभी से उनकी प्राथमिकता में जनस्वास्थ्य रहा है। इसके लिए हर साल प्रदेश के कुल बजट में से 900 करोड़ रुपए स्वास्थ्य विभाग को आवंटित किया जाता है ताकि प्रदेश के दूर-दराज के इलाके तक हर एक व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें। वहीं दूसरी तरफ इंदौर स्थित प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज में सरकारी सुविधा प्राप्त डॉक्टरों द्वारा शासन-प्रशासन और लोगों को अंधेरे में रखकर विदेशी दवाईयों के परीक्षण किए जाने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया हैै। हालांकि क्लीनिकल ट्रायल करने वाले डॉक्टर इसको जायज ठहराते हैं लेकिन ऐसे ही डाक्टरों की मनमानी का देश में हर साल हजारों लोग शिकार हो जाते हैं। कुछ मौत के मुंह में समा जाते हैं तो कुछ जीवनभर के लिए गंभीर बीमारी या अपंगता के शिकार हो जाते हैं। एक अनुमान के तहत मप्र में हर साल तकरीबन 20,000 लोगों पर विभिन्न प्रकार की दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है जिसमें से करीब 7500 लोग इसके विपरीत प्रभाव के शिकार हो रहे हैं और हजार के करीब तो मौत के मुंह में समा जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए डॉक्टरों ने किस तरह लोगों को गिनीपिग यानी परीक्षण की वस्तु या फिर यूं कहे कि बलि का बकरा बनाया है। जून 2006 से मार्च 2008 तक देश के सबसे बड़े चिकित्सकीय संस्थान एम्स में ऐसे ही एक ट्रायल के दौरान 48 बच्चों की मौत का मामला सामने आया था। जिसके बाद से ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने कानूनों को और कड़े करने का निर्णय लिया था, लेकिन आज तक सब कुछ निर्बाध रूप से चल रहा है। जबकि आंध्र प्रदेश में ड्रग ट्रायल के दौरान छह बच्चों की मौत के बाद वहां ट्रायल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
किसी दवा या टीके को बाजार में उतारने से पहले उसके प्रभाव को पहले किसी जीव और बाद में मरीज पर प्रयोग करके देखना ड्रग ट्रायल है। इसके विपरीत प्रभाव से मरीज की जान का खतरा रहता है। लेकिन डाक्टरी की डिग्री मिलने के बाद से ही करोड़पति-अरबपति बनने का ख्वाब संजोए डाक्टर अनौतिक रूप से ऐसे कार्यों में जुट जाते हैं। हालांकि प्रदेश में यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भोपाल में गैस त्रासदी दौरान भी मरीजों पर कुछ दवाओं का परीक्षण किया गया था। गैस पीडि़तों को गिनी पिग बनाने का खुलासा गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन के नेता अब्दुल जब्बार ने भी किया। उन्होंने बताया कि 24 अगस्त 2008 को भोपाल मेमोरियल हास्पिटल के निदेशक ने चार विभागों को पत्र लिखकर निर्देश दिए थे कि गैस पीडि़तों व अन्य मरीजों पर ट्रायल ड्रग का उपयोग बंद कर दिया जाए।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण करने के दौरान प्रदेश में एक महिला मरीज की जान जा चुकी है। जबलपुर के कैंसर अस्पताल में इस मरीज का उपचार चल रहा था। उधर, इंदौर के बाद भोपाल और ग्वालियर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल की अनियमितताएं सामने आई हैं। जबलपुर में अगस्त 2008 में कैंसर रोगियों पर ड्रग ट्रायल शुरू हुआ था। रेडियोथेरेपी की प्रोफेसर डॉ. पुष्पा किरार और डॉ. अमित जोतवानी ने पेट के कैंसर (कार्टिनोमा स्टमक) के चार रोगियों पर दवा का प्रयोग शुरू किया था। चूंकि यह ट्रायल प्लेसिबो (इलाज के बीच में दवा बंद कर दूसरे मरीजों से तुलना करना) था, इसलिए एक महिला रोगी पर सारी दवाइयां बंद कर दी गई। इसी दौरान पीडि़त की मौत हो गई। गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के सर्जरी एचओडी डॉ. एमसी सोनगरा और डॉ. नितिन वर्मा ने 08 में मूत्र रोग पीडित 40 लोगों पर कैडिला कंपनी की दवा का प्रयोग किया। उन्होंने अहमदाबाद की निजी एथिक्स कमेटी से मंजूरी ली। गाइडलाइन के मुताबिक यदि सरकारी कॉलेज में एथिक्स कमेटी हो, तो बाहर की कमेटी से अनुमति नहीं ली जा सकती है। वर्ष 2005 में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट संशोधन के मुताबिक ट्रायल को मंजूरी देने वाली एथिक्स कमेटी में एक आम आदमी समेत पांच बाहरी व्यक्ति होना आवश्यक है। ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में बनी कमेटी में दो लोग बाहरी हैं और इनमें भी आम आदमी नहीं है। यहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्र्मेद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए। इसमें करीब 3500 रोगियों को चुना गया।
लेकिन इंदौर में तो डॉक्टरों ने हद ही कर दी। यहां के एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले मरीज यहां के डॉक्टरों की नजर में चूहे से ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। देशी-विदेशी दवा कंपनियों में निर्माणाधीन दवा और टीके मरीजों पर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। पांच वर्ष में ही छह डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के नाम पर 1170 बच्चों समेत 1521 मरीजों पर प्रयोग करके दो करोड़ का कारोबार किया। सूत्रों के मुताबिक, कई ऐसी दवाओं के प्रयोग भी हो रहे हैं जिन्हें भारत सरकार से अनुमति नहीं है। वैसे तो निगरानी के लिए इथिकल कमेटी है, पर उसे दवाओं व कंपनियां के नाम की ही जानकारी दी जाती है। मरीज, राशि और हिसाब की जानकारी उसे कम ही होती है। मेडिकल कॉलेज ने राज्य सरकार को पूरी तरह अंधेरे में रखा है। सरकार को यह पता नहीं है कि उसके अस्पतालों में मरीजों पर प्रयोग के नाम डॉक्टर क्या कर रहे हैं, कितना कमा रहे हैं। यही नहीं निर्माणाधीन केमिकल फार्मूले (दवा) के मरीजों पर प्रयोग के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े तीन अस्पतालों में ऐसे दफ्तर खुले हैं, जो ड्रग ट्रायल के केंद्र हैं। इनमें करीब तीन दर्जन लोग काम करते हैं, जिन्हें ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टर ही तनख्वाह देते हैं। इन दफ्तरों में कम्प्यूटर, स्केनर, प्रिंटर के साथ ही फैक्स और अलग से लैंड लाइन फोन भी लगे हैं। इस सब कुछ के लिए किसी से भी इजाजत नहीं ली गई।
क्लीनिकल ट्रायल में विवाद का मुद्दा रहता है कि अधिकांश मरीज गरीब और अशिक्षित होते हैं और डॉक्टर्स अंग्रेजी के कंसर्न फार्म पर साइन लेते हैं। हालांकि सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में डॉक्टरों ने हिंदी का सहमति पत्र दिया है। कई मरीजों को पता ही नहीं होता कि वे किसी शोध का हिस्सा है या ऐसी दवा ले रहे हैं जो ड्रग कंट्रोलर द्वारा इंडियन मार्केट में बेचने की अनुमति नहीं है। प्रदेश की औद्योगिक राजधानी में ड्रग ट्रायल सरकारी मेडिकल कॉलेज ही नहीं, प्राइवेट संस्थाओं में भी किए जा रहे हैं। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च के क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट पर इंदौर शहर के 20 डॉक्टरों के नाम हैं जिनमें डॉ. राकेश तारन, पुष्पा वर्मा, अनिल भराणी, सुनील एम. जैन, हेमंत जैन, गोविंद मालपानी, अजय चौहान, सलिल भार्गव, राजेश जैन, प्रदीप भार्गव, गजेन्द्र भंडारी, अभय पालीवाल, उज्ज्वल सरदेसाई, रामगुलाम राजदान, अशोक वाजपेयी, प्रदीप मेहता, अतुल शेंडे, आरती कौल, एस.जेड. जाफरी, डॉ. राजेन्द्र मेहता हैं। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग और मेडिसिन विभाग में पांच साल में 40 क्लीनिकल ड्रग ट्रायल किए गए हैं। हालांकि इनमें से आठ-नौ ही इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च में पंजीबद्ध है। अब कॉलेज प्रशासन यह पता लगा रहा है डॉक्टरों ने इन ट्रायल्स का पंजीयन करवाया या नहीं? सरकारी डॉक्टरों के प्राइवेट अस्पतालों में नियमित जाने पर पाबंदी लगा रखी है। आकस्मिक स्थिति में भी डीन की अनुमति जरूरी है। इसको ठेंगा दिखाते हुए डॉक्टर प्राइवेट अस्पतालों में ड्रग ट्रायल भी कर रहे हैं। कई ने तो क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर प्राइवेट अस्पतालों के नाम के साथ खुद का रजिस्ट्रेशन करवा रखा है। इस पर कॉलेज प्रशासन मौन है। वहीं एमवाय अस्पताल अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव द्वारा ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर में खड़ा किया गया करोड़ों का ड्रग ट्रायल के कारोबार की जांच भोपाल के अधिकारी करेंगे। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के लचर रवैये को देखते हुए यह फैसला किया गया है। मनोरोग विभाग के डॉ. रामगुलाम राजदान, डॉ. अभय पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई और मेडिसीन के डॉ. अतुल शेंडे ने भी डॉ. भार्गव की तर्ज पर निजी अस्पतालों में जाकर ट्रायल के गोरखधंधे में व्यारे-न्यारे किए हैं।
मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों में से कुछ ने तो अस्पताल में ही ट्रायल किए और कॉलेज की एथिक्स कमेटी से इसकी बाकायदा अनुमति ली, लेकिन कुछ डॉक्टर्स ऐसे भी थे जिन्होंने प्राइवेट अस्पताल या क्लिनिक पर ट्रायल किए हैं। डॉक्टरों ने दवा का परीक्षण एमवायएच में न करते हुए बाहर किया ताकि किसी को पता न चले। शहर में मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में प्राइवेट डॉक्टर्स भी मरीजों पर शोध के नाम पर ऐसी दवा का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे ड्रग कंट्रोलर जनरल ने भारतीय बाजार में बेचने की अनुमति नहीं दी है। अगर डीजीसीआई इन दवाओं को बेचने की अनुमति नहीं देता तो फिर इनका परीक्षण यहां के मरीजों पर क्यों किया जा रहा है?
जानकारी के अनुसार डॉक्टर्स जो भी शोध करते हैं तो उन्हें एथिक्स कमेटी की मीटिंग में मरीजों पर प्रयोग की गई दवा और उसके असर के बारे में भी बताना पड़ता है। कमेटी के सदस्यों को सारी जानकारी होना चाहिए। मीटिंग के मिनट्स में भी इसका जिक्र होता है। पिछले तीन सालों की बात करें तो स्वास्थ्य मंत्रालय के ड्रग डिवीजन ने करीब 689 ड्रग्स के क्लिनिकल ट्रायल को एनओसी दी है।
किसी भी दवा का ट्रायल जब शुरू किया जाता है तो देशभर के कई केंद्रों पर इनका परीक्षण करवाया जाता है। पर प्रदेश में भी न केवल सरकारी स्तर पर बल्कि प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टरों द्वारा धड़ल्ले से ट्रायल किए जा रहे हैं। इन पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मेडिकल कॉलेज की अलग एथिक्स कमेटी है, वहीं प्राइवेट अस्पतालों ने अलग कमेटी बनाई है। जो डॉक्टर्स किसी अस्पताल में नहीं जाते हैं, उन्होंने इसके लिए अलग एथिक्स कमेटी गठित की है। एथिक्स कमिटी के फार्मेशन व रजिस्ट्रेशन को लेकर क्या नियम है, ये किसी को भी नहीं पता। राज्य के स्वास्थ्य विभाग को भी इसकी जानकारी नहीं है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज में क्लिनिकल ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों ने जो जवाब भेजा है, वह चौंकाने वाला है। डॉक्टरों ने कहा है औषधि अनुसंधान पढ़ाई का हिस्सा है, जबकि मेडिकल कॉलेज में ट्रायल किए जा रहे हैं। अनुसंधान और ट्रायल में फर्क होता है। जानकारों के मुताबिक मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया के पोस्ट ग्रेजुएट रेगुलेशन में इस बात का उल्लेख नहीं है कि ड्रग ट्रायल पढ़ाई का हिस्सा है। अगर ये एकेडमिक विषय है तो प्रदेश के अन्य चार मेडिकल कॉलेजों में यह ड्रग ट्रायल क्यों नहीं किए जा रहे? सूत्रों के अनुसार कुछ साल पहले फिजियोलॉजी विभागाध्यक्ष ने छात्रों द्वारा शोध के नाम पर दिए गए ड्रग ट्रायल को लेने से मना कर दिया था। अनुसंधान किसी बीमारी या अणु पर एकत्रित की गई जानकारी होती है। इसके लिए डाटा इक_ा किए जाते हैं जबकि ट्रायल का सीधा अर्थ है परीक्षण करना। विदेशों में शोध के बाद बनाई गई दवाइयों का परीक्षण शहर में धड़ल्ले से किया जा रहा है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में पांच वर्ष से जारी ड्रग ट्रायल की पूरी जानकारी 500 से अधिक पन्नों में पूरी हुई। यह जानकारी भोपाल भेजी गई है, जिसे विधानसभा के पटल पर रखा जाएगा। बरसों से एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ड्रग ट्रायल हो रहा है और सरकार को इसकी रत्तीभर भी जानकारी नहीं थी। हालांकि प्रदेशभर में डॉक्टरों के बीच इस बात को लेकर चर्चा थी। सूत्र बताते हैं कि इस गोरखधंधे की पोल उस समय खुली जब कुछ मरीजों ने अपने ऊपर की गई दवाओं के परीक्षण की बात कुछ सहृदयी डॉक्टरों से की। बात निकली तो धीरे-धीरे आगे बढ़ी और शिकायत पहुंच गई रतलाम के विधायक पारस सखलेचा और सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल के पास। दोनों विधायकों ने ड्रग ट्रायल का मामले को गंभीरता से लेते हुए विधानसभा में सवाल पूछा तो मामले में लिप्त सभी डॉक्टरों के कान खड़े हो गए। सूत्रों की माने तो विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में कॉलेज ने जानकारी भेजी कि शिशु रोग और मेडिसिन विभाग में 20-20 ट्रायल हुए हैं। इनमें कॉलेज से संबद्ध चाचा नेहरू अस्पताल में तो सारे ट्रायल डॉ. हेमंत जैन के नाम पर हैं। वे ही सारे ट्रायल के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर रहे, वहीं मेडिसिन में डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. सलील भार्गव, डॉ. संजय अवासिया, डॉ. अनिल भराणी आदि ने ट्रायल किए। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों की माने तो भारत में अधिकतर उन्ही विदेशी दवाओं का ट्रायल होता है जिन्हें किसी अन्य देश ने ट्रायल करने की अनुमति नहीं मिल पाती है। यही कारण है कि क्लीनिकल ट्रायल या क्लीनिकल रिसर्च (चिकित्सीय अनुसंधान) कारोबार में भारत अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वी चीन से भी आगे बढ़ गया है। देश की लचर स्वास्थ्य प्रणाली और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आउटसोर्स किए गए चिकित्सकीय परीक्षणों का बाजार आज 2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। गौरतलब है कि आम हिंदुस्तानी का बड़ी-बड़ी कंपनियों की दवाइयों के लिए गिनीपिग बनने का सिलसिला नया नहीं है।
गौरतलब है कि स्वाथ्य क्षेत्र में कोई नई दवा लोगों के लिए कितनी सुरक्षित है और कितनी प्रभावी है, इसके आंकड़े हासिल करने के लिए क्लीनिकल ट्रायल किया जाता है। किसी देश में यह परीक्षण करने के लिए पहले वहां स्वास्थ्य क्षेत्र की नियामक संस्था या सदाचार समिति से मंजूरी लेनी पड़ती है। भारत में कोई जब किसी दवा का क्लीनिकल ट्रायल करना चाहता है तो उसे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद से जुड़ी संस्था नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल स्टेटिस्टिक्स में इसकी रजिस्ट्री करवानी पड़ती है। उसे किसी मरीज पर इस दवा के परीक्षण से पहले डब्ल्यूएचओ के आईसीटीआरपी के मानक के अनुसार कई तरह की जानकारियां देनी पड़ती हैं। इसके साथ ही उसे भारतीय संदर्भ के लिए प्रासंगिक कई जानकारियां भी देनी होती हैं जैसे सदाचार समिति से मंजूरी मिली है या नहीं, डीसीजीआई से मंजूरी मिली है या नहीं आदि। देश में क्लीनिकल ट्रायल का कारोबार तेजी से बढऩे के बावजूद उसका फायदा घरेलू दवा कंपनियां नहीं उठा पा रही हैं। इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है क्लीनिकल ट्रायल के वास्ते ली जाने वाले फीस के लिए कोई मानक का न होना। इस वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश के योग्य डॉक्टरों को भारी-भरकम राशि देकर अपनी ओर खींचने में सफल हो जाती हैं जिसका सीधा असर देश में दवा उद्योग के रिसर्च कार्ये पर पड़ रहा है।
विडंबना यह है कि डाक्टरों को दी जाने वाली फीस पर सरकारी नियंत्रण का कोई इंतजाम नहीं है और न ही कोई योजना है। इसी वजह से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां योग्य डाक्टरों को काफी अधिक फीस दे रही हैं और वे छोटी कंपनियों की पहुंच से बाहर हो रहे हैं। मेट्रो शहरों में बड़े डाक्टर क्लीनिकल ट्रायल के वास्ते मरीज को रजिस्टर कराने के लिए दो लाख रुपये प्रति मरीज ले रहे हैं। ऐसे में छोटी कंपनियां बड़े शहरों को छोड़ छोटे शहरों में कम पैसों पर डाक्टरों से क्लीनिकल ट्रायल करवा रही हैं। भारत के दवा महानियंत्रक (डीसीजीआई) के सूत्रों ने बताया कि सरकार क्लीनिकल ट्रायल करने के तरीके पर पूरी नजर रख रही है। लेकिन इसके लिए डाक्टर से तय की जाने वाली फीस पर नियंत्रण करने की योजना पर सरकार अभी कुछ नहीं सोच रही है।
उनका कहना है कि अधिकतर नए मॉलिक्यूल्स बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ही तैयार किए जाते हैं, उनकी लागत भी काफी आती है और ट्रायल के लिए डाक्टर को ये कंपनियां फीस भी अधिक देती हैं। डीसीजीआई का मानना है कि क्लीनिकल ट्रायल के लिए फीस लेना-देना डाक्टर और कंपनी के बीच का मामला है। हालांकि, उनका कहना है कि इसके लिए कोई नियामक बनाने के बजाय डाक्टरों को ही तय करना होगा कि कितना पैसा जायज है। सरकारी संस्थाओं में क्लीनिकल ट्रायल करवाने के लिए काफी मानकों को पूरा करना होता है, इसलिए कंपनियां क्लीनिकल ट्रायल के लिए प्राइवेट डाक्टरों और कॉरपोरेट अस्पतालों को ही अहमियत देती हैं। लेकिन इंदौर में डाक्टरों ने इसके विपरीत कार्य किया है। उधर इस मामले में सीटीआरआई (क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया) की संचालक आभा अग्रवाल का कहना है कि अब क्लीनिकल ट्रायल का रजिस्ट्रेशन सीटीआरआई में होने लगा है। अभी तक हमारे यहां करीब 1152 ट्रायल रजिस्टर्ड हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या राज्यवार ट्रायल का विवरण भी आपके पास हैं तो उन्होंने कहा कि इस विभाग की अभी-अभी स्थापना हुई है इसलिए हमारे पास अभी पूरा सेटअप नहीं है। सीटीआरआई की संचालक के इस कथन से ही अंदाज लगाया जा सकता है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय लोगो के स्वास्थ्य के लिए कितना तत्पर है?
उल्लेखनीय है कि क्लीनिकल ट्रायल मामले में बॉयोमेडिकल रिसर्च ऑन ह्यïयूमन सब्जेक्ट (रेगुलेशन एंड प्रमोशन) बिल 2006 में तैयार किया था। जिसको सरकार ने स्वीकृत भी कर लिया था लेकिन वह पिछले 4 सालों से लटका हुआ था, लेकिन इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक डॉ. व्हीएम कचोट ने इसे गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के पास फाइनल टच के लिए भेजा। यह बिल संशोधित होकर संसद के इसी सत्र में पटल पर रखा जाएगा। ताकि इस बिल में कानूनी खामियों को दूर किया जा सके।
वैसे तो देश के हर राज्य में क्लीनिकल ट्रायल के नाम पर आदिवासी और गरीब लोगों पर विदेशी दवाओं का परीक्षण धड़ल्ले से चल रहा है, लेकिन मध्यप्रदेश की औद्योगिक राजधानी इंदौर में उजागर हुआ है। वह भी उस मुख्यमंत्री के कार्यकाल में जो मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर रहा है। शिवराज सिंह चौहान ने जब से मुख्यमंत्री का पदभार संभाला है तभी से उनकी प्राथमिकता में जनस्वास्थ्य रहा है। इसके लिए हर साल प्रदेश के कुल बजट में से 900 करोड़ रुपए स्वास्थ्य विभाग को आवंटित किया जाता है ताकि प्रदेश के दूर-दराज के इलाके तक हर एक व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई जा सकें। वहीं दूसरी तरफ इंदौर स्थित प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी मेडिकल कॉलेज में सरकारी सुविधा प्राप्त डॉक्टरों द्वारा शासन-प्रशासन और लोगों को अंधेरे में रखकर विदेशी दवाईयों के परीक्षण किए जाने का सनसनीखेज मामला प्रकाश में आया हैै। हालांकि क्लीनिकल ट्रायल करने वाले डॉक्टर इसको जायज ठहराते हैं लेकिन ऐसे ही डाक्टरों की मनमानी का देश में हर साल हजारों लोग शिकार हो जाते हैं। कुछ मौत के मुंह में समा जाते हैं तो कुछ जीवनभर के लिए गंभीर बीमारी या अपंगता के शिकार हो जाते हैं। एक अनुमान के तहत मप्र में हर साल तकरीबन 20,000 लोगों पर विभिन्न प्रकार की दवाओं का परीक्षण किया जा रहा है जिसमें से करीब 7500 लोग इसके विपरीत प्रभाव के शिकार हो रहे हैं और हजार के करीब तो मौत के मुंह में समा जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए डॉक्टरों ने किस तरह लोगों को गिनीपिग यानी परीक्षण की वस्तु या फिर यूं कहे कि बलि का बकरा बनाया है। जून 2006 से मार्च 2008 तक देश के सबसे बड़े चिकित्सकीय संस्थान एम्स में ऐसे ही एक ट्रायल के दौरान 48 बच्चों की मौत का मामला सामने आया था। जिसके बाद से ही स्वास्थ्य मंत्रालय ने कानूनों को और कड़े करने का निर्णय लिया था, लेकिन आज तक सब कुछ निर्बाध रूप से चल रहा है। जबकि आंध्र प्रदेश में ड्रग ट्रायल के दौरान छह बच्चों की मौत के बाद वहां ट्रायल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है।
किसी दवा या टीके को बाजार में उतारने से पहले उसके प्रभाव को पहले किसी जीव और बाद में मरीज पर प्रयोग करके देखना ड्रग ट्रायल है। इसके विपरीत प्रभाव से मरीज की जान का खतरा रहता है। लेकिन डाक्टरी की डिग्री मिलने के बाद से ही करोड़पति-अरबपति बनने का ख्वाब संजोए डाक्टर अनौतिक रूप से ऐसे कार्यों में जुट जाते हैं। हालांकि प्रदेश में यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भोपाल में गैस त्रासदी दौरान भी मरीजों पर कुछ दवाओं का परीक्षण किया गया था। गैस पीडि़तों को गिनी पिग बनाने का खुलासा गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन के नेता अब्दुल जब्बार ने भी किया। उन्होंने बताया कि 24 अगस्त 2008 को भोपाल मेमोरियल हास्पिटल के निदेशक ने चार विभागों को पत्र लिखकर निर्देश दिए थे कि गैस पीडि़तों व अन्य मरीजों पर ट्रायल ड्रग का उपयोग बंद कर दिया जाए।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों की विकसित दवाओं का धोखे से परीक्षण करने के दौरान प्रदेश में एक महिला मरीज की जान जा चुकी है। जबलपुर के कैंसर अस्पताल में इस मरीज का उपचार चल रहा था। उधर, इंदौर के बाद भोपाल और ग्वालियर के सरकारी मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में भी ड्रग ट्रायल की अनियमितताएं सामने आई हैं। जबलपुर में अगस्त 2008 में कैंसर रोगियों पर ड्रग ट्रायल शुरू हुआ था। रेडियोथेरेपी की प्रोफेसर डॉ. पुष्पा किरार और डॉ. अमित जोतवानी ने पेट के कैंसर (कार्टिनोमा स्टमक) के चार रोगियों पर दवा का प्रयोग शुरू किया था। चूंकि यह ट्रायल प्लेसिबो (इलाज के बीच में दवा बंद कर दूसरे मरीजों से तुलना करना) था, इसलिए एक महिला रोगी पर सारी दवाइयां बंद कर दी गई। इसी दौरान पीडि़त की मौत हो गई। गांधी मेडिकल कॉलेज भोपाल के सर्जरी एचओडी डॉ. एमसी सोनगरा और डॉ. नितिन वर्मा ने 08 में मूत्र रोग पीडित 40 लोगों पर कैडिला कंपनी की दवा का प्रयोग किया। उन्होंने अहमदाबाद की निजी एथिक्स कमेटी से मंजूरी ली। गाइडलाइन के मुताबिक यदि सरकारी कॉलेज में एथिक्स कमेटी हो, तो बाहर की कमेटी से अनुमति नहीं ली जा सकती है। वर्ष 2005 में ड्रग एंड कॉस्मेटिक एक्ट संशोधन के मुताबिक ट्रायल को मंजूरी देने वाली एथिक्स कमेटी में एक आम आदमी समेत पांच बाहरी व्यक्ति होना आवश्यक है। ग्वालियर के गजरा राजा मेडिकल कॉलेज में बनी कमेटी में दो लोग बाहरी हैं और इनमें भी आम आदमी नहीं है। यहां न्यूरो सर्जरी के डॉ. आयंगर, स्त्री रोग के डॉ. वी. अग्रवाल, मेडिसिन के डॉ. नवनीत अग्रवाल, धर्र्मेद्र तिवारी, चर्मरोग के डॉ. पीके सारस्वत और आर्थोपेडिक्स के डॉ. सिकरवार ने दस कंपनियों के ट्रायल किए गए। इसमें करीब 3500 रोगियों को चुना गया।
लेकिन इंदौर में तो डॉक्टरों ने हद ही कर दी। यहां के एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में आने वाले मरीज यहां के डॉक्टरों की नजर में चूहे से ज्यादा अहमियत नहीं रखते हैं। देशी-विदेशी दवा कंपनियों में निर्माणाधीन दवा और टीके मरीजों पर धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहे हैं। पांच वर्ष में ही छह डॉक्टरों ने ड्रग ट्रायल के नाम पर 1170 बच्चों समेत 1521 मरीजों पर प्रयोग करके दो करोड़ का कारोबार किया। सूत्रों के मुताबिक, कई ऐसी दवाओं के प्रयोग भी हो रहे हैं जिन्हें भारत सरकार से अनुमति नहीं है। वैसे तो निगरानी के लिए इथिकल कमेटी है, पर उसे दवाओं व कंपनियां के नाम की ही जानकारी दी जाती है। मरीज, राशि और हिसाब की जानकारी उसे कम ही होती है। मेडिकल कॉलेज ने राज्य सरकार को पूरी तरह अंधेरे में रखा है। सरकार को यह पता नहीं है कि उसके अस्पतालों में मरीजों पर प्रयोग के नाम डॉक्टर क्या कर रहे हैं, कितना कमा रहे हैं। यही नहीं निर्माणाधीन केमिकल फार्मूले (दवा) के मरीजों पर प्रयोग के लिए एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े तीन अस्पतालों में ऐसे दफ्तर खुले हैं, जो ड्रग ट्रायल के केंद्र हैं। इनमें करीब तीन दर्जन लोग काम करते हैं, जिन्हें ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टर ही तनख्वाह देते हैं। इन दफ्तरों में कम्प्यूटर, स्केनर, प्रिंटर के साथ ही फैक्स और अलग से लैंड लाइन फोन भी लगे हैं। इस सब कुछ के लिए किसी से भी इजाजत नहीं ली गई।
क्लीनिकल ट्रायल में विवाद का मुद्दा रहता है कि अधिकांश मरीज गरीब और अशिक्षित होते हैं और डॉक्टर्स अंग्रेजी के कंसर्न फार्म पर साइन लेते हैं। हालांकि सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में डॉक्टरों ने हिंदी का सहमति पत्र दिया है। कई मरीजों को पता ही नहीं होता कि वे किसी शोध का हिस्सा है या ऐसी दवा ले रहे हैं जो ड्रग कंट्रोलर द्वारा इंडियन मार्केट में बेचने की अनुमति नहीं है। प्रदेश की औद्योगिक राजधानी में ड्रग ट्रायल सरकारी मेडिकल कॉलेज ही नहीं, प्राइवेट संस्थाओं में भी किए जा रहे हैं। इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल रिसर्च के क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट पर इंदौर शहर के 20 डॉक्टरों के नाम हैं जिनमें डॉ. राकेश तारन, पुष्पा वर्मा, अनिल भराणी, सुनील एम. जैन, हेमंत जैन, गोविंद मालपानी, अजय चौहान, सलिल भार्गव, राजेश जैन, प्रदीप भार्गव, गजेन्द्र भंडारी, अभय पालीवाल, उज्ज्वल सरदेसाई, रामगुलाम राजदान, अशोक वाजपेयी, प्रदीप मेहता, अतुल शेंडे, आरती कौल, एस.जेड. जाफरी, डॉ. राजेन्द्र मेहता हैं। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के शिशु रोग और मेडिसिन विभाग में पांच साल में 40 क्लीनिकल ड्रग ट्रायल किए गए हैं। हालांकि इनमें से आठ-नौ ही इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च में पंजीबद्ध है। अब कॉलेज प्रशासन यह पता लगा रहा है डॉक्टरों ने इन ट्रायल्स का पंजीयन करवाया या नहीं? सरकारी डॉक्टरों के प्राइवेट अस्पतालों में नियमित जाने पर पाबंदी लगा रखी है। आकस्मिक स्थिति में भी डीन की अनुमति जरूरी है। इसको ठेंगा दिखाते हुए डॉक्टर प्राइवेट अस्पतालों में ड्रग ट्रायल भी कर रहे हैं। कई ने तो क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया की वेबसाइट पर प्राइवेट अस्पतालों के नाम के साथ खुद का रजिस्ट्रेशन करवा रखा है। इस पर कॉलेज प्रशासन मौन है। वहीं एमवाय अस्पताल अधीक्षक डॉ. सलिल भार्गव द्वारा ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर में खड़ा किया गया करोड़ों का ड्रग ट्रायल के कारोबार की जांच भोपाल के अधिकारी करेंगे। एमजीएम मेडिकल कॉलेज के लचर रवैये को देखते हुए यह फैसला किया गया है। मनोरोग विभाग के डॉ. रामगुलाम राजदान, डॉ. अभय पालीवाल, डॉ. उज्जवल सरदेसाई और मेडिसीन के डॉ. अतुल शेंडे ने भी डॉ. भार्गव की तर्ज पर निजी अस्पतालों में जाकर ट्रायल के गोरखधंधे में व्यारे-न्यारे किए हैं।
मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों में से कुछ ने तो अस्पताल में ही ट्रायल किए और कॉलेज की एथिक्स कमेटी से इसकी बाकायदा अनुमति ली, लेकिन कुछ डॉक्टर्स ऐसे भी थे जिन्होंने प्राइवेट अस्पताल या क्लिनिक पर ट्रायल किए हैं। डॉक्टरों ने दवा का परीक्षण एमवायएच में न करते हुए बाहर किया ताकि किसी को पता न चले। शहर में मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर्स ही नहीं, बल्कि बड़ी संख्या में प्राइवेट डॉक्टर्स भी मरीजों पर शोध के नाम पर ऐसी दवा का इस्तेमाल कर रहे हैं जिसे ड्रग कंट्रोलर जनरल ने भारतीय बाजार में बेचने की अनुमति नहीं दी है। अगर डीजीसीआई इन दवाओं को बेचने की अनुमति नहीं देता तो फिर इनका परीक्षण यहां के मरीजों पर क्यों किया जा रहा है?
जानकारी के अनुसार डॉक्टर्स जो भी शोध करते हैं तो उन्हें एथिक्स कमेटी की मीटिंग में मरीजों पर प्रयोग की गई दवा और उसके असर के बारे में भी बताना पड़ता है। कमेटी के सदस्यों को सारी जानकारी होना चाहिए। मीटिंग के मिनट्स में भी इसका जिक्र होता है। पिछले तीन सालों की बात करें तो स्वास्थ्य मंत्रालय के ड्रग डिवीजन ने करीब 689 ड्रग्स के क्लिनिकल ट्रायल को एनओसी दी है।
किसी भी दवा का ट्रायल जब शुरू किया जाता है तो देशभर के कई केंद्रों पर इनका परीक्षण करवाया जाता है। पर प्रदेश में भी न केवल सरकारी स्तर पर बल्कि प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टरों द्वारा धड़ल्ले से ट्रायल किए जा रहे हैं। इन पर किसी का नियंत्रण नहीं है। मेडिकल कॉलेज की अलग एथिक्स कमेटी है, वहीं प्राइवेट अस्पतालों ने अलग कमेटी बनाई है। जो डॉक्टर्स किसी अस्पताल में नहीं जाते हैं, उन्होंने इसके लिए अलग एथिक्स कमेटी गठित की है। एथिक्स कमिटी के फार्मेशन व रजिस्ट्रेशन को लेकर क्या नियम है, ये किसी को भी नहीं पता। राज्य के स्वास्थ्य विभाग को भी इसकी जानकारी नहीं है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज में क्लिनिकल ड्रग ट्रायल करने वाले डॉक्टरों ने जो जवाब भेजा है, वह चौंकाने वाला है। डॉक्टरों ने कहा है औषधि अनुसंधान पढ़ाई का हिस्सा है, जबकि मेडिकल कॉलेज में ट्रायल किए जा रहे हैं। अनुसंधान और ट्रायल में फर्क होता है। जानकारों के मुताबिक मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया के पोस्ट ग्रेजुएट रेगुलेशन में इस बात का उल्लेख नहीं है कि ड्रग ट्रायल पढ़ाई का हिस्सा है। अगर ये एकेडमिक विषय है तो प्रदेश के अन्य चार मेडिकल कॉलेजों में यह ड्रग ट्रायल क्यों नहीं किए जा रहे? सूत्रों के अनुसार कुछ साल पहले फिजियोलॉजी विभागाध्यक्ष ने छात्रों द्वारा शोध के नाम पर दिए गए ड्रग ट्रायल को लेने से मना कर दिया था। अनुसंधान किसी बीमारी या अणु पर एकत्रित की गई जानकारी होती है। इसके लिए डाटा इक_ा किए जाते हैं जबकि ट्रायल का सीधा अर्थ है परीक्षण करना। विदेशों में शोध के बाद बनाई गई दवाइयों का परीक्षण शहर में धड़ल्ले से किया जा रहा है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पतालों में पांच वर्ष से जारी ड्रग ट्रायल की पूरी जानकारी 500 से अधिक पन्नों में पूरी हुई। यह जानकारी भोपाल भेजी गई है, जिसे विधानसभा के पटल पर रखा जाएगा। बरसों से एमजीएम मेडिकल कॉलेज में ड्रग ट्रायल हो रहा है और सरकार को इसकी रत्तीभर भी जानकारी नहीं थी। हालांकि प्रदेशभर में डॉक्टरों के बीच इस बात को लेकर चर्चा थी। सूत्र बताते हैं कि इस गोरखधंधे की पोल उस समय खुली जब कुछ मरीजों ने अपने ऊपर की गई दवाओं के परीक्षण की बात कुछ सहृदयी डॉक्टरों से की। बात निकली तो धीरे-धीरे आगे बढ़ी और शिकायत पहुंच गई रतलाम के विधायक पारस सखलेचा और सरदारपुर के विधायक प्रताप ग्रेवाल के पास। दोनों विधायकों ने ड्रग ट्रायल का मामले को गंभीरता से लेते हुए विधानसभा में सवाल पूछा तो मामले में लिप्त सभी डॉक्टरों के कान खड़े हो गए। सूत्रों की माने तो विधानसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में कॉलेज ने जानकारी भेजी कि शिशु रोग और मेडिसिन विभाग में 20-20 ट्रायल हुए हैं। इनमें कॉलेज से संबद्ध चाचा नेहरू अस्पताल में तो सारे ट्रायल डॉ. हेमंत जैन के नाम पर हैं। वे ही सारे ट्रायल के प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर रहे, वहीं मेडिसिन में डॉ. अशोक वाजपेयी, डॉ. सलील भार्गव, डॉ. संजय अवासिया, डॉ. अनिल भराणी आदि ने ट्रायल किए। चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े सूत्रों की माने तो भारत में अधिकतर उन्ही विदेशी दवाओं का ट्रायल होता है जिन्हें किसी अन्य देश ने ट्रायल करने की अनुमति नहीं मिल पाती है। यही कारण है कि क्लीनिकल ट्रायल या क्लीनिकल रिसर्च (चिकित्सीय अनुसंधान) कारोबार में भारत अपने मजबूत प्रतिद्वंद्वी चीन से भी आगे बढ़ गया है। देश की लचर स्वास्थ्य प्रणाली और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते आउटसोर्स किए गए चिकित्सकीय परीक्षणों का बाजार आज 2 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। गौरतलब है कि आम हिंदुस्तानी का बड़ी-बड़ी कंपनियों की दवाइयों के लिए गिनीपिग बनने का सिलसिला नया नहीं है।
गौरतलब है कि स्वाथ्य क्षेत्र में कोई नई दवा लोगों के लिए कितनी सुरक्षित है और कितनी प्रभावी है, इसके आंकड़े हासिल करने के लिए क्लीनिकल ट्रायल किया जाता है। किसी देश में यह परीक्षण करने के लिए पहले वहां स्वास्थ्य क्षेत्र की नियामक संस्था या सदाचार समिति से मंजूरी लेनी पड़ती है। भारत में कोई जब किसी दवा का क्लीनिकल ट्रायल करना चाहता है तो उसे भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद से जुड़ी संस्था नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल स्टेटिस्टिक्स में इसकी रजिस्ट्री करवानी पड़ती है। उसे किसी मरीज पर इस दवा के परीक्षण से पहले डब्ल्यूएचओ के आईसीटीआरपी के मानक के अनुसार कई तरह की जानकारियां देनी पड़ती हैं। इसके साथ ही उसे भारतीय संदर्भ के लिए प्रासंगिक कई जानकारियां भी देनी होती हैं जैसे सदाचार समिति से मंजूरी मिली है या नहीं, डीसीजीआई से मंजूरी मिली है या नहीं आदि। देश में क्लीनिकल ट्रायल का कारोबार तेजी से बढऩे के बावजूद उसका फायदा घरेलू दवा कंपनियां नहीं उठा पा रही हैं। इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है क्लीनिकल ट्रायल के वास्ते ली जाने वाले फीस के लिए कोई मानक का न होना। इस वजह से बहुराष्ट्रीय कंपनियां देश के योग्य डॉक्टरों को भारी-भरकम राशि देकर अपनी ओर खींचने में सफल हो जाती हैं जिसका सीधा असर देश में दवा उद्योग के रिसर्च कार्ये पर पड़ रहा है।
विडंबना यह है कि डाक्टरों को दी जाने वाली फीस पर सरकारी नियंत्रण का कोई इंतजाम नहीं है और न ही कोई योजना है। इसी वजह से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां योग्य डाक्टरों को काफी अधिक फीस दे रही हैं और वे छोटी कंपनियों की पहुंच से बाहर हो रहे हैं। मेट्रो शहरों में बड़े डाक्टर क्लीनिकल ट्रायल के वास्ते मरीज को रजिस्टर कराने के लिए दो लाख रुपये प्रति मरीज ले रहे हैं। ऐसे में छोटी कंपनियां बड़े शहरों को छोड़ छोटे शहरों में कम पैसों पर डाक्टरों से क्लीनिकल ट्रायल करवा रही हैं। भारत के दवा महानियंत्रक (डीसीजीआई) के सूत्रों ने बताया कि सरकार क्लीनिकल ट्रायल करने के तरीके पर पूरी नजर रख रही है। लेकिन इसके लिए डाक्टर से तय की जाने वाली फीस पर नियंत्रण करने की योजना पर सरकार अभी कुछ नहीं सोच रही है।
उनका कहना है कि अधिकतर नए मॉलिक्यूल्स बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ही तैयार किए जाते हैं, उनकी लागत भी काफी आती है और ट्रायल के लिए डाक्टर को ये कंपनियां फीस भी अधिक देती हैं। डीसीजीआई का मानना है कि क्लीनिकल ट्रायल के लिए फीस लेना-देना डाक्टर और कंपनी के बीच का मामला है। हालांकि, उनका कहना है कि इसके लिए कोई नियामक बनाने के बजाय डाक्टरों को ही तय करना होगा कि कितना पैसा जायज है। सरकारी संस्थाओं में क्लीनिकल ट्रायल करवाने के लिए काफी मानकों को पूरा करना होता है, इसलिए कंपनियां क्लीनिकल ट्रायल के लिए प्राइवेट डाक्टरों और कॉरपोरेट अस्पतालों को ही अहमियत देती हैं। लेकिन इंदौर में डाक्टरों ने इसके विपरीत कार्य किया है। उधर इस मामले में सीटीआरआई (क्लीनिकल ट्रायल रजिस्ट्री ऑफ इंडिया) की संचालक आभा अग्रवाल का कहना है कि अब क्लीनिकल ट्रायल का रजिस्ट्रेशन सीटीआरआई में होने लगा है। अभी तक हमारे यहां करीब 1152 ट्रायल रजिस्टर्ड हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या राज्यवार ट्रायल का विवरण भी आपके पास हैं तो उन्होंने कहा कि इस विभाग की अभी-अभी स्थापना हुई है इसलिए हमारे पास अभी पूरा सेटअप नहीं है। सीटीआरआई की संचालक के इस कथन से ही अंदाज लगाया जा सकता है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय लोगो के स्वास्थ्य के लिए कितना तत्पर है?
उल्लेखनीय है कि क्लीनिकल ट्रायल मामले में बॉयोमेडिकल रिसर्च ऑन ह्यïयूमन सब्जेक्ट (रेगुलेशन एंड प्रमोशन) बिल 2006 में तैयार किया था। जिसको सरकार ने स्वीकृत भी कर लिया था लेकिन वह पिछले 4 सालों से लटका हुआ था, लेकिन इंडियन कॉउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के महानिदेशक डॉ. व्हीएम कचोट ने इसे गंभीरता से लेते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय के पास फाइनल टच के लिए भेजा। यह बिल संशोधित होकर संसद के इसी सत्र में पटल पर रखा जाएगा। ताकि इस बिल में कानूनी खामियों को दूर किया जा सके।
नक्सलवाद के लिए संजीवनी बना अफीम
मध्यप्रदेश का मालवांचल हमेशा से सिमी का गढ़ रहा है। भले ही पुलिस दावे करे कि मालवांचल सहित पूरे प्रदेश में सिमी के गढ़ को नेस्तानाबूत कर दिया गया है, लेकिन राख में आग अभी भी सुलग रही है। खूफिया सूत्रों की माने तो पुलिस के तेज होते पहरे के बीच सिमी कार्यकर्ताओं ने नक्सलियों से हाथ मिला लिया है और उन्हें आर्थिक सहायता पहुंचा रहे हैं। इसमें सिमी का साथ दे रहे हैं प्रदेश में अफीम की अवैध खेती करने वाले माफिया।
अफगानिस्तान में अगर नशे का कारोबार और खेती तालिबानी आतंकवादियों लिए आर्थिक संजीवनी बनी हुई है तो भारत में अफीम की खेती नक्सलवाद के लिए आर्थिक आधार का प्रमुख स्रोत हो गया है मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में अफीम की खेती के कारोबार के जरिए नक्सली अपने लिए धन जुटा रहे हैं। भारत में वैसे तो अफीम की खेती तीन राज्यों क्रमश: मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में की जाती है। लेकिन अभी भी सबसे अधिक अफीम का उत्पादन मध्यप्रदेश के २ जिलों क्रमश: नीमच और मंदसौर में होता है। हालांकि अफीम की खेती करने वालों पर पुलिस की नजर रहती है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि अपनी लचर प्रणाली और सांठ-गांठ के कारण वह अवैध खेती पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। जिसके कारण यहां हो रही अफीम की अवैध खेती की कमाई नक्सलियों को पहुंचाई जा रही है।
कुछ दिनों पहले तक मध्य प्रदेश और राजस्थान के अलावा कहीं और अफीम की खेती करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। किंतु अब उत्तर प्रदेश में भी इसकी खेती होने लगी है। हाल ही में इस श्रेणी में बिहार और झारखंड का नाम भी शामिल हो गया है। दरअसल बिहार और झारखंड के कुछ जिलों में गैरकानूनी तरीके से अफीम की खेती की जा रही है।
अफीम की खेती के लिए सबसे उपर्युक्त जलवायु ठंड का मौसम होता है। इसके अच्छे उत्पादन के लिए मिट्टी का शुष्क होना जरुरी माना जाता है। इसी कारण पहले इसकी खेती सिर्फ मध्य प्रदेश और राजस्थान में ही होती थी। हालांकि कुछ सालों से अफीम की खेती उत्तर प्रदेश के गंगा से सटे हुए इलाकों में होने लगी है, पर मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुकाबले यहाँ फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादकता अच्छी नहीं होती है। अफीम की खेती पठारों और पहाड़ों पर भी हो सकती है। अगर पठारों और पहाड़ों पर उपलब्ध मिट्टी की उर्वराशक्ति अच्छी होगी तो अफीम का उत्पादन भी वहाँ अच्छा होगा। इस तथ्य को बिहार और झारखंड में कार्यरत नक्सलियों ने बहुत बढिय़ा से पकड़ा है। वर्तमान में बिहार के औरंगाबाद, नवादा, गया और जमुई में और झारखंड के चतरा तथा पलामू जिले में अफीम की खेती चोरी-छुपे तरीके से की जा रही है। इन जिलों को रेड जोन की संज्ञा दी गई है। ऐसा नहीं है कि सरकार इस सच्चाई से वाकिफ नहीं है। पुलिस और प्रशासन के ठीक नाक के नीचे निडरता से नक्सली किसानों के माध्यम से इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं। खूफिया सूत्र बताते हैं कि अफीम की खेती में पारंगत मध्यप्रदेश के किसान यहां आकर नक्सलियों का हाथ बटा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रतिवर्ष इस रेड जोन से ७० करोड़ राजस्व की उगाही नक्सली कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक सीपीआई, माओइस्ट के अंतर्गत काम करने वाली बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी भी ३०० करोड़ रुपयों राजस्व की उगाही प्रत्येक साल सिर्फ बिहार और झारखंड से कर रही है। हाल ही में बिहार पुलिस ने नवादा और औरंगाबाद में छापेमारी कर काफी मात्रा में अफीम की फसलों को तहस-नहस किया था। औरंगाबाद के कपासिया गाँव जो कि मुफसिल थाना के तहत आता है से दो किसानों को अफीम की खेती करने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। औरंगाबाद जिला में प्रमुखत: सोन नदी के किनारे के इलाकों मसलन, नवीनगर और बारुल ब्लॉक में अफीम की खेती की जाती है। एक किलोग्राम अफीम की कीमत भारतीय बाजार में डेढ़ लाख है और जब इस अफीम से हेरोईन बनायी जाती है तो उसी एक किलोग्राम की कीमत डेढ़ करोड़ हो जाती है।
कुछ दिनों पहले नवादा पुलिस ने नवादा और जमुई की सीमा से लगे हुए हारखार गाँव में एक ट्रक अफीम की तैयार फसल को अपने कब्जे में लिया था। चूँकि सामान्य तौर पर बिहार और झारखंड में अफीम की खेती पठार और पहाड़ों में अवस्थित जंगलों में की जाती है। इसलिए पुलिस के लिए उन जगहों की पहचान करना आसान नहीं होता है। बावजूद इसके बिहार पुलिस सेटेलाईट की मदद से अफीम की खेती जहाँ हो रही है उन स्थानों की पहचान करने में जुटी हुई है।
आमतौर पर नक्सली किसानों को अफीम की खेती करने के लिए मजबूर करते हैं। कभी अंग्रेजों ने भी बिहार के ही चंपारण में किसानों को नील की खेती करने के लिए विवश किया था। उसी कहानी को इतिहास फिर से दोहरा रहा है। जब पुलिस अफीम के फसलों को अपने कब्जे में ले भी लेती है तो उनके शिकंजे में केवल किसान ही आते हैं। पुलिस की थर्ड डिग्री भी उनसे नक्सलियों का नाम उगलवा नहीं पाती है।
नक्सली नासूर धीरे धीरे पूरे देश में अपना पैर फैला रहा है। कुल मिलाकर आंतरिक युद्ध की स्थिति हमारे देश में व्याप्त है। अगर अब भी नक्सलियों पर काबू नहीं पाया गया तो किसी बाहरी देश को हम पर हमला करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारा देश अपने वालों से ही तबाह हो जाएगा। अगर इसे रोकना है तो हमें इनके आर्थिक स्रोत को किसी तरह से भी रोकना ही होगा। क्योंकि इस गैर कानूनी व्यवसाय में लागत की तुलना में मुनाफा हजारों गुणा ज़्यादा है। कम लागत और बेतहाशा मुनाफे को देखकर अधिकांश लोग अफीम की खेती करने में जुट गए हैं। अफीम की पैदावार से नक्सलियों को बतौर लेवी कमीशन भी मिलने लगा है।
मध्यप्रदेश के चंबल घाटी के मुरैना शहर में मुस्लिम आतंकवादी संगठन का एक कमांडर पकड़ा जाएगा यह किसी ने नहीं सोचा। चंबल घाटी के लोग तो अपनी बंदूकों और हत्यारों पर भरोसा करते हैं और बाहर से आने वालो को खदेड़ देते हैं। मगर पिछले साल २७ मई को आठ साल से फरार सिमी का कमांडर इशाक खान पकड़ा गया था और पकड़े जाने पर उसने बताया कि नौ साल पहले २० मई २००० को चेन्नई एक्सप्रेस में बम भी उसने रखा था और बम ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले अखबारो में लिपटा हुआ था इसलिए जाहिर है कि ग्वालियर भी सिमी से मुक्त नहीं है।
आम तौर पर देश का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश और उसके भी मालवा अंचल में स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंंट ऑफ इंडिया-सिमी के अड्डे और हत्यारों के खजाने होंगे यह पहले किसी ने नहीं सोचा था। मगर आतंकवादियों का तो पुराना रवैया है कि जहां उनके होने का किसी को अंदेशा भी नहीं हो, वहीं जा कर रहा जाए। मध्यप्रदेश में सिमी का नेटवर्क काफी मजबूत रहा है और इंदौर के पास एक अड्डा बना कर ये लोग बाकायदा आतंक का प्रशिक्षण दे रहे थे। प्रशिक्षण भी ऐसा वैसा नहीं,। एकदम सेना के गौरिल्ला कमांडो जैसा।
२००८ में सिमी के तेरह नेताओं को इंदौर के पास नदी के किनारे उनके अड्डे से पकड़ा गया था। इनमें सिमी का महासचिव सफदर नागौरी और उसका भाई कमरूद्दीन भी था। भोपाल और इंदौर के बीच और भोपाल से पैतीस किलोमीटर दूर चोराल नाम की रमणीक जगह पर भी सिमी का एक और अड्डा था जहां केरल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के मुस्लिम आतंकवादी प्रशिक्षण लेते थे और इसमें इस्लामिक मुजाहिदीन जैसे खतरनाक संगठन के लोग थे। यहां जब छापा मारा गया तो सिमी के कर्नाटक चीफ हाफिज हुसैन और केरल में सिमी का संयोजक कमरूद्दीन कापडिय़ा भी पकड़ा गया। कापडिय़ा की तलाश अहमदाबाद में हुए धारावाहिक धमाकों के अभियुक्त के तौर पर की जा रही है।
इसके बाद आजमगढ़ का रहने वाला और जयपुर, अहमदाबाद में दर्जनों लोगों की जान लेने वाला सैफ उर्र रहमान भी जबलपुर से पकड़ा गया। ये लोग मध्य प्रदेश में आकर बसे थे और अपना पूरा कर्तव्य कर रहे थे इससे जाहिर है कि इन्हें मध्य प्रदेश बहुत ज्यादा सुरक्षित लग रहा था लेकिन ये पकड़े गए इससे जाहिर है कि मध्य प्रदेश में सरकार आंख बंद कर के नहीं बैठी है। हालांकि इसका कोई राजनैतिक अर्थ नहीं हैं मगर १९९३ से २००३ तक मध्य प्रदेश में आतंकवादियों और मुस्लिम खूनी संगठनो का असर लगातार बढ़ा। इसे आप संयोग कह सकते हैं कि इस दौरान प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने जब छापे मारे तो खरगौन जिले के झीरामिया गांव से अपार विस्फोटक और आधुनिक हथियार बरामद हुए। संयोग से यह गांव उस सोहराबुदीन शेख का घर है जिसको फर्जी मुठभेड़ में मारने के मामले में नरेंद्र मोदी की सरकार अब तक फंसी हुई है। यहां तो आधुनिक हथियार बनाने और देशी हथियारों को आधुनिक बनाने का बाकायदा एक अड्डा बन गया था।
चाहे आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो या फिर खुफिया संस्थाओं के गैरकानूनी अभियान, उनके भरण-पोषण का यह एक बड़ा आधार है। अब नशीले पदार्थों की तस्करी आम आपराधिक या तस्कर गिरोहों के हाथ में नहीं रही। खुफिया एजेंसियों और आतंकवादी संगठनों ने इस पर कब्जा कर लिया है। सासाराम और मोहनियां उत्तर भारत में ड्रग स्मगलिंग के पुराने केंद्र रहे हैं। यहां के ड्रग माफियाओं के तौर अफगानिस्तान और दूसरे अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया से जुड़े हैं। यहां से हेरोइन, मार्फिन आदि मुंबई के रास्ते अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है। उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में पहली बार २००६ में चतरा जिले में अफीम की खेती की विधिवत शुरुआत हुई। शुरुआती दौर में स्थानीय बाजारों में खपत के अलावा यहां की अफीम के खरीददार भी नेपाली माओवादी ही थे। ४० से ५० हजार रुपए किलो अफीम, एक लाख रुपए किलो ब्राउन शुगर और लाख-डेढ़ लाख रुपए प्रति किलो हेरोईन बेची जाने लगी।
ऐसे में प्रदेश सरकार को चौतरफा लड़ाई लडऩी पड़ रही है। यदि मादक पदार्थों की तस्करी और और उसके व्यवसाय को छोड़ भी दिया जाय तो माओवाद और अलगावादी ताकते चुनौती के रूप में सामने हैं। माओवादियों ने छत्तीसगढ़ सीमा के जिलों खास तौर पर बालाघाट में हथियार बनाने के कई अड्डे बना रखे हैं वहीं सिमी का जाल पूरे प्रदेश में फैल गया है। सिमी और माओवादियों को मदद देने वालो में भू माफिया और मालवा के मंदसौर इलाके से अफीम की तस्करी करने वाले लोग भी मोटी कीमत पर सहायता बेच रहे हैं। इनमें से कई सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन कार्यकर्ताओं पर अदालत में मुकदमे चल रहे हैं और ज्यादातर मामलों में गवाह सामने नहीं आ रहे हैं। इसीलिए मध्य प्रदेश सरकार ने महाराष्ट्र के मकोका की तर्ज पर मध्य प्रदेश में इन मामलों को जल्दी निपटाने के लिए विशेष अदालते बनाने के इरादे से एक विधेयक पारित तो कर लिया मगर केंद्र सरकार की सहमति अब तक नहीं मिल पाई है।
अफगानिस्तान में अगर नशे का कारोबार और खेती तालिबानी आतंकवादियों लिए आर्थिक संजीवनी बनी हुई है तो भारत में अफीम की खेती नक्सलवाद के लिए आर्थिक आधार का प्रमुख स्रोत हो गया है मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान में अफीम की खेती के कारोबार के जरिए नक्सली अपने लिए धन जुटा रहे हैं। भारत में वैसे तो अफीम की खेती तीन राज्यों क्रमश: मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में की जाती है। लेकिन अभी भी सबसे अधिक अफीम का उत्पादन मध्यप्रदेश के २ जिलों क्रमश: नीमच और मंदसौर में होता है। हालांकि अफीम की खेती करने वालों पर पुलिस की नजर रहती है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि अपनी लचर प्रणाली और सांठ-गांठ के कारण वह अवैध खेती पर अंकुश नहीं लगा पा रही है। जिसके कारण यहां हो रही अफीम की अवैध खेती की कमाई नक्सलियों को पहुंचाई जा रही है।
कुछ दिनों पहले तक मध्य प्रदेश और राजस्थान के अलावा कहीं और अफीम की खेती करने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था। किंतु अब उत्तर प्रदेश में भी इसकी खेती होने लगी है। हाल ही में इस श्रेणी में बिहार और झारखंड का नाम भी शामिल हो गया है। दरअसल बिहार और झारखंड के कुछ जिलों में गैरकानूनी तरीके से अफीम की खेती की जा रही है।
अफीम की खेती के लिए सबसे उपर्युक्त जलवायु ठंड का मौसम होता है। इसके अच्छे उत्पादन के लिए मिट्टी का शुष्क होना जरुरी माना जाता है। इसी कारण पहले इसकी खेती सिर्फ मध्य प्रदेश और राजस्थान में ही होती थी। हालांकि कुछ सालों से अफीम की खेती उत्तर प्रदेश के गंगा से सटे हुए इलाकों में होने लगी है, पर मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुकाबले यहाँ फसल की गुणवत्ता एवं उत्पादकता अच्छी नहीं होती है। अफीम की खेती पठारों और पहाड़ों पर भी हो सकती है। अगर पठारों और पहाड़ों पर उपलब्ध मिट्टी की उर्वराशक्ति अच्छी होगी तो अफीम का उत्पादन भी वहाँ अच्छा होगा। इस तथ्य को बिहार और झारखंड में कार्यरत नक्सलियों ने बहुत बढिय़ा से पकड़ा है। वर्तमान में बिहार के औरंगाबाद, नवादा, गया और जमुई में और झारखंड के चतरा तथा पलामू जिले में अफीम की खेती चोरी-छुपे तरीके से की जा रही है। इन जिलों को रेड जोन की संज्ञा दी गई है। ऐसा नहीं है कि सरकार इस सच्चाई से वाकिफ नहीं है। पुलिस और प्रशासन के ठीक नाक के नीचे निडरता से नक्सली किसानों के माध्यम से इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं। खूफिया सूत्र बताते हैं कि अफीम की खेती में पारंगत मध्यप्रदेश के किसान यहां आकर नक्सलियों का हाथ बटा रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि प्रतिवर्ष इस रेड जोन से ७० करोड़ राजस्व की उगाही नक्सली कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक सीपीआई, माओइस्ट के अंतर्गत काम करने वाली बिहार-झारखंड स्पेशल एरिया कमेटी भी ३०० करोड़ रुपयों राजस्व की उगाही प्रत्येक साल सिर्फ बिहार और झारखंड से कर रही है। हाल ही में बिहार पुलिस ने नवादा और औरंगाबाद में छापेमारी कर काफी मात्रा में अफीम की फसलों को तहस-नहस किया था। औरंगाबाद के कपासिया गाँव जो कि मुफसिल थाना के तहत आता है से दो किसानों को अफीम की खेती करने के जुर्म में गिरफ्तार किया गया था। औरंगाबाद जिला में प्रमुखत: सोन नदी के किनारे के इलाकों मसलन, नवीनगर और बारुल ब्लॉक में अफीम की खेती की जाती है। एक किलोग्राम अफीम की कीमत भारतीय बाजार में डेढ़ लाख है और जब इस अफीम से हेरोईन बनायी जाती है तो उसी एक किलोग्राम की कीमत डेढ़ करोड़ हो जाती है।
कुछ दिनों पहले नवादा पुलिस ने नवादा और जमुई की सीमा से लगे हुए हारखार गाँव में एक ट्रक अफीम की तैयार फसल को अपने कब्जे में लिया था। चूँकि सामान्य तौर पर बिहार और झारखंड में अफीम की खेती पठार और पहाड़ों में अवस्थित जंगलों में की जाती है। इसलिए पुलिस के लिए उन जगहों की पहचान करना आसान नहीं होता है। बावजूद इसके बिहार पुलिस सेटेलाईट की मदद से अफीम की खेती जहाँ हो रही है उन स्थानों की पहचान करने में जुटी हुई है।
आमतौर पर नक्सली किसानों को अफीम की खेती करने के लिए मजबूर करते हैं। कभी अंग्रेजों ने भी बिहार के ही चंपारण में किसानों को नील की खेती करने के लिए विवश किया था। उसी कहानी को इतिहास फिर से दोहरा रहा है। जब पुलिस अफीम के फसलों को अपने कब्जे में ले भी लेती है तो उनके शिकंजे में केवल किसान ही आते हैं। पुलिस की थर्ड डिग्री भी उनसे नक्सलियों का नाम उगलवा नहीं पाती है।
नक्सली नासूर धीरे धीरे पूरे देश में अपना पैर फैला रहा है। कुल मिलाकर आंतरिक युद्ध की स्थिति हमारे देश में व्याप्त है। अगर अब भी नक्सलियों पर काबू नहीं पाया गया तो किसी बाहरी देश को हम पर हमला करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हमारा देश अपने वालों से ही तबाह हो जाएगा। अगर इसे रोकना है तो हमें इनके आर्थिक स्रोत को किसी तरह से भी रोकना ही होगा। क्योंकि इस गैर कानूनी व्यवसाय में लागत की तुलना में मुनाफा हजारों गुणा ज़्यादा है। कम लागत और बेतहाशा मुनाफे को देखकर अधिकांश लोग अफीम की खेती करने में जुट गए हैं। अफीम की पैदावार से नक्सलियों को बतौर लेवी कमीशन भी मिलने लगा है।
मध्यप्रदेश के चंबल घाटी के मुरैना शहर में मुस्लिम आतंकवादी संगठन का एक कमांडर पकड़ा जाएगा यह किसी ने नहीं सोचा। चंबल घाटी के लोग तो अपनी बंदूकों और हत्यारों पर भरोसा करते हैं और बाहर से आने वालो को खदेड़ देते हैं। मगर पिछले साल २७ मई को आठ साल से फरार सिमी का कमांडर इशाक खान पकड़ा गया था और पकड़े जाने पर उसने बताया कि नौ साल पहले २० मई २००० को चेन्नई एक्सप्रेस में बम भी उसने रखा था और बम ग्वालियर से प्रकाशित होने वाले अखबारो में लिपटा हुआ था इसलिए जाहिर है कि ग्वालियर भी सिमी से मुक्त नहीं है।
आम तौर पर देश का दिल कहे जाने वाले मध्य प्रदेश और उसके भी मालवा अंचल में स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंंट ऑफ इंडिया-सिमी के अड्डे और हत्यारों के खजाने होंगे यह पहले किसी ने नहीं सोचा था। मगर आतंकवादियों का तो पुराना रवैया है कि जहां उनके होने का किसी को अंदेशा भी नहीं हो, वहीं जा कर रहा जाए। मध्यप्रदेश में सिमी का नेटवर्क काफी मजबूत रहा है और इंदौर के पास एक अड्डा बना कर ये लोग बाकायदा आतंक का प्रशिक्षण दे रहे थे। प्रशिक्षण भी ऐसा वैसा नहीं,। एकदम सेना के गौरिल्ला कमांडो जैसा।
२००८ में सिमी के तेरह नेताओं को इंदौर के पास नदी के किनारे उनके अड्डे से पकड़ा गया था। इनमें सिमी का महासचिव सफदर नागौरी और उसका भाई कमरूद्दीन भी था। भोपाल और इंदौर के बीच और भोपाल से पैतीस किलोमीटर दूर चोराल नाम की रमणीक जगह पर भी सिमी का एक और अड्डा था जहां केरल, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के मुस्लिम आतंकवादी प्रशिक्षण लेते थे और इसमें इस्लामिक मुजाहिदीन जैसे खतरनाक संगठन के लोग थे। यहां जब छापा मारा गया तो सिमी के कर्नाटक चीफ हाफिज हुसैन और केरल में सिमी का संयोजक कमरूद्दीन कापडिय़ा भी पकड़ा गया। कापडिय़ा की तलाश अहमदाबाद में हुए धारावाहिक धमाकों के अभियुक्त के तौर पर की जा रही है।
इसके बाद आजमगढ़ का रहने वाला और जयपुर, अहमदाबाद में दर्जनों लोगों की जान लेने वाला सैफ उर्र रहमान भी जबलपुर से पकड़ा गया। ये लोग मध्य प्रदेश में आकर बसे थे और अपना पूरा कर्तव्य कर रहे थे इससे जाहिर है कि इन्हें मध्य प्रदेश बहुत ज्यादा सुरक्षित लग रहा था लेकिन ये पकड़े गए इससे जाहिर है कि मध्य प्रदेश में सरकार आंख बंद कर के नहीं बैठी है। हालांकि इसका कोई राजनैतिक अर्थ नहीं हैं मगर १९९३ से २००३ तक मध्य प्रदेश में आतंकवादियों और मुस्लिम खूनी संगठनो का असर लगातार बढ़ा। इसे आप संयोग कह सकते हैं कि इस दौरान प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री थे। शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने जब छापे मारे तो खरगौन जिले के झीरामिया गांव से अपार विस्फोटक और आधुनिक हथियार बरामद हुए। संयोग से यह गांव उस सोहराबुदीन शेख का घर है जिसको फर्जी मुठभेड़ में मारने के मामले में नरेंद्र मोदी की सरकार अब तक फंसी हुई है। यहां तो आधुनिक हथियार बनाने और देशी हथियारों को आधुनिक बनाने का बाकायदा एक अड्डा बन गया था।
चाहे आतंकवाद हो, नक्सलवाद हो या फिर खुफिया संस्थाओं के गैरकानूनी अभियान, उनके भरण-पोषण का यह एक बड़ा आधार है। अब नशीले पदार्थों की तस्करी आम आपराधिक या तस्कर गिरोहों के हाथ में नहीं रही। खुफिया एजेंसियों और आतंकवादी संगठनों ने इस पर कब्जा कर लिया है। सासाराम और मोहनियां उत्तर भारत में ड्रग स्मगलिंग के पुराने केंद्र रहे हैं। यहां के ड्रग माफियाओं के तौर अफगानिस्तान और दूसरे अंतर्राष्ट्रीय ड्रग माफिया से जुड़े हैं। यहां से हेरोइन, मार्फिन आदि मुंबई के रास्ते अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचता है। उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल में पहली बार २००६ में चतरा जिले में अफीम की खेती की विधिवत शुरुआत हुई। शुरुआती दौर में स्थानीय बाजारों में खपत के अलावा यहां की अफीम के खरीददार भी नेपाली माओवादी ही थे। ४० से ५० हजार रुपए किलो अफीम, एक लाख रुपए किलो ब्राउन शुगर और लाख-डेढ़ लाख रुपए प्रति किलो हेरोईन बेची जाने लगी।
ऐसे में प्रदेश सरकार को चौतरफा लड़ाई लडऩी पड़ रही है। यदि मादक पदार्थों की तस्करी और और उसके व्यवसाय को छोड़ भी दिया जाय तो माओवाद और अलगावादी ताकते चुनौती के रूप में सामने हैं। माओवादियों ने छत्तीसगढ़ सीमा के जिलों खास तौर पर बालाघाट में हथियार बनाने के कई अड्डे बना रखे हैं वहीं सिमी का जाल पूरे प्रदेश में फैल गया है। सिमी और माओवादियों को मदद देने वालो में भू माफिया और मालवा के मंदसौर इलाके से अफीम की तस्करी करने वाले लोग भी मोटी कीमत पर सहायता बेच रहे हैं। इनमें से कई सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन कार्यकर्ताओं पर अदालत में मुकदमे चल रहे हैं और ज्यादातर मामलों में गवाह सामने नहीं आ रहे हैं। इसीलिए मध्य प्रदेश सरकार ने महाराष्ट्र के मकोका की तर्ज पर मध्य प्रदेश में इन मामलों को जल्दी निपटाने के लिए विशेष अदालते बनाने के इरादे से एक विधेयक पारित तो कर लिया मगर केंद्र सरकार की सहमति अब तक नहीं मिल पाई है।
राजनेताओं के मोहरा बने नौकरशाह
भ्रष्टाचार ऐसा दंश है जो देश के हर संवेदनशील, विवेकवान और विचारशील के मस्तिष्क को अक्सर अथवा यदा-कदा आंदोलित करता रहता है। देश की नौकरशाही भी इस प्रश्र से उद्वेलित है परंतु वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गई है, क्योंकि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में राजनेताओं ने अपना एक अलग विधान बना लिया है। जिससे सत्ता और सर्वजन का संतुलन बनाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। संतुलन के खेल में नेताओं के बजाए नौकरशाह मोहरा बन गए है। अगर कोई नौकरशाह राजनेता के सांचे में नहीं ढ़लता है तो सत्ता और संतुलन के संघर्ष में वह फुटबाल की तरह इस पोस्ट से उस पोस्ट के बीच घूमता रह जाता है। ऐसे में उसे मोहरा बनाने के अलावा और कोई चारा दिखता नहीं है।
भले ही प्रशासनिक अधिकारियों के इस तंत्र को आज भी स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया कहा जाता है लेकिन सत्ता के साथ संतुलन बनाने में वे इतने लचीले हो जाते हैं कि एक अंगूठा छाप मंत्री उन्हें अपने इशारे पर घुमाता रहता है। जबकि इस देश का नौकरशाह ईमानदार होने की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित करे तो वह देश का कायाकल्प कर सकता है।
देश की नौकरशाही ने नागरिक प्रशासन को अत्यधिक निराश किया है। इन्हें देश में श्रेष्ठ नागरिक प्रशासन के लिए चुना गया था लेकिन ये भी भ्रष्ट राजनीतिज्ञों से भी बदतर होते जा रहे हैं। इनकी कार्यप्रणाली इतनी बदनाम और ध्वस्त हो चुकी है कि उस पर जनसामान्य भी यकीन करने को तैयार नहीं है। देश के खजाने के अरबों रुपए इनकी ढपोरशंखी नीतियों और भ्रष्टाचार जनित रणनीतियों पर खर्च होते हैं। कुछ एक निम्न वर्ग की बात छोड़ दी जाए तो भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में समाज के सबसे संपन्न और प्रभुत्वशाली वर्गों के लोग ही आते रहे जो अपने संस्कारों से ही स्वयं को प्रभुवर्ग का समझते हैं। वे देश की सामाजिक-आर्थिक हकीकत और आम जनता की समस्याओं के प्रति कतई संवेदनशील नहीं होते। उनके अंदर यह भाव शायद ही कभी आता है कि एक लोकसेवक के रूप में उनका उत्तरदायित्व जनता की समस्याओं को प्रभावी रूप से दूर करने का प्रयास करना है। वे नहीं समझते कि देश के विकास की तमाम नीतियों और कार्यक्रमों को तैयार करने तथा उन्हें कार्यान्वित करने में सबसे अहम भूमिका उन्हीं की है।
अब तक की दस पंचवर्षीय योजनाओं में देश के विकास के नाम पर जनता से एकत्र किए गए राजस्व में से लाखों करोड़ रुपए व्यय किए गए हैं, लेकिन बजट की अधिकांश धनराशि को नौकरशाह, राजनेता, माफिया और बिचौलिये ही हड़पते रहे हैं। आम जनता तक उनका पूरा लाभ नहीं पहुंच पाता है और देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी विकास की पटरी से बहुत दूर है।
यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में अब तक हुए प्रशासनिक सुधार के प्रयासों का कोई कारगर नतीजा नहीं निकल पाया है। यह संभव भी नहीं है जब तक कि नौकरशाहों की मानसिकता में बदलाव नहीं आ जाता है। हालांकि नौकरशाही पर किताब लिख चुके पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम मानते हैं कि राजनीतिक नियंत्रण हावी होने के बाद ही नौकरशाही में भ्रष्टाचार आया, अब उनका अपना मत मायने नहीं रखता, सब मंत्रियों और नेताओं के इशारों पर होता है। हमारे राजनीतिज्ञ करना चाहें तो पाँच साल में व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है लेकिन मौजूदा स्थिति उनके लिए अनुकूल है इसलिए वो बदलाव नहीं करते।
आलम यह है कि जिलों और विभागों में पदस्थ बेहतर और अनुभवी अधिकारियों को ताक में रखकर अधिकारियों की पदस्थापनाएं की जा रही है। इसके पीछे निष्ठा सबसे बड़ा कारण बताया जाता है। यही कारण है कि अधिकांश विभागों में ऐसे अधिकारियों को बिठा दिया गया है जिन पर या तो भ्रष्टाचार के आरोप हैं अथवा वह किसी मंत्री या पदाधिकारी के खासम खास बने रहने का दावा करते हैं। सरकार द्वारा बनाई गई विशेष योजनाओं का लाभ से वंचित रह जाने का सबसे बड़ा कारण भी यही है कि कैडर में शामिल प्रशासनिक क्षमताओं से परिपूर्ण ऐसे अधिकारियों को वह स्थान नहीं मिल पाता है जिसके की वह हकदार हैं। ऐसे में भला यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि उन योजनाओं का लाभ देश के उस तबके को भी मिलेगा जिसके खून पसीने की गढ़ी कमाई को हथियाने की गरज से अफसरशाह ईमानदारी का चोला ओढ़कर बैठे हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो क्या आजाद भारत के लिए दुनिया के विकसित देशों के समकक्ष आने में ६५ वर्ष का समय कम है?
भले ही प्रशासनिक अधिकारियों के इस तंत्र को आज भी स्टील फ्रेम ऑफ इंडिया कहा जाता है लेकिन सत्ता के साथ संतुलन बनाने में वे इतने लचीले हो जाते हैं कि एक अंगूठा छाप मंत्री उन्हें अपने इशारे पर घुमाता रहता है। जबकि इस देश का नौकरशाह ईमानदार होने की दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित करे तो वह देश का कायाकल्प कर सकता है।
देश की नौकरशाही ने नागरिक प्रशासन को अत्यधिक निराश किया है। इन्हें देश में श्रेष्ठ नागरिक प्रशासन के लिए चुना गया था लेकिन ये भी भ्रष्ट राजनीतिज्ञों से भी बदतर होते जा रहे हैं। इनकी कार्यप्रणाली इतनी बदनाम और ध्वस्त हो चुकी है कि उस पर जनसामान्य भी यकीन करने को तैयार नहीं है। देश के खजाने के अरबों रुपए इनकी ढपोरशंखी नीतियों और भ्रष्टाचार जनित रणनीतियों पर खर्च होते हैं। कुछ एक निम्न वर्ग की बात छोड़ दी जाए तो भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा में समाज के सबसे संपन्न और प्रभुत्वशाली वर्गों के लोग ही आते रहे जो अपने संस्कारों से ही स्वयं को प्रभुवर्ग का समझते हैं। वे देश की सामाजिक-आर्थिक हकीकत और आम जनता की समस्याओं के प्रति कतई संवेदनशील नहीं होते। उनके अंदर यह भाव शायद ही कभी आता है कि एक लोकसेवक के रूप में उनका उत्तरदायित्व जनता की समस्याओं को प्रभावी रूप से दूर करने का प्रयास करना है। वे नहीं समझते कि देश के विकास की तमाम नीतियों और कार्यक्रमों को तैयार करने तथा उन्हें कार्यान्वित करने में सबसे अहम भूमिका उन्हीं की है।
अब तक की दस पंचवर्षीय योजनाओं में देश के विकास के नाम पर जनता से एकत्र किए गए राजस्व में से लाखों करोड़ रुपए व्यय किए गए हैं, लेकिन बजट की अधिकांश धनराशि को नौकरशाह, राजनेता, माफिया और बिचौलिये ही हड़पते रहे हैं। आम जनता तक उनका पूरा लाभ नहीं पहुंच पाता है और देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी विकास की पटरी से बहुत दूर है।
यहां यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में अब तक हुए प्रशासनिक सुधार के प्रयासों का कोई कारगर नतीजा नहीं निकल पाया है। यह संभव भी नहीं है जब तक कि नौकरशाहों की मानसिकता में बदलाव नहीं आ जाता है। हालांकि नौकरशाही पर किताब लिख चुके पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम मानते हैं कि राजनीतिक नियंत्रण हावी होने के बाद ही नौकरशाही में भ्रष्टाचार आया, अब उनका अपना मत मायने नहीं रखता, सब मंत्रियों और नेताओं के इशारों पर होता है। हमारे राजनीतिज्ञ करना चाहें तो पाँच साल में व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है लेकिन मौजूदा स्थिति उनके लिए अनुकूल है इसलिए वो बदलाव नहीं करते।
आलम यह है कि जिलों और विभागों में पदस्थ बेहतर और अनुभवी अधिकारियों को ताक में रखकर अधिकारियों की पदस्थापनाएं की जा रही है। इसके पीछे निष्ठा सबसे बड़ा कारण बताया जाता है। यही कारण है कि अधिकांश विभागों में ऐसे अधिकारियों को बिठा दिया गया है जिन पर या तो भ्रष्टाचार के आरोप हैं अथवा वह किसी मंत्री या पदाधिकारी के खासम खास बने रहने का दावा करते हैं। सरकार द्वारा बनाई गई विशेष योजनाओं का लाभ से वंचित रह जाने का सबसे बड़ा कारण भी यही है कि कैडर में शामिल प्रशासनिक क्षमताओं से परिपूर्ण ऐसे अधिकारियों को वह स्थान नहीं मिल पाता है जिसके की वह हकदार हैं। ऐसे में भला यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि उन योजनाओं का लाभ देश के उस तबके को भी मिलेगा जिसके खून पसीने की गढ़ी कमाई को हथियाने की गरज से अफसरशाह ईमानदारी का चोला ओढ़कर बैठे हैं। यदि ऐसा नहीं है, तो क्या आजाद भारत के लिए दुनिया के विकसित देशों के समकक्ष आने में ६५ वर्ष का समय कम है?
भ्रष्टाचार उगा मनरेगा में
मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत उजाड़ और बीहड़ वनक्षेत्रों की बंजर भूमि पर वैकल्पिक ऊर्जा ईंधन या बायो फ्यूल उत्पादन के लिए जेट्रोफा की खेती करने का काम बड़ी जोर शोर के साथ शुरू किया गया था लेकिन अधिकारियों की करतुतों के कारण जेट्रोफा तो नहीं उग पाया,बल्कि उसकी जगह भ्रष्टाचार जरूर उगा और बड़ी तेजी से पनप भी। मनरेगा की गोद में पैदा हुआ भ्रष्टाचार का पौधा अब बट वृक्ष हो गया है और इसमें आधा दर्जन से अधिक आईएएस अधिकारियों को अपनी चपेट में ले लिया है।
राजीव गांधी गलत थे जो उन्होंने यह कहा कि विकास के लिए ऊपर से जो पैसा आता है उसका १० पैसा ही नीचे पहुंचता है. मप्र के अधिकारी यह साबित कर रहे हैं कि रूपये में दस पैसा नहीं बल्कि २५ पैसा नीचे पहुंचता है. आज राजीव गांधी जिन्दा होते और अपनी ही पार्टी की महत्वाकांक्षी परियोजना नरेगा के तहत पैसे की बंदरबाद देखते तो निश्चित रूप से वे अपना जुमला ठीक करते. लेकिन रूकिये, एक दिक्कत है. यह जो २५ पैसा नीचे तक जा रहा है वह तथाकथित विकास का पैसा नहीं है. यह सीधे तौर पर ग्रामीण लोगों के आर्थिक उत्थान के लिए खोजा गया जादुई फार्मूले का पैसा है. यह उस महान विचार से निकला पैसा है जो कहता है कि ग्रामीण इलाकों में अगर रोजगार हो तो शहर की ओर पलायन कम होगा और ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत किया जा सकेगा. लेकिन जब इस महान विचार पर अमल की बारी आयी तो सूखे के दिनों में मप्र में सड़कें खुदवाने का काम सबसे ज्यादा किया गया. अपनी ही खेत में विकास का हल चलाने के लिए भी पैसा दिया गया. कागज पूरा किया गया. बही-खाते बनाये गये और जितना पैसा लोगों को बांटा गया उसका तीन गुना अपने पास रख अधिकारियों ने अपना विकास सुनिश्चित कर लिया.
वैसे देखा जाए तो महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना जब से मप्र में लागू हुई है उसमें भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार हुआ है,लेकिन सबसे अनोखा भ्रष्टाचार हुआ सीधी में। सीधी जिले में तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और सीईओ चंद्रशेखर बोरकर ने वहां लगाए गए जैट्रोफा के पौधों को तेजी से बढ़ाने के नाम पर ढाई करोड़ के इंजेक्शन लगवा दिए। जब इस मामले की जांच कराई गई तो पूरी योजना केवल कागजों पर ही मिली। इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और सीईओ चंद्रशेखर बोरकर को दोषी बनाया गया है। इनके अलावा मनरेगा में भिंड के कलेक्टर एस.एस. अली, भिंड के सीईओ आर.पी. भारती, टीकमगढ़ के कलेक्टर के.पी. राही व एम.सी. वर्मा, छतरपुर के सीईओ एस.सी. शर्मा, (सभी तत्कालीन) ने करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार किया है। इन अफसरों के भ्रष्टाचार और गड़बडिय़ों की शिकायत पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (मप्र रोजगार गारंटी परिषद) तक पहुंची। यहां तक कि विधानसभा में भी इन अफसरों की गड़बडिय़ों को लेकर सवाल उठाए गए और ध्यानाकर्षण लगा। जनप्रतिनिधियों ने इन अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की, लेकिन इतनी उठापटक के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने इन अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए जीएडी को लिखा और इनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की जानकारी दी गई, लेकिन उसने तो कार्रवाई करने के बजाय दोषियों के नाम तक छिपा लिए। वह भी उस मुख्यमंत्री के शासन काल में जिसने अपना पूरा समय प्रदेश के विकास के लिए समर्पित कर दिया है।
उल्लेखनीय है २००५ में जब केन्द्र सरकार की बहुप्रतीक्षित मनरेगा योजना मध्यप्रदेश में लागू हुई तब से ही इस दुधारू याजना का दोहन करने के लिए अधिकारी अपनी पसंद की जगह पाने में जुट गए। शरूआत हुई पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव वसीम अख्तर से। इसके पीछे जो कहानी उभरकर सामने आई है उसके अनुसार श्री अख्तर जब ग्वालियर में कलेक्टर थे उस दौरान उनकी और भाजपा के नेता नरेन्द्र सिंह तोमर की दोस्ती हो गई। समय के बदलाव के साथ मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता में आई और नरेन्द्र सिंह तोमर को ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया। मंत्री बनते ही केन्द्र से आई नरेगा योजना की कमान वसीम अख्तर को दिलाने के लिए श्री तोमर ने सरकार से पहल की और श्री अख्तर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव बना दिए गए। बताते है इसके पीछे शिवराज सिंह चौहान की भी सहमति थी क्योंकि विदिशा में कलेक्टरी के दौरान से ही दोनों के अच्छे संबंध है और इसका लाभ उन्हें मिला भी। उनके कार्यकाल के दौरान सीधी में लगभग सौ करोड़ के भ्रष्टाचार का मामला भी प्रकाश में आया था जिसकी जांच २००७-०८ में ८ सहायक इंजीनियरों और ३२ अन्य इंजीनियरों ने की थी जहां प्लांटेशन, सड़क निर्माण आदि में व्यापक भ्रष्टाचार बताया गया था बावजूद इसके मामला दबा हुआ है।
मनरेगा में भ्रष्टाचार की कहानी शुरू होती है सीधी जिले से। सीधी जिले में वर्ष २००५-०६, २००६-०७ और २००७-०८ में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में भारी भ्रष्टाचार हुआ था। वर्ष २००६-०७ में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत सीधी जिले में ग्राम पंचायतों के माध्यम से २५५.८७ करोड़ की लागत के ३२ हजार २९९ कार्य संपादित कराए गए थे। लेकिन जिला सीधी में १५५ कार्य बिना प्रशासकीय एवं तकनीकी स्वीकृति के शुरू करा दिए गए। वहीं ३८.४८ लाख के ४१ कार्य ऐसे हो गए, जो कार्यस्थल के निरीक्षण के बाद सत्यापित नहीं हो सके। ऐसे कई और काम कराए गए, जिनमें बाद में वसूली योग्य राशि की जानकारी सामने आई। उसी दौरान सुखबीर सिंह के खिलाफ जिले में जेट्रोफा पौधरोपण का कार्य अवैध कंपनियों से कराने का आरोप है। इस पर जांच भी की गई और अभी उनका प्रकरण चल रहा है। सिंह ने जेट्रोफा बीज की सप्लाई, पौधों की खाद, कीटनाशक दवाओं और ग्रोथ हार्मोन्स के छिड़काव का काम एकमात्र फर्म ओम सांई बायोटेक, रीवा से कराया और भुगतान स्व-सहायता समूहों से करवाया। जबकि कंपनी के पास न तो टिन नं. है और न ही रासायनिक दवा बेचने का पंजीयन। जानकारी के अनुसार तत्कालीन सीधी कलेक्टर सुखवीर सिंह और मुख्य कार्यपालन अधिकारी चंद्रशेखर बोरकर ने ज्योट्रफा वनस्पति जिससे की बायोडीजल उत्पादन के लिए पूरे विश्व में शोध कार्य चल रहा था। इन दो अधिकारियों ने स्वयं निर्णय लेकर इनको कतिपय हार्मोंस के नाम से उत्पादन बढ़ाने हेतु इंजेक्शन आदि डलवाने की व्यवस्था कराई। जिसमें लगभग १८ से २० करोड़ का व्यय दर्शाया। जांच के बाद पता चला कि उक्त राशि मजदूरों की मजदूरी थी जिसे नरेगा के तहत काम करने पर उन्हें मिलता। इस पर एक जांच समिति गठित की गई थी, जिसकी जांच रिपोर्ट भी शासन को सौंपी जा चुकी है। यह जांच रिपोर्ट सामान्य प्रशासन विभाग के पास है।
सामान्य प्रशासन विभाग इन अफसरों के बचाव के लिए यह तर्क दे रहा है कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने उन्हें इन कलेक्टरों व सीईओ की गड़बडिय़ों को लेकर कोई जानकारी नहीं दी है। जीएडी का कहना है कि उन्हें सीधी के तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और तत्कालीन सीईओ चंद्रशेखर बोरकर के संबंध में ही जानकारी मिली है इसीलिए हमने इन पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की। जीएडी का यह भी तर्क है कि हमने इन दोनों अफसरों पर कार्रवाई के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को प्राप्त सबूतों को एक तय प्रोफार्मा में मांगा है, लेकिन विभाग उपलब्ध ही नहीं करवा रहा है।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (रोजगार गारंटी योजना परिषद) का कहना है कि इन तमाम अधिकारियों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों, जांचों और प्राप्त सबूत जीएडी को उपलब्ध करवा दिए हैं। जिन पर कार्रवाई करना जीएडी का काम है। इन अफसरों के संबंध में रोजगार गारंटी योजना परिषद स्तर पर किसी तरह की कार्रवाई लंबित नहीं है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सीधी के तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और तत्कालीन सीईओ चंद्रशेखर बोरकर के संबंध में जीएडी से बार-बार चि_ियां मिल रही हैं, लेकिन उनका जवाब अब तक नहीं दिया गया है।
एस.एस. अली पर भिंड जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में नियम विरुद्ध क्रय संबंधित गड़बड़ी के आरोप हैं। इसकी जांच के लिए २४ जुलाई २००९ को जांच दल गठित किया गया था। जांच के दौरान प्रथम दृष्टया पाया गया कि वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। प्रशासकीय अनुमोदन के बाद अली के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव/ आरोप पत्र सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव को भेजा गया। अब यहां पर आगे की कार्रवाई अटकी हुई है। के.पी. राही पर भी टीकमगढ़ जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में नियम विरुद्ध क्रय संबंधित गड़बड़ी के आरोप हैं। इसलिए उनके खिलाफ विभाग ने ६ नवंबर २००९ को अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव प्रशासकीय अनुमोदन पश्चात सामान्य प्रशासन विभाग को भेजा था, जहां सिर्फ खानापूर्ति की गई। इसके बावजूद अब तक न तो इस बारे में कोई कार्रवाई होती दिख रही है और न ही किसी भी तरह की हलचल। हर कोई इसे दबाने में जुटा है।
सूत्रों के अनुसार पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा कराई गई जांच में टीकमगढ़ में नरेगा के तहत आई राशि में से करीब ४० लाख रुपए तथा भिंड में करीब ३० लाख रुपए की खरीदी की बात सामने आई है। कलेक्टर व जिला पंचायत सीईओ ने अपने स्तर पर स्थानीय जरूरतों के आधार पर दरियों सहित अन्य सामान की खरीदी मनमाने दामों कर ली। जिला प्रशासन की जिम्मेदारी मॉनीटरिंग की है लेकिन इसके विपरीत दोनों जिलों में कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ की मंजूरी से खरीदी कर ली गई।
यही नहीं अधिकारियों की मिली भगत का ही परीणाम है औद्योगिक उपक्रमों ने भी सरकार को चूना लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। प्रदेश में वैकल्पिक ऊर्जा ईंधन या बायो फ्यूल उत्पादन के लिए उजाड़ और बीहड़ वनक्षेत्रों में रतनजोत (जेट्रोफा) की खेती करने के लिए कई औद्योगिक उपक्रमों ने राज्य सरकार से बड़े-बड़े वायदे किए थे और राज्य सरकार ने उन पर भरोसा भी कर लिया था, लेकिन किसी भी उपक्रम ने रतनजोत का एक पौधा भी लगाने का काम नहीं किया है. मध्य प्रदेश सरकार ने बायो डीजल उत्पादन की महत्वाकांक्षी औद्योगिक परियोजनाओं के लिए आठ बड़ी औद्योगिक कंपनियों से लगभग ४०००० करोड़ रुपयों के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेडिंग अर्थात सहमति पत्र प्राप्त किए थे. सरकार ने इन कंपनियों को राज्य के वनक्षेत्रों में खाली पड़ी भूमि और उजाड़ वनक्षेत्र जेट्रोफा की खेती के लिए रियायती दर पर आवंटित भी कर दी थी. लगभग आठ हजार हेक्टेयर से ज़्यादा वनभूमि इन कपंनियों को इसलिए दी गई थी, ताकि वे अपने वायदे के अनुसार रतनजोत (जेट्रोफा) की खेती कर सकें और उसका उपयोग बायो डीजल बनाने में करें, लेकिन वनभूमि लेने के बाद किसी ने भी उस पर न तो खेती शुरू की है और न ही बायो डीजल उत्पादन के लिए प्लांट लगाने के लिए कोई तैयारी शुरू की है. इससे लगता है कि राज्य में पूंजी निवेश और औद्योगिक विकास के राज्य सरकार के सभी प्रयास केवल कागज़़ी कार्यवाही तक सिमटकर रह गए हैं.
महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में भ्रष्टाचार साबित होने के बाद भी सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) प्रदेश के सात दागी आईएएस व डिप्टी कलेक्टर रैंक के अफसरों को बचाने में जुटा है। राज्य शासन के इस रवैए से नाराज होकर मनरेगा की शिकायत दिल्ली में केंद्र सरकार के समक्ष की है। ५० पेज की इस रिपोर्ट में मनरेगा हुए भ्रष्टाचार को लेकर शिकायत की गई है। प्रदेश के सात जिलों में गरीब जनता के रोजगार के लिए आए करोड़ो रुपयों को मनमाने तरीके से लुटाने वाले ७ अफसर शान से घूम रहे हैं। महीनों पहले इनके भ्रष्टाचार की शिकायत को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और मप्र राज्य रोजगार गारंटी परिषद ने भी सही पाया। दोनों ने सबूतों के साथ मामला सामान्य प्रशासन विभाग को कार्रवाई के लिए सौंपा लेकिन वह एड़ी-चोटी का जोर लगाकर इसे दबाने में लगा हुआ है। इसके लिए उसने कार्यवाही का लिखने वाले विभागों को इतने पत्र लिखे कि मामला पेचीदा हो गया। इधर दोनों विभागों में भी अफसर आते जाते रहे और इन्होंने भी कार्यवाही के लिए ठोस जवाब नहीं दिए। अब मामला दबाने के लिए जीएडी के अफसर राज्य सूचना आयोग से भी टकराव के लिए तैयार है।
सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग अलका उपाध्याय को भ्रष्ट कलेक्टरों और सीईओ (आईएएस) पर कार्रवाई करना है, लेकिन चूंकि ये खुद भी आईएएस हंै, इसलिए इन पर कार्रवाई करने के बजाय इन्हें बचाने में लगी हुई हैं। मप्र राज्य सूचना आयोग को भी इन्होंने बार-बार झूठी जानकारी दी और गुमराह किया। जब सूचना आयोग ने इन्हें कड़े शब्दों में जानकारी देने के लिए लिखा तो इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील दायर करने के संबंध में सूचना आयोग को पत्र लिख दिया। इस पर सूचना आयोग ने एक बार फिर कड़े शब्दों में पत्र लिखा कि चूंकि आयोग खुद एक सिविल कोर्ट है, अत: इसके निर्णय को कहीं चुनौती नहीं दी जा सकती। आयोग के इस पत्र से जीएडी के पैर तले जमीन खिसक गई। लेकिन इस बार फिर एक पत्र लिखा गया है, जिसके अनुसार जीएडी, हाईकोर्ट में सूचना आयोग के निर्णय को चुनौती देने के लिए जनहित याचिका दायर करने जा रहा है। इसके लिए एक कमेटी भी गठित कर दी गई है। विभाग के प्रमुख सचिव व विकास आयुक्त आर. परशुराम, सचिव अजय तिर्की और मप्र राज्य रोजगार गारंटी परिषद के सीईओ शिव शेखर शुक्ला, सभी आईएएस हैं। इन्हें जीएडी की सचिव अलका उपाध्याय और अन्य अफसरों ने सीधी के तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और सीईओ चंद्रशेखर बोरकर के बारे में तय प्रोफार्मा में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए करीब १५ चि_ियां लिखीं, लेकिन आर. परशुराम, अजय तिर्की व रोजगार गारंटी के सीईओ ने इनके जवाब देने तक की भी जेहमत नहीं उठाई। जीएडी के पत्राचार से परेशान होकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव अजय तिर्की को रोजगार गारंटी परिषद को अर्ध -शासकीय पत्र लिखना पड़ा। अजय तिर्की के अर्धशासकीय पत्र का भी जवाब नहीं मिला है। यानी जीएडी, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और रोजगार गारंटी परिषद सभी की मिलीभगत से गरीब और बेसहारा जनता के नाम पर केंद्र से आवंटित करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार करने वाले अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
उल्लेखनीय है कि भोपाल में आईएएस दंपत्ति के यहां पड़े छापे के बाद लोकायुक्त सक्रिय हो गया है. उसकी सक्रियता का असर यह है कि एक बार फिर प्रदेश के तमाम आईएएस के भ्रष्टाचार की फाइलों के पन्ने पलटे जाने लगे हैं. इन फाइलों में सतना कलेक्टर सुखबीर सिंह सहित तीस आईएएस अफसरों पर जांच की कार्यवाही अब तेज होगी. पता तो यह भी चला है कि सतना कलेक्टर कि फाइल पर चर्चा होनी है. जिन आईएएस अफसरों पर लोकायुक्त की जांच चल रही है उन अफसरों पर बेईमानी, सरकार को धोखा देने जैसे इल्जाम हैं। इनमें से अधिकांश अफसर तो मंत्रियों की पसंद के हैं। लोकायुक्त जांच के दायरे में आबकारी आयुक्त अरुण कुमार पांडे, प्रभात पाराशर आयुक्त जबलपुर, मनीष श्रीवास्तव कलेक्टर सागर, लोक निर्माण विभाग के सचिव मोहम्मद सुलेमान हैं तो विवेक अग्रवाल और एसके मिश्रा, जो कि मुख्यमंत्री के सचिवालय में कार्यरत हैं, भी जांच के घेरे में हैं।
रोजगार गारंटी योजना में सीधी के कलेक्टर रहे सुखवीर सिंह, संजय गोयल, डिंडोरी कलेक्टर चंद्रशेखर बोरकर, छिंदवाड़ा कलेक्टर, निकुंज श्रीवास्तव, भिंड कलेक्टर विवेक पोरवाल सहित अन्य जांच के घेरे में हैं। मनीष श्रीवास्तव, जिलाध्यक्ष जिला शिवपुरी पर त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक परीक्षा के प्रश्न-पत्र की छपाई में घोटाले का आरोप है। अरुण कुमार पांडे पर अधिकारियों की मिलीभगत से दो करोड़ रुपए का ठेकेदार को लाभ देने का आरोप है।
वैसे भी हमारे देश में आईएएस अधिकारी होना फायदे का सौदा है. उसका लालन-पालन और पोषण कुछ ऐसा होता है कि वह हर प्रकार के भ्रष्टाचार के मूल में होता है लेकिन उसका नाम कहीं नहीं आता. अगर कागज की अंतिम प्रमाण हैं तो आईएएस अधिकारी कागजों के साथ खेलना सबसे बेहतर जानता है. फिलहाल तो मप्र सरकार और दूसरे संकटों में उलझी हुई है इसलिए उससे यह उम्मीद करना कि वह नरेगा जैसे छोटे-मोटे मामले में कोई खास रूचि लेगी, ठीक नहीं लगता. यह बहस किनारे रख दें कि नरेगा से जिस गांव के इन्फ्रास्ट्रकर को विकसित करने की बात की जा रही है उसे उसकी जरूरत है भी या नहीं. हम मान लेते हैं कि नरेगा गांव में नयी बयार लेकर पहुंचा है. लेकिन इस बयार में क्या कुछ गुल खिल रहे हैं इसे तो जानना ही चाहिए.
मध्य प्रदेश में नरेगा योजना पूरी तरह से नौकरशाहों के हाथ में है। मुख्य सचिव सशक्त समिति के अध्यक्ष हैं। जॉब कार्ड खरीदे जाने के भी कई मामले हैं। छतरपुर जिले की राजनगर तहसील के कन्हैया अहिरवार की तकलीफ यह है कि वर्ष २००८ में उसे पुलिया निर्माण के काम में लगाया गया लेकिन मजदूरों का भुगतान आज तक नहीं हुआ। सिवनी जिले के कुई विकास खंड में ठेकेदार कार्ड किराए पर लेकर योजना में काम कर रहे हैं। कई स्थानों पर जॉब कार्ड सरपंच के कब्जे में होने की शिकायतें भी मिलती रही हैं। मजदूरी की दर भी अलग-अलग है। कई लोग शिकायत करते हैं कि पूरे सौ दिन भी काम नहीं मिल पाता।
विकास संवाद केन्द्र के प्रमुख सचिन जैन मानते हैं कि नरेगा के बारे में किए गए अध्यान में यह लक्ष्य उभर कर सामने आया कि योजना में भ्रष्टाचार भी काफी है। आधे से ज्यादा जॉबकार्ड धारकों के खाते नहीं खुले हैं। पोस्ट ऑफिस भी मजदूरी के पैसे का पूरा भुगतान नहीं कर रहा है। कानून के मुताबिक लोगों को काम भी नहीं मिल रहा है। डिण्डोरी जिले में १५२ से अधिक बैगा आदिवासियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है। अब देखना यह है कि नौकरशाहों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी झेल रही प्रदेश सरकार क्या कदम उठाती है।
राजीव गांधी गलत थे जो उन्होंने यह कहा कि विकास के लिए ऊपर से जो पैसा आता है उसका १० पैसा ही नीचे पहुंचता है. मप्र के अधिकारी यह साबित कर रहे हैं कि रूपये में दस पैसा नहीं बल्कि २५ पैसा नीचे पहुंचता है. आज राजीव गांधी जिन्दा होते और अपनी ही पार्टी की महत्वाकांक्षी परियोजना नरेगा के तहत पैसे की बंदरबाद देखते तो निश्चित रूप से वे अपना जुमला ठीक करते. लेकिन रूकिये, एक दिक्कत है. यह जो २५ पैसा नीचे तक जा रहा है वह तथाकथित विकास का पैसा नहीं है. यह सीधे तौर पर ग्रामीण लोगों के आर्थिक उत्थान के लिए खोजा गया जादुई फार्मूले का पैसा है. यह उस महान विचार से निकला पैसा है जो कहता है कि ग्रामीण इलाकों में अगर रोजगार हो तो शहर की ओर पलायन कम होगा और ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर को भी मजबूत किया जा सकेगा. लेकिन जब इस महान विचार पर अमल की बारी आयी तो सूखे के दिनों में मप्र में सड़कें खुदवाने का काम सबसे ज्यादा किया गया. अपनी ही खेत में विकास का हल चलाने के लिए भी पैसा दिया गया. कागज पूरा किया गया. बही-खाते बनाये गये और जितना पैसा लोगों को बांटा गया उसका तीन गुना अपने पास रख अधिकारियों ने अपना विकास सुनिश्चित कर लिया.
वैसे देखा जाए तो महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना जब से मप्र में लागू हुई है उसमें भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार हुआ है,लेकिन सबसे अनोखा भ्रष्टाचार हुआ सीधी में। सीधी जिले में तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और सीईओ चंद्रशेखर बोरकर ने वहां लगाए गए जैट्रोफा के पौधों को तेजी से बढ़ाने के नाम पर ढाई करोड़ के इंजेक्शन लगवा दिए। जब इस मामले की जांच कराई गई तो पूरी योजना केवल कागजों पर ही मिली। इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और सीईओ चंद्रशेखर बोरकर को दोषी बनाया गया है। इनके अलावा मनरेगा में भिंड के कलेक्टर एस.एस. अली, भिंड के सीईओ आर.पी. भारती, टीकमगढ़ के कलेक्टर के.पी. राही व एम.सी. वर्मा, छतरपुर के सीईओ एस.सी. शर्मा, (सभी तत्कालीन) ने करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार किया है। इन अफसरों के भ्रष्टाचार और गड़बडिय़ों की शिकायत पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (मप्र रोजगार गारंटी परिषद) तक पहुंची। यहां तक कि विधानसभा में भी इन अफसरों की गड़बडिय़ों को लेकर सवाल उठाए गए और ध्यानाकर्षण लगा। जनप्रतिनिधियों ने इन अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की, लेकिन इतनी उठापटक के बाद भी आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने इन अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए जीएडी को लिखा और इनके द्वारा किए गए भ्रष्टाचार की जानकारी दी गई, लेकिन उसने तो कार्रवाई करने के बजाय दोषियों के नाम तक छिपा लिए। वह भी उस मुख्यमंत्री के शासन काल में जिसने अपना पूरा समय प्रदेश के विकास के लिए समर्पित कर दिया है।
उल्लेखनीय है २००५ में जब केन्द्र सरकार की बहुप्रतीक्षित मनरेगा योजना मध्यप्रदेश में लागू हुई तब से ही इस दुधारू याजना का दोहन करने के लिए अधिकारी अपनी पसंद की जगह पाने में जुट गए। शरूआत हुई पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव वसीम अख्तर से। इसके पीछे जो कहानी उभरकर सामने आई है उसके अनुसार श्री अख्तर जब ग्वालियर में कलेक्टर थे उस दौरान उनकी और भाजपा के नेता नरेन्द्र सिंह तोमर की दोस्ती हो गई। समय के बदलाव के साथ मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता में आई और नरेन्द्र सिंह तोमर को ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया। मंत्री बनते ही केन्द्र से आई नरेगा योजना की कमान वसीम अख्तर को दिलाने के लिए श्री तोमर ने सरकार से पहल की और श्री अख्तर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव बना दिए गए। बताते है इसके पीछे शिवराज सिंह चौहान की भी सहमति थी क्योंकि विदिशा में कलेक्टरी के दौरान से ही दोनों के अच्छे संबंध है और इसका लाभ उन्हें मिला भी। उनके कार्यकाल के दौरान सीधी में लगभग सौ करोड़ के भ्रष्टाचार का मामला भी प्रकाश में आया था जिसकी जांच २००७-०८ में ८ सहायक इंजीनियरों और ३२ अन्य इंजीनियरों ने की थी जहां प्लांटेशन, सड़क निर्माण आदि में व्यापक भ्रष्टाचार बताया गया था बावजूद इसके मामला दबा हुआ है।
मनरेगा में भ्रष्टाचार की कहानी शुरू होती है सीधी जिले से। सीधी जिले में वर्ष २००५-०६, २००६-०७ और २००७-०८ में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना में भारी भ्रष्टाचार हुआ था। वर्ष २००६-०७ में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत सीधी जिले में ग्राम पंचायतों के माध्यम से २५५.८७ करोड़ की लागत के ३२ हजार २९९ कार्य संपादित कराए गए थे। लेकिन जिला सीधी में १५५ कार्य बिना प्रशासकीय एवं तकनीकी स्वीकृति के शुरू करा दिए गए। वहीं ३८.४८ लाख के ४१ कार्य ऐसे हो गए, जो कार्यस्थल के निरीक्षण के बाद सत्यापित नहीं हो सके। ऐसे कई और काम कराए गए, जिनमें बाद में वसूली योग्य राशि की जानकारी सामने आई। उसी दौरान सुखबीर सिंह के खिलाफ जिले में जेट्रोफा पौधरोपण का कार्य अवैध कंपनियों से कराने का आरोप है। इस पर जांच भी की गई और अभी उनका प्रकरण चल रहा है। सिंह ने जेट्रोफा बीज की सप्लाई, पौधों की खाद, कीटनाशक दवाओं और ग्रोथ हार्मोन्स के छिड़काव का काम एकमात्र फर्म ओम सांई बायोटेक, रीवा से कराया और भुगतान स्व-सहायता समूहों से करवाया। जबकि कंपनी के पास न तो टिन नं. है और न ही रासायनिक दवा बेचने का पंजीयन। जानकारी के अनुसार तत्कालीन सीधी कलेक्टर सुखवीर सिंह और मुख्य कार्यपालन अधिकारी चंद्रशेखर बोरकर ने ज्योट्रफा वनस्पति जिससे की बायोडीजल उत्पादन के लिए पूरे विश्व में शोध कार्य चल रहा था। इन दो अधिकारियों ने स्वयं निर्णय लेकर इनको कतिपय हार्मोंस के नाम से उत्पादन बढ़ाने हेतु इंजेक्शन आदि डलवाने की व्यवस्था कराई। जिसमें लगभग १८ से २० करोड़ का व्यय दर्शाया। जांच के बाद पता चला कि उक्त राशि मजदूरों की मजदूरी थी जिसे नरेगा के तहत काम करने पर उन्हें मिलता। इस पर एक जांच समिति गठित की गई थी, जिसकी जांच रिपोर्ट भी शासन को सौंपी जा चुकी है। यह जांच रिपोर्ट सामान्य प्रशासन विभाग के पास है।
सामान्य प्रशासन विभाग इन अफसरों के बचाव के लिए यह तर्क दे रहा है कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने उन्हें इन कलेक्टरों व सीईओ की गड़बडिय़ों को लेकर कोई जानकारी नहीं दी है। जीएडी का कहना है कि उन्हें सीधी के तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और तत्कालीन सीईओ चंद्रशेखर बोरकर के संबंध में ही जानकारी मिली है इसीलिए हमने इन पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की। जीएडी का यह भी तर्क है कि हमने इन दोनों अफसरों पर कार्रवाई के लिए पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को प्राप्त सबूतों को एक तय प्रोफार्मा में मांगा है, लेकिन विभाग उपलब्ध ही नहीं करवा रहा है।
पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (रोजगार गारंटी योजना परिषद) का कहना है कि इन तमाम अधिकारियों के खिलाफ प्राप्त शिकायतों, जांचों और प्राप्त सबूत जीएडी को उपलब्ध करवा दिए हैं। जिन पर कार्रवाई करना जीएडी का काम है। इन अफसरों के संबंध में रोजगार गारंटी योजना परिषद स्तर पर किसी तरह की कार्रवाई लंबित नहीं है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सीधी के तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और तत्कालीन सीईओ चंद्रशेखर बोरकर के संबंध में जीएडी से बार-बार चि_ियां मिल रही हैं, लेकिन उनका जवाब अब तक नहीं दिया गया है।
एस.एस. अली पर भिंड जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में नियम विरुद्ध क्रय संबंधित गड़बड़ी के आरोप हैं। इसकी जांच के लिए २४ जुलाई २००९ को जांच दल गठित किया गया था। जांच के दौरान प्रथम दृष्टया पाया गया कि वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। प्रशासकीय अनुमोदन के बाद अली के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव/ आरोप पत्र सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव को भेजा गया। अब यहां पर आगे की कार्रवाई अटकी हुई है। के.पी. राही पर भी टीकमगढ़ जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में नियम विरुद्ध क्रय संबंधित गड़बड़ी के आरोप हैं। इसलिए उनके खिलाफ विभाग ने ६ नवंबर २००९ को अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव प्रशासकीय अनुमोदन पश्चात सामान्य प्रशासन विभाग को भेजा था, जहां सिर्फ खानापूर्ति की गई। इसके बावजूद अब तक न तो इस बारे में कोई कार्रवाई होती दिख रही है और न ही किसी भी तरह की हलचल। हर कोई इसे दबाने में जुटा है।
सूत्रों के अनुसार पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग द्वारा कराई गई जांच में टीकमगढ़ में नरेगा के तहत आई राशि में से करीब ४० लाख रुपए तथा भिंड में करीब ३० लाख रुपए की खरीदी की बात सामने आई है। कलेक्टर व जिला पंचायत सीईओ ने अपने स्तर पर स्थानीय जरूरतों के आधार पर दरियों सहित अन्य सामान की खरीदी मनमाने दामों कर ली। जिला प्रशासन की जिम्मेदारी मॉनीटरिंग की है लेकिन इसके विपरीत दोनों जिलों में कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ की मंजूरी से खरीदी कर ली गई।
यही नहीं अधिकारियों की मिली भगत का ही परीणाम है औद्योगिक उपक्रमों ने भी सरकार को चूना लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। प्रदेश में वैकल्पिक ऊर्जा ईंधन या बायो फ्यूल उत्पादन के लिए उजाड़ और बीहड़ वनक्षेत्रों में रतनजोत (जेट्रोफा) की खेती करने के लिए कई औद्योगिक उपक्रमों ने राज्य सरकार से बड़े-बड़े वायदे किए थे और राज्य सरकार ने उन पर भरोसा भी कर लिया था, लेकिन किसी भी उपक्रम ने रतनजोत का एक पौधा भी लगाने का काम नहीं किया है. मध्य प्रदेश सरकार ने बायो डीजल उत्पादन की महत्वाकांक्षी औद्योगिक परियोजनाओं के लिए आठ बड़ी औद्योगिक कंपनियों से लगभग ४०००० करोड़ रुपयों के मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेडिंग अर्थात सहमति पत्र प्राप्त किए थे. सरकार ने इन कंपनियों को राज्य के वनक्षेत्रों में खाली पड़ी भूमि और उजाड़ वनक्षेत्र जेट्रोफा की खेती के लिए रियायती दर पर आवंटित भी कर दी थी. लगभग आठ हजार हेक्टेयर से ज़्यादा वनभूमि इन कपंनियों को इसलिए दी गई थी, ताकि वे अपने वायदे के अनुसार रतनजोत (जेट्रोफा) की खेती कर सकें और उसका उपयोग बायो डीजल बनाने में करें, लेकिन वनभूमि लेने के बाद किसी ने भी उस पर न तो खेती शुरू की है और न ही बायो डीजल उत्पादन के लिए प्लांट लगाने के लिए कोई तैयारी शुरू की है. इससे लगता है कि राज्य में पूंजी निवेश और औद्योगिक विकास के राज्य सरकार के सभी प्रयास केवल कागज़़ी कार्यवाही तक सिमटकर रह गए हैं.
महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में भ्रष्टाचार साबित होने के बाद भी सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) प्रदेश के सात दागी आईएएस व डिप्टी कलेक्टर रैंक के अफसरों को बचाने में जुटा है। राज्य शासन के इस रवैए से नाराज होकर मनरेगा की शिकायत दिल्ली में केंद्र सरकार के समक्ष की है। ५० पेज की इस रिपोर्ट में मनरेगा हुए भ्रष्टाचार को लेकर शिकायत की गई है। प्रदेश के सात जिलों में गरीब जनता के रोजगार के लिए आए करोड़ो रुपयों को मनमाने तरीके से लुटाने वाले ७ अफसर शान से घूम रहे हैं। महीनों पहले इनके भ्रष्टाचार की शिकायत को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और मप्र राज्य रोजगार गारंटी परिषद ने भी सही पाया। दोनों ने सबूतों के साथ मामला सामान्य प्रशासन विभाग को कार्रवाई के लिए सौंपा लेकिन वह एड़ी-चोटी का जोर लगाकर इसे दबाने में लगा हुआ है। इसके लिए उसने कार्यवाही का लिखने वाले विभागों को इतने पत्र लिखे कि मामला पेचीदा हो गया। इधर दोनों विभागों में भी अफसर आते जाते रहे और इन्होंने भी कार्यवाही के लिए ठोस जवाब नहीं दिए। अब मामला दबाने के लिए जीएडी के अफसर राज्य सूचना आयोग से भी टकराव के लिए तैयार है।
सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग अलका उपाध्याय को भ्रष्ट कलेक्टरों और सीईओ (आईएएस) पर कार्रवाई करना है, लेकिन चूंकि ये खुद भी आईएएस हंै, इसलिए इन पर कार्रवाई करने के बजाय इन्हें बचाने में लगी हुई हैं। मप्र राज्य सूचना आयोग को भी इन्होंने बार-बार झूठी जानकारी दी और गुमराह किया। जब सूचना आयोग ने इन्हें कड़े शब्दों में जानकारी देने के लिए लिखा तो इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट में अपील दायर करने के संबंध में सूचना आयोग को पत्र लिख दिया। इस पर सूचना आयोग ने एक बार फिर कड़े शब्दों में पत्र लिखा कि चूंकि आयोग खुद एक सिविल कोर्ट है, अत: इसके निर्णय को कहीं चुनौती नहीं दी जा सकती। आयोग के इस पत्र से जीएडी के पैर तले जमीन खिसक गई। लेकिन इस बार फिर एक पत्र लिखा गया है, जिसके अनुसार जीएडी, हाईकोर्ट में सूचना आयोग के निर्णय को चुनौती देने के लिए जनहित याचिका दायर करने जा रहा है। इसके लिए एक कमेटी भी गठित कर दी गई है। विभाग के प्रमुख सचिव व विकास आयुक्त आर. परशुराम, सचिव अजय तिर्की और मप्र राज्य रोजगार गारंटी परिषद के सीईओ शिव शेखर शुक्ला, सभी आईएएस हैं। इन्हें जीएडी की सचिव अलका उपाध्याय और अन्य अफसरों ने सीधी के तत्कालीन कलेक्टर सुखवीर सिंह और सीईओ चंद्रशेखर बोरकर के बारे में तय प्रोफार्मा में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए करीब १५ चि_ियां लिखीं, लेकिन आर. परशुराम, अजय तिर्की व रोजगार गारंटी के सीईओ ने इनके जवाब देने तक की भी जेहमत नहीं उठाई। जीएडी के पत्राचार से परेशान होकर पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के सचिव अजय तिर्की को रोजगार गारंटी परिषद को अर्ध -शासकीय पत्र लिखना पड़ा। अजय तिर्की के अर्धशासकीय पत्र का भी जवाब नहीं मिला है। यानी जीएडी, पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग और रोजगार गारंटी परिषद सभी की मिलीभगत से गरीब और बेसहारा जनता के नाम पर केंद्र से आवंटित करोड़ों रुपए का भ्रष्टाचार करने वाले अफसरों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
उल्लेखनीय है कि भोपाल में आईएएस दंपत्ति के यहां पड़े छापे के बाद लोकायुक्त सक्रिय हो गया है. उसकी सक्रियता का असर यह है कि एक बार फिर प्रदेश के तमाम आईएएस के भ्रष्टाचार की फाइलों के पन्ने पलटे जाने लगे हैं. इन फाइलों में सतना कलेक्टर सुखबीर सिंह सहित तीस आईएएस अफसरों पर जांच की कार्यवाही अब तेज होगी. पता तो यह भी चला है कि सतना कलेक्टर कि फाइल पर चर्चा होनी है. जिन आईएएस अफसरों पर लोकायुक्त की जांच चल रही है उन अफसरों पर बेईमानी, सरकार को धोखा देने जैसे इल्जाम हैं। इनमें से अधिकांश अफसर तो मंत्रियों की पसंद के हैं। लोकायुक्त जांच के दायरे में आबकारी आयुक्त अरुण कुमार पांडे, प्रभात पाराशर आयुक्त जबलपुर, मनीष श्रीवास्तव कलेक्टर सागर, लोक निर्माण विभाग के सचिव मोहम्मद सुलेमान हैं तो विवेक अग्रवाल और एसके मिश्रा, जो कि मुख्यमंत्री के सचिवालय में कार्यरत हैं, भी जांच के घेरे में हैं।
रोजगार गारंटी योजना में सीधी के कलेक्टर रहे सुखवीर सिंह, संजय गोयल, डिंडोरी कलेक्टर चंद्रशेखर बोरकर, छिंदवाड़ा कलेक्टर, निकुंज श्रीवास्तव, भिंड कलेक्टर विवेक पोरवाल सहित अन्य जांच के घेरे में हैं। मनीष श्रीवास्तव, जिलाध्यक्ष जिला शिवपुरी पर त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक परीक्षा के प्रश्न-पत्र की छपाई में घोटाले का आरोप है। अरुण कुमार पांडे पर अधिकारियों की मिलीभगत से दो करोड़ रुपए का ठेकेदार को लाभ देने का आरोप है।
वैसे भी हमारे देश में आईएएस अधिकारी होना फायदे का सौदा है. उसका लालन-पालन और पोषण कुछ ऐसा होता है कि वह हर प्रकार के भ्रष्टाचार के मूल में होता है लेकिन उसका नाम कहीं नहीं आता. अगर कागज की अंतिम प्रमाण हैं तो आईएएस अधिकारी कागजों के साथ खेलना सबसे बेहतर जानता है. फिलहाल तो मप्र सरकार और दूसरे संकटों में उलझी हुई है इसलिए उससे यह उम्मीद करना कि वह नरेगा जैसे छोटे-मोटे मामले में कोई खास रूचि लेगी, ठीक नहीं लगता. यह बहस किनारे रख दें कि नरेगा से जिस गांव के इन्फ्रास्ट्रकर को विकसित करने की बात की जा रही है उसे उसकी जरूरत है भी या नहीं. हम मान लेते हैं कि नरेगा गांव में नयी बयार लेकर पहुंचा है. लेकिन इस बयार में क्या कुछ गुल खिल रहे हैं इसे तो जानना ही चाहिए.
मध्य प्रदेश में नरेगा योजना पूरी तरह से नौकरशाहों के हाथ में है। मुख्य सचिव सशक्त समिति के अध्यक्ष हैं। जॉब कार्ड खरीदे जाने के भी कई मामले हैं। छतरपुर जिले की राजनगर तहसील के कन्हैया अहिरवार की तकलीफ यह है कि वर्ष २००८ में उसे पुलिया निर्माण के काम में लगाया गया लेकिन मजदूरों का भुगतान आज तक नहीं हुआ। सिवनी जिले के कुई विकास खंड में ठेकेदार कार्ड किराए पर लेकर योजना में काम कर रहे हैं। कई स्थानों पर जॉब कार्ड सरपंच के कब्जे में होने की शिकायतें भी मिलती रही हैं। मजदूरी की दर भी अलग-अलग है। कई लोग शिकायत करते हैं कि पूरे सौ दिन भी काम नहीं मिल पाता।
विकास संवाद केन्द्र के प्रमुख सचिन जैन मानते हैं कि नरेगा के बारे में किए गए अध्यान में यह लक्ष्य उभर कर सामने आया कि योजना में भ्रष्टाचार भी काफी है। आधे से ज्यादा जॉबकार्ड धारकों के खाते नहीं खुले हैं। पोस्ट ऑफिस भी मजदूरी के पैसे का पूरा भुगतान नहीं कर रहा है। कानून के मुताबिक लोगों को काम भी नहीं मिल रहा है। डिण्डोरी जिले में १५२ से अधिक बैगा आदिवासियों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है। अब देखना यह है कि नौकरशाहों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर बदनामी झेल रही प्रदेश सरकार क्या कदम उठाती है।
कभी नहीं खुल सकेगा एंडरसन का राज
भोपाल गैस त्रासदी के आरोपी और यूनियन कार्बाइड के तत्कालीन प्रमुख वारेन एंडरसन के भारत से भागने का रहस्य कभी नहीं खुल पाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि ७ दिसंबर १९८४ की रात को एंडरसन के देश से बच निकलने संबंधी कोई रिकार्ड गृह या विदेश मंत्रालय के पास मौजूद नहीं है। गृह मंत्री ने कहा कि त्रासदी के २६ साल बाद विदेश विभाग के पास भी इस बात की जानकारी नहीं है कि एंडरसन कब आया, किससे मिला और कब लौट गया। यही नहीं, केंद्र सरकार के पास तो उस दरमियान गृह विभाग से हुए फोन का ब्योरा भी नहीं है। यानी यह कभी पता नहीं चल पाएगा कि हजारों मौतों के लिए जिम्मेदार एंडरसन को बाइज्जत भारत से अमेरिका किसने भिजवाया। १९८४ में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे अर्जुन सिंह का कहना है कि एंडरसन की गिरफ्तारी के बाद उसकी रिहाई के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय से फोन किए गए थे। सिंह ने पूरे मामले में पहली बार मुंह खोलते हुए बुधवार को संसद में कहा था कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (तब गृह मंत्री पीवी नरसिंह राव थे) से राज्य के गृह सचिव को फोन कर एंडरसन को छोडऩे के लिए कहा गया था।
उन्होंने यह भी माना कि पीडि़तों को राजनीतिक नेतृत्व, संसद और कार्यपालिका से पूरी तरह निराश होना पड़ा है। उन्होंने इसे 'सभी की सामूहिक विफलताÓ बताया। िचदंबरम ने एंडरसन के भारत से जाने के घटनाक्रम पर सवाल पूछने वाले विपक्ष को भी निशाने पर लिया। उन्होंने विपक्ष के नेता अरुण जेटली से उल्टा सवाल किया कि ७ दिसंबर, १९८४ की रात को क्या हुआ था, यह सवाल उन्होंने दस साल पहले क्यों नहीं पूछा, जब उनकी पार्टी की सरकार थी?
भोपाल में ३ दिसंबर, १९८४ की रात यूनियन कार्बाइड के प्लांट से जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसके असर से सैकड़ों लोग नींद में ही मर गए। मरने वालों की तादाद हजारों में पहुंच गई है और लाखों लोग गैस का बुरा असर अभी भी झेल रहे हैं। पिछले दिनों, २५ साल बाद इस मामले में अदालत ने आरोपियों को महज दो साल की सजा सुनाई है।
भोपाल गैस त्रासदी को लेकर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने चुप्पी जरूर तोड़ दी, लेकिन भोपाल गैस पीडि़त संगठन उनके बयान से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। संगठन अर्जुन सिंह के उस बयान को झूठा बताते हैं, जिसमें उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का बचाव करते हुए सारा दोष तत्कालीन गृह मंत्री पीवी नरसिंहराव पर मढ़ दिया।
??यह कहानी आसानी से हजम होने वाली है नहीं। मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह इतनी बड़ी ताकत बन चुके थे कि उनके गृह सचिव या मुख्य सचिव की भी हिम्मत नहीं हो सकती थी कि अपने मुख्यमंत्री से पूछे बगैर देश के गृह मंत्री या उस मामले में कहे तो प्रधानमंत्री तक का आदेश मान लिया जाए। अर्जुन सिंह उसी शहर में और उसी इमारत में बैठे थे जहां नरसिंह राव फोन कर रहे थे।
आश्चर्य की बात है कि इस पूरे मामले में अर्जुन सिंह ने सिर्फ नरसिंह राव का नाम लिया। इस पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ कि अर्जुन सिंह नरसिंह राव को दोषी बता कर राजीव गांधी को बचाने की कोशिश करेंगे। आज न राव है और न राजीव गांधी और एक गवाह और पात्र के तौर पर अर्जुन सिंह जो कहेंगे वही सही माना जाएगा। लेकिन सही मानने के लिए अपने तर्क होते हैं।
पहली बार अर्जुन सिंह ने देश को बताया है कि हादसे के चार दिन बाद जब वे एंडरसन की गिरफ्तारी का आदेश दे चुके थे, राजीव गांधी भोपाल के पड़ोस में होशंगाबाद में हरदा शहर में चुनाव सभा के लिए आए थे। अर्जुन सिंह ने कहा कि वे गाड़ी से हरदा गए और राजीव गांधी को सारी परिस्थितियों की जानकारी दी। अर्जुन सिंह का बयान बताता है कि राजीव गांधी ने इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और बस सुन लिया।
अर्जुन सिंह का कहना है कि जब उन्हें पता चला था कि एंडरसन गैस हादसे के बाद भारत आ रहा है तो उन्हें आश्चर्य भी हुआ था क्योंकि वे जानते थे कि एंडरसन जैसे बड़े साहब किसी भी हाल में गैस राहत या गैस पीडि़तों का दर्द बांटने के लिए नहीं आने वाले हैं। यहां बड़े साहब शब्द भी अर्जुन सिंह का ही है। अर्जुन सिंह को तो एंडरसन की हिम्मत पर हैरत हुई थी। इसके बाद अर्जुन सिंह का कहना है कि उन्होंने एंडरसन की गिरफ्तारी के लिए लिखित आदेश दिए थे ताकि कोई और दबाव काम नहीं कर सके। अब यह दूसरा दबाव किसका हो सकता था, इसके बारे में अर्जुन सिंह ही बाद में कभी बताना चाहेंगे तो बताएंगे।
अर्जुन सिंह के भाषण में इस बात पर भी हैरत जाहिर की गई है कि जब एसपी स्वराज पुरी एंडरसन को गिरफ्तार कर के (एक जगह कहा गया हे कि पकड़ के) यूनियन कार्बाइड गेस्ट हाउस ले जा रहे थे तो एंडरसन ने यह पूछने की हिम्मत भी की थी कि आपके प्रदेश के मुख्यमंत्री मेरा स्वागत क्यों नहीं करने आए? अर्जुन सिंह का कहना है कि अगर वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहते तो एंडरसन को कब की सजा दिलवा चुके होते।
मगर राजीव गांधी को इतने बड़े औद्योगिक हादसे के मुख्य अभियुक्त के भारत आने और फटाफट जमानत हो जाने के बारे में कुछ भी नहीं पता था यह जरा कल्पना की बात लगती है। नरसिंह राव को एंडरसन से अचानक ऐसा क्या प्रेम हो गया था कि उनका ऑफिस लगातार भोपाल फोन कर के एंडरसन को ठीक से रखने और जल्दी से जमानत करवाने के आदेश दे रहा था? क्या नरसिंह राव जैसे आजीवन बगैर रीढ़ के नेता माने गए मंत्री की ये हिम्मत थी कि देश के प्रधानमंत्री को बताए बगैर वे इतने बड़े और मोस्ट वांटेड अभियुक्त के प्रति नरमी बरतने का निर्देश दे दे?
फिर सरकारी जहाज का सवाल आता है। किसी भी राज्य सरकार के पास राजकीय जहाज या हैलीकॉप्टर के उपयोग की एक निश्चित नियमावली है। इस नियमावली के अनुसार हर राज्य सरकार में एक एविएशन विभाग होता है, जिसका एक डायरेक्टर होता है और सरकारी विमान के उडऩे का आदेश मुख्यमंत्री सचिवालय या आवास से जारी किया जाता है। आम तौर पर जहाज मंत्रियों और मुख्यमंत्री के लिए होता है और अगर इसमें कोई और यात्रा कर रहा है तो उस यात्रा को आधिकारिक बनाने के लिए सचिव स्तर का एक अधिकारी या कम से कम कोई राज्य मंत्री बिठाया जाता है। मगर एंडरस तो अकेले भोपाल से दिल्ली आया था और उसके साथ कोई भी सरकारी पदाधिकारी नहीं था। इसका सीधा मतलब यह है कि यह उड़ान अवैध थी और इसके पायलटों को उस समय नहीं तो बाद में कभी सजा मिलनी चाहिए थी।
ऐसा नहीं हुआ मगर अर्जुन सिंह कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि आखिर सरकारी जहाज एंडरसन को ले कर दिल्ली कैसे पहुंचा? हैरत की बात यह है कि दो दिन बाद वे राजनैतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने विशेष आमंत्रित अतिथि के तौर पर बुलाए गए थे और इस मौके पर सीधे राजीव गांधी या नरसिंह राव से सवाल कर सकते थे। नरसिंह राव और अर्जुन सिंह के बीच कभी नहीं पटी और राजीव गांधी की हत्या के बाद अर्जुन सिंह की पहल पर ही नरसिंह राव पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए थे और बाद में अर्जुन सिंह का प्रधानमंत्री बनने का सपना नरसिंह राव ने तोड़ दिया। इसलिए पहले अर्जुन सिंह कह चुके है कि शायद नरसिंह राव को राजीव गांधी की हत्या की साजिश का पता था और अब राजीव गांधी को बेकसूर साबित करने के सिलसिले में एक बार फिर नरसिंह राव का नाम आ गया है। मुर्दे बोल नहीं सकते और जो जीते जी मुर्दा होने का अभिनय कर रहा हो उसे जीवित कौन कर सकता है।
गैस पीडि़त संगठनों के मुताबिक इतनी बड़ी त्रासदी की बात केवल गृह मंत्री तक ही सीमित रहे, यह हो नहीं सकता। जिस तरह यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन को स्टेट प्लेन से बाहर भेजा गया था, इससे साफ जाहिर होता है कि अर्जुन सिंह को सब पता था और उन पर किसी और दबाव था।
भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार के मुताबिक अर्जुन सिंह झूठ बोल रहे हैं। सच्चई यह है कि प्रधानमंत्री ने खुद अजरुन सिंह से संपर्क किया था। श्री सिंह ने तो स्टेट प्लेन उपलब्ध करवाकर एंडरसन को राजकीय सम्मान दिया था। गैस त्रासदी इतनी बड़ी त्रासदी थी जो केवल गृह विभाग तक सीमित हो ही नहीं सकती थी।
गैस पीडि़त निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के बालकृष्ण नामदेव का कहना है कि अजरुन सिंह ने गांधी परिवार के प्रति निष्ठा दर्शाई है। उन्होंने झूठा बयान देकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को क्लीन चिट दे दी, जबकि सच्चई अलग है। घटना के लिए अर्जुन सिंह पर प्रधानमंत्री का ही दबाव था।
उन्होंने यह भी माना कि पीडि़तों को राजनीतिक नेतृत्व, संसद और कार्यपालिका से पूरी तरह निराश होना पड़ा है। उन्होंने इसे 'सभी की सामूहिक विफलताÓ बताया। िचदंबरम ने एंडरसन के भारत से जाने के घटनाक्रम पर सवाल पूछने वाले विपक्ष को भी निशाने पर लिया। उन्होंने विपक्ष के नेता अरुण जेटली से उल्टा सवाल किया कि ७ दिसंबर, १९८४ की रात को क्या हुआ था, यह सवाल उन्होंने दस साल पहले क्यों नहीं पूछा, जब उनकी पार्टी की सरकार थी?
भोपाल में ३ दिसंबर, १९८४ की रात यूनियन कार्बाइड के प्लांट से जहरीली गैस का रिसाव हुआ था। इसके असर से सैकड़ों लोग नींद में ही मर गए। मरने वालों की तादाद हजारों में पहुंच गई है और लाखों लोग गैस का बुरा असर अभी भी झेल रहे हैं। पिछले दिनों, २५ साल बाद इस मामले में अदालत ने आरोपियों को महज दो साल की सजा सुनाई है।
भोपाल गैस त्रासदी को लेकर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने चुप्पी जरूर तोड़ दी, लेकिन भोपाल गैस पीडि़त संगठन उनके बयान से कोई इत्तेफाक नहीं रखते। संगठन अर्जुन सिंह के उस बयान को झूठा बताते हैं, जिसमें उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी का बचाव करते हुए सारा दोष तत्कालीन गृह मंत्री पीवी नरसिंहराव पर मढ़ दिया।
??यह कहानी आसानी से हजम होने वाली है नहीं। मध्य प्रदेश में अर्जुन सिंह इतनी बड़ी ताकत बन चुके थे कि उनके गृह सचिव या मुख्य सचिव की भी हिम्मत नहीं हो सकती थी कि अपने मुख्यमंत्री से पूछे बगैर देश के गृह मंत्री या उस मामले में कहे तो प्रधानमंत्री तक का आदेश मान लिया जाए। अर्जुन सिंह उसी शहर में और उसी इमारत में बैठे थे जहां नरसिंह राव फोन कर रहे थे।
आश्चर्य की बात है कि इस पूरे मामले में अर्जुन सिंह ने सिर्फ नरसिंह राव का नाम लिया। इस पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ कि अर्जुन सिंह नरसिंह राव को दोषी बता कर राजीव गांधी को बचाने की कोशिश करेंगे। आज न राव है और न राजीव गांधी और एक गवाह और पात्र के तौर पर अर्जुन सिंह जो कहेंगे वही सही माना जाएगा। लेकिन सही मानने के लिए अपने तर्क होते हैं।
पहली बार अर्जुन सिंह ने देश को बताया है कि हादसे के चार दिन बाद जब वे एंडरसन की गिरफ्तारी का आदेश दे चुके थे, राजीव गांधी भोपाल के पड़ोस में होशंगाबाद में हरदा शहर में चुनाव सभा के लिए आए थे। अर्जुन सिंह ने कहा कि वे गाड़ी से हरदा गए और राजीव गांधी को सारी परिस्थितियों की जानकारी दी। अर्जुन सिंह का बयान बताता है कि राजीव गांधी ने इस बारे में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और बस सुन लिया।
अर्जुन सिंह का कहना है कि जब उन्हें पता चला था कि एंडरसन गैस हादसे के बाद भारत आ रहा है तो उन्हें आश्चर्य भी हुआ था क्योंकि वे जानते थे कि एंडरसन जैसे बड़े साहब किसी भी हाल में गैस राहत या गैस पीडि़तों का दर्द बांटने के लिए नहीं आने वाले हैं। यहां बड़े साहब शब्द भी अर्जुन सिंह का ही है। अर्जुन सिंह को तो एंडरसन की हिम्मत पर हैरत हुई थी। इसके बाद अर्जुन सिंह का कहना है कि उन्होंने एंडरसन की गिरफ्तारी के लिए लिखित आदेश दिए थे ताकि कोई और दबाव काम नहीं कर सके। अब यह दूसरा दबाव किसका हो सकता था, इसके बारे में अर्जुन सिंह ही बाद में कभी बताना चाहेंगे तो बताएंगे।
अर्जुन सिंह के भाषण में इस बात पर भी हैरत जाहिर की गई है कि जब एसपी स्वराज पुरी एंडरसन को गिरफ्तार कर के (एक जगह कहा गया हे कि पकड़ के) यूनियन कार्बाइड गेस्ट हाउस ले जा रहे थे तो एंडरसन ने यह पूछने की हिम्मत भी की थी कि आपके प्रदेश के मुख्यमंत्री मेरा स्वागत क्यों नहीं करने आए? अर्जुन सिंह का कहना है कि अगर वे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने रहते तो एंडरसन को कब की सजा दिलवा चुके होते।
मगर राजीव गांधी को इतने बड़े औद्योगिक हादसे के मुख्य अभियुक्त के भारत आने और फटाफट जमानत हो जाने के बारे में कुछ भी नहीं पता था यह जरा कल्पना की बात लगती है। नरसिंह राव को एंडरसन से अचानक ऐसा क्या प्रेम हो गया था कि उनका ऑफिस लगातार भोपाल फोन कर के एंडरसन को ठीक से रखने और जल्दी से जमानत करवाने के आदेश दे रहा था? क्या नरसिंह राव जैसे आजीवन बगैर रीढ़ के नेता माने गए मंत्री की ये हिम्मत थी कि देश के प्रधानमंत्री को बताए बगैर वे इतने बड़े और मोस्ट वांटेड अभियुक्त के प्रति नरमी बरतने का निर्देश दे दे?
फिर सरकारी जहाज का सवाल आता है। किसी भी राज्य सरकार के पास राजकीय जहाज या हैलीकॉप्टर के उपयोग की एक निश्चित नियमावली है। इस नियमावली के अनुसार हर राज्य सरकार में एक एविएशन विभाग होता है, जिसका एक डायरेक्टर होता है और सरकारी विमान के उडऩे का आदेश मुख्यमंत्री सचिवालय या आवास से जारी किया जाता है। आम तौर पर जहाज मंत्रियों और मुख्यमंत्री के लिए होता है और अगर इसमें कोई और यात्रा कर रहा है तो उस यात्रा को आधिकारिक बनाने के लिए सचिव स्तर का एक अधिकारी या कम से कम कोई राज्य मंत्री बिठाया जाता है। मगर एंडरस तो अकेले भोपाल से दिल्ली आया था और उसके साथ कोई भी सरकारी पदाधिकारी नहीं था। इसका सीधा मतलब यह है कि यह उड़ान अवैध थी और इसके पायलटों को उस समय नहीं तो बाद में कभी सजा मिलनी चाहिए थी।
ऐसा नहीं हुआ मगर अर्जुन सिंह कहते हैं कि उन्हें नहीं पता कि आखिर सरकारी जहाज एंडरसन को ले कर दिल्ली कैसे पहुंचा? हैरत की बात यह है कि दो दिन बाद वे राजनैतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने विशेष आमंत्रित अतिथि के तौर पर बुलाए गए थे और इस मौके पर सीधे राजीव गांधी या नरसिंह राव से सवाल कर सकते थे। नरसिंह राव और अर्जुन सिंह के बीच कभी नहीं पटी और राजीव गांधी की हत्या के बाद अर्जुन सिंह की पहल पर ही नरसिंह राव पार्टी के अध्यक्ष बनाए गए थे और बाद में अर्जुन सिंह का प्रधानमंत्री बनने का सपना नरसिंह राव ने तोड़ दिया। इसलिए पहले अर्जुन सिंह कह चुके है कि शायद नरसिंह राव को राजीव गांधी की हत्या की साजिश का पता था और अब राजीव गांधी को बेकसूर साबित करने के सिलसिले में एक बार फिर नरसिंह राव का नाम आ गया है। मुर्दे बोल नहीं सकते और जो जीते जी मुर्दा होने का अभिनय कर रहा हो उसे जीवित कौन कर सकता है।
गैस पीडि़त संगठनों के मुताबिक इतनी बड़ी त्रासदी की बात केवल गृह मंत्री तक ही सीमित रहे, यह हो नहीं सकता। जिस तरह यूनियन कार्बाइड के अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन को स्टेट प्लेन से बाहर भेजा गया था, इससे साफ जाहिर होता है कि अर्जुन सिंह को सब पता था और उन पर किसी और दबाव था।
भोपाल गैस पीडि़त महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार के मुताबिक अर्जुन सिंह झूठ बोल रहे हैं। सच्चई यह है कि प्रधानमंत्री ने खुद अजरुन सिंह से संपर्क किया था। श्री सिंह ने तो स्टेट प्लेन उपलब्ध करवाकर एंडरसन को राजकीय सम्मान दिया था। गैस त्रासदी इतनी बड़ी त्रासदी थी जो केवल गृह विभाग तक सीमित हो ही नहीं सकती थी।
गैस पीडि़त निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के बालकृष्ण नामदेव का कहना है कि अजरुन सिंह ने गांधी परिवार के प्रति निष्ठा दर्शाई है। उन्होंने झूठा बयान देकर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को क्लीन चिट दे दी, जबकि सच्चई अलग है। घटना के लिए अर्जुन सिंह पर प्रधानमंत्री का ही दबाव था।
गुरुवार, 15 जुलाई 2010
मंत्रियों की लूट का पैसा शिवराज के पास
मध्य प्रदेश में इनदिनों कुलीनों का कुनबा भ्रष्टाचार के जाल में इस कदर फंसा हुआ है कि अब यह तय कर पाना मुश्किल हो रहा है कि कौन पाक-साफ है? भ्रष्टाचार में डूबी मध्य प्रदेश सरकार के मुखिया शिवराज सिंह चौहान भले ही सदाचार को अपना मूल मंत्र मानते हो लेकिन प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के महासचिव दिग्विजयसिंह की मानें तो मध्यप्रदेश के भ्रष्ट मंत्री जो पैसा खा रहे हैं उसमें शिवराज सिंह का भी एक बड़ा हिस्सा होता है। मंत्री इसी बात से नाराज है कि लूट का पैसा शिवराज के पास भी जाता है लेकिन भ्रष्टाचार की खबरें केवल मंत्रियों की ही छपती है। दिग्विजयसिंह के अनुसार मुख्यमंत्री सचिवालय में अधिकारियों की पोस्टिंग के लिए सौदेबाजी होती है।
इंदौर प्रवास पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहते हैं कि दिग्विजयसिंह ने कहा कि सिर्फ मंत्रियों को ही चोर क्यों कहते हो, इन सबका उस्ताद तो शिवराज सिंह चौहान है। अधिकारी 1 रुपए देता है तो 10 रुपए वसूलता है। इसी कारण मध्यप्रदेश में अपराध बढ़ रहे हैं। दिग्विजयसिंह ने कहा कि मेरे ऊपर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए गए थे। उमा भारती एक भी सबूत कोर्ट में नहीं दे पाई। 8 साल में भ्रष्टाचार का कोई भी केस नहीं लग पाया।
अगर दिग्विजय सिंह के आरोपों का गहनता से अध्ययन किया जाए तो हम पाते हैं कि भ्रष्टाचार यहां शासन-प्रशासन कि रग- रग में बह रहा है। जहां मुख्यमंत्री सहित करीब आधा दर्जन मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त की जांच चल रही है। लोकायुक्त सिर्फ दो तत्कालीन मंत्रियों ओमप्रकाश धुर्वे और जुगलकिशोर बागरी के खिलाफ दर्ज मामलों में ही जांच पूरी कर चालान पेश कर सका है। इसके बाद दोनों को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अजय विश्नोई को भाई के घर आयकर छापों की कार्रवाई के बाद पद छोडऩा पड़ा था। लेकिन भाजपा के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद विश्नोई फिर मंत्री बना दिए गए। अजय विश्नोई के खिलाफ लोकायुक्त में भी दो मामले हैं, जो अंजाम तक नहीं पहुंच पाए हैं।
वहीं राज्य के दो दजऱ्न से अधिक आईएएस और आईपीएस भी लोकायुक्त की जांच के दायरे में हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर दिग्विजय सिंह द्वारा लगाए गए उपरोक्त आरोपों में कितनी सत्यता है यह तो किसी उच्चस्तरीय जांच के बाद ही पता चल पाएगा लकिन लोकायुक्त में दर्ज मामलों का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि पूरे कुंए में ही भ्रष्टाचार की भांग घुली हुई है।
जनवरी 2004 से लेकर 31 जनवरी 2010 तक की अवधि में लोकायुक्त ने 2675 प्रकरण दजऱ् किए. इनमें से 1149 प्रकरणों में जांच कर खात्मा लगाया गया।
जिनके खिलाफ़ लोकायुक्त में मामले दजऱ् हैं
मंत्री : बाबूलाल गौर ,लक्ष्मीकांत शर्मा, अनूप मिश्रा, अजय विश्नोई एवं राजेंद्र शुक्ल और कैलाश विजयवर्गीय।
पूर्व मंत्री : हिम्मत कोठारी, ढाल सिंह बिसेन, अखंड प्रताप सिंह एवं कमल पटेल।
आईएएस, आईपीएस एवं प्रकरण दजऱ् करते समय पदस्थापना :
पुखराज मारू-प्रमुख सचिव राजस्व विभाग, देवराज विरदी-प्रमुख सचिव आवास एवं पर्यावरण, अरविंद जोशी-प्रमुख सचिव जल संसाधन विभाग, पी डी मीणा-प्रमुख सचिव लोनिवि, सत्य प्रकाश-प्रमुख सचिव उद्योग विभाग, विश्वपति त्रिवेदी-आयुक्त वाणिज्य कर इंदौर, एम एन खान-सचिव नगरीय प्रशासन, के सी जैन-सीईओ इंदौर विकास प्राधिकरण, एस आर मोहंती-सचिव महिला एवं बाल विकास, एम ए खान-तत्कालीन प्रबंध संचालक बीज निगम, राघव चंद्रा-प्रबंध संचालक मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम, आर सी साहनी- प्रमुख सचिव ऊर्जा विभाग, पुलिस अधीक्षक-जि़ला भोपाल, विवेक अग्रवाल-कलेक्टर जि़ला इंदौर, प्रमुख सचिव-स्वास्थ्य विभाग भोपाल, प्रबंध संचालक-लघु उद्योग निगम भोपाल, एस के मिश्रा-खनिज साधन, श्रीमती अलका उपाध्याय-आयुक्त स्वास्थ्य, महेंद्र ज्ञानी-उप सचिव ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, मनीष श्रीवास्तव-कलेक्टर जि़ला शिवपुरी, राकेश साहनी-मुख्य सचिव मप्र., एस के मिश्र-तत्कालीन कलेक्टर रीवा, संजय शुक्ल-सीएमडी मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपी, सरीना सिंह-आयुक्त अनुसूचित जाति कल्याण विभाग, गाजीराम मीणा-पुलिस महानिरीक्षक इंदौर, मो. सुलेमान-सचिव लोनिवि.
अन्य : संयुक्त संचालक
कोष एवं लेखा पेंशन भोपाल, अध्यक्ष-प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भोपाल, आयुक्त- नगर पालिका निगम सागर, डॉ. एच सी जैन-मप्र गौसेवा आयोग पशु चिकित्सालय भोपाल, ए के ठाकुर-मुख्य अभियंता पीएचई भोपाल, एम एल गोयल-मुख्य सचिव ऊर्जा विभाग भोपाल, पी एन सिंह-प्रबंध संचालक राज्य सहकारी मर्यादित भोपाल, प्रमुख अभियंता, अधीक्षण यंत्री एवं कार्यपालन यंत्री जल संसाधन विभाग भोपाल, एन एम पुरुषवानी-अधीक्षण यंत्री लोनिवि ग्वालियर, एस एन गुप्ता-अधीक्षण यंत्री पीएचई भोपाल, आयुक्त एवं कार्यपालन यंत्री नगर निगम जबलपुर, एस सी गर्ग-मुख्य अभियंता लोनिवि इंदौर, संजय तिवारी, संजीव दुबे, जिला आबकारी अधिकारी, रामजीत सिंह-सहायक आयुक्त आबकारी विभाग, क्रमश: जबलपुर, विदिशा एवं रतलाम. नरसिंह तोमर-जि़ला पंजीयक कार्यालय इंदौर, विनोद शर्मा-आयुक्त नगर निगम इंदौर, बी के श्रीवास्तव- अधीक्षण यंत्री पीएचई विभाग, योगीराज शर्मा-चाइल्ड हेल्थ सलाहकार स्वास्थ्य विभाग, संदीप जायसवाल- महापौर नगर निगम कटनी, डॉ. अशोक शर्मा-संचालक लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग भोपाल, जी एस कलसी-अधीक्षण यंत्री लोनिवि सेतु मंडल भोपाल, सी वी सिंह-मुख्य कार्यपालन अधिकारी इंदौर, संजय गोयल- सीईओ जि़ला पंचायत खंडवा, पवन शर्मा- तत्कालीन आयुक्त नगर निगम ग्वालियर, ओ पी मुछाल- प्रभारी मुख्य अभियंता लोनिवि इंदौर, एस एल गुप्ता-मुख्य अभियंता विद्युत वितरण कंपनी ग्वालियर, एस के पंचनंदा-अधीक्षण यंत्री विद्युत वितरण कंपनी ग्वालियर, मधुकर वर्मा-अध्यक्ष इंदौर विकास प्राधिकरण, प्रमोद गुप्ता-मुख्य कार्यपालन अधिकारी इंदौर विकास प्राधिकरण, महापौर-आयुक्त नगरपालिका इंदौर, वीर सिंह हिंडो-महापौर खंडवा, के पी जाटव-मध्य प्रदेश राज्य बीज एवं फार्म निगम, डॉ. योगीराज शर्मा-संचालक स्वास्थ्य, प्रताप सिंह चंपावत-वन मंडलाधिकारी दक्षिण सिवनी, अनिता बाथम-लेखा अधिकारी अनुसूचित जाति कल्याण विभाग, आर एल भारतीय-अधीक्षण यंत्री प्रभारी मुख्य अभियंता लोनिवि ग्वालियर, एस के महावर-नगर तथा ग्राम निवेश जबलपुर, एस के मंडल-अपर सचिव गर्ग-मुख्य अभियंता लोनिवि, बोरासी-कार्यपालन यंत्री ब्रिज डिवीजन इंदौर, मुदगल-अधीक्षण यंत्री इंदौर, मुख्य अभियंता गंगा प्रसाद एवं अधीक्षण यंत्री बाणसागर नहर मंडल रीवा, डॉ. अंजू सिंह भदौरिया-नर्सिंग स्वास्थ्य सेवाएं भोपाल, जे एस सलूजा-एसडीएम रतलाम, अशोक शर्मा- उप पंजीयक ग्वालियर, आयुक्त-नगर निगम भोपाल, मुख्य अभियंता लोनिवि संधारण क्रमांक एक भोपाल, वी के खरे-मुख्य अभियंता बाणसागर परियोजना रीवा, एल के जैन-तत्कालीन मुख्य अभियंता लोनिवि देवास, टी एन मलिक-अधीक्षण यंत्री नर्मदा विकास मंडल क्रमांक सात खरगौन, डॉ. बी एल यादव-महापौर सतना, आर बी चतुर्वेदी-आयुक्त नगर निगम सतना, वी के सोनगिरा- मुख्य अभियंता देवास, ए पी राणे-कार्यपालन यंत्री लोनिवि देवास, राजेश गुप्ता-तत्कालीन सीईओ जि़ला पंचायत खंडवा, आर बी चतुर्वेदी-आयुक्त नगर निगम सतना, राम विश्वास तिवारी, सत्य नारायण त्रिपाठी एवं रमेश त्रिपाठी-नगर निगम सतना, मित्तल-अधीक्षण यंत्री एवं वी के मिश्रा-कार्यपालन यंत्री और नवीन उपाध्याय- मप्र राज्य विद्युत मंडल रीवा, आर के सक्सेना-मुख्य अभियंता अमरकंटक ताप विद्युत केंद्र चचाई, भीमा मंडलोई-वन परिक्षेत्राधिकारी, वी पी कपिल-वन मंडलाधिकारी रायसेन, एम एम सकुनिया-परियोजना अधीक्षण यंत्री लोनिवि अलीराजपुर, मुख्य कार्यपालन अधिकारी-जि़ला पंचायत उमरिया, डी एस मुदगल-राज्य विद्युत मंडल बिरसिंहपुर, मुख्य कार्यपालन अधिकारी-जि़ला पंचायत बैतूल, अधीक्षण यंत्री एवं वीके शुक्ला- सहायक यंत्री, जे एस कलसी-मुख्य अभियंता मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी श्योपुर, ए के-अधीक्षण यंत्री एवं अन्य-नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, बड़वानी एस एन प्रसाद-मुख्य अभियंता एवं अन्य-लोनिवि खंडवा, डी के त्रिपाठी-मुख्य अभियंता एवं अन्य-जल संसाधन विभाग छतरपुर, सुरेश चंद्र श्रीवास्तव-प्रभारी अभियंता नगर पालिका अधिकारी उज्जैन, भगवान सिंह पवार-प्रभारी लेखपाल महिदपुर, दिनेश कौशल-प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी शिवपुरी, शैलेंद्र शुक्ला-प्रमुख अभियंता लोनिवि भोपाल, के सी जैन-अधीक्षण यंत्री-लोनिवि इंदौर, आर के अग्रवाल-तत्कालीन अधीक्षण यंत्री एवं अन्य-पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी छिंदवाड़ा, एस जे एस तुलसी-तत्कालीन अधीक्षण यंत्री लोनिवि सिवनी.
इंदौर प्रवास पर पत्रकारों से चर्चा करते हुए कहते हैं कि दिग्विजयसिंह ने कहा कि सिर्फ मंत्रियों को ही चोर क्यों कहते हो, इन सबका उस्ताद तो शिवराज सिंह चौहान है। अधिकारी 1 रुपए देता है तो 10 रुपए वसूलता है। इसी कारण मध्यप्रदेश में अपराध बढ़ रहे हैं। दिग्विजयसिंह ने कहा कि मेरे ऊपर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए गए थे। उमा भारती एक भी सबूत कोर्ट में नहीं दे पाई। 8 साल में भ्रष्टाचार का कोई भी केस नहीं लग पाया।
अगर दिग्विजय सिंह के आरोपों का गहनता से अध्ययन किया जाए तो हम पाते हैं कि भ्रष्टाचार यहां शासन-प्रशासन कि रग- रग में बह रहा है। जहां मुख्यमंत्री सहित करीब आधा दर्जन मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त की जांच चल रही है। लोकायुक्त सिर्फ दो तत्कालीन मंत्रियों ओमप्रकाश धुर्वे और जुगलकिशोर बागरी के खिलाफ दर्ज मामलों में ही जांच पूरी कर चालान पेश कर सका है। इसके बाद दोनों को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। वहीं तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अजय विश्नोई को भाई के घर आयकर छापों की कार्रवाई के बाद पद छोडऩा पड़ा था। लेकिन भाजपा के दोबारा सत्ता में लौटने के बाद विश्नोई फिर मंत्री बना दिए गए। अजय विश्नोई के खिलाफ लोकायुक्त में भी दो मामले हैं, जो अंजाम तक नहीं पहुंच पाए हैं।
वहीं राज्य के दो दजऱ्न से अधिक आईएएस और आईपीएस भी लोकायुक्त की जांच के दायरे में हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पर दिग्विजय सिंह द्वारा लगाए गए उपरोक्त आरोपों में कितनी सत्यता है यह तो किसी उच्चस्तरीय जांच के बाद ही पता चल पाएगा लकिन लोकायुक्त में दर्ज मामलों का अवलोकन करने पर हम पाते हैं कि पूरे कुंए में ही भ्रष्टाचार की भांग घुली हुई है।
जनवरी 2004 से लेकर 31 जनवरी 2010 तक की अवधि में लोकायुक्त ने 2675 प्रकरण दजऱ् किए. इनमें से 1149 प्रकरणों में जांच कर खात्मा लगाया गया।
जिनके खिलाफ़ लोकायुक्त में मामले दजऱ् हैं
मंत्री : बाबूलाल गौर ,लक्ष्मीकांत शर्मा, अनूप मिश्रा, अजय विश्नोई एवं राजेंद्र शुक्ल और कैलाश विजयवर्गीय।
पूर्व मंत्री : हिम्मत कोठारी, ढाल सिंह बिसेन, अखंड प्रताप सिंह एवं कमल पटेल।
आईएएस, आईपीएस एवं प्रकरण दजऱ् करते समय पदस्थापना :
पुखराज मारू-प्रमुख सचिव राजस्व विभाग, देवराज विरदी-प्रमुख सचिव आवास एवं पर्यावरण, अरविंद जोशी-प्रमुख सचिव जल संसाधन विभाग, पी डी मीणा-प्रमुख सचिव लोनिवि, सत्य प्रकाश-प्रमुख सचिव उद्योग विभाग, विश्वपति त्रिवेदी-आयुक्त वाणिज्य कर इंदौर, एम एन खान-सचिव नगरीय प्रशासन, के सी जैन-सीईओ इंदौर विकास प्राधिकरण, एस आर मोहंती-सचिव महिला एवं बाल विकास, एम ए खान-तत्कालीन प्रबंध संचालक बीज निगम, राघव चंद्रा-प्रबंध संचालक मध्य प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम, आर सी साहनी- प्रमुख सचिव ऊर्जा विभाग, पुलिस अधीक्षक-जि़ला भोपाल, विवेक अग्रवाल-कलेक्टर जि़ला इंदौर, प्रमुख सचिव-स्वास्थ्य विभाग भोपाल, प्रबंध संचालक-लघु उद्योग निगम भोपाल, एस के मिश्रा-खनिज साधन, श्रीमती अलका उपाध्याय-आयुक्त स्वास्थ्य, महेंद्र ज्ञानी-उप सचिव ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, मनीष श्रीवास्तव-कलेक्टर जि़ला शिवपुरी, राकेश साहनी-मुख्य सचिव मप्र., एस के मिश्र-तत्कालीन कलेक्टर रीवा, संजय शुक्ल-सीएमडी मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपी, सरीना सिंह-आयुक्त अनुसूचित जाति कल्याण विभाग, गाजीराम मीणा-पुलिस महानिरीक्षक इंदौर, मो. सुलेमान-सचिव लोनिवि.
अन्य : संयुक्त संचालक
कोष एवं लेखा पेंशन भोपाल, अध्यक्ष-प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भोपाल, आयुक्त- नगर पालिका निगम सागर, डॉ. एच सी जैन-मप्र गौसेवा आयोग पशु चिकित्सालय भोपाल, ए के ठाकुर-मुख्य अभियंता पीएचई भोपाल, एम एल गोयल-मुख्य सचिव ऊर्जा विभाग भोपाल, पी एन सिंह-प्रबंध संचालक राज्य सहकारी मर्यादित भोपाल, प्रमुख अभियंता, अधीक्षण यंत्री एवं कार्यपालन यंत्री जल संसाधन विभाग भोपाल, एन एम पुरुषवानी-अधीक्षण यंत्री लोनिवि ग्वालियर, एस एन गुप्ता-अधीक्षण यंत्री पीएचई भोपाल, आयुक्त एवं कार्यपालन यंत्री नगर निगम जबलपुर, एस सी गर्ग-मुख्य अभियंता लोनिवि इंदौर, संजय तिवारी, संजीव दुबे, जिला आबकारी अधिकारी, रामजीत सिंह-सहायक आयुक्त आबकारी विभाग, क्रमश: जबलपुर, विदिशा एवं रतलाम. नरसिंह तोमर-जि़ला पंजीयक कार्यालय इंदौर, विनोद शर्मा-आयुक्त नगर निगम इंदौर, बी के श्रीवास्तव- अधीक्षण यंत्री पीएचई विभाग, योगीराज शर्मा-चाइल्ड हेल्थ सलाहकार स्वास्थ्य विभाग, संदीप जायसवाल- महापौर नगर निगम कटनी, डॉ. अशोक शर्मा-संचालक लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग भोपाल, जी एस कलसी-अधीक्षण यंत्री लोनिवि सेतु मंडल भोपाल, सी वी सिंह-मुख्य कार्यपालन अधिकारी इंदौर, संजय गोयल- सीईओ जि़ला पंचायत खंडवा, पवन शर्मा- तत्कालीन आयुक्त नगर निगम ग्वालियर, ओ पी मुछाल- प्रभारी मुख्य अभियंता लोनिवि इंदौर, एस एल गुप्ता-मुख्य अभियंता विद्युत वितरण कंपनी ग्वालियर, एस के पंचनंदा-अधीक्षण यंत्री विद्युत वितरण कंपनी ग्वालियर, मधुकर वर्मा-अध्यक्ष इंदौर विकास प्राधिकरण, प्रमोद गुप्ता-मुख्य कार्यपालन अधिकारी इंदौर विकास प्राधिकरण, महापौर-आयुक्त नगरपालिका इंदौर, वीर सिंह हिंडो-महापौर खंडवा, के पी जाटव-मध्य प्रदेश राज्य बीज एवं फार्म निगम, डॉ. योगीराज शर्मा-संचालक स्वास्थ्य, प्रताप सिंह चंपावत-वन मंडलाधिकारी दक्षिण सिवनी, अनिता बाथम-लेखा अधिकारी अनुसूचित जाति कल्याण विभाग, आर एल भारतीय-अधीक्षण यंत्री प्रभारी मुख्य अभियंता लोनिवि ग्वालियर, एस के महावर-नगर तथा ग्राम निवेश जबलपुर, एस के मंडल-अपर सचिव गर्ग-मुख्य अभियंता लोनिवि, बोरासी-कार्यपालन यंत्री ब्रिज डिवीजन इंदौर, मुदगल-अधीक्षण यंत्री इंदौर, मुख्य अभियंता गंगा प्रसाद एवं अधीक्षण यंत्री बाणसागर नहर मंडल रीवा, डॉ. अंजू सिंह भदौरिया-नर्सिंग स्वास्थ्य सेवाएं भोपाल, जे एस सलूजा-एसडीएम रतलाम, अशोक शर्मा- उप पंजीयक ग्वालियर, आयुक्त-नगर निगम भोपाल, मुख्य अभियंता लोनिवि संधारण क्रमांक एक भोपाल, वी के खरे-मुख्य अभियंता बाणसागर परियोजना रीवा, एल के जैन-तत्कालीन मुख्य अभियंता लोनिवि देवास, टी एन मलिक-अधीक्षण यंत्री नर्मदा विकास मंडल क्रमांक सात खरगौन, डॉ. बी एल यादव-महापौर सतना, आर बी चतुर्वेदी-आयुक्त नगर निगम सतना, वी के सोनगिरा- मुख्य अभियंता देवास, ए पी राणे-कार्यपालन यंत्री लोनिवि देवास, राजेश गुप्ता-तत्कालीन सीईओ जि़ला पंचायत खंडवा, आर बी चतुर्वेदी-आयुक्त नगर निगम सतना, राम विश्वास तिवारी, सत्य नारायण त्रिपाठी एवं रमेश त्रिपाठी-नगर निगम सतना, मित्तल-अधीक्षण यंत्री एवं वी के मिश्रा-कार्यपालन यंत्री और नवीन उपाध्याय- मप्र राज्य विद्युत मंडल रीवा, आर के सक्सेना-मुख्य अभियंता अमरकंटक ताप विद्युत केंद्र चचाई, भीमा मंडलोई-वन परिक्षेत्राधिकारी, वी पी कपिल-वन मंडलाधिकारी रायसेन, एम एम सकुनिया-परियोजना अधीक्षण यंत्री लोनिवि अलीराजपुर, मुख्य कार्यपालन अधिकारी-जि़ला पंचायत उमरिया, डी एस मुदगल-राज्य विद्युत मंडल बिरसिंहपुर, मुख्य कार्यपालन अधिकारी-जि़ला पंचायत बैतूल, अधीक्षण यंत्री एवं वीके शुक्ला- सहायक यंत्री, जे एस कलसी-मुख्य अभियंता मध्य प्रदेश विद्युत वितरण कंपनी श्योपुर, ए के-अधीक्षण यंत्री एवं अन्य-नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण, बड़वानी एस एन प्रसाद-मुख्य अभियंता एवं अन्य-लोनिवि खंडवा, डी के त्रिपाठी-मुख्य अभियंता एवं अन्य-जल संसाधन विभाग छतरपुर, सुरेश चंद्र श्रीवास्तव-प्रभारी अभियंता नगर पालिका अधिकारी उज्जैन, भगवान सिंह पवार-प्रभारी लेखपाल महिदपुर, दिनेश कौशल-प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी शिवपुरी, शैलेंद्र शुक्ला-प्रमुख अभियंता लोनिवि भोपाल, के सी जैन-अधीक्षण यंत्री-लोनिवि इंदौर, आर के अग्रवाल-तत्कालीन अधीक्षण यंत्री एवं अन्य-पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी छिंदवाड़ा, एस जे एस तुलसी-तत्कालीन अधीक्षण यंत्री लोनिवि सिवनी.
शनिवार, 10 जुलाई 2010
आखिर सालों बाद क्यों जागा जमीर?
पाटी विद द डिफरेंस का नारा देने वाली भाजपा अब पार्टी विद इन डिफरेंस होती जा रही है। दिल्ली से लेकर भोपाल तक पार्टी संगठन में अनुशासनहीनता की घटनायें आये दिन बढ़ती जा रही हैं। आज हालात यह हैं कि अनुशासनहीन नेताओं के दबाव में आकर उन्हें महत्वपूर्ण जिमेदारियां सौंपी जा रही है। लिहाजा पार्टी में प्रेशर पॉलिटिक्स
शुरू हो गयी
है। मध्य प्रदेश भाजपा में तो स्थिति और भी दयनीय है। स्वर्णिम मध्य प्रदेश बनाने में लगे प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के राज में ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टाचार यहां आचार-विचार का एक आवश्यक अंग बन गया है... मंत्रियों, नेताओं के साथ ही नौकरशाह, अधिकारी, कर्मचारी इसे बढ़ावा देने में पीछे नही है.. सरकार भ्रष्टाचार के मामले में आये दिन बदनाम हो रही है...।
भाजपा नेताओं कि माने तो बदनामी का दंश झेल रही मप्र सरकार का जमीर जाग गया है और वह अब किसी भी दोषी को बख्शेगी नहीं। प्रदेश के दागी मंत्रियों पर कार्रवाई की जमीन तैयार हो गई है। रतलाम में प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की बैठक में मुख्यमंत्री को कार्रवाई की छूट दे दी गई है। पार्टी महासचिव और प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार ने सरकार को फ्री हैंड देते हुए कहा है कि वे दागी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए स्वतंत्र हैं। केंद्रीय नेतृत्व उनके साथ है।
शायद यही कारण है कि जिस तरह कहानियां खत्म होने से पहले कई मोड़ लेती हैं, उसी तरह शिवराज कबीना के हाईप्रोफाइल मंत्री अनूप मिश्रा की कहानी का भी हश्र हो गया है। यानी केंद्रीय नेतृत्व की धमकी के साथ ही सरकार के साथ उनका भी जमीर जाग गया और उन्होंने अपना इस्तीफा आधे मन से दे दिया। इस्तीफा दिया या उनसे लिया गया यह तो शिवराज सिंह चौहान या स्वयं अनूप मिश्रा ही बता सकते हैं। हालांकि भाजपा सूत्रों की माने तो उन्हें बचाने के लिए जितने प्रयास हुए, उतने ही प्रयास उन्हें मंत्री पद से विदा करने के भी हुए। यानि दोनों तरफ से जोर बराबर का ही लगा।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे होने के नाते श्री मिश्रा की गिनती प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेताओं में होती है। उनके इस्तीफे की खबर से राजधानी भोपाल के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों से लेकर दिल्ली तक खलबली मच गई। इसके साथ ही अन्य दागी मंत्रियों के भविष्य को लेकर कयास और अटकलों का दौर भी चल पड़ा। लेकिन पार्टी ने यह कह कर अटकलों पर विराम लगा दिया कि मिश्रा ने इस्तीफा देकर नैतिकता का परिचय दिया है। यदि यह बात मान भी ली जाए तो क्या और मंत्रियों में नैतिकता नहीं है कि बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद भी मंत्रियों ने इस्तीफा नहीं दिया। इससे ऐसा लगता है कि अनूप मिश्रा ने किसी न किसी दवाब में इस्तीफा दिया है, और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसे आनन-फानन में स्वीकार कर लिया। आखिर अनूप मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार करने का मापदंड क्या है? यदि थाने में दर्ज एफआईआर को ही आधार बनाया गया है तो क्या यह उचित है।
सरकार के प्रवक्ता डा. नरोत्तम मिश्रा ने भी खुद स्वीकार किया किकेवल आरोप लगने से कोई दोषी नहीं हो जाता। जिस दिन ग्वालियर जिले के बेलागांव में गोली बारी की घटना से भीकन कुशवाहा नामक युवक की मौत हुई, उस दिन अनूप मिश्रा उज्जैन में अधिकारियों की बैठक ले रहे थे। यदि यह माना जाए कि अनूप मिश्रा ने हत्या का षडयंत्र रचा है तो अभी उस मामले की जांच चल रही है। फिर भी इस्तीफा क्यूं।
यदि शिकायत को ही आधार बनाकर इस्तीफा लिया गया है तो वाणिज्य व उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तथा आदिम जाति कल्याण मंत्री कुंवर विजय शाह ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा क्यों नहीं दिया। इस तरह अनूप के त्यागपत्र ने शिवराज कैबिनेट के दूसरे दागी मंत्री और 100 करोड़ के जमीन घोटाले में लोकायुक्त जांच का सामना कर रहे कैलाश विजयवर्गीय की भी परेशानी बढ़ा दी है। पार्टी में खुली धड़ेबाजी के बीच विजयवर्गीय पर नैतिकता के नाते मंत्री पद छोडऩे का दबाव बनने लगा है। विपक्ष ने भी घोटालों की लंबी फेहरिस्त के आधार पर घेराबंदी तेज कर दी है। निगाहें अब आलाकमान से फ्रीहैंड ले चुके मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा पर है। लोगों का सीधा सवाल यह है कि जब बिना जांच महज एफआईआर के आधार पर मिश्रा से त्यागपत्र मांगा जा सकता है तो विजयवर्गीय मामले में जांच रिपोर्ट का इंतजार क्यों? विजयवर्गीय पर इंदौर के महापौर से प्रदेश के मंत्री रहते कई विवादित निर्णय लेने और चहेतों को फायदा पहुंचाने का आरोप है। उनसे जुड़े घपले घोटालों की फेहरिश्त बहुत लंबी है।
श्री विजयवर्गीय पर आरोप है कि इंदौर जिले के नंदा नगर में सुगनी देवी कालेज से लगी जमीन रमेश मेंदोला की समिति को दिलाने में मदद की। रमेश मेंदोला कैलाश विजयवर्गीय के सबसे खास मित्र हैं। इसी तरह आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह पर उनकी मैनेजर की पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति मंत्री के साथ रात बिताने के लिए दवाब डालता है। खंडवा कोतवाली में महिला ने शपथ पत्र के साथ शिकायत की थी, लेकिन पुलिस ने महिला के पति के खिलाफ प्रताडऩा का मामला दर्ज कर लिया, लेकिन मंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं की गई।
शिकायत को ही आधार बनाकर यदि इस्तीफा लिया जाना है तो लोकायुक्त जांच में घिरे आधा दर्जन मंत्रियों से भी इस्तीफा ले लेना चाहिए। इस मामले में पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव की रतलाम तथा आदिम जाति कल्याण मंत्री विजयशाह की हाल ही में ग्वालियर में की गई टिप्पणी गौर करने लायक है कि जांच पूरी होने के पहले केवल शिकायत के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। श्री भार्गव ने तो यहां तक कहा कि यदि शिकायत कार्रवाई का आधार है तो पूरा मंत्रालय खाली हो जाएगा।
इसी तरह विधायक कमल पटेल और अशोक वीर विक्रम सिंह की पत्नी विधायक आशारानी को पार्टी से निलंबित करने की भी पटकथा तैयार की जा रही है। श्री पटेल हत्या के षडयंत्र के मामले में जेल में हैं, जबकि विधायक आशारानी सिंह नौकरानी तिज्जी बाई की मौत के मामले में फरार हैं। सूत्रों का कहना है कि इंदौर के विधायक रमेश मेंदोला के मामले को लेकर भी हाईकमान गंभीर है। जेल में बंद इंदौर के सबसे बड़े भू माफिया बाबी छावड़ा के साथ श्री मेंदोला की दोस्ती के संबंध में हाईकमान को अवगत कराया गया है।
लेकिन यह पूरा प्रहसन सिर्फ शिवराज सिंह चौहान सरकार के ताकतवर होने से वाबस्ता नहीं है, बल्कि हाल के दिनों में ही भाजपा संगठन की ताकत में इजाफा होने का ज्यादा बड़ा और पुख्ता सबूत है।
पार्टी के अंदरखाने बताते हैं कि नवागत प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा ने दागी मंत्रियों को कबीना से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए कई बार परोक्ष-अपरोक्ष तौर पर सत्ता साकेतों पर दबाव डाला था। पार्टी में शुचिता के आग्रह को लेकर उन्होंने लंबे समय से दिल्ली में हाईकमान का मानस बदलने का प्रयास भी जारी रखा था। इसका असर रतलाम में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में पहले ही दिन नजर भी आ गया, जब मप्र के प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार ने मुख्यमंत्री को दागी मंत्रियों और विधायकों पर कड़ी कार्रवाई करने को कह डाला और उन्हें फ्री हैंड भी दे दिया। जाहिर है गेंद चतुराई से शिवराज के पाले में डाल दी गई थी।
साफ नजर आया कि पूरे मामले की स्क्रिप्ट काफी पहले ही लिख दी गई थी। इसके बाद यह साफ हो गया था कि अब अनूप मिश्रा को मंत्री पद से विदा करने की पूरी जाजम बिछ चुकी है। लेकिन अनूप अकेले ही नहीं है जो नैतिकता की चपेट में आते हैं। पार्टी के पास कुछ समय तक यह तर्क है कि उनके खिलाफ मामले जांच में विभिन्न स्तरों पर हैं और वे सिविल किस्म के मामले हैं। लेकिन बचाव की यह रणनीति भाजपा के कितने काम आएगी यह आने वाला समय में ही साफ हो पाएगा। क्योंकि आरोपों के कटघरे में खड़े मंत्रियों की सूची में अजाक मंत्री विजय शाह, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, नागेन्द्रसिंह आदि कई नाम हैं।
मिश्रा के इस्तीफे की खबर आई पार्टी नेताओं के एक बड़े वर्ग ने इस मुद्दे पर सत्ता व संगठन में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की घेराबंदी कर दी। इन लोगों ने मिश्रा का तकाजा देते हुए कहा कि अगर घटना के समय बेलगांव में न होने के बावजूद मिश्रा से इस्तीफा लिया गया तो विजयवर्गीय के खिलाफ जांच हो रही है फिर भी उन्हें क्यों बख्शा जा रहा है? उन्हें न हटाने के लिए मुख्यमंत्री पर क्या किसी का दबाव है? इंदौर में अपनी मर्जी के मुताबिक पार्टी चलाने के लिए विजयवर्गीय ने खुद को हमेशा संगठन से ऊपर माना। संगठन पर उनके दबदबे के चलते पार्टी नेतृत्व चाह कर भी उनका बाल बांका नहीं कर पाया। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी सुमित्रा महाजन के खिलाफ जिस तरह खुली बगावत की और अपने कट्टर समर्थक विधायक रमेश मेंदोला को आगे कर पार्टी को परेशानी में डाला वह किसी से छिपा नहीं। सब कुछ साफ होने के बाद भी कैलाश-मेंदोला का कुछ नहीं बिगड़ा। तमाम सबूतों के बावजूद जिम्मेदार लोग इनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाए। संगठन के इसी लचर रवैये ने उनके हौंसले बुलंद किए।
उधर लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा ने इस्तीफे के बाद चुप्पी साध ली है जिसके कारण राजनीतिक गलियारों में कयासों को दौर शुरू हो गया है। अब वे दिल्ली जाकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मिलेंगे। शिवराज मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने के बाद मिश्रा अपने सिपहसालारों से लगातार मंथन कर रहे हैं। राजनैतिक प्रेक्षक मानते हैं कि यह तूफान आने के पहले का सन्नाटा है। प्रेक्षकों का मानना है कि अनूप मिश्रा चुप बैठने वाले नेताओं में नहीं है।
दागियों के मामले में कुलीनों का कुनबा कही जाने वाली भाजपा में खंदक की लड़ाई शुरू हो गई है। स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा के त्यागपत्र के बाद संगठन में दागी कौन? इस सवाल को लेकर नेता भी बंटे हुए हैं। भाजपा की साख पर बट्टा लगाने वालों पर कार्रवाई के प्रदेश प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार के निर्देश और मुख्यमंत्री समेत नौ मंत्रियों के विरुद्ध चल रही जांच में लोकायुक्त पीपी नावलेकर द्वारा ढिलाई न बरतने की बात के बाद भाजपा में सफाई अभियान छिडऩे की चर्चा गर्म है। लोकायुक्त के दायरे में आए मंत्री मुख्यमंत्री से लेकर संगठन तक सफाई दे रहे हैं। विजयवर्गीय सहित अन्य दागियों के मामले में मुख्यमंत्री से लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय महासचिव नरेंद्र सिंह तोमर ने चर्चा की। सीएम हाउस में हुई इस बातचीत में प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा भी शामिल हुए। इसके बाद तोमर और माखन सिंह ने भी अलग से चर्चा की। इधर संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा संगठन और मुख्यमंत्री के बीच संपर्क सूत्र बने हुए थे।
भाजपा के ही वरिष्ठ नेता इसे प्रदेश संगठन के साथ ही प्रदेश भाजपा के लिए भी ठीक नहीं मानते। इनका मानना है कि प्रदेश भाजपा के साथ ही केन्द्रीय भाजपा संगठन तक सरे आम भाजपा संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। राजनीतिक विलेश्कों का यह भी मानना है कि पहले भाजपा के पदाधिकारी कम संसाधनों में ज्यादा कार्य करते थे लेकिन अब भाजपा में भी बदलाव आया है और पदाधिकारी ज्यादा आरामतलब हो गये हैं। सत्ता का स्वाद का स्वाद चख लेने के बाद पार्टी कार्यकर्ता और नेता विचारों के लिए त्याग के बजाय स्व हित में भोगविलास के संसाधन जुटाने में सक्रिय हैं। यही कारण है कि पार्टी को दान दातव्य में मिले धन को भाजपा पदाधिकारी मुक्त हाथों खर्च करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। लेकिन प्रदेश भाजपा ने संविधान को दरकिनार कर यहां अपना ही संविधान लागू होता दिखता है।
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में दोबारा भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बने एक साल का अरसा बीत चुका है और इस पंचवर्षीय में सरकार विकास कार्य और नई घोषणायें करने की स्थिति मे नहीं लगती। प्रदेश में पूर्व से संचालित एवं घोषित योजनायें ही इतनी है कि उनके संचालन के लिये प्रदेश सरकार के पास खजाने में पर्याप्त धन नहीं है। अनेक केंद्र द्वारा संचालित योजनाओं में एवं मदों में प्रदेश सरकार को जो अंशदान देना होता है वह भी सरकार देने की स्थिति में नहीं है। प्रदेश सरकार द्वारा पूर्व के कार्यकाल में घोषित की गई जननी सुरक्षा योजना, कन्यादान योजना, दीनदयाल उपचार योजना, लाडली लक्ष्मी योजना, सायकल वितरण योजना जैसी अनेकों जनहितकारी योजनाओं के लिये सरकार को धन उपलब्ध कराना भी मुश्किल पड़ रहा है। आगामी कार्यकाल सरकार को केवल प्रदेश की जनता को लोक लुभावने वायदों पर ही गुजारना है। इसी कार्यशैली का परिचय देते हुये प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाने के लिये संकल्प ले चुके है और इस दिशा में वे हर मंच से लच्छेदार भाषण जनता को पिला रहे है यह सच है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जमीन से जुडे हुये नेता है और वे जनता के दुख दर्दों को भली भांति जानते है। जनता की दुखती नब्ज पर हाथ रखने की उनमें कला है। स्वर्णिम प्रदेश बनाने की उनकी मंशा में कोई शंका नही की जा सकती परंतु यह मंशा उनकी अपनी व्यक्तिगत हो सकती है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता और इससे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भली भांति परिचित भी है कि उनके अपने मंत्रिमंडल में शामिल अनेक मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हुये है और इन मंत्रियों पर आरोप कोई मनगढंत भी नहीं है हालांकि इन्हें मंत्रिमंडल में मजबूरियों के चलते शामिल किया गया है। अनेक मंत्री विधायक भ्रष्टाचार में पैर से लेकर सिर तक आरोपित है। इन मंत्री विधायकों के भरोसे स्वर्णिम मध्यप्रदेश का निर्माण मुख्यमंत्री कैसे करेंगे यह समझ से परे है?
भाजपा की सफलता का रहस्य उसकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा में नहीं था बल्कि उसकी चरित्र आधारित राजनीति में था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं.दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता और आकर्षण के मूल में वही चारित्रिक शक्ति थी जो आज संभवत: भाजपा के किसी नेता के पास नहीं है। अपनी सारी रणनीतिक क्षमताओं के बावजूद न तो प्रमोद महाजन ही जनता के हृदय में स्थान पा सके और न ही अरूण जेतली। इसके विपरीत उमा भारती जैसे नेता आज भी लोगों की आस्था के केंद्र में हैं। इसका कारण बहुत ही स्पष्ट है। उदाहरण के लिए हम देख सकते हैं कि जब आडवाणी के मुख्य सारथी अरूण जेतली अपने व्यक्तिगत अहम के कारण कोप भवन मे बैठे हुए थे, ठीक उसी समय उमा भारती भाजपा द्वारा पूर्व में अपमानित होने के बावजूद आडवाणी के चुनाव प्रचार के लिए खुद आगे आयीं। ये दोनों उदाहरण दोनों की नेताओं की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने क लिए पर्याप्त हैं। कहना होगा कि अरूण जेतली के लिए उनका व्यक्तिगत कद पार्टी के हित से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उमा भारती के लिए आज भी भाजपा का हित ज्यादा महत्वपूर्ण है।
ठीक से कोई कुछ नहीं कह पा रहा है, लेकिन एक अजीब सी खामोशी पार्टी में तैर रही है। कोई नहीं समझ पा रहा है कि रतलाम में प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में दागियों को न बख्शने के अनंत कुमार के तीर का असली निशाना कौन है। कोई छोटा है या बड़ा? कई अदद निगाहें कहीं इतिहास खंगाल रही हैं, तो कहीं लोकायुक्त का रिकॉर्ड। इतना जाहिर है कि सिर्फ अनूप मिश्रा के लिए खुद गडकरी और अनंत कुमार को रतलाम आने की जरूरत नहीं थी। फिर इसका मकसद क्या था? देखते चलिए।
शुरू हो गयी
है। मध्य प्रदेश भाजपा में तो स्थिति और भी दयनीय है। स्वर्णिम मध्य प्रदेश बनाने में लगे प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के राज में ऐसा लगता है जैसे भ्रष्टाचार यहां आचार-विचार का एक आवश्यक अंग बन गया है... मंत्रियों, नेताओं के साथ ही नौकरशाह, अधिकारी, कर्मचारी इसे बढ़ावा देने में पीछे नही है.. सरकार भ्रष्टाचार के मामले में आये दिन बदनाम हो रही है...।
भाजपा नेताओं कि माने तो बदनामी का दंश झेल रही मप्र सरकार का जमीर जाग गया है और वह अब किसी भी दोषी को बख्शेगी नहीं। प्रदेश के दागी मंत्रियों पर कार्रवाई की जमीन तैयार हो गई है। रतलाम में प्रदेश भाजपा कार्यसमिति की बैठक में मुख्यमंत्री को कार्रवाई की छूट दे दी गई है। पार्टी महासचिव और प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार ने सरकार को फ्री हैंड देते हुए कहा है कि वे दागी मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए स्वतंत्र हैं। केंद्रीय नेतृत्व उनके साथ है।
शायद यही कारण है कि जिस तरह कहानियां खत्म होने से पहले कई मोड़ लेती हैं, उसी तरह शिवराज कबीना के हाईप्रोफाइल मंत्री अनूप मिश्रा की कहानी का भी हश्र हो गया है। यानी केंद्रीय नेतृत्व की धमकी के साथ ही सरकार के साथ उनका भी जमीर जाग गया और उन्होंने अपना इस्तीफा आधे मन से दे दिया। इस्तीफा दिया या उनसे लिया गया यह तो शिवराज सिंह चौहान या स्वयं अनूप मिश्रा ही बता सकते हैं। हालांकि भाजपा सूत्रों की माने तो उन्हें बचाने के लिए जितने प्रयास हुए, उतने ही प्रयास उन्हें मंत्री पद से विदा करने के भी हुए। यानि दोनों तरफ से जोर बराबर का ही लगा।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के भांजे होने के नाते श्री मिश्रा की गिनती प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेताओं में होती है। उनके इस्तीफे की खबर से राजधानी भोपाल के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों से लेकर दिल्ली तक खलबली मच गई। इसके साथ ही अन्य दागी मंत्रियों के भविष्य को लेकर कयास और अटकलों का दौर भी चल पड़ा। लेकिन पार्टी ने यह कह कर अटकलों पर विराम लगा दिया कि मिश्रा ने इस्तीफा देकर नैतिकता का परिचय दिया है। यदि यह बात मान भी ली जाए तो क्या और मंत्रियों में नैतिकता नहीं है कि बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद भी मंत्रियों ने इस्तीफा नहीं दिया। इससे ऐसा लगता है कि अनूप मिश्रा ने किसी न किसी दवाब में इस्तीफा दिया है, और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उसे आनन-फानन में स्वीकार कर लिया। आखिर अनूप मिश्रा का इस्तीफा स्वीकार करने का मापदंड क्या है? यदि थाने में दर्ज एफआईआर को ही आधार बनाया गया है तो क्या यह उचित है।
सरकार के प्रवक्ता डा. नरोत्तम मिश्रा ने भी खुद स्वीकार किया किकेवल आरोप लगने से कोई दोषी नहीं हो जाता। जिस दिन ग्वालियर जिले के बेलागांव में गोली बारी की घटना से भीकन कुशवाहा नामक युवक की मौत हुई, उस दिन अनूप मिश्रा उज्जैन में अधिकारियों की बैठक ले रहे थे। यदि यह माना जाए कि अनूप मिश्रा ने हत्या का षडयंत्र रचा है तो अभी उस मामले की जांच चल रही है। फिर भी इस्तीफा क्यूं।
यदि शिकायत को ही आधार बनाकर इस्तीफा लिया गया है तो वाणिज्य व उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय तथा आदिम जाति कल्याण मंत्री कुंवर विजय शाह ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा क्यों नहीं दिया। इस तरह अनूप के त्यागपत्र ने शिवराज कैबिनेट के दूसरे दागी मंत्री और 100 करोड़ के जमीन घोटाले में लोकायुक्त जांच का सामना कर रहे कैलाश विजयवर्गीय की भी परेशानी बढ़ा दी है। पार्टी में खुली धड़ेबाजी के बीच विजयवर्गीय पर नैतिकता के नाते मंत्री पद छोडऩे का दबाव बनने लगा है। विपक्ष ने भी घोटालों की लंबी फेहरिस्त के आधार पर घेराबंदी तेज कर दी है। निगाहें अब आलाकमान से फ्रीहैंड ले चुके मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान और प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा पर है। लोगों का सीधा सवाल यह है कि जब बिना जांच महज एफआईआर के आधार पर मिश्रा से त्यागपत्र मांगा जा सकता है तो विजयवर्गीय मामले में जांच रिपोर्ट का इंतजार क्यों? विजयवर्गीय पर इंदौर के महापौर से प्रदेश के मंत्री रहते कई विवादित निर्णय लेने और चहेतों को फायदा पहुंचाने का आरोप है। उनसे जुड़े घपले घोटालों की फेहरिश्त बहुत लंबी है।
श्री विजयवर्गीय पर आरोप है कि इंदौर जिले के नंदा नगर में सुगनी देवी कालेज से लगी जमीन रमेश मेंदोला की समिति को दिलाने में मदद की। रमेश मेंदोला कैलाश विजयवर्गीय के सबसे खास मित्र हैं। इसी तरह आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह पर उनकी मैनेजर की पत्नी ने आरोप लगाया था कि पति मंत्री के साथ रात बिताने के लिए दवाब डालता है। खंडवा कोतवाली में महिला ने शपथ पत्र के साथ शिकायत की थी, लेकिन पुलिस ने महिला के पति के खिलाफ प्रताडऩा का मामला दर्ज कर लिया, लेकिन मंत्री के खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं की गई।
शिकायत को ही आधार बनाकर यदि इस्तीफा लिया जाना है तो लोकायुक्त जांच में घिरे आधा दर्जन मंत्रियों से भी इस्तीफा ले लेना चाहिए। इस मामले में पंचायत व ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव की रतलाम तथा आदिम जाति कल्याण मंत्री विजयशाह की हाल ही में ग्वालियर में की गई टिप्पणी गौर करने लायक है कि जांच पूरी होने के पहले केवल शिकायत के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। श्री भार्गव ने तो यहां तक कहा कि यदि शिकायत कार्रवाई का आधार है तो पूरा मंत्रालय खाली हो जाएगा।
इसी तरह विधायक कमल पटेल और अशोक वीर विक्रम सिंह की पत्नी विधायक आशारानी को पार्टी से निलंबित करने की भी पटकथा तैयार की जा रही है। श्री पटेल हत्या के षडयंत्र के मामले में जेल में हैं, जबकि विधायक आशारानी सिंह नौकरानी तिज्जी बाई की मौत के मामले में फरार हैं। सूत्रों का कहना है कि इंदौर के विधायक रमेश मेंदोला के मामले को लेकर भी हाईकमान गंभीर है। जेल में बंद इंदौर के सबसे बड़े भू माफिया बाबी छावड़ा के साथ श्री मेंदोला की दोस्ती के संबंध में हाईकमान को अवगत कराया गया है।
लेकिन यह पूरा प्रहसन सिर्फ शिवराज सिंह चौहान सरकार के ताकतवर होने से वाबस्ता नहीं है, बल्कि हाल के दिनों में ही भाजपा संगठन की ताकत में इजाफा होने का ज्यादा बड़ा और पुख्ता सबूत है।
पार्टी के अंदरखाने बताते हैं कि नवागत प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा ने दागी मंत्रियों को कबीना से बाहर का रास्ता दिखाने के लिए कई बार परोक्ष-अपरोक्ष तौर पर सत्ता साकेतों पर दबाव डाला था। पार्टी में शुचिता के आग्रह को लेकर उन्होंने लंबे समय से दिल्ली में हाईकमान का मानस बदलने का प्रयास भी जारी रखा था। इसका असर रतलाम में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में पहले ही दिन नजर भी आ गया, जब मप्र के प्रभारी और राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार ने मुख्यमंत्री को दागी मंत्रियों और विधायकों पर कड़ी कार्रवाई करने को कह डाला और उन्हें फ्री हैंड भी दे दिया। जाहिर है गेंद चतुराई से शिवराज के पाले में डाल दी गई थी।
साफ नजर आया कि पूरे मामले की स्क्रिप्ट काफी पहले ही लिख दी गई थी। इसके बाद यह साफ हो गया था कि अब अनूप मिश्रा को मंत्री पद से विदा करने की पूरी जाजम बिछ चुकी है। लेकिन अनूप अकेले ही नहीं है जो नैतिकता की चपेट में आते हैं। पार्टी के पास कुछ समय तक यह तर्क है कि उनके खिलाफ मामले जांच में विभिन्न स्तरों पर हैं और वे सिविल किस्म के मामले हैं। लेकिन बचाव की यह रणनीति भाजपा के कितने काम आएगी यह आने वाला समय में ही साफ हो पाएगा। क्योंकि आरोपों के कटघरे में खड़े मंत्रियों की सूची में अजाक मंत्री विजय शाह, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा, नागेन्द्रसिंह आदि कई नाम हैं।
मिश्रा के इस्तीफे की खबर आई पार्टी नेताओं के एक बड़े वर्ग ने इस मुद्दे पर सत्ता व संगठन में शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की घेराबंदी कर दी। इन लोगों ने मिश्रा का तकाजा देते हुए कहा कि अगर घटना के समय बेलगांव में न होने के बावजूद मिश्रा से इस्तीफा लिया गया तो विजयवर्गीय के खिलाफ जांच हो रही है फिर भी उन्हें क्यों बख्शा जा रहा है? उन्हें न हटाने के लिए मुख्यमंत्री पर क्या किसी का दबाव है? इंदौर में अपनी मर्जी के मुताबिक पार्टी चलाने के लिए विजयवर्गीय ने खुद को हमेशा संगठन से ऊपर माना। संगठन पर उनके दबदबे के चलते पार्टी नेतृत्व चाह कर भी उनका बाल बांका नहीं कर पाया। लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने पार्टी की अधिकृत प्रत्याशी सुमित्रा महाजन के खिलाफ जिस तरह खुली बगावत की और अपने कट्टर समर्थक विधायक रमेश मेंदोला को आगे कर पार्टी को परेशानी में डाला वह किसी से छिपा नहीं। सब कुछ साफ होने के बाद भी कैलाश-मेंदोला का कुछ नहीं बिगड़ा। तमाम सबूतों के बावजूद जिम्मेदार लोग इनके खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पाए। संगठन के इसी लचर रवैये ने उनके हौंसले बुलंद किए।
उधर लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री अनूप मिश्रा ने इस्तीफे के बाद चुप्पी साध ली है जिसके कारण राजनीतिक गलियारों में कयासों को दौर शुरू हो गया है। अब वे दिल्ली जाकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से मिलेंगे। शिवराज मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने के बाद मिश्रा अपने सिपहसालारों से लगातार मंथन कर रहे हैं। राजनैतिक प्रेक्षक मानते हैं कि यह तूफान आने के पहले का सन्नाटा है। प्रेक्षकों का मानना है कि अनूप मिश्रा चुप बैठने वाले नेताओं में नहीं है।
दागियों के मामले में कुलीनों का कुनबा कही जाने वाली भाजपा में खंदक की लड़ाई शुरू हो गई है। स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा के त्यागपत्र के बाद संगठन में दागी कौन? इस सवाल को लेकर नेता भी बंटे हुए हैं। भाजपा की साख पर बट्टा लगाने वालों पर कार्रवाई के प्रदेश प्रभारी राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार के निर्देश और मुख्यमंत्री समेत नौ मंत्रियों के विरुद्ध चल रही जांच में लोकायुक्त पीपी नावलेकर द्वारा ढिलाई न बरतने की बात के बाद भाजपा में सफाई अभियान छिडऩे की चर्चा गर्म है। लोकायुक्त के दायरे में आए मंत्री मुख्यमंत्री से लेकर संगठन तक सफाई दे रहे हैं। विजयवर्गीय सहित अन्य दागियों के मामले में मुख्यमंत्री से लोकसभा की नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और राष्ट्रीय महासचिव नरेंद्र सिंह तोमर ने चर्चा की। सीएम हाउस में हुई इस बातचीत में प्रदेशाध्यक्ष प्रभात झा भी शामिल हुए। इसके बाद तोमर और माखन सिंह ने भी अलग से चर्चा की। इधर संसदीय कार्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा संगठन और मुख्यमंत्री के बीच संपर्क सूत्र बने हुए थे।
भाजपा के ही वरिष्ठ नेता इसे प्रदेश संगठन के साथ ही प्रदेश भाजपा के लिए भी ठीक नहीं मानते। इनका मानना है कि प्रदेश भाजपा के साथ ही केन्द्रीय भाजपा संगठन तक सरे आम भाजपा संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं। राजनीतिक विलेश्कों का यह भी मानना है कि पहले भाजपा के पदाधिकारी कम संसाधनों में ज्यादा कार्य करते थे लेकिन अब भाजपा में भी बदलाव आया है और पदाधिकारी ज्यादा आरामतलब हो गये हैं। सत्ता का स्वाद का स्वाद चख लेने के बाद पार्टी कार्यकर्ता और नेता विचारों के लिए त्याग के बजाय स्व हित में भोगविलास के संसाधन जुटाने में सक्रिय हैं। यही कारण है कि पार्टी को दान दातव्य में मिले धन को भाजपा पदाधिकारी मुक्त हाथों खर्च करने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। लेकिन प्रदेश भाजपा ने संविधान को दरकिनार कर यहां अपना ही संविधान लागू होता दिखता है।
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में दोबारा भारतीय जनता पार्टी की सरकार को बने एक साल का अरसा बीत चुका है और इस पंचवर्षीय में सरकार विकास कार्य और नई घोषणायें करने की स्थिति मे नहीं लगती। प्रदेश में पूर्व से संचालित एवं घोषित योजनायें ही इतनी है कि उनके संचालन के लिये प्रदेश सरकार के पास खजाने में पर्याप्त धन नहीं है। अनेक केंद्र द्वारा संचालित योजनाओं में एवं मदों में प्रदेश सरकार को जो अंशदान देना होता है वह भी सरकार देने की स्थिति में नहीं है। प्रदेश सरकार द्वारा पूर्व के कार्यकाल में घोषित की गई जननी सुरक्षा योजना, कन्यादान योजना, दीनदयाल उपचार योजना, लाडली लक्ष्मी योजना, सायकल वितरण योजना जैसी अनेकों जनहितकारी योजनाओं के लिये सरकार को धन उपलब्ध कराना भी मुश्किल पड़ रहा है। आगामी कार्यकाल सरकार को केवल प्रदेश की जनता को लोक लुभावने वायदों पर ही गुजारना है। इसी कार्यशैली का परिचय देते हुये प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाने के लिये संकल्प ले चुके है और इस दिशा में वे हर मंच से लच्छेदार भाषण जनता को पिला रहे है यह सच है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जमीन से जुडे हुये नेता है और वे जनता के दुख दर्दों को भली भांति जानते है। जनता की दुखती नब्ज पर हाथ रखने की उनमें कला है। स्वर्णिम प्रदेश बनाने की उनकी मंशा में कोई शंका नही की जा सकती परंतु यह मंशा उनकी अपनी व्यक्तिगत हो सकती है। इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता और इससे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भली भांति परिचित भी है कि उनके अपने मंत्रिमंडल में शामिल अनेक मंत्री भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे हुये है और इन मंत्रियों पर आरोप कोई मनगढंत भी नहीं है हालांकि इन्हें मंत्रिमंडल में मजबूरियों के चलते शामिल किया गया है। अनेक मंत्री विधायक भ्रष्टाचार में पैर से लेकर सिर तक आरोपित है। इन मंत्री विधायकों के भरोसे स्वर्णिम मध्यप्रदेश का निर्माण मुख्यमंत्री कैसे करेंगे यह समझ से परे है?
भाजपा की सफलता का रहस्य उसकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा में नहीं था बल्कि उसकी चरित्र आधारित राजनीति में था। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं.दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता और आकर्षण के मूल में वही चारित्रिक शक्ति थी जो आज संभवत: भाजपा के किसी नेता के पास नहीं है। अपनी सारी रणनीतिक क्षमताओं के बावजूद न तो प्रमोद महाजन ही जनता के हृदय में स्थान पा सके और न ही अरूण जेतली। इसके विपरीत उमा भारती जैसे नेता आज भी लोगों की आस्था के केंद्र में हैं। इसका कारण बहुत ही स्पष्ट है। उदाहरण के लिए हम देख सकते हैं कि जब आडवाणी के मुख्य सारथी अरूण जेतली अपने व्यक्तिगत अहम के कारण कोप भवन मे बैठे हुए थे, ठीक उसी समय उमा भारती भाजपा द्वारा पूर्व में अपमानित होने के बावजूद आडवाणी के चुनाव प्रचार के लिए खुद आगे आयीं। ये दोनों उदाहरण दोनों की नेताओं की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करने क लिए पर्याप्त हैं। कहना होगा कि अरूण जेतली के लिए उनका व्यक्तिगत कद पार्टी के हित से ज्यादा महत्वपूर्ण है जबकि उमा भारती के लिए आज भी भाजपा का हित ज्यादा महत्वपूर्ण है।
ठीक से कोई कुछ नहीं कह पा रहा है, लेकिन एक अजीब सी खामोशी पार्टी में तैर रही है। कोई नहीं समझ पा रहा है कि रतलाम में प्रदेश भाजपा कार्यकारिणी की बैठक में दागियों को न बख्शने के अनंत कुमार के तीर का असली निशाना कौन है। कोई छोटा है या बड़ा? कई अदद निगाहें कहीं इतिहास खंगाल रही हैं, तो कहीं लोकायुक्त का रिकॉर्ड। इतना जाहिर है कि सिर्फ अनूप मिश्रा के लिए खुद गडकरी और अनंत कुमार को रतलाम आने की जरूरत नहीं थी। फिर इसका मकसद क्या था? देखते चलिए।
बुधवार, 30 जून 2010
वीपी की राह पर दिग्विजय?
राजा मांडा के बाद अब राजा राघोगढ़ भावावेश में आकर अपनी पार्टी की ऐसी-तैसी करने पर तूले हैं। जिससे लगता है कि दिग्विजय सिंह अब वीपी सिंह बनने के चक्कर में है। 10 जनपथ के सूत्रों की माने तो दिग्गी राजा इनदिनों सोनिया गांधी के सबसे करीबी नेताओं में शामिल है। फिर ऐसी क्या वजह है कि वे लगातार लोकतांत्रिक अंदाज में पार्टी पर अप्रत्यक्ष हमला कर रहे हैं।
ताजा मामला भोपाल गैस त्रासदी को लेकर मचे बवाल का है। अपने राजनीतिक संरक्षक अर्जुन सिंह की वकालत करते हुए दिग्विजय सिंह ने अप्रत्यक्ष रुप से राजीव गांधी पर हमला बोल दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यूनियन कारबाइड के पूर्व चेयरमैन वारेन एंडरसन को अमेरिका के दबाव में छोड़ा गया था। उन्होंने खुलकर न बोलने के बजाए संकेतों में बोल दिया कि अमेरिका का दबाव सीधा मध्य प्रदेश सरकार पर तो नहीं आया था, पर अमेरिका ने भारतीय प्रधानमंत्री से ही बातचीत की होगी। इसकी पुष्टि मध्य प्रदेश सरकार के तत्कालीन एक अधिकारी ने भी की है कि रोनाल्ड रीगन ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी को फोन किया था, तभी वारेन एंडरसन छोड़े गए थे। दिग्विजय सिंह के इस हमले के बाद कांग्रेस हाईकमान सकते में है। क्योंकि यह दिग्विजय सिंह का लगातार दूसरा हमला है। इससे पहले नक्सल नीति को लेकर गृह मंत्री पी चिंदबरम पर उन्होंने हमला किया था। उन्होंने नक्सलियों से निपटने के तौर तरीके पर टिप्पणी की थी और चिंदबरम को एरोगेंट तक कह दिया था। इसके बाद फिर कांग्रेस में हलचल मची थी। दिग्विजय सिंह ने पी चिंदबरम से मिलकर अपने ब्यान पर लीपापोती का प्रयास किया था। लेकिन इन सारों के पीछे खेल क्या है उसपर चर्चा शुरू हो गई है। आखिर दिग्विजय सिंह भी कोई नादान, मूर्ख या बच्चा नहीं है। जो कुछ भी वे बोल रहे है उन्हें पता है वे क्या बोल रहे है और इसका प्रभाव क्या होगा यह भी उन्हें बखूबी पता है। इसके बावजूद वो बोल रहे है। दिग्विजय सिंह कांग्रेस में प्रभावी राजपूत नेता है। मध्य प्रदेश से संबंधित और लंबा राजनीतिक अनुभव है। लंबे अर्से तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे है। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से उनकी साम्यता काफी है। वे पिछले कुछ समय से दलित, आदिवासी, मुस्लिम और पिछड़ों के हितों में ब्यान देते नजर आ रहे है। ठीक वीपी सिंह के मुस्लिम प्रेम की तरह ही उन्होंने आजमगढ़ दौरा किया। वहां जाकर बाटला हाउस एनकाउंटर पर प्रश्न उठाया। साथ ही यह बोल दिया कि जल्द ही राहुल गांधी आजमगढ़ का दौरा करेंगे। जबकि राहुल गांधी के दौरे की जानकारी न तो कांग्रेस को थी न ही खुद राहुल गांधी को। दिग्विजय सिंह की वीपी सिंह से एक और साम्यता है। वे वीपी सिंह की तरह ही राजपूत है और उन्हीं की तरह एक रियासत के राजा भी। वीपी सिंह मांडा के राजा थे तो दिग्विजय सिंह राघोगढ़ के राजा है। अंतर बस यही है कि यह रियासत मध्य प्रदेश में है तो एक रियासत उतर प्रदेश में है। दोनों नेताओं को कांग्रेस के संगठन और प्रशासन का लंबा अनुभव है। दिग्विजय सिंह अगर मध्य प्रदेश मे लंबे समय मुख्यमंत्री रहे तो वीपी सिंह भी उतर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में मुख्यमंत्री रहे। मुद्दों को लेकर भी दोनों नेताओं में साम्यता है। वीपी सिंह ने आर्थिक मुद्दों पर राजीव गांधी की सरकार को घेर लिया था और वे खुद उस सरकार में मंत्री थे। दिग्विजय सिंह भी संगठन में रहते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों को ही घेर रहे है। जिस तरह से नक्सल अभियान पर सरकार की नीतियों को राजा ने घेरा है, वो एक तरह से पी चिंदबरम की प्रो कारपोरेट नीति का खुला विरोध है। अब भोपाल गैस त्रासदी के अभियुक्त एंडरसन को लेकर जिस तरह से दिग्विजय सिंह ने हमला बोला वह हमला सीधे राजीव गांधी पर है।
कांग्रेसी हल्कों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस के कई राजपूत नेताओं को अपने पाले में कर रखा है। हालांकि दिग्विजय सिंह वीपी सिंह की तरह फकीर की इमेज में नहीं है पर राजपूत नेताओं से उनकी प्रियता काफी है। दिग्विजय सिंह मृदुभाषी है और कहा जाता है कि दिग्गी राजा का काटा पानी भी नहीं मांगता। इसलिए दिग्गी राजा के इस ब्यान के कई अर्थ है, उनका ब्यान कोई नादानी है। उधर दिग्गी राजा के इस ब्यान के बाद कांग्रेसी ब्राहम्ण सोनिया गांधी को यह समझाने में लग गए है कि रियासती राजाओं को ज्यादा तव्वजो देना खतरे से खाली नहीं। कभी भी हमला हो सकता है। विश्वनाथ प्रताप सिंह भी रियासती थे। राजीव गांधी को इस तरह से मारा कि सता में दुबारा नहीं आ पाए। अर्जुन सिंह रियासती थे, सोनिया गांधी के नियंत्रण में चलने वाली सरकार को पांच साल तक परेशान रखा। कभी ओबीसी आरक्षण को लेकर तो कभी अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर। दिग्विजय सिंह भी रियासती है। ये भी अल्पसंख्यक,ओबीसी, आदिवासी, नक्सल जैसे मसलों पर अपनी ही सरकार को घेर रहे है। आने वाले दिनों में अच्छे संकेत तो नहीं दिखते। अब देखना यह है कि ब्राहम्ण नेताओं की दिग्विजय के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम क्या गुल खिलाती है।
राजा मांडा के बाद अब राजा राघोगढ़ भावावेश में आकर अपनी पार्टी की ऐसी-तैसी करने पर तूले हैं। जिससे लगता है कि दिग्विजय सिंह अब वीपी सिंह बनने के चक्कर में है। 10 जनपथ के सूत्रों की माने तो दिग्गी राजा इनदिनों सोनिया गांधी के सबसे करीबी नेताओं में शामिल है। फिर ऐसी क्या वजह है कि वे लगातार लोकतांत्रिक अंदाज में पार्टी पर अप्रत्यक्ष हमला कर रहे हैं।
ताजा मामला भोपाल गैस त्रासदी को लेकर मचे बवाल का है। अपने राजनीतिक संरक्षक अर्जुन सिंह की वकालत करते हुए दिग्विजय सिंह ने अप्रत्यक्ष रुप से राजीव गांधी पर हमला बोल दिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यूनियन कारबाइड के पूर्व चेयरमैन वारेन एंडरसन को अमेरिका के दबाव में छोड़ा गया था। उन्होंने खुलकर न बोलने के बजाए संकेतों में बोल दिया कि अमेरिका का दबाव सीधा मध्य प्रदेश सरकार पर तो नहीं आया था, पर अमेरिका ने भारतीय प्रधानमंत्री से ही बातचीत की होगी। इसकी पुष्टि मध्य प्रदेश सरकार के तत्कालीन एक अधिकारी ने भी की है कि रोनाल्ड रीगन ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी को फोन किया था, तभी वारेन एंडरसन छोड़े गए थे। दिग्विजय सिंह के इस हमले के बाद कांग्रेस हाईकमान सकते में है। क्योंकि यह दिग्विजय सिंह का लगातार दूसरा हमला है। इससे पहले नक्सल नीति को लेकर गृह मंत्री पी चिंदबरम पर उन्होंने हमला किया था। उन्होंने नक्सलियों से निपटने के तौर तरीके पर टिप्पणी की थी और चिंदबरम को एरोगेंट तक कह दिया था। इसके बाद फिर कांग्रेस में हलचल मची थी। दिग्विजय सिंह ने पी चिंदबरम से मिलकर अपने ब्यान पर लीपापोती का प्रयास किया था। लेकिन इन सारों के पीछे खेल क्या है उसपर चर्चा शुरू हो गई है। आखिर दिग्विजय सिंह भी कोई नादान, मूर्ख या बच्चा नहीं है। जो कुछ भी वे बोल रहे है उन्हें पता है वे क्या बोल रहे है और इसका प्रभाव क्या होगा यह भी उन्हें बखूबी पता है। इसके बावजूद वो बोल रहे है। दिग्विजय सिंह कांग्रेस में प्रभावी राजपूत नेता है। मध्य प्रदेश से संबंधित और लंबा राजनीतिक अनुभव है। लंबे अर्से तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे है। पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह से उनकी साम्यता काफी है। वे पिछले कुछ समय से दलित, आदिवासी, मुस्लिम और पिछड़ों के हितों में ब्यान देते नजर आ रहे है। ठीक वीपी सिंह के मुस्लिम प्रेम की तरह ही उन्होंने आजमगढ़ दौरा किया। वहां जाकर बाटला हाउस एनकाउंटर पर प्रश्न उठाया। साथ ही यह बोल दिया कि जल्द ही राहुल गांधी आजमगढ़ का दौरा करेंगे। जबकि राहुल गांधी के दौरे की जानकारी न तो कांग्रेस को थी न ही खुद राहुल गांधी को। दिग्विजय सिंह की वीपी सिंह से एक और साम्यता है। वे वीपी सिंह की तरह ही राजपूत है और उन्हीं की तरह एक रियासत के राजा भी। वीपी सिंह मांडा के राजा थे तो दिग्विजय सिंह राघोगढ़ के राजा है। अंतर बस यही है कि यह रियासत मध्य प्रदेश में है तो एक रियासत उतर प्रदेश में है। दोनों नेताओं को कांग्रेस के संगठन और प्रशासन का लंबा अनुभव है। दिग्विजय सिंह अगर मध्य प्रदेश मे लंबे समय मुख्यमंत्री रहे तो वीपी सिंह भी उतर प्रदेश में मुख्यमंत्री रहे और केंद्र में मुख्यमंत्री रहे। मुद्दों को लेकर भी दोनों नेताओं में साम्यता है। वीपी सिंह ने आर्थिक मुद्दों पर राजीव गांधी की सरकार को घेर लिया था और वे खुद उस सरकार में मंत्री थे। दिग्विजय सिंह भी संगठन में रहते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों को ही घेर रहे है। जिस तरह से नक्सल अभियान पर सरकार की नीतियों को राजा ने घेरा है, वो एक तरह से पी चिंदबरम की प्रो कारपोरेट नीति का खुला विरोध है। अब भोपाल गैस त्रासदी के अभियुक्त एंडरसन को लेकर जिस तरह से दिग्विजय सिंह ने हमला बोला वह हमला सीधे राजीव गांधी पर है।
कांग्रेसी हल्कों में इस बात की जोरदार चर्चा है कि दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस के कई राजपूत नेताओं को अपने पाले में कर रखा है। हालांकि दिग्विजय सिंह वीपी सिंह की तरह फकीर की इमेज में नहीं है पर राजपूत नेताओं से उनकी प्रियता काफी है। दिग्विजय सिंह मृदुभाषी है और कहा जाता है कि दिग्गी राजा का काटा पानी भी नहीं मांगता। इसलिए दिग्गी राजा के इस ब्यान के कई अर्थ है, उनका ब्यान कोई नादानी है। उधर दिग्गी राजा के इस ब्यान के बाद कांग्रेसी ब्राहम्ण सोनिया गांधी को यह समझाने में लग गए है कि रियासती राजाओं को ज्यादा तव्वजो देना खतरे से खाली नहीं। कभी भी हमला हो सकता है। विश्वनाथ प्रताप सिंह भी रियासती थे। राजीव गांधी को इस तरह से मारा कि सता में दुबारा नहीं आ पाए। अर्जुन सिंह रियासती थे, सोनिया गांधी के नियंत्रण में चलने वाली सरकार को पांच साल तक परेशान रखा। कभी ओबीसी आरक्षण को लेकर तो कभी अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर। दिग्विजय सिंह भी रियासती है। ये भी अल्पसंख्यक,ओबीसी, आदिवासी, नक्सल जैसे मसलों पर अपनी ही सरकार को घेर रहे है। आने वाले दिनों में अच्छे संकेत तो नहीं दिखते। अब देखना यह है कि ब्राहम्ण नेताओं की दिग्विजय के खिलाफ चलाई जा रही मुहिम क्या गुल खिलाती है।
मप्र को अंधेरे में धकेलने कीसाजिश
मध्य प्रदेश इन दिनों बिजली संकट दिन पर दिन गहराता जा रहा है। यहां कि विद्युत उत्पादन इकाईयों को केन्द्र सरकार द्वारा न तो समय पर और न ही अच्छी किस्म का कोयला मुहैैया कराया जा रहा है जिससे कई उत्पादन इकाईयां बंद पड़ी है। ऐसे में केन्द्र सरकार यहां बन रही महेश्वर नर्मदा जल परियोजना पर भी आंख तरेरे हुए हैं। केन्द्र सरकार की नीयत को तो देखकर ऐसा लगता है जैसे वह मध्यप्रदेश को अंधेरे में धकेलने की साजिश कर रही है।
महेश्वर नर्मदा जल परियोजना के निर्माण का मामला इतना तूल पकड़ गया है कि इसको लेकर केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार में जमकर तनातनी चल रही है। यहां तक कि बिना सोचे समझे और तथ्यों को जाने बगैर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने परियोजना से प्रभावित लोगों के पुनर्वास को लेकर इस पर आगे काम बंद करने के निर्देश दे दिए थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बाद में काम चालू करा दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री के इस दुस्साहस पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भड़क उठे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को मध्यप्रदेश के विकास के प्रति अनुदार और संवेदनहीन बताया। लेकिन, सच्चाई मुख्यमंत्री को भी मालूम है। नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को सरकारी तंत्र की तुलना में इस क्षेत्र की समस्याओं की कहीं ज़्यादा अच्छी समझ है। वे इन समस्याओं के समाधान के व्यवहारिक तरीके भी जानते हैं, लेकिन भाजपा सरकार से उनके संबंध अच्छे नहीं हैं। इसीलिए सरकार उनकी सुनना नहीं चाहती है। आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को तो मुख्यमंत्री एवं भाजपा के बड़े नेता प्रदेश और विकास विरोधी ठहरा चुके हैं, इसीलिए अब सरकारी अफसर उनकी बातों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझते, लेकिन जनता को राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। उसे तो अपनी समस्याओं से मतलब होता है।
मध्य प्रदेश में बिजली और पानी का संकट है, इसीलिए राज्य सरकार अपने जल संसाधनों का भरपूर उपयोग करना चाहती है। वह नदी जल का उपयोग सिंचाई और बिजली दोनों के लिए करना चाहती है। फिर नर्मदा जल के उपयोग का भी सवाल है। नर्मदा प्राधिकरण के पंचाट के अनुसार, मध्यप्रदेश अभी तक अपने हिस्से के जल का उपयोग नहीं कर पाया है। सरकार की सुस्ती एवं लापरवाही के चलते अगले दस सालों में भी मध्य प्रदेश अपने हिस्से के नर्मदा जल का उपयोग नहीं कर पाएगा। ऐसे में गुजरात और महाराष्ट्र को नर्मदा के पानी के उपयोग का अधिकार मिल जाएगा।
गुजरात ने तो प्राधिकरण के फैसले के दिन से ही नर्मदा जल के अधिकतम उपयोग के लिए तैयारी शुरू कर दी थी और अब वह नर्मदा का पानी कच्छ के मरुस्थल तक ले जाने की स्थिति में आ गया है। फिर भी मध्य प्रदेश की ओर से नर्मदा जल के उपयोग के लिए अच्छी शुरुआत हो रही है, लेकिन जल्दबाजी में जो कुछ हो रहा है, उससे सरकार अपने लिए नई-नई समस्याएं पैदा कर रही है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर बताया है कि नर्मदा की महेश्वर परियोजना से प्रतिदिन 7.2 लाख यूनिट बिजली पैदा होगी, जबकि राज्य की औसत खपत 1,000 लाख यूनिट प्रतिदिन है। इससे स्पष्ट है कि महेश्वर से राज्य की बिजली खपत का एक प्रतिशत से भी कम अंश प्राप्त होगा। फिर भी इसे अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी बताया जा रहा है।
केन्द्र सरकार का आरोप है कि बिजली उत्पादन के लिए राज्य सरकार ने महेश्वर परियोजना से विस्थापित होने वाले 61 गांवों के 70 हजार से अधिक परिवारों के पुनर्वास कार्यों को पूरा कराने पर विशेष ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि परियोजना से विस्थापित होने वाले ग्रामीण अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩे के लिए राजनेताओं और राजनीतिक दलों पर कोई भरोसा नहीं कर रहे हैं। वे नर्मदा बचाओ आंदोलन के झंडे तले अपनी आवाज उठा रहे हैं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने चालाकी का परिचय देते हुए सरकार के लिए समर्थन जुटाने का भी प्रयास किया। उन्होंने कहा कि महेश्वर परियोजना से इंदौर शहर को प्रतिदिन 300 मिलियन लीटर पानी मिल सकेगा और 2024 तक की पानी की जरूरत इससे पूरी हो सकेगी, लेकिन विस्थापितों के पुनर्वास के बारे में मुख्यमंत्री खुलकर कुछ नहीं बोलते। या यूं कहें कि बोलने से बचना चाहते हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल एवं चितरूपा पालित ने एक नया गले उतरने लायक तर्क छोड़ा है कि मुख्यमंत्री परियोजना के निर्माण कार्य में लगे पूंजीपति ठेकेदारों के हितों की ज़्यादा चिंता कर रहे हैं। इसीलिए वह नर्मदा आंदोलन और यहां तक कि अपनी मर्यादा भूलकर देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ भी नासमझी भरे बयान खुलकर दे रहे हैं। आलोक एवं चितरूपा ने राज्य सरकार पर आम जनता की अपेक्षा निजी परियोजनकर्ता के हितों की चिंता किए जाने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि परियोजनकर्ता को 400 करोड़ रुपये की गारंटी इस शर्त पर दी गई थी कि उसकी होल्डिंग कंपनी द्वारा मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम से लिए गए पैसे वापस करने होंगे। जबकि गारंटी मिलने के बाद कंपनी द्वारा दिए गए 55 करोड़ रुपये के 20 चेक बाउंस हो गए। निगम द्वारा कंपनी के खिलाफ 20 आपराधिक प्रकरण भी कायम किए गए। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद कंपनी से न तो जनता का पैसा वापस लिया गया और न ही आज तक गारंटी रद्द की गई। चितरूपा पालित ने कहा कि परियोजनकर्ता ने विद्युत मंडल एवं नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की 130 करोड़ रुपये की संपत्तियों का पैसा पिछले 14 सालों में आज तक सरकार को नहीं दिया। परियोजनकर्ता के अनुसार, उक्त संपत्तियां अब उनके नाम पर हो गई हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जवाब दे कि बिना पैसा लिए उक्त संपत्तियां परियोजनकर्ता के नाम कैसे हो गईं? उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय के आदेश का पालन करते हुए प्रभावितों का संपूर्ण पुनर्वास किए जाने, परियोजनकर्ता को दी गई गारंटी रद्द करने, विद्युत मंडल एवं नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की संपत्तियों का पैसा परियोजनकर्ता से वसूलने और विद्युत क्रय समझौता रद्द करने की मांग की है।
मध्य प्रदेश की महेश्वर, पेंच परियोजनाओं और कोयले के ब्लाक के दोहन पर रोक लगाने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने केंद्र सरकार पर और विकास विरोधी होने के आरोप लगाए हैं तथा इसे प्रदेश को अंधेरे में धकेलने की साजिश बताया। उनका कहना है कि कहा कि महेश्वर परियोजना के निर्माण कार्य पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं है। इस बारे में वह पहले ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री को पत्र लिख चुके हैं। अब लगता है कि वन मंत्रालय कांग्रेस पार्टी और नर्मदा बचाओ आंदोलन के दबाव में काम कर रहा है। यदि महेश्वर परियोजना पर काम बाधित नहीं होता तो जून 2010 में जल विद्युत परियोजना की पहली इकाई शुरू हो सकती थी, लेकिन रोक लग जाने से प्रदेश में 400 मेगावाट बिजली की कमी होगी और इसके लिए केंद्र सरकार ही जिम्मेदार होगी। उन्होंने कहा कि पेंच की दो ताप विद्युत इकाइयों को पानी देने से रोका गया है, इससे भी बिजली उत्पादन में कमी आएगी।
कांग्रेसी मुख्यमंत्री की इन दलीलों को व्यर्थ बताते हुए कहते हैं कि महेश्वर परियोजना का काम वैसे भी धीमी गति से चल रहा है। फिर पुनर्वास कार्य में तो सरकार ने कोई सक्रियता दिखाई नहीं, जबकि परियोजना की शर्त यही थी कि निर्माण कार्य के साथ-साथ विस्थापितों के पुनर्वास का काम भी पूरा कर लिया जाएगा, लेकिन अभी तक केवल एक गांव में पुनर्वास पैकेज लागू हो पाया है। पांच गांवों में पैकेज मान लेने के बाद भी पुनर्वास कार्य शुरू नहीं हुए। यदि मुख्यमंत्री की बात मान ली जाए तो बिना पुनर्वास के यदि जून में महेश्वर की पहली इकाई चालू होती है, तो आगामी बरसात में परियोजना के डूब क्षेत्र में 50 से ज्यादा गांव बिना पुनर्वास के ही डूब जाएंगे, इसकी चिंता मुख्यमंत्री को नहीं है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी का कहना है कि मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार को यह भरोसा दिलाया था कि महेश्वर परियोजना से प्रभावित अंतिम व्यक्ति का पुनर्वास होने तक बांध में पानी का भराव नहीं किया जाएगा, लेकिन शायद वह अपनी बात भूल गए। उन्होंने विस्थापितों को उचित पुनर्वास देने का अपना वायदा पूरा नहीं किया और अब वह परियोजना को जल्द पूरा करके 60 गांवों में बसे 70 हजार से ज़्यादा परिवारों को भगवान भरोसे छोडऩा चाहते हैं। अपनी गलतियों और कमजोरियों के लिए केंद्र को जिम्मेदार बताना भाजपा की फितरत है।
महेश्वर नर्मदा जल परियोजना के निर्माण का मामला इतना तूल पकड़ गया है कि इसको लेकर केंद्र और मध्य प्रदेश सरकार में जमकर तनातनी चल रही है। यहां तक कि बिना सोचे समझे और तथ्यों को जाने बगैर प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने परियोजना से प्रभावित लोगों के पुनर्वास को लेकर इस पर आगे काम बंद करने के निर्देश दे दिए थे। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बाद में काम चालू करा दिया गया। लेकिन प्रधानमंत्री के इस दुस्साहस पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भड़क उठे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री को मध्यप्रदेश के विकास के प्रति अनुदार और संवेदनहीन बताया। लेकिन, सच्चाई मुख्यमंत्री को भी मालूम है। नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं को सरकारी तंत्र की तुलना में इस क्षेत्र की समस्याओं की कहीं ज़्यादा अच्छी समझ है। वे इन समस्याओं के समाधान के व्यवहारिक तरीके भी जानते हैं, लेकिन भाजपा सरकार से उनके संबंध अच्छे नहीं हैं। इसीलिए सरकार उनकी सुनना नहीं चाहती है। आंदोलन की नेता मेधा पाटकर को तो मुख्यमंत्री एवं भाजपा के बड़े नेता प्रदेश और विकास विरोधी ठहरा चुके हैं, इसीलिए अब सरकारी अफसर उनकी बातों पर ध्यान देना जरूरी नहीं समझते, लेकिन जनता को राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। उसे तो अपनी समस्याओं से मतलब होता है।
मध्य प्रदेश में बिजली और पानी का संकट है, इसीलिए राज्य सरकार अपने जल संसाधनों का भरपूर उपयोग करना चाहती है। वह नदी जल का उपयोग सिंचाई और बिजली दोनों के लिए करना चाहती है। फिर नर्मदा जल के उपयोग का भी सवाल है। नर्मदा प्राधिकरण के पंचाट के अनुसार, मध्यप्रदेश अभी तक अपने हिस्से के जल का उपयोग नहीं कर पाया है। सरकार की सुस्ती एवं लापरवाही के चलते अगले दस सालों में भी मध्य प्रदेश अपने हिस्से के नर्मदा जल का उपयोग नहीं कर पाएगा। ऐसे में गुजरात और महाराष्ट्र को नर्मदा के पानी के उपयोग का अधिकार मिल जाएगा।
गुजरात ने तो प्राधिकरण के फैसले के दिन से ही नर्मदा जल के अधिकतम उपयोग के लिए तैयारी शुरू कर दी थी और अब वह नर्मदा का पानी कच्छ के मरुस्थल तक ले जाने की स्थिति में आ गया है। फिर भी मध्य प्रदेश की ओर से नर्मदा जल के उपयोग के लिए अच्छी शुरुआत हो रही है, लेकिन जल्दबाजी में जो कुछ हो रहा है, उससे सरकार अपने लिए नई-नई समस्याएं पैदा कर रही है।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर बताया है कि नर्मदा की महेश्वर परियोजना से प्रतिदिन 7.2 लाख यूनिट बिजली पैदा होगी, जबकि राज्य की औसत खपत 1,000 लाख यूनिट प्रतिदिन है। इससे स्पष्ट है कि महेश्वर से राज्य की बिजली खपत का एक प्रतिशत से भी कम अंश प्राप्त होगा। फिर भी इसे अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी बताया जा रहा है।
केन्द्र सरकार का आरोप है कि बिजली उत्पादन के लिए राज्य सरकार ने महेश्वर परियोजना से विस्थापित होने वाले 61 गांवों के 70 हजार से अधिक परिवारों के पुनर्वास कार्यों को पूरा कराने पर विशेष ध्यान नहीं दिया। यही कारण है कि परियोजना से विस्थापित होने वाले ग्रामीण अपने अस्तित्व की लड़ाई लडऩे के लिए राजनेताओं और राजनीतिक दलों पर कोई भरोसा नहीं कर रहे हैं। वे नर्मदा बचाओ आंदोलन के झंडे तले अपनी आवाज उठा रहे हैं।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने चालाकी का परिचय देते हुए सरकार के लिए समर्थन जुटाने का भी प्रयास किया। उन्होंने कहा कि महेश्वर परियोजना से इंदौर शहर को प्रतिदिन 300 मिलियन लीटर पानी मिल सकेगा और 2024 तक की पानी की जरूरत इससे पूरी हो सकेगी, लेकिन विस्थापितों के पुनर्वास के बारे में मुख्यमंत्री खुलकर कुछ नहीं बोलते। या यूं कहें कि बोलने से बचना चाहते हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेता आलोक अग्रवाल एवं चितरूपा पालित ने एक नया गले उतरने लायक तर्क छोड़ा है कि मुख्यमंत्री परियोजना के निर्माण कार्य में लगे पूंजीपति ठेकेदारों के हितों की ज़्यादा चिंता कर रहे हैं। इसीलिए वह नर्मदा आंदोलन और यहां तक कि अपनी मर्यादा भूलकर देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ भी नासमझी भरे बयान खुलकर दे रहे हैं। आलोक एवं चितरूपा ने राज्य सरकार पर आम जनता की अपेक्षा निजी परियोजनकर्ता के हितों की चिंता किए जाने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि परियोजनकर्ता को 400 करोड़ रुपये की गारंटी इस शर्त पर दी गई थी कि उसकी होल्डिंग कंपनी द्वारा मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम से लिए गए पैसे वापस करने होंगे। जबकि गारंटी मिलने के बाद कंपनी द्वारा दिए गए 55 करोड़ रुपये के 20 चेक बाउंस हो गए। निगम द्वारा कंपनी के खिलाफ 20 आपराधिक प्रकरण भी कायम किए गए। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद कंपनी से न तो जनता का पैसा वापस लिया गया और न ही आज तक गारंटी रद्द की गई। चितरूपा पालित ने कहा कि परियोजनकर्ता ने विद्युत मंडल एवं नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की 130 करोड़ रुपये की संपत्तियों का पैसा पिछले 14 सालों में आज तक सरकार को नहीं दिया। परियोजनकर्ता के अनुसार, उक्त संपत्तियां अब उनके नाम पर हो गई हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जवाब दे कि बिना पैसा लिए उक्त संपत्तियां परियोजनकर्ता के नाम कैसे हो गईं? उन्होंने पर्यावरण मंत्रालय के आदेश का पालन करते हुए प्रभावितों का संपूर्ण पुनर्वास किए जाने, परियोजनकर्ता को दी गई गारंटी रद्द करने, विद्युत मंडल एवं नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण की संपत्तियों का पैसा परियोजनकर्ता से वसूलने और विद्युत क्रय समझौता रद्द करने की मांग की है।
मध्य प्रदेश की महेश्वर, पेंच परियोजनाओं और कोयले के ब्लाक के दोहन पर रोक लगाने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने केंद्र सरकार पर और विकास विरोधी होने के आरोप लगाए हैं तथा इसे प्रदेश को अंधेरे में धकेलने की साजिश बताया। उनका कहना है कि कहा कि महेश्वर परियोजना के निर्माण कार्य पर रोक लगाने का कोई कारण नहीं है। इस बारे में वह पहले ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री को पत्र लिख चुके हैं। अब लगता है कि वन मंत्रालय कांग्रेस पार्टी और नर्मदा बचाओ आंदोलन के दबाव में काम कर रहा है। यदि महेश्वर परियोजना पर काम बाधित नहीं होता तो जून 2010 में जल विद्युत परियोजना की पहली इकाई शुरू हो सकती थी, लेकिन रोक लग जाने से प्रदेश में 400 मेगावाट बिजली की कमी होगी और इसके लिए केंद्र सरकार ही जिम्मेदार होगी। उन्होंने कहा कि पेंच की दो ताप विद्युत इकाइयों को पानी देने से रोका गया है, इससे भी बिजली उत्पादन में कमी आएगी।
कांग्रेसी मुख्यमंत्री की इन दलीलों को व्यर्थ बताते हुए कहते हैं कि महेश्वर परियोजना का काम वैसे भी धीमी गति से चल रहा है। फिर पुनर्वास कार्य में तो सरकार ने कोई सक्रियता दिखाई नहीं, जबकि परियोजना की शर्त यही थी कि निर्माण कार्य के साथ-साथ विस्थापितों के पुनर्वास का काम भी पूरा कर लिया जाएगा, लेकिन अभी तक केवल एक गांव में पुनर्वास पैकेज लागू हो पाया है। पांच गांवों में पैकेज मान लेने के बाद भी पुनर्वास कार्य शुरू नहीं हुए। यदि मुख्यमंत्री की बात मान ली जाए तो बिना पुनर्वास के यदि जून में महेश्वर की पहली इकाई चालू होती है, तो आगामी बरसात में परियोजना के डूब क्षेत्र में 50 से ज्यादा गांव बिना पुनर्वास के ही डूब जाएंगे, इसकी चिंता मुख्यमंत्री को नहीं है।
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी का कहना है कि मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार को यह भरोसा दिलाया था कि महेश्वर परियोजना से प्रभावित अंतिम व्यक्ति का पुनर्वास होने तक बांध में पानी का भराव नहीं किया जाएगा, लेकिन शायद वह अपनी बात भूल गए। उन्होंने विस्थापितों को उचित पुनर्वास देने का अपना वायदा पूरा नहीं किया और अब वह परियोजना को जल्द पूरा करके 60 गांवों में बसे 70 हजार से ज़्यादा परिवारों को भगवान भरोसे छोडऩा चाहते हैं। अपनी गलतियों और कमजोरियों के लिए केंद्र को जिम्मेदार बताना भाजपा की फितरत है।
रंगीन मिजाज़ विजय शाह
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी राजनैतिक मंडली को पाक-साफ बनाने और सुचिता का पाठ पढ़ाने का चाहें कितना भी जतन कर ले लेकिन अपनी रंगीन मिजाजी और
तानाशाही के कारण वे कहीं न कहीं कुछ ऐसा कर जाते हैं कि कुलीनों के कुनबे के साथ प्रदेश सरकार की अस्मिता भी तार-तार हो जाती है। सत्ता के मद में भले ही भाजपा के मंत्री और कुछ आला नेता भले ही न चूर हों पर उनके साहबजादों पर यह सर चढ़ कर बोल रहा है। नतीजतन उनके पिताओं के नसीब में सार्वजनिक बदनामी आ रही है। कुछ ऐसे भी हैं जो पुत्रों के कारण कानून की जद में भी आ गये हैं। कमल पटेल की जेल यात्रा उनके पुत्र के कारण ही है तो कई मंत्री और बड़े नेताओं की फजीहत भी पुत्रों के कारनामों से हो रही है। ऐसे बदनाम नेताओं की फेहरिस्त मेेंं आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह का नाम सबसे पहले लिया जाता है। यह हकीकत है या फसाना या फिर साजिश यह तो विजय शाह को ही मालूम होगा। इतना जरूर है कि अपने कुछ कदावर मंत्रियों की तथाकथित करतूतों से मुख्यमंत्री भी आजिज आ चुके हैं।
1990 के दशक में जब दिग्विजय सिंह कि सरकार थी तब पुलिस के डंडे खा कर विजय शाह राजनीति में चर्चा का विषय बने थे, लेकिन उसके बाद उनकी चर्चा हमेशा ऐसे ही ऊटपटांग मामलों को लेकर हुई हैं। विजय शाह की रंगीन मिजाजियों के किस्सों की फेहरिस्त इतनी लंबी हैं कि उसकी चर्चा कि जाये तो पूरा ग्रन्थ बन जायेगा। ताजा मामले में मंत्री के एक कर्मचारी की पत्नी ने आरोप लगाया है कि उसके पति ने उसको मंत्री के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए प्रताडि़त किया। यही नहीं, महिला ने थाने जा कर अपने पति और ससुराल वालो के खिलाफ दहेज के लिए प्रताडि़त करने का आरोप भी लगाया है। महिला ने बताया कि वह अपने पति की दूसरी पत्नी है और जब से उसकी शादी हुई है पति विन्सू भालेराव, जो मंत्री की गैस एजेंसी में काम करता है, दहेज के लिए परेशान कर रहा था। जब उसकी मांग पूरी नहीं हुई, तो उसने महिला को मंत्री के साथ अनैतिक कृत्य करने के लिए दवाब बनाया। जब महिला ने इसका विरोध किया, तो जान से मारने की धमकी देने लगा। आखिर में महिला ने थाने पहुंच कर रिपोर्टे दर्ज कराई। चार माह पहले महिला ने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या की कोशिश की थी और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। हालांकि, महिला ने यह भी स्वीकार किया था कि वह मंत्री से आज तक नहीं मिली है। महिला मंत्री से मिलकर अपने पति की शिकायत करना चाहती थी, लेकिन पति ने उसे नहीं मिलने दिया।
हालांकि इस मामले में विजयशाह का कहना है कि पूरा मामला पारिवारिक है। मुझे बेवजह इसमें बदनाम किया जा रहा है। इसके पीछे किसकी साजिश है यह खोज का विषय है। उधर इस मामले में पीडि़त महिला से मिलने गई मप्र कांग्रेस महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष अर्चना जायसवाल ने बताया कि पीडि़त महिला की शिकायत एकदम सही है। उन्होंने कहा कि उक्त महिला के प्रति मंत्री का झुकाव पहले से ही था और उन्हीं की पहल पर मंत्री के कर्मचारी विन्सू भालेराव से उक्त महिला की शादी डेढ़ वर्ष पहले हुई थी। यह महिला की भी और भालेराव की भी दूसरी शादी है। महिला का पहला पति गुजर चुका है, जबकि विन्सू भालेराव ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ कर इस महिला से शादी की थी। महिला का पहले पति से एक लड़का भी है।
हकीकत चाहे कुछ भी हो लेकिन कुंवर विजय शाह की पिछले कार्यकाल की कारगुजारियां किसी से छिपी नहीं हैं और अगर उनके सापेक्ष में देखा जाए तो इस घटना से इनकार भी नहीं किया जा सकता। उन्होंने किस तरह से पिछले कार्यकाल में मंत्री पद का दुरुपयोग किया, इससे जुड़ी शिकायतों की फेहरिस्त भी काफी लंबी है। इस सबसे इतर उनका एक खास अवगुण किसी भी दिन शिवराज और समूची बीजेपी के लिए भारी सिरदर्द बन सकता है... खुद शिवराज से लेकर भाजपा के तमाम नेतागण जानते हैं।
अपनी उस आदत के लिए विजय शाह किस हद तक चले जाते हैं...उनके पिछले कार्यकाल में शिवराज देख चुके हैं। पर्दा नहीं डाला गया होता तो उस आदत को लेकर शाह पिछले कार्यकाल में ही न केवल एक्सपोज हो जाते, बल्कि उनका राजनैतिक कैरियर भी तबाह हो गया होता। यही नहीं शाह के विरुद्ध आदिमजाति कल्याण विभाग में कंप्यूटर और इनवर्टर खरीदी में घोटाले की जांच जारी हैं तथा वन विभाग में बंदूकों की खरीदी की भी ई. ओ.डब्ल्यू जांच जारी हैं।
शिवराज को जानने वाले कहते हैं कि वे भीं यह सब पसंद नहीं करते हैं, लेकिन वे बेचारे क्या करें उन्होंने दिल्ली के दबाव में इस मनचले व्यक्तित्व वाले शख्स को मंत्री बना दिया हैं, सो इसका खामियाजा भविष्य में पूरी भाजपा को भोगना पड़ेगा, क्योंकि खण्डवा में संत कि समाधि पर अधनंगी रूसी बालाओं को नचाकर उन्होंने भाजपा की सूचिता को तार-तार कर डाला था। संत की समाधी पर चल रहे जलसे में उमड़ी थी हजारों की भीड़। भीड़ के नायक थे मध्यप्रदेश के केबिनेट मंत्री कुंवर विजय शाह। इनके पोस्टर जगह-जगह लगे थे तभी एक रुसी बैले डांसर मंच पर आती हैं और एक-एक करके सारे झालर नुमा कपड़े उतार देती हैं। बचते हैं तो सिर्फ अंत:वस्त्र.... खंडवा के निमाड़ी ग्रामीणों की बोली में गोरी औरत नाची चड्डी बनियान में। मजे की बात यह हैं कि इस सब के आयोजक मध्यप्रदेश सरकार और उसके आदिमजाति कल्याण मंत्री विजय शाह थे। इन्हें विवादित विजय शाह कहा जाये तो ठीक होगा। क्योंकि इस तरह के घोषित अघोषित आयोजनों में इनका नाम आना लाजिमी सी बात हैं। यही वजह हैं कि विजय शाह को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आठ महीने के लिए उन्हें केबिनेट से बाहर तक कर दिया था। लेकिन शिवराज भी क्या करें हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे की तर्ज पर उन्हें मजबूरी में विजय शाह को मंत्री मंडल में शामिल करना पड़ा। दिल्ली का दबाव ऐसा था की शिवराज को न चाहते हुए भी विजय शाह को मंत्री बनाना पड़ा ।
इससे पहले भी आदिवासी वोट पाने के लिए विजय शाह ने चार साल पहले से दातार साहब की समाधि पर मालगांव उत्सव का आयोजन सरकारी पैसे से शुरू करवाया, पहले विजय शाह ने वहां संस्कृति के नाम पर बेडनियों का डांस करवाया था, तब उस मामले को दबा दिया गया। लेकिन जब इस बार विजय शाह ने विदेशी लड़कियों को संत की समाधि पर नचवाया तो बखेड़ा शुरू हो गया। संत की समाधि पर नंगा नाच हुआ यह सच हैं और इस पर विवाद भी स्वाभाविक हैं। सवाल साफ हैं कि क्या एक संत की समाधि पर अधनंगी लड़कियों का नाच जरूरी था क्या? क्या विजय शाह की इस करतूत से बीजेपी की रीति नीतियाँ मेल खाती हैं? बीजेपी क्या ऐसे ही आयोजनों के जरिये दूसरों से अलग होना चाहती हैं या उसे और उसके नेताओं को अपना जनाधार बनाए रखने के लिए अधनंगी विदेशी लड़कियों का सहारा लेना पड़ रहा हैं।
आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह जहां अपनी करतूतों के कारण हमेशा विवादों में फंसे रहते हैं वहीं उनके सुपुत्र भी उनसे कम नहीं है। इंदौर में एक उद्योगपति की बेटी के बेहोशी की हालत में एक फ्लैट के बाहर पड़े मिलने के बाद उनके बेटे पर आरोप लगे थे। आरोप था कि शराब के नशे में उनके बेटे ने इस छात्रा को कमरे से बाहर फेंक दिया था। तब यह बात भी सामने आई थी कि मंत्री पुत्र और छात्रा समेत उनके सभी साथी नशे में धूत्त थे और शराब ज्यादा हो जाने के कारण वे अपनी साथी को छोड़ भाग गये थे। हालांकि दोनों पक्षों ने पुलिस में इस बारे में कोई शिकायत नहीं की। इसी घटना के कुछ दिन बाद ही विजय शाह के पुत्र इंदौर के एक व्यस्त चौराहे पर तेज गाड़ी चलाते हुए एक्सीडेंट करने के मामले में झड़प के शिकार हुए। बताया जाता है कि मंत्री पुत्र के साथ गुस्साए लोगों ने हाथापाई भी की। इस मामले में भी राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस ने मंत्री पुत्र के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।
अपने पिछले कार्यकाल में भी अपनी विवादित टिप्पणी के कारण विजयशाह सुर्खियों में छाए रहे। ब्राह्मणों के खिलाफ की गई टिप्पणी के विरोध में कुछ युवकों का हुजूम उनके आवास पर मुंह काला करने पहुंच गया था। हाथ में काला रंग लिए युवक मंत्री तक पहुंचते इससे पहले ही पुलिस ने तीन युवकों को दबोच लिया था। ये युवक वन मंत्री की ब्राह्मणों के खिलाफ की गई टिप्पणी से नाराज थे और उन पर काला रंग पोतना चाह रहे थे। यही नहीं अभी कुछ दिन पूर्व ही एक सरकारी योजना में घपले की शिकायत की जांच करने आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह की अगुआई में शिवपुरी पहुंचे दल पर हितग्राहियों ने हमला कर दिया। विजय शाह करैरा के विधायक रमेश खटीक की शिकायत पर शिवपुरी जिले में सफाई कामगारों को एसआरएमएस योजना के तहत उद्योग एवं व्यवसायों के लिए वितरित किए गए लाखों रुपए के ऋण प्रकरणों की जांच करने यहां आए थे। रेस्ट हाउस में विधायक खटीक से चर्चा करने के बाद जब शाह का काफिला जांच दल में शामिल अफसरों के साथ गांधी कॉलोनी स्थित अजाक्स के पूर्व जिलाध्यक्ष कमल किशोर कोड़े के परिवार के सदस्यों के घरों पर पहुंचे तो मामला गरमा गया। मौके की नजाकत को भांपते हुए शाह हितग्राहियों के घरों में स्टील एवं अन्य प्लांट को देखने खुद नहीं गए और समीप ही भाजपा कार्यकर्ता के घर जाकर बैठ गए। जांच के लिए विधायक खटीक, पूर्व विधायक ओमप्रकाश खटीक, शिवपुरी विधायक माखनलाल राठौर के साथ विभाग के अफसर हितग्राहियों के घर पहुंचे। यहीं बात बिगड़ गई और शिवदास कोड़े के घर में हितग्राहियों और उनके परिवार के सदस्यों ने जांच दल पर हमला कर दिया। लोगों ने भाजपा कार्यकर्ता एवं मप्र सफाई कामगार संगठन के सदस्य महेशचंद्र डागौर को पटक-पटक कर पीटा गया। लोगों के हाथ विधायक खटीक की गिरेबां तक पहुंच गए। मारपीट होती देख खटीक मौके से भागे। जांच दल में शामिल अफसर भी भागकर मंत्री शाह के पास पहुंचे और मामले की जानकारी दी। इसके बाद शाह भी बिना जांच किए गाड़ी में बैठकर निकल गए।
स्वर्णिम मध्यप्रदेश का सपना संजोए प्रदेश के विकास को गति देने में लगे मुख्यमंत्री की मंशा पर अगर इसी तरह उनके मंत्री पानी फेरते रहे तो प्रदेश की हालत क्या होगी यह तो भगवान ही बता सकता है।
तानाशाही के कारण वे कहीं न कहीं कुछ ऐसा कर जाते हैं कि कुलीनों के कुनबे के साथ प्रदेश सरकार की अस्मिता भी तार-तार हो जाती है। सत्ता के मद में भले ही भाजपा के मंत्री और कुछ आला नेता भले ही न चूर हों पर उनके साहबजादों पर यह सर चढ़ कर बोल रहा है। नतीजतन उनके पिताओं के नसीब में सार्वजनिक बदनामी आ रही है। कुछ ऐसे भी हैं जो पुत्रों के कारण कानून की जद में भी आ गये हैं। कमल पटेल की जेल यात्रा उनके पुत्र के कारण ही है तो कई मंत्री और बड़े नेताओं की फजीहत भी पुत्रों के कारनामों से हो रही है। ऐसे बदनाम नेताओं की फेहरिस्त मेेंं आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह का नाम सबसे पहले लिया जाता है। यह हकीकत है या फसाना या फिर साजिश यह तो विजय शाह को ही मालूम होगा। इतना जरूर है कि अपने कुछ कदावर मंत्रियों की तथाकथित करतूतों से मुख्यमंत्री भी आजिज आ चुके हैं।
1990 के दशक में जब दिग्विजय सिंह कि सरकार थी तब पुलिस के डंडे खा कर विजय शाह राजनीति में चर्चा का विषय बने थे, लेकिन उसके बाद उनकी चर्चा हमेशा ऐसे ही ऊटपटांग मामलों को लेकर हुई हैं। विजय शाह की रंगीन मिजाजियों के किस्सों की फेहरिस्त इतनी लंबी हैं कि उसकी चर्चा कि जाये तो पूरा ग्रन्थ बन जायेगा। ताजा मामले में मंत्री के एक कर्मचारी की पत्नी ने आरोप लगाया है कि उसके पति ने उसको मंत्री के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए प्रताडि़त किया। यही नहीं, महिला ने थाने जा कर अपने पति और ससुराल वालो के खिलाफ दहेज के लिए प्रताडि़त करने का आरोप भी लगाया है। महिला ने बताया कि वह अपने पति की दूसरी पत्नी है और जब से उसकी शादी हुई है पति विन्सू भालेराव, जो मंत्री की गैस एजेंसी में काम करता है, दहेज के लिए परेशान कर रहा था। जब उसकी मांग पूरी नहीं हुई, तो उसने महिला को मंत्री के साथ अनैतिक कृत्य करने के लिए दवाब बनाया। जब महिला ने इसका विरोध किया, तो जान से मारने की धमकी देने लगा। आखिर में महिला ने थाने पहुंच कर रिपोर्टे दर्ज कराई। चार माह पहले महिला ने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या की कोशिश की थी और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। हालांकि, महिला ने यह भी स्वीकार किया था कि वह मंत्री से आज तक नहीं मिली है। महिला मंत्री से मिलकर अपने पति की शिकायत करना चाहती थी, लेकिन पति ने उसे नहीं मिलने दिया।
हालांकि इस मामले में विजयशाह का कहना है कि पूरा मामला पारिवारिक है। मुझे बेवजह इसमें बदनाम किया जा रहा है। इसके पीछे किसकी साजिश है यह खोज का विषय है। उधर इस मामले में पीडि़त महिला से मिलने गई मप्र कांग्रेस महिला मोर्चा की प्रदेश अध्यक्ष अर्चना जायसवाल ने बताया कि पीडि़त महिला की शिकायत एकदम सही है। उन्होंने कहा कि उक्त महिला के प्रति मंत्री का झुकाव पहले से ही था और उन्हीं की पहल पर मंत्री के कर्मचारी विन्सू भालेराव से उक्त महिला की शादी डेढ़ वर्ष पहले हुई थी। यह महिला की भी और भालेराव की भी दूसरी शादी है। महिला का पहला पति गुजर चुका है, जबकि विन्सू भालेराव ने अपनी पहली पत्नी को छोड़ कर इस महिला से शादी की थी। महिला का पहले पति से एक लड़का भी है।
हकीकत चाहे कुछ भी हो लेकिन कुंवर विजय शाह की पिछले कार्यकाल की कारगुजारियां किसी से छिपी नहीं हैं और अगर उनके सापेक्ष में देखा जाए तो इस घटना से इनकार भी नहीं किया जा सकता। उन्होंने किस तरह से पिछले कार्यकाल में मंत्री पद का दुरुपयोग किया, इससे जुड़ी शिकायतों की फेहरिस्त भी काफी लंबी है। इस सबसे इतर उनका एक खास अवगुण किसी भी दिन शिवराज और समूची बीजेपी के लिए भारी सिरदर्द बन सकता है... खुद शिवराज से लेकर भाजपा के तमाम नेतागण जानते हैं।
अपनी उस आदत के लिए विजय शाह किस हद तक चले जाते हैं...उनके पिछले कार्यकाल में शिवराज देख चुके हैं। पर्दा नहीं डाला गया होता तो उस आदत को लेकर शाह पिछले कार्यकाल में ही न केवल एक्सपोज हो जाते, बल्कि उनका राजनैतिक कैरियर भी तबाह हो गया होता। यही नहीं शाह के विरुद्ध आदिमजाति कल्याण विभाग में कंप्यूटर और इनवर्टर खरीदी में घोटाले की जांच जारी हैं तथा वन विभाग में बंदूकों की खरीदी की भी ई. ओ.डब्ल्यू जांच जारी हैं।
शिवराज को जानने वाले कहते हैं कि वे भीं यह सब पसंद नहीं करते हैं, लेकिन वे बेचारे क्या करें उन्होंने दिल्ली के दबाव में इस मनचले व्यक्तित्व वाले शख्स को मंत्री बना दिया हैं, सो इसका खामियाजा भविष्य में पूरी भाजपा को भोगना पड़ेगा, क्योंकि खण्डवा में संत कि समाधि पर अधनंगी रूसी बालाओं को नचाकर उन्होंने भाजपा की सूचिता को तार-तार कर डाला था। संत की समाधी पर चल रहे जलसे में उमड़ी थी हजारों की भीड़। भीड़ के नायक थे मध्यप्रदेश के केबिनेट मंत्री कुंवर विजय शाह। इनके पोस्टर जगह-जगह लगे थे तभी एक रुसी बैले डांसर मंच पर आती हैं और एक-एक करके सारे झालर नुमा कपड़े उतार देती हैं। बचते हैं तो सिर्फ अंत:वस्त्र.... खंडवा के निमाड़ी ग्रामीणों की बोली में गोरी औरत नाची चड्डी बनियान में। मजे की बात यह हैं कि इस सब के आयोजक मध्यप्रदेश सरकार और उसके आदिमजाति कल्याण मंत्री विजय शाह थे। इन्हें विवादित विजय शाह कहा जाये तो ठीक होगा। क्योंकि इस तरह के घोषित अघोषित आयोजनों में इनका नाम आना लाजिमी सी बात हैं। यही वजह हैं कि विजय शाह को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने आठ महीने के लिए उन्हें केबिनेट से बाहर तक कर दिया था। लेकिन शिवराज भी क्या करें हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे की तर्ज पर उन्हें मजबूरी में विजय शाह को मंत्री मंडल में शामिल करना पड़ा। दिल्ली का दबाव ऐसा था की शिवराज को न चाहते हुए भी विजय शाह को मंत्री बनाना पड़ा ।
इससे पहले भी आदिवासी वोट पाने के लिए विजय शाह ने चार साल पहले से दातार साहब की समाधि पर मालगांव उत्सव का आयोजन सरकारी पैसे से शुरू करवाया, पहले विजय शाह ने वहां संस्कृति के नाम पर बेडनियों का डांस करवाया था, तब उस मामले को दबा दिया गया। लेकिन जब इस बार विजय शाह ने विदेशी लड़कियों को संत की समाधि पर नचवाया तो बखेड़ा शुरू हो गया। संत की समाधि पर नंगा नाच हुआ यह सच हैं और इस पर विवाद भी स्वाभाविक हैं। सवाल साफ हैं कि क्या एक संत की समाधि पर अधनंगी लड़कियों का नाच जरूरी था क्या? क्या विजय शाह की इस करतूत से बीजेपी की रीति नीतियाँ मेल खाती हैं? बीजेपी क्या ऐसे ही आयोजनों के जरिये दूसरों से अलग होना चाहती हैं या उसे और उसके नेताओं को अपना जनाधार बनाए रखने के लिए अधनंगी विदेशी लड़कियों का सहारा लेना पड़ रहा हैं।
आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह जहां अपनी करतूतों के कारण हमेशा विवादों में फंसे रहते हैं वहीं उनके सुपुत्र भी उनसे कम नहीं है। इंदौर में एक उद्योगपति की बेटी के बेहोशी की हालत में एक फ्लैट के बाहर पड़े मिलने के बाद उनके बेटे पर आरोप लगे थे। आरोप था कि शराब के नशे में उनके बेटे ने इस छात्रा को कमरे से बाहर फेंक दिया था। तब यह बात भी सामने आई थी कि मंत्री पुत्र और छात्रा समेत उनके सभी साथी नशे में धूत्त थे और शराब ज्यादा हो जाने के कारण वे अपनी साथी को छोड़ भाग गये थे। हालांकि दोनों पक्षों ने पुलिस में इस बारे में कोई शिकायत नहीं की। इसी घटना के कुछ दिन बाद ही विजय शाह के पुत्र इंदौर के एक व्यस्त चौराहे पर तेज गाड़ी चलाते हुए एक्सीडेंट करने के मामले में झड़प के शिकार हुए। बताया जाता है कि मंत्री पुत्र के साथ गुस्साए लोगों ने हाथापाई भी की। इस मामले में भी राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस ने मंत्री पुत्र के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।
अपने पिछले कार्यकाल में भी अपनी विवादित टिप्पणी के कारण विजयशाह सुर्खियों में छाए रहे। ब्राह्मणों के खिलाफ की गई टिप्पणी के विरोध में कुछ युवकों का हुजूम उनके आवास पर मुंह काला करने पहुंच गया था। हाथ में काला रंग लिए युवक मंत्री तक पहुंचते इससे पहले ही पुलिस ने तीन युवकों को दबोच लिया था। ये युवक वन मंत्री की ब्राह्मणों के खिलाफ की गई टिप्पणी से नाराज थे और उन पर काला रंग पोतना चाह रहे थे। यही नहीं अभी कुछ दिन पूर्व ही एक सरकारी योजना में घपले की शिकायत की जांच करने आदिम जाति कल्याण मंत्री विजय शाह की अगुआई में शिवपुरी पहुंचे दल पर हितग्राहियों ने हमला कर दिया। विजय शाह करैरा के विधायक रमेश खटीक की शिकायत पर शिवपुरी जिले में सफाई कामगारों को एसआरएमएस योजना के तहत उद्योग एवं व्यवसायों के लिए वितरित किए गए लाखों रुपए के ऋण प्रकरणों की जांच करने यहां आए थे। रेस्ट हाउस में विधायक खटीक से चर्चा करने के बाद जब शाह का काफिला जांच दल में शामिल अफसरों के साथ गांधी कॉलोनी स्थित अजाक्स के पूर्व जिलाध्यक्ष कमल किशोर कोड़े के परिवार के सदस्यों के घरों पर पहुंचे तो मामला गरमा गया। मौके की नजाकत को भांपते हुए शाह हितग्राहियों के घरों में स्टील एवं अन्य प्लांट को देखने खुद नहीं गए और समीप ही भाजपा कार्यकर्ता के घर जाकर बैठ गए। जांच के लिए विधायक खटीक, पूर्व विधायक ओमप्रकाश खटीक, शिवपुरी विधायक माखनलाल राठौर के साथ विभाग के अफसर हितग्राहियों के घर पहुंचे। यहीं बात बिगड़ गई और शिवदास कोड़े के घर में हितग्राहियों और उनके परिवार के सदस्यों ने जांच दल पर हमला कर दिया। लोगों ने भाजपा कार्यकर्ता एवं मप्र सफाई कामगार संगठन के सदस्य महेशचंद्र डागौर को पटक-पटक कर पीटा गया। लोगों के हाथ विधायक खटीक की गिरेबां तक पहुंच गए। मारपीट होती देख खटीक मौके से भागे। जांच दल में शामिल अफसर भी भागकर मंत्री शाह के पास पहुंचे और मामले की जानकारी दी। इसके बाद शाह भी बिना जांच किए गाड़ी में बैठकर निकल गए।
स्वर्णिम मध्यप्रदेश का सपना संजोए प्रदेश के विकास को गति देने में लगे मुख्यमंत्री की मंशा पर अगर इसी तरह उनके मंत्री पानी फेरते रहे तो प्रदेश की हालत क्या होगी यह तो भगवान ही बता सकता है।
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